• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

16

शफ्फाक शाही ने पूछा-“कौन?”

"जावेद कश्मीरी ।" दूसरी तरफ से कहा गया ।

दो अक्षरों का वह छोटा सा नाम शफ्फाक शाही कै दिलो दिमाग पर जैसे रायफल की गोली बनकर लगा था । उसे तभी से जावेद कै फोन का इंतजार था जब से उसका जिगर का टुकडा अगवा हुआ था क्योंकि उससे बात करके कम से कम उसे यह तो पता लग सकता था कि वारिस महफूज भी हे या नहीं।

...... इसके बावजूद अब, फोन आया तो जावेद कश्मीरी का नाम सुनते ही सारे जिस्म में झुरझुरी सी दौढ़ गई ।

बडी मुशिकल से बोला-"तुम्हारी दुश्मनी मुझसे है जावेद, हाथ ही डालना था तो मुझ पर डालते । मेरे मासूम वेटे ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा हैं? उसे छोढ़ दो ।”

जवाब सुलगते लहजे में आया…"मेरे मां…बाप ओर बहन ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा ? उन्हें किस बात की सजा मिली और. ..मैँने ही तेरा क्या बिगाड़ था? मुझे किस बात की सजा दी थी तुमने मुझे ?"

“ग गलती हो गई जावेद ।"'

"तो अब उस गलती की सजा भुगत ।"

"मैं तैयार हू..मैं हर सजा भुगतने के लिए तैयार हूंमगर मेरे बेटे को छोड दे । उसे खरोंच भी नहीँ आनी चाहिए ।"

' बडे ही जहरीले अंदाज में हंसकर कहा गया…"अब तेरी समझ में आ रहा होगा कि जब तुम मुझे हथकडी और बेडियों में जकड़कर मेरे मां बाप के पास ले गए थे तो उनके दिल पर क्या गुजरी होगी !"

"क्या चाहते हो मुझसे ? "

"तुझे वहाँ आना हे जहा' मैँ बुलाऊं ।"'

"ब बताओ कहां आना है, मैं तेयार हूं ।"'

“पहले हिदायत सुन ।"'

"हिदायत ? ”

"अपने अफसरों से मेरे फोन या उस जगह के बारे में कोई बात की जहां मैँ वुलाऊंगा तो वारिस खलास ।”

"न नहीं नहीं । तुम बारिस को हाथ भी नहीं लगाओगे । मैं इस बारे में किसी से कोइ बात नहीं करूंगा । बताओ कहां आना है।"

"फिर फौन करूंगा ।”

शफ्फाक शाही क्रो लगा कि दूसरी तरफ़ से संबंध विच्छेद किया जाने वाला है इसलिए जल्दी से बोला-"व वारिस ठीक तो है । "

"तब तक ठीक ही रहेगा जब तक कोई चालाकी नहीं करोगे। ”

"उ उससे बात करा दो ।"'

"नहीं हो सकती ।"

शफ्फाक ने कुछ कहने के लिए मु'ह खोला ही था कि कनेक्शन कटने की आबाज कान से टकराई।

चेहरे पर मौजूद भय के भावों में निराशा ने रंग भरने शुरु कर दिए । उस वक्त वह रिसीवर क्रेडिल पर वापस रख रहा था जब बगल में खडी बीवी यानि रेहाना ने कहा…“मुझसे बात क्यों नहीं कराई। मैंने कहा था उसका फोन आए तो...

"मौका ही कहां दिया उसने। अपने मतलब की बात कही और फोन काट दिया । वारिस तक से बात नहीं कराईं ।"

' “क्या कह रहा था ?"

“कहीं बुलाना चाहता हे, अभी जगह नहीं बताई ।"'

"कुछ लेकर जाना है ?”

"अभी तो इस बारे में कुछ नहीं कहा ।"'

“हमें भी इसी बात की हैरत है ।"' इन शब्दों के साथ डीआइजी ने शफ्फश्क शाही के बंगले की लाबी में कदम रखा ।

“अ..... आप?" उन्हें देखकर शफ्फाक चौंका था ।

"सुना है जावेद कश्मीरी किसी बेगुनाह को अपना निशाना नहीं बनाता, केवल उन लोगों को मार रहा है जिन्हें दोषी समझता हे, जैसे इकरामुद्दीन, जैसे गुलहसन । इस पैमाने से नापें तो ज़रूर तुमसे भी उसकी कोइ पर्सनल खुदक है।"

"न नहीं सर ।"' उसने घबराकर कहा-""ऐसा नहीं है ।"'

17

"फिर तुम्हें टार्गेट क्यों बना रहा हे वह?”

"म मैं इस बारे मेँ क्या कह सकता हूं?"

"अगर सच बोल रहे हो तो ऐसे मामलों में दूसरा कारण दौलत होती हे । शायद उसने तुम्हारे बेटे क्रो पैसों कै लिए किडनैप किया हो लेकिन अभी तक तो ऐसी भी कोइ बात न की हे । उसने यह सब पेसों के लिए किया होता तो भले ही जगह न बताता मगर फिरौती मांगने वाले आम मुजरिम की तरह यह तो कहता ही कि इतने पैसों का इंतजाम करके रखना ।"

“आपको कैसे मालूम सर कि उसने फोन पर क्या . . .

"तुम्हारा फोन टैप है शफ्फाक ।"'

" ओह ! ”

"सोचा था एक बार फोन करते ही पकडा जाएगा मगर चालाक हे । फर्जी आइडी वाले मोबाइल से फोन किया था उसने ।”

"ल लेकिन ।" रेहाना का चेहरा फक्क पढ़ गया था, वह कहती चली गई-“अगर उसे पता लग गया कि हमारा फोन टैप किया गया था और पुलिस ने सारी बातें सुनी हं तो...

"तो? "

"वह हमारे वारिस को...

"आप फिक्र न करें, उसे वारिस क्रो कोई नुकसान नहीं पहुंचाने दिया जाएगा ।'" डीआइजी ने कहा…"मगर इस डर से उसे चाहे जो करत्ते रहने की छूट भी नहीं दी जा सकती । बल्कि हम तो कहते हैँ उसे गिरफ्तार करने या खत्म कर देने का यह सबसे बेहतरीन मौका है । किसी न किसी मकसद से तो उसने वारिस क्रो किडनैप किया ही हे । अपने उस मकसद क्रो पूरा करने के लिए वह तुम्हें किसी स्थान पर बुलाएगा । " अब वह शफ्फाक से मुखातिब था…""पूरी तैयारियों कै साथ उसे उसी स्थान पर घेर लिया जाए । "

"इससे वारिस को खतरा हो सकता है सर ।" कहते वक्त खौफ की ज्यादती के कारण शफ्फाक के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था ।

डीआइजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा -“यकीन रखो शफ्फाक , तुम्हारे बेटे क्री कीमत पर कुछ नहीं किया जाएगा । पर तुम्हें भी यकीन दिलाना होगा कि उसके ओर अपने बीच होने वाली किसी डील को छुपाओगे नहीं क्योकि ज़रूरी नहीं हे अगली बार वह फोन पर ही बात करे । चालाक है, इसलिए उम्मीद की जाती हे कि जगह कै बारे में वह तुम्हें किसी अन्य माध्यम से बताएगा । किसी ऐसे माध्यम से जिस तक पुलिस अपने प्रयास से न पहुंच सकै । उस अवस्था मेँ तुम हमेँ सबकुछ बताआगे, वेसे भी एसएसपी होने के नाते इतनी हिम्मत तो तुम्हें दिखानी ही होगी ।"

शफ्फष्क शाही खामोश खड़ा रहा ।

"जवाब दो शफ्फाक ।" इस बार डीआईजी ने थ्रोड़े सख्त लहजे में पूछा था…“हिम्मत दिखाओगे या नहीं। "

"ज जी । दिखाऊंगा ।"

"यदि बेटे के मोह में तुम अपना फर्ज भूले यानी जावेद से कोई गुपचुप डील की तो याद रखना, उस अवस्था मेँ किसी भी पुलिसिया कार्यवाही के दरम्यान तुम वारिस को गंवा सकते हो जबकि अगर तुम पल पल की जानकारी देते रहे त्तो हमारा वादा हे- उसे पकडा जा सकै या न पकडा जा सकें, वारिस का बाल बांका न होने दिया जाएगा । उसे महफूज रखना हमारी पहली ड्यूटी होगी। "

शफ्फाक शाही को लगा…डीआइजी साहब ठीक कह रहे हैं ।

¶¶¶¶¶¶¶

¶¶¶¶¶¶¶

¶¶¶¶¶¶¶
 
18

एक दो या चार छ: दिन नहीं बल्कि पूरे हफ्ते भर खामोशी छाई रही ।

जावेद की तरफ से किसी भी माध्यमसे कोई संपर्क न किया गया । जाहिर हे इस बीच शफ्फाक शाही और उससे ज्यादा रेहाना की बेचैनी बढी रही ।

उसने तो खाना पीना ही छोड दिया था । हमेशा बस रोती ही रहती थी । ये शंकाएं उन्हें डसे जा रही थीं कि उनकै जिगर का टुकडा कैसा होगा।

जावेद कश्मीरी ने दोबारा संपर्क क्यों नहीं किया ? वारिस महफूज भी है या नहीं? उनके पास किसी सबाल का जवाब पाने का कोई रास्ता न था । कश्मीरी की तरफ़ से इतनी लंबी खामोशी पुलिस कै लिए भी बेचैनी का सबब बन गई थी । इसबीच डीआइजी साहब से कई बार बात करके अपने अलफाज़ दोहरा चुके थे । यह कि…याद रखना, अगर तुमने कुछ छुपाने की कोशिश की तो वारिस की जान खतरे मेँ पढ़ सकती है । ऐसे हर समय पर शफ्फाक क्रो लगा था कि डीआइजी साहब उस पर शक कर रहे हैं । उन्हें लग रहा है कि उसकै और कश्मीरी के बीच कोइ डील हो चुकी हे ओर उसे वह उनसे छुपा रहा है । हर बार उसने गिड़गिड़ाकर यकीन दिलाया था कि कश्मीरी ने अभी तक किसी भी माध्यम से कोइ संपर्क नहीं किया हे । एक दिन, जब आफिस से बंगले पर पहुंचा रेहाना की शक्ल देखकर चौंका । अन्य दिनों के मुकाबले वह कुछ ज्यादा ही डरी हुइ नजर आइ थी । पूछा…“क्या हुआ? ”

हालाकि लाबी में कोई न था, इसके बावजूद वहा कुछ न कहा बल्कि यह कहकर बेडरूम की तरफ चल दी…"मेरे साथ आइए । "

सस्पेंस में फंसा शफ्फाक शाही उसके पीछ चल दिया ।

बेडरूम में पहुंचकर रेहाना ने दाएं हाथ की मुटठी खोली और उसके सामने करती बोली…“य ये जावेद कश्मीरी का खत ।"

शफ्फाक शाही को आंखों मेँ हैरत कै साए उमढ़ आए ।

मु'ह से लफ्ज़ फिसले… "तुम्हें कहाँ से मिला ?'

