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मेज पर रखे शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकलकर विजय की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी… “राजदूत महोदय से बात कराओ । ”
“आप कौन ?'
"उनसे कहो, जेड टूए बात करनी चाहता है ।"
""ओके..ओके सर ।"' लडकी की आवाज बता रही धी कि कोड को सुनते ही वह बहुत कुछ समझ गई थी…"अभी कराती हू। "
इस बार बिजय की आवाज़ न उभरी ।
परंतु फोन के दूसरी तरफ से आधे मिनट से भी पहले एक भारी भरकम आवाज सुनाई दी थी…“यस, भारतीय राजदूत हियर । ”
“इंडियन सीक्रेट एजेंट बिजय बोल रहा हूसर ।"
"वो तो हम समझ गए लेकिन ये नंबर तो कराची का है?"
"मैं करांची मेँ ही हूसर ।”
“ओह आप यहा' पहुच चूकै हैं ।। ”
“यही दर्ज कराने के लिए फोन किया है।"
“बताइए आप कहां हैं। एंबेसी की गाडी भेज देता हूं ।"
"उसकी जरूरत नहीं हे । आप अपने रिकार्ड में बस यह दर्ज कर लीजिए कि मैं पाक जासूस नुसरत तुुगलक से मिलने जा रहा हू । ”
"क्या आपको सिक्योरिटी की जरूरत हे?”
“नो ।” कहकर रिसीवर रख दिया गया ।
°°°°°°°°
°°°°°°°°
नुसरत की ही नहीं, तुगलक की नजर भी उस ट्रांसमीटर पर स्थिर थ्री जो अब कोइ आवाज नहीँ उगल रहा था ।
कुछ देर बाद तुगलक ने कहा…"ये बिजय दी ग्रेट का क्रोनसा पेंतरा हुआ नुसरत बहन ? "
"तुमने उसे फिर ग्रेट कहा !”
"इस बार तो सिद्ध हो गया हुजूरेआला कि ग्रेट वही है, फुद्दू तो हम निक्ले । इतनी गहरी साजिश के बावजूद कहां रामनाम सत्य कर सकै उसकी। उल्टा हमारा प्यादा मारा गया ।"
"इतना बड़ा फेरबदल उस साले अंतर्राष्टीय घपड़चट्टू के कारण हुआ है । वो सही समय पर वहां पहुंचकर हमारे प्यादे को न उड़ा देता तो प्यादा अपना काम कर चुका था। ”
"वो भी तो हमारा ही फुद्दूपन हुआ। ”
"वो कैसे?”
"सुना नहीं तूने। उसने खुद बिजय दी ग्रेट क्रो बताया कि शुरू से हम पर नजर रखे हुए था, तभी तो वहां पहुंच सका और हम यह बात ताढ़ न सके तो हुए न फुद्दुओं कै सरदार। "
“बात में दम है तुगलक भैया ।"
"अब तो बात का दम ही निकला पड़ा है नुसरत बहन। ”
"मैंने पूछा था…ये उसका कौनसा पैंतरा हुआ मगर तू बात को सूमो पहलवानों की तरह गोलमटोल कर गया ।"
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"पैंतरा क्या है? हमारी मुश्किलें बढा दी हें उसने । अब से पहले तक. . .यानी जब तक वह नंबर एक में पाकिस्तान नहीं आया था, हमारे लिए उसका क्रियाकम करना आसान था क्योंकि जो आदमी पाकिस्तान मेँ था ही नहीं उसे भला हम मार कैसे सकते थे मगर अब, जब वह रजिस्ट्रड रूप से हमारे मुल्क में आ चुका है तो उसे गारत कर देना आसान नहीँ है । विश्व स्तर पर हमारे प्यारे मुल्क से पूछा जाएगा कि तुम्हारे यहां पहुचा इंडियन एजेंट विजय कहां गया आर हमारे मुल्क के लिए ज़वाब देना भारी पड़ जाएगा ? "
“उसका जबाब तो हमारे पास है। ”
"श शी !" तुगलक ने अपने होठों पर उंगली रखकर कमरे में चारों तरफ देखते हुए कहा-“कच्ची वातें मुंह से नहीँ निकालते मेरे बच्चे । अंत्तरांष्ट्रीय घपड़चट्टू के रूप में तुम देख चुकें हो कि दीवारों के कान कितने लवे लंबे होते हैं ।"
"चलो, नहीं निकालता उस बात को मुंह से । अंदर ही अंदर घोटकर पी जाता हू मगर... "अब कहा' अटक गया जामुन की औलाद?”
