• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

छोटी-छोटी रसीली कहानियां, Total 18 stories Complete

.

वो उस दिन अकेला था और भैंसों के लिए चारा काट रहा था। मुझे देखकर उसने मशीन बंद कर दी और मेरी तरफ खाना लेने आया। मगर यह क्या उसने तो खाना पकड़ने के बहाने मेरी कलाई ही पकड़ ली।

मैंने कहा- “यह क्या कर रहे हो?”

वो बड़े ही अल्ल्हड़पन के साथ बोला- “तेरी कलाई पकड़कर देख रहा हूँ कि जवानी वाली चमड़ी आई भी है या नहीं…” मैं छटपटा कर उससे अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी मगर उसने खाने का डिब्बा किनारे रखकर मुझे अपनी तरफ खींचा।

मैंने उससे विनती करते हुए कहा- “जाने दे मुझे, रब के वास्ते जाने दे मुझे…”

वो बोला- “चली जाना, आज तेरे घर पर कोई भी तो नहीं है। सब तो शादी में गए हुए हैं। तू अकेली वहाँ क्या करेगी?” और इतना कहते हुए उसने मेरे उभरते हुए अनारों को ऊपर से रगड़ा और मुझे बाँहों में जकड़ लिया और मेरे होंठ चूमने लगा। मैं इस अकस्मात हमले को झेल नहीं पाई। हालाँकि मुझे इन सब चीजों का ज्ञान था मगर सम्भोग के बारे में मेरा ज्ञान अभी पूरा नहीं था।

मैंने उससे विनती करते हुए फिर से कहा- “कालू जाने दो। मुझे वरना मैं माँ को बता दूँगी…”

वो मेरे उभारों को दबाते हुए बड़बड़ाया- “चुप कर साली। वो कौन सी दूध की धुली हैं। तेरी माँ और चाची दोनों को ठोंक चुका हूँ और वो भी उनकी पहल पर…” फिर उसने मेरी कमीज के बटन खोलते हुए कहा- “अभी कुछ नहीं करूँगा बस ऊपर से ही एक बार मजे लेने दे। मैंने इतनी कच्ची उम्र की कली को कभी नंगा नहीं देखा है। देर ना कर और मुझे ऊपर से ही हलके-फुल्के मजे लेने दे…” इतना कहते हुए उसने मेरी कमीज उतारनी शुरू कर दी और फिर एक ही पल में उसने मेरी कमीज को मेरे शरीर से अलग कर दिया।

मैंने अपने अनारों पर अभी ब्रा डालनी शुरू नहीं किया था, इसलिए कमीज के नीचे कुछ भी नहीं था।

मेरे उभरते हुए अनारों को देखते ही उसका मुँह खुला का खुला रह गया और उसने कहा- “हाय कितनी मस्त है तेरी जवानी…”

जब उसने मेरे दाल के दाने जैसे चूचुकों को चुटकी में लेकर मसला तो मानो मुझे स्वर्ग का मजा मिल गया। उसने अपना सर झुका कर अपने होंठों से मेरे चूचुक चूसने शुरू कर दिए। मेरे तीस इन्ची अनार उसके मुँह में पूरे आ रहे थे। वो कमाल कर रहा था। मुझे बहुत-बहुत-बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था। जी हाँ दोस्तों, इतना मजा तो मुझे आज भी नहीं आता जितना मजा मुझे उस पहली बार में आया था।

मैं उसके बालों में हाथ फेर रही थी और वो मेरे चूचुक चूस रहा था। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था। उसने चूचुक चूसते हुए सलवार का नाड़ा खींच दिया और मेरी सलवार नीचे सरक गई। मैंने आज सलवार के नीचे भी कुछ नहीं पहना था। हल्के भूरे बालों से भरी मेरी गुलाबी होंठों वाली चूत देखकर उसका बुरा हाल हो गया। और जब उसने मेरी चूत के होंठ को अलग करके उसपर हाथ फेरा तो…

हाय… मैं क्या बताऊँ, मैं सिसकने लगी। मैं अपने होश खोने लगी थी और मैंने कहे- “काले, छोड़ दे मुझे। कुछ कुछ होता है…”

“मैं तेरी नहीं लूँगा, यह वादा रहा मेरा। बस तू अपनी मर्जी से मुझे मजे लेने दे। वरना मैं जबरदस्ती ले ही लूँगा…”

वैसे मुझे बहुत मजा आ रहा था। उसने मुझे बोरियों से बने तख़्त पर लिटाया और मेरे टांगो के बीच में खुद बैठ गया। उसने अपनी दो उँगलियों से मेरे चूत के होंठ फैलाए और अपनी जीभ उसपर रख दी। मैं तो पागल सी हो रही थी। वो अपनी जीभ से मेरी चूत को चाट रहा था, उसकी खुरदरी जीभ मेरी कोमल चूत पर रगड़ खा रही थी और मेरी चूत अजीब सी अकड़न के साथ फुदक रही थी।

उसने कहा- “कितनी साफ सुथरी कुँवारी चूत है। पहली बार एक कच्ची लड़की की चूत देख रहा हूँ…” और वो मजे ले-लेकर मेरी चूत को चूसने लगा। इसी बीच उसने अपना पजामा उतार दिया और फिर अपना कच्छा भी उतार दिया।

हाय राम… जब मैंने उसका काला नाग जो पहले किसी चमड़ी के हिस्से की तरह लटक रहा था, उसे अपना सर उठाते हुए देखा, मेरी तो जान ही निकल गई। फिर उसका वो काला नाग देखते ही देखते एक लोहे का डण्डा जैसा हो गया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपना लौड़ा पकड़ाकर बोला- “ले मेरी जान… इसे पकड़कर इसके साथ खेल। एक ना एक दिन तो तुझे इसको अपनी चूत में डलवाना ही पड़ेगा। अगर मैं नहीं डालूँगा तो कोई और डाल देगा। शादी के बाद तो तेरा खसम रहम नहीं खायेगा। इसको तो फटना ही होगा आज नहीं तो कल। चल चूम ले इसे और मजे लेते हुए मजे दे…”

मैंने उसके लौड़े को सहलाकर देखा और फिर मुँह में लेने की कोशिश की। मगर वो लौड़ा था कि मेरे मुँह में समां नहीं रहा था।

वो बोला- “अपनी जबान से चाट-चाटकर मेरा पानी निकलवा दे। फिर चली जाना…”

मैं बड़ी असमंजस में थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि काला कौन से पानी का बात कर रहा है। इसी उधेड़बुन में मैंने उसे पूछा- “पानी… कैसा पानी निकालना है?”

वो मुझे समझाते हुए और मेरे मम्मे दबाते हुए बोला- “अरे मेरी जान… इसके अंदर से पानी निकलता है, जिससे बच्चा होता है। अगर कल को तेरा खसम अपना पानी तेरी चूत के अंदर निकालेगा, तब जाकर तू माँ बनेगी। चल चाट ले इसे…” काला अपना लण्ड हाथ में लेकर मेरे चेहरे के करीब बैठकर मुठ मारने लगा। वो मेरे होठों से अपने लण्ड को रगड़-रगड़कर मुठ मार रहा था।


.

.
 
.

अचानक ही वो उठा और नीचे जाकर मेरी चूत पर अपना लण्ड सटाकर घिसने लगा। मैं उसकी इस क्रिया से मचल उठी। मुझे अजीब सा मजा आने लगा। वो मेरी हालत समझ रहा था और इतने में ही उसने मुझसे पूछा- “थोड़ा घुसा के दिखाऊँ?”

