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चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

अगले दिन क्योकि बैंक की छुटटी थी इसलिए शौकत करांची नहीं गया । सुबह कै अखबार को गिरधर के साथ साथ उसने भी खूब चाटा मगर इकरामुद्दीन से संबधित खबर न मिली ।

शौकत और गिरधर के बीच तय हुआ कि 'उनके' आने पर चाहे जो होता रहे लेकिन गिरधर को सामने नहीं आना है क्योंकि उससे कोइ लाभ होने वाला न था । उल्टा, गिरधर भी उनकी निगाह में आ जाता । वैसे भी, जब वे 'उनकी' बात मानने को तेयार थे त्तो गढ़बढ़ ही क्या होनी ।"

शौकत ने सारी बातें खालिदा को बता दी थीं । शौकत की ही तरह, उसे भी पिचहत्तर करोढ़ का अफ़सोस तो था परंतु हालात क्रो देखते हुए जो फैसला लिया गया था, वही ठीक लगा ।

सुबह के दस बजे ही शोकत फस्ट फ्लोर के अपने उस कमरे में जम गया जिसकी खिडकी से मकान के सामने कै पूरे हिस्से क्रो साफ देखा जा सकता था । ऐसा उसने इसलिए किया था ताकि सांकल बजने से पहले ही उनके आगमन का पता लग जाए या इसे उसके अंदर की बेचैनी भी कही जा सकती थी ।

यह बैचेनी समय के साथ बढती चली गइ क्योंकि शाम ढलने तक भी वे नहीँ आए थे । लाइटें आन हो गईं ।

शौकत को लगने लगा कि शायद वे आएंगे ही नहीं । यह एक ही काम थोडी हे उन्हें ।

अनेक काम हें । अपनी व्यस्तताआं में उलझ गए होंगे । शायद कल आएं । या उसक भी बाद ।

लेकिन अगर ऐसा हुआ तो बैंक में आएंगे क्योकि वे जानते हैं कि मैं सारे दिन बैंक में मिलता हूं । खुदा करे ऐसा ही हो ।

ये सारे बिचार उसे बहुत राहत पहुंचा रहे थे ।

मगर यह राहत केवल रात कें नो बजे तक पहुची क्योकि ठीक नो बजे उसने उसी लंबी गाडी को आम के दोनों पेडों के बीच रुकते देखा जिसमेँ वे परसों आए थे ।

सफेद रंग की गाडी थी वह ।

उसे देखते ही शौकत का दिल उछल उछलकर उसके कंठ की गोली से टकराने लगा ।

सबसे पहले हकरामुद्दीन गाडी से निकला, उसक बाद हाजी गल्ला और फिर, तीसरा शख्स ।

तीसरे शख्स को देखकर तो शौकत अंसारीकेे हाथ पांव ही ठंडे पढ़ने लगे क्योंकि उसके जिस्म पर पुलिस क्री वर्दी ही नहीं बल्कि कंधे पर स्टार कै साथ चांद तारे का निशान भी लगा था ।

शौकत क्रो समझते देर न लगी कि वह पुलिस का कोई बड़ा अफसर हे ।

यह बात उसके जेहन को सनसनाए दे रही थी कि वे अपने साथ पुलिस के इतने बडे अफसर को क्यों लाए हैं ?

बात...उसकी समझ में न आनी थी, न आई ।

वे मुख्यद्वार की तरफ बढे ।

वह तेजी से उठा । कमरे से निकला और फिर लगभग दौड़ते हुए सीढियां त्तय करने लगा । लाबी में बैठे खालिदा, सुरैया, किबला ओर जावेद उसकी हालत देखकर चौंक पड़े थे ।

जावेद ने तो पूछ भी लिया…“क्या हुआ अब्बा? आप इस कदर हढ़बड़ाए हुए क्यों हैं ?"

जावेद के सबाल पर जरा भी ध्यान दिए बगेर शौकत ने उत्तेजित अवस्था मेँ खालिदा से कहा-"वे आ गए ।'"

"ओह ।" खालिदा का चेहरा पसीने से नहा गया ।

जावेद को वह सब असामान्य लगा ।

उसन पूछा… "कौन आए हें अब्बा ?"

जावेद के पूछने के अंदाज पर शोकत क्रो पहली बार एहसास हुआ कि वह ओवर रिएक्ट कर गया है ।

इस बार थोडा संभलकर बोला…"क कुछ नहीं बेटे, मेरे बैंक के साथी हे । मिलने आए हे ।'"

"तो इस कदर घबराने की क्या जरूरत है और उनक आने की खबर से अचानक मम्मी को इतना पसीना क्यों आ गया हे ? ओर, आपने कहा कि वे आ गए-इसका मतलब वे ऐसे लोग हें जिनका आपको इंतजार था । मेरे ख्याल से तो आप सुबह से अपने ऊपर वाले कमरे में जो बेठे थे, उन्हीं का इंतजार कर रहे थे !"'

तभी सांकल बजी ।

शौकत अंसारी कुछ और हड़बड़ा गया…"क-कुछ नहीं, बस तेरे ही कारण । उनकी नज़र तुझ पर पढ़ गई तों...तूऊपर जा ।”

हालांकि किसी के भी आने पर उसे ऊपर भेजने की यह क्रिया पहले भी कई बार हो चुकी थी मगर इस बार जावेद को खटकी ।

सांकल फिर बजी ।

"जल्दी जा ।" शौकत ने जावेद को धक्का सा दिया…" वर्ना वे सोचेंगे दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों ही रही है ।”

असमंजस मेँ फसे जावेद को सीढियों की तरफ बढना पड़ा ।

"खोलते हैं भईं ।'" कहता हुआ शौकत दरवाजे की तरफ लपका मगर दरवाजा उसने तब तक न खोला जबतक जावेद लाबी मे नज़र आना बंद न हो गया । और...दस्वाजा खुलते ही वे तीनों इस तरह धड़धड़ाते हुए अंदर आ गए जेसे उनका अपना घर हो ।

गेंठे कद का इकरामुद्दीन परंपरागत यानी नेता वाले लिबास में था और वह, जिसे शौकत अंसारी हाजी गल्ला के नाम से जानता था किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था ।

उसके पहाढ़ जैसे बलिष्ट जिस्म पर काले रंग का पठानी सूट था । चेहरा अत्यंत चौडा । मोटे-मोटे होंठ । लंबी नाक और ज़रूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुइ ठोडी । मस्तक वहुत चौडा था और पीछे की तरफ क्रो कढे हुए लंबे बाल ।

वह जितनी वार भी शौकत के सामने आया था, उस पर उसने खास ध्यान न दिया था । उसकी तवज्जौ इकरामूद्दीन पर ही रहती थी क्यो़कि हाजी गल्ला की हस्ती से वाकिफ न था ।

जबकि इकरामुद्दीन को एमपी कै रूप में जानता था ।

पिछली मुलाकातों में हाजी गल्ला को उसने इकरामुद्दीन का वेसा ही चमचा समझा था जैसे नेताओं के साथ रहते हैं ।

इस बार उसने खास तवब्जौ दी और तवब्जी देते ही रूह फना हो गई उसकी क्योंकि उसकी लाल सुर्खं, गोलमटोल और बही बडी आंखें सुरैया पर स्थिर थीं ।

पिछली बार भी उसने नोट किया था कि हाजी गल्ला ने सुरैया क्रो अच्छी नज़रों से नहीं देखा था मगर इस बार. . .बल्कि इस वक्त उसने महसूस किया कि हाजी गल्ला के चेहरे पर ऐसे भाव हें जेस सुरैया को आंखों ही आंखों में पी जाना चाहता हो ।

हाजी गल्ला के देखने कै अंदाज पर सुरैया सहम गई थी और डरी हुईं खालिदा ने उसे अपने पीछे छुपाने की कोशिश की यी ।

शौकत ने कहा…"'खालिदा, सुरैया को अंदर ले जाओ ।"

"क्यों भइ, खडी रहने दो उन्हें भी यहीं । " हाजी गल्ला कें चेहरे पर बडी ही खतरनाक मुस्कान थी…“हम क्या खा जाएंगे ।"

खालिदा सुरैया को लेकर किचन की तरफ बढी थी ।

"ऐ! सुना नहीं तूने ।" हाजी गल्ला की आवाज सननाटे पर तैरती सीटी की-सी आवाज थी…“यहीं खडी रह ।"

"आपके लिए चाय बनाने जा रहे हैं भाईजान ।'"

“ये किस मर्ज की दवा है ?" उसने किबला की तरफ देखा ।

खालिदा के होश फाख्ता ।

शौकत बोला…"आपफे आफर पर मैंने सोच लिया है । जेसा कहैं, वैसा करने को तैयार हू' ।”

"कहां तैयार हे !” इकरामूद्दीन बोला…"तूतो उस कटारीदार मूंछ वाले थानेदार के पास गया था !"

इस एहसास ने शौकत के होश उड़ा दिए कि इकरामुद्दीन को उस बारे में पता था । हकलाता हुआ बोला…“ग गलती हो गई एमपी साहब, माफ कर दीजिए ।"'

“थानेदार के क्या बस का था । इनसे मिलो ।"’ उसने पुलिस के अफसर की तरफ इशारा क्रिया-"ये एसएसपी भी हैं और हमारे दोस्त भी-मिस्टर शफ्फफाक शाही । तुम्हारी जो भी कंपलंट हे, इनसे कहो । ये तुम्हारी हर प्राबलम को अपनी प्राबलम समझकर हल करें गे । हे न, शफ्फफाक शाही साहब !"

"जरूर...जरूर मिस्टर अंसारी, हम तो आए ही इसलिए हैं ।" कहते वक्त एसएसपी के होठों पर जो मुस्कान थी उसने शौकत के तिरपन कंपा दिए थे-"वोलिए कौन आपकी ज़मीन को जबरदस्ती खरीदना चाहता है । आखिर करांची में पुलिस भी हे !"'

"नहीँनहीँ । मुझे किसी के खिलाफ क्रोइ कंपतेंट नहींकरनी ।” शौकत अपनी आवाज़ में पैदा होनेवाले कपन का बडी मुश्किल से रोके हुए था…"कोई मेरी जमीन जबरदस्ती नहीँ खरीदना चाहता । बल्कि मै ता खुद ही बेचने का इच्छुक हू ।"

“अच्छा ! कितने की देंगे आप अपनी जमीन?"

“प पच्चीस करोढ़ ।”

इकरामुद्दीन ने तुरंत कहा था…"मैं बीस करोड़ से ज्यादा नहीं दे सकता एसएसपी साहब ।"’

शौकत अंसारी सकपका गया । उसने चौंककर इकरामूद्दीन की तरफ देखा ।

शब्द मुंह से खुद फिसलते चले गए--“प पर आपने तो खुद पच्चीस लगाए थे एमपी साहब ।"

"वो तुम्हारे थानेदार के पास जाने से पहले की बात थी ।"

पलक झपकते ही शौकत की समझ में यह बात आ गईं कि थानेदार के पास जाने की सजा के तौर पर पांच करोड़ कम कर दिए गए हैं । झटका तो लगा । दिमाग में यह बिचार भी उठा कि क्या उसे बीस करोढ़ कबूल कर लेने चाहिए लेकिन तभी, गिरधर की यह बात जेहन में कौधं गई कि "वे चाहे तो ज़मीन मुफ्त में भी उनकी हो सकती है ।' अत: बगेर ज़रा भी देर किए वोला…"म मुझे मंजूर हे । आप जो भी दे मुझे मंजूर हे ।"'

"अच्छी तरह सोच लीजिए, कोई जबरदस्ती तो नहीँ कर रहा आपसे ।" शफ्फाक शाही ने कहा था…"जब तक मैं' करांची का एस एसपी हू तब तक शहर मै कोई गैरकानूनी काम नहीँ हो सकता । बहरहाल, पुलिस होती ही कानून लागू करने के लिए हे ।"

"ज-जी नहीँ, मेरे साथ किसी के द्धारा कोई जबरदस्ती नहीँ की जा रही । मैँ खुद अपनी जमीन बीस करोड़ में बेचने को तैयार हूं।”

"तो फिर आपके बीच पुलिस का दख्ल खत्म हो जाता हे ।"

इकरामूद्दीन बोला…"निकालो कागज. . और साइन करो ।"'

"क-कागज तो बैंक के लाकर मेँ हैं ।"' खौफ की ज्यादती के कारण शौकत अंसारी का हलक सूख गया था…"आप कल बेंक खुलते ही आ जाइएगा । बल्कि आप पर टाइम न हो तो कोइ जरूरी नहीँ हे कि खुद ही आएं । किसी क्रो भेज दीजिएगा । मै सारे कागज साइन करके उसे दे दूगा । ये मेरा वादा "हे ।”

"क्यों हाजी ? " इकरामुद्दीन ने पूछा था…"क्या कहते हो ।”

"तब तक इसकी बेटी हमारी मेहमाननवाजी में रहेगी । " सुरैया की तरफ एकटक देख रहे हाजी गल्ला ने जब ऐसा कहा तो शौकत के हलक से निकली चीख ने पूर मकान क्रो दहला दिया…“नहीं।"

तीनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन देख तीनों शौकत की तरफ ही रहे थे और शौकत का हाल खौफ की ज्यादती के कारण बहुत बुरा था । वह कहता चला गया…"ऐसा नहीं हो सकता ।"

"कैसा नहीँ हो सकता?” हाजी गल्ला ने गुर्राकर पूछा था ।

"सुरैया तुम्हारी भी बेटी जैसी है ।"' शौकत गिढ़गिड़ा उठा था ।

"यही तो दिक्कत हे अंसारी, कब से पैदा करने की कोशिश कर हूं मगर खुदा ने मुझे अभी तक एक वेटी नहीँ दी । मुकिन्न हे तुम्हारी बटी मेरे जीवन की इस सबसे बडी कमी को पूरी कर दे ।"

“बात हमारी समझ में नहीं आई ।" इकरामुद्दीन ने उसकी बात काटी…"सुबह तक गारंटी के तोर पर यदि हाजी गल्ला सुरैया को अपने पास रखना चाहता है तो इसमें एतराज की क्या बात हे?”