"उसने ऐसा किया क्यों ? ”
“मतबल?? "
“कहीं उसकी नजर हमारे द्वारा गजाला कै फ्लैट में छुपाए गए उस माइक्रोफोन पर तो नहीं पढ़ गइ है जिसकी बदौलत यहां बैठकर वहां का लाइव टेलिकास्ट सुन रहे है !"
"ये भी हो सकता है क्योंकि जब वह पैदा हुआ था तो मैंने अपने चक्षुओं से उसके बाप को उसकी आंखों में गिद्ध की आंखें फिट करते देखा था लकिन.. .ऐसा न भी हुआ हो तब भी, उसने जो किया है , अपनी सुरक्षा के लिए किया हे क्योंकि जेसा कि पहले ही फरमा चुका हू…अब उसे गारत करना हमारे लिए आसान नहीं है ।"'
"अंतराष्ट्रीय घपढ़चटटू को क्यों भगा दिया उसने ?"
"तू तो मेरा भेजा कुछ ज्यादा ही चाट रहा है बिल्ली कै बच्चे, क्या तूने वह नहीं सुना जो उसने गजाला नाम की खातून से कहा ? ”
“क्या वही सच है ?'"
“जब वो बोलता हे तो सच झूठ का पता तो ऊपर वाला भी नहीं लगा सकता, हमारी तो बिसात क्या है? हां, हाल फिलहाल के हालात को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता हे कि वह इस बात को अच्छी तरह जानता हे कि अंतर्राष्टीय घपड़चटटू मरत्ते दम तक पेसों के अलावा किसी का नहीं ही सकता । उसका भी नहीँ । फिर, उसने हाजी गल्ला के हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे मे बगेर एक भी लफ्ज बताए जो कुछ कहा उसे सुनकर वह समझ गया होगा कि इस लफडे मेँ पडकर वह अपना वक्त ही बरबाद करेगा । इस सबको देखत हुए उसकी इस दलील में दम नज़र आता है कि जिस नोशाद अंसारी क्रो वह जावेद कश्मीरी क्रो हमें सौंपकर लुभाव में ले सकता हे, उसके लिए हाजी गल्ला कै उस हेडक्वाटर में घुसने का रिस्क क्यों उठाए जिसके बारे मेँ घपढ़चटटू का कहना ये हे कि वहां परिंदा भी पंख मारेगा तो कटवा बेठेगा !"
"पर क्या हम उसे लुभाव देंगे?"
“पागल कुत्ते ने काटा हे हमेँ? ”
“फिर ? ”
"तूने मुझसे यह नहीं पूछा था भींडी के बीज कि हम क्या करेंगे बल्कि यह पूछा था कि वह क्या सोच रहा है और मैंने तुझे तेरे उसी सवाल का जवाब दिया हे ।"'
"उसने राजदूत से यह क्यों कहा कि वह हमसे मिलने...
"तेरे दिमाग का क्या बिल्कुल ही दिवाला निकल गया है करेले के छिलके ! उसने दूतावास में जानबूझकर यह मैसेज छोड़ा है ताकि अगर वह 'गायब' हो जाए तो सीधे सीधे हमारे कान उमेठे जाएं ।"
"अब क्या वह वाकइ हमसे मिलेगा? "
"डंके की चोट पर मिलेगा। "
“यह जानते बुझते कि हमने गुलजार नाम कै मानवबम कै जरिए उसका क्रियाकर्म करने की कोशिश की?”
“यह खूबी हे उसकी । पहली बार नहीं होगा ऐसा, वह पहले भी कई बार अपनी हत्या के ख्वाहिशमंदो कै सामने जाकर उन्हें सलाम ठोकने कै करिश्मे दिखा चुका हे ।" नुसरत ने कुछ कहने कै लिए मुंह खोला ही था फि तुगलक कै बाएं हाथ की तर्जनी में मौजूद मोटे नग वाली अंगूठी से 'पिंग पिंग’ की आवाज निकलने लगी । स्वाभाविक रूप से दोनों की नजरें उस पर स्थिर हो गई। फिर, तुगलक बोला -"ले आडू के बीज, आ गया उसका फरमान ।"
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“क्या ज़रूरी है कि वहीँ हो ?"
