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गीता चाची -Geeta chachi complete

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चाचीजी भी अब अपने ही पति की गांड मारी जाने का यह तमाशा देखने को बहुत उत्सुक हो गयी थीं. मुझे बोलीं. "चढ़ जा बेटे, चोद ले इन्हें. मैंने सोचा था कि एक साथ हनीमून में तुम दोनों एक दूसरे की गांड मारोगे. अब अपने चाचाजी के साथ की तेरी सुहागरात के लिये तेरी कुंवारी गांड रहे, इतना बस है. इनकी तो बहुतों ने मारी होगी, तू भी मार ले."

में उनके पास जाकर बैठ गया और उनके चूतड़ सहलाने लगा. पहली बार किसी मर्द की गांड इतनी पास से साफ़ देख रहा था, और वह भी अपने हट्टे कट्टे हैंडसम चाचाजी की. उनके चूतड़ मस्त भारी भरकम थे. गठे हुए मांस पेशियों से भरे, चिकने और गोरे उन नितंबों को देख मेरे लंड ने ही अपनी राय पहले जाहिर की और कस कर और टन्ना कर खड़ा हो गया. दोनों चूतड़ों के बीच गहरी लकीर थी और गांड का छेद भूरे रंग के एक बंद मुंह सा लग रहा था.

उसमें उंगली करने का मेरा मन हुआ और मैंने उंगली चाची की चूत में गीली कर के धीरे से उसमें डाली. मुझे लगा कि मुश्किल से जाएगी पर उनकी गांड में बड़ी आसानी से वह उतर गई. अंदर से बड़ा कोमल था चाचाजी का गुदाद्वार. मेरे उंगली करते ही वे हुमक कर कहा, "हा ऽ य राजा मजा आ गया, और उंगली कर ना, इधर उधर चला." मैने उंगली घुमाई और फ़िर धीरे से दूसरी भी डाल दी. फ़िर उन्हें अंदर बाहर करने लगा. आराम से उस मुलायम छेद में मेरी उंगलियां घुस रही थीं जैसे गांड नहीं, किसी युवती की चूत हो.

चाची अब तक हस्तमैथुन करने में जुट गयी थीं. हांफ़ते हुए बोलीं. "मैं कहती थी ना, तेरे जैसी कुंवारी नहीं है इनकी गांड . पर है बड़ी गहरी. लगता है मजा आ रहा है तुझे अपने चाचा की गांड में उंगली करने में." मुझे तो उस गांड पर इतना प्यार आ रहा था कि उसे चूमने की बहुत इच्छा हो रही थी.

न रहकर मैने झुककर उनके नितंबों को चूम लिया. फ़िर चूमता हुआ और जीभ से चाटता हुआ उनके गुदा के छेद की ओर बढ़ा. मुंह छेद के पास लाकर मैने उंगलियां निकाल ली और उन्हें सुंघा. चाची की गांड मारने के पहले मैंने काफ़ी बार उसमें उंगली की थी और सुंघा था, चाचाजी की गांड की मादक गंध भी मुझे बड़ी मतवाली लगी. "चुम्मा दे दे बेटे उसे, जैसे मेरी गांड को देता है. बिचारी तेरी जीभ के लिये तड़प रही है." चाची ने घचाघच मुठ्ठ मारते हुए कहा. आखिर साहस करके मैने अपने होंठ उनके गुदा पर रख दिये और चूसने लगा.

उस सौंधे स्वाद से जो आनंद मिला वह क्या कहूं. चाचाजी ने भी अपने हाथों से अपने ही चूतड़ फैला कर अपना गुदा खोला. मैं देखकर हैरान रह गया. मुझे लग रहा था कि जैसा सबका होता है वैसा छोटा सकरा भूरा छेद होगा. पर उनका छेद तो मस्त मुंह जैसा खुल गया और उसकी गुलाबी कोमल झलक देख कर मैने उसमें जीभ डाल दी.

"शाब्बास मेरे राजा, मस्त चाटता है तू गांड, जरा जीभ और अंदर डाल." चाचाजी निहाल हो कर बोले. आखिर भरपूर अपनी गांड चुसवा कर वे गरम हो गये. "मार ले अब मेरी बेटे, अब नहीं रहा जाता. तेरी चाची पर भी चढने की इच्छा हो रही है."

