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चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

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मेज पर रखे शक्तिशाली ट्रांसमीटर से निकलकर विजय की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी… “राजदूत महोदय से बात कराओ । ”

“आप कौन ?'

"उनसे कहो, जेड टूए बात करनी चाहता है ।"

""ओके..ओके सर ।"' लडकी की आवाज बता रही धी कि कोड को सुनते ही वह बहुत कुछ समझ गई थी…"अभी कराती हू। "

इस बार बिजय की आवाज़ न उभरी ।

परंतु फोन के दूसरी तरफ से आधे मिनट से भी पहले एक भारी भरकम आवाज सुनाई दी थी…“यस, भारतीय राजदूत हियर । ”

“इंडियन सीक्रेट एजेंट बिजय बोल रहा हूसर ।"

"वो तो हम समझ गए लेकिन ये नंबर तो कराची का है?"

"मैं करांची मेँ ही हूसर ।”

“ओह आप यहा' पहुच चूकै हैं ।। ”

“यही दर्ज कराने के लिए फोन किया है।"

“बताइए आप कहां हैं। एंबेसी की गाडी भेज देता हूं ।"

"उसकी जरूरत नहीं हे । आप अपने रिकार्ड में बस यह दर्ज कर लीजिए कि मैं पाक जासूस नुसरत तुुगलक से मिलने जा रहा हू । ”

"क्या आपको सिक्योरिटी की जरूरत हे?”

“नो ।” कहकर रिसीवर रख दिया गया ।

°°°°°°°°

°°°°°°°°

नुसरत की ही नहीं, तुगलक की नजर भी उस ट्रांसमीटर पर स्थिर थ्री जो अब कोइ आवाज नहीँ उगल रहा था ।

कुछ देर बाद तुगलक ने कहा…"ये बिजय दी ग्रेट का क्रोनसा पेंतरा हुआ नुसरत बहन ? "

"तुमने उसे फिर ग्रेट कहा !”

"इस बार तो सिद्ध हो गया हुजूरेआला कि ग्रेट वही है, फुद्दू तो हम निक्ले । इतनी गहरी साजिश के बावजूद कहां रामनाम सत्य कर सकै उसकी। उल्टा हमारा प्यादा मारा गया ।"

"इतना बड़ा फेरबदल उस साले अंतर्राष्टीय घपड़चट्टू के कारण हुआ है । वो सही समय पर वहां पहुंचकर हमारे प्यादे को न उड़ा देता तो प्यादा अपना काम कर चुका था। ”

"वो भी तो हमारा ही फुद्दूपन हुआ। ”

"वो कैसे?”

"सुना नहीं तूने। उसने खुद बिजय दी ग्रेट क्रो बताया कि शुरू से हम पर नजर रखे हुए था, तभी तो वहां पहुंच सका और हम यह बात ताढ़ न सके तो हुए न फुद्दुओं कै सरदार। "

“बात में दम है तुगलक भैया ।"

"अब तो बात का दम ही निकला पड़ा है नुसरत बहन। ”

"मैंने पूछा था…ये उसका कौनसा पैंतरा हुआ मगर तू बात को सूमो पहलवानों की तरह गोलमटोल कर गया ।"

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"पैंतरा क्या है? हमारी मुश्किलें बढा दी हें उसने । अब से पहले तक. . .यानी जब तक वह नंबर एक में पाकिस्तान नहीं आया था, हमारे लिए उसका क्रियाकम करना आसान था क्योंकि जो आदमी पाकिस्तान मेँ था ही नहीं उसे भला हम मार कैसे सकते थे मगर अब, जब वह रजिस्ट्रड रूप से हमारे मुल्क में आ चुका है तो उसे गारत कर देना आसान नहीँ है । विश्व स्तर पर हमारे प्यारे मुल्क से पूछा जाएगा कि तुम्हारे यहां पहुचा इंडियन एजेंट विजय कहां गया आर हमारे मुल्क के लिए ज़वाब देना भारी पड़ जाएगा ? "

“उसका जबाब तो हमारे पास है। ”

"श शी !" तुगलक ने अपने होठों पर उंगली रखकर कमरे में चारों तरफ देखते हुए कहा-“कच्ची वातें मुंह से नहीँ निकालते मेरे बच्चे । अंत्तरांष्ट्रीय घपड़चट्टू के रूप में तुम देख चुकें हो कि दीवारों के कान कितने लवे लंबे होते हैं ।"

"चलो, नहीं निकालता उस बात को मुंह से । अंदर ही अंदर घोटकर पी जाता हू मगर... "अब कहा' अटक गया जामुन की औलाद?”

"उसने ऐसा किया क्यों ? ”

“मतबल?? "

“कहीं उसकी नजर हमारे द्वारा गजाला कै फ्लैट में छुपाए गए उस माइक्रोफोन पर तो नहीं पढ़ गइ है जिसकी बदौलत यहां बैठकर वहां का लाइव टेलिकास्ट सुन रहे है !"

"ये भी हो सकता है क्योंकि जब वह पैदा हुआ था तो मैंने अपने चक्षुओं से उसके बाप को उसकी आंखों में गिद्ध की आंखें फिट करते देखा था लकिन.. .ऐसा न भी हुआ हो तब भी, उसने जो किया है , अपनी सुरक्षा के लिए किया हे क्योंकि जेसा कि पहले ही फरमा चुका हू…अब उसे गारत करना हमारे लिए आसान नहीं है ।"'

"अंतराष्ट्रीय घपढ़चटटू को क्यों भगा दिया उसने ?"

"तू तो मेरा भेजा कुछ ज्यादा ही चाट रहा है बिल्ली कै बच्चे, क्या तूने वह नहीं सुना जो उसने गजाला नाम की खातून से कहा ? ”

“क्या वही सच है ?'"

“जब वो बोलता हे तो सच झूठ का पता तो ऊपर वाला भी नहीं लगा सकता, हमारी तो बिसात क्या है? हां, हाल फिलहाल के हालात को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता हे कि वह इस बात को अच्छी तरह जानता हे कि अंतर्राष्टीय घपड़चटटू मरत्ते दम तक पेसों के अलावा किसी का नहीं ही सकता । उसका भी नहीँ । फिर, उसने हाजी गल्ला के हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे मे बगेर एक भी लफ्ज बताए जो कुछ कहा उसे सुनकर वह समझ गया होगा कि इस लफडे मेँ पडकर वह अपना वक्त ही बरबाद करेगा । इस सबको देखत हुए उसकी इस दलील में दम नज़र आता है कि जिस नोशाद अंसारी क्रो वह जावेद कश्मीरी क्रो हमें सौंपकर लुभाव में ले सकता हे, उसके लिए हाजी गल्ला कै उस हेडक्वाटर में घुसने का रिस्क क्यों उठाए जिसके बारे मेँ घपढ़चटटू का कहना ये हे कि वहां परिंदा भी पंख मारेगा तो कटवा बेठेगा !"

"पर क्या हम उसे लुभाव देंगे?"

“पागल कुत्ते ने काटा हे हमेँ? ”

“फिर ? ”

"तूने मुझसे यह नहीं पूछा था भींडी के बीज कि हम क्या करेंगे बल्कि यह पूछा था कि वह क्या सोच रहा है और मैंने तुझे तेरे उसी सवाल का जवाब दिया हे ।"'

"उसने राजदूत से यह क्यों कहा कि वह हमसे मिलने...

"तेरे दिमाग का क्या बिल्कुल ही दिवाला निकल गया है करेले के छिलके ! उसने दूतावास में जानबूझकर यह मैसेज छोड़ा है ताकि अगर वह 'गायब' हो जाए तो सीधे सीधे हमारे कान उमेठे जाएं ।"

"अब क्या वह वाकइ हमसे मिलेगा? "

"डंके की चोट पर मिलेगा। "

“यह जानते बुझते कि हमने गुलजार नाम कै मानवबम कै जरिए उसका क्रियाकर्म करने की कोशिश की?”

“यह खूबी हे उसकी । पहली बार नहीं होगा ऐसा, वह पहले भी कई बार अपनी हत्या के ख्वाहिशमंदो कै सामने जाकर उन्हें सलाम ठोकने कै करिश्मे दिखा चुका हे ।" नुसरत ने कुछ कहने कै लिए मुंह खोला ही था फि तुगलक कै बाएं हाथ की तर्जनी में मौजूद मोटे नग वाली अंगूठी से 'पिंग पिंग’ की आवाज निकलने लगी । स्वाभाविक रूप से दोनों की नजरें उस पर स्थिर हो गई। फिर, तुगलक बोला -"ले आडू के बीज, आ गया उसका फरमान ।"

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“क्या ज़रूरी है कि वहीँ हो ?"

"अभी सबूत पेश करता हू ।” कहने के साथ तुगलक ने अंगूठी का नग हटाया । ऐसा करते ही पिंग पिंग की आवाज बंद होगई।

तुगलक ने केवल इतना ही कहा…“यस ।"

“नो भी कहोगे तो अब हम इस ट्रांसमीटर से टलने वाले नहीं हैँ तुगलक मियां ।” विजय की आवाज़ मेज पर रखे ट्रांसमीटर से भी निकली ओर अंगूठीरूपी ट्रांसमीटर से भी ।

"ओह ! गुरुओं के गुरुघंटाल.. बोल रहे हैँ !" तुगलक ने अपनी सदाबहार टोन में कहा…"खैरमगदम है आपका ।"

"खैरमगदम तो मियां हमारा ऐसा किया कि किस्मत साथ न देती तो इस वक्त खुदा के रजिस्टर में हाजिरी दर्ज कर रहे होते । "

"हुजूर मतलब क्या हुआ इस तोहमत का ?”

"मतलब ये हुआ कि तुम्हारे प्यादे का कचूमर निकला पड़ा है ।"

"कहां?"

"वहीँ, जहा तुमने उसे मानवबम बनाकर भेजा था ।”

"मानवबम। प्यादा ! कचूमर ! लाहालविलाकूवत । ये आप क्या फरमाए चले जा रहे हैं गुरुदेव ? हमने अपना कौनसा प्यादा मानव बम बनाकर कहां भेज दिया ?"

"गजाला के फ्लैट पर । " तुगलक ने पूरी ढिठाई कै साथ पूछा…"ये कौन हुईं ?' "तुम जानते हो ।"

"इंमान से सरकार, हमेँ नहीं मालूम ये मोहतरमा कौन हे ।”

"करांची में पहले से स्थापित राॅ की एजेंट ।"

"आप इतनी सीक्रेट जानकारी हमें दे रहे हैँ? "

दूसरी तरफ मोजूद बिजय हंसा…“जो जानकारी तुम्हें पहले से हे, उसे बताकर कोई नया नुकसान नहीं होने बाला ।"

"दो मिनट कै अंदरशंदर आपने हम पर ये दूसरी तोहमत लगा दी है हजूर, इसका मतलब तो ये हुआ कि भले ही हम गर्म तवे पर बैठकर यह कहें कि न हमेँ गजाला नाम की किसी राॅ की एजेंट की जानकारी थी. न ही हमने अपने किसी प्यादे को मानवबम बनाकर कहीं भेजा, मगर आप हमारी बात पर यकीन नहीं करेंगे ।"

"करेंगे ….…करेंगे क्यों नहीं? " विजय का लहजा वता रहा था कि अब उसने भी पैंतरा वदल लिया है…“इतने महान मुल्क कै इतने अजीमुश्शान जासूस अगर गर्म तवे पर बैठकर कहेंगे तो यकीन क्यों नहीं करेंगे ! मगर...

"अगर मगर के चक्कर में कहा पड़ गए हुजूरेआला?"

"यह बात तुम्हें सचमुच गर्म तवे पर बैठकर कहनी होगी ।"

“कहेंगें…सोलह आने कहेगे गुरुदेव पर उसके लिए तुम्हें हमारे सामने प्रकट होना पड़ेगा ।”

"उसी के लिए संपर्क किया है ।"'

"तो होइए न !”

"तुम्हारे मुल्क में आए हैं, हमें लेने गाडी भी नहीं भेजोगे क्या? ”

“क्यों नहीं भेजेंगे ! फ़रमाइए तो सही-कहां' भेजें गाडी?"

“वहीं, जहां तुम्हारे प्यादे का मलूदा पड़ा है ।”

“फिर वही तोहमतबाजी ! ये बात ठीक नहीँ है गुरूदेव, आप तो फाऊल पर फाऊल किए चले जा रहे हैं ।"'

"वह कैसे ? "

"आपकी बातों से लग रहा है कि आप पाकिस्तान पहुंच चुके हैं जबकि कम से कम इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि हमारे मुल्क ने आपको बा इज्जत इन्वाइट किया था । यानी हमें मालूम होना चाहिए था कि आप कब किस फ्लाइट से तशरीफ ला रहे हैं । हमारा हक आपको एयरपोर्ट से रिसीव करना था पर लग रहा हे-आपने हमारे इस हक पर डाका डाला है ।”

"बात तो ठीक है तुम्हारी ।”

"यह जुल्म आपने क्यों किया ?”
 
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"सोचा था खुलेआम जाएंगे, यह एलान करके पाकिस्तान पहुंचेंगे कि जावेद कश्मीरी नाम कै मेमने को पकड़ने विजय दी ग्रेट पधार गए हैं हो सकता हे तुम्हारे साथ साथ हमारे इस्तकबाल के लिए जावेद कश्मीरी भी पहुंच जाए और वह हमेँ पाकिस्तान में पहली सांस लेने से पहले ही टिकाने लगा दे । साथ ही यह भी सोचा था कि…हम गुप्त रूप से इस महान मुल्क में पहुंचकर साले जावेद कश्मीरी नाम के मेमने का टेंटवा दबा देंगे । उसे पता भी नहीं लगेगा कि हम कब पाकिस्तान में आए और उसकी गर्दन तक पहुंच गए ।”

“तो आप यह सोचकर गुप्तरूप से पाकिस्तान आए ?”

"कसम से ।"

"फिर क्या हुआ ? "

"क्या हुआ से मतलब ? "

"दबाया मेमने का टेंटवा ? "

"अजी कहा' मियां ! उल्टे हमारी जान को लाले पढ़ गए । "

"बो कैसे ?"

