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अगले दिन क्योकि बैंक की छुटटी थी इसलिए शौकत करांची नहीं गया । सुबह कै अखबार को गिरधर के साथ साथ उसने भी खूब चाटा मगर इकरामुद्दीन से संबधित खबर न मिली ।
शौकत और गिरधर के बीच तय हुआ कि 'उनके' आने पर चाहे जो होता रहे लेकिन गिरधर को सामने नहीं आना है क्योंकि उससे कोइ लाभ होने वाला न था । उल्टा, गिरधर भी उनकी निगाह में आ जाता । वैसे भी, जब वे 'उनकी' बात मानने को तेयार थे त्तो गढ़बढ़ ही क्या होनी ।"
शौकत ने सारी बातें खालिदा को बता दी थीं । शौकत की ही तरह, उसे भी पिचहत्तर करोढ़ का अफ़सोस तो था परंतु हालात क्रो देखते हुए जो फैसला लिया गया था, वही ठीक लगा ।
सुबह के दस बजे ही शोकत फस्ट फ्लोर के अपने उस कमरे में जम गया जिसकी खिडकी से मकान के सामने कै पूरे हिस्से क्रो साफ देखा जा सकता था । ऐसा उसने इसलिए किया था ताकि सांकल बजने से पहले ही उनके आगमन का पता लग जाए या इसे उसके अंदर की बेचैनी भी कही जा सकती थी ।
यह बैचेनी समय के साथ बढती चली गइ क्योंकि शाम ढलने तक भी वे नहीँ आए थे । लाइटें आन हो गईं ।
शौकत को लगने लगा कि शायद वे आएंगे ही नहीं । यह एक ही काम थोडी हे उन्हें ।
अनेक काम हें । अपनी व्यस्तताआं में उलझ गए होंगे । शायद कल आएं । या उसक भी बाद ।
लेकिन अगर ऐसा हुआ तो बैंक में आएंगे क्योकि वे जानते हैं कि मैं सारे दिन बैंक में मिलता हूं । खुदा करे ऐसा ही हो ।
ये सारे बिचार उसे बहुत राहत पहुंचा रहे थे ।
मगर यह राहत केवल रात कें नो बजे तक पहुची क्योकि ठीक नो बजे उसने उसी लंबी गाडी को आम के दोनों पेडों के बीच रुकते देखा जिसमेँ वे परसों आए थे ।
सफेद रंग की गाडी थी वह ।
उसे देखते ही शौकत का दिल उछल उछलकर उसके कंठ की गोली से टकराने लगा ।
सबसे पहले हकरामुद्दीन गाडी से निकला, उसक बाद हाजी गल्ला और फिर, तीसरा शख्स ।
तीसरे शख्स को देखकर तो शौकत अंसारीकेे हाथ पांव ही ठंडे पढ़ने लगे क्योंकि उसके जिस्म पर पुलिस क्री वर्दी ही नहीं बल्कि कंधे पर स्टार कै साथ चांद तारे का निशान भी लगा था ।
शौकत क्रो समझते देर न लगी कि वह पुलिस का कोई बड़ा अफसर हे ।
यह बात उसके जेहन को सनसनाए दे रही थी कि वे अपने साथ पुलिस के इतने बडे अफसर को क्यों लाए हैं ?
बात...उसकी समझ में न आनी थी, न आई ।
वे मुख्यद्वार की तरफ बढे ।
वह तेजी से उठा । कमरे से निकला और फिर लगभग दौड़ते हुए सीढियां त्तय करने लगा । लाबी में बैठे खालिदा, सुरैया, किबला ओर जावेद उसकी हालत देखकर चौंक पड़े थे ।
जावेद ने तो पूछ भी लिया…“क्या हुआ अब्बा? आप इस कदर हढ़बड़ाए हुए क्यों हैं ?"
जावेद के सबाल पर जरा भी ध्यान दिए बगेर शौकत ने उत्तेजित अवस्था मेँ खालिदा से कहा-"वे आ गए ।'"
"ओह ।" खालिदा का चेहरा पसीने से नहा गया ।
जावेद को वह सब असामान्य लगा ।
उसन पूछा… "कौन आए हें अब्बा ?"
जावेद के पूछने के अंदाज पर शोकत क्रो पहली बार एहसास हुआ कि वह ओवर रिएक्ट कर गया है ।
इस बार थोडा संभलकर बोला…"क कुछ नहीं बेटे, मेरे बैंक के साथी हे । मिलने आए हे ।'"
"तो इस कदर घबराने की क्या जरूरत है और उनक आने की खबर से अचानक मम्मी को इतना पसीना क्यों आ गया हे ? ओर, आपने कहा कि वे आ गए-इसका मतलब वे ऐसे लोग हें जिनका आपको इंतजार था । मेरे ख्याल से तो आप सुबह से अपने ऊपर वाले कमरे में जो बेठे थे, उन्हीं का इंतजार कर रहे थे !"'