चाची ने मुझे पास खींच कर जोर जोर से मेरा लंड चूस कर गीला किया और फ़िर बोलीं. "चढ़ जा अब इनपर, मार ले इनकी, अब नहीं रहा जाता, इनका लंड मैं अपनी चूत में लेना चाहती हूं. मस्त गीली है इनकी गांड तेरे चूसने से, आराम से घुस जाएगा तेरा लौड़ा"

मैं चाचजी के कूल्हों के दोनों ओर घुटने जमा कर बैठा और अपना सुपाड़ा उनके गुदा में दबा दिया. चाचाजी ने अपने चूतड़ पकड़ कर खींच रखे थे और इसलिये बड़े आराम से उनके खुले छेद में पाक की आवाज के साथ मेरा शिश्नाग्र अंदर हो गया. उस मुलायम छेद के सुखद स्पर्श से मैं और उत्तेजित हो उठा और एक धक्के में अपना लंड जड़ तक उनकी गांड में उतार दिया.

 
चाची बोलीं "अनिल, मेरी गांड में लंड डालने को तुझे दस मिनिट लगे थे. इनकी में दस सेकंड में काम हो गया. अपनी पत्नी से ज्यादा मुलायम है इनकी गांड ." अब चाचाजी ने चूतड़ छोड़े और अपना छल्ला सिकोड़ कर मेरा लंड गांड से पकड़ लिया.

चाची अब तक बिलकुल तैयार थीं. नीचे बिस्तर पर एक तकिये पर अपने नितंब टिका कर और पैर फैला कर चूत खोले बांहें फैलाये अपने पति का इंतजार कर रही थीं. मुझे पीठ पर लिये ही चाचाजी उठे और उनके पैरों के बीच झुक कर बैठ गये. उनका लंड अब पूरा जोर से खड़ा था. चाचीने खुद उनके सुपाड़े को अपनी बुर के द्वर पर रखा और चाचाजी उसे पेलने लगे.

इंच इंच करके वह सोंटे जैसा लंड चाचीकी चूत में घुसने लगा. चाची आनंद से सिहर उठीं. "हाय मेरे प्राणनाथ, आज तो देवी को प्रसाद चढ़ाऊंगी! मेरी बुर कब से आपका इंतजार कर रही थी. मर गई रे!." वे दर्द से चिल्लाईं जब जड़ तक नौ इंची शिश्न उनकी जांघों के बीच में धंस गया.

चाचाजी भी अब मजा ले रहे थे. "मेरी रानी, दुखा क्या? कितनी मखमली है तेरी चूत, और कितनी गीली! अरे मुझे पता होता कि चोदने में इतना मजा आता है तो क्यों इतना समय मैं गंवाता." उनके आनंद को बढ़ाने को मैंने अपना लंड उनकी गांड में मुठियाया तो वे सिसक कर चाची पर लेट गये और उन्हें चोदने लगे. चाची भी अब तक अपना दर्द भूल कर चुदाने को बेताब हो गयी थीं.

मैं चाचाजी के ऊपर लेट गया और बेतहाशा उनकी चिकनी पीठ और मांसल कंधे चूमने लगा. मेरे वजनको आसानी से सहते हुए वे अब पूरे जोर से चाची को चोदने लगे. चाची भी दो दो शरीरों का वजन आराम से सह रही थीं क्योंकि इतने मोटे लंड से चुदाने में उन्हें स्वर्ग का आनंद आ रहा था. "चोदो जी, और जोर से चोदो, अपनी बीवी की चूत फ़ाड़ डालो, तुम्हें हक है मेरे नाथ." ऐसा चिल्लाते हुए चाची चूतड़ उचका कर चुदवा रही थीं.