"अभी सबूत पेश करता हू ।” कहने के साथ तुगलक ने अंगूठी का नग हटाया । ऐसा करते ही पिंग पिंग की आवाज बंद होगई।
तुगलक ने केवल इतना ही कहा…“यस ।"
“नो भी कहोगे तो अब हम इस ट्रांसमीटर से टलने वाले नहीं हैँ तुगलक मियां ।” विजय की आवाज़ मेज पर रखे ट्रांसमीटर से भी निकली ओर अंगूठीरूपी ट्रांसमीटर से भी ।
"ओह ! गुरुओं के गुरुघंटाल.. बोल रहे हैँ !" तुगलक ने अपनी सदाबहार टोन में कहा…"खैरमगदम है आपका ।"
"खैरमगदम तो मियां हमारा ऐसा किया कि किस्मत साथ न देती तो इस वक्त खुदा के रजिस्टर में हाजिरी दर्ज कर रहे होते । "
"हुजूर मतलब क्या हुआ इस तोहमत का ?”
"मतलब ये हुआ कि तुम्हारे प्यादे का कचूमर निकला पड़ा है ।"
"कहां?"
"वहीँ, जहा तुमने उसे मानवबम बनाकर भेजा था ।”
"मानवबम। प्यादा ! कचूमर ! लाहालविलाकूवत । ये आप क्या फरमाए चले जा रहे हैं गुरुदेव ? हमने अपना कौनसा प्यादा मानव बम बनाकर कहां भेज दिया ?"
"गजाला के फ्लैट पर । " तुगलक ने पूरी ढिठाई कै साथ पूछा…"ये कौन हुईं ?' "तुम जानते हो ।"
"इंमान से सरकार, हमेँ नहीं मालूम ये मोहतरमा कौन हे ।”
"करांची में पहले से स्थापित राॅ की एजेंट ।"
"आप इतनी सीक्रेट जानकारी हमें दे रहे हैँ? "
दूसरी तरफ मोजूद बिजय हंसा…“जो जानकारी तुम्हें पहले से हे, उसे बताकर कोई नया नुकसान नहीं होने बाला ।"
"दो मिनट कै अंदरशंदर आपने हम पर ये दूसरी तोहमत लगा दी है हजूर, इसका मतलब तो ये हुआ कि भले ही हम गर्म तवे पर बैठकर यह कहें कि न हमेँ गजाला नाम की किसी राॅ की एजेंट की जानकारी थी. न ही हमने अपने किसी प्यादे को मानवबम बनाकर कहीं भेजा, मगर आप हमारी बात पर यकीन नहीं करेंगे ।"
"करेंगे ….…करेंगे क्यों नहीं? " विजय का लहजा वता रहा था कि अब उसने भी पैंतरा वदल लिया है…“इतने महान मुल्क कै इतने अजीमुश्शान जासूस अगर गर्म तवे पर बैठकर कहेंगे तो यकीन क्यों नहीं करेंगे ! मगर...
"अगर मगर के चक्कर में कहा पड़ गए हुजूरेआला?"
"यह बात तुम्हें सचमुच गर्म तवे पर बैठकर कहनी होगी ।"
“कहेंगें…सोलह आने कहेगे गुरुदेव पर उसके लिए तुम्हें हमारे सामने प्रकट होना पड़ेगा ।”
"उसी के लिए संपर्क किया है ।"'
"तो होइए न !”
"तुम्हारे मुल्क में आए हैं, हमें लेने गाडी भी नहीं भेजोगे क्या? ”
“क्यों नहीं भेजेंगे ! फ़रमाइए तो सही-कहां' भेजें गाडी?"
“वहीं, जहां तुम्हारे प्यादे का मलूदा पड़ा है ।”
“फिर वही तोहमतबाजी ! ये बात ठीक नहीँ है गुरूदेव, आप तो फाऊल पर फाऊल किए चले जा रहे हैं ।"'
"वह कैसे ? "
"आपकी बातों से लग रहा है कि आप पाकिस्तान पहुंच चुके हैं जबकि कम से कम इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि हमारे मुल्क ने आपको बा इज्जत इन्वाइट किया था । यानी हमें मालूम होना चाहिए था कि आप कब किस फ्लाइट से तशरीफ ला रहे हैं । हमारा हक आपको एयरपोर्ट से रिसीव करना था पर लग रहा हे-आपने हमारे इस हक पर डाका डाला है ।”
"बात तो ठीक है तुम्हारी ।”
"यह जुल्म आपने क्यों किया ?”