मैं कुछ नहीं बोल पाई। उसने इसे मेरी रजामंदी मानकर मेरी चूत के होंठ फैलाकर हल्के से अपने लण्ड का टोपा मेरी चूत पर रख दिया और एक हाथ से मेरे चूचे दबाने लगा और दूसरे हाथ से चूत के ऊपर उभरे दाने को रगड़ने लगा। उसने अपने लौड़े पर और मेरे चूत पर थोड़ा थूक लगाया और लौड़े को झटका दिया।

दर्द के मारे मेरी तो जान ही निकल गई थी। आखिर एक कुंवारी कन्या की सील बंद चूत जो थी।

उसने मुझे दिलासा देते हुए कहा- “डर मत… घुसेगा नहीं…” वो मेरी चूत पर अपना लण्ड रगड़कर मुठ मारने लगा और फिर एक बार जोर से झटका लगा दिया। उसका टोपा मेरी चूत में फँस गया। दर्द के मारे मैं रोने लगी। उसने आगे डालने की कोशिश नहीं की, वहीं रुक गया और आगे-पीछे करने लगा और साथ ही मेरे दाने को बराबर रगड़ने लगा।

पूरा खिलाड़ी था वो।

मैंने सर उठाकर देखा कि मेरी गोरी चूत पर उसका मोटा काला लौड़ा अटका हुआ था। उसने एक हाथ मेरे मुँह पर रख दिया और एक और झटका मारकर थोड़ा और आगे सरकाया। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आज तो मैंने मर ही जाना है। वह बड़ा ही माहिर था। उसी अवस्था में वो आगे-पीछे करने लगा तो मुझे राहत मिली। उसने पास ही पड़े अपने कच्छे से मेरी चूत को पोंछा और कहा- “देख, तेरी झिल्ली फट गई जान…”

मैंने उसे याद दिलाया कि उसने वादा किया था कि वो कुछ नहीं करेगा।

वो बोला- “बस हो गया जान… अब बस मेरा माल निकाल दूंगा और आगे नहीं करूँगा…” इतना कहकर उसने ढेर सारा थूक लगाया और लौड़ा और अंदर घुसा दिया। अब उसने एक और झटका मारा तो उसका लण्ड मेरी चूत में आधा घुस पाया। और उसी अवस्था में उसने मुझे चोदा। थोड़ी देर अपनी कमर चलाने के बाद उसने अपने लौड़े को मेरी चूत के अन्दर से निकाला और अपने हाथ में थाम कर तेजी से हाथ चलने लगा। अचानक ही तेज धार के रूप में कुछ निकला, गर्म-गर्म सा पानी। उसने वो सारा पानी मेरी चूत के ऊपर निकाल दिया और मुझे चूमता हुआ मेरे ऊपर लुढ़क गया।

कुछ देर बाद उसने कहा- “रुक… तुझे तो मजा दिया ही नहीं। मजा दूंगा तभी तो आगे खुद ही मरवाने आएगी…” इतना कहकर उसने अपनी जबान से दाना रगड़ना चालू किया।

थोड़ी-थोड़ी देर में ऊँगली भी कर लेता था वो। मैं तो हवा में उड़ने लगी। एकदम से मुझे ऐसा लगा जैसे मैं आसमान में उड़ रही हूँ। और फिर एक सैलाब सा आया और मैं आसमान से नीचे गिर पड़ी। मुझे इतना आनंद आया जिसे मैं बयान नहीं कर सकती शब्दों में।

उसने मुझसे कपड़े पहन लेने को कहा और बोला- “जा और किसी से मत कहना कुछ…”

मेरी आधी चूत खुली थी अभी,

मैं आधी कुंवारी थी। एक तीखी टीस मेरी टांगों के बीच उठ रही थी। अब तो वो जब भी घर खाना-वाना लेने आता, मौका देख मेरे मम्मे दबाने लगता और चूचुक चुटकी से मसलने लगता। उस बात को महीना भर हो गया। मेरी छाती में एकदम से बदलाव आने लगा। काफी कसी-कसी सी रहने लगी। महीने बीत जाने के बाद भी उसने मुझे पूरा कभी नहीं चोदा। लेकिन उसके हाथों से मेरे मम्मे बड़े हो गए, मुझे ब्रा डालना शुरू करना पड़ा। उधर मेरा बदन भर गया और अब मेरे ख्यालों में बदलाव आने लगे। लौड़ा तो मैं कब से पकड़ती सहलाती आ रही थी, चूस भी रही थी। मगर चुदवाने का मौक़ा नहीं मिल पाया था अभी तक।

एक दिन में घर पर अकेली थी। कालू खाना लेने आया। उसे नहीं मालूम था कि मैं अंदर अकेली हूँ। लेकिन मैं तो उसका इंतजार कर रही थी, जानबूझ कर मैं खाना देने नहीं गई थी क्योंकी मैं चाहती थी कि वो अन्दर आये। जब कालू खाना लेने आया तब उसे यह नहीं मालूम था कि मैं अन्दर अकेली उसका उन्ताजार कर रही हूँ। मैं चाहती थी कि वो आये और आज मुझे औरत बनने का सुख दे। मेरे मन में आज कुछ अजीब सी उथल पुथल चल रही थी।

कालू जैसे ही घर के दरवाजे पर पहुंचा, उसने हमेशा की तरह मेरी कलाई पकड़ ली। मैंने अपने दूसरे हाथ से उसकी बांह पकड़कर उसको अन्दर खींच लिया और कहा- “आ भी जा मेरे कालू। आज घर पर कोई नहीं है। आज तो मैं अपने कालू को अपने हाथों से खाना खिलाऊँगी…” इतना कहकर मैं उससे लिपट गई।

वोह मुझे चूमने लगा। पहले तो वो मेरे गालों पर चुम्मियां लेने लगा और फिर धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरे अधरों पर रख दिए। मैं तो पहले से ही गर्म थी। सो मैं उसका कुरता उतारने लगी। फिर मैंने अपनी कमीज उतार दी। मेरी ब्रा में कैद मेरे मम्मे देखकर कालू भी जान चुका था कि पहले छूटी अधूरी कहानी को पूरा करने का वक़्त आ गया है।


.

.
 
.

मुझमें बेसब्री का आलम छा चुका था। मैंने उसका पजामा भी उतार फेंका और उसके कच्छे को भी नीचे सरका दिया। उसका काला नाग लटक रहा था। मैंने उसे अपने मुँह में भर लिया और ऐसा करते हुए मैंने अपनी सलवार भी उतार फेंकी।

यह देखकर कालू बड़ा खुश हो गया और बोला- “देखा मेरी गुड़िया। कहा था ना मैंने कि एक दिन तू खुद ही मुझे अपनी लेने के लिए कहेगी…”

मेरे मुँह से भी अचानक ही निकल पड़ा- “कालू… अट्ठारह सावन पार कर चुकी हूँ, और तूने जो आग की चिंगारी महीने भर पहले लगाई थी वो अब शोले का रूप ले चुकी है…”

इतना सुनते ही वो बड़े जोश में आ गया और उसने मेरी ब्रा का हुक खोलते हुए कहा- “गुड़िया रानी… देख तेरे दूध कितने बड़े हो गए हैं। जब पहली बार पकड़ा था, तब अनार थे और आज रसीले आम बन चुके हैं…”

मैं तो अपने होश खो ही चुकी थी। सो मैंने उसके सर को दबाकर अपने मम्मे उसके मुँह के हवाले कर दिए। वो एक हाथ से मेरे बाएँ मम्मे को मसलने लगा और दायें वाले मम्मे को मुँह में लेकर चूसने लगा। मेरे से अब रह पाना मुश्किल हो रहा था। मैंने उसके लौड़े को पकड़ लिया और जोर-जोर से हिलाने लगी। उसने मेरे चूचुक चूस-चूसकर खड़े कर दिए थे।