चाचाजी भी सुख के शिखर पर थे. उनकी गांड में एक जवान तनाया हुआ लंड घुसा हुआ था और खुद उनका शिश्न एक तपती गीली मखमली म्यान का मजा ले रहा था. "मेरे राजा, मेरे बेटे, बहुत प्यारा है तेरा लंड, बड़ा मस्त लग रहा है गांड में, है थोड़ा छोटा पर एकदम सख्त है, लोहे जैसा. मार बेटे, अब चुपचाप न पड़ रह, गांड मार मेरी"

मैं धीरे धीरे मजे लेकर उनकी गांड मारने लगा. मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि किसी मर्द की गांड मारना इतना सुखद अनुभव होगा. और ऊपर से मैं अपने सगे चाचा की गांड मार रहा था. उनकी गांड एकदम कोमल और गरम थी और मेरे लंड को प्यार से पकड़कर सेक रही थी. अपना गुदा का छल्ला सिकोड़ सिकोड़ कर एक एक्सपर्ट की तरह चाचाजी मस्त मरवा रहे थे. मैंने अपनी बांहें चाचाजी के और चाची के शरीर के बीच घुसा कर उनकी छाती को बांहों में भर लिया और ओर जोर से गांड मारने लगा. मेरे हाथों पर चाची के कोमल स्तनों का भी दबाव महसूस हो रहा था.

 
"शाबास मेरे राजा, मार और जोर से, और मेरे निपल दबा बेटे प्लीज़, समझ औरत के हैं." चाचाजी के निपल दबाता

और उंगलियों में लेकर मसलता हुआ मैं एक चित्त होकर उनकी गांड को भोगने लगा. उनके निपल औरत की तरह सख्त हो गये थे. बिलकुल झड़ने ही वाला था पर चाची समझ गईं, बोलीं "बेटे, झड़ना नहीं, तुझे मेरी कसम, इन्हें घंटे भर मुझे चोदने दे, जब ये झड़ें फ़िर ही तू झड़ना." मैंने किसी तरह अपने आप को रोका और हांफ़ता हुआ पड़ा

रहा.

मेरे इस संयम पर खुश होकर चाची ने चाचाजी के कंधे पर से गर्दन निकाल कर मुझे चूम लिया. उनके मीठे चुंबन से मेरा हौसला बढ़ा और मैं फ़िर चाचाजी की गांड मारने लगा. चाचाजी ने भी इनाम स्वरुप अपना सिर घुमाया और अपना हाथ पीछे करके मेरी गर्दन में डालकर मेरे सिर को पास खींच लिया. "चुम्मा दे राजा, चुंबन देते हुए गांड मार अपने चाचा की."

मैमे अपने होंठ उनके होंठों पर रख दिये और पास से उनकी वासना भरी आंखों में एक प्रेमी की तरह झांकता हुआ उनका मुंह चूसने लगा. सिगरेट के धुएं से मिले उनके मुंह के रस का स्वाद किसी सुंदरी के मुंह से ज्यादा मीठा लग रहा था. जल्द ही खुले मुंह में घुस कर हमारी जीभें लड़ीं और एक दूसरे की जीभ चूसते हुए हमने फ़िर संभोग शुरू कर दिया. गांड में लंड के फ़िर गहरे घुसते ही चाचाजी चहक उठे. "मार जोर से, फुकला कर दे, मां कसम, मैं भी आज तेरी चाची को चोद चोद कर फुकला कर देता हूं, हमेशा याद रखेगी, बस तू मेरी मारता रह."

घंटे भर तो नहीं पर आधा घंटे हम तीनों की यह चुदाई चलती रही. अंत में चाची झड़ झड़ कर इतनी थक गयी थीं कि चाचाजी से उन्हें छोड़ देने की गुहार करने लगीं. चाचाजी तैश में थे, और जोर से चोदने लगे. आखिर जब चाची लस्त होकर बेहोश सी हो गयीं तब जाकर वे झड़े. उनके झड़ते ही मैंने भी कस के धक्के लगाये और उनकी जीभ चूसते हुए मैं भी झड़ गया. चाचाजी वाकई गांड मराने में माहिर थे, उनकी गांड ने मेरे लंड को मानों दुहते हुए पूरा वीर्य निचोड़ लिया.