"बारिस के वारे में पूछने कलबा वाले पीर के मौलाना के पास गई थी । वहां एक औरत मिली । उसी ने दिया है ।”

“क्या तुम उसे पहचान सकती हो ?'

"बुर्के में थी । बोली अगर शोर मचाने या मुझसे ज्यादा बातें करने की कोशिश की तो तुम्हारे वारिस क्री खैर नहीं है । चुपचाप इसे घर ले जाओ ओर अपने शौहर को दो । कहना-पुलिस को भनक भी लगी तो अपन बेटे का कातिल वह खुद माना जाएगा ।"

इस बीच शफ्फाक शाही कागज की तहें खोल चुका था । अब उसकी आंखें उस पर लिखे हकों क्रो पढ रही थीं । लिखा था-"रात के बारह बजे, बडी मस्जिद के पीछे वाले खंडहरों में । याद रहे, अफसरों को खबर देने का मतलब होगा आखों से अपने बेटे की लाश देखना ।'"

छोटा सा खत पढने के बाद जब शफ्फाक शाही ने आंखे उठाई तो रेहाना को अपनी तरफ देखते पाया । अपनी आंखे तो उस वक्त वह देख नहीँ सकता था लेकिन रिहाना की आंखों में दहशत कै साए जरूर मंडराते नजर आए ।

काफी देर तक दानों के बीच कोई वार्ता न हो सकी । अंतत: शफ्फाक शाही ने पूछा…"ये तुम्ह' कब मिला?”

“करीब तीन बजे ।"

"अब बता रही हो?”

"इसके बारे में तुम्हें फोन न करने के बारे में उसने सख्त हिदायत दी थी । कहा था-तभी बताऊं जब शाम को तुम घर आओ । "

"ओह ! उन्हें खबर लीक होने का डर होगा ।'"

रेहाना चुप रह गई । चुप तो शफ्फाक शाही भी हो गया था ।

उसकी चुप्पी का कारण था…उस एक एक घटना का मस्तिष्क पटल से गुजरना जिसे उसने और उसके साथियों ने अंजाम दिया था ।

उन्हें याद करके वह खुद सिहर गया था और...यह समझने में जरा भी दिक्कत पेश न आइ थी कि जावेद उसे किसी भी हालत में जिंदा नहीं छोड़ेगा। बुला ही इसलिए रहा है । जी चाह रहा था कि न जाए मगर.. .ऐसा नहीं कर सकता था । जावेद ने जाल ही ऐसा बुना था । अपनी जगह भला वह अपने बेटे की बलि कैसे दे सकता था ! कोइ बाप ऎसा नहीँ कर सकता । जावेद इस बात को अच्छी तरह समझता होगा, तभी तो ये चाल चली ओर. ..कैसी विडंबना थी कि रेहाना सहित वह किसी को भी यह नहीं वता सकता था कि खंडडरां में उसे हलाक करने केलिए बुलाया जा रहा है क्योंकि उस हालत मं यह भी बताना जरूरी हो जाता कि जावेद ऐसा क्यों कर रहा हे और… वह सब बताने लायक न था । चुप्पी लंबी हो गइ तो रेहाना ने पूछा…"क्या सोच रहे हो ? ”

""यह...कि ये खबर डीआइजी साहब तक कैसे पहुंचाइ जाए ।'"

“ क्या ? " रेहाना के हलक से चीख निकल गइ थी…"आप ये खबर डीआइजी साहब को पहुचाएंगे ?"

शफ्फाक शाही ने दुढ़तापूवक कहा…“हां ।"

“आप पागल हो गए हें क्या ! क्या कोइ इस तरह भी अपने बेटे की जान को खतरे में डालता होगा? क्या आपको इस बात का जरा भी इल्म नहीं है कि जावेद कश्मीरी को भनक लग गइ तो...

"उतना ही डर दूसरी तरफ से भी हे ।"

19

“मतलब ? ”

“बगैर डीआइजी साहब क्रो इंफार्म करे हमारा काम नहीँ चल सकता । कल जब वे वारिस को हमारे पास वापस देखेंगे तो तुरंत जाएंगे कि मैंने डिपार्टमेंट से छुपकर जावेद से कोई डील की हे । न सिफ नोकरी जाती रहेगी बल्कि मुझ पर कार्यवाही भी हो सकती है। "

" होती रहे कार्यवाई । जाती रहे नौकरी। "

रेहाना पूरो तरह बिफर चुकी थी-"अपने बेटे की कीमत पर हमेँ यह सब नहीं चाहिए । "

"रेहाना, कोशिश करो समझने की । अपने डिपार्टमेंट से छुपाकर कुछ भी करने में खतरा ज्यादा है । अगर मैं वहां अकेले गया तो पता नहीं वह मेरे साथ क्या सलूक करे या पता नहीं बातें क्या रुख ले जाएं । उस अवस्था में मैं कुछ न कर सकूंगा । न अपनी सुरक्षा, न ही अपने बट की हिफाजत । तुम तो जानती ही हो कि जावेद कश्मीरी कितना जालिम है । वह हमारे वारिस को कोइ भी नुकसान पहुंचाने में जरा भी नहीं हिचकगा । इसके उलट-अगर उस इलाके को चारों तरफ से पुलिस ने घेर रखा होगा तो वह चाहकर भी मुझे या वारिस क्रो कोइ नुकसान न पहुंचा सकैगा ।"

"अगर उसे पता लग गया तुमने पुलिस को खबर की है तो वह वहां पहुंचेगा ही नहीं । उलटे, खुदा न करें हमारे वारिस...

“ऐसा कुछ नहीं होगा रेहाना, इतना डरने से काम नहीं होते । मैं ये खबर डीआइजी तक ऐसी तरकीब से पहुचाऊगा कि किसी क्रो भनक तक न लगेगी ओर फिर...

"फिर ? "

“मुझे डीआइजी साहब पर पूरा भरोसा है । उन्होंने कहा हे…जो भी एक्शन लिया जाएगा, वारिस को महफूज करने के बाद लिया जाएगा और ऐसा तो मैं भी चाहूगा रेहाना । एक बार मेरा वारिस रिहा हो जाए उसके बाद ।”

शफ्फाक शाही का चेहरा भभकने लगा था, रेहाना क्रो उसकी आंखों में हिंसक चमक नजर आइ थी दांत भीचकर वह कहता चला गया था…"अपने बेटे कें लिए हरामजादे ने हमें बहुत त्तढ़पाया है । तडपते तड़पते एक हफ्ता हो गया । मौका मिला तो मैं उससे इस तड़प का बदला जरूर लूगा ।"

अपने शौहर की आंखों में नजर आ रही चिंगारियों क्रो देखकर रेहाना के तिरपन कांप गए थे लेकिन अब...उस पर कुछ कहते न बन पड़ा क्योंकि पिछले सात सालों में वह ये जान गई थी कि उसका पति महाजिद्दी हे । वही करता हे जो एक बार ठान लेता है।।

°°°°°°°°

°°°°°°°°

°°°°°°°°
 
19

खंडहर करीब पांच हजार मीटर में फैला हुआ था । देखने मात्र से आभास होता था कि वह किसी किले का खंडहर है । कई मीनारें, बुज आर गुंबद अभी भी सीना ताने खंड़े थे, जेसे कह रहे हौं कि हम कभी नहीं गिरेंगे मगर...उनकी हालत बता रहीँ थी कि किसी तरह एक दिन गिरना तो उन्हें भी पडेगा जिस तरह उनकी संगी साथी दीवारें और छतें गिरकर मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी ।

उन्हें गिरे भी इतना टाइम गुज़र चुका था कि बड़े बड़े पत्थरों के बीच जगह-जगह न केवल जंगली घास उग आई थी बल्कि सूखकर इतनी लंबी हो गइ थी कि कोई उसके बीच छुप सकता था ।

खंडहर की. ..या यूंकहें कि किसी समय के किले की बाउंड्री वाल हालांकि बहुत ऊची थी मगर कई जगह से टूट चुकी थी ।

आज, शाम कै बाद अंधेरा होते ही डीआइजीं के नेतृत्व में खंडहर के चप्पे चपपे पर हथियारबंद पुलिस फोर्स तेनात हो गई थी किन्तु ऐसे अंदाज में कि किसी क्रो किसी भी तरह यह आभास न ही पाए कि जीव कै नाम पर वहा' कोइ चिडिया भी है ।

सबको अगले हुक्म तक इस कदर खामोश रहने के लिए कहा गया था कि उन्हें खुद अपने सांसों तक की आवाज न आनी चाहिए । खंडहर के बाहर तो क्या आसपास भी कोई वाहन पार्क न किया गया था । फोर्स क्रो वहां छोडने के बाद सारे वाहन वापस चले गए ।

खुद डीआइजी एक बड़े पत्थर के पीछे, मलवे पर लेटे थे ।

जावेद के खत के मुताबिक उसने शफ्फाक शाही को रात के बारह बजे बुलाया था । इससे डीआइजी ने अनुमान लगाया था कि जावेद खुद वहां दस से पौने बारह के बीच पहुंचेगा ।

प्लान यह बना था कि जब तक वारिस उसके कब्जे मे रहे तब तक कोई एक्शन न लिया जाए और जब वारिस शफ्फाक शाही के कब्जे में आ जाए तो ऐसा एक्शन लिया जाए कि जावेद भोंचवका रह जाए । समझ ही न पाए कि अचानक क्या हुआ ! जादू कै कौानसे जोर से खंडहर में इतनी फोर्स पेदा हो गई।