मैंने भी उसके लौड़े को झुक कर अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगी। मैंने उससे कहा- “कालू, तू तो बाहर मजे लेता रहता है, तेरी घरवाली का क्या होता होगा? बेचारी…”

वह बोला- “उसका क्या है? रात को चढ़वा लेती है मुझे अपने ऊपर। अँधेरे में ही घुसवा लेती है और पानी निकाल देती है…”

कालू ने मुझे अपनी बाहों में उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। अब वो मेरे ऊपर चढ़ गया और मैंने भी अपनी राह साफ करने के लिए खुद ही अपनी टाँगें फैला दी। आग दोनों ही तरफ लगी हुई थी और किसी के लिए भी अब देर करना संभव नहीं था।

उसने अपने लौड़े को मेरी टांगों के बीच में रखकर एक जोरदार झटका दिया। चूत तंग होने के कारण उसका लौड़ा मेरी चूत में फँस गया। मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा था। मगर मैंने तो आज किला फतह करने की सोच रखी थी। इसलिए मैंने चादर को जोर से पकड़ रखा था और मेरे होंठ मेरे दांतों के तले दबे हुए थे। अपनी पीड़ा को सहन करने की मुझे इच्छा शक्ति आ गई थी और इसलिए मैंने उसे नहीं रोका। उसने 2-3 जोरदार झटके लगाये और उसका लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ पूरा मेरे अन्दर चला गया।

वो खुश होते हुए बोला- “लगता है गुड़िया रानी ने आज पूरा लेने का मन बनाया था…”

मैंने कहा- “हाँ मेरे कालू… आज तो मैं पूरी हो जाना चाहती थी…”

यह सुनते ही उसमें घोड़े जैसा जोश भर गया और वो तेजी से अपनी कमर चलाते हुए मुझे पेलने लगा। धीरे-धीरे मेरा दर्द रफू-चक्कर हो गया और मुझे मजा आने लगा। मेरे चूतड़ उठने लगे और मेरे मुख से सिसकारियां छूटने लगी। मेरे मुख से खुद ही निकल पड़ा- “कालू और कर… जोर-जोर से कर… मुझे आज मुझे कच्ची कली से खिला हुआ फूल बना दे…”

कालू मखमल जैसी कली को चोद रहा था और बहुत खुश था। वो बोला- “चल घोड़ी बनाकर लेता हूँ तेरी अब…”

मैंने पूछा- वो कैसे?

वो बोला- तू घुटनों के बल बैठ के झुक कर घोड़ी बन जा।

मैं उसके बताये अनुसार घोड़ी बन गई और उसने मेरे पीछे आते हुए अपना लौड़ा मेरी चूत में पीछे से घुसा दिया। मेरे मम्मे नीचे लटकने लगे थे और उसके धक्कों की ताल पर ताल बजाकर नाच रहे थे। उसने झुक कर मेरे मम्मों को पकड़ लिया और उन्हें रगड़-रगड़कर मजे लेने लगा।

मैं- “हाय रे मेरे कालू… और रगड़ मेरी मम्मों को, बहुत सुख मिल रहा है रे। चोद मुझे और जोर-जोर से चोद…”

अब कालू जोर-जोर से अपनी कमर हिलाने लगा और मुझे चोदने लगा। जब वो झटके लगाने के लिए अपना लौड़ा मेरी चूत से निकालता तो मैं भी अपनी गाण्ड पीछे धकेलती ताकी रगड़ मेरी चूत पर जोर से लगे और पूरा लौड़ा मेरी चूत में समा जाए।

कालू बोला- “साली ऐसा लगता है कि तू अब जहाजी बनने वाली है…”

मैंने उससे पूछा- क्या मतलब है तेरा?

उसने मुझे उत्तर दिया- “मेरा मतलब यह कि तू एक लौड़े से शांत नहीं रहने वाली। तेरे अन्दर की यह आग एक लण्ड से शांत नहीं होने वाली मेरी गुड़िया रानी…”

मैंने कहा- “हाय कालू… तुझे कैसे बताऊँ कि मुझे कैसा सुख मिल रहा है तेरी चुदाई में, बयान नहीं कर पा रही मैं। और इसलिए तो गाण्ड धकेल-धकेल कर मजा ले रही हूँ…”

वो अपने लण्ड को एक बार फिर से जड़ तक पेलते हुए बोला- “साली, पहली चुदाई में इतनी उतावली हो रही है तू… तू तो पक्का जुगाड़ बनेगी लड़कों के लिए…”

मुझे उसके मुँह से ये सब बातें बड़ी अच्छी लग रही थी। मेरे मुख से ठंडी आह सी निकली और मैंने उससे कहा- “आह… चोद मुझे, और चोद… मार मेरी… लेता जा मेरी फुद्दी… मेरी चूत को फाड़ के रख दे रे मेरे काले… तेरा घंटा बहुत ज़ालिम है रे काले…”

कालू जोश में भर के मेरे मम्मे मसलते हुए बोला- “हाय मेरी जान… माँ और चाची से चार कदम आगे है तू…”

थोड़ी देर में मेरा शरीर अकड़ने लगा और फिर एक जोर का ज्वालामुखी मेरी चूत में छूट पड़ा और गरम-गरम लावा मेरी चूत में निकल पड़ा। दोनों शरीरों से निकले लावा ने हम दोनों को तृप्त कर दिया था। जब उसने मुझे छोड़ा तो हम दोनों हांफने लगे थे। कुछ देर चित्त लेटने के बाद हम दोनों ने कपड़े पहने और वो घर से बाहर निकल गया।

एक अलग सा स्वाद वो मेरे जीवन में छोड़ गया और मेरे चेहरे पर संतुष्टि झलक रही थी।


.

***** अगले अपडेट में समाप्त *****

.
 
.

आप सभी तो जानते ही हैं कि कालू के साथ मेरे शारीरिक संपर्क बन चुके थे और हम जब मौका मिलता मस्ती के सागर में डूब जाते थे। तो इसी चक्कर में एक बार कालू ने मुझे मोटर घर में पकड़ लिया और हम दोनों की गर्मी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। हमें कुछ नहीं मालूम था, बस उसका काला लौड़ा मेरी चूत को हलाल करने में लगा था।

जब हम अलग होकर होश में आये तो सामने शंकर को देखकर हमारे चेहरे पर तोते उड़ने लगे। मैं सम्पूर्ण नंगी थी, एक भी कपड़ा तन पर नहीं था। जल्दी से मैंने अपने हाथों से अपनी चूत को छुपाने की कोशिश की और जब मैंने अपनी सलवार खींचकर चूत को ढकने की कोशिश की तो मेरे मम्मे दिखने लगे।

शंकर बोला- “वाह मेम साहब, इस कालू की पाँचों उँगलियां घी में रहती हैं…”

मैं सलवार सीधी करके पहनने लगी तो उसने मुझे रोक दिया।

मैंने उससे गुस्से में कहा- “शंकर… जाओ यहाँ से…”

वह अपने लण्ड को अपने लुंगी के ऊपर से ही मसलते हुए बोला- “हमें स्वाद नहीं लेने दोगी जवानी का गुड़िया रानी…”

“मैं रंडी नहीं हूँ जो हर किसी से करवाऊँ…” मैं गुस्से में लाल हुए जा रही थी।

यह सुनकर वो मेरी बाहें पकड़कर मुझे लगभग खींचते हुए बोला- “साली रंडी से कम भी नहीं है तू। एक शादीशुदा नौकर के साथ रंगरलियां मनाते वक़्त याद नहीं आया कि रंडी क्या होती है…”