तभी सांकल बजी ।
शौकत अंसारी कुछ और हड़बड़ा गया…"क-कुछ नहीं, बस तेरे ही कारण । उनकी नज़र तुझ पर पढ़ गई तों...तूऊपर जा ।”
हालांकि किसी के भी आने पर उसे ऊपर भेजने की यह क्रिया पहले भी कई बार हो चुकी थी मगर इस बार जावेद को खटकी ।
सांकल फिर बजी ।
"जल्दी जा ।" शौकत ने जावेद को धक्का सा दिया…" वर्ना वे सोचेंगे दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों ही रही है ।”
असमंजस मेँ फसे जावेद को सीढियों की तरफ बढना पड़ा ।
"खोलते हैं भईं ।'" कहता हुआ शौकत दरवाजे की तरफ लपका मगर दरवाजा उसने तब तक न खोला जबतक जावेद लाबी मे नज़र आना बंद न हो गया । और...दस्वाजा खुलते ही वे तीनों इस तरह धड़धड़ाते हुए अंदर आ गए जेसे उनका अपना घर हो ।
गेंठे कद का इकरामुद्दीन परंपरागत यानी नेता वाले लिबास में था और वह, जिसे शौकत अंसारी हाजी गल्ला के नाम से जानता था किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था ।
उसके पहाढ़ जैसे बलिष्ट जिस्म पर काले रंग का पठानी सूट था । चेहरा अत्यंत चौडा । मोटे-मोटे होंठ । लंबी नाक और ज़रूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुइ ठोडी । मस्तक वहुत चौडा था और पीछे की तरफ क्रो कढे हुए लंबे बाल ।
वह जितनी वार भी शौकत के सामने आया था, उस पर उसने खास ध्यान न दिया था । उसकी तवज्जौ इकरामूद्दीन पर ही रहती थी क्यो़कि हाजी गल्ला की हस्ती से वाकिफ न था ।
जबकि इकरामुद्दीन को एमपी कै रूप में जानता था ।
पिछली मुलाकातों में हाजी गल्ला को उसने इकरामुद्दीन का वेसा ही चमचा समझा था जैसे नेताओं के साथ रहते हैं ।
इस बार उसने खास तवब्जौ दी और तवब्जी देते ही रूह फना हो गई उसकी क्योंकि उसकी लाल सुर्खं, गोलमटोल और बही बडी आंखें सुरैया पर स्थिर थीं ।
पिछली बार भी उसने नोट किया था कि हाजी गल्ला ने सुरैया क्रो अच्छी नज़रों से नहीं देखा था मगर इस बार. . .बल्कि इस वक्त उसने महसूस किया कि हाजी गल्ला के चेहरे पर ऐसे भाव हें जेस सुरैया को आंखों ही आंखों में पी जाना चाहता हो ।
हाजी गल्ला के देखने कै अंदाज पर सुरैया सहम गई थी और डरी हुईं खालिदा ने उसे अपने पीछे छुपाने की कोशिश की यी ।
शौकत ने कहा…"'खालिदा, सुरैया को अंदर ले जाओ ।"
"क्यों भइ, खडी रहने दो उन्हें भी यहीं । " हाजी गल्ला कें चेहरे पर बडी ही खतरनाक मुस्कान थी…“हम क्या खा जाएंगे ।"
खालिदा सुरैया को लेकर किचन की तरफ बढी थी ।
"ऐ! सुना नहीं तूने ।" हाजी गल्ला की आवाज सननाटे पर तैरती सीटी की-सी आवाज थी…“यहीं खडी रह ।"
"आपके लिए चाय बनाने जा रहे हैं भाईजान ।'"
“ये किस मर्ज की दवा है ?" उसने किबला की तरफ देखा ।
खालिदा के होश फाख्ता ।
शौकत बोला…"आपफे आफर पर मैंने सोच लिया है । जेसा कहैं, वैसा करने को तैयार हू' ।”
"कहां तैयार हे !” इकरामूद्दीन बोला…"तूतो उस कटारीदार मूंछ वाले थानेदार के पास गया था !"
इस एहसास ने शौकत के होश उड़ा दिए कि इकरामुद्दीन को उस बारे में पता था । हकलाता हुआ बोला…“ग गलती हो गई एमपी साहब, माफ कर दीजिए ।"'
“थानेदार के क्या बस का था । इनसे मिलो ।"’ उसने पुलिस के अफसर की तरफ इशारा क्रिया-"ये एसएसपी भी हैं और हमारे दोस्त भी-मिस्टर शफ्फफाक शाही । तुम्हारी जो भी कंपलंट हे, इनसे कहो । ये तुम्हारी हर प्राबलम को अपनी प्राबलम समझकर हल करें गे । हे न, शफ्फफाक शाही साहब !"
"जरूर...जरूर मिस्टर अंसारी, हम तो आए ही इसलिए हैं ।" कहते वक्त एसएसपी के होठों पर जो मुस्कान थी उसने शौकत के तिरपन कंपा दिए थे-"वोलिए कौन आपकी ज़मीन को जबरदस्ती खरीदना चाहता है । आखिर करांची में पुलिस भी हे !"'
"नहीँनहीँ । मुझे किसी के खिलाफ क्रोइ कंपतेंट नहींकरनी ।” शौकत अपनी आवाज़ में पैदा होनेवाले कपन का बडी मुश्किल से रोके हुए था…"कोई मेरी जमीन जबरदस्ती नहीँ खरीदना चाहता । बल्कि मै ता खुद ही बेचने का इच्छुक हू ।"
“अच्छा ! कितने की देंगे आप अपनी जमीन?"