आखिर झड़ा लंड निकाल कर मैं पलंग पर पड़ा सुस्ताने लगा. अब पति पत्नी पड़े पडे. प्यार से चूमा चाटी कर रहे थे. मुझे देख कर बड़ा अच्छा लगा. आखिर मेरी भी मेहनत थी. साथ साथ अब प्रीति को मन चाहे भोगने मिलेगा यह मस्त एहसास था. मैंने चाची से कहा कि जब उनके पतिदेव अपना लंड बाहर निकालें तो मुझे सूचित कर दें; आराम से सावधानी से निकालें. दोनों समझ गये और मेरे इस चाहत पर प्यार से मुस्करा दिये.

आखिर जब चाचाजी ने अपना लंड चाची की चूत से निकाला तो मैं तैयार था. चाची ने तुरंत अपनी टांगें हवा में उठा लीं ताकि चूत मे भरा वीर्य टपक न जाये. मैंने चट से चाचाजी का मुरझाया शिश्न मुंह में लेकर चूस डाला. चाची के रस और उनके वीर्य के मिले जुले पानी को चाट कर उनका लंड साफ़ किया और आखिर उस खजाने की ओर मुड़ा जो चाची की बुर में जमा था. चूत से मुंह लगा कर जीभ घुसेड़ कर मैं उस मिश्रण का पान करने लगा. मुझे मानों अमृत मिल गया था.

जब तक मैं चाची की बुर चूस रहा था, चाचाजी मेरी गांड से खेल रहे थे. उसे एक दो बार चूमा और फ़िर एक उंगली गीली करके अन्दर डालने लगे. उंगली गई तो पर जरा मुशिल से और मुझे थोड़ा दर्द होने से मैं विचक उठा. चाचाजी मेरे गुदा के कसे कौमार्य पर फ़िदा होकर अपनी पत्नी से याचना करने लगे. "मेरी रानी, अब तो तुम्हारा काम हो गया, मैं तुम्हारा गुलाम हो गया. अब मेरी सुहागरात करवा दो इस प्यारे बच्चे के साथ जैसा तुमने वादा किया

था."

 
चाची मेरे सिर को अपनी बुर पर कस कर दबा चूत चुसवाती हुई बोलीं. "बस नरसों करा दूंगी. अब दो दिन मेरी गुलामी करो, मुझे चोदो रात दिन, चाहो तो मेरी गांड भी मार लो, पर बुर चूसना भी पड़ेगी. इतने दिन मेरी बुर का पानी व्यर्थ बहा है, अब तुम्हे पिलाऊंगी. और लल्ला तुझे भी, तू फ़िकर न कर."

मैं उठ कर बैठ गया. चाची आगे बोलीं. "लल्ला को अब तीन दिन छुट्टी देते हैं ताकि यह पूरा ताजा तवाना हो जाये. तुम दो दिन मुझे खूब भोगो, मुझे खुश कर दो. परसों रात से तुम्हें भी एक दिन का आराम दूंगी ताकि तुम अपने पूरी शक्ति से तुम इस लड़के का कौमार्य भंग करने का आनंद उठा सको."

मैंने तीन दिन सेक्स से वंचित रखे जाने एक प्लान पर विरोध किया पर दोनों ने मेरी एक न सुनी. हां, मुझे एक चुदाई का आखरी उपहार देने के स्वरूप मेरी चुदैल चाची ने यह इच्छा जाहिर की कि आज की रात भर मैं और चाचाजी एक साथ उन्हें आगे पीछे से भोगें. जाहिर था कि चाची की कामोत्तेजना अब चरम सीमा पर थी. अपने दोनों छेदों में एक एक लंड एक साथ लेना चाहती थी.

दोपहर भर आराम करके हम फ़िर चुस्त हुए. रात को बिस्तर में एक दूसरे से चूमा चाटते करते हुए हमने यह फैसला किया कि पहले चाचाजी उसकी चूत चोदेंगे और मैं गांड मारूंगा. चाचाजी ने पहले तो चाची की चूत चूसी और उसे गरम किया. एक दो बार झड़ाकर रस पिया. फ़ि अपनी पत्नी की बुर में अपना लौड़ा घुसाकर वे उसे बांहों में भरकर पीठ के बल लेट गये जिससे चाची उनके ऊपर हो गयीं. चाची की गांड उन्होंने अपने हाथों से मेरे लिये फैलायी और मैंने अपना लंड चाची के कोमल गुदा में आसानी से उतार दिया.