कालू ने अपने कपड़े ठीक किये और धीरे से निकल गया। शंकर ने आगे बढ़कर मुझे अपनी बाहों में दबोच लिया और पागलों की तरह मुझे चूमने लगा। मैं उसका विरोध करना चाह रही थी मगर मुझे अपने भेद के खुल जाने का डर था। मेरे मम्मों को ऊपर से ही दबाते हुए वो बोला- “गुड़िया… बचपन से देखा है तुझे। बिल्कुल अपनी माँ पर गई है…”

“शंकर दिमाग मत खराब कर और मुझे छोड़ दे…” मैंने उससे विनती की।

मगर वो कहाँ मानने वाला था। उसने जल्दी से मुझे लिटाया और जबरदस्ती मुझे मसलने लगा। वह मेरे मम्मे दबाने लगा और फिर उन्हें अपने मुँह में डालकर चूसने लगा। उसने अपनी लुंगी उतारकर अपना लौड़ा निकाला और मेरी जांघों में घुसाने लगा। उसने मेरी दोनों टांगें फैला दी और मेरी चूत पर थूक लगाया। उसके लौड़े को अभी तक मैं देख भी नहीं पाई थी। जब उसने अपना लौड़ा मेरी चूत पर सटाकर एक झटका दिया तब मुझे पता चला कि उसका लौड़ा कितना तगड़ा है।

मैं छटपटाने लगी। कितना बड़ा और कितना मोटा लौड़ा होगा उसका यह सोचकर मेरी जान निकल रही थी। उसने ना तो मेरी चूत चाटी और ना ही मेरे होंठ चूमे बस देसी लौंडे की तरह अपना काम निकाल रहा था वो। वो तो बस अपने लौड़े को चूत में डालकर अपना काम निकाल रहा था, किला फतह करने की कला उसमें नहीं थी।

मेरे मुख से निकला- “निकालो अपने लौड़े को, चूत फट रही है मेरी…”

उसने कहा- “अभी मजा आएगा कुछ देर सह ले मेरी जान…” और सच में कुछ ही देर में मैं नीचे से खुद ही हिलने लगी और उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी।

वो खुश होते हुए बोला- “आया ना मजा साली…”

मैंने उससे कहा- “तुम बहुत गंदे हो शंकर, तुमने मुझे चोद दिया। मैं माँ को बता दूंगी यह सब…”

उसने अपने दांत दिखाते हुए कहा- “चल न, इकट्ठे चलते हैं तेरी माँ के पास। मैं बताऊँगा तेरी माँ को कि उसकी छोरी कालू के नीचे लेटी थी और उसे देखकर मेरा खड़ा हो गया। अब तू ही बता कि मैं क्या करता? मेरे सामने नन्ही मुन्नी सी गुड़िया नंगी लेटी थी और मैंने उसे पकड़ लिया। और अब जब पकड़ ही लिया था तो चोदना तो बनता ही है न…”

मुझे उसकी हरामीपने की बातें सुनकर शर्म आ रही थी मगर मुझे उसके धक्कों से मजा भी आ रहा था। आह्ह्ह्ह… आआह्ह्ह्ह… हम दोनों की कमर एक साथ चल रही थी और हम दोनों आनन्द के सागर में मजे ले रहे थे। थोड़ी देर बाद हम दोनों साथ-साथ झड़े।

सच में शंकर का लौड़ा बड़ा मस्त निकला और मेरे तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। कभी कालू के साथ तो कभी शंकर के साथ मैं मोटर घर में मजे कर रही थी। रोज का नियम सा बन गया था यह। कभी-कभी तो दोनों से एक साथ भी मजे लेती थी।

एक दिन कि बात है कि मेरे फूफाजी आये हुए थे। किसी शादी के लिए बुआ जी और माँ को शहर लेजाकर उनको खरीदारी करवानी थी। मैंने फूफाजी को खाना-वाना खिलाया और डिब्बे में खाना डालकर मोटर घर की तरफ चल पड़ी मेरे कालू को खाना खिलाने। कालू तो मेरी राह देख ही रहा था। मेरे पहुँचते ही उसने मुझे दबोच लिया। काफी दिनों के बाद हम मिले थे और शंकर अभी वहाँ नहीं था। देखते ही देखते हम दोनों वहाँ लेटकर रंगरेलियां मनाने लगे। उसने मुझे चूमते हुए मेरे कपड़ों के ऊपर से मेरे मम्मे दबाते हुए मेरी सलवार खोल दी। उसका लौड़ा खड़ा था और मुझे मेरी टांगो के बीच में चुभ रहा था।

“कालू आज तो तेरा पप्पू बड़ा जल्दी खड़ा हो गया रे…”

“अरे यह तो पहले से ही खड़ा था। चल इसे दो-चार चुप्पे नहीं लगाएगी…” उसने बड़ी ही बेसब्री से कहा।

मैंने नीचे झुक कर उसका लौड़ा मुँह में लिया और चूसने लगी।

“दोनों गेंदों को निगल कर चूस रे छिनाल…” उसने कहा।

कुछ ही देर में मेरी चूत जवाब देने लगी और मुझे रह पाना अब नामुमकिन हो रहा था। मैंने उसके सामने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा- “डाल दे न अपना मूसल मेरे चूत में। हाय कितना तड़पा रहा है रे ठरकी। देख न कैसे पनिया रही है मेरी मुनिया…”

कालू ने मुझे दबोच लिया और अपना हाथ नीचे लेजाकर निशाने पर तीर रखकर डाल दिया मेरी चूत में अपना लौड़ा। मैं बहुत खुश थी, आखिर बहुत दिनों बाद मुझे कालू का लौड़ा मिला था।

मैंने उससे कहा- “हाय रे कालू, बड़े दिनों बाद तेरा लौड़ा मिला है रे। आज तो जी भर के चोद ले अपनी गुड़िया को…”

वो जोश में आते हुए बोला- “साली झूठ बोलती है, शंकर था न तेरे पास…”

“शंकर है तो सही, लेकिन उसमें तेरे जैसा जोश नहीं है रे मेरे कालू…” ऐसा मैंने उसे और जोश दिलाने के लिए कहा, मैं तो चाहती थी कि आज वो मेरी चूत को फाड़कर तृप्त कर दे।


.
 
.

वो जोश में आकर मुझे चोदने लगा और दस मिनट के बाद हम शांत होकर एक तरफ लुढ़क गए। तूफान शांत हो चुका था और हम अपनी कल्पनाओं के सागर में एक दूसरे का चुम्बन ले रहे थे। आज वो खास मूड में था। चुदाई के बाद के चुम्बन मुझे और रोमांचित कर रहे थे।

करीब आधे घंटे के बाद हम सामान्य हुए और उसने कहा- “चल उठकर सलवार पहन ले…”

उसने मेरी ब्रा का हुक लगाते हुए मुझे फिर से चूम लिया और मैंने भी बदले में उसे चूमकर उसका धन्यवाद अदा किया। जब मैं अपनी सलवार ऊपर कर रही थी तो मुझे मोटर घर के बाहर एक साया दिखा। फिर अचानक ही किसी चीज के गिरने की आवाज आई। मैं हड़बड़ा गई और बाहर जाकर देखा तो बाहर फूफाजी खड़े थे। मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी और मैं सर नीचे कर उनके सामने खड़ी हो गई।

वो बोले- “शर्म नाम की कोई चीज बची है या नहीं तेरे अन्दर…” वो मुझे डांट रहे थे।

और मैं सर झुका कर खड़ी थी।

उन्होंने कहा- “चल आज तू घर चल, तेरी माँ और बुआ से तेरी खैर निकलवाता हूँ। खाना पहुँचाने आती है या यहाँ हर मजदूर से चुदवाने…” इतना कहकर वो निकल गए।

मेरी तो फटने लगी। मुझे पता था कि बुआ का हाथ बहुत भारी है और वो यह भी नहीं देखती कि कहाँ लग रही है।

मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ते देखकर कालू ने मुझे गले से लगाते हुए कहा- “देख, तेरे फूफा बहुत ही बड़े ठरकी हैं। इन्हें मैं बहुत पहले से जानता हूँ। तेरी चाची के साथ भी सम्बन्ध रहे हैं इसके। तू बस घर जाकर संभाल इसको। पाँव पकड़ते हुए लुंगी में मुँह घुसा देना, शांत हो जायेगा…”

मुझे गुस्सा आने लगा, मैंने कालू को डांटते हुए कहा- “क्या बक रहा है कमीने?”