“प पच्चीस करोढ़ ।”
इकरामुद्दीन ने तुरंत कहा था…"मैं बीस करोड़ से ज्यादा नहीं दे सकता एसएसपी साहब ।"’
शौकत अंसारी सकपका गया । उसने चौंककर इकरामूद्दीन की तरफ देखा ।
शब्द मुंह से खुद फिसलते चले गए--“प पर आपने तो खुद पच्चीस लगाए थे एमपी साहब ।"
"वो तुम्हारे थानेदार के पास जाने से पहले की बात थी ।"
पलक झपकते ही शौकत की समझ में यह बात आ गईं कि थानेदार के पास जाने की सजा के तौर पर पांच करोड़ कम कर दिए गए हैं । झटका तो लगा । दिमाग में यह बिचार भी उठा कि क्या उसे बीस करोढ़ कबूल कर लेने चाहिए लेकिन तभी, गिरधर की यह बात जेहन में कौधं गई कि "वे चाहे तो ज़मीन मुफ्त में भी उनकी हो सकती है ।' अत: बगेर ज़रा भी देर किए वोला…"म मुझे मंजूर हे । आप जो भी दे मुझे मंजूर हे ।"'
"अच्छी तरह सोच लीजिए, कोई जबरदस्ती तो नहीँ कर रहा आपसे ।" शफ्फाक शाही ने कहा था…"जब तक मैं' करांची का एस एसपी हू तब तक शहर मै कोई गैरकानूनी काम नहीँ हो सकता । बहरहाल, पुलिस होती ही कानून लागू करने के लिए हे ।"
"ज-जी नहीँ, मेरे साथ किसी के द्धारा कोई जबरदस्ती नहीँ की जा रही । मैँ खुद अपनी जमीन बीस करोड़ में बेचने को तैयार हूं।”
"तो फिर आपके बीच पुलिस का दख्ल खत्म हो जाता हे ।"
इकरामूद्दीन बोला…"निकालो कागज. . और साइन करो ।"'
"क-कागज तो बैंक के लाकर मेँ हैं ।"' खौफ की ज्यादती के कारण शौकत अंसारी का हलक सूख गया था…"आप कल बेंक खुलते ही आ जाइएगा । बल्कि आप पर टाइम न हो तो कोइ जरूरी नहीँ हे कि खुद ही आएं । किसी क्रो भेज दीजिएगा । मै सारे कागज साइन करके उसे दे दूगा । ये मेरा वादा "हे ।”
"क्यों हाजी ? " इकरामुद्दीन ने पूछा था…"क्या कहते हो ।”
"तब तक इसकी बेटी हमारी मेहमाननवाजी में रहेगी । " सुरैया की तरफ एकटक देख रहे हाजी गल्ला ने जब ऐसा कहा तो शौकत के हलक से निकली चीख ने पूर मकान क्रो दहला दिया…“नहीं।"
तीनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन देख तीनों शौकत की तरफ ही रहे थे और शौकत का हाल खौफ की ज्यादती के कारण बहुत बुरा था । वह कहता चला गया…"ऐसा नहीं हो सकता ।"
"कैसा नहीँ हो सकता?” हाजी गल्ला ने गुर्राकर पूछा था ।
"सुरैया तुम्हारी भी बेटी जैसी है ।"' शौकत गिढ़गिड़ा उठा था ।
"यही तो दिक्कत हे अंसारी, कब से पैदा करने की कोशिश कर हूं मगर खुदा ने मुझे अभी तक एक वेटी नहीँ दी । मुकिन्न हे तुम्हारी बटी मेरे जीवन की इस सबसे बडी कमी को पूरी कर दे ।"
“बात हमारी समझ में नहीं आई ।" इकरामुद्दीन ने उसकी बात काटी…"सुबह तक गारंटी के तोर पर यदि हाजी गल्ला सुरैया को अपने पास रखना चाहता है तो इसमें एतराज की क्या बात हे?”
“कानूनुन भी इसमें कोई गलत बात नहीं हे।" शफ्फाक शाही बोला…“कोइ अपने वादे से मुकर न जाए, इसके लिए गारंटी के तौर पर कोइ न कोइ चीज तो अपने पास रखनी ही पड़ती है ।"
" मै तैयार हूं ।" खालिदा ने कहा…“गारंटी के तोर पर में तुम्हारे साथ चलने को तैयार हू ।"
“तेरा क्या अचार डालूगा बुढिया ।." कहने के साथ हाजी गल्ला ने झपटकर न सिर्फ सुरैया की कलाई पकड़ ली थी बल्कि एक झटक से उसे अपनी तरफ खींच भी तिया था ।
सुरैया कं हलक से निकली चीख ने मुकम्मल मकान क्रो झकझोर कर रख दिया ओर...उसी कै साथ मकान को झकझोरा था एक और दहाड़ ने ।
उस दहाड ने जो जावेद के हलक से निकली थो-“अगर किसी ने मेरी बहन को हाथ लगाने की कोशिश की तो में उसकी लाश बिछा दूंगा । छोड सुंरया को ।”
इस दहाड के साथ वह सीढियां उतरता हुआ लाबी में नहीं पहुचा था बल्कि जहां वे जेड का आकार बनाती थीं वहां से सीधा वहां कूदा था जहां सुरैया का हाथ पकडे हाजी गल्ला खडा था ।
और...इससे पहले कि हाजी गल्ला कुछ समझ पाता, एक ही झटके में उसने सुरैया की कलाई उससे छुडा ली थी ।
"य ये क्या किया जावेद ? ये क्या किया तूने !" शोकत अंसारी चीख पडा आ…"तूसामने क्यों आया ?"
