• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

घाट का पत्थर /गुलशन नंदा

'इसके लिए तुम्हें मेरे डैडी के पास जाना चाहिए। मैं मानती हूं कि मैं एक स्वतंत्र विचारों वाली लड़की हूं और सबसे भली प्रकार हंस-बोल देती हूं परंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि मैं अपनी मान-मर्यादा में न रहूं।'

'मैंने तुम्हारे हृदय को टटोलना आवश्यक समझा। यदि तुम ही तैयार नहीं हो तो मेरा तुम्हारे डैडी से पूछना व्यर्थ है।'

'परंतु मेरा अभी विवाह करने का कोई इरादा नहीं और न ही अभी चार-पांच वर्ष तक इस विषय में सोच सकती हूं।'

"तुम जब तक कहो, मैं प्रतीक्षा कर सकता हूं, परंतु एक बार हृदय को यह विश्वास तो होना चाहिए कि इसमें तुम्हारी स्वीकृति है!'

'यदि मैं विश्वास दिला दूं और डैडी न मानें तो?'

'हृदय पर पत्थर बांधकर बैठ जाऊंगा।'

'यह भी तो सम्भव है कि मुझे पाने के लिए तुम उचित-अनुचित का ध्यान खो बैठो?'

'इसकी नौबत नहीं आएगी। तुम भूल रही हो कि मुझे प्रेम के साथ-साथ तुम्हारी मान-मर्यादा का भी ध्यान है।'

'और यदि मैं कह दूं कि....'

'क्या कह दो?' राज ने आकुलता से पूछा।

'कि तुम मुझे पसंद नहीं।' |

राज के हृदय पर एक बिजली-सी गिर पड़ी। 'अभी तो तुम कह रही थीं कि मैं तुम्हें अच्छा लगता हूं।'

'परंतु किसी और नाते से।'

'तब तो कथा ही समाप्त हो गई। मुझे यदि मेरे ही मिथ्या विश्वास मार डालें और उसमें तुम्हारा क्या दोष?' राज यह कहकर उठा और बाहर जाने लगा।

डॉली ने आवाज दी, 'क्यों कहां चल दिए?'

राज ने कोई उत्तर नहीं दिया और अपने कमरे की ओर चल दिया। डॉली को क्या वह गलत समझा? उसे विश्वास भी न हो पाता। वह चंचल मुख, मधुर मुस्कान, मदभरे नयन... वह क्यों बेचैन हो उठता था उन्हें देखने को? यह प्रेम नहीं तो क्या भ्रम था... निरा छल? उसने द्वार बंद कर लिया और चुपचाप बिस्तर पर पड़ रहा।

बाहर मूसलाधार वर्षा शुरु हो गई थी। थोड़ी ही देर बाद सेठ साहब आए। खाने के लिए बुलावा भेजा तो उसने तबियत ठीक न होने का बहाना कर दिया।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
चार दिन बीत गए परंतु राज डॉली के कमरे में न गया। डॉली ने भी उसे नहीं बुलाया। राज इस विचार से कि डॉली अब उससे घृणा करने लगी है, उसके सामने आने का साहस न कर सका।

आज इतवार का दिन था। राज की छुट्टी थी। डॉली भी चारपाई छोड़ चुकी थी। सेठ साहब कुछ कागज बिखेरे बैठे थे। राज अपने कमरे में अकेला बैठा था। वह बाहर आने का साहस न कर सका। वह डर रहा था कि बाहर निकलते ही यदि डॉली का सामना हो गया तो वह क्या करेगा। उसके पैर सीढ़ियों तक पहुंचे ही थे कि उसे डॉली की आवाज ने वहीं ठहरा दिया। उसने धीरे-से मुड़कर देखा। डॉली अपने कमरे के दरवाजे में खड़ी मुस्करा रही थी।

'जरा मेरी बात सुन जाओ।' और वह कमरे में अंदर चली गई।

राज दबे पांव, उसके पीछे कमरे में आ गया। वह शीशे के सामने खड़ी बाल बना रही थी। राज कमरे में आते ही ठिठककर खड़ा हो गया। शीशे में उसे डॉली का चेहरा दिखाई दे रहा था। वह अभी मुस्करा रही थी।

'आपने मुझे बुलाया?' राज ने धीरे-से पूछा।

'जी। विचार तो कुछ ऐसा ही है।' अभी तक वह शीशे की ओर ही मुख करे खड़ी थी।

'कहिए, क्या आज्ञा है?'

'यह आप-आप क्या लगा रखी है, सीधा तुम कहो ना।' डॉली ने बालों में पिन लगाते हुए कहा।

'मेरा विचार....।'

'जी आपका विचार ठीक है।' डॉली ने बात काटकर कहा और कंघा ड्रेसिंग टेबल पर छोड़कर राज की ओर देखने लगी। फिर बोली, 'क्या मुझसे नाराज हो?'

'नहीं तो डॉली, ऐसी कोई बात नहीं।'

'फिर तुम चार दिन से मेरे इतने समीप रहते हुए भी मुझसे क्यों दूर रहे?'

'वास्तव में बात यह थी कि मेरी कुछ तबियत...।'

'तबियत खराब थी! कितने मीलों से आना था पूछने तुमको... बहाना भी ऐसा बनाया? अच्छा अब यह बताओ कि जा कहां रहे हो?'