20

उसके कुछ भी समझने से पहले या तो गिरफ्तार कर लिया जाए या मार दिया जाए।

मगर, कोई भी प्लान बनाना आसान होता हे-उस पर अमल करना मुश्किल । फोर्स क्योंकि वहा आठ बजे पहुंचकर

अपने-अपने स्थान पर स्थापित हो गई थी और सभी को मुदों की तरह पड़े रहना था इसलिए दस बजाने भारी हो गए ।

दस क्या ...उसकै बाद भी घडी क्री सुइयां आगे बढती रहीँ मगर जावेद का दूर दूर तक पता न था ।

बारह बज गए ।

हालांकि फोर्स और डीआइजी के प््वांइट आफ व्यूसे 'ये बारह' बडी मुश्किल से बजे थे । एक एक सेकंड करके उनकें दिमागों की घडी आगे बढी थी और ज्यों ज्यों टाइम गुजरता जा रहा था, उनके दिलों की धडकनें ही बेक्राबू होती चली गई थीं बल्कि जेहनों में भी तरह तरह कै सवाल सर्प बनकर रेंगने लगे थे ।

सबसे बुरी हालत डीआइजी की थी ।

जब बारह भी बज गए और जावेद नजर न आया तो उन्हें लगा कि अब वह नहीं आएगा । मिशन को गुप्त रखने की भरपूर कोशिश कै बावजूद शायद किसी माध्यम से उसे भनक लग गइ है कि खंडहर में उसके लिए जाल बिछाया गया है ।

प्लानिंग कै मुताबिक ठीक बारह बजे शफ्फाक अपनी गाडी से खंडहर के बाहर पहुचा ओर गाडी क्रो वहीँ पार्क करकै अंदर आ गया ।

सीन ऐसा था जैसे दूर-दूर तक उसके अलावा कोई न हो ।

डीआइजी सहित सभी अपने स्थान पर सांस रोकें पड़े रहे ।

हालांकि अब उम्मीद न बची थी लेकिन फिर भी, खासतोर पर डीआइजी यह दुआ मना रहे थे कि जावेद आ जाए । उनके दिमाग मेँ विचार उठ रहा था…हो सकता हे, जावेद ने शफ्फाक शाही के वहा पहुंचने के बाद पहुचने का प्रोग्राम बनाया हो।

हालांकि शफ्फाक शाही को मालूम था कि खंडहर में चप्पे चप्पे पर फोर्स तेनात हे मगर उसने किसी को भी तलाश करने की कोशिश न की थी और. ..हकीकत है कि उसे कोइ नजर भी न आया था । मन ही मन डीआइजी के नेतृत्व की तारीफ करता वह खंडहर के ठीक बीच में मलबे कै काफी उच्चे टीले पर जा खंडा हुआ ।

हर तरफ गहरा अंधेरा छाया हुआ था मगर फिर भी उसने चारों तरफ देखने का प्रयास किया और फिर, एक ऐसी घटना घटी जिसने अकेले शफ्फाक की ही नहीं बल्कि खंडहर में मोजूद हर शख्स की आंखें अपनी तरफ खींच लीं।

वह घटना थी-एक टार्च का आन होना ।

वह टाच दाई तरफ आन हुइ थी ।

खुद ब खुद सभी निगाहें उस तरफ धूम गई ।

और...यह कहा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि शफ्फाक शाही की आंखें बुरी तरह चुधिया गई थीं।

कारण-शक्तिशाली टार्च की रोशनी सीधी उसकी आंखों में पडी थी । रोशनी से नहा उठा था वह । हाथ आंखों के सामने अड़ा लिया मगर अपनी जगह से हिला तक नहीं ।

डीआइजी का दिल बहुत जोर जोर से उनकी पसलियों पर सिर पटकने लगा था । यह समझने में उन्हें जरा भी देर न लगी थी कि टार्च आन करने वाला जावेद है ।

हां, जेहन में यह सवाल जरूर उभरा कि वह वहां कब और कैसे पहुच गया ? टार्च आन करने से पहले नजर तो कहीं आया न । मगर इतनी राहत भी कम न थी कि वह पहुंचा है। इसका सीधा मतलब था कि उसे उनकी घेरेबंदी के बारे में भनक नहीं ।

होती ...तो यहां आने की बेवकूफी नहीं कर सकता था ।

शक्तिशाली टार्च कै प्रकाश झाग शफ्फाक शाही के जिस्म से हटे और खंडहर की ऊंची नीची जमीन पर थिरकने लगे ।

शफ्फाक शाही क्रो समझते देर न लगी कि टार्च के ज़रिए यह कहा जा रहा है कि उसे क्रिस तरफ बढना है ।

उसकी हालत ऐसो हो गइ जैसे हलाल होने के लिए बकरा खुद कसाई की तरफ बढ रहा हो । क्रोइ नहीं जान सकता था कि इस वक्त वह कितना मजबूर था । काश, उसका बेटा जावेद के कब्जे में न होता ! उसने प्रकाश दायरे का पीछा करना शुरू किया ।

रास्ता दिखाता दायरा उसके आगे आगे चलता रहा ।

अंतत: वह ऐसे कमरे में पहुंच गया जिसकी आधी छत्त जमीन पर गिरकर मलबे का ढेर बन चुकी थी लेकिन आधी ऐसे अंदाज मेँ लटकी हुइ थी जैसे किसी क्षण गिर पडेगी ।

उस कमरे की सभी दीवारें ज्यों की त्यों खंडी थीं ।

आमने सामने की दीवारों में दो दरवाजे थे, किसी में भी किवाड़ होने का कोई सवाल ही न था ।
 
21

प्रकाश दायरे का पीछा करता शफ्फाक जिस दरवाजे से कमरे मेँ आया था, दूसरा दरवाजा उसके सामने था ओर उसी के करीब आन टार्च हाथ में लिए खडे एक शख्स क्रो इस वक्त वह साए कं रूप में देख सकता था । टार्च के पीछे से आबाज उभरी-"मेरे ख्याल से तुम सबसे पहले अपने बेटे को देखना चाहोगे? "

कोशिश के बावजूद शफ्फाक के मुंह से आवाज न निकल सकी ।

शक्तिशाली टार्च का प्रकाश दायरा कमरे के दाएं कौने की तरफ बढा और फिर जहां स्थिर हुआ वहां मलबे के ढेर पर चित्त अवस्था में वारिस पड़ा नजर आया ।

“वारिस ।" इस शब्द के साथ शफ्फाक शाही ने उस तरफ बढने की कोशिश की ही थी कि कर्कश अंदाज में कहा गया'-" नो । "

शफ्फाक शाही जहाँ का तहां जाम हो गया ।

“घबराने की जरूरत नहीं 'हे ।'" कहा गया-"सिर्फ बेहोश है ।""

“क क्या चाहते हो ?' शफ्फाक की आवाज़ कांप रही थी ।

“क्या तुम वाकई इतने बेवकूफ हो ? "

“म मतलब?"

“कि नहीं जानते कि तुम्हें यहां क्यों बुलाया गया है ?'

उसके मुंह से निकला"ज-जानता हूं ।"

“बोलो. . .अपने मुह से बोलो-क्या जानते हो ?"

“तुम्हें मेरी जान चाहिए ।"

बड़े ही खूंखार लहजे में पूछा गया-“क्यों ?"

"तुम मुझसे खेल क्यों रहे हो जावेद ?"

“क्या तुम नहीं खेले थे मुझसे ?”

"देर मत करो। ” खौफ की ज्यादती के कारण शफ्फाक शाही चिल्ला उठा था…'" गोलियों से छलनी कर दो मेरा सीना मगर मेरे बेटे क्रो हाथ न लगाना । खरोंच भी न आए उसे ।"

"तूमरते दम तक भी जावेद की फितरत को नहीं समझ सका शफ्फाक शाही, समझ गया होता तो किसी हालत में यहां न आता क्योकि जान गया होता कि जावेद कश्मीरी में वारिस खान जेसे मासूम की जान लेने का कलेजा नहीं है और तेरे जैसे राक्षस क्रो किसी हालत में जिंदा नहीं छोढ़ सकता ।"" सुलगते लहजे में इतना कहने के बाद जावेद के हाथ में दबे रिवॉल्वर ने आग उगलनी शुरु कर दी थी । वह आग, जो शफ्फाक कै जिस्म में भरती चली गई ।

जहां का तहां ढेर हो गया वह ।

°°°°°°°°°°°°°

°°°°°°°°°°°°°

°°°°°°°°°°°°°
 
21

"व. . .वो रहा ।"

“कहां ? "

"उधर, सूखी झाडियों में । वह भाग रहा हे…पकडो ।""

भारी बूटों की आवाज झाडियों की तरफ लपकी ।

"टार्च आन करो । उसे घेर लो । भागने न पाए ।”

एक साथ कई टार्चे आंन हुई ।

प्रकाश दायरे दानाक से सूखी झाडियों पर झपटे ।

सिफ एक क्षण कै लिए लंबी काली छाया रोशनी में नहाई, किंतु अगले पल…धांय...धांय...धांय ! झाडियो की तरफ से लगातार एक रिवाल्वर गर्जा ।

एक ही पल में झनझनाकर सभी आन टाचों के शीशे बिखर गए । पहले से भी घना अंधेरा ।

डी आईजी चिल्लाए"झाडियों में फायर करो ।"

धाय. . .धाय. . . .धांय !

22

घुप्प. . . घुम्म !