“एयरपोर्ट से गजाला के फ्लैट पर पहुंचकर पहली सांस भी नहीँ ली कि मानवबम ने हमें उडाने की कोशिश की ।"

“और आपने बगेर किसी सबूत कै हम पर इस तोहमत का तीर दाग दिया कि वह हमारे द्वारा भेजा गया था । एक क्षण के लिए भी आपकी खोपडी में ये बात नहीं आइ कि यह अजीमु्श्शान कारनामा जावेद कश्मीरी नाम के बवाल का भी हो सकता है। "

“जावेद कश्मीरी क्या इतना पावरफुल है? "

"पावरफुल नहीं, वह पूरा पावरहाऊस बना हमारे सिरों पर नाच रहा हे गुरूदेव, सोचिए ज़रा'-ऐसा न होता तो क्या हिंदुस्तान से आपकी आयात करने ज़रूरत पड़ती ? ”

"माफ करना तुगलक मियां, हमने तुम पर बगेर सोचे समझें इल्जाम लगा दिए । अब तो हमें भी लग रहा है कि हमारी रामनाम सत्य करने का ये खेल उसी न खेला होगा ।"

“अपनी इस गलती कै तिए आपको हमारे सामने कान पकड़कर माफी मांगनी पडेगी ।”

“उधर तुम गर्म तवे पर बैठकर ये कहोगे कि मानवबम तुम्हारा भेजा हुआ न था, इधर हम कान पकडकर माफी मांगेंगे। "

“पक्का । "'

"तो भेजो गाडी ।”

तुगलक ने सतर्क लहजे में कहा…"पता बताएं तो भेजू न!"

बिजय ने गजाला के फ्लैट का पता बता दिया ।

तुगलक ने अंगूठीरूपी ट्रांसमीटर आफ किया ही था कि मेज पर रखे ट्रांसमीटर से गजाला की आवाज निकली-"ये क्या कर रहे हैं आप ? उनकी मांद में जाएंगे जिन्होंने आपको खत्म करने के लिए मानवबम भेजा? अगर सही वक्त पर. ..

"उन्हें गुलजार के नाकाम होने की जानकारी तो है मगर शायद यह नहीं जानते कि ऐसा हुआ कैसे अर्थात् लूमड़ के वारे में उन्हें कोइ जानकारी नहीं है।”

"ऐसा कैसे लगता है आपको ?"

"तुगलक की बातों से नजर आता हे ।" विजय की आवाज ।

"बातें तो मैं भी सुन रहीँ थी । आप भी जानते हैं कि सफेद झूठ बोल रहा हे वो । " गजाला थोडी उत्तेजित लगी…“इस बात को सिरे से नकार गया कि गुलजार उनका आदमी था । आप आदमी की किसी भी बात पर कैसे यकीन...

"यकीन करना नहीं, दर्शाना पढ़ता हे गजाला डार्लिंग । " विजय ने कहा… "तुम इन बातों क्रो नहीं समझोगी । यह भी अंतर्राष्टीय जासूसी की एक पैंत्तरेबाजी हे ।"

"पर मैं आपकी उनकी मांद में नहीं जाने दूंगी । जिन लोगों ने आपको यहां रहते बम से उड़ाने को कोशिश की वे.. . “

"इन बातों को भी नहीं समझोगी गजाला डार्लिग, जितनी आसानी से वे वाहिद पठान को मार सकते थे, उतनी आसानी से विजय को नहीं मार सकेंगे जो आन रिकार्ड पाक में आ चुका हे और क्या तुम समझी कि हमने तुम्हारा नाम खुल्लमखुल्ला क्यों लिया? "

वह उखडी हुइ सी मालूम पढ़ रही थी…“पता नहीं आप मुझे क्या समझाने की कोशिश कर रहे हैं !"

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बिजय के ऐसे अंदाज मेँ हंसने की आवाज आइ जैसे गजाला को बच्ची समझ रहा हो-"तुम्हारा नाम हमने उनके दिमागों मेँ यह मैसेज डालने के लिए खुल्लमखुल्ला लिया है कि अगर तुम्हें कुछ हुआ तो हम समझ जाएंगे कि उन्होंने किया हे ओर फिलहाल के हालात में वे हमें ऎसा कुछ भी समझाना नहीं चाहेंगे । मतलब ये हुआ कि जब तक हमसे उनका काम नहीं निकल जाता तब तक तुम सुरक्षित हो लेकिन उसके बाद हरगिज नहीं । हम रॉ के चीफ से सिफारिश करेंगे कि तुम्हें हमारे पाकिस्तान में रहते वापस इंडिया बुला ले ।'"

"यानी इंडिया के लिए पाकिस्तान में मेरी सेवाओं का खात्मा ?'

“तुम्हारे खात्मे से तो यही बेहतर हे । तुम एक अच्छी जासूस हो । राॅ की तरफ से किसी अन्य देश में स्थापित हो सकती हो ।"

गजाला इस बार कुछ बोल न सकी थी इसलिए उसकी आवाज़ उस कक्ष तक भी न पहुची जिसमें नुसरत तुगलक थे । नुसरत ने मेज पर रखे ट्रांसमीटर क्रो आफ करने के बाद कहा…“बिजय दी ग्रेट ने कहा, हमें लूमढ़ के बारे मेँ कुछ मालूम नहीं है इससे जाहिर है, वह गजाला के फ्लैट में छुपे उस माइक्रोफोन को नहीं ताड सका हे जिसकी वजह से हमने लाइव टेलिकास्ट सुना ।'"

“अब...ज़बकि वह सबकुछ जानता है और हमसे मिलने आ रहा है तो इस वात का कोई महत्व नहीं बचा है नुसरत बहन कि वह क्या ताढ़ गया है, क्या नहीं । अब तो हमेँ इस बात पर गौर फरमाना चाहिए कि उसका इस्तकबाल किस तरह किया जाए । "

“जाहिर है, उसी तरह जिस तरह पहले ही से सोच रखा था ।'" उसकी आंखों में किसी प्लान कै कीडे गिजबिजा रहे थे…“दुनिया यह देखेगी कि विजय दी ग्रेट अपना मिशन पूरा करके जावेद कश्मीरी को गिरफ्तार करने के बाद हमेँ सौंपकर अपने वतन लौट गए जबकि असल मेँ कुछ और ही हुआ होगा ।”

“पोल तो नहीं खुल जाएगी हमारी ?' तुगलक ने शंका व्यक्त की…“कहीँ ऐसा तो नहीं हो जाएगा कि...

“कुछ नहीं होगा तुगलक मियां, ये प्लान नुसरत दी ग्रेट का है और इसकी तैयारियां आज से नहीं, सालों से चल रही थीं ।'"

"पूरा ठेका खुद मत उठाओ ।'" तुगलक बोला…"प्लान में हमारे भेजे का भी उत्तना ही दख्ल है जितना तुम्हारी खोपडी का ।'"

"तो डर क्यों रहे हो ? "

"डरें हमारे विजय दी ग्रेट जैसे दुश्मन ।”

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लकडी का लटठा नदी से टकराया । झेलम क्योकि वहा ज्यादा गहरी नहीं थी इसलिए पानी को चीरता हुआ लट्ठे का अगला सिरा नदी मेँ पड़े पत्थरों से टकराया था । उस कारण, विकास ओर मोगली के जिस्मों को बहुत तेज़ झटका लगा और साथ ही…दोनों के जिस्म ठंडे पानी में डूबते चले गए ।

मोगली की तो कौन कहे, बिकास जेसे लड़के के हलक से चीख निकल गई थी और फिर, जब उसका जिस्म पानी में डूबा तो पलक झपकते ही सुन्न पड़ता चला गया था ।

दिल जेसे हलक में आकर अटक गया था।

यह लिखा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी कि उस क्षण उन्हें यह पता ही न रहा था कि वे जीवित हैं.. .या मृत ।।

बिकास को नहीं पता कि लट्ठा कितनी देर पानी के अंदर रहने के बाद ऊपर उबरा । पहला एहसास उसे बस यह हुआ था कि अब वह पानी के अंदर नहीं था बल्कि पानी के ऊपर तैर रहा था ।

जिस्म इतना सुन्न जैसे हो ही नहीं ।

काफी देर बाद दिमाग ने काम करना शुरू किया । धीरे धीरे यह बात समझ में आई कि वह मरा नहीं हैं और इसी के साथ जेहन में ख्याल उभरा मोगली का क्या हुआ ?

पानी के बहने का शोर क्योंकि अब कानफाडू शोर में बदल गया था इसलिए वह जितनी जोर से चीख सकता था, चीखा…“तुम ठीक हो न मोगली?"

मोगली क्री तरफ से कोई आवाज़ न आई तो यह सोचकर घबरा गया कि वह कहीं पहले ही झटके में मर तो नहीं गया है !

उसने जल्दी जल्दी कई बार 'मोगली मोगली" कहा और साथ ही हाथों से लटूठे कै उस हिस्से क्रो टटोलने की कोशिश की जहां मोगली को बांधा गया था ।

दायां हाथ रस्सी से बंधे मोगली के जिस्म से टकराया । उसे झंझोढ़ने की कोशिश करते हुए कहा…"'मोगली...मोगली ।'"

मोगली के जिस्म से निकली हल्की सी कराह ने विकास क्रो बताया कि वह जिंदा था।

बिकास ने पहली बार राहत की सांस ली और तब महसूस किया कि वहुत जोर से गर्जना करती झेलम का पानी उन्हें तेजी से बहाए ले जा रहा था ।

हर तरफ अंधेरा था । कुछ भी नजर न आ रहा था । तेज़ बहाव के हवाले हुआ लट्ठा उन्हें लिए बस बहता चला जा रहा था । गोल लट्ठे का वह हिस्सा जहां विकास बंधा था, कभी पानी मे डूब जाता, कभी खुद ही आकाश की तरफ़ घूम जाता । ऐसा ही हाल उस हिस्से का था जिसमें मोगली बंधा था । उनके अपने हाथ में कुछ भी न था । बस वहीँ होता रहा जो ऊपर वाला चाहता था ।

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"विकाश शा...ब. ..गुडूम ।"' बुरी तरह कांपती हुई यह आवाज मोगली की थी लेकिन अंतिम शब्द बता रहे थे कि सेंटेंस पूरा होने से पहले ही उसका मुंह पानी मेँ डूब गया हे ।

कांपती आवाज़ ने विकास क्रो उसकी हालत का एहसास करा दिया मगर इस बात की खुशी थी कि वह बोल सकने की स्थिति में था । उसे प्रोत्साहित करने के लिए बिकास बोला…"तुम ठीक तो हो मोगली?" शब्द पूरे होते होते लटठा थोडा घूम गया था ।

"हमने गलती की । " मोगली के दांत किटकिटा रहे थे-" मैने पहले ही कहा था कि इश तरह पाकिस्तान नहीं पहुचा जा शकता । मुझे नहीँ पता मेरे पाश जिश्म है भी या नहीं । मैँ मरने वाला हू ।”

हालत विकास की भी खस्ता थी लेकिन मोगली का हौंसला बढाने की गर्ज से बोला…“ऐसा न सोचो मोगली, थोडी देर में हमारा जिस्म ठंडे पानी का अभ्यस्त हो जाएगा ।"

"पर तबतक मैं मर चुका होऊंगा ।"

"तुम्हें जावेद से मिलना है न !"

"हां । "

“तो यकीन रखो, तुम्हें कुछ नहीँ होगा। "

इस बार मोगली की तरफ से शब्द नहीँ बल्कि 'गुडुम' की आवाज आई थी । जाहिर था कि लटठे ने घूमकर उसे पानी में डुबो दिया था ।

विकास ने अपने दोनों हाथों को हरकत दी । कोशिश लटठे को घुमाने की थी ताकि मोगली ऊपर आ सके । मगर, उससे पहले ही बहुत तेज झटका लगा और यह झटका लटठे कै किसी विशाल पत्यर से टकराने के कारण लगा था ।

वह स्थिति ठीक वैसी थी जैसे तेजी से दोड़ रही गाडी अचानक किसी अवरोध से टकरा गइ हो लेकिन बहते हुए पानी ने लटठे क्रो घुमाया और पत्थर रूपी अवरोध को पार करके उसने अपना सफर पुन: जारी कर दिया ।

फिर, एक ऐसी जगह आई जब उन्हें लगा कि लटठा पानी पर नहीं तेर रहा है बल्कि हवा में उढ़ रहा हे ।

लटठे कै साथ उनके जिस्म नीचे गिरते जा रहे थे । वे जिस्म जिनमें जेसे अब कोई वजन ही न रह गया हो । वह स्थिति वैसी थी जैसे बिमान में बैठे किसी भी जिस्म की स्थिति विमान कै लैंड करने पर होती है ।

और फिर. . .लटठा 'छपाक' की जोरदार आवाज़ कै साथ पानी से टकराया ।

उनके कुछ भी समझने से पहले न सिर्फ गहरे पानी में डूबता चला गया बल्कि पानी के अंदर ही इस तरह घूम गया जैसे किसी शरारती बच्चे द्वारा तेजी से घुमा दी गइ फिरकनी ।

साथ ही लटठा पानी कै अंदर ही अंदर दूर तक बह गया था । कुछ देर बाद विकास ने महसूस किया कि वह पुन: पानी की सतह पर बहने लगा था । गनीमत थी कि अभी तक उसका दिमाग इतना काम कर रहा था कि वह समझ गया कि…कुंछ देर पहले लटठे ने वह स्थान पार किया है जहां झेलम किसी पहाड से खाइ में गिरी थो ।

ऐसे एक नहीं, अनेक स्थान आए ।

यदि यह कहा जाए तो गलत न होगा कि कुछ देर बाद उनके जिस्म ऐसे झंझावातों को सहने के आदी हो गए ।

हालांकि विकास और मोगली के बीच लगातार बातें नहीं हो पा रहीँ थीं मगर बीच बीच में मोगली की आवाज बिकास को यह राहत जरूर प्रदान कर देती थी कि वह जीवित ही नहीं, होश में भी था ।

यह सफर सारी रात चला ।

फिर, विकास ने महसूस किया कि अब झेलम पहाडी रास्ते पर नहीं बल्कि प्लेन में बह रही थी क्योंकि काफी देर से लट्ठे ने कोइ झरना पार न किया था और न ही अब वह पत्थरों से टकरा रहा था ।