'वैसे ही जरा बाहर, एक मित्र के घर।'

'देखो, मैं दादर एक सहेली की सगाई में जा रही हूं। यदि बुरा न मानो तो रास्ते में छोड़ते जाना। मैं जल्दी से कपड़े बदल लूं।'

राज कमरे से बाहर जाने लगा।

ठहरो, तुम कहां जा रहे हो? मैं स्वयं ही बाथरूम में जा रही हूं। यह कहकर डॉली ने अपने कपड़े उठा लिए और बाथरूम की ओर चल दी। राज पास ही पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। वह मन-ही-मन प्रसन्न था। उसका पुरुषत्व विजयी हुआ था। डॉली ने ही तो उसे पहली आवाज दी थी। इसी बीच डॉली कपड़े बदल कर वापस आ गई और शीशे के सामने खड़ी होकर बाल संवारने लगी।

'राज एक काम करो।'

'कहो डॉली।'

'तनिक समीप आ जाओ।'

राज उठा और डॉली के पीछे जा खड़ा हुआ। डॉली बोली, 'जरा पीछे से मेरी कमीज के बटन बंद कर दो।'

'मेरा विचार है कि तम भविष्य में इस प्रकार के कामों के लिए एक आया का प्रबंध कर लो....।' राज ने डॉली की कमीज के बटन बंद करते हुए कहा।

'मुझे ज्ञात न था कि छोटे-छोटे काम करने से तुम्हारे हाथ थक जाते हैं।'

'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं परंतु तुम्हारे और मेरे बीचआवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता अच्छी नहीं और फिर तुम भी तो यह पसंद नहीं करती कि मैं....।'

'यह ठीक है कि मैंने तुम्हें उस दिन किसी बात के लिए मना कर दिया और तुम भी भली प्रकार समझते हो कि वह तुम्हारी भूल थी।'

'मेरा तो विचार है कि मैंने तुम्हें मांगकर कोई भूल नहीं की। फिर भी यदि तुम समझती हो कि यह कहकर मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है तो मैं इसकी क्षमा चाहता हूं। इससे अधिक मैं और क्या कर सकता हूं?'

'इसमें बुरा मानने की क्या बात है? यदि मेरे हृदय में कोई संदेह होता तो मैं तुम्हें किसी भी काम के लिए क्यों कहती? मेरी दृष्टि में तुम अब भी वैसे हो जैसे कुछ दिन पहले थे।'

"डॉली, क्या तुम ठीक कह रही हो? तुम्हारे हृदय में मेरे लिए उतना ही आदर और स्नेह है जितना पहले था?'

'मुझे झूठ बोलने की आदत नहीं। चलो जल्दी चलो। देर हो रही है।' यह कहकर डॉली दरवाजे की ओर बढ़ी। राज भी उसके पीछे हो लिया। थोड़ी देर बाद दोनों सड़क पर पहुंच एक ओर चल दिए। डॉली मौन थी। राज चाहता था कि वह कुछ बात और करे तो वह उसके सब संदेह दूर कर दे। वह नहीं चाहता था कि उसके कारण डॉली अथवा उसके डैडी को किसी प्रकार का क्लेश हो, परंतु डॉली मौन रही। उसने कोई बात नहीं की। राज ने डॉली को उसकी सहेली के घर पहुंचा दिया और सिनेमा चला गया। उसे ऐसा जान पडा मानो उसके हृदय पर से एक भारी बोझ उतर गया है।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
इसी प्रकार दिन बीतते गए। डॉली और राज फिर से आपस में घुल-मिल गए। डॉली पहले से भी अधिक उसका ध्यान रखने लगी। दोनों एक-दूसरे का दिल बहलाने का पूरा प्रयत्न करते। एक दिन सायंकाल के समय जब वे दोनों अकेले बगीचे की घास पर बैठे ताश खेल रहे थे, राज से रहा न गया और वह बोल पड़ा, 'डॉली एक बात पूछं?'

'अवश्य। एक नहीं, दो।'

'विश्वास दिलाओ कि तुम उसका उत्तर ठीक-ठीक दोगी।'

'अपनी ओर से तो पूरा प्रयत्न करूंगी।'

'डॉली याद है एक दिन मैंने तुम्हें अपना जीवन-साथी बनाने के लिए कहा था और तुमने उत्तर में कहा कि तुम मुझे पसंद नहीं करती।'

"फिर क्या हुआ?' डॉली ने ताश का पत्ता फेंकते हुए कहा।

'यह इंकार किसी कारण से ही किया होगा। मैं केवल वह कारण जानना चाहता हूं।'

"कारण क्या होता है?'

'आखिर कुछ तो सोचा ही होगा तुमने।' ।

'मैंने इस बारे में कभी कुछ नहीं सोचा। फिर उत्तर क्या दूं?'

'यह कैसे हो सकता है। आखिर कोई कारण तो होगा ही। मेरी सूरत पसंद नहीं? काम पसंद नहीं? आखिर मुझे पता तो लगना चाहिए कि मुझमें क्या कमी है जो तुम....।'

'यह जानकर क्या होगा?'