"भैया...भैया ।" कहकर सुरैया उससे लिपट गइ थी ।
“जब तक तेरा भाई हे सुंरैया, तब तक कोई तुझे हाथ नहीं लगा सकता ।” कहने कै साथ जावेद ने सुंरेया को पकडा, अपने सीने से अलग कर पीठ की तरफ किया और पहाड़ की तरह हाजी गल्ला के सामने अड़ता हुआ गुर्राया-“मेंने तेरा बहुत नाम सुना है हाजी गल्ला, लगता हे खुदा ने मुझे यहा' तेरा ही खात्मा करने भेजा हे ।"
"अरे !” हाजी गल्ला हंसा । इकरामुद्दीन आर शफ्फाक शाही से मुखातिब होते हुए कहा उसने-“कहानी में ये नया किरदार कहा से आ गया? हमने तो सुना था अंसारी की सिंफ़ एक बेटी है ।"'
"मैं भी इसी शौकत अंसारी का बेटा हू* हाजी गल्ला ।" जोश में भरा जावेद कहता चला गया…"आज से पहले मैं...
“नहीं जावेद. . .नहीँ । तूउस बारे में कुछ नहीं वोलेगा ।" उसकी बात पूरी होने से पहले ही शौकत चीख पड़ा था।
"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हे एसएसपी साहब कि ये सब आखिर हो क्या रहा है ? " हाजी गल्ला ने शफ्फाक शाही से ऐसे अंदाज़ में कहा था जेसे स्टेज पर नाटक कर रहा हो'-""हम बिलेंस के बीच में अचानक ये हीरो कहा से आ गया ?"
"क्यों बे वैंक क्लर्क, कहा छुपा रखा था अपने इस छ: फूट बेटे को?” इकरामुद्दीन ने दानों हाथों से शोकत का गिरिबान पकडकर उसे झझोड़ते हुए कहा था-"ओर वो कौनसी बात जिसे कहने से तूने अभी अभी इसे रोका हे ?'"
"ऐ... ।" जावेद इकरामुद्दीन की तरफ लपका…"गिरेबान छोड़ मेरे अब्बा का, वर्ना हाथ काटकर फेंक दूंगा ।"
"और अगर तूने ऐसी कोशिश की तो कामयाब हो सको या न हो सक़ मगर मै तेरी मां की खोपडी उडाने में जरूर कामयाब हो जाऊंगा ।" कहने से पहले शफ्फाक अपने होलेस्टर से रिवाल्वर निकालकर खालिदा के सिर से सटा चुका था।
जावेद ने उस दृश्य को देखा ता जेसे फट पड़ा-"तुप सब साले कायर हो । और ओरतां की आढ़ क्या लेते हो ! शेर की तरह सामने आकर बात करो ।।मै जबाब दूगा तुम्हें ।"
"सबसे पहले एमपी साहब को छोड ।"
जावेद उसी पोज़ में अपने स्थान पर खडा दहाडता रहा । एसएसपी गुराया-"छोड़ता है...या दबा दूंट्रेगर ?" भभकते जावेद ने इकरामुद्दीन का कालर छोड दिया ।
"हाजी गल्ला ।'" एसएसपी न कहा…"गारंटी के तौर पर अगर हम लडकी की जगह लढ़के क्रो ले जाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा । ”
"इसका क्या करेंगे एसएसपी साहब, ये तो साला...
"बहुत कुछ कर सकते हैं हाजी गल्ला । "' एसएसपी ने उसकी बात काटी-“दिमाग से सोच, बहुत नाम सुना है इसने तेरा । कोई बहुत बडी कहानी खुलकर सामने आ सकती हे ।”
"पर लडकी. ..
"लडकी कहा जारही है.'” एसएसपी ने आंख मारीं…"वो तो वहीँ हे, जहां अब तक थी । हमारी पकड़ से बाहर थोडी हो जाएगी ! "
जाने क्या सोचकर हाजी गल्ला चुप रह गया ।
"बोल ।"' एसएसपी ने जावेद से कहा-"गारंटी के तौर पर तू हमारे साथ चल रहा है या तेरी बहनिया क्रो ले जाएं र”
"नहीं...नहीं ।"' शौकत चीखा…"तुम मेरे बेटे क्रो कहीं नहीं ले जाओगे । मैं तुम्हारे साथ चलने क्रो तैयार हू ।'"
"तुझसे बात नहीं हो रही शौकत । एसएसपी साहब तेरे बटे से बात कर रहे हें ।" इकरामुद्दीन ब्रोला-“उसे जवाब देने दे।'"
जावेद समझ चुका था कि इस वक्त उनसे उलझकर वह किसी भी तरह फायदे में नहीं रह सकता था अत: बोला…"में तुम्हारे साथ चलने को तेयार हूं । देखता हूंकहां ले जाते हो ।”
"ओके ।" शफ्फाक शाही ने एक बार फिर हाजी गल्ला की तरफ आंख मारी थी…“बाहर निकलकर गाडी में बैठ ।"’
हाजी गल्ला इससे ज्यादा कुछ न समझ पाया कि एसएसपी के दिमाग में कुछ है इसलिए वह कुछ न बोला जबकि घर से निकलते वक्त भी वह घूरता सुरैया को ही रहा था ।
शौकत, खालिदा और सुरैया चीखते रह गए ये । उन्होने जावेद को गाडी में बैठा लिया । किवला की समझ में कुछ न आ रहा था । गाडी के जाते ही गिरधर घर से बाहर निकला । उसने पूछा-“क्या हुआ शौकत, वे जावेद को अपने साथ क्यों ले गए हैँ और खालिदा बहन पर रिवाल्वर क्यों तान रखा था उन्होंने ?"