एक साथ अनेक गनें गजीं ।

फिर शांत भी हो गई ।

सूखी झाडियाँ बुरी तरह जख्मी हो गई थीं मगर उस तरफ से किसी को भी कोई इंसानी चीख सुनाई न दी ।

सभी ने अपनी अपनी पोजीशन ले रखी थी । ज्यादातर सिपाही पेट के बल मलबे से चिपके हुए थे ।

डीआइजी भी उन्हीं में थे ।

उनकी आंखें उस दिशा में मौजूद अभेद्य अंधेरे को वेंघने का प्रयास कर रही थीं जिस दिशा में सूखी झाडियाँ थीं ।

सभी सांस रोके पड़े थे । गहन सन्नाटा-ऐसा, मानो खंडहर में चिडिया का एक बच्चा भी न हो । वातावरण में धीरे धीरे बहने वाली हवा सरसरा रही थी।

सितारों से ढका आसमान भी मानो झुककर उत्सुकतापूर्वक सूखी झाडियों में झांक रहा था ।

सन्नाटा काफी देर तक रहा ।

इस बीच क्रोहनियों और घुटनों कें बल रेंगते हुए डीआइजी खंडहर में खड़े शीशम के एक पेड़ के समीप पहुंच गए।

फिर, फुर्ती से उठे ओर पेढ़ की जड़ के पीछे छुप गए ।

हाथ में दवा पिस्तौल झाडियों की तरफ तान दिया उन्होंने और गुर्राए-“हम जानते हैं कि तुम झाडियों कै पीछे छुपे हो । आज तुम हमारे घेरे से बचकर नहीं निकल सकोगे जावेद । बेहतर यही होगा कि दोनों हाथ ऊपर उठाकर बाहर निक्ल आओ…वरना हम यहां से तुम्हारी लाश ही लेकर जाएंगे ।"

झाडियों की तरफ छाया सन्नाटा न टूटा ।।

हवा सरसराती रहीँ ।

डीआइजी ने बार बार चेतावनी दी ।

जब इस पर भी कोई हलचल नज़र न आई तो गुस्से मेँ थरथराते हुए फायरिंग का आदेश दिया ।

वातावरण में जब एक बार "धांय धांय' की आवाजें गूंजी' तो फिर गूंजती ही चली गई ।

परंतु झाडियों की तरफ से इंसानी चीख न उभरी ।

फायरिंग बंद ।

पुन: गहन सन्नाटा ।

हवा पर बारूद की दुर्गध सवार हो गई थी ।

करीब आधे मिनट बाद दाई बाउंड्री वाल की तरफ से किसी पुलिसिए की आवाज उभरी-“अरे ये तो इधर है स...

धाय !

बाकी अलफाज़ चीख में बदल गए ।

डीआइजी ने तेजी से पलटकर उधर देखा ।

खंडहर की बाउंड्री वाल के ऊपर हवा में कलाबाजियां खाता एक इंसानी जिस्म नजर आया ।

पलक झपकने से भी पहले, ठीक इसी क्षण डीआइजी के हाथ में दबे पिस्तील ने छींका ।

बाउंड्री वाल के ऊपर से जम्प लेने के बाद एक इंसानी चीख चारों दिशाओं में गूँजती चली गई ।

निःसंदेह यह जोरदार चीख जावेद के मुंह से निकली थी मगर हवा में कलाबाजियां खाता हुआ वह बाउंड्री वाल के दूसरी तरफ जा गिरा था ।

डीआइजी साहब ऊंचे स्वर में चीख पड़े-“उसे मेरी गोली लग गई है, जख्मी हालत में वह भाग नहीं सकेगा । दूसरी तरफ से जाकर पकड़ने की कोशिश करो इंस्पेक्टर हमीद ।"

हमीद और ढेर सारे सिपाही उस तरफ लपके जहां बाउंड्री बाल का काफी बडा हिस्सा टूटा पड़ा था ।

अत्यंत उत्साहित डीआइजी साहब ठीक उस तरफ दौडे जिधर से उन्होंने छाया को बाउंड्री वाल के दूसरी तरफ छलांग लगाते देखा था ।

उन्होंने भी जम्प लगा दी ।

हवा में लहराए र्कितु बाउंड्री वाल से ऊची जम्प न लगा सकें ।

दीवार से टकराकर वापस मलवे पर आ गिरे ।

बाउंड्री वाल सचमुच इतनी ऊंची थी कि जम्प मारकर उसे कोई साधारण आदमी पार नहीं कर सकता था ।

°°°°°°°°°°°°°°°

°°°°°°°°°°°°°°°
 
23

गोली दाएं बाजूमेँ लगी थी ।

ज़ख्म से बराबर रब्रून बह रहा था किन्तु बाएं हाथ से ज़ख्म को दबाए वह लगातार भागता रहा ।

सारा हाथ खून से लथपथ हो चुका था ।

वह संकरी गलियों से दौड़ रहा था । वो मुख्य सडकों पर तो थोडी देर के लिए सिर्फ तब आता था, जब गलियों के एक जाल से निकलकर दूसरे जाल में दाखिल होता ।

करीब तीस मिनट बाद ।

वह संकरी गली में स्थित एक ऐसे मकान के बाहर ठिठका, जिसका मेनगेट और सीढियां अंधेरे में डूबे हुए थे।

अंधेरे में ही सीढियां चढकर मेनगेट पर पहुचा ।

भारी भरकम गेट बंद था ।

थोडी देर तक गेट पर पीठ टिकाए हांफता रहा ।

उखडी सांसों को नियंत्रित करके चौखट कै एक तरफ़ लगे कालबेल कै स्वीच को टटोला ।

मकान कें अंदर कहीँ कालबेल की आवाज गूंजी ।।

कुछ देर बाद दरवाजे कै दूसरी तरफ हलचल महसूस दी । फिर, अंदर से किसी स्विच कै आन होने की आवाज आई ।

बंद दरवाजे की दरारों से रोशनी ने बाहर झांका ।।

डंडाले कं खुलने को आवाज़ आई और हल्की स्री चरमराहट कै साथ भारी दरवाजा खुला ।

आरती नज़र आई ।

उसके ज़ख्म को देखते ही वह चौंक उठी… “हैं।। गोली खाकर आया है ! मैंने साथ चलने के लिए कहा था । कहा था कि एक से भले दो । मगर तूनहीँ माना । तुड़वा लिया न बाजू!”

जावेद चुप रहा ।

आरती ने दरवाजा बंद किया । हंडाला खींचा । गेलरी में एक छोटे से बल्ब का प्रकाश था ।

जावेद तेजी से आगे बढा ।

आरती पीछे लपकती बोली…“अरे...रे...ठहर तो...

वह ठिठका, घूमकर बोला…"क्या है ?”

"ठोकर खाकर मरेगा क्या ? " वह तेजी से उसके करीब आई ।

आरती की बात पर ध्यान न दिया उसने।

पूछा… “चाचा सो गए? "

"नहीं । "

उसने ठिठककर पूछा… "क्यों ?"'

"यह उन्हीं से पूछियो ।” आरती लगातार आगें बढती हुई बोली थी…“अपने कमरे मेँ खाट पर बैठे हैं वो । हाँ, मैँ जरूर सो गई थी । कालबेल की आवाज सुनकर पापा ने ही जगाया । कहने लगे कि मैं देखूं-शायद वह नालायक आ गया हे ।"

“क वया कहा ! नालायक? ”

'मैँने नहीं…पापा ने । '"

मकान की दूसरी मंजिल पर पहुंचने के लिए आरती के पीछे सीढियां चढता हुआ वह बोला… “यह तो हो सकता है कि चाचा जाग रहे हों लेकिन यह नहीँ हो सकता कि तूसो गई हो ।”

“क्यों नहीं हो सकता ?'

"बस...नहीं हो सकता?"

"तेरे जैसे पागल कभी ठीक बात सोच ही नहीँ सकते ।”

वह कुछ बोला नहीँ ।

घुमावदार सीढियां चढकर वे पहली मंजिल पर पहुंचे ।

24

एक कमरे में दाखिल हुए ।

वहां भरपूर रोशनी थी ।

चारपाई पर बैठा गिरधर व्हिस्की पी रहा था । जावेद क्रो देखते ही उसके मुंह से चौंका हुआ स्वर निकला… "अरे। तेरे कंघे से इतना खून क्यों बह रहा हे ? गोली लगी है क्या !"

"पूरी फोर्स के साथ आया था साला ।” जावेद दर्द पीता बोला ।

आरती का सवाल-"शफ्फाक शाही 'है' या 'था' हो गया ?”

"नाकाम लोटा हूमैं कभी? "

"गुड । मेंने तो पहले ही कहा था. . . । ” कहते-कहते गिरधर ने देखा कि जावेद की आंखें बंद हुई जा रही र्थी । खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था । गिरधर चारपाइ से उठकर विद्युत वेग से उसकी तरफ बढा । उसे सहारा देते वक्त गिरधर की आंखें भर आइ थीं ।

“ चाचा । ”

“हां । "

“आप रो रहे हैं ? ”

"न नहीं रे ! " गिरधर ने आंसूपोंछे-“तेरे जैसे सपूत का चाचा भला रोया करता है। ये तो खुशी कै आंसूहैँ पाजी। खुशी के। "

,

"ऐसी कौनसी खुशी मिल गई तुम्हें ? "

“इससे ज्यादा खुशी की और क्या बात होगी कि आज़ तूने तीसरे दरिंदे क्रो भी मार डाला । बहुत जुल्म किए थे कमबख्तोंने। "

"आप सोए क्यों नहीं। ” जावेद ने टापिक चेंज करने की गर्ज से कहा-“मैं सोने के लिए कहकर गया था ।"

"हां, कहकर तो गया था, लकिन नींद ही न आए तो क्या करूं ! चाचा को पता हो कि उसका लाड़ला शैतानों के बीच गया

है तो नींद आ भी कैसे सकती है ! मुझे पहले ही शक था कि खंडहर में वह अकेला नहीं आएगा । कुछ भी हो सकता हे ।"

"च चाचा, आप भी बस...

गिरधर आरती क्री त्तरफ घूमकर बोला-"आरती ।”

"यहीं हूं पापा ।"

"तू खडी क्यों है ! चाकू गर्म कर। गोली निकालनी पड़ेगी ।"

आरती ने कहा-"एक बात कहू पापा ! ”

"हां हां, बोल ।"

उसने तिरछी नज़र से जावेद को देखते हुए कहा…"अगर हम जावेद के जिस्म मेँ गोली पडी ही रहने दें तो कैसा रहे !'"