'केवल हृदय को संतोष।'

'इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं और सच पूछो तो मैंने इंकार तो किया ही नहीं। इतना अवश्य है कि अभी मेरा इस विषय में कोई विचार नहीं।'

'इसका अर्थ तो यह हुआ कि अभी कुछ आशा शेष है, जिसके सहारे मैं जीवित रह सकता हूं।'

'संभव है। मैं किसी प्रकार का विश्वास नहीं दिला सकती, परंतु मैं नहीं तो कोई और सही, तुम्हारे लिए ही क्या विशेष अंतर पड़ जाएगा जो इतने चिंतित हो रहे हो।'
 
'डॉली, कितना अच्छा हो यदि भगवान दो पल के लिए तुम्हें मेरा हृदय दे दे। तब तुम समझ सको कि मैं इतना चिंतित क्यों

डॉली हंसने लगी। हंसी रोकते हुए बोली, 'बातें करने का ढंग तो बहुत सुंदर आता है।' और उठ खड़ी हुई।

'क्यों, बाजी तो समाप्त होने दो।' राज ने कहा।

'तुम पत्ते संभालो, मेरी एक सहेली मिलने आई है। मैं जाती

राज ने देखा, डॉली गेट की ओर चल दी। वहां उसकी एक सहेली आई खड़ी थी। राज ने पत्ते डिबिया में बंद किए और अंदर जाने लगा। डॉली और उसकी सहेली बरामदे में पहुंच चुकी थीं।

'आओ राज।' डॉली ने आवाज दी। राज वहीं ठहर गया। डॉली और उसकी सहेली राज के पास आ गई।

‘यह हैं, हमारी फर्म के मैनेजर, मिस्टर राज और यह है मेरी सहेली माला।'

'नमस्ते।' राज ने धीरे से हाथ ऊपर उठाते हुए कहा। तीनों ड्राइंगरूम में पहुंच गए।

'माला, तुम जरा बैठो, मैं दो-चार मिनट में आती हूं।' यह कहकर डॉली अंदर चली गई।

'बैठ जाइए।' राज ने माला से कहा और माला सोफे पर बैठ गई। कुछ देर तक दोनों चुपचाप बैठे रहे। इस प्रकार चुपचाप बैठने से तो काम नहीं चलेगा, कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा। यह सोच राज बोला, 'मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा।'

'जी। मैं कुछ दिनों से अपने चाचा के घर पूना गई थी, नहीं तो मैं प्रायः डॉली के घर आती रहती हूं।'

'आप क्या डॉली के साथ पढ़ती हैं?'

'पढ़ती थी, परंतु अब पढ़ाई छोड़ चुकी हूं। एफ.ए. करने के बाद मैंने एक म्यूजिक कॉलेज में संगीत सीखना आरंभ कर दिया है। वास्तव में मुझे संगीत बहुत प्रिय है, इसी कारण पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सकी।'

'तब तो बहुत प्रसन्नता की बात है। फिर तो कभी....।'

'क्यों? प्रसन्नता की क्या बात है?' डॉली ने कमरे में आते ही पूछा।

'माला के संगीत के विषय में।'

'गाती भी बहुत अच्छा है और सितार तो इतना अच्छा बजाती है कि तुम सुनकर दंग रह जाओ।'

'तो आज एक गाना सुना दीजिए।' राज ने प्रार्थना भरे स्वर में कहा।

'आज नहीं फिर कभी। आज कुछ मूड नहीं है।'

'अच्छा कोई बात नहीं, परंतु भूलिएगा नहीं।'
 
'क्यों डॉली, तुम इतवार को चल रही हो या नहीं?' माला ने डॉली को संबोधित करके कहा।

'अभी डैडी से पूछा नहीं है।'

'तो डैडी ने क्या कहना है?'

'फिर भी पूछना तो अवश्य है।'

'क्यों कहां जाना है?' राज बीच में बोल उठा।

'इतवार को माला, मैं और कुछ अन्य सहेलियां पूना 'रेसिज' पर जा रही हैं। हम लोग सोमवार सवेरे लौटेंगे। रात को माला के चाचा के घर ठहरेंगे। समझो कि एक प्रकार का पिकनिक-सा रहेगा।'

'प्रोग्राम तो बहत अच्छा है।'राज ने कहा।

'तो आप भी चलिए न।' माला ने अनरोध किया।

'जाने में तो कोई आपत्ति नहीं, परंतु....।'

'किंतु परंतु क्या एक अच्छा मनोविनोद रहेगा।'

'आप सब लड़कियों में मेरा जाना कुछ अच्छा नहीं जान पड़ता।'

'आप इसकी चिंता न करें।'

'मेरी ओर से कोई आपत्ति नहीं, सब डॉली पर निर्भर है।'

'तुम अपनी इच्छा के स्वयं स्वामी हो, इससे मेरा क्या।' डॉली ने उत्तर दिया, जो अभी तक चुपचाप दोनों की बात सुन रही थी।

'मेरा मतलब यह है कि जब डैडी से अपने लिए पूछोगी, उसी समय मेरे लिए भी आज्ञा ले लेना।'

'परंतु तुम्हें पूछते क्या लाज आती है?'

"ऐसी बात नहीं। मैं तुम्हें कहीं साथ ले जा रहा होता तो आज्ञा

ले लेता।'

'अच्छा ले भी लेना डॉली, आप दोनों तो लंबी-चौड़ी बहस में पड़ गए।' माला ने डॉली के कहा। और दोनों उठकर बरामदे में चली गई। राज अंदर चला गया।
 
"प्रोग्राम तो पक्का ही है न डॉली, तुम्हारे डैडी मना तो नहीं करेंगे?'माला ने डॉली का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।

"मना क्यों करने लगे? केवल उनके कानों से बात निकलनी है और तुमने राज का यह नया प्राग्राम बना दिया?'