पीछे पीछे आरती भी वहां पहुंच गइ थी ।
उसके चेहरे पर हवाइया उढ़ रहीँ थीं ।
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शौकत और गिरधर के बीच तय हुआ कि 'उनके' आने पर चाहे जो होता रहे लेकिन गिरधर को सामने नहीं आना है क्योंकि उससे कोइ लाभ होने वाला न था । उल्टा, गिरधर भी उनकी निगाह में आ जाता । वैसे भी, जब वे 'उनकी' बात मानने को तेयार थे त्तो गढ़बढ़ ही क्या होनी ।"
शौकत ने सारी बातें खालिदा को बता दी थीं । शौकत की ही तरह, उसे भी पिचहत्तर करोढ़ का अफ़सोस तो था परंतु हालात क्रो देखते हुए जो फैसला लिया गया था, वही ठीक लगा ।
सुबह के दस बजे ही शोकत फस्ट फ्लोर के अपने उस कमरे में जम गया जिसकी खिडकी से मकान के सामने कै पूरे हिस्से क्रो साफ देखा जा सकता था । ऐसा उसने इसलिए किया था ताकि सांकल बजने से पहले ही उनके आगमन का पता लग जाए या इसे उसके अंदर की बेचैनी भी कही जा सकती थी ।
यह बैचेनी समय के साथ बढती चली गइ क्योंकि शाम ढलने तक भी वे नहीँ आए थे । लाइटें आन हो गईं ।
शौकत को लगने लगा कि शायद वे आएंगे ही नहीं । यह एक ही काम थोडी हे उन्हें ।
अनेक काम हें । अपनी व्यस्तताआं में उलझ गए होंगे । शायद कल आएं । या उसक भी बाद ।
लेकिन अगर ऐसा हुआ तो बैंक में आएंगे क्योकि वे जानते हैं कि मैं सारे दिन बैंक में मिलता हूं । खुदा करे ऐसा ही हो ।
ये सारे बिचार उसे बहुत राहत पहुंचा रहे थे ।
मगर यह राहत केवल रात कें नो बजे तक पहुची क्योकि ठीक नो बजे उसने उसी लंबी गाडी को आम के दोनों पेडों के बीच रुकते देखा जिसमेँ वे परसों आए थे ।
सफेद रंग की गाडी थी वह ।
उसे देखते ही शौकत का दिल उछल उछलकर उसके कंठ की गोली से टकराने लगा ।
सबसे पहले हकरामुद्दीन गाडी से निकला, उसक बाद हाजी गल्ला और फिर, तीसरा शख्स ।
तीसरे शख्स को देखकर तो शौकत अंसारीकेे हाथ पांव ही ठंडे पढ़ने लगे क्योंकि उसके जिस्म पर पुलिस क्री वर्दी ही नहीं बल्कि कंधे पर स्टार कै साथ चांद तारे का निशान भी लगा था ।
शौकत क्रो समझते देर न लगी कि वह पुलिस का कोई बड़ा अफसर हे ।
यह बात उसके जेहन को सनसनाए दे रही थी कि वे अपने साथ पुलिस के इतने बडे अफसर को क्यों लाए हैं ?
बात...उसकी समझ में न आनी थी, न आई ।
वे मुख्यद्वार की तरफ बढे ।
वह तेजी से उठा । कमरे से निकला और फिर लगभग दौड़ते हुए सीढियां त्तय करने लगा । लाबी में बैठे खालिदा, सुरैया, किबला ओर जावेद उसकी हालत देखकर चौंक पड़े थे ।
जावेद ने तो पूछ भी लिया…“क्या हुआ अब्बा? आप इस कदर हढ़बड़ाए हुए क्यों हैं ?"
जावेद के सबाल पर जरा भी ध्यान दिए बगेर शौकत ने उत्तेजित अवस्था मेँ खालिदा से कहा-"वे आ गए ।'"
"ओह ।" खालिदा का चेहरा पसीने से नहा गया ।
जावेद को वह सब असामान्य लगा ।
उसन पूछा… "कौन आए हें अब्बा ?"
जावेद के पूछने के अंदाज पर शोकत क्रो पहली बार एहसास हुआ कि वह ओवर रिएक्ट कर गया है ।
इस बार थोडा संभलकर बोला…"क कुछ नहीं बेटे, मेरे बैंक के साथी हे । मिलने आए हे ।'"
"तो इस कदर घबराने की क्या जरूरत है और उनक आने की खबर से अचानक मम्मी को इतना पसीना क्यों आ गया हे ? ओर, आपने कहा कि वे आ गए-इसका मतलब वे ऐसे लोग हें जिनका आपको इंतजार था । मेरे ख्याल से तो आप सुबह से अपने ऊपर वाले कमरे में जो बेठे थे, उन्हीं का इंतजार कर रहे थे !"'