पानी का शोर भी कम हो गया था ।

पर एक चिंता उसके दिमाग पर सवार हो चुकी थी ।

यह कि काफी देर से मोगली की तरफ से कोई हलचल न थी ।

कई बार पुकारने के बावजूद उसके कानों तक मोगली के मुंह से निकली आवाज नहीं पहुंचीं थी । शांत बह रही झेलम में करीब एक घंटे के सफर कै बाद विकास की नजर आकाश पर फटती 'पो' पर पडी ।

पूर्व दिशा का गगन सुर्ख होने लगा था और वहा' हल्की हल्की सी रोशनी फैलने लगी थी ।

हालांकि ऐसा था नहीँ लेकिन उस दृश्य को देखकर बिकास को ऐसी राहत मिली जैसे उसके ठंडे पड़ते जा रहे जिस्म पर तेज धूप ने अपना कब्जा जमा लिया हो ।

जीवन की सबसे खुशनुमा सुबह लगी थी वह उसे ।

एक बार फिर बार बार मोगली क्रो पुकारने लगा मगर उसकी तरफ से चूं चां तक की आवाज न आ रही थी ।

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इस एहसास ने उसे डरा दिया था कि मोगली है भी या नहीं ? धीरे धीरे रोशनी बढती चली गइ ओर फिर सूरज भी नजर आने लगा । साथ ही नजर आने लगा-दूर-दूर तक का स्पष्ट दृश्य । इस वक्त वे घने जंगल कं बीच बह रही झेलम में थे । एक बार फिर मोगली क्रो पुकारते हुए उसने गर्दन घुमाकर उस हिस्से की तरफ देखने की कोशिश की जहां मोगली बंधा था । बस इतना देख सका कि वह स्थान पर था मगर जिस्म में कोई हलचल न थी । लाश को मार्निद लटठे के साथ बंधा था वह। इश विचार ने विकास जेसे लड़कै के दिल को कंपाकर रख दिया कि मोगली की आत्मा ने उसकै जिस्म को त्याग तो नहीं दिया ! शायद अजाने में उसके दोनों हाथ पानी क्रो काटने लगे । वे हाथ जिनसे इस वक्त वह चप्पूओं का काम लेने की कोशिश कर रहा था । उसका प्रयास लटठे को नदी के किनारे की तरफ ले जाने का था । हालांकि अपने इस प्रयास मेँ वह बहुत कम मात्रा में कामयाब हो पा रहा था लेकिन बहरहाल, आधे घंटे की मशक्कत के बाद इतनी कामयाबी जरूर मिली कि वह लटठे को नदी किनारे खडे एक पेड़ के तने में अटकाने में सफल हो गया ।

अब...लटठे के एक तरफ़ पानी बह रहा था दूसरी तरफ़ पानी नहीं बल्कि हल्की सी कीचड थी ।

क्रीचढ़ के बाद सूखी ज़मीन ।

उसने खुद को रस्सी से मुक्त किया और फिर घुटनों तक पानी में खडे होकर लटठे के साथ बंथे मोगली को चैक किया ।

जिस्म में कोई हलचल न थी मगर उसकी चलती हुई सांसों ने विकास को राहत पहुचाइ थी । उसने देखा-मोगली का पेट बुरी तरह फूला हुआ था । बिकास को समझते देर न लगी कि पेट मेँ जरूरत से ज्यादा पानी चला गया है । उसने रस्सी खोली । जिस्म को कंधे पर लादा और सूखी जमीन पर ले जाकर पेट के बल लिटा दिया । अगले पल वह उसकी कमर को दबा-दबाकर पेट में भरा पानी निकाल रहा था ।

करीब पंद्रह मिनट कै प्रयास कें बाद मोगली के मुंह से पानी के साथ कराहने की आवाजें निकलने लगीं ।

बिकास ने राहत की सांस ली लेकिन काम जारी रखा । पंद्रह मिनट बाद मोगली पूरी तरह चैतन्य था मगर उसके जिस्म में उठकर बैठने की ताकत न थी ।

लेटे ही लेटे पुतलियां घुमाकर आसपास के माहौल का निरीक्षण किया और फिर सूनी आंखे बिकास पर स्थिर हो गई ।

सूरज काफी ऊपर पहुंच चुका था । उसकी किरणे' दोनों कै गीले जिस्मों को बहुत राहत प्रदान कर रही थीं ।

मोगली के मुंह से पहले लफ्ज़ ये निकले-“क्या हम जिंदा हैं?”

विकास के होठों पर बरबस ही मुस्कान उभर आइ । उसने उसके गालों क्रो थपथपाते हुए कहा…"तुमने कर दिखाया ।”

"कर तो तुमने दिखाया शाब ।"' वह बोला …"हमेँ तो अब भी यकीन नहीं हो रहा कि य शब हो गया है ।"'

“हो कहां गया है? अभी तो शायद हम अपनी मजिल से काफी दूर हैँ । वो तो तुम्हें बेहोश देखकर मुझे यहां रूकना पड़ा ।”

"ये तो मै भी नहीं पहचान पा रहा कि रशीदनगर यहां से कितना दूर 'हे लेकिन ।”

इन शब्दों कै साथ वह उठकर ब्रेठ गया था ओर ठीक से चारों तरफ देखता वोला-"प्लेन में बहती हुइ झेलम बता रहीँ हे कि ज्यादा दूर नहीं होना चाहिए ।"'

“रशीदनगर ! यानी जावेद का गांव?”

"हां । मेने बताया तो था ! उनका परिवार वहीं रहता है । झेलम वहां शे होकर गुजरती है और वह श्थान इस्लामाबाद शे कुल दश किलोमीटर दूर है और... '"

"और ? '"

"वहां तक झेलम प्लेन शे होकर गुजरती है । पहाडी राश्ते को तो हम पार कर आए हैँ । तभी तो कहा…तुमने कर दिखाया ।”

“पर अब हम वहां पहुंचंगे कसे ? "

"वेशे ही जैशे यहा तक आए हैं । आप मुझे पहले की तरह लटठे कै शाथ बांध दें । जब यहां तक का शफर कर लिया है तो आगे कै शफर की तो बात ही कुछ नहीं । मगर... ।”

कुछ कहता कहता रुक गया मोगली। विकास ने पूछा…“क्या हुआ ?"

"आपको कोन बांधेगा ?”

"लटठे के साथ यात्रा करने के लिए अब मुझे उसके साथ बंधने की ज़रूरत नहीं है । मैं उसे पकडकर भी साथ तैर सकता हूँ।। "

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"अब हमें यकीन हो गया है कि आप दुनिया का हर काम कर शकते हैं ।" मोगली की आंखों में उसके लिए प्रशंसा का भाव था ।

"तो चलें ।”

"चलो । पर मुझे तो आपको लटठे के शाथ बांधना ही होगा ।"

"तुम बंधने के लिए तेयार हो तो मुझे बांधने में क्या दिक्कत हे !" कहने के साथ विकास ने रस्सी उठा ली थी ।

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"अरे। " किनारे पर खड़े एक शख्स ने नदी में वह रहे लटठे पर नजरें टिकाए, अपनी बगल में खडे दूसरे शख्स से कहा…“ज़रा देख तो, मेरी आंखों को कुछ हो गया है या जो में देख रहा हूंवह सच हे ! मुझें लगता हे-उस लटठे कै साथ कोइ बंधा है ।"

"बंधा तो हे ही लेकिन तेरी आंखों ने शायद वह नहीं देखा जो मेरी अखियों ने देखा है ।" उनके साथ खडे तीसरे शख्स ने कहा । चौथे ने पूछा…“क्या देखा हे तूने? "

"एक और था । लड़का सा । उसे मैंने लटठे कै साथ साथ तैेरते देखा था । हमें देखते ही उसने पानी कै अंदर डुबकी लगा ली।"

"यानी वे दो हैं ? एक-लटठे के साथ बंधा हुआ, दूसरा उसके साथ तैर रहा था ?” पहले ने पूछा ।

"ऐसा ही लगता है ।"

"पर माजरा क्या है ?"' दूसरा बोला-"भला लटठे के साथ बंधा हुआ क्यों है वो ? और वो कौन था जिसे तूने डुबकी मारते देखा ? "

"हमारे कश्मीरी साथियों ने तो किसी क्रो लटठे कें साथ...

"अबे पागल हो गया है क्या ? " चौथे ने तीसरे की बात पूरी होने से पहले ही कहा…"लटठे के साथ कश्मीर से बहकर आने पर क्या कोइ जिंदा रह सकता है? देख, वो जिंदा है । हाथ चला रहा है ।"

"हां यार, वो तो वाकइ जिंदा हे ।"

"लटठे को तो निकालो, बातें ही करते रहे तो बहता हुआ आगे निकल जाएगा । लाखों का माल है ।”

चारों एकसाथ नदी में कूद गए और पेशेवर गोताखोरों की तरह तेजी से तैरते हुए उस तरफ बढे जिस तरफ लट्ठा आ रहा था ।

वहाँ झेलम केवल पांच फुट गहरी थी । जल्दी ही उन्होंने लट्ठे का रास्ता रोक लिया जबकि मोगली उन्हें देखकर "बचाओ बचाओ' चिल्लाने लगा था ।

लटठे क्रो उन्होंने बड़े ही पेशेवराना अंदाज़ में कब्जाया ही नहीं बल्कि उसे साथ लेकर किनारे की तरफ तैरने लगे । अपने काम में लगे रहकर उनमें से एक ने मोगली से पूछा…"तूकोन है बे गुटके? ओर तुझे इस लटठे कै साथ किसने बांध दिया ?'

"मुझे नहीँ पता वे कौन थे मगर मुझे मारना चाहते थे ।" बातों के दरम्यान वे लटठे को लगातार किनारे की तरफ धकेल रहे थे । उनमे से एक ने कहा…“पर लटठे के साथ कोई तेर रहा था जिसने हमेँ देखकर पानी में डुबकी लगा दी ।”

"न नहीं तो। "

"झूठ बोलता है साले !" वे चारों अपने काम में एक्सपर्ट थे यानी मुश्किल से दस मिनट में लटठे क्रो किनारे पर लगा दिया । उस किनारे पर जहाँ पहले ही से अनेक लटठे पड़े थे । वे ही लटठे जो कश्मीर से झेलम में डाले गए थे ।

मोगली क्रो समझते देर न लगी कि ये उन्हीं के साथी हैँ । एक ने खोलते हुए कहा -"अब बता, किसने ओर क्यों बांधा तुझे ?"

मोगली ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि उनमें से एक इस तरह चीखा जैसे जिस्म कै किसी हिस्से मेँ गोली लगी । गोली तो नहीं पर उसके माथे पर एक बडा पत्थर जरूर लगा था ।

ठीक गोली की सी रफ्तार के साथ वह पत्थर नदी क्री तरफ से आया था ।

पलक झपकते ही उसके माथे से खून बहने लगा और अपने हाथों से जख्म को पकड़े वहीँ गिरकर डकराने लगा ।

बाकी तीनों ने चौंककर नदी की तरफ देखा ।

यहीँ क्षण था कि उधर से एक और पत्थर सन्नाता हुआ आया ओर एक अन्य के सिर से टकराया ।

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उसके सिर से भी खून बहने लगा और वह भी जहा का तहां गिरकर डकराने लगा ।

"अबे कौन है साला ।" बाकी बचे दो मेँ से एक चीखा ।

दूसरे ने नदी की तरफ दौढ़ लगा दी थी मगर वह वहा' तक पहुंच न सका क्योकि उससे पहले ही एक पत्थर उसके कंघे से टकराया ।

चौथा समझ गया था कि बेवकूफी की तो उसका हश्र भी अपने तीन साथियों जैसा होगा अत: उसने खुद क्रो एक लटठे के पीछे जमीन पर लिटा लिया । सिर उठाकर नदी की तरफ देखने तक का रिस्क नहीं लिया उसने क्योकि समझ चुका था…उसने सिर लटठे से ऊपर उठाया और पत्थर सिर से टकराया ।

इधर, हाथ में पत्यर लिए बिकास नदी से बाहर निकला और तेजी से उस लटठे क्री तरफ बढा जिसके पीछे चोथे ने खुद को छुपा रखा था । बाकी तीनों उसे देख जरूर रहे थे लेकिन उनमें खडे होकर उसका विरोध करने की ताकत न थी ।

लटठे के पीछे लेटे शख्स क्रो कदमों की आहट-सी मिली तो सिर उठाकर देखा ।

उसी समय, बिकास ने अपने हाथ में मौजूद पत्थर खींचकर उसके सिर पर मारा मगर उसने जबरदस्त फुर्ती के साथ सिर वापस खींच लिया था ।

पत्थर रेत पर लुढ़कता हुआ दूर तक चला गया ।

विकास ने एक ही जम्प में उसे दबोच लिया । उसने विकास के चंगुल से निकलने की भरपूर कोशिश की लेकिन नाकाम कोशिश की थी ।

केवल एक मिनट बाद विकास उसकी छाती पर न केवल चढा 'बठा था बल्कि गुर्रा भी रहा था…-""तो तुम ही इंडियन लकडी के चोर। "

“तूकौन है?” वह नीचे दबा होने कै बावजूद गुर्राया ।

“इस लकडी का मालिक जिसे त्तेरे हरामजादे साथी कश्मीर से झेलम में डालते हैं और तूयहां उसे निकाल लेता है ।”

“ल लकडी का मालिक ! मतलब?"

“मैं इंडियन हूहरामजादे ।"

"इंडियन ! यहाँ कैसे पहुच गया ?"

"जिस तरह तेरे साथी लकडी पहुंचाते हैं ।”

“त तुम इस लटठे के साथ इंडिया से बहते हुए आए हो ? नहीँ, ये नहीँ ही सकता । वहां से भला कोई यहां कैसे आ सकता है। "

“हम आ गए हैं कुत्ते, तू अपनी आंखों से देख रहा है ।"

इस बार वह कुछ बोला नहीं मगर आंखों मेँ अविश्वास के कीडे गिज़बिजा रहे थे । बिकास ने पूछा…"क्या नाम है इस जगह का ? "

"म मतलब?" उसकै मुहं से निकला ।

“जहा" इस वक्त हम हे, उस जगह का नाम पूछ रहा हू ।"

"फूलपुर । "

"रशीदनगर कितनी दूर है। "

"अगला गांव रशीदनगर ही हे मगर...