'इसमें बुराई क्या है? आदमी तो दिलचस्प जान पड़ता है।'

'तुम नहीं समझतीं। कभी-कभी आवश्यकता से अधिक दिलचस्पी अच्छी नहीं होती। चलो, अब तो जो हो गया।'

'अच्छा तो मैं चलती हूं। बहुत देर हो गई।'

'कुछ देर और ठहरो। खाना खाकर ही चली जाना।'

'नहीं, बहुत देर हो जाएगी।

"दिलचस्प आदमी को भेज दंगी। रास्ता अच्छा कट जाएगा।'

'चल, शैतान कहीं की।' माला ने नीचे उतरते हुए कहा। दोनों हंसने लगीं।

डॉली फाटक तक उसे छोड़ने गई। वापस आने पर वह गुनगुनाती हुई ड्राइंगरूम में आ गई।

'क्यों डॉली, यदि तुम नहीं चाहती तो मैं पूना नहीं जाता। मैं तो वैसे ही हां कर बैठा।' राज ने कहा। वह सामने सोफे पर लेटा हुआ था।

'वैसे ही क्या?तुम्हारे जाने से तो मेरा मन लगा रहेगा।' डॉली ने एक फीकी हंसी होंठों पर लाते हुए कहा।

'सच डॉली! तब तो मैं अवश्य जाऊंगा।' राज ने प्रसन्नता से कहा। रात को जब डैडी वापस आए तो खाने के बाद डॉली ने बात छेड़ दी। दोनों के जाने में तो उन्हें कोई आपत्ति न थी, परंतु राज का सोमवार को वापस आना उन्हें स्वीकार न था। अंत में निर्णय यह हुआ कि राज इतवार को ही रात की गाड़ी से वापस आ जाए। राज इसी में प्रसन्न था। इतवार भी आया। दोनों ने आवश्यक सामान साथ लिया और स्टेशन पर पहुंच गए। माला पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने एक कम्पार्टमेंट बुक करवा लिया था। राज को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जय भी उनके साथ जा रहा है। जय के साथ एक और लड़का अनिल भी था जो हाथ मिलाते ही बोला, 'तो यह है मिस्टर राज, जिनके बारे में माला कह रही थी। आपसे मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई,

परंतु मैंने कभी आपको कॉलेज....।'

'कॉलेज में नहीं, यह तो डॉली के पिताजी के मैनेजर हैं।' जय ने राज को अपने पास ही बैठने का स्थान देते हुए कहा।

'माला और डॉली कहां गई?'राज ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।

'घबराइए नहीं, वे सामने प्लेटफार्म पर मैगजीन ले रही हैं।' गाड़ी चलने को थी। डॉली और माला शीघ्रता से कम्पार्टमेंट में आ गई। इंजन ने सीटी दी और गाड़ी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया। दोनों राज और जय के सामने वाली सीटों पर बैठ गई।

'आओ मैं तुम्हारी सबसे जान-पहचान करा दूं...।' डॉली ने राज से कहा और बारी-बारी से सबका परिचय देने लगी।

'जय और माला को तो तुम जानते ही हो और यह महाशय हैं मिस्टर अनिल। हैं कुछ हंसमुख। हंसी करने में तो कभी....।'

'अपना लिहाज भी न करू।' अनिल ने डॉली की बात काटते हुए कहा। इस पर सब हंसने लगे।

'और यह हैं मेरी सहेलियां, रानी और मधु।'

'आप सब लोगों से मिलकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। आशा है हम सब लोगों के मिल जाने से हमारी यह यात्रा बहुत मनोरंजक रहेगी।'

'आपकी वाणी सत्य हो। अनिल बोला, माला सच ही कह रही थी कि आदमी बहुत ही दिलचस्प है।'

'जी, परंतु लड़कियों की नजर में।' राज ने लापरवाही से उत्तर दिया और सब हंसने लगे।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

गाड़ी के डिब्बे में एक अच्छी-खासी मजलिस लगी हुई थी। बातों-बातों और गप्पों में समय इस प्रकार बीत गया कि पूना पहुंचने पर भी किसी को विश्वास न हुआ कि गाड़ी पूना पहुंच गई। जब माला ने दरवाजा खोलते हुए कुली-कुली की आवाज लगाई तो सबको होश आया।। गाड़ी से उतर कर सब माला के मकान पर पहुंचे। मकान क्या था एक बहुत बड़ी कोठी थी। माला के चाचा लखमीचंद पूना के धनवानों में से थे और माला उसके भाई की एकमात्र पुत्री थी।

सब अतिथियों से मिलकर लखमीचंद बहुत प्रसन्न हुए। जलपान करके सब तैयार होकर घुड़दौड़ के मैदान में पहुंचे।

राज को उसमें कोई विशेष दिलचस्पी न थी परंतु सहयात्रियों के कारण उसे भी इसमें भाग लेना पड़ा। लाखों मनुष्य एकत्रित थे। कोलाहल हो रहा था। 'नीलम जीतेगी' नहीं 'झांसी की रानी"विन लगाओ' नहीं 'प्लेस' यही आवाज चारों ओर गूंज रही थी। रेस समाप्त होते ही सब कोठी लौट गए। चाय पहले से ही तैयार थी और भूख भी सबको लगी थी, आते ही सब चाय पीने बैठ गए।

'एक बात कहूं, आज्ञा है?'राज ने माला को संबोधित करके कहा।

'अवश्य...' डॉली ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।

'याद है आपने एक दिन वायदा किया था?'

'क्या?' माला ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा।

'गाना सुनाने का!'