जावेद मुस्करा उठा ।

जबकि गिरधर बोला…"शेतानी छोड आरती, जल्दी कर । यदि गोली का जहर फैल गया तो मुसीबत ही जाएगी।”

"गोली में इस घोचू के खून से ज्यादा जहरीला ज़हर नहीं होगा बापू ।" कहती हुइ वह कमरे से बाहर निकल गई ।

जावेद ने कहा…"इस नकटी को आपने बेकार ही सिर पर चढा रखा है चाचा । हमेशा बेसिर पैर की बातें करती हे ।"

“वह तेरा ख्याल न रखे तो पाकिस्तानी सरकार से इतना कडा मुकाबला न ले पाए तू ।"

"आप भी कैसी बात करते हैं।। वह करती ही क्या है ।"

"तुझसे प्यार करती है ।"

"च चाचा। " जावेद का लहजा एकदम से सख्त और गंभीर हो गया… “आपसे कितनी बार कहा है मैंने, मुझसे ऐसी बातें न किया करें । किसी से प्यार करने का वक्त ही कहां है मेरे पास। मुकम्मल पाकिस्तानी सरकार मेरी जान कं पीछे पडी है । आज बाजू मे गोली लगी हे । कल थोड़ा हटकर, सीने में लग गइ तो...

“इसका मतलब यह तो नहीं बेटे कि तू आरती के साथ अन्याय करे !" गिरधर शून्य में नेत्र टिकाए कहता चला गया…"उसे मैँ तुझसे बेहतर जानता हू । बाप हू उसका । वह तेरे लिए जान भी दे सकती हे । वह जानती है गधे कि तूकिसी भी क्षण मर सकता है । फिर भी तुझी से मुहब्बत करती है ।"

“म मगर चाचा ।'" जावेद अभी कुछ कहना ही चाहता था कि हाथ में चाकू लिए आरती कमरे में दाखिल हुई ।

उसके दाएं हाथ पें दबे चाकूका फल दहककर लाल सुर्ख हो रहा था, बाएं हाथ मेँ फर्स्ट एड बाक्स था ।
 
गिरधर ने उसकी त्तरफ देखा, चारपाइ के पाए से लगी एक हाकी उठाइ और दरवाजे की तरफ बढता हुआ बोला… “गोली निकलवा जावेद । चाकूठंडा हो जाएगा ।"

25

"आप कहां चले? "

दरवाजे पर पहुंचकर गिरधर बोला… "तेरे हाथ खून से सने पड़े हैँ, इन्हीं में से किसी से कालबेल बजाई होगी । उस पर खून लगा होगा । इससे पहले कि सुबह कोई गली से गुजरता राहगीर या पडोसी खुन को देख ले, उसे साफ़ करना ज़रूरी हे !"

"कल हमेँ यह जगह छोड देनी है ।"

“मतलब ? "

"इस्लामाबाद में मेरा काम खत्म हुआ । अगला शिकार करांची में है, वहीँ जाना होगा। ”

"हां । ये तो है। "

आरती ने लपककर कहा… “फिलहाल तूयहां बैठ । फर्श पर । मुझे आपरेशन करना है ।"

होठों पर दर्द भरी मुस्कान लिए गिरधर बाहर निकल गया ।

°°°°°°°

°°°°°°°°

ऐसा नही था कि गोली पहली बार लगी थी । दूसरी बार गोली खाया था वह, पहली जो आइएसआइं के एजेंट अफजल ने मारी थी ।

उसे नाज़नीन ने निकाला था ।

( 'कशमीर का बेटा' पढें) ।

गोली निकालने का आरती का तरीका भी ठीक वेसा ही था जैसा नाज़नीन का था । पढकर देखें-जावेद की तरह आपको भी नाज़नीन की याद आ जाएगी ।

कुछ देर बाद जावेद कमरे के बीच फ़र्श पर बैठा था और उसके जख्मी बाजूक्री तरफ मुंह किए बैठी थ्री आरती। उसके दाएं हाथ में चाकूथा । समीप ही फ़र्स्ट एड बाक्स खुला रखा था । चाकूकै सुर्ख फल से वह ज़ख्म को कुरेदती हुई गोली पर दृष्टि जमाने की चेष्टा कर रही थी । जावेद सख्ती से दांत मींचेे पीड़ा को पी रहा था ।

अपने काम मेँ व्यस्त आरती ने धीमे से कहा"घोंचू ।"

“ह हू?" उसने दांत भीचे रखे ।

“आज की रामायण सुना । ”

"र रामायण ?'

“यह मिठाई क्री गोली कैसे लगी? किसने मारी?"

"अरे रे ! बहकता क्यों है ? आगे बोल।"

"'आह...आ...आरती, डीआइजी की गोली…आह !"

“बीच बीच में पटाखे से क्यों छोड़ रहा है।। आराम से बता-हां, क्या कह रहा था तू! डीआइजो की गोली लगी। शफ्फाक शाही का खात्मा उससे पहले किया या बाद में ?'

“पहले ...उसे खत्म करने कै बाद भाग रहा था कि... "वारिस क्रो तो चोट नहीं आई?"

“खरोंच भी नहीं ।"

"गुड।। ” आरती ने तुरत ही टापिक चेंज किया-""खैर, छोड इस बात को । यह बता कि मुझसे लडता क्यों रहता है ?"

"लोहा आरती म...मैं कहां लड़ता हूं । आह । तूही तो...उई ।”

"मैं तो प्यार करती हूतुझसे। ”

“उई ! आह। " जावेद कै हलक से चीखें निकलकर रह गई ।

“क्या आई उई कर रहा है । बोल, तुझे भी मुझसे थोडा बहुत प्यार हे कि नहीँ।। बोल, वरना चाकू अंदर तक घुसेढ़ दूंगी ।”

"आह। आ...आरती ।” बुरी तरह चीखकर जावेद ने उसे बांहों में कस लिया । इतनी जोर से कि आरती की कई हडिडयां क्रड़कड़ा उठी ।

आरती ने कहा" … अरे. .अरे क्या करता है ! मेरी हड्रिडयों को तोड़ ही डालेगा क्या, गोली निक्ल चुकीं है गधे।”

जावेद क्री पक्रड़ ढीली पडती चली गई।

26

वह बेहोश हो चुका था ।

"घोंचूकहीं का…अक्ल घुटने मेँ लिए फिरता है ।” कहती हुई आरती का हाथ फर्स्ट एड बाक्स की तरफ बढा ।

दरवाजे पर खडे गिरधर ने दांतों से अपना निचला होंठ जख्मी कर लिया था । भावनाओं का सेलाब सा उमड़ा हुआ था उसके दिल में । इस वक्त उसकी इतनी हिम्मत तक न हुइ कि आरती को वहां अपनी मौजूदगी का एहसास करा देता ।

°°°°°°°°°

°°°°°°°°°°°°
 
26

शाम के वक्त

°°°°°°°°°°°°

सूरज सामने वाले बर्फ से ढके पहाढ़ के पीछे मुंह छुपाने की तैयारी कर ही रहा था कि विकास और मोगली एक छोटी सी पहाडी के शीष पर पहुंचे ।

पहुंचे ही थे कि उनकी नजर कुछ ऐसे कश्मीरी लड़कों पर पडी जिनमें से कूछ घाटी कै लंबे लंबे पेडों को काट रहे थे । कुछ ज़मीन पर पडी कटी हुइ डालों से पत्ते और छोटी छोटी टहनियां को साफ कर रहे थे आर चार लड़र्को ने मिलकर अभी-अभी लकडी के एक मोटे लटठे को घाटी में बह रही उस नदी में फेंका था जिसके स्वच्छ पानी के बड़े-वड़े पत्थरों से टकराने के कारण सारी घाटी में जोरदार संगीतमय शोर गूंज रहा था ।

सभी लढ़कें पठानी सूट पर गर्म कश्मीरी चोंगा डाले थे । उस दृश्य को देखकर विकास के मुह से चौंका हुआ स्वर निकला -“अरे ये कौन पागल लोग हैं मोगली जो कश्मीरी के लंबे लंबे और कीमती पेड को काटकर नदी में बहा रहे

है। "

मोगली इस तरह मुस्कराया जैसे विकास ने कोई बचकाना बात कह दी हो, बोला…"वो पागल नहीं विकाश शाब, ज़रूरत शे ज्यादा शयाने लोग है। फ्रीफंड का बिज़नेश करते हैं ये ओर चूना लगता हे हिंदुस्तान की शरकार को।"

“मतलब ? "

"क्या आप इश लकडी की हेशियत्त जानते हैं ?'

"हां हां । क्यों नहीँ।। '" विकास ने कहा… "यह दुनिया की सबसे कीमती लकडी है क्योंकि इससे बने क्रिकेट बैट सबसे उम्दा हौते हैँ । इसीलिए दुनिया भर के क्रिकेट प्लेयर्स हिंदुस्तान से बेट खरीदते हैं ।"

" और ये लोग इशीलिए इश लकडी को पाकिस्तान शप्लाई कर रहे हैँ । " मोगली ने इस तरह कहा जेसे बिकास की बात पूरी की हो ।

"पाकिस्तान सप्लाई कर रहे हैँ...मतलब?”

"मतलब शीधा हे शाब, जिश नदी में ये लोग कीमती लकडी को डाल रहे हैं, उश नदी का नाम झेलम है ओर यह तो आप जानते ही होंगे कि झेलम वेरीनाग से निकलकर कशमीर घाटी शे बहती हुइ पाकिस्तान के झांग मघियाना नगर के करीब चिनाब तक जाती हे ।"

"तो ?"