“कानूनुन भी इसमें कोई गलत बात नहीं हे।" शफ्फाक शाही बोला…“कोइ अपने वादे से मुकर न जाए, इसके लिए गारंटी के तौर पर कोइ न कोइ चीज तो अपने पास रखनी ही पड़ती है ।"

" मै तैयार हूं ।" खालिदा ने कहा…“गारंटी के तोर पर में तुम्हारे साथ चलने को तैयार हू ।"

“तेरा क्या अचार डालूगा बुढिया ।." कहने के साथ हाजी गल्ला ने झपटकर न सिर्फ सुरैया की कलाई पकड़ ली थी बल्कि एक झटक से उसे अपनी तरफ खींच भी तिया था ।

सुरैया कं हलक से निकली चीख ने मुकम्मल मकान क्रो झकझोर कर रख दिया ओर...उसी कै साथ मकान को झकझोरा था एक और दहाड़ ने ।

उस दहाड ने जो जावेद के हलक से निकली थो-“अगर किसी ने मेरी बहन को हाथ लगाने की कोशिश की तो में उसकी लाश बिछा दूंगा । छोड सुंरया को ।”

इस दहाड के साथ वह सीढियां उतरता हुआ लाबी में नहीं पहुचा था बल्कि जहां वे जेड का आकार बनाती थीं वहां से सीधा वहां कूदा था जहां सुरैया का हाथ पकडे हाजी गल्ला खडा था ।

और...इससे पहले कि हाजी गल्ला कुछ समझ पाता, एक ही झटके में उसने सुरैया की कलाई उससे छुडा ली थी ।

"य ये क्या किया जावेद ? ये क्या किया तूने !" शोकत अंसारी चीख पडा आ…"तूसामने क्यों आया ?"

"भैया...भैया ।" कहकर सुरैया उससे लिपट गइ थी ।

“जब तक तेरा भाई हे सुंरैया, तब तक कोई तुझे हाथ नहीं लगा सकता ।” कहने कै साथ जावेद ने सुंरेया को पकडा, अपने सीने से अलग कर पीठ की तरफ किया और पहाड़ की तरह हाजी गल्ला के सामने अड़ता हुआ गुर्राया-“मेंने तेरा बहुत नाम सुना है हाजी गल्ला, लगता हे खुदा ने मुझे यहा' तेरा ही खात्मा करने भेजा हे ।"

"अरे !” हाजी गल्ला हंसा । इकरामुद्दीन आर शफ्फाक शाही से मुखातिब होते हुए कहा उसने-“कहानी में ये नया किरदार कहा से आ गया? हमने तो सुना था अंसारी की सिंफ़ एक बेटी है ।"'

"मैं भी इसी शौकत अंसारी का बेटा हू* हाजी गल्ला ।" जोश में भरा जावेद कहता चला गया…"आज से पहले मैं...

“नहीं जावेद. . .नहीँ । तूउस बारे में कुछ नहीं वोलेगा ।" उसकी बात पूरी होने से पहले ही शौकत चीख पड़ा था।

"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हे एसएसपी साहब कि ये सब आखिर हो क्या रहा है ? " हाजी गल्ला ने शफ्फाक शाही से ऐसे अंदाज़ में कहा था जेसे स्टेज पर नाटक कर रहा हो'-""हम बिलेंस के बीच में अचानक ये हीरो कहा से आ गया ?"

"क्यों बे वैंक क्लर्क, कहा छुपा रखा था अपने इस छ: फूट बेटे को?” इकरामुद्दीन ने दानों हाथों से शोकत का गिरिबान पकडकर उसे झझोड़ते हुए कहा था-"ओर वो कौनसी बात जिसे कहने से तूने अभी अभी इसे रोका हे ?'"

"ऐ... ।" जावेद इकरामुद्दीन की तरफ लपका…"गिरेबान छोड़ मेरे अब्बा का, वर्ना हाथ काटकर फेंक दूंगा ।"

"और अगर तूने ऐसी कोशिश की तो कामयाब हो सको या न हो सक़ मगर मै तेरी मां की खोपडी उडाने में जरूर कामयाब हो जाऊंगा ।" कहने से पहले शफ्फाक अपने होलेस्टर से रिवाल्वर निकालकर खालिदा के सिर से सटा चुका था।

जावेद ने उस दृश्य को देखा ता जेसे फट पड़ा-"तुप सब साले कायर हो । और ओरतां की आढ़ क्या लेते हो ! शेर की तरह सामने आकर बात करो ।।मै जबाब दूगा तुम्हें ।"

"सबसे पहले एमपी साहब को छोड ।"

जावेद उसी पोज़ में अपने स्थान पर खडा दहाडता रहा । एसएसपी गुराया-"छोड़ता है...या दबा दूंट्रेगर ?" भभकते जावेद ने इकरामुद्दीन का कालर छोड दिया ।

"हाजी गल्ला ।'" एसएसपी न कहा…"गारंटी के तौर पर अगर हम लडकी की जगह लढ़के क्रो ले जाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा । ”

"इसका क्या करेंगे एसएसपी साहब, ये तो साला...

"बहुत कुछ कर सकते हैं हाजी गल्ला । "' एसएसपी ने उसकी बात काटी-“दिमाग से सोच, बहुत नाम सुना है इसने तेरा । कोई बहुत बडी कहानी खुलकर सामने आ सकती हे ।”

"पर लडकी. ..

"लडकी कहा जारही है.'” एसएसपी ने आंख मारीं…"वो तो वहीँ हे, जहां अब तक थी । हमारी पकड़ से बाहर थोडी हो जाएगी ! "

जाने क्या सोचकर हाजी गल्ला चुप रह गया ।

"बोल ।"' एसएसपी ने जावेद से कहा-"गारंटी के तौर पर तू हमारे साथ चल रहा है या तेरी बहनिया क्रो ले जाएं र”

"नहीं...नहीं ।"' शौकत चीखा…"तुम मेरे बेटे क्रो कहीं नहीं ले जाओगे । मैं तुम्हारे साथ चलने क्रो तैयार हू ।'"

"तुझसे बात नहीं हो रही शौकत । एसएसपी साहब तेरे बटे से बात कर रहे हें ।" इकरामुद्दीन ब्रोला-“उसे जवाब देने दे।'"

जावेद समझ चुका था कि इस वक्त उनसे उलझकर वह किसी भी तरह फायदे में नहीं रह सकता था अत: बोला…"में तुम्हारे साथ चलने को तेयार हूं । देखता हूंकहां ले जाते हो ।”

"ओके ।" शफ्फाक शाही ने एक बार फिर हाजी गल्ला की तरफ आंख मारी थी…“बाहर निकलकर गाडी में बैठ ।"’

हाजी गल्ला इससे ज्यादा कुछ न समझ पाया कि एसएसपी के दिमाग में कुछ है इसलिए वह कुछ न बोला जबकि घर से निकलते वक्त भी वह घूरता सुरैया को ही रहा था ।

शौकत, खालिदा और सुरैया चीखते रह गए ये । उन्होने जावेद को गाडी में बैठा लिया । किवला की समझ में कुछ न आ रहा था । गाडी के जाते ही गिरधर घर से बाहर निकला । उसने पूछा-“क्या हुआ शौकत, वे जावेद को अपने साथ क्यों ले गए हैँ और खालिदा बहन पर रिवाल्वर क्यों तान रखा था उन्होंने ?"

पीछे पीछे आरती भी वहां पहुंच गइ थी ।

उसके चेहरे पर हवाइया उढ़ रहीँ थीं ।

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जावेद के चेहरे पर जलजले के से भाव थे । रस्सी से एक कुर्सी के साथ बंधा वह चीखता चला गया…"मै सोच भी नहीं सकता था कि जिस को अपना समझकर मै इधर आया था, उसमें भी वेसे ही दरिंदे होगे जेसे सरहद कै उस पार हैं । उन लागों ने जो किया इसलिए किया क्योंकि मुसलमान होने के कारण मै यकीन के काबिल न था मगर तुम मेरे ओर मेरे परिवार के साथ जो कर रहे हो इसलिए कर रहे हो क्याकि हम को मुसलमान ही नहीँ मानते, मुजाहिदीन समझते हो । ऐसे हालात में हम कहा' जाएं?"

"तेरे इस सवाल का जवाब में बाद मे दूगा । कहने के साथ हाजी गल्ला उसके नजदीक आया-“पहते ये बता, मेरा नाम कहां सुना था तूने । ऐसा क्यों कहा कि शायद तू मुझे...

"ऐसा कौनसा हिंदुस्तानी हे हरामजादे जिसने त्तेरा नाम न सुना हो ।" जावेद उसकी बात पूरी होने से पहले ही गुर्रा उठा था…"उस वक्त तूदिल्ली की तिहाढ़ मेँ था जब तेरे गुर्गो ने इंडियन एयरलाइंस कै प्लेन को हाइजैक किया और उसे कंधार ले गए थे । उन्हौने भारत सरकार कै सामन जेल से तेरी रिहाई की मांग रखी । विमान में र्फसे एक सो इक्यावन यात्रियां की खातिर सरकार को त्तेरे गुर्गो की मांग माननी पडी । तुझे छोढ़ दिया गया । उसकै बाद, क्या नहीँ किया तूने ! मुंबइ पर हमले का मास्टर माइंड तू था और तूहीँ था वो, जिसके इशारे पर पूना ब्रेकरी कांड हुआ । तू दर्जंनों इंडियंस का हत्यारा है हाजी गल्ला, तुझे कोई इंडियन माफ नहीं कर सकता !”

"अरे वाह ।” इकरामूद्दीन ब्रोला-"तूतो एक बार फिर इंडियन बन गया । कुछ देर पहले तो कह रहा था कि हिंदुस्तान मेँ तुझे अपने हिंदुस्तानी पर नफरत हो गई थी ।."

"यहां आकर अपने पाकिस्तानी होने पर नफरत ही गई है।"

"तू तो बुरा फंसा यार-न इधर का रहा, न उधर का । "

“यहीँ तो त्रासदी है हम मुसलमानों की।।" जजबाती लहजे में जावेद कहता चला गया…"न हम इधर के हैं, न उधर कै । तुम दोनों मुल्कौ ने मिलकर हमे बगैर मुल्क के नागरिक बना दिया है । वहां हम भरोसे के काबिल नहीं हैँ और यहां मुजाहिदीन हे।"

"च च च...वाकइ, तुझ जसे मुसलमानों के साथ बडी ज्यादती ही रही हे ।" शफ्फ*क शाही ने इस तरह कहा जेसे उस पर तरस खा रहा हो-“पर इस ज्यादती का मतलब ये तो नहीं हे कि तू या तेरा मुजाहिदीन बाप हमें कॉपरेट न करे । हाजी गल्ला ने गारंटी के तोर पर तेरी बहन को एक रात के लिए ही तो मांगा था । इसमें...

“जुबान संभाल कुत्ते. . .जुबान संभालकर बात कर ।”

"वर्ना क्या करेगा ?""

"खोलकर देख मुझें इस कुर्सी से, तेरी जीभ निकालकर ज़मीन पर न डाल दूंतो मेरा नाम जावेद नहीं । ”

“काफी गर्म लड़का है...क्यों हाजी गल्ला।"

"इसकी गर्मी झाढ़ने में पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगेंगे ।'" कहने के साथ वह अपने चेहरे पर कहर लिए उसकी तरफ बढा ही था कि शफ्फाक ने बाजूपकढ़ लिया ।

हाजी गल्ला ने नागवारी वाले अंदाज में शफ्फाक शाही की ओर देखा तो शफ्फाक शाही बौला--"तुममें बस यही एक कमी है हाजी गल्ला, मोके की नजाकत को नहीं समझ पाते ।'"

“क्या कहना चाहते हो कमिश्नर?" वह गुर्राया था ।

“ये लडका सरहद पार से आया है इसलिए, न तुम्हारा शिकार है, न हम पुलिसवालों का । इस पर आर्मी का हक है । वही निपटे इससे । सोचो, कल अगर आर्मी को पता लगा कि सरहद पार से आए एक लड़कै की इंफारपेशन हमने उन्हें नहीं दी तो क्या होगा ?"

“क्या होगा ? ”

"क्या तुम नहीँ जानते कि ऐसे किसी भी शख्स की जानकारी आर्मी को न देना कानूनन जुर्म है ओर ऐसा करने वाले पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाता है?"

"सुना तो है ऐसे कानून के बारे में ।"

"तो सोचो, अगर हम तीनों मुल्क से गद्दारी करने के मुकदमे मेँ र्फस गए तो क्या होगा । आर्मी हमारी हस्ती मिटा डालेगी जबकि इसके ठीक उलट, अगर हम इसे आर्मी कै हवाले कर देते हें तो आर्मी हमें सम्मानित करेगी । हो सकता हे मुल्क की खास खिदमत करने के तमगे भी दिए जाएं ।"

इकरामुद् शदीन बोला'"बात तो तुम्हारी ठीक है एसएसपी मगर यदि इसने आर्मी क्रो हमारे इरादों कै बारे में बता दिया तो ?"