मेज पर रखे शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकलकर विजय की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी… “राजदूत महोदय से बात कराओ । ”
“आप कौन ?'
"उनसे कहो, जेड टूए बात करनी चाहता है ।"
""ओके..ओके सर ।"' लडकी की आवाज बता रही धी कि कोड को सुनते ही वह बहुत कुछ समझ गई थी…"अभी कराती हू। "
इस बार बिजय की आवाज़ न उभरी ।
परंतु फोन के दूसरी तरफ से आधे मिनट से भी पहले एक भारी भरकम आवाज सुनाई दी थी…“यस, भारतीय राजदूत हियर । ”
“इंडियन सीक्रेट एजेंट बिजय बोल रहा हूसर ।"
"वो तो हम समझ गए लेकिन ये नंबर तो कराची का है?"
"मैं करांची मेँ ही हूसर ।”
“ओह आप यहा' पहुच चूकै हैं ।। ”
“यही दर्ज कराने के लिए फोन किया है।"
“बताइए आप कहां हैं। एंबेसी की गाडी भेज देता हूं ।"
"उसकी जरूरत नहीं हे । आप अपने रिकार्ड में बस यह दर्ज कर लीजिए कि मैं पाक जासूस नुसरत तुुगलक से मिलने जा रहा हू । ”
"क्या आपको सिक्योरिटी की जरूरत हे?”
“नो ।” कहकर रिसीवर रख दिया गया ।
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नुसरत की ही नहीं, तुगलक की नजर भी उस ट्रांसमीटर पर स्थिर थ्री जो अब कोइ आवाज नहीँ उगल रहा था ।
कुछ देर बाद तुगलक ने कहा…"ये बिजय दी ग्रेट का क्रोनसा पेंतरा हुआ नुसरत बहन ? "
"तुमने उसे फिर ग्रेट कहा !”
"इस बार तो सिद्ध हो गया हुजूरेआला कि ग्रेट वही है, फुद्दू तो हम निक्ले । इतनी गहरी साजिश के बावजूद कहां रामनाम सत्य कर सकै उसकी। उल्टा हमारा प्यादा मारा गया ।"
"इतना बड़ा फेरबदल उस साले अंतर्राष्टीय घपड़चट्टू के कारण हुआ है । वो सही समय पर वहां पहुंचकर हमारे प्यादे को न उड़ा देता तो प्यादा अपना काम कर चुका था। ”
"वो भी तो हमारा ही फुद्दूपन हुआ। ”
"वो कैसे?”
"सुना नहीं तूने। उसने खुद बिजय दी ग्रेट क्रो बताया कि शुरू से हम पर नजर रखे हुए था, तभी तो वहां पहुंच सका और हम यह बात ताढ़ न सके तो हुए न फुद्दुओं कै सरदार। "
“बात में दम है तुगलक भैया ।"
"अब तो बात का दम ही निकला पड़ा है नुसरत बहन। ”
"मैंने पूछा था…ये उसका कौनसा पैंतरा हुआ मगर तू बात को सूमो पहलवानों की तरह गोलमटोल कर गया ।"
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"पैंतरा क्या है? हमारी मुश्किलें बढा दी हें उसने । अब से पहले तक. . .यानी जब तक वह नंबर एक में पाकिस्तान नहीं आया था, हमारे लिए उसका क्रियाकम करना आसान था क्योंकि जो आदमी पाकिस्तान मेँ था ही नहीं उसे भला हम मार कैसे सकते थे मगर अब, जब वह रजिस्ट्रड रूप से हमारे मुल्क में आ चुका है तो उसे गारत कर देना आसान नहीँ है । विश्व स्तर पर हमारे प्यारे मुल्क से पूछा जाएगा कि तुम्हारे यहां पहुचा इंडियन एजेंट विजय कहां गया आर हमारे मुल्क के लिए ज़वाब देना भारी पड़ जाएगा ? "
“उसका जबाब तो हमारे पास है। ”
"श शी !" तुगलक ने अपने होठों पर उंगली रखकर कमरे में चारों तरफ देखते हुए कहा-“कच्ची वातें मुंह से नहीँ निकालते मेरे बच्चे । अंत्तरांष्ट्रीय घपड़चट्टू के रूप में तुम देख चुकें हो कि दीवारों के कान कितने लवे लंबे होते हैं ।"
"चलो, नहीं निकालता उस बात को मुंह से । अंदर ही अंदर घोटकर पी जाता हू मगर... "अब कहा' अटक गया जामुन की औलाद?”