"" बोल । "'

“रशीदनगर कै बारे में क्यों पूछ रहे हो?”

"वहा पहुंचकर तेरे चाचा से मिलना है ।"

"म मगर मेरां तो कोई चाचा रशीदनगर में नहीं रहता ।”

"तेरा नहीं तो मेरा रहता होगा ।” कहने कै साथ बिकास ने उसकी कनपटी पर ऐसी कराट रसीद की जिसने एक चीख के बाद उसे तुरंत बेहोश कर दिया ।

अब विकास के लिए कुछ भी मुश्किल न था ।

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गजाला ने कुछ कहने कै लिए मुहँ खोला ही था कि विजय इस तरह झपटा जेसे सिंह हिरनी पर झपटा हो ।

गजाला मुहं से आवाज निकालने के लिए ही नहीँ बल्कि खुद को उसकी गिरफ्त से निकलने के लिए भी बुरी तरह छटपटाईं थी मगर दोनों में से किसी भी प्रयास में कामयाब न हो सकी क्योंकि विजय का हाथ मुंह पर कूकर का ढक्कन बनकर चिपका हुआ था । बिजय उसे खींचता हुआ बाथरूम की तरफ ले जा रहा था ।

यह बात गजाला की समझ में आने क्रो तैयार न थी कि विजय क्रो अचानक क्या हों गया है? वह उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है?

विजय जल्दी ही उसे घसीटता हुआ बाथरूम में पहुंच गया ओर दरवाजे क्रो आहिस्ता से बंद करने कै बाद मुँह से हाथ हटाता हुआ बोला …"अगर तुमने बुद्धि से काम लिया होता तो हमें तुम्हारे साथ कबड्डी खेलने की ज़रूरत नहीं पढ़ती ।”

"म मतलब?" वह बडी मुश्किल से पूछ सकीं थी ।

"मतलब यह मेरी जान कि फ्लैट कै ड्राइंगरूम में रखे एक गुलदस्ते में एक ऐसा माइक्रोफोन छुपा हे जिसके तार हमारे ख्याल से पाकिस्तानी चलते पुर्जो के कानों से जुडे हें और सौभाग्य या दुर्भाग्य की बात ये है कि हमारा ख्याल गलत नहीं होता ।"

"ए ऐसा उन्होंने कब कर दिया?"

गजाला कै चेहरे पर हवाइयां उडती नजर आ रही थीं ।

"जाहिर हैं कि हमारे यहा पधारने से पहले ही कर चुकें थे ।"

"प पर उन्होंने ऐसा क्यों...

"उतनी वेवकूफी भरी बातें मत करो डार्लिंग जिसके बाद हमें यह कहना पड़े कि तुम जेसी गधी को रॉ में किसने भर्ती कर लिया । जाहिर है वे अपने भेजे हुए मानववम द्वारा हमारे खात्मे का हाल लाइव सुनना चाहते थे मगर. ..

"म मगर?"

"सुना वो.. .जो यहां हुआ । हमारी नज़र भी माइक्रोफोन पर ज़रा देर से पडी । तब, जब लूमढ़ हमें हाजी गल्ला कै हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था कै बारे में बताने की बातें कर रहा था ।"

"तो क्या आपने इसीलिए अलफांसे को...

"तुमन पहली बार वो बात कहीँ है जो राॅ की जासूस को कहनी चाहिए । उस वक्त चलते पुर्जों को यह मैंसिज़ पहुंचाना जरूरी हो गया था कि जावेद कश्मीरी क्रो पकडकर पाक कै हवाले करना हमारी प्राथमिकता में शामिल है । नौशाद अंसारी तक पहुचना तो लुभाव है जिसे हम चलते पुर्जों से भी हासिल कर सकते हें ।"

"लेकिन उसके बाद तो आपने बहुत सी ऐसी बातें कीं जो उन तक नहीं पहुंचाई जानी चाहिए थीं ।"

"गौर करोगी तो ऐसी एक भी बात नहीँ पाओगी डार्लिग, हमने चुन चुनकर वे बातें कहीं जो यह जानने के बाद उन तक पहुँचानी ज़रूरी हो गईं थीं कि सारा किस्सा लाइव टेलिकास्ट होकर उनके कानों तक पहुंच गया है । साथ ही यह भी दर्शाया कि उनके मानव बम को हमने बगेर किसी की मदद के खुद धराशाहीँ किया है। "

"पर वे तो जानते होंगे कि अलफांसे...

"इसीलिए तो !"

"म मतलब। " वह बुरी तरह उलझी नजर आई-“बात मेरी समझ में नहीं आईं । आप कहना क्या चाहते हैं ?'

“जैसा कि हम पहले ही फर्मा चुक हें गजाला डार्लिंग कि वे इस दुनिया के सबसे ज्यादा चलते पुर्जे हें । अगर हम उनसे ट्रांसमीटर पर हुई बातों के दरम्यान झूठे को भी यह कह देते कि इस काम में लुमड़ ने हमारी मदद की थी तो वे फौरन समझ जाते कि हमारी नज़र गुलदस्ते में छुपे माइक्रोफोन पर पड़ चुकी हे जबकि् उन्है यह मैसिज़ गया होगा कि ऐसा नहीं हो सका हे क्यूंकि मैं लूमढ़ के वारे में उनसे छुपाने की कोशिश कर रहा हूँ ।""

गजाला की समझ में बात आईं भी और नहीं भी । कुछ देर चुप रहने के बाद वह बस इतना ही कह सकीं-"अब ?'"

“अब बस ये कि कुछ देर बाद उनके चमचे हमेँ लेने तुम्हारे इस फ्लैट पर पहुंचेंगे । हमें उनके साथ जाना है आंहां. ..हां.. .बीच में मत बोलो, कान लगाकर हमारी बात सुनो ।” उसका मुंह खुलता देख बिजय कहता चला गया…"' तुम्हें घसीटकर बाथरूम के अंदर इसलिए लाना पड़ा क्योंकि तुम्हें यह बताना है कि जेसे ही हम निकलें वैसे ही तुम भी हमेशा के इस फ्लैट को छोड देना । ऐसा न करना तुम्हारे लिए खतरनाक हो सकता है । जैसे भी हो, तुम्हें जल्दी से जल्दी पाकिस्तान छोड़कर इडिमा पहुंच जाना है लकिन सावधान रहना, तुम पर किसी की नज़र न टिकी हो । ऐसा हुआ तो तुम कभी अपन देश नहीं पहुंच सकोगी।”

"चिंता न करें मिस्टर बिजय ।"" गजाला के होठों पर काफी देर बाद मुस्कान थिरकीं-"अगर आप अपने काम में एक्सपर्ट हैं तो बहुत ज्यादा नादान मै भी नहीं हूंलेकिंन...

"कहां अटक गई सुई। ”

"क्या अब भी मेरी वह इच्छा पूरी नहीं करेंगे जो मैंने आपके यहां आते ही प्रकट की थी ।"

"हम तांत्रिक अंगूठी हैं डार्लिग, सबकी सब इच्छाएं पूरी करते हैं । तुम भी बोलो क्या चाहती हो?”

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"इतना सब हो गया लेकिन अभी भी आप वाहिद पठान के ही मेकअप में हैं जबकि मैं आपकी असली सूरत देखना चाहती हूं। "

"अब इसके कोई मायने भी नहीं रह गए हैं डार्लिंग ।'" कहने के साथ उसने अपने चेहरे से फेसमास्क उतार लिया और... गजाला उसे देखती रह गई । वह सोच भी नहीं सकती थी कि जिससे संसार भर के कुख्यात मुजरिम और दुश्मन देश का एक से एक बडा जासूस थर्राता है वह इतना खूबसूरत होगा ।

वह एकटक उसे देखे जा रही थी जबकि…

“अब आओ. . .बाहर निकलकर वो बातें करें जो चलते पुजों तक पहुचानी हैं । " कहने के तुरंत बाद बिजय बाथरूम का दरवाजा खोलकर ड्राइंगरूम मेँ पहुच गया ।

गजाला उसके पीछे थी ।

वे, वे बातें करने लगे जिन्हें नुसरत तुगलक तक पहुचाना चाहते थे । गजाला इस डर से कम बोल रही थी कि कहीं उससे कोई चूक न हो जाए जबकि विजय निरंतर चालूथा ।

करीब एक घंटे बाद कालबेल बजीं ।

दरवाजा विजय ने खोला ।

अपने साथ गजाला को उसने इसलिए रखा ताकि आने वाला वापस जाने पर नुसरत तुुगलक को यह रिपोर्ट दे कि जिस वक्त वह फ्लैट पर पहुंचा उस वक्त गजाला वहीँ थी ।

आने वाले के जिस्म पर सफेद जूते, सफेद पतलून, सुनहरी कढाई वाला सफेद कोट ओर वैसी ही कढाई की सफेद टोपी थी ।

वर्दी बता रही थी कि वह किसी शानदार गाडी का शोफर है । बोला-“मैं मिस्टर बिजय को ले जाने आया हूं ।'"

"ले जाओ ।'" विजय ने तपाक से कहा ।

"क्या आप ही मिस्टर विजय हैं?”

“कोइ शक है" कहने के साथ उसने सीना चौड़ा किया ।

“मुझे जनाब नुसरत तुगलक ने भेजा है ।"

"तुम्हारी शक्ल से नजर आ रहा है ।'"

"आइए ।” कहने के साथ वह वापस जाने के लिए मुढ़ गया ।

"अमां !" विजय चिहुका । लपककर उसने पीछे से शोफर का कालर पकड लिया और बोला…“कहां चल दिए मियां ? हमें लेकर नहीं जाओगे ?'

शोफर बौखला सा गया। बोला…“अ-आने को कहा तो है !"

"कहने से क्या होता है मियां ! ले जाने आए हो तो लेकर ही जाना पडेगा । गोद में उठाकर ले जाओ हमें ।"

"जरूर ।" वह मुस्कराया… "कालर छोडेंगे तो मैं उठाऊंगा ।'"

"ये लो. ..छोढ़ दिया । ”

"ये लो. . .उठा लिया । ” कहने के तुरंत बाद शोफर ने उसे वाकई न सिर्फ इस तरह उठा लिया जैसे वह रुई का पुतला हो बल्कि गोद में लिए लिफ्ट की तरफ बढ गया ।

बिजय को पहली बार एहसास हुआ कि वह सिर्फ शोफर नहीँ बल्कि शौफर की वर्दी में बहुत कुछ था ।

गजाला उसके पीछे पीछे चल रही थी ।

शोफर की गोद में मोजूद बिजय ने कहा…"तुम फ्लेट में बैठकर हमारा इंतजार करो पर्दानशीं, हम जनाबे नुसरत-तुगलक से मुहब्बत की बातें करक वापस आते है।"'

"अ आप.. . ।" गजाला ने कुछ कहना चाहा मगर बिजय ने उसे बोलने का मौका दिए बगैर आंख मारने कै साथ कहा…"ज़ज़बाती होने की जरूरत नहीं है मोहतरमा, वही करो जो कहा है ।'"

गजाला कै पेर जैसे फर्श से चिपक गए ।

उसके देखते ही देखते शोफर विजय को गोद में लिए लिफ्ट मेँ सवार हुआ और फिर लिफ्ट नीचे की तरफ चली गई ।

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न विजय ने शोफ़र की गोद से उतरने की कोशिश की थी, न ही शोफर ने उतारने की । उसे यूंही लिए बिल्डिंग की पार्किग में खडी काले रंग की शानदार लिमोजीन के नजदीक पहुंचा।

रिमोट से उसे अनलाक किया और पिछला दरवाजा खोलकर जब वह विजय क्रो उसकी गद्दी पर डालने लगा तो विजय ने कहा था-""इतनी शानदार गाडी उन उचक्कों की तो हो नहीं सकती । जरूर कहीं से उड़ाइ होगी। मुझे मालूम हे-पूरे करु हैं वो ।"

शोफर कुछ न बोला ।

पिछला गेट बंद करने के बाद वह लंबी गाडी का चक्कर लगाता हुआ ड्राइविंग डोर कै करीब पहुंचा । उसे खोला और इंजन स्टार्ट करने के बाद गाड्री आगे बढाइ ही थी कि बिजय पिछली सीट से लपककर अगली यानी उसके बराबर वाली सीट पर पहुंचता हुआ बोला …“तुमन हमेँ वहां कहां पीछे डाल दिया मिया। "

"मालिक लोग पीछे ही वेठत है सर। ” वह मुस्कराया था ।

"अजी हम मालिक कहां ! मालिक होंगे वे उचक्के...और हमें मालूम है, ऐसे मालिक तो वे भी नहीं हो सकते जिनकै पास ऐसी गाडी और तुम जैसा शोफर हो । जरूर उन्होंने ये गाडी तुम सहित कहीँ से उड़ाइ है । हमें बता दो, हम किसी को नहीं बताऐगें। "

वह वोला…" मुझे पहले ही बता दिया गया था ।"

“क्या बता दिया गया था ?'