“कोइ फर्क नहीँ पड़ेगा ।'"

"मतलब ? ”

“उसे समझने की कोशिश मत करो, बस इतना समझो कि इस लढ़कै की शक्ल में हमारे हाथ ऐसी बटेर लग गई है जिसे आर्मी को सौंपकर हम सारे मुल्क की वाहवाही लूट सकत्ते हैं । इस बात क्रो मैं इसकै घर पर ही, इसके मुहं से निकले चंद अलफाजों को सुनकर ही समझ गया था । तभी तो तुम्हारी इच्छा न होने के बावजूद गारंटी के तोर पर लडकी जगह इसे लाया । लडकी कहा जा रही है , वह तो तुम्हें मिल ही जाएगी पर ये निकल जाता तो हमारे हाथ से मुल्क की खास खिदमत करने का सुनहरा मौका निकल जाता । "'

"मैँ अब भी नहीं समझ पा रहा हूंकि तुम...

"'समझोगे...वक्त आएगा तो खुद समझ जाओगे ।” कहने कै बाद शपफाक शाही ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर कोइ नंबर लगाया और संपर्क स्थापित होते ही बोला…"कराची का एसएसपी शफ्फाक शाही बोल रहा हू ब्रिगेडियर साहब ।'"

एक भारी भरकम आवाज उभरी-"बोलो ।"

"मेरे हाथ सरहद पार से आया एक लड़का लगा है ।"

"सरहद पार से आया लडका !'" आवाज़ मेँ ऐसी खनक पैदा हो गई जैसे उसे पता लगा हौ कि उसकी लाटरी निक्ल आईं है…“कहां है? क्या नाम हे उसका ?”

"मेरे आफिस में है, नाम जावेद बताता है।"

"मैं वहीँ आ रहा हू' ।” कहकर संबंध विच्छेद कर दिया गया ।

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गुलहसन था उसका नाम । ब्रिगेडियर गुलहसन । कद…पांच ग्यारह कें आसपास ।

रंग-गोरां । पेट अंदर, सीना बाहर । टिंडे जैसी नाक के नीचे हिटलर-कट मूंछें । जैसे ही वह कमरे में दाखिल हुआ…इकरानुद्दीन, शाही और हाजी गल्ला सम्मान दर्शात्ते हुए थोडा पीछे हट गए । जावेद को समझते देर न लगी कि वह उन सबसे "बड़ा' हे । उसकी आंखें हाजी गल्ला पर केंद्रित हो गई । मुह से काफी कडा लहजा निकला था-"तुम यहां क्या कर रहे हो?"

"इसकी मदद से ही इसे पकडा जा सका है ब्रिगेडियर साहब ।" शफ्फाक शाही ने कुर्सी कें साथ बंधे जावेद की तरफ़ इशारा करने कै बाद कहा था…“एमपी साहब और हाजी गल्ला न हाते तो...

"फिर भी । " गुलहसन ने उसकी बात काटी-“हम लोगों के साथ इसका यूं खुलेआम नज़र आना मुनासिब नहीं है । मीडिया को भनक लग गइ तो स्कैंडल खडा हो जाएगा । बहरहाल, आन रिकाड ये पाकिस्तान मेँ नहीं है ।'"

"इस बात का हमने पूरा ख्याल रखा हैँ ब्रिगेडियर साहब ।'" एक बार फिर शफ्फाक शाही ने ही कहा…"हमें मालूम है कि मीडिया को खुद से दूर रखनाहैं ।”

गुलहसन की आंखें जावेद पर जम गई । बोला…"नई उम्र का लडका है । इधर कैसे आ गया ?"

शफ्फाक शाही ने बताने के लिए मुंह खोला ही था कि जावेद बोला…"मैं आपको सबकुछ बता दूंगा ब्रिगेडियर साहब मगर.....!"

“मगर ? "

“अकेले में बात करनी चाहता हू ।”

“क्यों ?"

“मुझें कुछ ऐसा भी बताना है जो इन्हें नहीँ बता सकता था ।"" कहने के साथ जावेद ने उन तीनों की तरफ देखा ।

इस बार गुलहसन कुछ न बोला ।

बस घूरता रहा जावेद को ।

इसका लाभ उठाते शफ्फाक शाही ने कहा-"उससे पहले आप हमारी बात सुन ले ।"

"बिल्कुल नहीँ । " जावेद बोला-"उससे पहले मुझें एकांत में आपसे कुछ कहना है ब्रिगेडियर साहब, प्लीज...मेरी ये रिक्वेस्ट मान लीजिए ।"

इस बार हाजी गल्ला ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला था परंतु उससे आवाज़ निकलने से पहले ही गुलहसन ने आडर देने वाले अंदाज में कहा…"तुम लोग बाहर वाले कमरे मे जाओ ।""

"आपको पहले हमारी बात...

“एसएसपी ।"" हाजी गल्ला की बात काटकर गुलहसन एक खास इशारे कै साथ शफ्फाक शाही से मुखातिब हुआ था…“इसे समझाओ कि आर्मी वालों को हुक्मउदूली पसंद नहीं होती ।”

हाजी गल्ला ने पुन: कुछ कहना चाहा लेकिन शफ्फाक शाही ने उसे रोक दिया । आंख के इशारे से उन्म्हें यह समझाने कै बाद कमरे से वाहर ले गया कि इस वक्त यहीँ मुनासिब है ।

गुलहसन ने जावेद से कहा… "अब बोलो।”

“कमरा बंद कर लीजिए सर ।" जावेद ने रिक्वेस्ट करने वाले लहजे में कहा था…"प्लीज ।”

कुछ देर तक गुलहसन सख्त अंदाज़ में उसे घूरता रहा, जेसे सोच रहा हो कि जावेद का कहा माने या नहीं मगर फिर दरवाजे की तरफ बढा । दरवाजा बंद करने के बाद वापस उसके करीब पहुचा ही था कि जावेद चालूहो गया…"मैँ पहलगाम में रहता था सर जबकि मेरे मां बाप और छोटी बहन इधर, रशीदपुर मे हे।""

"तुम वहा तो परिवार यहाँ क्यों ?'

“मेरे अब्बा और चाचा के विचारों में फ़र्क था ।" जावेद जल्दी जल्दी बताता चला गया…"अब्बा के मुताबिक मुसलमान होने कै नाते उनका मुल्क पाकिस्तान था इसलिए वे यहां आ गए जबकि चाचा को यह ज़रूरी न लगा । उस वक्त मुझ भी जरूरी न लगा था इसलिए चाचा के साथ वहीँ रह गया । बाद में मुझे पुलिस में नौकरी मिल गइ । मैं पूरी इमानदारी से उस मुल्क की खिदमत कर रहा था जिसे आंखें खुलने से पहले तक अपना मुल्क समझता था ।""

"आंखें खुलने से मतलब ?”

"हिदू अफसरों ने मुझ पर कभी यकीन नहीं किया । कारण सिर्फ यह था कि मैं मुसलमान था । हमेशा शक की नजरों से देखा मुझे, हमेशा यह समझा कि मेरे दिल में पाकिस्तान बसता होगा । हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्होंने मुझे आतंकी साबित कर दिया आर फासी पर चढाने की तैयारी कर ली । तब मेरी समझ में आया कि अब्बा ठीक कहत थे । मुसलमानो का मुल्क पाकिस्तान ही है और मै किसी तरह उनकी कैद से फरार होकर यहा आ गया ।""

"सारा किस्सा डिटेल मेँ बताओ, क्या केसे हुआ ? सरहद कैसे पार की तुमने ? इधर कैसे पहुचे ?”

जावेद ने बता दिया मगर अर्जुन पांडे और देवांश कै किरदार को छुपा गया । कैद से फरार होने की उसने कोइ और कहानी गढ़कर सुना दी थी । गुलहसन खामोश ही था कि जावेद कहता चला गया-"लेकिन सर, यहां पहुंचकर मेंने जो देखा और अब तक जो भोगा है उससे मुझे बहुत ठेस पहुची हे । मुझे लगा…जिसे अपना मुल्क समझकर आया था, वह भी मेरा मुल्क नहीँ ।"

"ऐसा तुमने क्या देखा और भोगा ?"

"करांची में मेरे अब्बा की एक ज़मीन हे । आज कै बाजार भाव के मुताबिक उसकी कीमत सो करोड हे लेकिन इकरामुद्दीन, हाजी गल्ला और शफ्फाक शाही अपनी ताकत केे दमपर उसे सिफ बीस करोढ़ मेँ हथियाना चाहते हैँ । इनसे डरे हुए अब्बा ने सब कुछ कबूल भी कर लिया था मगर इनकी नजर मेरी बहन पर भी हे ।""

"ओह।।"

"मुझे इंसाफ दिलाइए ब्रिगेडियर साहब, मैँने सुना हे कि आर्मी के लोग इंसाफ पसंद होते हैं । मेरे दिल में इस बात को जमने दीजिए कि पाकिस्तान मेरा अपना मुल्क है और यहां मेरे और मेरे परिवार कें साथ इतना बडा जुल्म नहीं हो सकता ।"

"वो कौनसी बात थी जो उन्हें नहीं, सिर्फ मुझे बता सकते थे ।"

"मैें उनकी शिकायत उनके सामने नहीं कर सकता था ।"

“उनकी करतूत कै बारे मेँ भी तफ्सील से बताओ ।"

जावेद ने वह सब बता दिया जो हुआ था । सुनने के बाद वह बोला…“उफ्फ इतने गंदे लोग हैं ये !"

"ऐसे लोग मुल्क को बदनाम करते हैँ ।”

"कह तो तुम ठीक ही रहे हो । "

"क्या आप मुझे इंसाफ दिलाएंगे सर?"

“क्यों नहीं ? तुमने ठीक सुना आर्मी के लोग इंसाफ पसंद होते हैं । मगर बदले में तुम्हें भी कुछ करना होगा ।"'

“आप जो कहेंगे, मै करू'गा ।'"

“आर्मी क्रोट को हकीकत बतानी होगी ।”

"कोर्ट क्रो क्या, मैें किसी को भी उस सारे जुल्म के बारे मेँ बताने क्रो तैयार हू जो हिंदुस्तान मे मुझ पर हुआ ।"'

"मैं उसकी नहीं, हकीकत बताने की बात कर रहा हू ।"

"हकीकत वही तो हे सर जो मेंने आपको ..

“हकीकत वो नहीं है ।"'

"ज जी?” जावेद चकराया ।

गलुहसन उस पर झुका ओर अपने हरेक शब्द को चबाता हुआ गुर्राया-"हकीकत ये है कि तुम इंडियन सीक्रेट सर्विस कै एजेंट हो। "

"क्या ।।।'" एक ही झटके में जावेद जैसे आसामान से ज़मीन पर आ गिरा-"य ये क्या कह रहे हैँ आप ?'

"वही, जो हकीकत है ।'"

“नहीं सर ।'" वह चीख पड़ा-“यह सरासर झूठ है ।"'

“मुझे बेवकूफ समझते हो?”

"ज-जी ? "

"क्या मैें नहीं जानता कि इंडियन सीक्रेट सर्विस आए दिन हमारे मुल्क के खिलाफ नई नई साजिशें रचती रहती है ! नईं-नईं कहानियां गढ़कर अपने जासूस पाकिस्तान में भेजती रहती हैँ । तुम भी उन्हीं में से एक हो । हमें बेवकूफ बनाकर यहां स्थापित हो जाने की यह चाल नहीँ चलेगी मिस्टर क्योकि हम जानते हैं, एक बार जावेद कै नाम से स्थापित होने कं बाद तुम इस मुल्क का कितना नुकसान करोगे । अभी तो ये भी पक्का नहीं है कि तुम्हारा नाम जावेद ही है ।"'

“य ये आप क्या कहे चले जा रहे हैँ सर ! सरासर धोखा हो रहा है आपको । इंडियन सीक्रेट सर्विस से मेरा कोई संबंध नहीँ है, मेरा नाम जावेद ही हे और मै इंडियन पुलिस में इंस्पेक्टर था । मेरे चाचा, नौशाद अंसारी वहा के ला मिनिस्टर हैं । आप जैसे चाहें जांच करां सकते हें । मेरा और कोई परिचय नहीं है ।”

"मैं यह भी जानता हूं कि जब किसी पहचान और कहानी कै साथ उधर से किसी जासूस क्रो इधर भेजा जाता है तो वह नाम और कहानी इतनी पुख्ता होती हे कि किसी भी जांच में झूठी साबित नहीं की जा सकती । बडा सालिड गेम खेलते हैँ वे लोग । "

"क-कमाल की बात कर रहे हैं आप !” मारे हेरत के जावेद का बुरा हाल हो गया था…"मुझे इंडियन सीक्रेंट एजेंट बना रहे हो ।”

"बना नहीं रहे, तुम हो सीक्रेप एजेंट । " गुलहसन ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकड लिया था…“हमने तो सिर्फ तुम्हें पकड़ा है ओर यह बात तुम्हें आर्मी कोट कै सामने कबूल करनी पडेगी ।"

"हरगिज नहीं ।'"

"तुम्हारे कथित अब्बा की जमीन हड़प ली जाए तब भी नहीँ ?? तुम्हारी कथित बहन के साथ रेप कर दिया जाए तब भी नहीं ?"