'ओह! मैंने सोचा न जाने कौन-सा वायदा।'

"बहुत अच्छे समय पर याद दिलाया।' अनिल बोला, 'हम तो सचमुच भूल ही गए थे कि माला गाना जानती है।' सबने उसकी हां में हां मिलाई और माला को भी कब इंकार था।

कुछ देर में ही वह पियानो के पास बैठी दिखाई दी और उसने गाना आरंभ कर दिया। गाना समाप्त हुआ। सबने तालियां बजाकर माला के गाने की प्रशंसा की। इसके बाद मधु ने एक छोटा-सा नाच दिखाया। संध्या गहरी हो चुकी थी और रात की गाड़ी से राज को वापस बंबई लौट जाना था। वह जाना तो न चाहता था पर विवश था। वैसे तो डॉली भी सवेरे की गाड़ी से पहुंच रही थी परंतु राज को ऐसा ही जान पड़ता था मानों वह उससे सदा के लिए बिछुड़ रहा हो।

'राज एक बात सुनो।' डॉली ने उसे कुछ दूर ले जाते हुए कहा।
 
माला उसके समीप आते हुए बोली, 'क्यों? कोई प्राइवेट बात है?'

'नहीं, तुमसे क्या प्राइवेट बात हो सकती है।' डॉली ने माला के गले में बांहें डालते हुए कहा और राज से बोली, 'राज एक बात कहनी है।'

'कहो।'

'देखो, डैडी से यह न कहना कि जय और अनिल भी हमारे साथ थे।'

'क्यों? यह झूठ बोलने की क्या आवश्यकता है?'

'तुम इतना भी नहीं समझे? मेरा मतलब, हम तो एक पिकनिक पर आए हैं. कहीं डैडी को कोई संदेह न हो जाए।'

'अच्छा।' यह कहकर राज चुप हो गया। उसका चेहरा उतर गया और वह जाकर कार में बैठ गया।

'अच्छा, डॉली मैं भी जाती हूं। कार तो जा रही है, आते हुए कामिनी को ले आऊंगी। जरा रौनक रहेगी।' माला ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा और राज के साथ बैठ गई।

"जल्दी ही आना। अभी रात का प्रबंध भी करना है।'

'बस गई और आई।'

ड्राइवर ने कार स्टार्ट की और सबने हाथ उठा राज को विदाई दी। उसने भी उत्तर में हाथ हिलाया। इतना धीरे मानो वह निर्जीव हो। कार पक्की सड़क पर भागने लगी। वह अपनी पूरी गति पर जा रही थी। राज मौन था।

बहुत देर सन्नाटे के बाद माला बोली 'क्यों जी, मौन क्यों हो? चेहरे पर उदासी सी छा रही है।'

'नहीं तो।' उसने फीकी हंसी हंसते हुए कहा।।

'अकेले जा रहे हो इसलिए? मैं तो तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने भी आ गई।'

'इसके लिए हार्दिक धन्यवाद! माला एक बात पूछू?'

'अवश्य।'

'आते समय डॉली ने मुझसे जो बात कही उसका क्या मतलब था?'

माला हंस पड़ी और बोली, 'भई, इतना भी नहीं समझते। इसका मतलब यह था कि डैडी को इस बात का पता चल गया तो वह अवश्य बिगड़ेंगे। वह तो उनसे कहकर आई है कि कुछ सहेलियों के साथ जा रही है और यहां सहेलियों के साथ कुछ मित्र भी हैं।'

'तुम्हारा मतलब यह है कि डॉली ने जय को बुलाया था।'

'प्रोग्राम तो उन सबने ही बनाया था, मेरी तो केवल सेवाएं ही स्वीकार की गई थीं। यदि डैडी को पहले पता चल जाता कि जय आदि साथ हैं तो वह शायद डॉली को न भेजते।'

'मतलब यह कि डॉली डैडी की दी हुई स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रही है।'

'अरे करे भी क्या? आजकल के बड़े-बूढ़े अपनी लड़कियों का इस प्रकार अपने मित्रों के साथ मिलना, हंसना-खेलना पसंद कर सकते हैं?'

'कभी नहीं! परंतु डॉली को ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी?'

'बहुत भोले हो। देखो, मैं तुम्हें आज एक बात बताती हूं। वचन दो कि यह केवल हम दोनों तक ही रहेगी। मैं तुम्हें इसलिए बतला रही हूं कि शायद तुम डॉली की कुछ सहायता कर सको।'

'तुम्हारा मतलब...?' उसने व्याकुलता से पूछा।

'डॉली जय से प्रेम करती है और...।'

"बस माला, मैं समझ गया।' राज ने माला के मुंह पर हाथ रखते हए कहा। उसके माथे पर पसीने की बंदें आ गई। उसके सिर में चक्कर-सा आने लगा। वह यह क्या सुन रहा है? उसे अपने कानों पर विश्वास ही न हो पाता था। उसने कांपते स्वर में माला से पूछा, 'क्या यह सब सच है?'

'क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?' तुम कांप रहे हो। यह तुम्हें क्या हो रहा है? वचन दो कि यह बात कभी डैडी के कानों तक नहीं पहुंचेगी। समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।

'तुम क्या सोचती हो और मैं क्या? मैं भला डैडी से क्यों कहने लगा। इतना ही क्या कम है कि तुमने समय पर मुझे सूचना दे दी।'

'तुम्हारा मतलब?'