कालू ने मुझे समझाया- “बक नहीं रहा हूँ गुड़िया रानी। तुझे अपनी इज्जत बचाने का तरीका बता रहा हूँ। तेरा क्या बिगड़ जायेगा। दो लेती थी एक और ले लेना…”

मैं वहाँ से जैसे तैसे भागकर घर आ गई। फूफाजी अपने कमरे में लेटकर अखबार पढ़ रहे थे। मैं उनके पैरों की तरफ बैठकर उनसे विनती करने लगी- “मुझे माफ कर दो फूफाजी, आगे से ऐसी गलती नहीं करुँगी…” इतना कहकर मैं रोने लगी। मेरी आँखों से आंसू बह रहे थे।

उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा- “शर्म-लाज कुछ है तुझमें?”

“पैर पकड़ती हूँ फूफाजी, मुझे माफ कर दो…” इतना कहकर मैं वहाँ से रोते हुए अपने कमरे में चली आई और अपने बिस्तर में गिर कर सुस्ताने लगी।

बुआ, चाची और माँ सब बाजार गए हुए थे और उन्हें शाम से पहले लौटना नहीं था। वैसे भी कालू ने मुझे हल्का कर दिया था और ऊपर से गर्मी के कारण मुझे बेचैनी सी होने लगी थी। यूँ तो चुदाई के बाद मुझे नींद बड़ी अच्छी आती है मगर आज मेरी आँखों से नींद गायब थी। मैं चाह रही थी कि फूफाजी के सामने जाकर सब कुछ बता दूँ, मगर हिम्मत नहीं हो रही थी। कभी-कभी ख्याल आ रहा था कि उनसे जाकर लिपट जाऊँ, खुद को उनके हवाले कर दूँ, उन्हें अपने दूध पिला दूँ।

वैसे भी उन्होंने मुझे आधी नंगी तो देख ही लिया है। क्या पता शायद वो बहुत देर से मेरी जवानी का मजा ले रहे हों। पता नहीं ऐसे अनगिनत ख्याल मेरे मन में घर कर रहे थे। मुझे यह तो मालूम था कि मेरी उभरी हुई जवानी देखकर उनके दिल में कुछ तो हुआ होगा, मगर उनके गुस्से से मैं वाकिफ थी। इस अजीब सी कशमकश में कब मेरी आँख लग गई मुझे पता ही नहीं चला।

कुछ देर बाद मुझे मेरे पास किसी के लेटे होने का एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे कोई मेरे चूतड़ों पर हाथ फेर रहा हो। मेरी आँख खुल गई मगर मैंने सोये होने का नाटक करना चालू रखा। मैंने अपनी आँखें धीरे से खोलकर कनखियों से देखा तो वो और कोई नहीं मेरे फूफाजी ही थे।

उन्होंने धीरे-धीरे मेरी कमीज को ऊपर सरकाया और मेरे चिकने सपाट पेट पर हाथ फेरने लगे। फिर धीरे से उन्होंने मेरा नाड़ा भी खोलकर मेरी सलवार को खिसकाते हुए मेरी पैंटी के ऊपर से ही मेरी चूत पर हाथ फेरने लगे। वो बड़े आराम से मेरी नाभि पर हाथ फेरते हुए और मजे लेते हुए बोले- “गुड़िया… अब मूड में आ भी जाओ। कब तक सोते रहने का नाटक करोगी…”

फिर भी जब मैंने अपनी आँखें नहीं खोली।

तो उन्होंने मेरी पैंटी में हाथ डालकर मेरे दाने को मसल दिया।

मैं उनकी तरफ मुड़ी और उनसे लिपट गई और बोली- “आप किसी से कहेंगे तो नहीं…”

उन्होंने बड़े ही प्यार से मेरे होंठों को चूमते हुए कहा- “नहीं कहूँगा मेरी रानी, चल उठकर नंगी हो जा…”

मैंने कहा- “नहीं फूफा जी, माना कि मैं चुदाई करवाती हूँ और आपने मुझे देखा भी है पर आपके सामने यूँ नंगी होने में मुझे शर्म आ रही है। मैं आंखें बंद कर रही हूँ, आपको जो उतारना है, उतार लेना…” मैं खड़ी हो गई मगर मुझे यह ध्यान नहीं था कि फूफाजी ने मेरा नाड़ा खोल दिया है। जैसे ही मैं खड़ी हुई मेरी सलवार नीचे सरक कर पैरों में गिर गई। मैं शर्म से लाल हो रही थी और अपनी जाँघों को समेट रही थी।

“क्या मस्त जांघें हैं तेरी। गुड़िया रानी इतनी चिकनी जांघें तो मैंने कभी देखी ही नहीं। दूर से देखा था तब पप्पू मेरा हिलने लगा था और अब पास से देख रहा हूँ तो मेरा पप्पू अकड़ने लगा है…” उन्होंने लगभग घूरते हुए अपनी आखों से मुझे चोदते हुए कहा।

“क्यों… बुआ जी की चिकनी नहीं है क्या?” मैंने चुटकी ली।


.
 
.

“अब कहाँ वो बात…” उन्होंने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा और मेरी कमीज उतारकर मेरी काले रंग की ब्रा में कैद मेरे कबूतरों को आजाद कर दिया। मेरे फडफाड़ते हुए कबूतरों को देखकर वो बोले- “क्या मस्त माल है तेरे पास…” और इतना कहकर वो मेरे अनारों को मसलने लगे। कुछ देर मसलने के बाद उन्होंने मेरे चूचुक को अपने मुँह में भर लिया और चूस-चूसकर मेरे चूचुक खड़े कर दिए।

“हाय फूफा जी… मारोगे क्या? बड़ा मस्त चूसते हो आप…”

“चल अब मेरा लौड़ा हिला और चूस इसको…”

“खुद पास आकर चुसवा लो न…”

उन्होंने खुद अपना लौड़ा पकड़कर मेरे मुँह में डाल दिया और मैं चूमने लगी उनके मस्त लौड़े को।

“हाय रे गुड़िया रानी, क्या चूसती हो…” फिर कुछ देर चूसवाने के बाद बोले- “साली मुँह में झड़वा देगी क्या?” इतना कहते हुए उन्होंने मेरी टाँगें फैला दी।

मैंने भी ज्यादा नाटक ना करते हुए रास्ता साफ कर दिया। उन्होंने अपने लौड़े को पकड़कर निशाने पर टिकाकर एक करार झटका लगा दिया। उनका लौड़ा मस्ती में मेरी चूत में झूलने लगा था।