"उसने ऐसा किया क्यों ? ”
“मतबल?? "
“कहीं उसकी नजर हमारे द्वारा गजाला कै फ्लैट में छुपाए गए उस माइक्रोफोन पर तो नहीं पढ़ गइ है जिसकी बदौलत यहां बैठकर वहां का लाइव टेलिकास्ट सुन रहे है !"
"ये भी हो सकता है क्योंकि जब वह पैदा हुआ था तो मैंने अपने चक्षुओं से उसके बाप को उसकी आंखों में गिद्ध की आंखें फिट करते देखा था लकिन.. .ऐसा न भी हुआ हो तब भी, उसने जो किया है , अपनी सुरक्षा के लिए किया हे क्योंकि जेसा कि पहले ही फरमा चुका हू…अब उसे गारत करना हमारे लिए आसान नहीं है ।"'
"अंतराष्ट्रीय घपढ़चटटू को क्यों भगा दिया उसने ?"
"तू तो मेरा भेजा कुछ ज्यादा ही चाट रहा है बिल्ली कै बच्चे, क्या तूने वह नहीं सुना जो उसने गजाला नाम की खातून से कहा ? ”
“क्या वही सच है ?'"
“जब वो बोलता हे तो सच झूठ का पता तो ऊपर वाला भी नहीं लगा सकता, हमारी तो बिसात क्या है? हां, हाल फिलहाल के हालात को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता हे कि वह इस बात को अच्छी तरह जानता हे कि अंतर्राष्टीय घपड़चटटू मरत्ते दम तक पेसों के अलावा किसी का नहीं ही सकता । उसका भी नहीँ । फिर, उसने हाजी गल्ला के हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे मे बगेर एक भी लफ्ज बताए जो कुछ कहा उसे सुनकर वह समझ गया होगा कि इस लफडे मेँ पडकर वह अपना वक्त ही बरबाद करेगा । इस सबको देखत हुए उसकी इस दलील में दम नज़र आता है कि जिस नोशाद अंसारी क्रो वह जावेद कश्मीरी क्रो हमें सौंपकर लुभाव में ले सकता हे, उसके लिए हाजी गल्ला कै उस हेडक्वाटर में घुसने का रिस्क क्यों उठाए जिसके बारे मेँ घपढ़चटटू का कहना ये हे कि वहां परिंदा भी पंख मारेगा तो कटवा बेठेगा !"
"पर क्या हम उसे लुभाव देंगे?"
“पागल कुत्ते ने काटा हे हमेँ? ”
“फिर ? ”
"तूने मुझसे यह नहीं पूछा था भींडी के बीज कि हम क्या करेंगे बल्कि यह पूछा था कि वह क्या सोच रहा है और मैंने तुझे तेरे उसी सवाल का जवाब दिया हे ।"'
"उसने राजदूत से यह क्यों कहा कि वह हमसे मिलने...
"तेरे दिमाग का क्या बिल्कुल ही दिवाला निकल गया है करेले के छिलके ! उसने दूतावास में जानबूझकर यह मैसेज छोड़ा है ताकि अगर वह 'गायब' हो जाए तो सीधे सीधे हमारे कान उमेठे जाएं ।"
"अब क्या वह वाकइ हमसे मिलेगा? "
"डंके की चोट पर मिलेगा। "
“यह जानते बुझते कि हमने गुलजार नाम कै मानवबम कै जरिए उसका क्रियाकर्म करने की कोशिश की?”
“यह खूबी हे उसकी । पहली बार नहीं होगा ऐसा, वह पहले भी कई बार अपनी हत्या के ख्वाहिशमंदो कै सामने जाकर उन्हें सलाम ठोकने कै करिश्मे दिखा चुका हे ।" नुसरत ने कुछ कहने कै लिए मुंह खोला ही था फि तुगलक कै बाएं हाथ की तर्जनी में मौजूद मोटे नग वाली अंगूठी से 'पिंग पिंग’ की आवाज निकलने लगी । स्वाभाविक रूप से दोनों की नजरें उस पर स्थिर हो गई। फिर, तुगलक बोला -"ले आडू के बीज, आ गया उसका फरमान ।"
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“क्या ज़रूरी है कि वहीँ हो ?"