'कुछ नहीं।'

'राज, नहीं अवश्य कोई बात है।' इतने में कार स्टेशन पर रुकी। राज लड़खड़ाता हुआ कार से नीचे उतर गया। वह अनमना-सा हो रहा था। उसका दिल चाहता था कि डॉली को अभी साथ ले आए परंतु क्यों कर...।
 
'माला मैं और कुछ सुनना नहीं चाहता। मैंने भूल की जो यहां चला आया।'

'और मैंने भी भूल की जो तुम्हें यह रहस्य बता दिया।'

'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। तुमने तो किसी गिरते हुए को बचा लिया।'

'मैं तुम्हारा मतलब समझीं नहीं।'

'क्या करोगी समझकर? अच्छा तुम जाओ। पार्टी को देर हो रही होगी।' यह कहकर राज प्लेटफार्म की ओर चल पड़ा।

माला भी उसके पीछे-पीछे आ गई और कहने लगी, 'राज, जब तक मुझे नहीं बताओगे, मुझे तसल्ली नहीं होगी।' ।

'व्यर्थ में क्यों चिंतित होती हो? कोई बात नहीं जाओ, देर हो रही है।'

'तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो। अच्छा, चलती हूं। मेरे जैसा भी कोई मूर्ख होगा?' यह कहकर माला जाने लगी।

राज ने उसका हाथ पकड़कर कहा, 'सुनना चाहती हो तो सुनो, मैं भी डॉली से प्रेम करता हूं। और....।'

'और डॉली?'

'यह तो तुम जानती ही हो।' इतने में गाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई। माला मौन खड़ी थी। राज गाड़ी की ओर लपका। माला वापस स्टेशन के बाहर आ गई और कार में बैठकर घर की ओर चल दी। राज रुका और उसे देखने लगा परंतु वह उसे दिखाई न दी।

माला घर पहुंची तो पार्टी का सब सामान तैयार था परंत राज की बात सुनने के बाद वह चिंतित सी थी। न वह उसके साथ जाती और न उसे कुछ पता चलता। आवश्यक वस्तुएं नौकरों के सिर पर उठवाकर वे सब साथ वाले बाग में पहुंच गए। चांदनी अपने पूर्ण यौवन पर थी। पास ही नदी बह रही थी। जय और डॉली 'बोटिंग' के लिए चले गए। अनिल और रानी आइसक्रीम बनाने लगे। मधु अनिल के मुंह का बाजा लेकर उसे बजाने लगी। माला का मन किसी भी बात में न लगा। वह कुछ दूरी पर एक पेड़ के पास आ खड़ा हुई। कुछ समय तक वह इसी प्रकार खड़ी दूर देखती रही। फिर पास पड़े बैंच पर बैठ गई। वह सोचती रही कि कैसा अनोखा प्रेम है, जिसमें दिन-रात एक दूसरे के निकट रहने पर भी एक जल रहा है और दूसरों को उसका पता तक नहीं।

'जरा देखू, आइसक्रीम तैयार हुई या नहीं।'

'हां, हां, अवश्य देखो। यदि हो गई हो तो हमारे लिए यहां भेज दो।' यह कहकर डॉली बैंच पर लेट गई और उसने अपना सिर जय की गोद में रख दिया। जय उसके बालों से खेलने लगा।

'राज के आने से कुछ मजा किरकिरा-सा हो गया था।'

'इसलिए तो उसे रात की गाड़ी से वापस भेज दिया है।'

'डॉली, तुम हो बहुत चतुर। उसके सामने तो मैं इस प्रकार डर-डरकर तुमसे बात करता था मानों वह मुझे खा ही जाएगा।'

'हो तो डरपोक ही न, प्रेम करना है तो फिर डर कैसा?'

'तुम तो जैसी डरती ही नहीं। तुम भी तो उसके सामने भीगी बिल्ली की तरह बैठ जाती हो।'

'करू भी क्या, घर के भेदिये से डरना ही पड़ता है।' दोनों हंसने लगे।

'डॉली, वह देखो तो सामने कौन आ रहा है।' जय ने डॉली का सिर अपनी गोदी से उठाते हुए कहा। डॉली घबराकर उठ बैठी। पर एक परछाई दूर उनकी ओर बढ़ती आ रही थी। डॉली भयभीत हो उठी। कुछ ही देर में वह परछाई उनके समीप पहुंच गई। परछाई एक पुरुष की थी जो कोट-पतलून पहने थे। उसके पास आते ही डॉली घबरा गई। उसकी जुबान खिंच गई और उसके मुंह से एक शब्द भी न निकल सका।

राज सामने खड़ा था। जय ने कुछ संभलते हुए पूछा, 'तुम गाड़ी में.....।'

'जी, परंतु गाड़ी मेरे पहुचने से पहले ही छूट गई।'

'अथवा यह कहिए कि भाग्य को तुम्हारा इस पार्टी में भाग लेना ही स्वीकार था और हमारा आकर्षण तुम्हें यहां तक खींच लाया।'

'जैसा आप समझें, आपका आकर्षण कहिए या मेरी ढिठाई।

'अच्छा तुम डॉली से बात करो, मैं सबको सूचना देता हूं।'

यह कहकर जय चला गया। डॉली अभी तक गुमसुम-सी बैठी उनकी बातें सुन रही थी।

उसने संभलते हुए अपनी साड़ी का पल्ला ठीक करना चाहा परंतु राज ने उसे खींचते हुए कहा, 'क्यों इसकी क्या आवश्यकता है। मुझमें और जय में क्या अन्तर है?' राज ने अपना मुंह डॉली की ओर से फेर लिया।

'यह आज तुम्हें क्या हो गया है?'

'कभी-कभी यह जंगलीपन सवार हो ही जाता है, विवश हूं।'

'शायद तुम्हें हमारा इस प्रकार अकेले बैठना पसंद नहीं?'