“मजा आया रानी…” उन्होंने अपने धक्कों को संयमित करते हुए पूछा।

“हाँ फूफाजी… और तेज रगड़ा लगाओ ना…”

“कुतिया क्या हाल है तेरा? साली सुहागरात पर पकड़ी जायेगी। कुछ छोड़ दे उसके लिए भी। तेरी उम्र में तो तेरी बुआ मेरा लौड़ा अपनी चूत में लेकर कराहने लगती थी, मगर तू तो बड़ी कमीनी है रे। और जोर से धक्के लगाने को कह रही है…”

“हाय फूफाजी रगड़ दो। रगड़ दो मुझे। और… और तेज चोदो मुझे…” मेरे मुँह से आवाजें निकल रही थी और फूफाजी मुझे तेजी से चोदने लगे थे।

करीब आधे घंटे के कोहराम के बाद हम दोनों फारिग हुए और एक दूसरे के जिश्म को जकड़कर एक ओर लुढ़क गए।

फूफाजी बोले- “साली मैंने तो सोचा था कि तू मोटर घर में कालू से चुदकर ठंडी हो गई होगी। मगर तू तो पक्की हरामन है रे…”

“भतीजी किसकी हूँ। सच बताना मैं अपनी चाची से भी ज्यादा मस्त हूँ न…” मैंने उन्हें छेड़ा।

“क्या मतलब है तेरा?” वो गुर्राए।

“वही जो पूछा है?”

“किसने कहा तुझसे यह सब?”

“बस बताने वाले ने बता दिया फूफाजी…”

“बहुत तेज है रे तू छोरी। चल एक और दौर हो जाए…” इतना कहकर वो मेरी गाण्ड पर हाथ फेरने लगे और कहा- “तेरी चूत मारते वक़्त देखा था, तेरी गाण्ड बड़ी चिकनी है, बोल मरवाएगी?” यह कहकर वो अपने हाथ से मेरी गोलाइयों का जायजा लेते हुए मेरी गाण्ड सहलाने लगे।

मैंने उन्हें समझाया- “फूफाजी… अभी सब आने वाले हैं। सो खुद की गाण्ड मत फड़वा लेना बुआ से…”

मगर वो कहाँ मानने वालों में से थे। उन्होंने जबरदस्ती अपना मुरझाया हुआ लण्ड मेरे गाण्ड पर सटा दिया और अन्दर डालने की कोशिश करने लगे। लेकिन उनका इतनी जल्दी खड़ा नहीं हो पा रहा था। आखिर हार मानकर वो मुझे अपने कपड़े पहनने को बोलकर अपने कपड़े ठीक करने लगे।

“अब तो तू मेरी ही है गुड़िया, आज नहीं तो फिर कभी सही, अब मैं तुझे नहीं छोड़ने वाला…”

थोड़ी देर में कालू घर पर चाय लेने आया। उसने मुझसे सुबह वाले किस्से के बारे में पूछा- “कर लिया अपने फूफा को अपने गुनाहों में शामिल…”

मैं शरमा गई और शरमा कर उससे बोली- “चल हट कुत्ता, जा चाय लेकर, मैं आती हूँ खेतों पर…”

“क्यों अभी भी चूत की आग शांत नहीं हुई क्या जो दोबारा वहाँ आएगी…” उसने मुझे छेड़ा- “फाड़ डालेंगे तेरी चूत को। आज तो शंकर के अलावा कामा भी है वहाँ…”

मैं थक चुकी थी और 3 लौड़ों को एक साथ सँभालने की ताकत अभी नहीं थी मेरी। इसलिए मैंने चाय बनाकर उसे पकड़ाकर उसे रुखसत किया। इस किस्से के बाद तो मैं हर किसी से चुदवाने लगी और खुले में गफ्फे लगाने लगी। और इस तरह मैं गुड़िया से चुदक्कड़ मुनिया बन गई।

इसके बाद तो बस मैं हर तरह से सेक्स का मजा लेने लगी और जब मैं शहर आई तो मैंने हद पार कर दी थी।

खैर वो सब अगले कहानी में।

तो दोस्तों इस तरह से मैं एक चुदक्कड़ मुनिया बन गई।


.

***** THE END समाप्त *****

.

.
 
.

Friends,

"गुड़िया से बन गई चुदक्कड़ मुनिया" is completed.

Now its your turn to read & enjoy.


.

.
 
.

मेरे दोस्त की बीवी

.

लेख़क - नवीन सिंह

.

दोस्तों, मैं जो कहानी बताने जा रहा हूँ इसको पढ़कर शायद आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी क्यूंकि शायद ऐसा अनुभव आपने पहले कभी नहीं सुना होगा।

क्या कोई पति अपनी पत्नी को किसी और से चुदते हुआ देखना चाहेगा?

नहीं ना… पर ऐसा होता है…

मैं आज आपको ऐसी ही एक कहानी बताने जा रहा हूँ।

***** *****

मेरा नाम नवीन है, मैं 29 साल का विवाहित पुरुष हूँ मेरी बीबी की उम्र 27 साल है। मैं राजस्थान में एक छोटे कस्बे झोटवाड में रहता हूँ। मेरी शादी को चार साल हो गए हैं, मेरा वैवाहिक जीवन बहुत मस्त चल रहा है, मेरी पत्नी सुजाता मुझसे बहुत खुश है और मैं उसके साथ बहुत खुश हूँ।

मेरा एक दोस्त रचित भी मेरी ही उम्र का है। वह मेरा परम मित्र है। रचित हमेशा सेक्स की बात के लिए उतारू रहता है। हमारे जीवन की कोई बात एक दूसरे से छुपी हुई नहीं है, हमने रात को क्या-क्या किया, एक दूसरे को बताते हैं, तो जाहिर सी बात है कि सेक्स की बात भी खुलकर ही होती है। उसको मेरी पत्नी की बदनाकृति पता है, मुझे उसकी पत्नी बबीता की कि उसके कहाँ तिल है और मेरे बीबी के कहाँ क्या है? उसको पता है। इतनी तक बात हम लोग एक दूसरे को बताते हैं। इन बातों से हम उतेजित भी हो जाते हैं जाहिर सी बात है।

‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ यह कहावत तो सबने सुन ही रखी है।

एक दिन बात बात में रचित मुझसे से बोला- यार नवीन, मैं हमारी सब बात बबीता को बताता हूँ। उसको तुम्हारी सेक्स की बात सुनकर ज्यादा नशा होता है और कहती है कि नवीन भैया की तरह तुम भी मुझे चोदो ना। तुमने मुझे नवीन भैया की सेक्स की बातें सुना-सुनाकर ज्यादा सेक्सी बना दिया है यार।

रचित अपनी बीवी की कहानी सुनाने लगा, वो ज्यादातर तुम्हारे लण्ड के बारे में बात करती है, मैंने तुम्हारे लण्ड का आकार बबीता को बताया है।

मैंने बीच में बात काटी, बोला- यार रचित, तुम भी क्या करते हो? मुझे अब बहुत शर्म आ रही है, भाभी क्या सोचती होगी मेरे बारे में कि मेरा लिंग इतना बड़ा नहीं है। तुमने ऐसा क्यों किया यार? और क्या-क्या बताया है तुमने? मुझे अब भाभी के सामने जाने में ही शर्म आएगी।

“अरे नहीं यार नवीन, वो तो तुम्हारे छोटे लण्ड की बात करती है, कहती है कि कितना प्यारा होगा न नवीन भैया का? क्या तू उसके साथ सेक्स करना चाहेगा?” एकदम रचित ने यह बात कह दी।