चाची को अब हम दोनों एक साथ चोदने लगे. मैं ऊपर से उनकी गांड मारने लगा और नीचे से चाचाजी अपनी कमर उछाल उछाल कर चोदने लगे. कुछ ही समय में एक लय बंध गयी और चाची के दोनों छेदों में सटा सट लंड चलने लगे. वे तृप्त होकर सिसकारियां भरने लगीं. हर दस मिनिट में हम पलट लेते जिससे कभी चाचाजी ऊपर होते तो कभी मैं. कभी करवट पर लेट कर आगे पीछे से चोदते. चाची तो निहाल होकर किसी रंडी जैसी गंदी गालियां देती हुईं इस डबल चुदाई का आनंद ले रही थीं.

चाचाजी बेतहाशा चाची को चूमते हुए उसे चोद रहे थे. बीच में चाची सांस लेने को अपना मुंह हटा लेतीं तो मैं और चाचाजी एक दूसरे के चुंबन लेने लगते. चाची की चूत और गुदा के बीच की दीवार तन कर इतनी पतली हो गयी थी कि मेरे और चाचाजी के लंड आपस में रगड़ रहे थे मानों हम लंड लड़ा रहे हों. हमने ऐसी लय बांध ली कि जब मेरा लंड अंदर होता तो चाचाजी का बाहर और जब वे चूत में लंड पेलते तो मैं गांड में से बाहर खींच लेता. इससे हमारे लंड आपस में ऐसे मस्त सटक रहे थे कि जैसे बीच में कुछ न हो.

 
झड़ने के बाद हमने एक दूसरे के वीर्य का पान चाची के छेदों में से किया. मैंने उनकी चूत चूसी और चाचाजी ने गांड . फ़िर हमने चोदने के लिये छेद बदल लिये. इस बार मेरा लंड चाची की चूत में था और चाचाजी का लंड उसकी गांड में था. यह चुदाई आधी रात के बाद तक चलती रही और तभी खतम हुई जब आखिर चाची चुद चुद कर बेहोश हो गयी. मैं और चाचाजी झड़े नहीं थे और एक दूसरे के लंड के प्यासे थे. कस के खड़े लंड हमने खींच कर बाहर निकाले तो बेहोशी में चाची कराह दीं. वे तो अब निश्चल होकर लुढ़क गयीं.

"बेटे मेरी गांड मार दे प्लीज़." कहकर चाचाजी पट सो गये. उनपर चढ़ कर मैंने उनके चूतड़ों के बीच अपना लौड़ा उतार दिया और उन्हें भोगने लगा. मैंने चाचाजी की गांड आधे घंटे मारी और झड़ने के पहले ही लंड बाहर खींच लिया. फ़िर हमने सिक्सटी नाइन किया और एक दूसरे के शिश्न का रस पीकर ही हमारी वासना शांत हुई. हम भी अब थक चुके थे और सो गये.

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दो दिन बाद चाचाजी भी ब्रम्हचारी हो गये और दो दिन मेरी तरह आराम किया. हम अलग अलग सोते. लगता है। चाची ने भी मुट्ठ मारना तक छोड़ दिया. हमेशा उनकी आंखें वासना से गुलाबी रहतीं. मैंने और चाचाजी ने उनसे कहा कि उन्हें तड़पने की कोई जरूरत नहीं है, वे चाहे जितना हस्तमैथुन कर सकती हैं. पर उन्होंने मना कर दिया. बोलीं कि अपना रस व्यर्थ नहीं करना चाहतीं. मेरी और चाचाजी की सुहागरात खतम होने पर सुबह हमें अपनी चूत का कटोरी भर शहद पिलाना चाहती थीं.

आखिर वह शाम आयी जब चाची अपना मदभरा गुड्डे गुड़िया का खेल खेलने वाली थीं. शाम को उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया. कहा कि नहा कर आऊं. चाचाजी भी नहाधोकर फ्रेश होने को चले गये. चाची ने उनके लिये रेशम का कुरता पाजामा निकाल कर रखा था. "आखिर आज रात वे तेरे दूल्हे हैं, दूल्हे जैसे कपड़े पहनना जरूरी है."