'मेरे पसंद न आने से क्या होता है। तुम्हें तो पसंद है न? और पसंद भी क्यों न हो, यह सुहावना समय, छिटकी हुई चांदनी।

मुझे अधिक बनाने का प्रयत्न न करो। अपने काम से मतलब रखो।'

'बहुत अच्छा, आगे से ऐसा ही होगा।'
 
इतने में माला और उनके अन्य साथी भी वहां आ गए और राज को खींचकर अपने साथ ले गए। सबने मिलकर आइसक्रीम खाई। आइसक्रीम बहुत अच्छी बनी थी परंतु आनंद किसी को भी न आया। रात्रि के बारह बज चुके थे। दिन के थके-मांदे तो थे ही। घर वापस पहंचते ही सोने की तैयारी की। राज, जय और अनिल एक कमरे में और बाकी सब दूसरे में। रानी और मधू तो आते ही सो गई। परंतु माला और डॉली बाहर बालकनी में खड़ी आपस में बातें करने लगीं। माला के पेट में कोई बात न रहती थी। तनिक-सी किसी ने सहानुभूति प्रकट की तो उसकी हो गई। डॉली ने जब राज की बात कही तो माला ने स्टेशन जाते समय की सारी घटना उसे कह सुनाई।

'माला, यह तुमने अच्छा नहीं किया।'

'परंतु अब जो भूल मुझसे हो गई है, उसका क्या करू।"

'तुम्हारे लिए साधारण भूल है। यदि उसने डैडी से कह दिया... तो?'

'इसकी तुम चिंता न करो। वह डैडी से कभी न कहेगा।'

'क्या तुम्हें इसका विश्वास है?'

'हां चलो, अब सो जाओ। सवेरे जाना है। रात बहुत हो चुकी है।' माला ने डॉली को ले जाकर बिस्तर पर लिटा दिया और स्वयं भी लेट गई। सवेरे की गाड़ी से सब बंबई लौट आए। सेठ साहब ने राज से रात को न आने के विषय में कुछ न कहा। जलपान करके दोनों फैक्टरी चले गए। डॉली के कॉलेज की छुट्टी थी और वह रात की थकी हुई थी। उसने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और सो गई।

*

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

संध्या का समय था। डॉली बाहर बरामदे में बैठी कॉलेज का काम कर रही थी। एक साइकिल बरामदे के सामने रुकी। परंतु डॉली अपने काम में इतनी व्यस्त थी कि उसने उस ओर ध्यान ही न दिया। वह उसी प्रकार सिर नीचा किए बैठी लिखती रही। अनायास आगन्तुक की आवाज सुनकर वह चौंक गई। 'हुजूर की सेवा में नमस्कार करती हूं।' स्वर माला का था।

डॉली ने सिर उठाकर देखा और बोली, 'नमस्कार की बच्ची। इतने दिन से कहां थी? जब से पूना से लौटकर आई हो, सूरत नहीं दिखाई।'

'क्या करू, पूना से लौटी तो बुआ बीमार थीं। कॉलेज से छुट्टी ले रखी है। आज कुछ तबियत ठीक थी तो सोचा कि अपने प्राण-प्यारों से मिल लिया जाए।'

'अच्छा पहले तो बैठ जाओ।' डॉली ने पुस्तक बंद करते हुए कहा।

माला पास ही बिछी कुर्सी पर बैठ गई।

'हां, अब कहो, क्या मंगवाऊं, चाय या शरबत?'

'इस गरमी में साइकिल चलाकर आई हूं और ऊपर से चाय!'

'तो शरबत ही सही... किशन!' डॉली ने नौकर को आवाज देते हुए कहा, 'और कोई सेवा?'

'तुम सेवा करोगी? कोई सेवा हो तो मुझसे कहो।'

'न बाबा, तुम्हारी की हुई सेवा के तो अहसान अभी तक भूले नहीं!'

'कौन-सी?'

'जो राज को स्टेशन पहुंचाते समय की थी।'

'ओह! कहो राज का पारा अभी तक उतरा है या नहीं?'

'मुझे तो उतरा हुआ दिखाई नहीं देता।'

'क्यों, क्या बात है?'

'उसने तो मुझसे बोलना ही छोड़ दिया है। मेरे तैयार होने से पहले ही फैक्टरी चला जाता है और संध्या को भी देर से लौटता है। पहले तो इधर मैं कॉलेज से आई उधर वह आ पहुंचा।'

'डॉली, क्या तुम्हें यह मालूम न था कि वह तुमसे प्रेम करता है?'

'जानती क्यों नहीं थी।'

फिर तुमने उसे इस प्रकार अंधेरे में क्यों रखा? किसी दिन साफ-साफ कह देती कि तू जय को पसंद करती है।

'तू नहीं जानती कि उसको साफ इंकार करना कितना कठिन है

'तो क्या अब वह कठिनता दिन-प्रतिदिन सरल होती जा रही है?'

'नहीं परंतु मैं करू क्या?'

'वह बुद्धिमान है। उसे किसी समय ठीक प्रकार से समझा दो। वह स्वयं ही तुम्हारा ध्यान छोड़ देगा।'

'वह तो मैं चाहूं तो आज भी हो सकता है, परंतु वह मुझे कितना चाहता है, इसका अनुमान तुम नहीं लगा सकती।'

"जब उसकी चाहना का ध्यान है तो उसकी ही रहो।'

'यह कैसे संभव है?'

"क्या वह तुम्हें पसंद नहीं?'