“कि आप ऐसी बातें करेंगे ।"

“कैसी बातें ”

“बेसिर पैर की ।""

“क्या.... क्या ” विजय इस तरह चिहुका जैसे उसे की सबसे गंदी गाली दी गई हो-"हमारी बातें बेसिर पैर की होती हैं ! किसने कहा ऐसा ? हमेँ बताओ-हम उसका मुर्गमसलम बनाकर चट कर जाएंगे और तुम मांगागे तो तुम्हें भी थोडा सा चखा देगें ।""

"एक और बात कही गईं थी मुझसे ।”

“उसे भी उगलो।"

“कि मुझे चुप रहना है ।”

“यानी ? "

"आपकी किसी बात का ज़वाब नहीं देना है। ”

"पर हमें मालूम हे कि तुम्हें जिसने भी यह हुक्म दिया है, तुम उसकी हुक्मउद्दूली करोगे ।" विजय कहता चला गया-"बहरहाल चुप वो रहे जिसे खुदा ने जुबान न दी हो । भला किसी बंदे का हुक्म खुदा के हुक्म से बड़ा कैसे हो सकता हे ! हमने गलत कहा क्या ? "'

शोफर कुछ न बोला ।

वह खामाशी के साथ गाडी चलाता रहा । इसमें कोई शक नहीं कि उसका मुहं खुलवाने की विजय की हर कोशिश नाकाम हो गई थी । उसने कई बार महसूस किया कि शोफर की हंसी छूटने वाली हे वह उसे दबा गया ।

बिजय बकवास करता भले ही नजर आ रहा हो मगर वास्तव में उन रास्तों को दिमाग में बिठाने क्री कोशिश का रहा था जिनसे लिमोजीन गुज़र रही थी और अंतत: सरल रेखा की मानिंद एकदम सीधी चली गई सड़क के अंतिम छोर पर एक इमारत नजर आई ।

ऐसी इमारत जो किसी भी व्यक्ति का ध्यान अपनी तरफ खींच सकती थी । बिजय की नजरें भी उस पर स्थिर होकर रह गई । इस हद तक कि जुबान को बिराम लग गया था ।

कुतुवमीनार की नकल जैसी लग रही थी वह इमारत । हजारों हजार गज के भूखंड के बीचोंबीच कंकरीट की एक ऐसी गोल इमारत खडी कर दी गइ थी जेसे उसके ऊपरी सिर क्रो गगन से टच कराने की कोशिश की गई हो । आश्चर्यजनक ऊंचाई के कारण वह दूर ही से नज़र आने लगती थी और...टाप पर, यानी कुतुबमीनार की छत पर एक हेलीकाप्टर भी खड़ा नजर आ रहा था ।

मतलब साफ था कि छत पर छोटा मोटा हलीपेड हे ।

उसकी दीवारों मेँ में अनेक खिडकी दरवाजे थे।

खिढ़कीं दरवाजों पर तनात थे-हथियारबंद गार्ड ।

उनके जिस्मों पर काल रंग की कमांडोज जेसी वर्दी थी ।

सरल रखा की मानिदं सीधी चली गइ सडक कुतुबमीनार जेसी इमारत कै लोहे वाले गेट तक चली गई थी ।

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अगर यह कहा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि यह सड़क उसी इमारत तक पहुंचने के लिए बनाईं गई थी क्योंकि दाएं…बाएं, आगे पीछ कहीँ कोई अन्य इमारत न थी । लोहे वाले गेट पर तैनात कमांडो जैसी वर्दी वाले माइंस ने दूर ही से आती लिमोजीन को देखते हीँ गेट खोलना शुरू कर दिया था । वह इतना भारी था कि हाथों से नहीं बल्कि एक लीवर को दबाने से खुलता था ।

लिमोाजीन के नज़दीक पहुचने तक गेट पूरी तरह खुल चुका था । अब लिमोजीन चारदीवारी के अंदर दूर दूर तक फैल गार्डन क बीच बनी सड़क से गुजर रही थी । उस सडक से जो कमान की तरह घूमती हुईं कुतुबमीनार के पोर्च की तरफ चली गई थी । पोर्च भी गोल और दर्शनीय था परंतु बिजय उसे नहीं देख रहा था । वह देख रहा था…वहां की सुरक्षा व्यवस्था को । कमानीदार सडक के दोनां तरफ ही नहीं, गार्डन में भी जगह जगह गार्ड तैनात थे । सैंकडों की संख्या में थै वे । सभी के हाथों में स्वचालित गनें थीं । उस सबको देखकर विजय का लगा…सुरक्षा कै कुछ खास ही इंतजाम किए गए हे । इमारत के मालिक की इच्छा के बगैर यहां आना ओर अंदर से बाहर निकलना एवरेस्ट की चोटी पर चढने के बराबर कठिन है । शोफर ने गाडी पोर्च के नीचे रोक दी । वहां तैनात गार्डस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया । शोफर ने अपनी साइड का दरवाजा खोला ।

उसके साथ ही, विजय ने भी और वे लगभग साथ ही गाडी से बाहर निकले । गार्डस ने उन्हें इस तरह रास्ता दिया जेसे पहल से जानते हों कि उन्हें कब क्या करना है । बिजय को अपने पीछे आने का इशारा करने के साथ शोफर उन सीढियां की तरफ बढ गया जो कुतुबमीनार जेसी इमारत के मुख्य द्धार तक चली गई थी।

बहुतही भव्य सीढियां थीं वे । करीब बीस । कुछ वैसी ही जेसी स्टेडियम में दर्शकों के लिए होती हैँ ।

जहां लिमोजीन खडी थी, मुख्यद्वार वहां से करीब बारह फुट ऊपर था ।

कुछ देर बाद वे मुख्यद्वार पार कर गए । अनेक गेलरियों से गुजरते हुए एक लिफ्ट में पहुंचे ।

लिफ्ट में उनका सफर ऊपर के लिए नहीं बल्कि नीचे केलिए था ।

विजय को समझते देर न लगी कि कुतूवमीनार जितनी जमीन के ऊपर नजर आती है, उतनी नहीं तो कम से आधी जमीन के अंदर है । विजय ने कह भी दिया…"यह कुतुबमीनार तो इंडिया की कुतूबमीनार से भी ज्यादा हैरतअंगज लग रही है ड्राइवर मियां । वो केवल ज़मीन के ऊपर खडी है लेकिन ये उतनी ही नीच भी नज़र आ रही है जितनी ऊपर हे । लिफ्ट में दाखिल होते वक्त हमने साचा था कि तुम हमेँ आकाश की सेर कराओगे मगर तुम तो पाताल की तरफ लिए जा रहे हो ।"

शोाफर केवल मुस्कराकर रह गया । "तुम तो वाकइ खुदा से ज्यादा बंदे के हुक्म कै पाबंद हो। ”

वह तब भी कुछ न बोला ।

करीब पांच मिनट वाद लिफ्ट रूकी ।

वे बाहर निकले ।

सामने गेलरी थी ।

एकबार फिर वे कईं गेलरियां पार करके एक कमरे में पहुंचे।।

विजय ने नोट किया…बेस्मेंट में गार्डस काफी कम थे । जिस कमरे मेँ ड्राइवर उन्हें ले गया उसे कमरा न कहकर किसी शेख का हरम कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा क्योंकि दीवारों पर नंगी लडकियों की फोटो लगी थीं ।

विजय का माथा ठनका ।

उसके ख्याल से ये 'ठिकाना' नुसरत तुगलक का नहीं हो सकता था क्योंकि लडकियों में उनकी कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही । शोफर एसी के स्वीच की तरफ बढा । उसे आन किया । ओर...पलक झपकते ही बिजय के पैरों कै नीचे से जमीन खिसक गई । उसे कुछ समझने या संभलने का जरा भी मौका न मिला । जेहन और जिस्म, दोनों हवा में परवाज़ कर रहे थे ।

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रशीदपुर एक छोटा सा गांव था ।

करीब पचास मकान रहे होंगे ।

बिकास और मोगली जिस वक्त वहां पहुचे उस वक्त सूरज छोटी छोटी पहाडियों के पीछे छुपने की तैयारी कर रहा था ।

एक अधेड सामने पड़ा ।

वह कंधे पर फावड़ा रखे हुए था ।

शायद अपने खेत से काम करके गांव की तरफ लोट रहा था ।

उन्हें देखकर उसी ने पूछा…"कौन हो बेटे? पहले तो कभी इधर नहीं देखा ! कहां से आए हो?”

“फूलपुर से ।"' मोगली न कहा ।

“ओह ! वो तो बगल मेँ ही है । कैसे आना हुआ?”

विकास बोला …"हमें शोकत अंसारी कै घर जाना है ।"

“श शौकत अंसारी? यह नाम उसके मुंह से इस तरह निकला जैसे अचानक जुबान पर अंगारा आकर टिक गया हो ओर साथ ही, चेहरा इस कदर पीला पड़ता चला गया जेसे किसी अदृश्य शक्ति ने जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया हो और फिर, एकाएक वह पलटा और तज कदमों के साथ विपरीत दिशा में चल दिया ।

विकास और मोगली हैरान रह गए । कुछ देर तो उनमें से किसी की कुछ समझ मेँ ही न आया और जब आया तो…“अरे, क्या हुआ आपको ? मेरी बात तो सुनिए ।" कहता हुआ बिकास उसकी तरफ लपका ।

मोगली भी साथ था ।

जल्दी ही बिकास अधेड कै नजदीक पहुंचा ओर पीछ से कंधे पर हाथ रखा ही था कि वह तेजी से पलटकर बोला…"तुमने झूठ बाला है ।"'

“झूठ !" बिकास सकपकाया"मैंन क्या झूठ बोला ?'

“कि तुम फूलपुर से आए हो ।”

बिकास चुप रह गया ।

“फूलपुर की तो बात ही दूर, यहां से पच्चीस पच्चीस मील तक जितने भी गांव हैं, उनमें से किसी में भी रहने वाला कोई भी शख्स शौकत अंसारी कै घर जाने की बात नहीं कर सकता ।”

“क्यों ? " बिकास ने पूछा ।

“क्योंकि सब जानते हैँ कि शौकत के साथ क्या हुआ ।"'

“क्या हुआ ? "

“मुझे नहीं पता ।"' कहने कै साथ वह पलटा ओर एक बार फिर त्तेज कदमों के साथ विपरीत दिशा में चल दिया ।

इस बार विकास लपककर उससे आगे पहुंचा और एक तरह से उसका रास्ता रोकता हुआ बोला…“मुझे बताइए न, क्या हुआ शौकत अंसारी के साथ ?'

“क्यां मरना चाहते हो लडके ? "

“मरना चाहता हू'! मैं !" विकास बुरी तरह चकराया-"मै क्यों मरना चाहूंगा ? और मुझे कौन, क्यों मारेगा ?'

“वे बहुत ताकतवर हैं ।”

“कौन ? ”

“कहा न, मुझे नहीं पता ।”

“आप जानते हें मगर बता नहीं रहे । शायद किसी से डरे हुए हें । डरिए मत । मैं हू न ! मुझे बताइए कि...

“सामने से हटता है कि नहीं ! "" कहने के साथ उसने गुस्से में न केवल कंघे से फावड़ा उतार लिया बल्कि उसे बिकास पर हमला करने की पाजीशन में ले आया ।

उसके इतने सख्त रुख पर एक बार को तो विकास हैरान ही रह गया मगर फिर संभलकर बोला…"समझने की कोशिश तो......

"अगर तूनहीँ हटा तो मैं तेरे टुकड़े टुकडे कर दूंगा ।” आंखें निकालकर उसने यह बात ऐसे अंदाज मेँ कहीँ थी कि बिकास क्रो लगा-यदि वह नहीं हटा तो वह सचमुच हमला कर देगा ।

उससे उलझन का कोई औचित्य नहीं था अत: विकास ने एक तरफ़ हटकर उसे रास्ता दे दिया । वह उससे आंखें मिलाए बगेर फावड़े को वापस कंधे पर रखकर आगे बढ गया ।

विकास और मोगली उसे जाते देख ही रहे थे कि थोडा आगे जाने के बाद वह खुद ही रूका ओर पलटता हुआ बोला-“मुझे नहीं पता तुम कौन हो । कहां से आए हो और शौकत अंसारी कै बारे मेँ क्यों पूछ रहे हो । इस बात से कोई मतलब भी नहीं है मुझे । बगेर पेसों की बस यह सलाह दे रह हूंकि जान की सलामती चाहते हो तो जहां से आए हो, खामोशी कै साथ वहीँ लौट जाओ और भविष्य में कभी शोकत अंसारी का नाम जुबान पर मत लाना ।"

46

"आप डरे हुए हें लेकिन गांव का हर आदमी डरा हुआ नहीं हो सकता ।" मोगली ने कहा था…"हम किसी ओर से पूछ लेंगे ।"

अधेड के सूखे हाठों पर एसी मुस्कान उभरी थी जसे उसने बहुत ही बचकानी बात सुनी हो ।

बोला…"गांव में ं घुस भी मत जाना । वहां तो क्रोइ शौकत अंसारी के बारे में तुमसे उतनी बात भी नहीं करगा जितनी मेंने कर ली । जान सबको प्यारी हे । और फिर, गांव ही में "उनकें" कई लोग हें । यदि उन्होंने 'उन' तक यह खबर पहुंचा दी कि दो लड़के अंसारी कै बारे में पूछ रहे हें तो तुम्हारी खेर नहीं हे ।"

“आखिर क्या कारण है इसका ?" विकास लगभग चीखा था ।

“जानने की काशिश मत करो ।"

"हम जाने बगैर जाने वाल नहीं हैं ।”

“यानी मरने ही आए हो...तो मरो ।” कहने के बाद वह निर्णायक अंदाज में पलटा और गांव की तरफ चल दिया ।

"एक मिनट...एक मिनट ।" बिकास तेजी से करीब पहुंचा और उसके साथ साथ चलता हुआ बोला -"अच्छा शोकत अंसारी के या "उन" लोगों कै बारे में नहीं बताना चाहते तो मत बताओ मगर ये तो बता सकते हो कि उसका घर गांव में है कहा?"

वह ठिठका ।

बिकास की आंखों में इस तरह झाँका उसने जैसे किसी नादान की आंखों में झांका हो ।

बोला-"तो तुम उसका घर देखना चाहते हो ?”

"देखने से मतलब ?"

उसके सवाल पर ध्यान दिए बगेर अघेढ़ ने कहा…"उसकै लिए तुम्हें गांव के अंदर जाने की जरूरत नहीं है । वैसे भी, बता देता हूं कि गांव के अंदर जाकर शौकत अंसारी कै बारे मेँ बात करना तुम्हार लिए मुनासिंब नहीं हे । ये ।"

उसने एक चकराड तरफ इशारा किया… “इस चकरोड पर चले जाओ । ये तुम्हें गांव के दक्षिणी सिरे पर ले जाएगी । वहां आम के दो बड़े पेड़ मिलेंगे । उनके सामने बस दो ही घर हें । एक नौशाद अंसारी का, दूसरा गिरधर पांडे का ।”

“गिरधर पाडे । ये कौन है ?"

"नहीं जानते ?"

"नहीं । "

"तुम कुछ नहीं जानते और. ..जो जानने की कोशिश कर रहे हो, उसके कारण तुम्हारी जान जा सकती है। ”

"आप बताते क्यों नहीं, आखिर बात क्या है?”