जब मैं नहा कर चाचीके कमरे में पहुंचा तो धड़कते दिल से. उनकी यह बात याद थी कि वे मुझे दुल्हन जैसे सजाएंगी. पलंग पर पूरे कपड़े तैयार थे. देखकर मैं शरमा गया. अंदर ही अंदर एक मीठी वासना भी जगने लगी.

पलंग पर एक सफ़ेद ब्रेसियर, पैंटी, गुलाबी पेटीकोट, गुलाबी साड़ी और ब्लाउज़ रखे थे. पलंग के नीचे ही चाची के ऊँची ऐड़ी के सैंडल रखे थे. आइने के सामने मेकप का पूरा सामान था. गहने भी थे. और एक रेशमी काले बालों का विग था!

चाची ने मुझे नंगा किया. मेरे गोरे बदन को देखा और सहलाया और मुझे प्यार से चूमा. मुझे झुक कर खड़ा होने को कहा. पीछे से उन्होंने मेरे गुदा पर लिपस्टिक से दो होंठ बना दिये. "तेरे छेद को और मोहक बना रही हूं, देखते ही ये पागल हो जायेंगे." फ़िर लंड को हाथ में लेकर बोलीं. "इसका कुछ करना पड़ेगा." वह अभी से खड़ा होना शुरू हो गया था.

 


उसे ऊपर कर के मेरे पेट से सटाकर रेशम का पट्टा मेरी कमर के चारों ओर लपेट कर उससे उन्होंने बांध दिया. फ़िर ऊपर से पैंटी पहना दी. फ़िर ब्रेसियर उठायी और मुस्कराते हुए मेरे पास आयीं. मैंने देख कि ब्रेसियर के दोनों कपों में उन्होंने एक एक अर्धगोलाकार स्पंज की गेंद फंसा रखी थी. एक निकाल कर उन्होंने मुझे दिखायी भी. उसपर रबर की छोटी गोली भी निपल जैसी चिपका रखी थी.

"मैंने पिछले दो दिनों में बनाई यह नकली चूचियां. आखिर तेरे चाचाजी को लगना चाहिये कि असली स्तन हैं." फ़िर उन्होंने ब्रेसियर मुझे पहना दी और हुक पीछे मेरी पीठ पर लगा दिये. बड़ी कसी हुई छोटे साइज़ के ब्रा थी इसलिये इलास्टिक का स्टेप उन्हें कस कर खींचना पड़ा.

मैं थोड़ा कसमसया. ब्रेसियर के स्ट्रेप मेरे बदन में गड़ रहे थे. वे बोलीं. "अरे टाइट ब्रेसियर से स्तन उभरते हैं और बड़े सेक्सी लगते हैं. आइने में देख!" मैंने देखा तो चेहरा शर्म से लाल हो गया और एक अजीब से गुदगुदी हुई. वाकई में मेरे जवान गोरे बदन पर पैंटी और ब्रा बड़े फ़ब रहे थे. बड़े बड़े तन कर खड़े मम्मे नकली हैं ऐसा कोई कह नहीं सकता था. ब्रा के बारीक नाइलॉन मे से निपल का आकार भी फूल आया था.

फ़िर उन्होंने मुझे विग लगाया. शोल्डर लेंग्थ बालों का वह विग था जैसे आजकल लड़कियां रखती हैं. उन्हें लगाते ही मेरा रूप पलट गया. अब मैं सच में एक सुंदर कमसिन युवती जैसा लगने लगा था. मेरे रूप को देखकर मेरा ही लंड और खड़ा हो गया. मैंने मन ही मन सोचा कि मेरा ही यह हाल है तो चाचाजी तो आज मेरा क्या हाल करेंगे?

खैर फ़िर पेटीकोट, साड़ी मुझे पहनायी गयी. ऊँची ऐड़ी के सैंडल मैंने पहने और चलने की प्रेक्टिस की. ऊंची ऐड़ियों के कारण अपने आप मेरी कमर बल खाती थी. फ़िर मेरा मेकप किया गया. और लाल लिपस्टिक से होंठ रंगे गये.