"पसंद की बात नहीं। शुरु से ही मैं उससे कुछ इतनी अधिक घुल मिल गई थी कि वह समझने लगा कि मैं भी उससे प्रेम करने लगी हूं। मैंने सोचा कि इस बेचारे का यहां कोई नहीं, यदि दो घड़ी मन बहला ले तो मेरा क्या जाता है और मेरे भी हंसने-खेलने का सामान मुफ्त में हो गया।'

'दूसरे शब्दों में तुम उसे खिलौना समझकर उसके साथ खेलती रही।'

'नहीं, ऐसा तो मैंने कभी नहीं समझा, मेरा विचार था कि थोड़ी-सी उपेक्षा भी उसे मुझसे दूर रख सकती है।'

'और अब?'

'अब वह दिल बहलावा मेरे लिए एक संकट-सा बन गया है।'

'तुम तमाशा देखकर केवल हंसना जानती हो, पुरस्कार देना नहीं।'

'तुम्हें तो सदा हंसी ही सूझती है।'

'और मैं कर भी क्या सकती हूं?'

'जो आग तुमने लगाई है, उसे ही बुझा दो। आगे मैं संभाल लूंगी।'

'मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।'

"किसी प्रकार राज को यह विश्वास दिला दो कि जो बात तुमने उससे कही थी वह झूठ थी।'

'अर्थात् तुम जय से प्रेम नहीं करती।'

'नहीं।'

'राज से प्रेम करती हो।'

'तुम तो फिर हंसी करने लगी। यह तो केवल राज को बताना है।'

'डॉली, एक बात कहूं?'

'कहो, क्या है?'

'वैसे राज जय से कहीं अच्छा है। मेरा मतलब है सुंदर, मधुर स्वभाव वाला....।'

'तुम्हीं उसके साथ विवाह कर लो ना! करू बात। आदमी बहुत दिलचस्प भी है।'

'लो यह खूब रही। प्रेम तुमसे करे और तुम उसे किसी और को सौंपो।'

‘परंतु तुमने छोटा मुंह बड़ी बात वाली कहावत नहीं सुनी क्या ?'

'तुम्हारा मतलब है कि जय उससे कहीं अधिक मूल्य दे सकता है!'

'क्यों नहीं?'

'भला कैसे? मैं भी सुनूं!'

'उसके पास पैसा है, राज से अधिक पढ़ा हुआ है, मान है और हमारी टक्कर का है। राज तो फिर भी हमारा एक नौकर ही है।'

'इसका अर्थ है कि तुम्हें जय से अधिक उसके धन से प्रेम है।'

'क्यों नहीं! कौन लड़की यह नहीं चाहती कि वह अपने पति के घर सुख से जीवन बिताए, अच्छे से अच्छा पहने, खाए और सुख और आदर से रहे?'

'इन सब वस्तुओं के सामने क्या राज का प्रेम भरा दिल कम है?'
 
"ऐसे दिल तो सवेरे से शाम तक हजारों ले लो।'

'डॉली, अब इस बहस से क्या लाभ? बोलो, अब क्या करू?'

'कोई ऐसा उपाय सोचो जिससे उसके मन से यह संदेह दूर हो जाए।'

माला सोच में पड़ गई। थोड़ी देर बाद बोली, 'देखो यह काम तुम मुझ पर छोड़ दो, मैं अभी चली जाती हूं। राज आने वाला है। उसे यह न पता लगे कि मैं यहां आई थी।'

'इससे क्या होगा?' डॉली ने पूछा।

'तुम देखती जाओ, आज रात को एक पत्र तुम्हें भेजूंगी। तुम्हें मिलने से पहले किसी तरह उसे राज पढ़ ले तो सब काम बन जाएगा। घबराओ नहीं, मेरा काम तो तुम लोगों की सेवा करना है।' यह कहकर माला ने साइकिल उठाई और चल दी। डॉली की समझ में न आया कि उसे यह पत्र की क्या सूझी। कहीं और आपत्ति न खड़ी कर दे। माला ने घर पहुंचते ही डॉली के नाम एक पत्र लिखा और अंधेरा होते ही अपने नौकर को सिखाकर उसके घर भेज दिया।

नौकर पत्र लेकर डॉली के घर पहुंचा और उसने राज के कमरे की खिड़की से झांका। राज अपने कमरे में ही था। नौकर दरवाजे की ओर बढ़ गया और उसने धीरे-से खटखटाया। राज ने दरवाजा खोलते ही पूछा, 'क्या काम है?'

'ओह! क्षमा कीजिए मैं कमरा भूल गया। उसने कांपती आवाज में कहा, मुझे तो डॉली बीबी से काम है।'

'क्या काम है?' राज ने उतावलेपन से पूछा।

'यह चिट्ठी उन्हें देनी है।'

"किसने भेजी है?'

'यह मैं आपको नहीं बता सकता।'

'लाओ, मैं दे दूंगा।'

'नहीं साहब, यह केवल उन्हीं को देनी है।' उसने पत्र को राज के सामने करते हुए कहा। राज ने पत्र को संदेह की दृष्टि से देखकर हाथ से छीन लिया।

'साहब, यह आप क्या कर रहे हैं? यह तो डॉली बीबी....।'

'हां! मैं जानता हूं। जाओ मैं उसे दे दूंगा, वह घर पर नहीं है।'

'अच्छा साहब, मैं जाता हूं। किसी और के हाथ न लग जाए, बहुत प्राइवेट है।' यह कहकर वह मुड़ा और दरवाजे से बाहर निकल गया।
 
Back
Top