जावेद ऐसा हकबक्राया था कि अभी तक अपने होशो हवास दुरुस्त नहीं कर पा रहा था ।

कोशिश के बावजूद एक लफ्ज न निकल सका मुंह से ।

अपने चेहरे पर झुके गुलहसन के तमतमाए चेहरे क्रो देखता रह गया वह ।

जबकि गुलहसन कहे चला रहा था-“तब तो साबित ही हो जाएगा कि सुरैया तेरी बहन नहीं है क्योकि कोइ भाई अपनी बहन के साथ रेप नहीं होने दे सकता । ”

"मैं समझ गया ब्रिगेडियर साहब । "' जावेद कह उठा-"समझ गया कि मेरी मज़बूरी का फायदा उठाकर तुम कौनसा खेल खेलना चाहते हो । तुम भी गजेंद्र चौधरी, शिंघालकर शर्मा ओर अविनाश अग्रवाल से अलग नहीं हो । उनका पेशा अपनी बहादुरी की झूठी कहानियां गढ़कर अफसरो की नजरों में चढना था, तुम भी उसी फिराक में हो । तुम भी एक इंडियन सीक्रट एजेंट' को गिरफ्तार करके अपने अफसरो की वाहवाही लूटना चाहते हो । अपनी सर्विस वुक में तमगों की बढोत्तरी कराना चाहत हो ।"

"तूतो ज़रूरत से ज्यादा समझदार निकला यार, इतनी जल्दी मेरा पूरा प्लान समझ गया ! इतना समझदार है तो जल्दी से यह भी समझ जा कि अब तेर पास कवल दो रास्ते हैं ।"

“दो रास्ते ?'

“पहला, मेरी बात न मानना । अंजाम-न केवल ज़मीन तेरे बाप के हाथ से जाती रहेगी बल्कि वे तीनों तेरी बहन के साथ रेप भी करेंगे । मुकम्मल परिवार बरबाद हो जाएगा तेरा । दूसरा, मेरी बात मान लेना । अंजाम-मैं वेसा कुछ भी नहीं होने दूंगा । तेरा पूरा परिवार महफूज रहेगा, बस तुझे इंडियन सीक्रेट एजेंट बनना होगा।'"

जी तो बहुत चाहा जावेद का. . .जी तो बहुत चाहा कि हलक फाड़ फाड़कर चीख पड़े ।

चीख चीखकर कहे कि मैँ तेरी लाश बिछा दूंगा मगर ठीक उसी समय उसका विवेक काम कर गया ।

विवेक ने फुसफुसाकर कान में कहा या…'जावेद, इसे अपने तेवर दिखा कर कुछ नहीं कर सकता क्योकि सारे हालात इसके काबू में हैं । वही होगा जो ये चाहेगा ।

अत: होशियारी से काम ले ।

जो कुछ वह करने वाले हे उसके मुकाबले खुद क्रो इंडियन सीक्रेट एजेंट घोषित हो जाने देना सस्ता सौदा है ।'

सो, बोला“मैँ तुम्हारी बात मान लू तो. ..

"वादा रहा लड़कै. ..वादा रहा।” उसकी बात काटकर गुलहसन कहता चला गया…"सारी दुनिया जानती हे कि ब्रिगेडियर गुलहसन अपने वादे का पक्का है । सुरैया की तो बात ही दूर, तेरे घर की तरफ तक उनमें से काई टेढी नज़र से नहीं देखगा ।"

"मैं तयार हूं ।"

ब्रिगडियर गुलहसन ने खुश होकर कहा…"मुझे तो लगा था कि इस काम के लिए तैयार करने हेतु तुझे टार्चर करना पडेगा मगर तूतो वाकइ ज़रूरत से ज्यादा समझदार निकला लड़के । बहुत जल्दी समझ गया कि तेरे पास अन्य कोइ रास्ता नहीं हे ।"

जावेद का दिमाग भले ही चाहे जितना सनसना रहा था लकिन चुप रह गया ।

खामोशी के साथ उसे देखता रहा ।

जबकि गुटलहसन ने आगे बढकर न केवल दरवाजा खोल दिया बल्कि उन तीनां को अंदर बुलाकर कहा-"कान खोलकर सुन लो, आज के वाद शौकत की जमीन हढ़पने का ख्याल दिमाग से निकाल दोगे आर सुरैया की तरफ भूलकर भी बुरी नजरों से नहीँ देखोगे ।"

हाजी गल्ला का चेहरा तमतमा उठा ।

वह कुछ कहने वाला था कि गुलहसन सख्त लहजे में बोला…“इसे एक बार फिर समझाओ एसएसपी कि आर्मी बालों को हुक्मउदूली पसंद नहीं होती ।"

शफ्फाक शाही ने आंख कै इशारे स हाजी गल्ला को खापाश रहने के लिए कहा ।

हाजी गल्ला खामोश भले ही रह गया हो मगर उसके चेहरे पर चलतीं बगावत की आंधी साफ नजर आ रही थी ।

गुलहसन ने जावेद से कहा-"हमारे हुक्म के बाद इनमें से किसी की भी हिम्मत, ज़रा भी हिमाकत करने की नहीं है ।'"

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वह रात शौकत के परिवार पर ही नहीं, गिरधर और आरती पर भी कहर बनकर टूटी थी । उनमें से कोई भी नहीँ सो पाया था ।

सबको यहीँ चित्ता सताती रही कि जालिमों कै चंगुल में र्फसे जावेद पर क्या गुजर रही होगी?

क्या वे जावेद की हकीकत. . .यानी यह जान गए होंगे कि वह सरहद कै पार से इधर आया है ।।

अगर हां, तो वे उसके साथ क्या सलूक कर रहे होंगे ? सबकी जुबानो पर और दिमागों में केवल सवाल ही सवाल थे, जवाब किसी पर भी नहीँ ।

शौकत अंसारी कइ बार बड़बड़ा चुका था-"कितना कहा था डधे से कि किसी भी बाहरी शख्स के सामने नहीँ आना है, पर वह नहीँ माना । और फिर, आया भी तो उन लोगों कै सामन जो पहले ही हमारे पीछे पड़े है ।'"

"सोच तो सही शौकत । '" हर बार गिरधर ने यहीँ कहा--'"एक भाई उन हालात में खुद को कैस रोक सकता था जो उन जालिमों ने क्रियेट कर दिए थे । वे उसकी बहन पर हाथ डाल रहे थे ।”

"फिर थी, उसने ऐसे अलफाज़ बोलने की बेवकूफी क्यों की जिनसे उन्हें इल्म हो सकता है कि वह सरहद पार से आया है ?“

"हा" । ये उसकी गलती ज़रूरी थी।'"

“पता नहीं अब क्या होगा ?”

गिरधर ने शौकत को सांत्वना देने की मंशा से कहा था…" तू डर क्यों रहा है यार, कुछ नहीं होगा । जावेद को वे गारंटी के तोर पर ही तो ले गए हें । उन्हें ज़मीन चाहिए । उसे तूकल बैंक में उनके हवाले कर ही देगा । कागज हाथ मेँ आते ही वे जावेद को हमेँ सोंप देंगें ।”

“जावेद की हकीकत जानने कै बावजूद ?'

" नहीँ छोहंगे तो हम कहेगे-हमेँ वीस करोड़ भी नहीं चाहिए । जमीन मुफ्त में ले लें । जावेद को छोड दें । उसके राज क्रो राज रहने दे। वे लालची लाग हें, तेयार हो जाएंगे । बीस करोढ़ कम नहीं होते लकिन हमारे लिए हमारा बेटा बीस करोड से बहुत ज्यादा का ।”

"तुम ठीक से समझ नहीं रहे गिरधर, अब मामला सिर्फ ज़मीन का नहीं रह गया है । दो तरफ से फंस गए हैँ हम । एक, बे जावेद की हकीकत जान गए होंगे । दो, हाजी गल्ला की गंदी नज़र सुरैया पर हे । इसलिए, मुझे शक है कि वे बेंक में नहीं बल्कि यहां आएंगे । इस कंडीशन में हमारी प्राथमिकता सुरैया को बचाना होनी चाहिए । समझ ' नहीं आ रहा, ऐसा कैसे करें ?"

सब चुप रह गए, जेसे सबके दिमाग कुंद हो गए हों ।

सुबह के पांच बजे शौकत ने गिरधर से कहा…"तुम आरती वेटी को लेकर उधर चले जाओ...थोडी नीद ले लो ।""

"मैं भी यहीँ सोच रहा था ।"" गिरधर 'बोला-"थोडी थोडी नीद सभी क्रो ले लेनी चाहिए । तुम लोग भी सो लो । बहरहाल, कल जैसे भी हालात होंगे, निपटना तो होगा ही ।"

"एक बात ध्यान रखना गिरधर, पालिसी वहीँ ठीक है जिस पर हमने कल अमल किया । इधर चाहे जो होता रहे, तुम और आरती बिटिया सामने नहीं आओगे ।”

"नहीँ शौकत, अब ऐसा नहीं हो सकता यार, मैं तो कल भी आने वाला था ।” गिरधर कहता चला गया-"तू तो जानता हे कि मै अपनी हाकी से क्या क्या करतब दिखा सकता हू । अगर उन्होन सीमाएं तोडी तो एक एक साले क्रो सबक सिखा दूंगा ।"

शौकत के होठों पर फीकी मुस्कान उभरी-“मैं तेरे ज़जबातो की कद्र करता हूदोस्त मगर इस वक्त हमेँ दिल से नहीं दिमाग से काम लेना चाहिए । इसमें शक नहीं कि तुम अपनी हॉकी से वहुत कुछ कर सकते हों - गोलियां के सामने हाकी की क्या बिसात है ! उल्टे हमारी तरह तुम भी उनके कहर का शिकार हो जाओगे । अभी तक तो नजर केवल सुरैया पर हे, आरती बेटी को भी उसी नजर से देख लिया तो क्या कर सकेंगे हम?"

शौकत ने जो कहा था उसका मर्म समझते ही गिरधर के तिरपन कांप गए ।

मुंह से बोल न फूट सका ।

जबकि अचानक किबला ने कहा था…"आप लोग कहे तो में एक मशविरा दूं?”

"हां हा किबला, बोलो ।”

"सुरैया बेटी को भी उधर ही भेज देना चाहिए और इस बात पर सख्ती से अमल करना चाहिए कि भले ही इधर चाहे जो होता रहे, उधर से कोइ इधर नहीं आएगा।"

"वे सुरैया के बारे में पूछेंगे तो हम क्या कहेंगे?"

"कह देंग इस्लामाबाद ग*ई हे, अपने मामा कै यहां ।"

“वे यकीनन नहीं मानेंगे ।”

"न मानें, मगर हम अपनी बात पर अड़े रहेंगे ओर फिर...

“हा" हां, बोलो । रुक क्यों गए?"

"ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि सुंरैया की तलाश में वे सारे घर को खंगाल लेंगे लेकिन जब नहीं मिलेगी तो मानना पड़ेगा कि ये यहा नहीं हे । उस हालत में उनके दिमाग में यह बात आएगी कि उनके खौफ के कारण हमने जानबूझकर सुरैया क्रो मामा के घर भेज दिया है । पड़ोस का ख्याल नहीं आएगा उनके दिमाग मेँ ।"

"किबला ठीक कह रहा हैं ।" गिरधर बोला…"इस तरह हम सुरैया क्रो उनकी गंदी नज़रों से बचाने में सफ़ल हो जाएंगे ।""

"नहीं अब्बू-अम्मी ।" सुरैया ने कहा…“मै आप लागों क्रो यहा छोड़कर चाचा के घर नहीं जाऊंगी ।"

"ये बेवकूफी होगी बेटी ।” शौकत बोला…"जेसा कि पहले ही कह चुका हुं, इस वक्त हमेँ दिल से नहीँ दिमाग से काम लेना चाहिए हम लोगो का क्या बिगाड़ लेंगे वे ! तुम महफूज रहनी चाहियो ।""

खालिदा और गिरधर ने भी उसका समर्थन किया मगर सुरैया न मानी । खालिदा से लिपटकर रोने लगी । बार बार कहने लगी कि वह उन्हें छोडकर नहीं जाएगी ।

अंतत: शोकत ने कहा… '" अच्छा ठीक हे, तूनहीं मानती तो यहीं रह । तुम आरती को साथ लेकर जाओ गिरधर । " कहने के साथ ही उसने गिरधर को ऐसा इशारा किया था जिसका मतलब था…'"फिलहाल जाओ, सुबह तक में सुरैया को समझा बुझाकर उधर भेज दूगा ।"

गिरधर ने उसके इशारे को समझा और आरती के साथ चला गया ।

उसके वाद-शौकत, खालिदा और किबला का जैसे एक ही मिशन था-सुरेया को गिरधर के घर जाने को तेयार करना । ऊंच नीच की बहुत सारी बातें समझानी पडी उसे । सात बजे के करीब उन्हें अपने मिशन में कामयाबी मिली ओर उस वक्त वे उसे गिरधर के घर भेजने की तैयारी कर ही रहे थे कि ढुक्रा हुआ मनगेट खुला ।

उसकी आवाज ने चारों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था । और. .. दरवाज़े पर जो शख्स खडा नज़र आया उसे सुरैया, खालिदा और किवला नहीँ पहचानते थे जबकि शौकत की रूह फना हो गइ ।

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वह कटारीदार मूंछीं बाला थानेदार था ।

थानेदार को अपने दरवाजे पर खड़ा देखकर पलक झपकते ही शौकत के समूचे जिस्म ने पसीना उगल दिया था । हलक से हकलाहट भरी आवाज़ निकली-"त तुम यहां ?"

"तुम्हें कोइ एतराज ?” कहता हुआ वह लॉबी में आ गया और उसके पीछे-पीछे लाबी में दाखिल हुए ऐसे चार शख्स जिनके जिस्मों पर पुलिस की वर्दी थी !

"ए एतराज तो कुछ नहीं लेकिन मैं सोच भी नहीं सकता था कि तुम यहां आ सकते हो । वह भी इतनी सुबह. ..क्यों आए ?"

"एसएसपी साहब का हुक्म हुआ, चला आया ।"

खालिदा, सुंरैया और किबला केवल असमंजस में थे जबकि शौकत का चेहरा ऐसा नजर आने लगा जैसे उससे खून की हर बूंद निचोढ़ ली गइ हो । मुंह से निकला-"त तुम लोगों को इतनी सुबह यहा आने का हुक्म एसएसपी साहब ने दिया है ?"