मैं हतप्रभ रह गया कि यह क्या बात कर रहा है। मैं कुछ नहीं बोला।

“क्या सोच रहा है नवीन? उसे तेरे लण्ड में रूचि है, तो अगर तू कहे तो मैं बात करूँ उससे… वैसे वो एक बार में ही मान जाएगी, ऐसा मुझे यकीन है, क्यूंकि हमारी बात होती ही रहती है। तुम्हारे और सुजाता भाभी के सेक्स की बात के साथ ही हम लोग सेक्स करते हैं और हमें मजा ऐसे ही आता है…” रचित ने कहा।

मैं सोच में पड़ गया कि क्या कहना चाहिए मुझे, हाँ या ना? मैंने कहा- “यार रचित, अभी नहीं, मैं तुझे कल जवाब देता हूँ…” ऐसा मैंने कहा और बात का विषय बदलने का प्रयास करने लगा।

पर जैसे उसको अपनी पत्नी के मेरे साथ सेक्स करवाने में मजा आ रहा था। वो उस बात से नहीं हटा- “यार नवीन, बता ना… मेरी ख़ुशी के लिए ही हाँ भर दे यार…”

जब उसने ऐसा कहा तो मैंने हाँ भर दी।

रचित- “अगर मैं तुमको फ़ोन लगाऊँ तो तुम आ सकते हो ना?”

वैसे हमारे घर एक दूसरे के घर से ज्यादा दूर नहीं थे तो कभी भी आया जा सकता था। मैंने हाँ भर दी। सुजाता हमारे बीच कभी नहीं आती थी, उसको पता है कि हमारी दोस्ती क्या है? खैर… रात करीब 11:30 बजे रचित का फ़ोन आया।

मैंने उठाया तो वो बोला- “मैदान साफ है यार… आ जा, आज बहुत मजे करेंगे…”

वैसे मेरी बीवी ने रचित की आवाज सुन ली थी, वो बोली- “क्या कह रहे थे रचित भैया? क्या कार्यक्रम है?”

मैं ऐसे ही बात को टालते हुए कपड़े पहनने लगा, मैंने कहा- “मैं आता हूँ अभी रचित के यहाँ से होकर…”

वो बोली- “क्या हुआ? कोई बात है क्या…”

मैंने कहा- “नहीं यार, थोड़ी बात करने के लिए उसने बुलाया है और थोड़ी देर में आकर सब बताता हूँ…” मैंने बात को सँभालते हुए कहा और मैं बाहर ताला लगाकर चला गया।

वहाँ गया तो दोनों ने मेरा बड़ी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। फिर हमने थोड़ा ड्रिंक किया। अक्सर हम चारों साथ बैठकर पीते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होती है।

भाभी बोली- “अरे क्या भैया, सुजाता को नहीं लाये?”

मैंने कहा- “नहीं, वो सो रही है, तो मैं ही आ गया…” मैंने बात को घुमाते हुए कहा और तीन-चार पैग लगाकर मैंने कहा- “अच्छा रचित, अब मैं चलता हूँ, बहुत रात हो गई है…”

तो रचित बोला- “यार चल ना बेडरूम में, कोई मूवी देखते हैं…”

मैं सारी योजना तो समझ रहा था पर अनजान बनते हुए मैंने कहा- “नहीं यार, फिर कभी। आज तो बहुत रात हो गई है…”

इतने में भाभी बोली- “क्या बात भैया आज बहुत जल्दी है? ये कह रहे हैं तो रुक जाओ ना…”

मैं रुक गया, उसने मूवी लगा दी, सेक्सी मूवी थी। भाभी कुछ खाना लेने गई थी, वो अचानक आ गई, वो बोली- “क्या कर रहे हो तुम दोनों यह?” अनजान बनते हुए साफ उनके चहरे से दिख रहा था।

पर मुझे शर्म आ गई।

रचित- “अरे डार्लिंग आओ न… तुम भी देखो, मजा लो…” मूवी में काफी अच्छा दृश्य चल रहा था। एक आदमी के साथ तीन लड़कियाँ थी, चारों मजा कर रहे थे। यह देखकर भाभी की आह्ह निकल गई और रचित ने उनका हाथ पकड़कर अपने बगल में बिठा लिया। थोड़ी देर बाद वो उनके चूचों को दबाने लगा।


.
 
.

भाभी बोली- “क्या कर रहे हो? नवीन भैया यहाँ हैं, तुम भी ना…”

रचित बोला- “यार नवीन देखो ना, तुम्हारी भाभी की कैसी चूचियाँ हैं छोटी-छोटी। मुझे ज्यादा मजा नहीं आता है यार। तुम इस मामले में किस्मत वाले हो। सुजाता भाभी के बहुत अच्छे हैं यार…”

मैंने कहा- “तुमने कब देख लिए?”

वो बोला- “नहीं, तुमने जैसा बताया, उससे बोल रहा हूँ और यूँ भी तो पता लग ही जाता है यार। तू भी ना… चल तुझे छोटी चूचियाँ अच्छी लगती हैं तो ले, मेरे बीवी के साथ मजा कर ले, ले दबा ले इसकी…”

मुझे बड़ी शर्म आ रही थी और वो बहुत सहज भाव से यह बात करता जा रहा था।

भाभी भी बोली- क्या बात कर रहे हो रचित तुम?

वो बोला- “यार, अब नाटक मत करो, तुम दोनों को पता है कि क्या हो रहा है? और तुम्हें एक दूसरे में रुचि भी है तो फिर क्यों समय ख़राब करते हो?” और मेरा हाथ पकड़कर भाभी के वक्ष पर रख दिया, और खुद उठकर उधर दूसरी तरफ चला गया। अब हम दोनों के बीच में भाभी थी, एक चूची रचित दबा रहा था और एक मैं दबा रहा था।

रचित बोला- “अब ऐसे मजा नहीं आ रहा है…” और वो भाभी को नंगा करने लगा।

मैंने भी उसका सहयोग किया। अब मेरा भी लिंग खड़ा हो गया था, आखिर दूसरी औरत का मजा लेने का मौका और वो भी उसके पति के सामने… ऐसा अनुभव तो बड़ा रोमांचक होता है। मेरे सामने अब भाभी पूरी नंगी थी, मुझे बहुत मजा आ रहा था।

रचित खुद काफी रोमांचित हो रहा था।

मुझे सब कुछ सपने जैसा लग रहा था। मैं और जोश से भाभी के स्तन दबा रहा था और उनको मुँह में लेकर चूसता भी जा रहा था।

भाभी भी बहुत उत्तेजित हो गई, वो कहने लगी- “अब नहीं सहा जाता है, अब आ भी जाओ नवीन भैया। एक बार दर्शन तो करा दो अपने लिंग के…”

मैंने जल्द ही अपने सारे कपड़े उतार दिए।

भाभी मेरा लिंग देख कर काफी उत्तेजित हो गई और उसे मुँह में ले लिया।

रचित बोला- “अरे यह क्या? मेरा लेने में तो नाटक करती है और इसका बड़े मजे से… क्या बात है यार?”