"जितना बता सकता था, बता दिया । इससे आगे एक लफ्ज भी नहीं बता सकता ।" कहने के बाद वह आगे बढ गया और इस बार विकास के कई बार पुकारने के बावजूद न रुका ।

बिकास मोगली की तरफ देखता रह गया, मोगली विकास की तरफ ।

किसी की समझ में कुछ नहीं आया था और समझने कै लिए चकरोड पर बढने के अलावा कोई चारा न था ।

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वह दुमंजिला मकान था । करीब चार सौ गज मेँ बना हुआ मगर जब वना होगा…त्तब बना होगा ।

विकास और मोगली की आंखों कै सामन तो उसके अवशेष ही बाकी थे ।

हालत बता रही थी कि किसी समय वह उसी तरह आग की चपेट में आ गया होगा जैसे होली जला करती है ।

कई दीवारं गिर गई थीं । जो खडी थीं, उनका रंग भी काला पढ़ चुका था । दरवाजों और खिढ़क्रियों के स्थान पर अब बस बड़े बड़े मोखल नजर आ रहे थे । इतना ही नहीं, उसके बगल वाले मकान की हालत भी अच्छी न थी। वह उतनी खस्ता हालत में तो न था लकिन आग की लपटों ने उसे भी नुकसान पहुंचाया था ।

अथेड़ ने ठीक ही कहा था…उस इलाके में उन दो मकानों के अलावा दूर दूर तक कोई तीसरा मकान न था ।

वहा की हालत देखकर बिकास और मोगली कै दिमागों ने कुछ कल्पनाएं की थीं ।

ऐसी कल्पनाएं जिन्होंने उन्हें दहलाकर रख दिया था । उन्हीं कल्पनाआं से घिर उन दानों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर, मोगली बडी मुश्किल से कह सका था…"क्या इशीलिए -अधेढ़ ठीक शे बात नहीं कर रहा था?"

"वह डरा हुआ था । उस वक्त हम ठीक से कुछ समझ न पाए थे ।” विकास बोला…"लेकिन यहां की हालत देखकर लग रहा है कि कुछ बुरा घटा था जो बहुत होलनाक था । जिसकी यादं गांव वालों के दिलो दिमाग में आज भी दहशत बनकर समाई हुइ है। "

"और वे उन लोगों शे खौफ खाए हुए हें जिन्होंने यह शब घटाया या बल्कि अब तो मैँ ये भी कह शकता हूं शाब कि वे वही लोग हें जिन्होंने जावेद के वालिद के इश घर में आग लगाई थी ।"

“वह कह रहा था कि गांव में कुछ लोग 'उनके' साथी हैँ ।"

"क्या हम उनशे मिलें?"

"कोइ और रास्ता नहीं निकला तो उन्हीं से निपटना पडेगा ।" कहने के साथ विकास ने मकान के मुख्यद्वार के अवशेष की तरफ कदम बढा दिए थे ।

मोगली उसके पीछे लपकता हुआ बोला…"क्या आप अंदर जाने के बारे में शोच रहे हे शाब ?”

"हा" ।” वह आगे बढता रहा ।

"उशशे क्या होगा ?"'

“हो सकता है अंदर से कुछ ऐसा मिल जाए जिससे पता लग सकै कि यहां क्या हुआ है और जो हुआ है, वह किसने किया ।"

मोगली उसके करीब आ गया ।

दोनों मुख्यद्वार के अवशेष पर पहुंचे ओर बुरी तरह जल चुके उस उज़ड़े हुए मकान कै अंदरूनी हिस्से क्रो देखने लगे ।

सूरज क्यूंकि अभी पूरी तरह डूबा न था इसलिए वे देख सकते थे कि…उनकै सामने मकान की लाबी हे । ड्राइंगरूम और डायनिंग भी लाबी से अटैचड मालूम पड़ रहे थे क्योंकि एक तरफ सोफे की राख पडी थी दूसरी तरफ डायनिंग टेबल ओर उसकी कुर्सियों के वुरी तरह जल चुके ढांचे ।

कहीं काई आबाज न थी ।

हर तरफ दिल में खौफ बनकर उतर जाने वाला सन्नाटा ।

आग से ध्वस्त और घुवें से काली हो चुकी दीवारों क्रो देखते हुए मोगली ने कहा -"लगता है शाब, यहां जो भी हुआ है, बहुत ही विध्वंशक हुआ है। अब आपको यहां शे क्या मिलेगा ? सबकुछ तो जलकर खाक हो चुका है ।"

'जेड' का आकार बनाती हुई, पहली मजिल की तरफ चली गई, बुरी तरह जली हुई सीढियां क्रो देखते विकास ने कहा-“एक दिन उन्हें मेरे सामने होना होगा जिन्होने यह सब किया हे । ज़रा ठीक से देख तो लूंकि उन्होंने किया क्या हे ताकि उनके किए का पूरा पूरा हिसाब ले सकू ।” भावुक स्वर में कहते हुए उसने लाबी में कदम रखा ही था कि राख के नीचे दबी कोई ऐसी चीज जूते के नीचे आ गई जिसके टूटने से जोरदार आवाज़ पैदा हुई थी और...उस आवाज का पैदा होना था कि अचानक बहुत सारी आवाजें पेदा हो गई ।

वहां छाया मौत का सा सन्नाटा अचानक ही कोलाहल से भर गया और यह कोलाहल था…उजाढ़ मकान में घोंसले बनाकर रह रहे कबूतरों कै पंख फढ़फड़ाकर उडने का और...कबूतर ही क्यों, उढ़ने वालों में चमगादड़ भी थे, उल्लूभी थे ।

जाने कहां से निकलकर 'म्यांऊं' की आबाज के साथ एक काली बिल्ली सीढियों पर दौढ़ती नज़र आइ ।

तात्पर्य यह कि उजाड पड़े मकान क्रो अपनी जागीर समझकर जितने भी जीवों ने अपना बसेरा बना लिया था, उन सबके सन्नाटा युक्त जीवन में विकास कै पेरों के नीचे आई चीज़ ने खलबली मचा दी थी ।

कुछ देर विकास और मोगली अपने स्थान पर खड़े लाबी में तरह तरह के परिंदों को परवाज़ करते देखते रहे ।

फिर आगे बढे ।

वे सीढियां की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक नजर एक ऐसी चीज पर पडी जिसे देखकर बिकास जैसे शख्स की रीढ की हइडी में मौत की सिहरन दोढ़ गईं ।

उस वक्त उसके बाएं हाथ में मोगली क्री कलाई थी । हाथ की पकढ़ सख्त होती चली गईं ।

"क्या हुआ शाब?"

यह सच है कि बिकास जेसे तड़कै के मुंह से कोशिश के बावजूद आबाज न निकल सकी थी ।

बस एक तरफ को इशारा कर सका वह ।

और...उस तरफ देखते ही मोगली के हलक से तो ऐसी चीख निकली जेसे अचानक उसके पेट में किसी ने चाकूघोंप दिया ।

उसकी चीख के कारण लाबी में परवाज़ कर रहे परिंदों में ऐसी खलबली मची

फिर आगे बढे ।

वे सीढियां की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक नजर एक ऐसी चीज पर पडी जिसे देखकर बिकास जैसे शख्स की रीढ की हइडी में मौत की सिहरन दोढ़ गईं ।

उस वक्त उसके बाएं हाथ में मोगली क्री कलाई थी । हाथ की पकढ़ सख्त होती चली गईं ।

"क्या हुआ शाब?"

यह सच है कि बिकास जेसे तड़कै के मुंह से कोशिश के बावजूद आबाज न निकल सकी थी ।

बस एक तरफ को इशारा कर सका वह ।

और...उस तरफ देखते ही मोगली के हलक से तो ऐसी चीख निकली जेसे अचानक उसके पेट में किसी ने चाकूघोंप दिया ।

उसकी चीख के कारण लाबी में परवाज़ कर रहे परिंदों में ऐसी खलबली मची कि उनमें से कई डरकर बाहर चले गए ।

मोगली की आंखों में जितनी गहराई तक देखा जा सकता था, उतनी गहराई तक दहशत ही दहशत नाच रही थी ।

उसका सारा जिस्म इस तरह कांपने लगा था जेसे अचानक जूडी का बुखार चढ़ गया हो ।

अपने दोनों हाथों से उसने बहुत ही कसकर बिकास की कलाइ पकढ़ ली थी और साथ ही बंद कर थीं अपनी आंखे.... जो इस बात का द्योतक थीं कि जो दृश्य उसकी आंखों के सामने था उसे वह देख नहीं पा रहा था ।

"ख खुद को संभालों मोगली ।" विकास मुश्किल से कह सका ।

48

मोगली के मुंह से शब्द फूटे… "क.... कौन है ये ?"

"मुझे क्या पता ? "

मोगली ने हिम्मत जुटाई । धीरे धीरे आंखें खोलीं और पुन: उस वस्तु को देखने लगा जिसे देखना न चाहता था ।

वह वस्तु एक इंसानी कंकाल था ।

वह कंकाल जो एक दीवार से पीठ टिकाए बैठा प्रतीत हो रहा था । उसके दोनों हाथ अपने सिर पर थे ।

सारी ह्रड्रिडयों पर धुर्वे की पर्त जम चुकी थी अर्थात् वहां मौजूद हर वस्तु की तरह वह भी पूरी तरह काला हो चुका था । गनीमत बस यह थी कि हडिडयां एक दूसरे से अलग न हुई थीं ।

"जिस्म से रूह निकलते वक्त यह जिस अवस्था में था, उसी में बैठा रह गया है ।"' शब्द जेसे विकास कै नहीं, किसी और के मुंह से निक्ल रहे थे…"दोनों हाथ सिर पर हैं, मतलब-किसी ने सिर पर वार किया था या खुद क्रो आग से बचाने की कोशिश कर रहा था ।"

मोगली ने कूछ बोलने की कोशिश जरूर की थी मगर मुंह से कोई आवाज़ न निकाल सका जबकि विकास अपने जूतों से राख को रोंदता हुआ कंकाल की त्तरफ बढा ।

डरा सहमा सा मोगली उसकी कलाई जकड़े, उसके साथ था । नजदीक पहुंचकर बिकास गौर से कंकाल को देखने लगा ।

मोगली की कांपती आवाज़-"य ये कौन है शाब ?'"

"तुमने दोबारा ये सवाल किया है मोगली, भला मैं कैसे कुछ बता सकता हू! इस कंकाल को देखकर तो दावे के साथ यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये लेडीज़ का है या जेंटूस का ।"'

"मगर ये तो तय हे शाब कि यहा' जो भी कुछ हुआ है, हमारी उम्मीदों से बहुत ज्यादा हुआ है ।"'

विकास चुप रह गया था।

जैसे बोलने के लिए कुछ हो ही नहीँ और जैसे-जैसे उन्होंने वहां का निरीक्षण किया, उनकी बोलती बंद होती चली गई ।

मोगली की इस बात पर ठप्पा लगता चला गया कि यहां जो भी कुछ हुआ है, हमारी उम्मीदों से बहुत ज्यादा हुआ है क्योंकि…लाबी में ज़गह जगह वहां जले सामान के साथ इंसानी हड्रिडयां पडी हुई थीं । वे हड्रिडयां इस बात की गवाह थीं कि मकान में लगी आग में एक से ज्यादा इंसान जले है ।

उस वक्त विकास उन हहिडयों को देखकर, या यूंकहें कि उन्हें गिनकर यह पता लगाने की नाकाम कोशिश कर रहा था कि जलने वाले कितने इंसान थे कि अचानक सोफे के अवशेष के पीछे कोई ऐसी आहट हुई जिसने दोनों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था । आहट किसी के रेंगने की थी ।

जेसे क्रोइं भारी भरकम जानवर रेंगा हो ।

तो क्या किसी ऐसे जानवर ने भी यहां बसेरा बना लिया है जिसके रेंगने की आवाज इतनी दूर तक आ सकती है !

दोनों थोड़े सावधान हो गए क्योकि जानवर घातक किस्म का भी हो सकता था ।

विकास उस तरफ बढा । मोगली भी साथ था । अभी वे सोफे से काफी इधर ही थे कि उसके पीछे से निक्लकर पूरे मकान में एक दहाड़ गूजी-"मेरे नज़दीक मत आना ।”

इस एहसास ने मोगली और विकास के रोंगटे खड़े कर दिए कि सोफे कै पीछे जानवर नहीं इंसान है ।

इंसान !

और यहां ?

क्या कर रहा है ?

कौन हे???

पलक झपकते ही उनकें दिमागों में सैंकडों सवाल चकरा उठे थे मगर, फिलहाल ज़वाब एक का भी न था । बिकास ने बडी तेजी से खुद क्रो नियंत्रित किया ओर बोला …"कोंन हो तुम ?'