"ये लोग लकडी के तश्कर हैं । इनके दूसरे शाथी पाकिस्तान में रहते हैं । वे, जो लकडी के इन लटठों को पाकिस्तान पहुंचते ही नदी शे निकालकर वहां के मार्केट में ब्रेच देगे । उनकी भी मोटी कमाइ होगी ओर इनका हिस्सा भी इन तक पहुच जाएगा । लगा न हिंदुस्तानी गर्वमेँट को करोडों का फटका ! तश्करों की पौं बारह । झेलम इनके लिए बगेर पैशौं के ट्रांसपोर्ट का काम करती है ।”

कोई ओर वक्त होता तो इस एहसास मात्र से बिकास का खून खोल उठता कि किस अवेध तरीके से हिंदुस्तानी संपदा क्रो पाक में सप्लाई किया जा रहा था मगर इस वक्त क्यूंकि उसके दिमाग में चल ही कुछ और रहा था इसलिए इस वात क्रो इस एंगिल से नहीं सोचा बल्कि आंखों में चमक सी आ गइ । मुंह से स्वत: शब्द फिसलते चल गए…"पाकिस्तान पहुंचने का आसान रास्ता मिल गया । ”

"जी - जी। "

"जिस तरह लकडी के ये लटठे पाकिस्तान पहुचते हैँ उसी तरह मैं भी झेलम र्के रास्ते वहाँ पहुंच सकता हूं ।”

"अव्रआप पागल हो गए हें क्या शाब ?'" मोगली के समूचे जिस्म में झुरझूरी दोंढ़ गई-“ये क्या वेवकूफाना ख्याल आपके जेहन में आया हे ! वे लकडी के बेजान लटठे हें । न उन्हें ठंड लगती हे और न ही पानी के साथ किसी ऊंची पहाडी से गहरी खाईं में गिरने पर टूटते हैं लेकिन इंशानी जिश्म हाढ़ मांस का बना होता हे । झेलम के पानी क्रो छूकर तो दखिए, बर्फ शे ज्यादा ठंडा है । इतना ज्यादा कि उसमें उंगली डालत ही शारे जिश्म मेँ करंट दौड जाएगा। किशी तरह उशकै ठण्डेपन को झेल भी गए तो नदी में पड़े बडे बडे पत्थरों शे टकरा टकराकर लहूलुहान हो जाएंगे। पाकिस्तान तक पहुंचते पहुचते झेलम का पानी अनेक इतनी ऊंची ऊंची पहाडियों शे घाटियों में गिरता है और इश तरह मथता है कि एक एक हहडी का शुरमा बन जाएगा । पाकिस्तान में आपका मुकम्मल जिश्म नहीं बल्कि उशका मलूदा ही पहुच शकता हे ।”

“मैं अपने जिस्म क्रो लकडी का लटठा बना सकता हू ।"

मोगली ने ऐसी नजरों से विकास की तरह देखा जैसे उसे यकीन हो चला हो कि इस वक्त वह एक पागल हो चुके लड़कै की तरफ देख रहा हे । बोला…"आप ठीक तो हें ?'

"तुम्हें शक हे?"

"पक्का ...क्योंकि मेरी शमझ में नहीं आ रहा कि हाड मांस का बना शख्स खुद क्रो लकडी का लटठा कैशे बना शकता है?"

“खुद को लकडी के लटठे का हिस्सा बनाकर ।"

"ऐशा आप केशे कर शकते है ? ”

"तुम मेरे जिस्म क्रो किसी भारी लटठे के साथ बांधकर नदी में डाल देना । उसके साथ बहता हुआ मैं पाकिस्तान पहुंच जाऊगा । ”

"अब मुझे पक्का यकीन हो गया है विकाश शाब कि आपकी दिमागी हालत दुरूश्त नहीँ है । लकडी के लटठे के शाथ बंधे होने के कारण हो शकता हे आपकी हडडियां का शुरमा न बने मगर ठंडा पानी आपको इतना अकड़ा देगा कि जिश्म शचमुच का लकडी का लटठा बनकर ही पाकिस्तान पहुंचेगा । नहीं शाब...आप जरा भी ठीक नहीं शोच रहे हें । झेलम पाकिस्तान तक जरूर जाती हे लेकिन इशकै ज़रिए कभी कोइ यहां शे पाकिस्तान नहीं पहुंचा ।"'

"विकास को बीमारी ही वह करने की हे मोगली जो पहले कभी किसी ने न किया हो ।" लडके ने अपनी चिरपरिचित मुस्कान कै साथ कहा था…"तुम्हारा काम मुझें बस लटठे के साथ बांधकर उसे नदी में डाल देना हे । बाकी में देख लूगा ।”

इस बार मोगली कुछ बोला नहीं, गहरी नजरों से विकास को देखता रहा और फिर...देखत्ते ही दखत्ते समझ गया कि लडका मानने वाला नहीं हे । वही करेगा जो ठान बैठा हे तो बोला-“और ये आप मुझे-मुझें क्या कर रहे हैं ? पाकिस्तान केवल आप ही को नहीं मुझे भी जाना हे । हम दोनों को जाना है । 'हमेँ' कहिए ।"

"तुम तो उस रास्ते से जाने को तैयार ही नहीं हो जिस रास्ते से जाने का मैंने निश्चय किया है ।"

"आपशे किशने कहा मै तेयार नहीं हू?"

“अरे। ” बिकास के फेस पर आश्चर्य के भाव उभर आए-“तुम मुझे समझा रहे थे कि पाकिस्तान पहुचते पहुंचते जिस्म...

"मेरा मकशद वहाँ जाकर जावेद शाब से मिलना है और अपने इस मकशद को पूरा करने के लिए, जान की बाजी लगाना तो बहुत छोटी बात है शाब, मैं कुछ भी कर शकता हू ।" वह पत्थर से सख्त लहजे में कहता चला गया…"ओर फिर, मै भला वह क्यों नहीं कर शकता जो आप कर शकते हें !"

इस बार विकास ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा था ओर उस पर मौजूद दुढ़ता ने उसे बताया था कि मोगली अपने इरादे और फैसले से डिगने वाला नहीं हे । बस यही कहा उसने-“लेकिन अलग अलग लट्ठों के साथ बंधे होने के कारण हम एकदूसरे से बिछुढ़ जाएंगे ।"

“अलग अलग लटठों कै साथ क्यों जाएंगे हम दोनों एक ही लटठे पर दानों बंध जाएंगे ।"

"बांधेगा कौन ?”

¶¶¶¶¶

¶¶¶¶¶
 
आप 'कश्मीर का बेटा' के सारांश में पढ़ आए हैं कि…जावेद कश्मीरी से निजात पाने के लिए पाक सरकार ने भारत से अपनी मदद के लिए बिजय को बाकायदा मांगा था ।

फिर भी, विजय चकमा देकर यानी वाहिद पठान बनकर पाक पहुंचा मगर...यह चकमा उसने सिर्फ अपनी नजर मेँ दिया था ।

हकीकत यह थी कि पाक के अजीमुश्शान जासूस नुसरत तुगलक उसके हर पैंतरे से न केवल वाकिफ थे बल्कि उन्होंने उसके स्वागत की ऐसी जोरदार तैयारी भी कर रखी थी हमेशा लिए उसकी रामनाम सत्य हो जाए ।

अपनी प्लानिंग के मुताबिक बिजय वाहिद पठान के मेकअप में पाक मेँ पहले से स्थापित रा की जासूस गजाला के फ्लैट पर पहुंचा ओर वहीं नुसरत तुगलक ने अपने गुलजार नाम के प्यादे क्रो मानव बम बनाकर भेजा।

28

कुछ अपनी सतर्कता के कारण और कुछ ऐन मोके पर मिली अलफांसे की मदद के कारण बिजय ने गुलजार नामक मानवबम को नाकाम कर दिया अर्थात् खुद वह मारा गया जबकि विजय या गजाला का बाल तक बांका न हो सका था ।

तब, बिजय और अलफांसे कै बीच नौशाद अंसारी क्रो लेकर वार्ता हुईं । उस नौशाद अंसारी को लेकर जो इंडिया का ला मिनिस्टर होने कै साथ साथ जावेद कश्मीरी का चाचा भी था। उसे इंडिया से किडनैप कर लिया गया था । विजय का अनुमान था कि उसे जावेद कश्मीरी पर दबाव बनाने कै लिए पाकिस्तान ने किडनेप कराया है और उस वक्त यह अनुमान सेंटपरसेंट खरा उतरा जब अंलफासे ने बताया कि नुसरत तुगलक ने नौशाद अंसारी को तालिबानियों के सरदार हाजी गल्ला के हेडक्याटर में कैद कर रखा है।। विजय ने जब हाजी गल्ला कै हेडक्वार्टर का पता पूछा तो जरा गौर फरमाएं कि अलफांसे ने क्या कहा???

उसने कहा था… "क्या तुम नौशाद अंसारी को वहा से निकालने के बारे में सोच रहे ही ? "

“नहीं । " विजय ने व्यंग किया था… "पाकिस्तान में हम नमाज पढने आए हैं। ”

"भूल जाओ ।"

"यानी ? ”

“हाजी गल्ला के हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में सुनोगे तो तुम भी यही कहोगे कि उसे वहां से निकालना नामुमकिन ।"

"ये बात तुम कह रहे हो प्यारे यानी हमारे लूमढ़ मियां ! वो, जो न जाने कितनी बार चचा (सिंगही) और मम्मी (प्रिसेज जैकसन) कै दढ़वों में घुसकर धमाल मचा चुके हो ।"

“हां । ये बात मैं कह रहा हूं ।” अलफांसे बोला-"कहनी पढ़ रही है क्योकि मुझें पता है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता और मारने की कोशिश की तो अपने पंख कटवा बैठेगा ।”

"एक बात कहें लूमड़ मिया ?" पूछते वक्त विजय की नजर कमरे में रखे एक गुलदस्ते पर स्थिर थी ।

अलफांसे की नजर भी उधर ही घूम गई थी…"हजार कहो, वही सुनने आया हूं ।"

अब...विज़य ने उसकी आंखों मेँ झांका…"फूट लो यहां से ।”

"क्या ?” अलफांसे ने चोंकै हुए स्वर मेँ कहा ।

“हमने वहीँ कहा जो तुमने सुना ।"

"ये क्या बात हुई ?'

"ये बात ये हुइ प्यारे लाल कि तुम तो यार हमारे मनोबल क्री ऐसी की तैसी करने पधारे मालूम पढ़ते हो । ” इस चार बिजय बगैर कोमा विराम के कहता चला गया…"दुनिया के पर्दे पर ऐसी साली कौनसी जगह हे जहां विजय दी ग्रेट अपनी मर्जी से घुसकर, अपनी मनमर्जी चलाकर, अपनी उसी मर्जी से वापस नहीँ आ सकते। "

“बताया तो है, वह जगह हाजी गल्ला का है...