"नहीं तो मेरे दिमाग में क्या फोडा निकला था कि अपनी नींद खराब करता ! मैं नौ बजे सोकर उठने वाला आदमी, आज़ साढे पांच बजे उठा क्यौकि एसएसपी साहब का हुक्म था, ठीक सात बजे तुम फोर्स के साथ शोकत अंसारी साहब के घर होने चाहिए।"

"पर क्यों ?? उन्होंने तुम्हें यहां क्यों भेजा है ?”

"तुम लोगों की हिफाजत की खातिर ।”

“हिफाजत की खातिर ?"

“जो कंपलेंट तुमने मुझसे की थी, वहीँ उनसे की होगी । उन्होंने कहा…शौकत अंसारी साहब के घर पर डेरा डाल दो । कोई हाजी गल्ला, कोइ इकरामुदृदीन उसे परशान न कर पाए ।"

"ए एसएसपी साहब ने ये कहा?"

“बिल्कुल यहीँ कहा, तभी तो हम यहां आए हैं ।" उससे कहने के बाद वह सिपाहियों से बोला…“तुम बाहर जाओ रे, दो मकान के अगले हिस्से में और दो पिछले हिंस्से में तेनात हो जाओ । मुस्तेद रहना । ज़रा भी लापरवाही बर्दाश्त न होगी । न क्रोइ मकान के अंदर घुस सकै, न यहां से कोई बाहर निकल सके । खेर, उसके लिए तो मैं ही काफी हू । बहरहाल, मेरी तेनाती इसी लाॉबी मे होगी ।"

चारों सिपाही बगैर कुछ कहे बाहर निकल गए ।

थानेदार इस तरह साफे पर पसर गया जेसे उसका अपना घर हो । जेब से अद्धा निकालकर मेज पर रखता बोला…"माफ करना अंसारी साहब इसे पिए वगेर मै आधे घंटे से ज्यादा नहीं रह सकता । वेसे आप फिक्र न करें, मैं किसी क्रो कोइ परेशानी नहीं होने दूगा । बिटिया, एक कांच का गिलास, जग पें पानी और घर में थोड़ा सा नमकीन पड़ा हो तो ले आ । नमकीन न हो तो नमक चलेगा ।"

सुरैया सहित सभी सन्नाए से खडे रह गए ये ।

शौकत समझ चुका था कि सुबह होते ही एक तरह से उन्हें उन्हीं के घर में कैद कर लिया गया था और इन हालात में वह कुछ नहीं कर सकता था । अब तो सुरेया को गिरधर के घर भी नहीं भेजा जा सकता था । छत के रास्ते से भी नहीँ क्योंकि थानेदार जान चुका था कि वह यहीँ है । वह किवला से यह कहने पर मजबूर हो गया था…"जो सामान थानेदार साहब मांग रहे हैं, वो ले आ ।”

कुछ देर बाद थानेदार की 'दुकान' ड्राइंगरूम में ही सज गई ।

शौकत की हालत खराब थी । हालांकि उसे इल्म हो रहा था कि वे अब बैंक में नहीँ बल्कि यहीं आएंगें फिर भी, वैंक जाकर इंतजार करना चाहता था ताकि

आएं तो वह उन्हें मिल जाए....

और जमीन कै कागज देकर वहीँ पीछा छुडा ले । कम से कम यहां आने का उन्हें यह बहाना तो न मिले कि वह बैंक में न पिला ।

वैसे भी..कागज वाकई बैंक कै लाकर मेँ थे । उन्हें तो वहां से निकालना ही था और ये काम उसके अलावा और कोइ नहीं कर सकता था मगर...यहां से जाए कैसे ? यहां तो ये शेतान जमा हें ।

साढे आठ कै करीब उसने कहा भी…"मुझे बैंक जाना है ।”

“हा', बताया तो था एसएसपी साहब ने कि तुम्हें बैंक जाना हो सकता हे ।” वह बोला…“जाओ, ज़रूर जाओ । बहरहाल डयूटी, डयूटी होती है । बही तो मैं भी निभा रहा हू ।”

"पर आप... "मै क्या ?'

"क्या आप घर कै बाहर नहीं बैठ सकते ? "

"ओह । अच्छा ! ये डर सता रहा हे तुम्हें !"' वह बड़े ही वाहियात तरीके से ह'सा था…“तुम ये सोच रहे हो कि तुम्हारे निकलते ही मैं तुम्हारी बीबी और बेटी को गटक जाऊंगा !"'

"न नहीं ।” उसने हकबकाकर कहा-"ऐसी बात नहीं है ।"

"ऐसी बात नहीं है तो फिर कैसी बात है?” उसने अपनी सुर्ख आंखें शौकत की आंखों में डाल दी थीं…"मेरे यहीँ बैठने में तुम्हें और क्या एतराज हो सकता है?”

शौकत कै मुह में मानो जुबान ही न रही थी।

"वैसे मेँ दूध का धुला नहीं शौकत मियां मगर तुम घबराओ मत ।” वहीँ बोला था…"इसलिए मत घबराओ क्योकि अगर मैं वेसा कुछ करने की पोजीशन मे होता जे तुम सोच रहे हो तो तुम्हारे सामने ही कर डालता । मेरा दावा हे कि तुम मुझे रोक नहीं सकते थे मगर, जेसा कि फरमा चुका हू उस पोजीशन में इसलिए नहीं हूक्योकिं हमारे डिपार्टमेंट में अफसरों के हिस्से की मलाई मातहत नहीं चाट सकते । वे मातहत को चटट कर जाते हैं ।"

जो कुछ उसने कहा था, उसे समझते ही शौकत कें समूचे जिस्म में खौफ की चींटियाँ सी रेंग गई थीं ।

एक बार फिर उस पर कुछ कहते न बन पड़ा ।

पुन: थानेदार ने ही कहा…"वेसे मैंने तुम्हें आश्वस्त करने की पूरी कोशिश की है, इसके बाद भी यदि तुम्हारा दिल बैंक न जाने को कर रहा हो तो मत जाओ । चौकीदारी करते रहो अपनी बीबी और बेटी की । बहरहाल मैँ यहां से नहीं सकता क्योकि एसएसपी साहब द्वारा मेरी डयूटी यहीं लगाई गइ है और नौकरी मुझे प्यारी हे ।"

कहने के लिए कुछ भी तो नहीं बचा था शौकत कै पास ।

बैंक जाए बगेर काम नहीं हो सकता था ।

जाना पड़ा ।

वहां पहुचते ही सबसे पहले लाकर से कागज निकाले । उसी समय बेक में होती एक खास चर्चा सुनी । उसके कानों में ये शब्द पड़े कि करांची मेँ कोई इंडियन जासूस पकडा गया है, मगर उस शख्स क्रो भला ऐसी किसी खबर में क्या दिलचस्पी हो सकती थी जिसका परिवार खतरे में हो ! उसका तो जी चाह रहा था, तुरंत छुटटी लेकर घर पहुच जाए मगर ऐसा इस उम्मीद ने न करने दिया कि कहीँ वे यहीँ न आ जाएं । परंतु पांच बजे तक भी वे न आए ।

वही जानता था कि यह वक्त उसने बैंक में कैसे गुजारा था । ये बात उसके जेहन में कई बार आईं थी कि जो हालात घर में हें उनसे बचने कै लिए उसे कुछ करना चाहिए । मगर क्या ???

लाख दिमाग घुमाने के बबाजूद कुछ न सूझा क्योंकि परिवार को गुंडों ने बंधक बनाया होता तो पुलिस के पास जा सकता था मगर जब एसएसपी ने ही ऐसा किया हुआ हो तो कहां जाए ?

छ: बजे घर पहु'चा ।

यह देखकर राहत मिली कि सबकुछ बैसा ही था जेसा छोढ़कर गया था । नशे में डूबे थानेदार ने तो कह भी दिया…“अपनी बीवी और बेटी क्रो अच्छी तरह चैक कर लो शौकत मियां, तसल्ली कर लो कि सबकुछ साबुत है या नहीँ और फिर तहेदिल से इस बात को महसूस करो कि मैंने जो कहा था, दुरुस्त कहा था ।"'

शौकत के मुंह में अब भी जुबान न थी ।

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सुबह कै ठीक दस बजे ब्रिगेडियर गुलहसन ने जावेद को आर्मी कोर्ट में पेश किया । इकरामूद्दीन ओर शफ्फाक शाही साथ थे मगर हाजी गल्ला का कहीँ पता न था ।

कोर्ट में आर्मी कें वकील ने जज से कहा… " मीलार्ड जिस शख्स को आपके सामने पेश किया गया है, उसे पिछली रात माननीय एमपी इकरामुद्दीन और एसएसपी शफ्फाक शाही की हेल्प से ब्रिगेडियर गुलहसन ने करांची के बाहरी इलाके से दबोचा है । पूछताछ मेँ पता लगा हे कि वे शख्स इंडियन सीक्रेट सर्विस का खतरनाक जासूस हे और इसे विध्वंसक कार्यो में प्रशिक्षित करके हिंदुस्तान की तरफ से पाकिस्तान मे स्थापित करने के मकसद से भेजा गया है । इसके पास से घातक गोला बारुद भी बरामद हुआ है । ये अवेध तरीके से बार्डर् क्रास करके बहुत सी पहचान के साथ हमारे मुल्क में घुसा हे । अपना नाम इसने जावेद अंसारी बताया है और इसके मां…बाप औंर बहन कराची के गांव रशीदपुर में रह्ते हें । "

"इसका क्या मतलब हुआ ? ” ज़ज़ ने सबाल उठाया… "यदि ये इंडियन है तो इसका परिवार रशीदपुर में कैसे रहता हैं ?"

"इस...ओर कोर्ट के अगले सभी सवालों कै जवाब यदि ये खुद दे तो मुनासिब होगा मीलार्ड ।”

जज ने जावेद से पूछा-"क्या तुम्हें कुछ कहना हे यंगमेन ?'

“जो आप पूछंगे, मैँ उसका ज़वाब दूंगा ।” जावेद ने कहा ।

"तुम किसी दबाव मेँ तो नहीं हो?"

"नहीं । "

“क्या तुम पर लगाया गया इल्जाम सच है ?"

“जी हां ।'" जावेद ने केवल यहीँ नहीं कहा बल्कि जज के हर सवाल का वहीँ जवाब देता चला गया जो गुलहसन ने उसे समझाया था ।

कोर्ट को वही कहानी सुनाइ जो गुलहसन ने गढी थी क्योकि अपने परिवार को बचाने का इसके अलावा कोइ चारा न था।

पूरी सुनवाई के बाद ज़ज़ ने कहा… “अभी केवल अभियुक्त के बयान हुए हैं । कोर्ट इसके मां-बाप के बयान भी सुनना चाहेगी। ”

"अगली तारीख पर उन्हें भी पेश कर दिया जाएगा मीलार्ड ।'"

"उन्हें आने वाले मंडे को पेश किया जाए।“

“जो हुक्म मीलार्ड, मगर...

“क्या कहना चाहते हो?”

"गुलहसन का पढाया हुआ वकील बोला…"हम अदालत से इसे मीडिया के सामने पेश करने की परमीशन चाहते हैँ ताकि अंतर्राष्ट्रीय जगत के पडोसी की करतूत का पर्दाफाश कर सकें ।'"

"क्या अभी इसकी पहचान को आम करना मुनासिब होगा?"

"ऐसा हम इसकी पहचान को छुपाए रखकर भी कर सकते हैं ।"

"इस शर्त के साथ परमीशन दी जाती है ।'" कहने कै बाद ज़ज़ कुर्सी से खडा हो गया।

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आदत के मुताबिक गिरधर न्यूज चेनल देख रहा था । स्क्रीन पर नजर आ रही लडकी ने कहा-""एक बार फिर साबित हुआ है कि पड़ासी मुल्क लगातार हमारे मुल्क में घुसपठ कर रहा है । पिछली रात एमपी इकरामुद्दीन और एसएसपी शफ्फाक शाही की मदद से ब्रिगेडियर गुलहसन ने इंडियन सीक्रेेट सर्विस कै एक जासूस को गिरफ्तार किया हे ।'"

इतना सुनते ही गिरधर चीख पड़ा-"अरे आरती...आरती, देखो ये क्या कह रही है?"

"क्या हुआ पापा ?" हढ़बड़ाइ हुइ आरती कमरे में दाखिल हुई । गिरधर ने टीवी की तरफ इशारा किया…"सुनो ये क्या.. .

"व्रिगडियर गुलहसन इस वक्त उसे मीडिया के सामने पेश कर रहे हें । " स्क्रीन पर नजर आने बाली लड़क्री कह रहीँ थी… “वहां हमारे नुमाइंदे मिस्टर परवेज माजूद हैं । लाइव टेलीकास्ट दिखाने के लिए हम आपको सीधे वहीं लिए चलते हैँ ।"

' "क्या सुनूं पापा ?" आरती ने पूछा ।

"'देखा…….देखो ।'" टीबी कीं तरफ इशारा करके गिरधर अभी यही कह पाया था कि स्कीन पर मीडिया कै लोगों की भीढ़ नजर आई ।

एक छोटा सा मंच नजर आया ।

मंच पर मौजूद कुर्सियों पर शफ्फाक शाही, इकरामूद्दीन ओर गुलहसन के बीच एक ऐसा शख्स बेठा था जिसके चेहरे पर सफेद रंग का नकाब था । नकाब में आखों के स्थान पर छेद थे छेदों से उसकी आंखें नजर आ रही थीं ।

एक लडका चेनल के माइक पर कह रहा था… "मै डूंपरवेज़ । इस वक्त पिछली रात गिरफ्तार किए गए इडियन सीक्रेट सर्विस के जासूस को मीडिया कें सामने पेश किया जा रहा है । पहचान छुपाए रखने के लिए उसके चेहरे पर नकाब डाला गया हे।"

सिर्फ आंखों को देखकर आरती के हलक से चीख सी निकल गइ थी-…""य ये तो...ये तो जावेद हे पापा ।”

गिरधर के मुंह से आवाज न निकल सकी ।

गुलहसन ने पत्रकारों से कहा था…" अब आप इससे खुद सवाल ज़वाब कर सकते हैं । इसके इंडियन सीक्रेट एजेंट होने कै हमारे पास इतने सबूत हैं कि ये झूठ नहीं बोल सकेगा । ओर ये ।" उसने एक मेज़ पर रखे बहुत सारे हथियारों की तरफ इशारा करने कै साथ कहा था…“ये घातक इंडियन असलाह ओर गोला बारूद इससे बरामद किए गए हैँ ।"

कैमरे ने हथियारों को हाइलाइट किया ।

गिरधर और आरती आंखें फाड़े स्कीन की तरफ देख रहे थे ।

एक पत्रकार ने नकाबपोश से पूछा…"आपका नाम ?"