"यहां का मालिक । ये घर मेरा हे । " अजीब सी दीवानगी के आलम में कहा गया था… "मेरे अलावा यहां कोई नहीं आ सकता । निकल जाओ, तुम बाहर निकल जाओ…नहीँ तो मैं तुम्हें मार दूगा ।”

"क्या तुम शौकत अंसारी हो ?" बिकास ने पूछा ।

"ह हां । मैं शोकत अंसारी हूं ।”

अगर यह लिखा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि मोगली और विकास के रोंगटे एकसाथ खडे हो गए ।

तभी, सोफे के पीछे से बही अजीब बात कही गई…" शौकत अंसारी कै मरने के बाद में ही शौकत अंसारी हू ।"

"शौकत अंसारी के मरने कै बाद तुम ही शौकत अंसारी हो ?" विकास उलझ गया…"मतलब क्या हुआ इस अनोखी बात का ? "'

"कुछ भी समझने की कोशिश मत करो । जाओ यहां से ।"

“हम यहां से जाने के लिए नहीं आए हैँ।"'

"मैं तुम्हें मार डालूगा ।"'

विकास बोला-“तुम जो भी हो, सामने आकर बात करो ।"'
 
49

मगर इस बार सोफे कै पीछे से आवाज नहीं बल्कि गोली की सी तेजी से कोई चीज उनकी तरफ आई ।

खतरे क्रो भांपकर विकास ने खुद क्रो नीचे झुका तिया । परिणाम स्वरूप वह चीज उसके ठीक पीछे खड़े मोगली के सिर से टकराई ।

मोगली के हलक से निकली चीख उजाड पडे मकान को झकझोरती चली गईं । पलक झपकते ही उसका हाथ अपने सिर पर पहुंच चुका था । वहा से खून की धारा वह निकली थी ।

उसी क्षण, विकास ने राख पर दूर तक लुढ़कते चले गए एक पत्थर को देखा । यह बात समझ में आते ही उसने तेजी से सोफे की तरफ देखा कि उसके पीछे से उन्हें पत्थर मारा गया है ।

"चले जाओ...चले जाओ यहा से। ” जेसे पागल चिल्लाया हो ।

विकास ने इस बार कुछ कहा नहीँ लेकिन पहले से कई गुना ज्यादा सतर्क जरूर हो गया…क्या पता, सोफे के पीछे से फिर कोई पत्थर मारा जाए। मोागली खून बहाते अपने जखा को पकड़े नीच बैठ गया था जबकि बिकास एक एक कदम नाप-तोलकर रखता हुआ सोफे की तरफ बढा और अभी वह उसके पीछे झांकने की पोजीशन में नहीं आ पाया था कि एक बहुत ही डरावनी चीख के साथ, बहुत ही डरावना आदमी साफ के पीछ से उछलकर खड़ा हो गया।

वह इतना डरावना था कि एक बार को तो बिकास सकपका गया । वह उसके किसी भी हमले का सामना करने के लिए तैयार था मगर उसने हमला नहीं किया बल्कि अपनी गोल गोल आंखें निकालकर और बंदर की तरह दांत किटकिटाते हुए मुंह से वैसी ही आवाज निकालकर उसे डराने की काशिश की ।

धूल से अटे उसके बाल बहुत लंबे थे । उतनी ही लंबी दाढी और मूंछें थीं ।

इतनी ज्यादा कि चेहरा ठीक से नजर न आ रहा था । जिस्म किसी समय गोश्त भरा पूरा रहा हो तो रहा हों, इस वक्त तो वह हड्रिडयों का ढांचा नज़र आ रहा था और उस ढांचे पर पठानी सूट के रूप में जो लिबास था, वह जगह-जगह से फटा हुआ था । धूल इतनी थी लिबास पर कि उसका रंग धूल क पीछ छुपकर रह गया था ।

दांत लंवे थे । पीले ओर मैले ।

साफ नज़र आ रहा था कि वह महीनों से नहीं नहाया है।

"कौन हो तुम ?' विकास ने पूछा ।

"मै तुमसे पूछ रहा हू ।" वह चिल्लाया-“तुम कौन हो?”

“पहले तुम्हें बताना होगा । "

"मुझे तो सब जानते हे । पर ये रशीदपुर नाम का मुकम्मल गांव हीजडों का है । जब बो सब हो रहा था तो कोई इधर नहीं आया । तब आए जब सबकुछ हो चुका । तब भी, अंदर कहा आए वो ! किसी ने मेरे घर में लगी हुई आग को बुझाने की कोशिश कहां की? सब तमाशा देखते रहे । मैं दोढ़ दोड़कर सबसे आग बुझाने के लिए कहता रहा । यह सोचकर कि शायद कोइ बच जाए पर किसी ने कुछ नहीं किया । सब मुझे पागल समझते रहे मगर वो आएगा...वो ज़रूर आएगा । एक एक से, गिन गिनकर बदला लेगा वो । ""

"कौन ?' विकास ने पूछा ।

"जावेद...मेरा बेटा । " पहली रौ में तो वह कह गया मगर अगले ही पल संभलकर बोला…“मगर नहीं, मैं तुम्हें उसके बारे में क्यों बताऊं? तुम ज़रूर उन्हीं के आदमी होगे क्योंकि गांव के हीजडों मेँ से तो किसी की हिम्मत यहां आने की हे नहीं ।"

विकास के दिमाग ने तेजी से काम करना शुरू कर दिया था । उसे लगा…ये आदमी जावेद कश्मीरी के नाम से सेट हो सकता हे इसलिए बोला…"हम जावेद कै दोस्त हैँ ।"

“जावेद के दोस्त ?" गोल आंखें सुकढ़ गई ।

“हां । "'

“उसका तो पाकिस्तान में कोई दोस्त ही नहीं है ।"

“हम हिंदुस्तान से आए हैँ ।"

"हिंदुस्तान से ! " उसकै लहजे से घृणा टपकने लगी थी…“वहीं कौन दोस्त था उसका ! दोस्त होते तो उसे यहा आना ही क्यों पड़ता ! सब दुश्मन ही तो थे । जो जावेद हिंदुस्तान के लिए जान देने को तैयार था वे ही हिंदुस्तानी उसकी जान लेने को तैयार हो गए ! ”

विकास ने तिगढ़म भिड़ाई-"क्या तुमने सब इंस्पेक्टर देबांश और अर्जुन पांडे का नाम नहीं सुना !"

“क-क्या तुम वो हो?” पागल नजर आने वाले शख्स के हलक से खुशी की ज्यादती के कारण किल्ली सी निकल गई थी ।

विकास को लगा कि तीर सहीं निशाने पर जा लगा हे इसलिए दुगने उत्साह कै साथ बोला …"हां, हम वही हे ।”

"तुम्हारी तो बडी तारीफ करता था जावेद । उसने बताया था कि तुम न होते तो वह किसी हालत में पाकिस्तान नहीं आ सकता था । हिंदुस्तान मेँ ही फांसी पर लटका दिया गया होता ।"

50

“तुम तो सबकुछ जानते हो ।"

"पर तुम यहाँ ...पाक्रिस्तान में कैसे आ गए ? "'

“बहुत लंबी कहानी है । सुनाने में वक्त लग जाएगा। संक्षेप मेँ बस इतना समझ लो कि हमारे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था क्योंकि हमारे अफसरों को पता लग गया था कि जावेद को हमीं ने हवालात से भगाया है । इस जुर्म में वे वही सजा हमें देने वाले थे जो जावेद को दी जाने बाली थ्री । मौका देखकर हम वहा से भाग निकले, हिंदुस्तान में अब हमारे लिए कहीँ कोई ठिकाना न था इसलिए यह सोचकर इधर आ गए कि जावेद हमेँ जरूर पनाह देगा ।”

"क्यों नहीं देगा। एक सच्चा मुसलमान अपनी मदद करने वाले क्रो कभी अकेला नहीं छोढ़ सकता मगर...

“मगर ? "

“जावेद यहा नहीं है पर तुम चिंता मत करो । मैं दूं न ! जावेद का चाचा । मैं हर तरह से तुम्हारी मदद करूंगा । "

"तुम जावेद के चाचा हो?”

“तुम्हें शक है ? "

विकास ने एक एक शब्द नापतौल कहना शुरू किया…“जो कुछ जावेद ने हमें बताया था, उसके मुताबिक उसके वालिद के केवल एक भाई थे…नौशाद अंसारी । वे हिंदुस्तान मेँ ही रह गए और आज वहां के ला मिनिस्टर हें ।"

“तो जावेद का चाचा क्या सिर्फ वही हो सकता है जो उसके वालिद का सगा भाइ हो? वो नहीं हो सकता जिसकी गोद में उसका बचपन गुजरा हो ! जिसने उसे सगे चाचा से भी ज्यादा चाहा हो? "

“हो ता सकता हे लेकिन आपने हमें अपने बारे मेँ अभी तक कुछ भी नहीं बताया तो हम कैसे समझ सकते हैं कि...

“मेरा नाम किबला है । मेरे वालिद ने मुझ उस वक्त शौकत और नौशाद अंसारी के वालिद को सोंपा था जिस वक्त मेरी उप्र छ: साल थी । तभी से इस खानदान की खिदमत कर रहा हूँ । शोकत ओर नौशाद अंसारी कै साथ खेलकूदकर बड़ा हुआ । जावेद और सुरैया को तो मेंने अपनी गोद में खिलाया था । फिर, जब शोकत साहब ने पाकिस्तान आने का फैसला किया लेकिन जावेद इसके लिए तैयार न हुआ तो सबकी तरह मुझें भी बहुत दुख हुआ था । अंतत: उसे हिंदुस्तान में ही नौशाद साहब के हवाले करके आना पडा । ”

संयोग से ही सही लेकिन वो आदमी "सेट" हो चुका था जो उन्हें यहा' हुए कांड कै बारे मेँ बता सकता था और उस सबके बारे में जानने के लिए वह वेचैन भी बहुत था मगर किवला की मानसिक अवस्था देखकर उसे तुरंत उस बिषय पर आना मुनासिब न लगा ।

अत: बोला"क्या अब हम दोस्त हैं ?"'

“दोस्त नहीं, तुम मेरे भतीजे हो ओर मै तुम्हारा चाचा । बहर हाल, तुम जावेद के दोस्त हो । मगर अभी तक तुमने यह नहीं बताया कि तुममें से अर्जुन पांडे कौन है और देवांश कौन?”

“ये देबांश है ।" विकास ने अभी तक ज़ख्म पकड़े बैठे मोगली की तरफ इशारा किया-“मैं अर्जुन ।”

“माफ करना देवांश बेटे ।" कहता हुआ वह दौढ़कर मोगली के नजदीक पहुंच गया था-"मै समझा कि या तो तुम गांव के हीज़डों में से कोई हो या "उन्हीं" के आदमी । इसलिए पत्थर मारा । यदि मुझे ज़रा भी इल्म होता कि तुम जावेद कै दोस्त हो तो.....

अपनी बात अधूरी छोडकर उसने अपनी फूटी हुई कमीज से एक बहुत बडा टुकडा फाड़कर अलग कर लिया और उसे उसके जखम पर बांधता हुआ बोला…"मेरे पास क्रोइ दवा नहीं हे ।"

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चौदह फुट ऊपर से गिरने के बावजूद विजय को चोट न लगी थी तो उसका एक ही कारण था-यह कि वह फर्श पर बिछे डनलप के वहुत ही मोटे गद्दे पर गिरा था ।

आधा सेर्किड ज्यों का त्यों पड़ा रहा और उस वक्त उठने की कोशिश कर ही रह था कि कानों मं किसी की आवाज़ पडी…“आप कोन है? ”

विजय इस तरह उछलकर खडा हो गया जेसे जिस्म मेँ रिग्रंग लगे हों । नजर आवाज की दिशा में घुमाई तो चौंक पडा । मुंह से शब्द फिसलते चले गए…"अ-आप ? नौशाद अंसारी साहब !"

“यानी आप मुझे जानते हें !"

“अजी दुनिया में ऐसा कौन है जिसे हम न जानते हों, हम तो पैदा ही लोगों को जानने के लिए हुए हैं मगर सोचने वाली बात ये है कि दुनिया मेँ तहलका मचा हुआ है कि आपको किंडनेप कर लिया गया है ओर आप हें कि यहां आराम फरमा रहे हैँ ।"

चौदह फुट ऊपर से गिरने के बावजूद विजय को चोट न लगी थी तो उसका एक ही कारण था-यह कि वह फर्श पर बिछे डनलप के वहुत ही मोटे गद्दे पर गिरा था ।

आधा सेर्किड ज्यों का त्यों पड़ा रहा और उस वक्त उठने की कोशिश कर ही रह था कि कानों मं किसी की आवाज़ पडी…“आप कोन है? ”

विजय इस तरह उछलकर खडा हो गया जेसे जिस्म मेँ रिग्रंग लगे हों । नजर आवाज की दिशा में घुमाई तो चौंक पडा । मुंह से शब्द फिसलते चले गए…"अ-आप ? नौशाद अंसारी साहब !"

“यानी आप मुझे जानते हें !"

“अजी दुनिया में ऐसा कौन है जिसे हम न जानते हों, हम तो पैदा ही लोगों को जानने के लिए हुए हैं मगर सोचने वाली बात ये है कि दुनिया मेँ तहलका मचा हुआ है कि आपको किंडनेप कर लिया गया है ओर आप हें कि यहां आराम फरमा रहे हैँ ।"

51

“आराम ! इसे आप आराम कह रहे हैं !", वह इस तरह बोला जेसे विजय कै शब्द उसके दिल से जा लगे हों-"'मैं यहां कैद में हू । पता नहीं ये लोग मुझसे क्या चाहते हैं ।"

"कौन लोग ? "

"मुझे नहीं पता । "

"आपको पता क्या है जनाब?"

"बस इतना पता हे कि मैं राजनगर स्थित अपने घर से दिल्ली जाने हेतु एयरपोर्ट के लिए निकला था । मेरे साथ ढेर सारी पुलिस और खुद सुपरिटेंडेंट रघुनाथ था । इसके बावजूद हमारे काफिले पर इतना ज़बरदस्त हमला किया गया कि कोइ कुछ न कर सका । दो गोलियां लगी थीं । मैं बेहाश हो गया । होश आया ता किसी डाक्टर के क्लीनिक में था । बेहोशी की अवस्था में ही मेरी दाईं जांघ और बाएं पैर की पिंडली से गोलियां निकाल दी गइ थीं । दोनों जख्मों पर पटटियां बंधी थी एक बार फिर बेहोश कर दिया गया । उसके बाद जब से होश में आया हूं…यहीं हू । कभीकभी एक डाक्टर आता है और मेरी पटटियां बदलकर तथा कुछ दबाएं देकर चला जाता है ।"

"बिस्तर तो वडा शानदार है मंत्री जी आपका ।"' उसकी दोनों टांगों पर बंधी पटटियों पर नजर डालने के बाद बिजय बीस बाई बीस के कमरे के एक कौने में पडे बेड को देखता हुआ बोला था…"आपको किसी ने बांध बांध भी नहीं रखा है और आप कहते हैँ कि यहां कैद हैँ, बात कुछ जमी नहीं ।"'

"पता नहीं आप किसे कैद कहते हैँ ! " उसने कहा -"देख नहीं रहे ! स्टील की बनी दीवारों का कमरा है ये । कहीं कोई खिडकी या दरवाजा नहीं । आदमी अपनी मर्जी से न कहीँ आ सकता है, न जा सकता हे । और कैद किसे कहते हैं !"