"बस लूमड़...बस ।" बिजय ने उसकी बात पूरी नहीँ होने दी थी…"'जैसा कि पहले ही फरमा चुके हैं, हम तुम्हारे द्धारा और ज्यादा डिमीरलाइज होने क्रो तैयार नहीं हें इसलिए फौरन से पहले फूट लो यहां से और अब हम तुम्हें उसी हाजी गल्ला के दड़बे से अपने ला मिनिस्टर साहब को निकालकर दिखाएंगे ।"

अलफांसे ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ कहा…"बगेर वहां की सुरक्षा व्यवस्था जाने ? ”

"अब हमें तुमसे कुछ नहीँ पूछना । जो पता लगाना होगा खुद लगा लेंगे वरना बाद मेँ र्डीगें मारते फिरोगे कि अगर मैं मदद न करते तो हम यह काम नहीं कर सकते थे और राजनगर पहुंचकर वो एक लाख रुपए देने वाला सोदा भी यहीं का यहीं रद्द । फूटी कोडी भी देने वाले नहीँ हैं हम तुम्हें ।""

“बो तो मुझे पहले ही से मालूम था कि तुम कैसे ठाकुर हो ।" अलफांसे की मुस्कान गहरी हो गई थी ।

“तो अब फूटते क्यों नहीं मियां ?”

"क्या तुम वाकई चाहते हो कि मैं यहां से चला जाऊं?” इस बार अलफांसे ने उसकी आंखों में आंखें डाली थीं ।

विजय ने भी वेसा ही करते हुए कहा…"स्टाप्प पेपर पर लिखकर दूं?"

“ओके। " कहने के साथ अलफांसे उस खिडकी की तरफ बढ गया जिसके ज़रिए आया था । विजय इस तरह खिडकी तक गया जेसे चैक कर रहा हो कि अलफांसे वहां छुपा हुआ तो नहीं है । फिर उसने जेब से एक छोटा सा यंत्र निकाला ओर गजाला की नजरों से छुपाकर खिडकी कै उस तरफ़ फेंकने के तुरंत बाद गजाला की तरफ पलटा ।

गजाला को उम्मीद थी कि बिजय अलफांसे को जाने नहीं देगा, ऐन वक्त पर रोक लेगा लेकिन जब उसने वेसा नहीं किया और अंलफासे वाकई चला गया तो अपने मुंह से निकलने वाले आश्चर्य मिश्रित शब्दों क्रो न रोक सकी…"य ये आपने क्या किया?"

“तुमने देखा नहीँ ?”

29

“देखा...तभी तो पूछ रही हूं । हाजी गल्ता के हेडक्वार्टर की सुरक्षा व्यवस्था तो सुन लेते । जब तक वह पता न होगा तब तक नौशाद अंसारी को निकालने के बारे मेँ सोचा ही कैसे जा सकेगा ?'

"हमारी एक खूबी है गजाला डार्लिग। " उसके नाम कै साथ डार्लिंग शब्द उसने पहली बार लगाया था-“ऐसी खूबी जिसकी तारीफ सारी दुनिया करती है । वह खूबी दुनिया की केवल दो हस्तियों मेँ पाई जाती हे । पहले हम और दूसरा आमिर खान । यह कि हम दोनो एक वार में केवल एक ही काम करते है और हम यहाँ जावेद कश्मीरी नाम के लकड़बग्धे को कान से पकडकर पाकिस्तान के हवाले करने के मिशन पर आए हैं जबकि ये लूमढ़ साला हमेँ नौशाद अंसारी को हाजी गल्ला की कैद से निकालने कै मिशन को हमारे दिमाग में चुनोतीं बनाकर भटकाना चाहता था।”

“मतलब आपका मिशन इडिया कै ला मिनिस्टर का वापस भारत ले जाना नहीं है?” गजाला ने चकित स्वर में पूछा ।

"हैं … …हंडरेड परसेंट है । '"

"तो ?"

"वो हमें लुभाव में मिलेगा ।"

"लुभाव में। ”

"जब हम बच्चे थे और मां ढाई सौ ग्राम दाल खरीदने लाला की दुकान पर भेजती थी तो दाल लेने क बाद हम लाला से कहते थे कि दाल तो हमने खरीद ली, अब लुभाव तो दे दो लाला । लाला हमारे हाथ पर एक टाफी रख देता था । कसम से, हमेँ दाल की उतनी खुशी नहीं होती थी जितनी टाफी की होती थी ।'"

"वो तो ठीक है लेकिन. ..

उसने गजाला की बात काटी…"ला मिनिस्टर नुसरत-तुगलक की तरफ से हमेँ मिलने वाला लुभाव होगा । "

"" मतलब? ”

“जब हम जावेद कश्मीरी नाम के कनकच्चे को पकडकर इस मुल्क के महान जासूसों के हवाले करेंगे तो उनसे लुभाव के रूप में मिनिस्टर साहब को मांगेंगे । कसम से, दरियादिल है वे महान जासूस । फोरन मिनिस्टर को हमारे हवाले कर देंगे और हम उसे लेकर राजी खुशी इंडिया लौट जाएंगे। "

गजाला की समझ में नहीँ आ रहा था कि अचानक ही बिजय कौनसी भाषा बोलने लगा था । वही उसने कह भी दिया-“आपक्री बातें मेरी समझ पें नहीं आ रहीँ हैँ ।'"

"बुद्धि में नुक्स है तुम्हारी क्योंकि हमारी बातों में न समझ में आने वाला कुछ भी नहीं है ।'" अपनी ही रौ में विजय कहता चला गया…"वरना सोचो, उन्होंने मिनिस्टर को किडनैप क्यों किया ?”

"आप ही ने बताया था, जावेद पर प्रेशर बनाने के लिए ।'"

"और उसी जावेद को हम उनके हवाले कर देंगे ।”

“तो?"

"उसके बाद मिनिस्टर का क्या वे अचार डालेंगे ? बिल्कुल नहीं, इसलिए नहीं क्योंकि अचार डालने वाली वस्तु वह है ही नहीं और जिसका वे अचार तक न डाल सकेंगे उसे लुभाव मेँ हमें देने में उन्हें भला क्या एतराज होगा !"'

बात इस एंगिल से गजाला को ठीक ही लगी पर बोली-"मगर मै सोच भी नहीं सकती थी किं आप नुसरत-तुगलक के साथ मिलकर काम करने कै बारे में सोच सकते हैं ।"

"ये वो बात हे गजाला डार्लिग जो हमें शुरू में ही सोच लेनी चाहिए थी लेकिन कोई बात नहीं, गलती आदमी के बच्चे से ही होती हे । वेटी अभी वाप के घर है । जब हमारा मिशन ही जावेद कश्मीरी नाम के बजरवटटू को पकडकर उनके हवाले करना है तो मिनिस्टर के लिए किसी हाजी गल्ला के उस हेडक्वार्टर में घुसने की जेहमत उठाने की ज़रूरत ही क्या हे जिसके बारे में लूमड़ मियां का कहना है कि वहां घुसने की कोशिश करने वाला परिंदा भी अपने पंख कटवा बेठेगा। अगर हम सीधे सादे रास्ते पर चले तो खुद नुसरत भैया और तुगलक बहन मिनिस्टर को चांदी की प्लेट में सजाकर हमारे हवाले कर देंगे। खेल खत्म…पैसा हज्म । "

गजाला की हालत ऐसी हो गई कि उस पर कुछ कहते न वन पडा जबकि बिजय यह कहता हुआ एक लैंडलाइन फोन की तरफ बढा…"वात शायद तुम्हारी 'समधन' में आ गइ है डार्लिंग ।'"

°°°°°°°°°

°°°°°°°°°
 
30

सूरज के पूरी तरह बर्फ से ढके पहाढ़ के पीछे मुंह छुपाते ही झेलम के आसपास अंधेरा फैल गया क्योंकि रोशनी हेतु वहां कोई अन्य व्यवस्था न थी ओर अंधेरा होते ही पेड़ो को काट काटकर नदी में डाल रहे लडकों की समझ में एटोमेटिक रूप से जैसे यह बात आ गई कि उनके वर्किंग हावर्स खत्म हो गए हैं ।

पानी कै पत्थरों से टकरा टकराकर बहने का शोर बदस्तूर जारी था और अंधेरे के साथ मिलकर यह शोर डरावना लगने लगा था ।

पेडों पर चढे लड़कै कुल्हाडियों सहित नीचे उतर आए । लटठों से पत्ते और टहनियों साफ करते लड़कों ने अपना काम जहां का तहां रोक दिया और लटठों को झेलम में डाल रहे लड़कों ने अपने मस्तकों से पसीना पोंछा ।

अगर यह लिखा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी कि उनमें से किसी ने भी किसी दूसरे से कोइ बात नहीं की थी और एक पगडंडी जैसे रास्ते पर से होते हुए उस टीले की तरफ बढ गए थे जिस पर कुछ देर पहले विकास औल मोगली मौजूद थे।

ये रास्ता क्यगेंकि संकरा था, इतना ज्यादा कि दो लोग अगल बगल नहीं चल सकते थे इसलिए वे एक के पीछे एक चल रहे । पहले ही से एक पत्थर के पीछे घात लगाए खडा विकास पंक्ति मेँ सबसे पीछे वाले लडके पर इस तरह झपटा कि क्या बाज हवा में परवाज़ कर रहे कबूतर पर झपटता होगा !

ज़रा भी आहट न हुइ थी और...अगर थोडी बहुत हुईं भी थी तो पानी के बहने का शोर उसे पी गया था अर्थात् उससे आगे जा रहे लड़कै को इस बात की भनक भी न लग सकी थी कि पीछे वाले के साथ कुछ हो गया है ।

बेचारा कश्मीरी लडका !