"नहीं बता सकता ।” आवाज़ पहचानते ही गिरधर चिल्ला उठा था…“ये तो अपना जावेद ही है ।”

दूसरे पत्रकार ने पूछा था…"इंडिया में कहां के रहने वाले हैं ?”

"कश्मीर का ।”

उससे सवाल किए जाते रहे और ज़वाब में वह स्वीकार करता चला गया कि वह इंडियन सीक्रेट सर्विस का जासूस है ।

गिरधर ओर आरती चेहरों पर आतंक और आश्चर्य लिए तब तक प्रेस कांफ्रेंस को देखते रहे जब तक वह खत्म न हो गई और जब खत्म हो गई तो आरती ने कहा…"ये हमने क्या सुना पापा?"

"इन हरामजादों ने तो जावेद को इंडियन जासूस बना दिया ।"

आरती बोली-"पर जावेद क्यों कबूल कर रहा है ?'

"उन्होंने उसे मजबूर कर दिया होगा । कहा होगा कि यदि उसने कबूल न किया तो सुरैया को...

अपनी बात खुद ही अधूरी छोड़ दी गिरधर ने ।

“ये बात शौकत चाचा को बताइ जानी चाहिए पापा ।"

“पर कैसे ? ” गिरधर कह उठा…“चार सिपाही बाहर से उसक घर क्री निगरानी कर रहे हैं । थानेदार अंदर बैठा हे ।”

“मैँ छत से जाकर. . .

""नहीँ, यह रिस्की होगा । हम सामने नहीं आ सकते ।"

“तो क्या करें ?' आरती के इस सवाल का गिरधर के पास कोई जवाब न था । अपने ही दिमाग में घुसा वह बड़बड़ाया-“ये कैसा खेल खेल रहे हैं कमीने ! जावेद क्रो इंडियन सीक्रूट सर्विस का जासूस साबित करने से उन्हें क्या फायदा होगा?"

आरती के मुंह में जुबान हो तो बोले भी ।

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रात के दस बजे । सफेद रंग की लंबी गाडी शौकत के घर के सामने, आम के दोनों पेडों के बीच वहां रूकी जहाँ पहले से थानेदार की जीप खडी थी ।

उससे ब्रिगेडियर गुलहसन, इकरामुद्दीन शफफाक शाही ओर हाजी गल्ला बाहर निकले । साथ ही निकला-जावेद । उसके हाथों में हथकड्री और पैरों में बेडियां थी । ऐसी ब्रेडियां जिनके कारण वह धीरे धीरे, एक निश्चित चाल से चल सकता था ।

तेज़ चलने क्री अवस्था में गिर जाना निश्चित था ।

हाजी गल्ला ने सहारा देने वाले अंदाज में उसका बाजूपकढ़ रखा था । उसे उसी चाल से चलाते वे मेनगेट तक ले गए । शफ्फाक शाही ने सांकल बजाईं ।

दरवाजा खुला ।

खोलने वाला थानेदार था । शफ्फाक शाही क्रो देखते ही उसने सल्यूट मारा ओर एक तरफ को हट गया ।

जावेद को लिए वे लाबी में दाखिल हुए ।

उसे देखते ही शौकत, खालिदा, सुरैया ओर किवला कें चेहरों पर ऐसा आतंक छा गया जो ताला बनकर उनके मुहोंं पर लटक गया था

जाने क्या क्या चीख पड़ने की इच्छा के बावजूद उनमें से किसी कै भी मुंह से कोई आवाज न निक्ल सकी ।

आंखों में दहशत लिए वे जावेद को बस देखते रह गए जबकि शफ्फा्क शाही ने थानेदार से कहा था…"तुम जाओ ।"

"जो हुक्म हुजूर ।'" कहने कै साथ वह दरवाजे की तरफ़ बढा ।

“सिर्फ यहीं से नहीं बल्कि रशीदपुर से चले जाना हे तुम्हें । " शफ्फाक शाही बोला…"अपनी फोर्स को भी ले जाना, यूंसमझो कि तुम सबकी डयूटी खत्म हो चुकी हे । "

"जी हुजूर" कहकर वह बाहर निकल गया।

शौकत, खालिदा, सुरैया और किबला की नजरें स्वाभाविक रूप से गुलहसन पर अटक गई थीं क्योंकि वह पहली बार आया था और उसके जिस्म पर आर्मी की वर्दी थी ।

वे जानना चाहते थे कि वह कौन है ।

इधर हाजी गल्ला की गंदी नजरें सिर्फ और सिर्फ सुरैया पर स्थिर थीं ।

उनमें वही, उसे कच्ची चबा जाने जैसा भाव था । उसकी नजरों ने जहा सुरैया और खालिदा कै जिस्मों में खौफ़ की सिहरन दोड़ा दी वहीँ, शौकत ने झपटकर डायनिंग टेबल पर रखे कागज उठाए और हाजी गल्ला के ठीक सामने इस तरह जाकर खडा हो गया कि सुरेया उसकी आड में छुप जाए ।

बोला…"य ये लीजिए, ये जमीन के कागज हैं । मैँ बैंक लॉकर से निकाल लाया था । आप जिस कागज पर कहें मै साइन करने को तैयार हूं ।मेरे बेटे को छोढ़ दीजिए ।"

हाजी गल्ला के चेहरे पर ऐसे भाव थे जेसे शौकत कै अलफाज़ सुने ही न हों ।

उसका कद क्योंकि शौकत से ज्यादा था इसलिए सुरैया शोकत कें पीछे छुप न सकी थी । उसके सिर कै ऊपर से हाजी गल्ला अभी भी सुरैया क्रो उन्हीं नज़रों से देखे जा रहा था ।

"इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं है शौकत भाई ।" कहता हुआ इकरामूद्दीन उसके नजदीक आया-“इस बार हम तुम्हारे लिए एक खुशखबरी लाए हैं ।'"

"ख खुशखबरी ?""

"हमने तुम्हारी जमीन न लेने का फैसला लिया है ?”

"ज जी?”

"हुआ न सीधे सीधे सौ करोढ़ का प्राफि्ट।" कहने कै साथ उसने गुलहसन की तरफ इशारा किया था-“और ये प्राफिट तुम्हें इनकी बदौलत हुआ हे । ये हैँ…ब्रिगेडियर गुलहसन । "

“पर में समझा नहीं सर ।" शौकत ने गुलहसन की तरफ देखा । गुलहसन बोला…“बदले में हमारी छोटी सी दरख्वास्त है ।'"

"जी बोलिए ।" उसका दिल धाढ़ धाड़ करके बज रहा था । "आर्मी कोर्ट में तुम्हें यह कहना होगा कि तुम्हारे बेटे का संबंध इंडियन सीक्रेट सर्विस से है ।"

"क्-क्या बात कर रहे हैं आप?" शौकत पर जैसे बिजली गिरी ।

“वही, जो सच हे ।'"

“हरगिज नहीं ।" बात समझ में आते ही शौकत हलक फाड़कर चीख पड़ा था-"किसी कीमत पर नहीं ।'"

“हमें मालूम था तुम आनाकानी कर सकते हो इसलिए जावेद क्रो साथ लाए हैं । यही समझाएगा तुम्हें ।”

"ज जावेद ।" शौकत ने हेरत से उसकी तरफ देखा था ।

"ये ठीक कह रहे हैं अब्बा ।"' जावेद बोला…"जो ये कह रहे हैं, वह आप कोर्ट में कह दें ।”

सारे संसार की हेरत जैसे सिर्फ और सिर्फ शौकत की आंखों में सिमट आइ थी । जावेद के चेहरे की तरफ देखता रह गया वह ओर फिर चीखता चला गया…“में समझ गया, इन्होंने तुझे मजबूर किया होगा । लेकिन नहीं, मैं मर जाऊंगा पर कोर्ट में ये न कहूगा ।"'

“हमारी भलाइ इसी में हे अब्बा ।

" "क्या भलाइ है बेवकूफ ये लोग भी वहीँ कर रहे हैं जो इंडियन पुलिस ने किया था । तुझे फांसी पर चढाने की तैयारी हे ये । एक बार आर्मी कोट मे एजेंट साबित हो गया तो फिर कोई तुझे फांसी से नहीं बचा सकेगा ।"

"ऐसा नहीँ हे शौकत अंसारी साहब ।" गुलहसन बोला-"मैं कोर्ट से जावेद को फांसी न देने की अपील करूंगा । इतना तो आप समझते ही होगें कि जिस अफ़सर ने इसे पकड़ा हे जब वहीँ कोर्ट मेँ ऐसा कहेगा तो क्रोर्ट को रहम करना ही पड़ेगा ।”

“बहलाओ मत मुझे । कह चुका हू…मैं ऐसा नहीं कहूंगा ।”

"तो फिर यहां रेप होगा ।'" शफ्फाक शाही ने वहुत ही नंगे शब्दों में कहा था…“तेरी बीबी के सामने, तेरे बेटे के सामने ओर

खुद तेरी आखों कै सामने तेरी बेटी से रेप होगा । हाजी गज्जा तेयार खडा है ।"

"नहीं ।" वह आर्तनाद कर उठा…"तुम ऐसा नहीं कर सकते ।”

“हम ऐसा ही करेंगे शौंकत भाई ।" इकरामुद्दीन ने बहुत आराम से कहा था…"तुम हमारी बात नहीं मानोगे तो पूरा सीन सोचकर आए है और...जो सोचकर आए हें, वो जावेद को पता हे । इसीलिए तो ये तुम्हें हमारी बात मान लेने की सलाह दे रहा ।"

भन्नाया हुआ शौकत उसकी तरफ देखता रह गया ।

कोशिश के बावजूद मुंह से आवाज न निकाल सका था ।

गुलह्रसन बोला…"चलो तुम्हारी बात वडी करते हैं । इडियन सीक्रेट एजेंट साबित होने पर कार्ट तुम्हारे लखोजिगर को फांसी पर चढा दगीं । वेसा जब होगा, तब होगा मगर यदि तुमने हमारा बल्कि खुद अपने बटे का कहा न माना ता तुम्हारी बटी के साथ वह यहीं ओर इसी वक्त हो जाएगा जो शफ्फाक शाही ने कहा । फैसला तुम्हारे अपने हाथ में हे । बेटी से रेप कराना हे या बेटा.......

“इज्जत बडी चीज होती है शौकत मियां ।” गुलहसन की बात पूरी होने से पहले ही इकरामूद्दीन ने सलाह दी…“इज्जत चली जाए ता कुछ नहीं रह जाता । मेरे ख्याल से तुम्हें इसे बचाना चाहिए । वेसे भी जावेद पहले ही साथ कहां था । इंडिया में रहता था । आगे भी न रहेगा तो क्या खास फर्क पढ़ जाएगा ! ऊपर से सौ करोढ़ की जमीन सो अलग । जैसे अब तक गुजार रहे थे, उससे कईं गुना ज्यादा शानो शौकत के साथ जिंदगी गुजारना ।"

“तू कुत्ता है, जलील आर कमीना हे ।" शौकत गुराया-"तभी ऐसा सोच सकता हे कि एक बाप अपने बयान से बेटे क्रो फांसी पर चढा सकता हे । मेरी जगह तूहोता तो...

उसकी बात पूरी होने से पहले ही शफ्फाक शाही बोला…"त्तेरी जगह मैं होता तो बेटी के साथ रेप तो कभी न होने देता ।"

शौकत उसे देखता रह गया ।

उस अकेले को ही क्या, चारों को देखता रह गया था वह ।

जोश में भले ही चाहे जो कह दिया हो मगर हकीकत लिखी जाए तो यह थी कि वह फसला नहीँ कर पा रहा था कि क्या किया जाए? बेटे को बचाए या बेटी की इज्जत .....

"समझने की कोशिश करो अब्बा । " जावेद ने कहा था…"" अगर वह हो गया जो ये कह रहे हैं तो हममें से कौन जिंदा रह पाएगा ! क्या हम सभी जीते जी नहीं मर जाएंगें ?”

शौकत अंसारी ऐसी नज़रों से देखता रह गया था जेसे समझ न पा रहा हो कि जावेद ने क्या कहा हे ।

शफ्फाक शाही ने कहा…"इसने वेटी के साथ रेप होने देने का फेसला लिया है हाजी गल्ला, चुप क्यों खड़ा है तू?”