तभी सांकल बजी ।
शौकत अंसारी कुछ और हड़बड़ा गया…"क-कुछ नहीं, बस तेरे ही कारण । उनकी नज़र तुझ पर पढ़ गई तों...तूऊपर जा ।”
हालांकि किसी के भी आने पर उसे ऊपर भेजने की यह क्रिया पहले भी कई बार हो चुकी थी मगर इस बार जावेद को खटकी ।
सांकल फिर बजी ।
"जल्दी जा ।" शौकत ने जावेद को धक्का सा दिया…" वर्ना वे सोचेंगे दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों ही रही है ।”
असमंजस मेँ फसे जावेद को सीढियों की तरफ बढना पड़ा ।
"खोलते हैं भईं ।'" कहता हुआ शौकत दरवाजे की तरफ लपका मगर दरवाजा उसने तब तक न खोला जबतक जावेद लाबी मे नज़र आना बंद न हो गया । और...दस्वाजा खुलते ही वे तीनों इस तरह धड़धड़ाते हुए अंदर आ गए जेसे उनका अपना घर हो ।
गेंठे कद का इकरामुद्दीन परंपरागत यानी नेता वाले लिबास में था और वह, जिसे शौकत अंसारी हाजी गल्ला के नाम से जानता था किसी भी तरह छ: फुट दो इंच से कम न था ।
उसके पहाढ़ जैसे बलिष्ट जिस्म पर काले रंग का पठानी सूट था । चेहरा अत्यंत चौडा । मोटे-मोटे होंठ । लंबी नाक और ज़रूरत से ज्यादा बाहर को निकली हुइ ठोडी । मस्तक वहुत चौडा था और पीछे की तरफ क्रो कढे हुए लंबे बाल ।
वह जितनी वार भी शौकत के सामने आया था, उस पर उसने खास ध्यान न दिया था । उसकी तवज्जौ इकरामूद्दीन पर ही रहती थी क्यो़कि हाजी गल्ला की हस्ती से वाकिफ न था ।
जबकि इकरामुद्दीन को एमपी कै रूप में जानता था ।
पिछली मुलाकातों में हाजी गल्ला को उसने इकरामुद्दीन का वेसा ही चमचा समझा था जैसे नेताओं के साथ रहते हैं ।
इस बार उसने खास तवब्जौ दी और तवब्जी देते ही रूह फना हो गई उसकी क्योंकि उसकी लाल सुर्खं, गोलमटोल और बही बडी आंखें सुरैया पर स्थिर थीं ।
पिछली बार भी उसने नोट किया था कि हाजी गल्ला ने सुरैया क्रो अच्छी नज़रों से नहीं देखा था मगर इस बार. . .बल्कि इस वक्त उसने महसूस किया कि हाजी गल्ला के चेहरे पर ऐसे भाव हें जेस सुरैया को आंखों ही आंखों में पी जाना चाहता हो ।
हाजी गल्ला के देखने कै अंदाज पर सुरैया सहम गई थी और डरी हुईं खालिदा ने उसे अपने पीछे छुपाने की कोशिश की यी ।
शौकत ने कहा…"'खालिदा, सुरैया को अंदर ले जाओ ।"
"क्यों भइ, खडी रहने दो उन्हें भी यहीं । " हाजी गल्ला कें चेहरे पर बडी ही खतरनाक मुस्कान थी…“हम क्या खा जाएंगे ।"
खालिदा सुरैया को लेकर किचन की तरफ बढी थी ।
"ऐ! सुना नहीं तूने ।" हाजी गल्ला की आवाज सननाटे पर तैरती सीटी की-सी आवाज थी…“यहीं खडी रह ।"
"आपके लिए चाय बनाने जा रहे हैं भाईजान ।'"
“ये किस मर्ज की दवा है ?" उसने किबला की तरफ देखा ।
खालिदा के होश फाख्ता ।
शौकत बोला…"आपफे आफर पर मैंने सोच लिया है । जेसा कहैं, वैसा करने को तैयार हू' ।”
"कहां तैयार हे !” इकरामूद्दीन बोला…"तूतो उस कटारीदार मूंछ वाले थानेदार के पास गया था !"
इस एहसास ने शौकत के होश उड़ा दिए कि इकरामुद्दीन को उस बारे में पता था । हकलाता हुआ बोला…“ग गलती हो गई एमपी साहब, माफ कर दीजिए ।"'
“थानेदार के क्या बस का था । इनसे मिलो ।"’ उसने पुलिस के अफसर की तरफ इशारा क्रिया-"ये एसएसपी भी हैं और हमारे दोस्त भी-मिस्टर शफ्फफाक शाही । तुम्हारी जो भी कंपलंट हे, इनसे कहो । ये तुम्हारी हर प्राबलम को अपनी प्राबलम समझकर हल करें गे । हे न, शफ्फफाक शाही साहब !"
"जरूर...जरूर मिस्टर अंसारी, हम तो आए ही इसलिए हैं ।" कहते वक्त एसएसपी के होठों पर जो मुस्कान थी उसने शौकत के तिरपन कंपा दिए थे-"वोलिए कौन आपकी ज़मीन को जबरदस्ती खरीदना चाहता है । आखिर करांची में पुलिस भी हे !"'
"नहीँनहीँ । मुझे किसी के खिलाफ क्रोइ कंपतेंट नहींकरनी ।” शौकत अपनी आवाज़ में पैदा होनेवाले कपन का बडी मुश्किल से रोके हुए था…"कोई मेरी जमीन जबरदस्ती नहीँ खरीदना चाहता । बल्कि मै ता खुद ही बेचने का इच्छुक हू ।"
“अच्छा ! कितने की देंगे आप अपनी जमीन?"