वह तो यह तक न समझ सका कि अचानक ही उस पर क्या मुसीबत टूट पडी ।

स्वाभाविक रूप से उसका मुंह चीखने कै लिए खुला ज़रूर था मगर चीखने की तो बात ही दूर, हलक से चूं चां तक की आवाज न निकल सकी ।

एक मजबूत हाथ को उसने अपने मुंह पर इस तरह फिक्स पाया था जेसे कूकर का ढक्कन कूकर कै मुंह पर फिक्स होता है।

यह बात समझ में आने में उसे थोडी देर लगी कि किसी ने उसके जिस्म को जकड लिया है और यह बात समझ में आते ही उसने रवुद को ज़कढ़न से निकालने की कोशिश शुरू कर दी थी । हल्का फुल्का लडकाा नहीं था वह । काफी जिस्मानी ताकत का मालिक था लेकिन यह बात जल्दी ही उसकी समझ में आ गईं कि उसे ज़कड़ने वाला उससे ज्यादा ताकतवर है । वह, जो उसे घसीटता हुआ पत्थर के पीछे ले गया । गिरफ्त से आजाद होने की कोशिश वह उस वक्त भी कर रहा था जब एक ठंडी सी वस्तु कनपटी से स्पर्श हुइ और कानों से टकराया उससे भी सर्द लहजा-“ज्यादा उठापटक की तो भेजे में गोली उतार दूगा ।"'

लडकै कै जिस्म का हर हिस्सा इस तरह जहा' का तहा' रुक गया जेसे उसे चलाने वाला रिमोट आफ़ हो गया हो ।

"हाथ हटा रहा हू ।" वहीँ सर्द लहजा-"पर आवाज निकाली तो मेरा रिवाल्वर गर्जंकर तुम्हें हमेशा के लिए खामोश कर देगा ।"

रिमोट फिर भी आन न हुआ । मुंह से हाथ हटा । हुक्म मिला-"मेरी तरफ घूमो ।"

हुक्म का पालन करते ही उसने लंबे लड़के की परछाईं को अपने नजदीक महसूस किया ।

रिवाल्वर उसी के हाथ में था । उसी के करीब चार फुटे आदमी की एक अन्य परछाई भी मौजूद थी ।

“क.... कोन हो तुम और मुझसे क्या चाहते हो?" कश्मीरी लडके ने खुद महसूस किया कि उसकी आवाज कांप रही थी।।

“पहले सवाल का क्रोइ मतलब नहीं हे । हां, दूसरे का जवाब जरूर मिलेगा । वो भी वक्त आने पर ।" कहने के बाद लंबी परछाईं उसकै पीछे पहुच गइ । फिर, रिवाल्वर की नाल उसने अपनी पीठ पर महसूस की, साथ ही सर्दं लहजा कानों से टकराया…“चलौ ।"

कश्मीरी लड़कै कें पास हुक्म का पालन करने के अलावा कोई चारा न था । चार फुटी परछाईं साथ साथ चल रही थी । वे उसे वहां ले गए जहां पेडों के कटे हुए बड़े बड़े लटठे पड़े थे अर्थात् नदी कें किनारे पर ।

वहां शोर कुछ ज्यादा ही था । उस वक्त उसकी खोपडी हया हो गइ जब लंबे लडके ने हुक्म दिया…"मेरे चार फुटे साथी को इस त्तटठे के साथ बांध दो ।” हुक्म का मतलब समझ में नहीं आया उसकी ।

विकास ने मोगली से कहा…"इसे रस्सी दो ।”

मोगली ने रस्सी की एक गुच्छी कश्मीरी लडके की तरफ बढाई ।

31

लड़कै की समझ मेँ अब भी कुछ नहीं आया था सो मुंह से शब्द फिसलते चले गए…"म मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आप................

“कुछ भी समझने की कोशिश करने की जगह वह करो जो मैंने कहा है। ” बिकास ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी थी ।

लड़का चुप रह गया ।

"तुम खड़े क्यों हो ?” विकास ने मोगली से कहा…"लट्ठे पर लेटते क्यों नहीं?"

मोगली जरा भी चूं चां किए बगेर गोल लट्ठे पर चित्त अवस्था में लेट गया । बिकास ने लड़कै से कहा…"अब तुम्हें इस रस्सी की मदद से उसे इसी पोजीशन मेँ लट्ठे के साथ कसकर बांधना हे । टांगें धढ़ आदि सब । केवल कलाईयां आजाद रहेंगी ।"

लडके क्री समझ में अव भी कुछ न आया ओर...जो समझ में नहीं आ रहा था उसे समझने के लिए उसके दिमाग की नसे बुरी तरह फड़फड़ा रही थीं मगर सवाल करने की हिम्मत न पडी जबकि बिकास ने पुन: कहा…"रस्सी को लट्ठे कै चारों तरफ घुमाते हुए तुम्हें इसे उतनी ही कसकर बांधना है जितनी कसकर बांध सकते हो । भले ही इसकी नसों में बहता खून रुक जाए ।'"

लड़कै की समझ में अब भी न आया कि लंबूउससे क्या करा रहा है ? क्या वह गुटके को मारने की फिराक मेँ है ? ऐसा था तो उसे उसकी क्या जरूरत थी ? यह काम तो वह खुद द भी कर सकता था क्योंकि गुटके की तरफ से अभी तक लबूं का विरोध होने की तो बात ही दूर, वह तो एक लपज तक न बोला था। बंधने के लिए लट्ठे पर इस तरह लेट गया था उसका जरखरीद गुलाम हो ।

सो, लडके ने भी वगेर कोई सवाल किए हुक्म का पालन करना शुरू कर दिया मगर जो काम उसे सौपा गया था वह आसान न था । लट्ठा क्योंकि भारी था इसलिए हर अलबेटे पर रस्सी को ओर ज़मीन कै बीच से गुजारना लोहे के चने चबाने जेसा था ।

परंतु लड़कै की स्थिति मरता क्या न करता वाली थी । सिर पर तना रिवाल्वर भला किससे क्या नहीं करा देता।

हां, रस्सी के कसाव क्रो ढीला महसूस करके बिकास को कई बार उससे और ज्यादा कसने कै लिए कहना पड़ा ।

सचमुच रस्सी मोगली के जिस्म में कइ जगह इस कदर धंस गई थी कि खून स्का सा महसूस हुआ ।

मुंह से कराह जरूर निकली मगर बोला कुछ नहीं ।

मोगली के बंधने के बाद विकास ने लड़कै से कहा…"अब इस लट्ठे को घक्का देकर ऐसी पोजीशन में लुढका दो कि मोगली का जिस्म आसमान की तरफ न होकर साइड में हो जाए ।'"

लडके ने बैसा भी कर दिया ।

तब विकास ने रस्सी की दूसरी गुच्छी कश्मीरी लडके को देते कहा…“अब मैं लट्ठे पर लेट रहा हू और तुम्हें मुझे भी इसी तरह बांधना हैं । याद रहे, अगर ज़रा भी हाशियारी दिखाने की कोशिश की तो तुम अपना काम खत्म होने तक हाथ में मोजूद रिवाल्वर के निशाने पर रहोगे और तुम्हारा काम तमाम करने के लिए मुझें अपनी उंगली को जुम्बिश देने से ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ेगा । "

लढ़कै के होश फाख्ता हो चुकें थे ।

खासतौर पर यह सोचकर कि लंबू आखिर चाहता क्या है? इस बार वह अपने मुंह से निकलने वाले लफ्जों को रोक न सका । आवाज में रोने का पुट आने के बाद भी उसने पूछा…"अ-आप आखिर मुझसे करा वया रहे है' ? "

“कहा न। वह मत सोचो ।" सख्त लहजा-“जान बचाना चाहते हो तो वह करो जो मैं कह रहा हूं ।”

आखिर मजबूरी भी दुनिया मं कोई चीज हैं! जब वह विकास को भी लट्ठे कै साथ बांध चुका तो बिकास ने रिवाल्वर उसकी तरफ ताने रखकर कहा -"अब इस लट्ठे को लंबाई में सरकाकर नदीं में डाल दो ।'"

“क क्या ?'" कश्मीरी लडके के हलक से न चाहते हुए भी चीख निकल गई थी । आंखें आश्चर्य से फटी रह गई ।

"मरना नहीं चाहते तो वह करो जो कहा है ।'" विकास ने सख्त लहजे में कहा-“मेरे हुक्म पर तुम्हारे द्वारा किया गया यह अंतिम काम होगा । उसके बाद तुम अपने घर जा सकते हो ।”

" लेकिन लटठा इतना भारी है ।'" इस बार वह कहे बगेर न रह सका…“भला मैं अकेला इसे नदी में कैसे डाल सकता हू?"

“मैंन भी सोच समझकर इसी लटठ क्रो चुना है । यह आधा तो पहले ही ढलान की तरफ लटका हुआ हे । तुम्हें इसे उठाकर नदी में नहीं र्फकना, वल्कि जोर लगाकर इतना नदी की तरफ सरकाना है कि ढलान की तरफ ज्यादा वजन हो जाए । ऐसा होते लट्ठा खुद फिसलता हुआ नदी में जा गिरेगा। ”

32

"व... वो सब तो ठीक हे सर लेकिन इस तरह सुसाइड क्यों करना चाहते हैँ आप ? किसी भी हालत में आप बचेंगे नहीं । हालांकि तो नदी तक पहुचते पहुचते ही मर जाएंगे। किसी तरह नीचे पहुंच भी गए तो झेलम का बर्फ सा पानी आपकी कुल्फी जमा देगा । कितनी देर तक उससे मुकाबला कर सकेंगे ! वैसे भी आपने खुद को इतना कसकर बंधवा लिया है कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकेंगे । मेरी तो समझ मेँ नहीँ आ नहीं आ रहा कि आप...

"बात तुम्हारी समझ में नहीं आती क्या ?" विकास ने एक बार फिर उसकी बात काटी…"मरना चाहते हो तो बहस करो और जीना चाहते हो तो वह...जो मैंने कहा हे ।"

कश्मीरी लड़के ने वह भी कर दिया ।

लट्ठा जब ढलान पर तेजी से फिसलता हुआ नदी की तरफ बढा तो उसके कानों में लंबू और गुटके, दोनों के चीखने की आवाजें आइ थीं और फिर... 'छपाक' की वह जोरदार आवाज़ जिसने उसे बताया कि लटठा नदी के पानी से जा टकराया है । अब वह अंधेरे कै कारण लटठे को नहीं देख सकता था मगर महसूस कर सकता था कि वे दौनों मौत के कितने नज़दीक है।

उसकी समझ में अब भी नहीँ आ रहा था कि कैसे पागल लोग थे वे जिन्होंने उसे रिवाल्वर से मारने की धमकी देकर उसी से खुद की हत्या कराइ थी । अगर वे सुसाइड भी करना चाहते थे तो मरने का ये कौनसा तरीका हुआ ?

°°°°°°°°°°°°°°

°°°°°°°°°°°°°°
 
Back
Top