हाजी गल्ला का तो जेसे इंतजार ही ऐसे किसी आदेश का था ।

उसका पहाड़ जेसा जिस्म शौकत को एक तरफ धकेलता हुआ सुरेया और खालिदा की तरफ लपका । पलक भी नहीं झपकी थी कि उसने उस खालिदा को सुरैया से अलग करके एक तरफ फेक दिया जिसने सुरैया को इस कदर कसकर पकढ़ रखा था जैसे कयामत भी आ जाए तो उसे नहीं छाड़गी ।

हलक से चीख निकालती हुई खालिदा ब्रिगेडियर के कदमों में जा गिरी थी ।

इधर, हाजी गल्ला के बंधनों में छटपटाती सुरैया चीखे चली जा रही थी और उधर शौकत अंसारी चीख रहा था ।

"उसे रोको एसएसपी साहब ।" जावेद दहाड़ा…"में अब्बा क्रो समझा लूंगा । वो कोर्ट में वही कहेंगे जो तुम चाहोगे ।"

पर अब, जेसे उसकी आवाज़ किसी के कानों तक न पहुंच रही थी । लाबी में 'चिर...र्र...र' की आवाज़ गूंजी । यह आवाज़ सुरया की कुर्ती फटने की थी ।

उसकी पीठ नंगी हो चुकी थी ।

हाजी गल्ला के मुंह से पैशाचिक अटटहास निकलने लगे थे ।

ऐसी हालत हो गइ थी उसकी जेसे भूखे शेर को बहुत दिन बाद गोश्त का लोथड़ा मिला हो।

नन्ही सुरेया उसके चंगुल से बच निकलने की नाकाम कोशिश कर रही थी । शौकत उसे छुडाने के लिए हाजी गल्ला तक पहुंचना चाहता था परंतु शफ्फाक शाही ने ज़कह रखा था ।

किबला ने मेनगट की तरफ सरकना शुरू कर दिया था ।

दुसरी तरह रोती खालिदा गुलहसन के कदमों से लिपटी गिड़गिड़ा रहीँ थी…"मेरी बेटी को बचा लीजिए साहब ।”

गुलहसन ने उसके बाल पकड़े । उसी पोजीशन में ऊपर उठाते हुए खालिदा का फेस अपने फेस कै सामने किया और बोला…"उम्र भले ही थोडी ज्यादा हो पर खूबसूरत तो तूभी कम नहीं । आजा…बांहां में आ जा मेरी ।" कहने कें साथ उसने खालिदा को कसकर बांहों में जकढ़ लिया था ।

खालिदा छटपटा उठी ।

बड़ा ही वीभत्स दृश्य था वह ।

ऐसी चीखौ पुकार मची हुई थी कि कोई किसी कीं सुनने को तैयार न था ।

हाजी गल्ला सूरेया कै कपड़े तारन्तार कर रहा था तो शौकत शफ्फाक शाही कै शिकंजे से निकलने के लिए छटपटा रहा था ।

हथकडी और वेहियों में ज़कड़ा बेबस जावेद कभी शौकत से उनकी बात मान लेने कें लिए चीख रहा था, कभी उन लोगो से रूक जाने कै लिए कह रहा था ।

मेनगेट की तरफ सरक रहे किबला पर किसी का ध्यान न था ।

खालिदा को जब कुछ और न सूझा तो गुलहसन कै कंघे पर दात गड़ा दिए और काटती चली गई ।

दर्द से छटपटाते गुलहसन क्रो उसे छोड देना पडा । उसके गिरफ्त से निकलते ही खालिदा उस हाजी गल्ला पर झपटी जिसने सुरैया को दबोच रखा था ।

अगले पल उसके दांत हाजी गल्ला की कलाई पर गडे हुए थे । वह भी छटपटा उठा ।

इधर, खालिदा का अपनी गिरफ्त से निक्ल जाना गुलहसन क्रो बर्दाश्त न हुआ ।

अपने कंधे पर लटक रहीँ छोटी-सी म्यान से कटार निकाली आर खालिदा के पेट में भोंक दी ।

खालिदा के हलक से ज़बरदस्त डकराहट निकली और. ..

........उस दृश्य को देखकर जावेद के हलक से उससे भी ज्यादा दिल क्रो दहला देने वाली डकराहट निकली थी ।

उस वक्त वह भूल गया कि हाथों में हथकडी ओर पैरों में बेडियां हें ।

खूंखार अंदाज में गुलहसन पर झपट पडा था वह ।

मगर, मुंह कै बल ज़मीन पर गिरा ।

उसके करीब ही गिरी थी खून से लथपथ खालिदा ।

जावेद ने उठने की कोशिश की मगर हथकडी ओर बेडियों के कारण कामयाब न ही सका ।

फिर भी, ज़मीन पर पड़े ही पडे उसने गुलहसन की टांग पकड़ ली और तब...गुलहसन ने उसके चेहरे पर अपने भारी बूट की ऐसी ठोकर मारी कि वह हवा में उछलता हुआ सीढियां के नज़दीक जा गिरा ।

उसके बाद उसके मुंह से कोई आवाज न निकली ।

बेहोश ही गया था वह ।

ज़मीन पर गिरती खालिदा को शौकत ने भी देख लिया था और उस सबको देखकर जैसे वह पागल हो गया ।

जाने कहां से ताकत आ गइ कि दायां हाथ शफ्फाक शाही के कुल्हे पर लटके होलेस्टर में फंसे पिस्तोल की मूठ पर जमाकर बाएं हाथ से जोरदार घक्का दिया ।

लढ़खड़ाता हुआ शफ्फाक शाही एक कुर्सी से उलझने कै बाद फर्श पर जा गिरा जबकि उसका पिस्तौल शौकत के हाथ में आ चुका था ।

पलक झपकते ही उसने पिस्तौल का रुख उस हाजी गल्ला की तरफ घुमाकर ट्रेगर दबा दिया जिसके बंधनों में जकडी अर्धनग्न सुंरेया "बचाओ…बचाऔ' चिल्ला रही थी ।

पर ऐन मौके पर जाने क्या हुआ कि पिस्तौल से निकली गोली की जद मेें हाजी गल्ला की जगह सुरैया आ गई ।

गोली उसकी नंगी पीठ में धंसी और खून का फव्वारा छोडती छाती क्रो चीरती बाहर निकल गइ ।

चीख के साथ सुरेया कटे वृक्ष सी ज़मीन पर गिरी ।

उस दृश्य को देखकर तो शौकत जैसे पागल ही हो गया ।

उसी पर झपट पड़ा वह ।

अगले पल उसके जिस्म क्रो झंझोड़ता पागलों की मानिंद चीखे चला जा रहा था…""सुरया...सुरेया...हे खुदा, ये मेरे हाथों से क्या हो गया ! मैंनै तो उस हरामजादे को गोली मारी थी ।"'

सुंरैया से लिपटकर शोक मनाता शौकत की बेवकूफी साबित हुई क्योकि ठीक

उसी वक्त इस बात से घबराए हाजी गल्ला ने उसके चेहरे पर अपने बूट की जोरदार ठोकर मारी कहीँ वह अगली गोली उसी पर न चला दे ।

चीख के साथ शोकत दूर जा गिरा ।

पिस्तोल उसके हाथ से निकल चुका था और फिर, शफ्फाक शाही ने झपटकर पिस्तौल उठाया तथा किसी के भी कुछ समझने से पहले उसका रुख शौकत की तरफ घुमाकर, दांतां पर दात जमाए ट्रेगर दबाता चला गया…धाय...धाय...धाय !

"बस !" किबला भभकते लहजे में कहता चला गया था-“वह दृश्य मेरी आखों द्वारा देखा गया अंतिम दृश्य था । उसे देखते ही मैंने मेनगेट के नजदीक मौजूद लाइट का मेन स्वीच आफ कर दिया था । सारे मकान में अंधेरा छा गया । मेरा धीरे धीरे मेनगेट की तरफ बढ़ने का मकसद भी यही था । बहुत पहले समझ चुका था कि हममें उन दरिदों से टकराने क्री ताकत नहीं हे । वे पूरी तैयारी से आए थे । मगर काश...काश मैंन उतना सब होने से पहले मेन स्वीच आफ कर दिया होता । ऐसा हो जाता तो शायद.......

शौकत, खालिदा या सुरेया में से आज़ कोई जिंदा होता परंतु मेन स्वीच की तरफ मैं इस तरह बढा था कि उनमें से किसी की तवज्जो मुझ पर न जा पाए क्योकि अगर मेरे इरादे को भांप जाते तो उनका सवसे पहला शिकार मैें ही होता ओर उस हालत में उतना भी न कर पाता जितना कर सका । अपने इरादे की भनक उन्हें न लगने देने के प्रयास में ही इतनी देर हो गइ कि वे हमारी दुनिया उजाढ़ चुके थे ।"’

विकास ने पूछा…“अंघेरा होने के बाद क्या हुआ ?'

"वहीँ, जो सोचकर मैंन वेसा किया था । वे बौखला गए । कई कै मुंह से एकसाथ निकला-'अरे ये क्या हो गया ? फिर किसी की आवाज गूंजी-"मैंने मेन स्वीच आफ होन की आवाज सुनी है ।"

पुन: उन्ही मे स किसी ने कहा…'यह हरकत इनके उस हरामजादे नौकर की लगती है ।'

वे इस किस्म की बकवास भले ही कर रहे हों लेकिन किसी को नजर कुछ नहीं आ रहा था जबकि मै अंधेरे ही मे सीढियों की तरफ दोड़ा ।

अपना घर होने के कारण मैं वेसा कर सकता था ।

रास्ते में कईं से टकराया ।

जेसे मैं न जान सका कि वे कौन थे वेसे ही वह भी न जान सके कि वे मुझसे टकराए थे ।

सोचा होगा आपस मे ही टकराए हें मगर अंतत: में जावेद तक पहुंच गया ।

जाने कहां से इतनी ताकत आ गइ थी कि उसके बेहोश जिस्म कौ कंधे पर लादकर सीढियां चढता चला गया । दोंढ़ता हुआ टेरेस पर पहुंचा । वहा गिरधर और आरती मिले ।"

"वे वहा क्या कर रहे थे ?' बिकास ने पूछा।

"गोलियां कीं आवाज सुनकर पहुंच थे । बुरी तरह घबराए हुए थे वे । गिरधर कै हाथ में उसकी हाकी थी ।

....नीचे आना चाहते थे लेकिन साढियां का दरवाजा गुमटी के अंदर स बंद था ।

मेरे पहुंचते ही उन्होंने सवाल करने शुरू कर दिए । सबसे पहले मैंने गुमटी का दरवाजा टेरेस की तरफ से बंद किया ताकि उनमें से काइ वहा न आ सके ।

शार्ट में सबकुछ बताया । उनके होश उढ़ गए ।

हढ़वड़ाए हुए अंदाज में मैंने कहा…"इस वक्त हमारा पहला ओर आखरी काम अपनी और जावेद की जान बचाना है । हकीकत ये है कि इस वक्त हम इससे ज्यादा और कर भी नहीं सकते ओर...

..... इसके लिए जितनी जल्दी हो सकै यहा' से दूर भाग जाने के अलावा कोई चारा नहीं है ।'

बात उनकी समझ मं आ गई । तभी सीढियां की तरफ से ऐसी आवाज़ आइ जेस कोई वहां पहुचा हो । फिर, बंद दरवाजे पर धक्का लगा ।

माहौल में गूंजने वाली उत्तेजना से भरी आवाज़ शफ्फाक शाही की थी ।

उसने अपने साथी से कहा था…"दरवाजा छत की तरफ से बंद हे, मतलब वह यहीँ आया हे ।'

हम तीनां ने गिरधर कै मकान की तरफ दोंड़ लगा दी । दरवाजा गुमटी की तरफ से बंद किया और नीचे पहुंच गए मगर समझ चुके थे…

वहां महफुज नहीं हैं । देर सवेर उन लोगां को वहां पहुच जाना था लिहाजा, गिरधर के मकान के पिछले दरवाजे से निकले ओर जंगल की तरफ दौड़त्ते चले गए ।"'

मोगली ने पूछा…"उसकै बाद ? "

"चारों तरफ घनघोर अंघरा था, इसके वावजूद हमारे पास दौडते चले जाने कै अलावा कोई चारा न था । जिन्हें मालूम हो कि दुश्मन के हाथ लग गए तो जिंदा न बचेंगे, वे भागने कै अलावा और कर भी क्या सकते हें !

भागते ही भागते गिरधर ने कहा…"हमेँ नदी की तरफ जाना चाहिए । एक वार नदी पार कर गए तो उनकी पकड़ से काफी दूर निकल जाएंगे ।' मुझ भी बात जमी । लिहाजा, खुद ब रवुद हमारा रुख नदी की तरफ़ हो गया ।

तीनों थक गए थे ।

बुरी तरह हाफने लगे थे मगर मेरी हालत कुछ ज्यादा ही पतली थी ।

इस हकीकत को भांपते हुए गिरधर ने कहा…"तुम वहुत थक गए हो किबला, लाओ…जावद क्रो मुझे दे दो ।'

वहा से जावेद उसके कंधे पर ट्रांसफर हो गया ।

एक घंटा भागने के बाद झेलम के किनारे पर पहुंचे ।

उस एक घंटे के दरम्यान कहीं भी यह महसूस नहीं किया था कि वे पीछे हें ।

इस वात ने हमेँ काफी राहत पहुंचाई थी और शायद इसीलिए झेलम के किनारे पहुच कर उसके पानी से जावेद को होश में लाने का फेसला किया लेकिन अभी उसके चेहरे पर पानी कै पहले छीटे मार पाए थे कि पीछे की तरफ किसी गाडी की हैडलाइटस नज़र आइ ।

यह सोचकर हड़बड़ा गए कि वह वही, लंबी सफद गाडी होगी क्योकि रात के उस वक्त वहां ओर कोई गाडी वाला क्यों आएगा !