“प पच्चीस करोढ़ ।”
इकरामुद्दीन ने तुरंत कहा था…"मैं बीस करोड़ से ज्यादा नहीं दे सकता एसएसपी साहब ।"’
शौकत अंसारी सकपका गया । उसने चौंककर इकरामूद्दीन की तरफ देखा ।
शब्द मुंह से खुद फिसलते चले गए--“प पर आपने तो खुद पच्चीस लगाए थे एमपी साहब ।"
"वो तुम्हारे थानेदार के पास जाने से पहले की बात थी ।"
पलक झपकते ही शौकत की समझ में यह बात आ गईं कि थानेदार के पास जाने की सजा के तौर पर पांच करोड़ कम कर दिए गए हैं । झटका तो लगा । दिमाग में यह बिचार भी उठा कि क्या उसे बीस करोढ़ कबूल कर लेने चाहिए लेकिन तभी, गिरधर की यह बात जेहन में कौधं गई कि "वे चाहे तो ज़मीन मुफ्त में भी उनकी हो सकती है ।' अत: बगेर ज़रा भी देर किए वोला…"म मुझे मंजूर हे । आप जो भी दे मुझे मंजूर हे ।"'
"अच्छी तरह सोच लीजिए, कोई जबरदस्ती तो नहीँ कर रहा आपसे ।" शफ्फाक शाही ने कहा था…"जब तक मैं' करांची का एस एसपी हू तब तक शहर मै कोई गैरकानूनी काम नहीँ हो सकता । बहरहाल, पुलिस होती ही कानून लागू करने के लिए हे ।"
"ज-जी नहीँ, मेरे साथ किसी के द्धारा कोई जबरदस्ती नहीँ की जा रही । मैँ खुद अपनी जमीन बीस करोड़ में बेचने को तैयार हूं।”
"तो फिर आपके बीच पुलिस का दख्ल खत्म हो जाता हे ।"
इकरामूद्दीन बोला…"निकालो कागज. . और साइन करो ।"'
"क-कागज तो बैंक के लाकर मेँ हैं ।"' खौफ की ज्यादती के कारण शौकत अंसारी का हलक सूख गया था…"आप कल बेंक खुलते ही आ जाइएगा । बल्कि आप पर टाइम न हो तो कोइ जरूरी नहीँ हे कि खुद ही आएं । किसी क्रो भेज दीजिएगा । मै सारे कागज साइन करके उसे दे दूगा । ये मेरा वादा "हे ।”
"क्यों हाजी ? " इकरामुद्दीन ने पूछा था…"क्या कहते हो ।”
"तब तक इसकी बेटी हमारी मेहमाननवाजी में रहेगी । " सुरैया की तरफ एकटक देख रहे हाजी गल्ला ने जब ऐसा कहा तो शौकत के हलक से निकली चीख ने पूर मकान क्रो दहला दिया…“नहीं।"
तीनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन देख तीनों शौकत की तरफ ही रहे थे और शौकत का हाल खौफ की ज्यादती के कारण बहुत बुरा था । वह कहता चला गया…"ऐसा नहीं हो सकता ।"
"कैसा नहीँ हो सकता?” हाजी गल्ला ने गुर्राकर पूछा था ।
"सुरैया तुम्हारी भी बेटी जैसी है ।"' शौकत गिढ़गिड़ा उठा था ।
"यही तो दिक्कत हे अंसारी, कब से पैदा करने की कोशिश कर हूं मगर खुदा ने मुझे अभी तक एक वेटी नहीँ दी । मुकिन्न हे तुम्हारी बटी मेरे जीवन की इस सबसे बडी कमी को पूरी कर दे ।"
“बात हमारी समझ में नहीं आई ।" इकरामुद्दीन ने उसकी बात काटी…"सुबह तक गारंटी के तोर पर यदि हाजी गल्ला सुरैया को अपने पास रखना चाहता है तो इसमें एतराज की क्या बात हे?”
“कानूनुन भी इसमें कोई गलत बात नहीं हे।" शफ्फाक शाही बोला…“कोइ अपने वादे से मुकर न जाए, इसके लिए गारंटी के तौर पर कोइ न कोइ चीज तो अपने पास रखनी ही पड़ती है ।"
" मै तैयार हूं ।" खालिदा ने कहा…“गारंटी के तोर पर में तुम्हारे साथ चलने को तैयार हू ।"
“तेरा क्या अचार डालूगा बुढिया ।." कहने के साथ हाजी गल्ला ने झपटकर न सिर्फ सुरैया की कलाई पकड़ ली थी बल्कि एक झटक से उसे अपनी तरफ खींच भी तिया था ।
सुरैया कं हलक से निकली चीख ने मुकम्मल मकान क्रो झकझोर कर रख दिया ओर...उसी कै साथ मकान को झकझोरा था एक और दहाड़ ने ।
उस दहाड ने जो जावेद के हलक से निकली थो-“अगर किसी ने मेरी बहन को हाथ लगाने की कोशिश की तो में उसकी लाश बिछा दूंगा । छोड सुंरया को ।”
इस दहाड के साथ वह सीढियां उतरता हुआ लाबी में नहीं पहुचा था बल्कि जहां वे जेड का आकार बनाती थीं वहां से सीधा वहां कूदा था जहां सुरैया का हाथ पकडे हाजी गल्ला खडा था ।
और...इससे पहले कि हाजी गल्ला कुछ समझ पाता, एक ही झटके में उसने सुरैया की कलाई उससे छुडा ली थी ।
"य ये क्या किया जावेद ? ये क्या किया तूने !" शोकत अंसारी चीख पडा आ…"तूसामने क्यों आया ?"