"बात में तो कइ किलो वजन हे आपकी ।"' कहने के साथ विजय ने कमरे का निरीक्षण करना शुरु किया । वाकइ सभी दीवारें, फर्श ओर छत ठोस स्टील की बनी मालूम पड़ रही थीं । वह हवा भी जाने कहां से आ रहीँ थी जिसके कारण वे सांस ले पा रहे थे । ठंडक बता रही थी कि उस कमरे को एसी का सुख प्राप्त है पर एसी कहां हे, नज़र न आ रहा था । विजय ने फर्श पर बिछे गद्दे के ठीक ऊपर उस स्थान को देखा जहां से वह टपका था ।

उस स्थान की पोजीशन ऐसी थी जेसे कभी खुला ही न हो ।

भले ही बिजय बाहर से कुछ भी सोचता नजर न आ रहा हो पर अंदर ही अंदर दिमाग बहुत तेजी से काम कर रहा था ।

अलफांसे की बात पर यकीन किया जाए तो नौशाद अंसारी हाजी गल्ला के हेडक्वार्टर में कैद था ।

मतलब ये हुआ कि उसे भी वहीँ पहुंचा दिया गया है । तभी उसे इस कमर से ऊपर वाला, यानी वह कमरा याद आया जिससे शोफर द्वारा यहा टपकाया गया था । उसकी दीवारों पर लगी नंगी लडकियों की फोटो भी याद आईं । वे फोटा जिन्हें देखकर उसके जेहन में यह बात कौंधी थी कि ये जगह नुसरत तुगलक का ठिकाना नहीं हो सकती ।

कुतुबमीनार जैसी इमारत की सुरक्षा व्यवस्था भी याद आईं और अलफांसे के शब्द भी । हर बात का निचोड़ एक ही था । यह कि-ये जगह हाजी गल्ला का हेडक्वार्टर है ।

अब सवाल ये उठता था कि नुसरत तुगलक ने उसे यहाँ क्यों पहुंचाया ? ये जानते थे कि मैं भारतीय दूत्तावास में अपनी आमद दर्ज करां चुका हू । उनकी जानकारी में लाकर आमद दर्ज कराइ ही इस लिए थी ताकि वे उसे मारने या कैद करने जेसा कदम न उठा सके क्योकि उसके 'गायब' होने का मतलब था…सारे संसार में तहलका मच जाना । पाकिस्तान क्रो इस सवाल का ज़वाब देना भारी पड़ जाएगा कि इंडियन जासूस कहां गया।।

नुसरत तुगलक अपने मुल्क को ऐसी बिकट अवस्था में नहीं र्फसा सकते थे । फिर उन्होंने उसे कैद क्यों किया ? विजय उन्हें चलते पुर्जे सिर्फ कहता ही नहीँ था वल्कि मानता भी था ।

यह सब उन्होंने ज़रूर कुछ सोचकर किया होगा ।

काफी दिमाग के वावजूद वह समझ न सका कि उन्होंने क्या सोचा होगा इसलिए पुन: नौशाद से मुखातिब हुआ…"लगता हे मियां कि हमारी पोजीशन भी तुम्हारी वाली होने बाली है।"

"" मतलब। "

“भविष्य में हमेँ भी दिन रात का पता नहीं लगेगा ।"'

"यानी आपको भी यहां कैद कर लिया गया हे ?'

“लगता तो यही है ।"

"पर आपने अभी तक नहीँ बताया कि आप हैं कौन ?"

"बिजय दी ग्रेट का नाम सुना हे ?'

"विजय दी ग्रेट ? "

"इंडियन सोक्रेट एजेंट ।"

"ह हा ! अआप वो बिजय हैं। " नौशाद हकला गया…"म मैने आपका बहुत नाम सुना हे । आप यहां कैसे ?”

"चौबेजी हें । पाकिस्तान में छब्बेजी बनने आए थे । देख ही रहे हो, दूबेजी बने पड़े हैँ ।"

"प पाकिस्तान में ! क्या हम पाकिस्तान में हैँ ? "

“बगेर किसी शक के ।"'

"म मगर ये कैसे हों गया? मैं यहां कैसे पहुच गया ? "

“बेहोश व्यक्ति को कहीँ भी पहुचाया जा सकता हे ।"

“इसका मतलब मुझे पाकिस्तान ने किडनेप कराया है, क्यों ? मे'ने तो कभी उनके खिलाफ कोई बयान भी नहीँ दिया ।”

"आपके भतीजे ने यहा कोहराम मचा रखा हे ।"'

“भ भतीजा ! मतलब जावेद ?”

“ठीक पहुचे । "

“उससे मेरा क्या मतलब?"

“उसका मतलब तो आपसे हो सकता है !"

"मैं समझा नहीँ ।"

"जो जावेद पाकिस्तान के किसी भी पैतरे से काबूमेँ नहीं आरहा, उसे अब ये आपको मार डालने की धमकी देकर काबू में करने कीं कोशिश करेंगें ।”

"ओह !'" नौशाद अंसारी के मुहं से यह एकमात्र शब्द निकला और फिर, जैसे उसके दिलो दिमाग पर सन्नाटा छा गया । एक लफ्ज़ न निकल सका मुंह से । सोच रहा हो कि-अगर जावेद को उसे मार डालने की धमकी दी गइ तो वह क्या करेगा ?

किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच सका ।

पलटकर बिजय से बोला-"अभी अभी आपने कहा था कि आप मुझे यहा से निकालने आए हैं !"

मैंने यह भी कहा था जनाब कि इस इरादे से आया जरूर था लकिन दूबेजी बनकर रह गया हूं ।"' विजय ने उसे बोलने का मौका दिए बगैर सवाल क्रिया-'"खाना वाना तो देते होंगे ये लोग?"

"एक टाइम नाश्ता, दो टाइम खाना ।"

“कैसे देते हैं ?'

“छत से एक बडी सी स्लैव लिफ्ट के फर्श की तरह नीचे आती है । सबकुछ उसी पर रखा होता है । आप अपने खाने का सामान ले लें, स्लैव वापस चली जातीं है ।"

"देनिक कर्मों से भी फारिग होते होंगे ?"

“जोर जोर से कहना पढ़ता हे कि मुझे टायलेट जाना है, पाटी जाना हे या नहाना है । कुछ देर बाद उधर, जहां मेरा बैड है, की दीवार अपने स्थान से हट जाती है । वहां बाथरूम है ।"

"अमां तो यार पाटी आ रही है मुझे । पेट मेँ बहुत जोर से दर्द हो रहा है । जल्दी से बाथरूम का दरवाजा खोलो वरना यहीँ पैंट और कच्छा उतारकर बेठ जाऊंगा। " अचानक बिजय ने इस तरह जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया कि नौशाद अंसारी बौखला उठा ।

वेड के नज़दीक वाली दीवार तो नहीं सरकी मगर छत में ऐसी हलचल ज़रूर हुई जेसे कोई छोटी मशीन चल रही हो ।

दोनों की नजर ऊपर उठ गई ।

इस कमरे की छत और ऊपर वाले कमरे के फर्श का काफी बड़ा हिस्सा नीचे की तरफ आने लगा । वह हिस्सा करीब छ: बाई छ: का था । ठीक वेसा, जेसा लिफ्ट का फर्श होता है ।

उस पर खड़े हुए दो लोगों की टांगें नजर आई । छत का हिस्सा क्योंकि धीरे धीरे नीचे आ रहा था इसलिए अभी उनके चेहरे नजर नहीं आए थे लकिन बिजय पेर और टांगे देखकर समझ गया था कि आने वाले नुसरत तुगलक हैँ क्योंकि पेरों में कढाइदार जूतियां और टांगों में चूडीदार पेजामे थे ।

नौशाद अंसारी तो खेर खामोश था ही, बिजय भी खामोशी के साथ उस दृश्य को देखता रहा और फिर, हिस्सा इतना नीचे आ गया उन दो लोगां कै चेहरे नजर आने लगे । वेसा होते ही विजय ने नारा सा लगाया था-""आओ.. आओ नुसरत बहन ओर तुगलक भैया ।"'

अभी उनका सफर इस कमरे के फर्श की तरफ जारी ही था किं मुस्कराते हुए इस तरह बिजय क्रो सलाम बजाने लगे जेसे शायर अपने शेर पर दाद देने वालों को बजा रहे हों ।

नौशाद असारी की समझ में यह बात आने क्रो तैयार न थी कि विजय ने उनमें से एक को बहन और दूसरे को भैया क्यों कहा था ।

उसे तो दोनों जेंटस ही नजर आ रहे थे मगर वे थे बड़े अजीब । शायरों जैसे लिबास में, आंखों में काजल और मुंह में पान दबाए । पतले दुबले । मटकते से अंदाज में ।

छ: बाइ छ: के जिस टुकडे पर वे खडे थे उसके चारों कोनों पर लोहे के मजबूत तार बंधे थे बल्कि यह कहा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा कि वह उन्ही तारों पर झूल रहा था ।

वे नीचे पहुचे । स्टील के फर्श पर जूतियां रखीं । दुकड़े ने वापस छत की तरफ सफर शुरू कर दिया था ।

विजय ने कहा…"फ्री का सर्कस दिखाने के लिए शुक्रिया ।"'

"कुबूल ।" नुसरत ने अपने दाएं हाथ की उंगलिया' अपनी दाईं कनपटी से सटाकर सिर नवाया ।

तुगलक बोला-"आप गुरुओं के गुरु...गुरु घंटाल हैँ, इसलिए पूछना पड़ेगा कि अपना नया आशियाना कैसा लगा ?”

"क्या हमेँ भी मंत्री महोदय की तरह कैद किया जा रहा है ?'

"नहीं ।"' तुगलक बोला…"अचार डालेंगे आपका ।"'

“तूचोंच बंद रख बे । '" नुसरत ने इस तरह तुगलक से कहा जैसे डांट रहा हो-"गुरुओँ के गुरु...गुरुघंटाल से हम बात कर रहे हैँ । हां तो गुरुदेव, क्या पूछा था आपने? "

"पूछा नहीं था...धोया था । यह कि...

"क्या आपको भी मंत्री महोदय की तरह कैद किया गया है ! ज़वाब हाजिर हे…बेशक ।"

"मैंने तुमसे बडे गधे पहले कभी नहीं देखे ।”

तुगलक तुरंत बोला…"आइना देख लेते हुजूर ।"'

बिजय ने उसे घूरा ही था कि नुसरत ने डॉटा… "तू फिर बीच में बोला ढेकची के ! कहा न, जब दो घोड़े हिनहिना रहे हों तो गधे क्रो ढेंचू ढेंचूनहीं करनी चाहिए ।”

"माना कि ये गुरुओं के गुरु...गुरुघंटाल हैं मगर इसका मतलब ये नहीं है कि चाहे जिसको ढेचू ढेंचूबता देंगे । तुझे कहा होता तो मैं अपनी जुबान को ज़म्बूरे पकडे बैठा रहता पर मियां, इन्होंने तो दोनों क्रो कह डाला । तब तो मेरा जबाब देना बनता ही था न !"

"अब हमारे बीच ढेंचू ढेंचूनहीँ करेगा तू ।"

"एक शर्त पर ।"'

"उगल । "

“ये मुझसे पंगा नहीं लेंगे ।"

"आप तो महाज्ञानी हैँ गुरुदेव.. .परमज्ञानी हैं । " नुसरत ने बिजय से कहा…“पहले से जानते होंगे कि वुरे लोगों के मुंह नहीँ लगना चाहिए । इसलिए यह अर्ज करना मेरा फर्ज है ...

"अगर मुझे यहां कैद करोगे तो दुनिया को तुम्हारा मुल्क क्या जवाब देगा ?' विजय ने उसका सेंटेंस पूरा होने से पहले कहा-"मैं दूतावास मेँ अपनी आमद दर्ज करा चुका हू ।"

' "हमारे संज्ञान में है हुजूर। "

"फिर भी?”

""जी. ..फिर भी । " नुसरत ने अपने एक एक शब्द पर जोर देकर कहा था…“ओर इस फिर भी का जवाब ये है गुरु महाराज कि जावेद नाम कै चूहे से निपटने के लिए, हमारे रहते, हमारे अहले वतन क्रो हिंदुस्तान से आपको मांगना पड़ा तो हमारी तो गइ न धेला"

"यह बात हमारे दिमाग मेँ आईं थी ।"' बिजय बोला…“अपने बास से कहा भी था कि नुसरत तुगलक क्या तेल लेने चले गए है जो पाकिस्तान क्रो जावेद से निपटने के लिए हमारी ज़रूरत...

"सोचकर और कहकर ही रह गए गुरुघंटाल महोदय, बात की गहराई में जाकर नहीं तैर सके ।” नुसरत भी विजय की बात पूरी होने से पहले ही शुरू ही गया था'-"'तैरे होते तो जरूर समझ जाते कि मामला जावेद का नहीं, कुछ और है ।"'

"क्या है ?" बिजय ने उनका प्लान समझने की मंशा से पूछा ।

"वही, जो होना चाहिए । "

“क्या होना चाहिए ?"

"आपसे हमेशा क लिए निजात ।"'

तुगलक बोला…"मेरी जुबान पर फिर ढेंचू ढेंचू करने के लिए खुजली हो रही हे। नहीं करूंगा तो कसम से. ..मर जाऊंगा । "

“कर ले। ” नुसरत ने कहा।

"हमारी आईंस्कीम हमेशा के लिए सिर्फ इन्हीं से निजात पाने की नहीं है बल्कि मुकम्मल इंडियन सीक्रेट सर्विस से निजात.....

"चुप्प साले ।” नुसरत ने उसे आगे बोलने से रोका-“चुप्प हो जा। इससे आगे बोला तो हमारी पूरी आइसक्रीम समझ जाएंगे ये । ये मत भूल कि गुरुओं के महागुरु.. .गुरु घंटाल हैं ।"'

"अजी घंटा । " तुगलक सीधा बिजय से वोला-"लो कर देता हूबात पूरी । हमारी आइसक्रीम मुकम्मल इडियन सीकेट सर्विस से निजात पाने की है । आया कुछ समधन में ?"

बिजय उसे घूरता रह गया। हकीकत ये हे कि उसे बोलने के लिए कुछ सूझा नहीं था ।

"देखा। देखा तुगलक बहन। ” नुसरत ने तुरंत तुगलक की तरफ पलटते हुए कहा था…“तुम्हारे गुरुओं के गुरु...गुरुघंटाल मेरो तरफ यूं देख हें जसे गूंगी गुढ़ की तरफ देखती है । इससे जाहिर हे कि न इनकी अक्ल में कुछ घुसा हे, न भेजे में ।"'

"क्यों गुरु? " तुगलक ने विजय से पूछा…“क्या वाकइ अब भी आपकी समझ में कुछ नहीं आया ?"
 
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