मेरे मुंह से निकला-'वे आ गए ।'

गिरधर ने जावेद को वापस कंधे पर लादते हुए कहा था-'भागो ।'

इस तरह, हमने झेलम में छलांग लगा दी और बहाव के साथ तैरते हुए पार करने लगे ।

उस वक्त हम झेलम के करीब बीच में थे जव गाडी को उस स्थान के आसपास रुकते देखा जहा जावेद को होश में लाने की नाकाम कोशिश की थी ।

हेडलाइटस के झाग हालांकि झेलम के पानी पर नाच रहे थे मगर हम उनसे काफी दूर और उतने हटकर थे जितना पानी अपने साथ बहा ले गया था ।

कुछ देर बाद हेडलाइटस के आसपास कुछ लोगां को खडे देखा । हमें समझते देर न लगी कि वे अनुमान भले ही चाहे जो लगा रहे हों लेकिन हमें देख नहीं पाए हें । तभी एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण मन बुक्का फाड़ फाढ़कर रोने क्रो हूआ ।"
 
"ऐसा क्या हुआ था ?” बिकास ने पूछा ।

“नदी बहरहाल नदी होती हे । मै गिरधर ओर आरती से करीब दस मीटर बाईं तरफ था ।

अचानक एक भंवर सा आया और संभलने की लाख चेष्टाओं कै बावजूद मैं पानी के साथ तेजी से घूमता हुआ न केवल उसमे डूबता चला गया बल्कि तेज बहाव के साथ बहता भी चला गया था । हालांकि अपने हाथ पैर मारने में मैंने कोई कसर न छोडी थी मगर हकीकत ये हे कि मेरे किए..... कुछ न ही रहा था ।

वस उस दिशा ओर गहराई में बढता चला गया जिसमेँ भंवर ले गया था । पता नहीं कितनी देर बाद सिर पानी की सतह से ऊपर निकला ।

हवा ओर पानी पर त्तेरती गिरधर की वचैन आवाज मेर कानों मे पडी थी…'कि...ब...ला' आवाज खुद व खुद वता रही थी कि वह वहुत दूर से आइ थी और गिरधर मुझसे बिछुढ़ जाने के कारण घबराया हुआ था ।

उसे अपनी स्थिति वताने के लिए मेंने जोर से चीखना चाहा लकिन कामयाब न हो सका क्योेकि उससे पहले ही एक बार फिर पानी मे डूब गया था ।

वेसे भी पेट में ज्यादा पानी जाने के कारण हालत खराब हो गइ थी ।

एक वार फिर पानी कै ऊपर उबरा लेकिन फिर डूब गया ।

यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं । अब तो मेंरे हाथ पेरों में पानी से लड़ने की ताकत भी खत्म होती जा रही थी ।

बस एक ही दुआ कर रहा था खुदा से…किसी तरह पानी से निजात मिले । किनारे पर पहुंच जाऊं और...खुदा ने मेरी दुआ कुबूल कर ली । पानी खुद बहाता हुआ मुझे किनार पर ले गया ।

मैं नदी से वाहर निकला और पत्थर पर लटककर लंबी लंबी सांसे लेने लगा । सांसे ठीक से व्यवस्थित भी न हुई थीं कि महसूस किया…पेट में वहुत ज्यादा पानी भर गया है । वहा' मेरी मदद करन वाला कोईं न था इसलिए खुद ही एक पत्थर पर पेट के बल लेट गया ओर पेट जोर-जोर से दबाने लगा ।

परिणाम स्वरूप मुंह से पानी निकलने तगा । कुछ देर बाद राहत महसूस क्री तो उसी पत्थर पर चित्त अवस्था में लेट गया ।

आज भी ठीक से नहीं बता सकता कि कितनी देर यूंही लटा रहा । हकीकत ये है कि उस वक्त मुझ नोंद सी आ गई थी ।

नींद टूटी तो पहला ख्याल गिरधर, आरती और जावेद का आया ।

जंगल की तरफ मुंह घुमाकर जोरजोर से गिरधर के नाम की आबाजं लगाई लकिन कहीं से ज़वाब न मिला ।

उस वक्त मेरी हालत बहुत बिचित्र हो गइ जब महसूस किया कि इतन प्रयासों के बावजूद नदी पार न कर पाया था वल्कि उसी किनारे पर था जिससे नदी में कूदा था ।

बस इतना फर्क आया था कि उस स्थान से मालों दूर था जहां से नदी में कूदा था और यह करिश्मा था…नदी के तेज़ वहाब का ।

अव मेरी समझ में आया कि गिरधर, आरती ओर जावेद इस तरफ के जंगलों मे कहां ! वे तो नदी के उस पार होंगे । सो, अब मेंने कइ वार नदी की तरफ मुह घुमाकर गिरधर को आवाजं लगाईं ।

नतीजा ढाक के तीन पात ।

उस वक्त पहली वार एहसास हुआ कि अब मै कभी उन लोगां से न मिल सकूंगा क्योकि वे नदी के उस पार निक्ल गए होंगे जबकि मुझमें उसे पार करने की ताकत न वची थी ।

इस एहसास कै कारण मेरा मन बुक्का फाढ़ फाड़कर रोने का हुआ । पर रोकर था क्या हो सकता था !

यह दुआ करता थक हारकर पत्थर पर बैठ गया कि वह जहा भी होा, महफूज हों । बस उन दरिंदों के हाथ न लगें लेकिन वहां भी कब तक बैठा रहता !

दिमाग में विचारों का आवागमन शुरू हो गया था । सारे हौलनाक दृश्य एक एक करके मस्तिष्क पटल से गुजरने लगे और फिर, ज़हन ने कहा…'मेँ यह क्यो मान रहा हूकि सुरैया, शोकत ओर खालिदा पर चुकें हें मरते हुए कहा देखा मेंने उफ्फ ! चाकू लगने के बाद मैंने खालिदा का खून से लथपथ अवस्था मेँ जमीन पर गिरते देखा था । शोकत कै हाथ में दबे पिस्तौल से चली गोली को सुरैया की पीठ मे लगते देखा था और देखा था…शफ्फाक शाही का शौकत पर गालियां बरसाते।

चाकू ओर गोलियां लगने पर मर ही जाएं, ऐसा जरूरी तो नहीं होता । जख्मी होकर भी तो रह जाते हें !

मुमकिन है उनमें से कोई जिंदा हो ? मगर फिर, मन में विपरीत बिचार उभरे…'चाकू या गाली के बाद उनमें से कोई जिंदा बचा भी होगा तो बाद में उन जालिमों ने कहां छोडा होगा ? थोडी देर के लिए दिमाग पर निराशा फैली लेकिन तुरत ही इस बिचार ने आशा का संचार किया कि…'मेरे जावेद को कंधे पर लादकर भागने कें कारण उन्हें यह देखने का होश ही कहा' रहा था कि उनमें से कोइ जिदा है या मर गए !

.....वे तो मेरे पीछ लग गए थे ।"

इस विचार ने मुझे उत्साहित किया ।

इतना ज्यादा कि तेजी से रशीदपुर की तरफ वढ़ गया ।

इस विचार से बंधा मैें दोढ़ने की कोशिश कर रहा था कि यदि उनमें से कोई जिंदा हुआ तो उसे मेडिकल एड की ज़रूरत होगी मगर कोशिश के बावजूद कमजारी कै कारण दौढ़ न सका ।

कइ बार ज़हन में यह ख्याल भी आया कि कही गुलहसन, शफ्फाक शाही, इकरामुद्दीन या हाजी गल्ला से सामना न हो जाए मगर फिर खुद ही लगा भला वे दरिंदे वहा क्या कर रहे हांगे ! सुबह कै चार बज मै रशीदपुर के छोर पर पहुंचा और...वहा पहुंचकर ही जव उस दिशा में आग की लपटो और धुवंऐ का एहसास किया जिस दिशा मे हमारे मकान थे तो इस कदर दोडा जैस मेरे पीछे सैकडों भूत लगे हौं ।

नहीं पता किस तरह गिरता पड़ता यहा पहुंचा । मगर जब पहुंचा तो यहां का मंजर. देखते ही पागल सा हो गया । यह मकान होली की तरह जल रहा था ।
 
आग की लपटें लपक लपककर गिरधर के मकान को छूने की काशिश कर रही थीं और...रशीदपुर गांव में रहने वाल हीज़ढे दोनों मकानां के सामने खड़े उस मंज़र को यूंदेख रह थे जेसे इंसान नहीं वेजान पुतले हो । मै चीख चीखकर पागलों की तरह उनसे आग को बुझाने के लिए कहने लगा मगर किसी के कान पर जू न रेंगी ।

जव मैंने कहा कि…"मकान कै अंदर शौकत, खालिदा या सुरया में से कोई जिंदा हो सकती हे तो उन्हीँ में से किसी हीजड़े ने कहा…'अगर वे लोग उनमे से किसी को जिंदा छोड भी गए होगें तो वह इस आग में भुन गया होगा ।

हाजी गल्ला खुद से दुश्मनी लेने वाले क्रो किसी हालत में जिंदा नहीं छोड़ता । अपने खिलाफ सबूत न छोडना भी उसकी फितरत है । तभी तो घर मे आग लगा गया ! इसकी राख से भला किसी को क्या सबूत हाथ लगेगा ! हमने तो सोचा था तू भी इसी मे जलकर खाक हो चुका होगा पर खुदा का शुक्र हे कि तूजिंदा है । अब अपना दिमागी संतुलन दुरुस्त करने के बारे में सोच किवला, उनमें से कोई नहीं बचा हे ।'

मगर, मेरा दिमाग मेरे काबू में होता तो उसे दुरुस्त करने कै बार में साचता भी ।

मैं गांव वालों को गालियां देने लगा ।

बार बार हीजड़ा कहकर उन पर थूकने लगा और शायद इसीलिए उन्होंने मुझे पागल समझ लिया ।

तब से यहीँ हूँओर कभी-कभी तो खुद ही खुद को पागल सा लगने लगता हू.........

पर असल में मै पागल नहीं हूं । मै यहा इसलिए पड़ा हूकि अगर जावेद जिंदा है तो कभी तो उसे अपने इस घर की याद आएगी ओर वह यहा आएगा । तब उससे मिलूंगा और कहुंगा-"मेंने तुझे इसलिए बचाया था ताकि तू अपने मां बाप और बहन की हत्याओं का बदला ल सकै ।"

"वहीँ हो रहा हैँ किबला ।" विकास अपने मुह से निक्लने वाले इन ज़जबात्ती अलफाजों को न रोक सका…"वही हो रहा है ।"

"मतलब ? "

"क्या तुम्हें नहीं मालूम कि आज की डेट में जावेद ने मुकम्मल पाकिस्तान में कोहराम मचा रखा है ?'

"य ये क्या कह रहे हो तुम ? "

“वह इकरामुद्दीन को मौत के घाट उतार चुका है दोस्त, लाख सुरक्षा व्यवस्थाओं को धता बताकर ब्रिगेडियर गुलहसन की लाश बिछा चुका है जावेद । पाकिस्तान में इस कदर तहलका मचाए हुए हे कि यहा की सरकार ने भारत से मदद मांगी हे ।""

"क-क्या तुम सच कह रहे हो ? " किबला की आंखां में ऐसी चमक नजर आइ थी जेसे उनमें नन्हें-नन्हे' बल्ब राशन हो-"क्या मेरे जावेद ने सचमुच इकरामुद्दीन और गुलहसन नाम के दरिंदों को मौत कै घाट उतार दिया ?"

“ये सच हे किवला।""

"तुम्हें कैसे मालूम?”

"मुझे ही क्या ! सबको मालूम हे । सारी दुनिया को पता है । यहा की सरकार उसके कारनामों को हवा ही इतनी दे रही है कि दुनिया भर का मीडिया शोर मचाए हुए है। तुम्हें शायद इसलिए नहीं मालूम क्योकि तब से अब तक तुमने बाहरी दुनिया ही नहीं देखी । वह खुद को इंडियन सीक्रेट सर्विस के एजेंट के रूप में प्रचारित कर रहा है ।”

"ऐसा क्यों ? "

"तुम्हारी बातें सृनने के बाद मेरी समझ में आया है कि वह ऐसा क्योंकर रहा है । क्यों खुद को जावेद की जगह जावेद कश्मीरी कहने लगा हे । उस इंडियन सीक्रेेट एजेंट बनाने वाला गुलहसन या ओर बाद मे उसने खुद को इसी रूप मेँ इसलिए प्रचारित किया क्योंकि वह दोनों देशो से बराबर नफरत करता हे । उस पर दोनों ही मुल्को ने जुल्म किए हें । पाकिस्तान से वह यहा खून खराबा करके बदला ले रहा है तो हिंदुस्तान क्रो सारी दुनिया में बदनाम करके । करना चाहिए...उसे यही करना चाहिए । उसकी जगह में होता तो मै भी यहीँ करता । अभी तो शफ्फाक शाही और हाजी गल्ला बाकी हैं । मुझ पूरा यकीन हे कि वह उन्हें भी नहीं छोड़ेगा । "'

“यह तो तुमन मुझे वहुत ही बडी खुशखवरी सुनाइ हे दोस्त, क्या तुम्हें यह भी मालूम हे कि जावेद इन दिनों कहा है ?'

"नहीँ, यह नहीं मालूम । मुझे उसके बारे में सिर्फ उतना पता हे जितना मीडिया में आता रहता हे । यह किसी क्रो नहीँ मालूम कि वह कहा' रहता हे, किस रूप में रहता है ।”

"गिरधर और आरती के बारे मेँ कुछ?”

"उनके तो तुम्हारी कहानी से पहले मैंने नाम भी न सुने थे । ” विकास ने कहा-"परंतु जैसे भी हो, हमें जावेद तक पहुंचना होगा ।"

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