"भैया...भैया ।" कहकर सुरैया उससे लिपट गइ थी ।
“जब तक तेरा भाई हे सुंरैया, तब तक कोई तुझे हाथ नहीं लगा सकता ।” कहने कै साथ जावेद ने सुंरेया को पकडा, अपने सीने से अलग कर पीठ की तरफ किया और पहाड़ की तरह हाजी गल्ला के सामने अड़ता हुआ गुर्राया-“मेंने तेरा बहुत नाम सुना है हाजी गल्ला, लगता हे खुदा ने मुझे यहा' तेरा ही खात्मा करने भेजा हे ।"
"अरे !” हाजी गल्ला हंसा । इकरामुद्दीन आर शफ्फाक शाही से मुखातिब होते हुए कहा उसने-“कहानी में ये नया किरदार कहा से आ गया? हमने तो सुना था अंसारी की सिंफ़ एक बेटी है ।"'
"मैं भी इसी शौकत अंसारी का बेटा हू* हाजी गल्ला ।" जोश में भरा जावेद कहता चला गया…"आज से पहले मैं...
“नहीं जावेद. . .नहीँ । तूउस बारे में कुछ नहीं वोलेगा ।" उसकी बात पूरी होने से पहले ही शौकत चीख पड़ा था।
"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हे एसएसपी साहब कि ये सब आखिर हो क्या रहा है ? " हाजी गल्ला ने शफ्फाक शाही से ऐसे अंदाज़ में कहा था जेसे स्टेज पर नाटक कर रहा हो'-""हम बिलेंस के बीच में अचानक ये हीरो कहा से आ गया ?"
"क्यों बे वैंक क्लर्क, कहा छुपा रखा था अपने इस छ: फूट बेटे को?” इकरामुद्दीन ने दानों हाथों से शोकत का गिरिबान पकडकर उसे झझोड़ते हुए कहा था-"ओर वो कौनसी बात जिसे कहने से तूने अभी अभी इसे रोका हे ?'"
"ऐ... ।" जावेद इकरामुद्दीन की तरफ लपका…"गिरेबान छोड़ मेरे अब्बा का, वर्ना हाथ काटकर फेंक दूंगा ।"
"और अगर तूने ऐसी कोशिश की तो कामयाब हो सको या न हो सक़ मगर मै तेरी मां की खोपडी उडाने में जरूर कामयाब हो जाऊंगा ।" कहने से पहले शफ्फाक अपने होलेस्टर से रिवाल्वर निकालकर खालिदा के सिर से सटा चुका था।
जावेद ने उस दृश्य को देखा ता जेसे फट पड़ा-"तुप सब साले कायर हो । और ओरतां की आढ़ क्या लेते हो ! शेर की तरह सामने आकर बात करो ।।मै जबाब दूगा तुम्हें ।"
"सबसे पहले एमपी साहब को छोड ।"
जावेद उसी पोज़ में अपने स्थान पर खडा दहाडता रहा । एसएसपी गुराया-"छोड़ता है...या दबा दूंट्रेगर ?" भभकते जावेद ने इकरामुद्दीन का कालर छोड दिया ।
"हाजी गल्ला ।'" एसएसपी न कहा…"गारंटी के तौर पर अगर हम लडकी की जगह लढ़के क्रो ले जाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा । ”
"इसका क्या करेंगे एसएसपी साहब, ये तो साला...
"बहुत कुछ कर सकते हैं हाजी गल्ला । "' एसएसपी ने उसकी बात काटी-“दिमाग से सोच, बहुत नाम सुना है इसने तेरा । कोई बहुत बडी कहानी खुलकर सामने आ सकती हे ।”
"पर लडकी. ..
"लडकी कहा जारही है.'” एसएसपी ने आंख मारीं…"वो तो वहीँ हे, जहां अब तक थी । हमारी पकड़ से बाहर थोडी हो जाएगी ! "
जाने क्या सोचकर हाजी गल्ला चुप रह गया ।
"बोल ।"' एसएसपी ने जावेद से कहा-"गारंटी के तौर पर तू हमारे साथ चल रहा है या तेरी बहनिया क्रो ले जाएं र”
"नहीं...नहीं ।"' शौकत चीखा…"तुम मेरे बेटे क्रो कहीं नहीं ले जाओगे । मैं तुम्हारे साथ चलने क्रो तैयार हू ।'"
"तुझसे बात नहीं हो रही शौकत । एसएसपी साहब तेरे बटे से बात कर रहे हें ।" इकरामुद्दीन ब्रोला-“उसे जवाब देने दे।'"
जावेद समझ चुका था कि इस वक्त उनसे उलझकर वह किसी भी तरह फायदे में नहीं रह सकता था अत: बोला…"में तुम्हारे साथ चलने को तेयार हूं । देखता हूंकहां ले जाते हो ।”
"ओके ।" शफ्फाक शाही ने एक बार फिर हाजी गल्ला की तरफ आंख मारी थी…“बाहर निकलकर गाडी में बैठ ।"’
हाजी गल्ला इससे ज्यादा कुछ न समझ पाया कि एसएसपी के दिमाग में कुछ है इसलिए वह कुछ न बोला जबकि घर से निकलते वक्त भी वह घूरता सुरैया को ही रहा था ।
शौकत, खालिदा और सुरैया चीखते रह गए ये । उन्होने जावेद को गाडी में बैठा लिया । किवला की समझ में कुछ न आ रहा था । गाडी के जाते ही गिरधर घर से बाहर निकला । उसने पूछा-“क्या हुआ शौकत, वे जावेद को अपने साथ क्यों ले गए हैँ और खालिदा बहन पर रिवाल्वर क्यों तान रखा था उन्होंने ?"
पीछे पीछे आरती भी वहां पहुंच गइ थी ।
उसके चेहरे पर हवाइया उढ़ रहीँ थीं ।
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