आखिर में हाथों में कांच के चूड़ियां और गले, कान में गहने पहनाये गये. बालियां स्प्रिंग वाली थीं क्योंकि मेरे कानों में छेद नहीं थे.

 
मैंने अपने रूप को देखा तो खुद ही नहीं पहचान पाया. लगता था कि जवान कमसिन मादक शोख लड़की खड़ी है. चाची की भी आंखों में वासना उतर आयी थी. मुझे चूमते हुए और मेरे नकली स्तन दबाते हुए बोलीं. "हाय लल्ला, मेरा ही यह हाल है तो ये तो तुझ पर मर मिटेंगे आज, पर तेरा हाल भी बुरा करेंगे, तू तैयार है ना?"

मैंने सिर हिलाया. मुझे मालूम था कि आज मेरी गांड की क्या दुर्दशा होगी पर अब मैं सच में स्त्री रूप में एक फ़ीमेल की साइकलाजी में आ गया था. बस मेरा लंड बुरी तरह से खड़ा होकर मेरे पेट से सटा मुझे मीठी अग्नि में जला रहा था.

मेरा हाल देखकर चाची बोलीं. "लल्ला, काफ़ी देर तक तो तुझे यह मीठा दर्द सहना ही पड़ेगा. तुझे पूरा भोगने के बाद देर रात फ़िर तुझे शायद अपनी वासना पूर्ति का मौका दें तेरे चाचाजी."

फ़िर वे मुझे खींच कर आंगन में ले गयीं. वहां चाचाजी को भी बुलाया. वे तो मुझे पहचन ही नहीं पाये. जब समझे कि यह तो उनका प्यारा भतीजा अनिल है, उनकी आज की दुल्हन तो मेरे देखते देखते ही उनके पाजामे में बड़ा तंबू बन गया.

चाची हंसते हुए बोलीं. "चलो, अब इसे सिंदूर लगाओ, मंगलसूत्र पहनाओ, फ़िर खाना खाकर अपने कमरे में ले जाओ और खूब सुहागरात मनाओ. आज तुमपर कोई बंधन नहीं है, जैसा चाहे भोग लेना अपनी दुल्हन को. हां अंदर मख्खन का डिब्बा रखा है, लंड डालने के पहले लगा लेना नहीं तो मार डालोगे मेरी नाजुक दुल्हनिया को"

चाचाजी ने अपने पत्नी को जोर से चूमकर उसका धन्यवाद किया. "तुमने तो मुझे अपना गुलाम बना लिया रानी. तुम नहीं देखोगी क्या यह सुहागरात? आ जाओ हमारे साथ ही."

चाची बोलीं. "देखेंगी मगर चुपचाप दूसरे कमरे में झरोखे से. तुम लोगों को पता भी नहीं चलेगा. तुम मेरी फ़िकर मत करो, मुट्ठ मारने के लिये केले गाजर मेरे पास बहुत हैं. सुबह तुम लोगों की ही खाने हैं. आज मन भर कर तुम लोगों का लाइव शो देखकर सड़का मारूगी. और कल से तो मेरे प्राणनाथ, तुमसे कैसी गुलामी करवाती हूँ, तुम ही देखना. इतने दिन अपनी पत्नी के प्रति अपना कर्तव्य तुमने नहीं किया, कल से पल पल का हिसाब वसूल लूंगी."

चाचाजी ने मुझे सिंदूर लगाया और मंगलसूत्र पहनाया. खाने पर भी मुझे चाचाजी की गोद में बैठना पड़ा नई दुल्हन की तरह. अब इस खेल में मुझे भी मजा आ रहा था. मैं भी दुल्हन जैसी ही हरकतें कर रहा था जो काफ़ी नेचरल थीं क्योंकि मैं काफ़ी शरमा रहा था. एक दूसरे को निवाले दिये गये. चाची ने तो मुझे अपने मुंह में का चबाया हुआ निवाला चाचाजी को खिलाने को कहा. "अरे अपनी दुल्हन के मीठे मुंह में से खाओ."