"अभी सबूत पेश करता हू ।” कहने के साथ तुगलक ने अंगूठी का नग हटाया । ऐसा करते ही पिंग पिंग की आवाज बंद होगई।
तुगलक ने केवल इतना ही कहा…“यस ।"
“नो भी कहोगे तो अब हम इस ट्रांसमीटर से टलने वाले नहीं हैँ तुगलक मियां ।” विजय की आवाज़ मेज पर रखे ट्रांसमीटर से भी निकली ओर अंगूठीरूपी ट्रांसमीटर से भी ।
"ओह ! गुरुओं के गुरुघंटाल.. बोल रहे हैँ !" तुगलक ने अपनी सदाबहार टोन में कहा…"खैरमगदम है आपका ।"
"खैरमगदम तो मियां हमारा ऐसा किया कि किस्मत साथ न देती तो इस वक्त खुदा के रजिस्टर में हाजिरी दर्ज कर रहे होते । "
"हुजूर मतलब क्या हुआ इस तोहमत का ?”
"मतलब ये हुआ कि तुम्हारे प्यादे का कचूमर निकला पड़ा है ।"
"कहां?"
"वहीँ, जहा तुमने उसे मानवबम बनाकर भेजा था ।”
"मानवबम। प्यादा ! कचूमर ! लाहालविलाकूवत । ये आप क्या फरमाए चले जा रहे हैं गुरुदेव ? हमने अपना कौनसा प्यादा मानव बम बनाकर कहां भेज दिया ?"
"गजाला के फ्लैट पर । " तुगलक ने पूरी ढिठाई कै साथ पूछा…"ये कौन हुईं ?' "तुम जानते हो ।"
"इंमान से सरकार, हमेँ नहीं मालूम ये मोहतरमा कौन हे ।”
"करांची में पहले से स्थापित राॅ की एजेंट ।"
"आप इतनी सीक्रेट जानकारी हमें दे रहे हैँ? "
दूसरी तरफ मोजूद बिजय हंसा…“जो जानकारी तुम्हें पहले से हे, उसे बताकर कोई नया नुकसान नहीं होने बाला ।"
"दो मिनट कै अंदरशंदर आपने हम पर ये दूसरी तोहमत लगा दी है हजूर, इसका मतलब तो ये हुआ कि भले ही हम गर्म तवे पर बैठकर यह कहें कि न हमेँ गजाला नाम की किसी राॅ की एजेंट की जानकारी थी. न ही हमने अपने किसी प्यादे को मानवबम बनाकर कहीं भेजा, मगर आप हमारी बात पर यकीन नहीं करेंगे ।"
"करेंगे ….…करेंगे क्यों नहीं? " विजय का लहजा वता रहा था कि अब उसने भी पैंतरा वदल लिया है…“इतने महान मुल्क कै इतने अजीमुश्शान जासूस अगर गर्म तवे पर बैठकर कहेंगे तो यकीन क्यों नहीं करेंगे ! मगर...
"अगर मगर के चक्कर में कहा पड़ गए हुजूरेआला?"
"यह बात तुम्हें सचमुच गर्म तवे पर बैठकर कहनी होगी ।"
“कहेंगें…सोलह आने कहेगे गुरुदेव पर उसके लिए तुम्हें हमारे सामने प्रकट होना पड़ेगा ।”
"उसी के लिए संपर्क किया है ।"'
"तो होइए न !”
"तुम्हारे मुल्क में आए हैं, हमें लेने गाडी भी नहीं भेजोगे क्या? ”
“क्यों नहीं भेजेंगे ! फ़रमाइए तो सही-कहां' भेजें गाडी?"
“वहीं, जहां तुम्हारे प्यादे का मलूदा पड़ा है ।”
“फिर वही तोहमतबाजी ! ये बात ठीक नहीँ है गुरूदेव, आप तो फाऊल पर फाऊल किए चले जा रहे हैं ।"'
"वह कैसे ? "
"आपकी बातों से लग रहा है कि आप पाकिस्तान पहुंच चुके हैं जबकि कम से कम इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि हमारे मुल्क ने आपको बा इज्जत इन्वाइट किया था । यानी हमें मालूम होना चाहिए था कि आप कब किस फ्लाइट से तशरीफ ला रहे हैं । हमारा हक आपको एयरपोर्ट से रिसीव करना था पर लग रहा हे-आपने हमारे इस हक पर डाका डाला है ।”
"बात तो ठीक है तुम्हारी ।”
"यह जुल्म आपने क्यों किया ?”