खाने के बाद आधा घंटे गप्पें मारने के बाद चाची हमें चाचाजी के कमरे में ले गयीं और खिलखिलाते हुए हमें अंदर ढकेल कर बाहर से दरवाजा लगा दिया. दरवाजा लगाने के पहले मेरी ओर कुछ दया भरी निगाहों से देखते हुए उन्होंने चाचाजी के कान में कुछ कहा. मुझे इतना ही सुनाई दिया कि दुल्हन की प्यास बुझा देना. चाचाजी की आंखों में चाची की बात से एक अलग चमक आ गयी थी.

 
दोस्तो आज का अपडेट दे दिया है

पर हमारा कोई भी नया यूज़र हमारा साथ नही दे रहा है सब सोए हुए हैं हद होती है यार बेशरमाई की भी
 
धन्यवाद दोस्तो

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कमरे में फूलों से सजी सेज थी और पास के टेबल पर दो गिलास दूध और मख्खन का डिब्बा रखा था. चाचाजी ने मुझे झट से बाहों में दुल्हन जैसे उठा लिया और पलंग पर ले गये.

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मेरी यह बड़ी अलग सी और मादक सुहागरात शुरू हुई जिसमें मैं दुल्हन था और चाचाजी दूल्हा. पलंग पर बैठ कर चाचाजी ने मुझे बांहों में भर लिया और जोर जोर से चूमने लगे. मैं भी उनके चुंबन का प्रतिसाद आंखें बंद करके देने लगा. आखिर उन्होंने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा. "अनिल बेटे, अगर आज मैं तुझपर सचमुच जोर जबरदस्ती करता हुआ तुझे भोगूं तो तू नाराज तो नहीं होगा?" मैंने कहा, "नहीं चाचाजी, आप कुछ भी कर लें. पर जोर जबरदस्ती की क्या जरूरत है? मैं तो आपका हूं ही आज की रात?"

वे बोले. "असल में तू बड़ा सेक्सी लग रहा है. और बहुत दिनों से मेरी यह चाहत रही है कि किसी मादक हसीन जवान छोकरे को या छोकरी को खूब जोर से रफ़ सैडिस्टिक तरीके से भोगू. तुझे रेप कर डालें. जैसे पहले के दुष्ट पति किया करते थे. पहली रात में पत्नी की हालत खराब हो जाती थी. मैं वैसा करना चाहता हूं."

मैं भी अब समर्पण के मूड में था, किसी घबरायी नवेली दुल्हन की तरह. डर तो लग रहा था क्योंकि मुझे मालूम था कि मेरी क्या हालत होगी. पर लंड भी मस्त खड़ा होकर कह रहा था कि करवा ले अपनी दुर्गति, उसमें भी मजा है। जो तूने आज तक चखा नहीं है और फ़िर आखिर तेरे चाचाजी हैं, वे घर में अपनी सब इच्छाएं पूरी नहीं करेंगे तो कहां करेंगे? मैंने हां कर दी.

वे खुश हो गये. "ठीक है बेटे, अव से तुझे मैं अनू रानी कहूंगा, गंदी गंदी गालियां भी दूंगा, तू चुपचाप सहना और मुझे चाचाजी मत कहना, स्वामी कहना. और सुन, मार पीट भी कर सकता हूं तेरे साथ, सहते जाना सब कुछ."

मेरे गर्दन हिलाते ही वे मुझे पलंग पर पटक कर मुझ पर चढ़ बैठे. अगले दस मिनिट में मेरे बुरी तरह चुंबन लिये गये और मेरे बदन को मसला गया. वे चाहे जैसे मुझे चूम रहे थे, मेरे नितंबों और जांघों को मसल रहे थे और मेरे नकली स्तन दबा रहे थे. "क्या माल है मेरी जान तू, हाय क्या चूचियां हैं तेरी जानेमन" कहकर वे उन्हें कुचलने लगे. इतनी बेरहमी से वे मम्मे मसल रहे थे कि अगर वे सच के स्तन होते तो मैं जरूर रो देता. इसलिये मैने भी नाटक करते हुए कराह कर कहा. "धीरे दबाइये स्वामी, दुखता है."

 
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