“अरे, तुम नहीं जानते, नवीन भैया के लिंग की कहानी तुमने सुना-सुनाकर मुझे बहुत परेशान का रखा था, आज जब मेरे सामने खुद आ गया है तो यह तो क्या, मैं तो इसको चोदूंगी। मैं तुम्हारे साथ भी करुँगी, पहले मेहमान का तो स्वागत कर लूँ…”

“हाँ-हाँ… क्यों नहीं यार। मैं तो मजाक कर रहा था…” रचित बोला।

और भाभी ने इस कदर मेरे लण्ड के साथ खेल किया कि मैं ज्यादा देर तक मैदान में नहीं टिक सका, और मैं बोला- “भाभी, मैं झड़ने वाला हूँ, हटा लो अपना मुँह…”

भाभी कुछ नहीं बोली और करती रही।

मैं बोला- “अब नहीं रुका जाता है भाभी… आह्ह…”

रचित बोला- “यार हो जाने दे, उसको यह सब बहुत अच्छा लगता है। मेरे साथ भी कभी-कभी ऐसा ही करती है यह…” मैं भाभी के मुँह में झड़ गया तो भाभी ने मेरा सारा वीर्य अंदर उतार लिया और बोली- “बहुत अच्छा है नवीन भैया का तो, मजा आ गया… आओ अब तुम्हारा भी चूसती हूँ…”

और भाभी ने रचित का मुँह में लेकर एक दो बार ही किया था कि रचित भाभी के मुँह में ढेर हो गया। भाभी ने उसका भी वीर्य अंदर गटक लिया।

भाभी मेरे लिंग को देख रही थी- “यार रचित, कितना बढ़िया है ना नवीन भैया का लिंग…”

रचित बोला- “तुम तो मना कर रही थी, तो कैसे देख पाती इसका यह रूप…”

तब हम फिर सेक्सी मूवी देखने में लग गए, फिर से मेरा कड़क हो गया। भाभी ने मेरा लिंग अपने हाथ में लिया हुआ था तो उनको अहसास हो गया, और कहा- “रचित देखो, तुम तो अभी तक ऐसे ही पड़े हो, नवीन भैया तो फिर से तैयार हो गए हैं…” और इतना बोलकर उसने फिर से मेरे लिंग को मुँह में ले लिया।

मैंने उसकी चूत को सहलाना शुरू कर दिया।

वो बोली- अब इसका नम्बर है क्या?

मैंने कहा- “हाँ भाभी, अब चूत का मजा लेने दो…” मैं अब खुल चुका था। मैंने भाभी को लिटाया और लण्ड अंदर डाल दिया।

भाभी बोली- “वाह… क्या अच्छा है तुम्हारा लिंग, दर्द भी नहीं हुआ और कितना प्यारा अहसास हो रहा है। इनका तो मुझे ज्यादा अच्छा नहीं लगता। रचित, बुरा मत मानना पर अब मैं कभी-कभी नवीन भैया के साथ सेक्स करुँगी…”

रचित बोला- “मेरी जान, मैं भी तो यही चाहता हूँ कि तुम रोज ही मेरे सामने इसके साथ सेक्स करो और मैं तुम दोनों को ऐसे ही देखता रहूँ। मुझे तुम्हारी ख़ुशी चाहिए मेरी जान…”

अब मैंने थोड़ी गति बढ़ा दी तो भाभी बोली- “क्या बात है भैया, कहीं जाना है क्या? थोड़ी देर तक तो रुको, अंदर होने का मजा तो लेने दो…”

अब रचित ने भी अपना लण्ड हाथ से हिलाकर खड़ा कर लिया था, वो भी अब जोश मे आ गया था। उसने अपना लंड भाभी के मुँह में डाल दिया और बोला- “यार बबीता, मेरा बरसों का सपना था कि तुम ऐसे मेरे सामने दूसरे से चुदो और मैं बस ऐसे मजा करूँ तुम्हारे मुँह में डालकर…”

भाभी बोली- “क्यों नवीन भैया, एक बात बोलूँ… अगर तुम बुरा न मानो तो…”

मैंने कहा- “बोलो भाभी, मैं तुम्हारी बात का कैसे बुरा मान सकता हूँ। वैसे एक सच बताऊँ भाभी… मैं सुजाता को चोद-चोदकर बोर हो चुका था। जैसे मेरा तुम्हारे सामने थोड़ी देर में दो बार खड़ा हो गया न, ऐसे मेरा कभी सुजाता के सामने नहीं होता है…”

बीच में बात काटकर रचित बोला- “अरे क्या बात करता है यार नवीन… सुजाता भाभी का क्या बदन है यार? क्या चीज है यार वो? आई लव हर…”

भाभी बीच में बात काटकर बोली- “यार नवीन भैया, क्यों न हम चारों साथ में सेक्स करें? ये तुम्हारी बीवी को और तुम मुझे चोदो, कितना मजा आएगा…”

मैं घबरा गया, मैंने कहा- “यार रचित, सुजाता नहीं मानेगी। मुझे नहीं लगता है कि वो मानेगी…”

“अरे, तुम चिंता मत करो…” भाभी बोली- “मैं उसको मना लूंगी। मैं जानती हूँ कि वो कितना पसंद करती है इनके लण्ड को…”

मैंने कहा- मतलब?


.
 
.

तो भाभी बोली- “जैसे तुम दोनों दोस्त आपस मे बात करते हो, कोई बात नहीं छुपाते हो। ऐसे ही हम दोनों भी तो सहेलियाँ हैं न… तो हम भी तुम्हारे लंड के बारे में बात करते हैं और मैं तुम्हारे लण्ड की बात सुनती थी, दो-दो बार, एक तो सुजाता से और एक इनके मुँह से। तो मेरा क्या हाल होता था आप जान ही सकते हैं। मुझे आपका लण्ड इतना प्यारा लगा कि कभी मुँह से न निकालूँ और जब भी तुम्हारा वीर्य निकले तो उसको अपने मुँह में ले लूँ बस। और मैंने सुजाता की भी ऐसे ही तड़प देखी है। अगर तुमको यकीन न हो तो आज बात करके देखना, वो ज्यादा ना-नुकर नहीं करेगी और इनके लंड के बारे में बात करने लगेगी…”

“वैसे भाभी, मैंने भी बात की हुई है रचित के लण्ड के बारे में। बात तो वो बहुत ही ध्यान से सुनती है और आगे कुछ-कुछ पूछती भी है पर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वो इससे चुदना चाहती है…” मैंने बताया।

“यार नवीन भैया, तुम भी ना… कोई भी औरत ऐसा अपने मुँह से अपने पति से नहीं कह सकती है कि मैं उस आदमी से चुदना चाहती हूँ… जैसे मैं तुमसे चुदना तो चाहती थी पर मैंने कभी इनको अहसास नहीं होने दिया कि मैं क्या चाहती हूँ, वैसे इनका भी ऐसा मन था कि मैं किसी दूसरे मर्द के साथ भी सेक्स का मजा लूँ तो ऐसा अपने आप ही हो गया, नहीं तो ऐसा हो पाना मुश्किल था। तुम भी जानते हो ना…”

ऐसे ही बात चलती रही और मैं धीरे-धीरे अंदर-बाहर करता रहा। भाभी पूरे जोश में आ चुकी थी, वो अब तक दो बार झड़ चुकी थी। मैंने कहा- “भाभी, मेरा तो बस अब होने वाला है…”

तो वो बोली- ऐसे ही मत कर देना। मुझे वीर्य पीना है।

और मैंने अपना लण्ड निकालकर भाभी के मुँह में दे दिया। थोड़ी देर तक मुँह में हिलाता रहा तब जाकर मेरा हुआ। भाभी पूरा का पूरा लण्ड मुँह में लेकर झूम रही थी। मुझे भी बहुत मजा आ रहा था तो मैं भी धक्के लगा रहा था। भाभी ने मेरी एक एक बूंद चाट ली।

अब बारी रचित की थी, रचित बोला- “जान, मुझे भी थोड़ा मजा दोगी क्या?”

भाभी बोली- “अब तो सारा मजा सुजाता ही देगी तुमको…”

मैंने भी अपना सर हाँ में हिला दिया- “हाँ रचित, अब सुजाता के साथ मजा करना। मैं अब भाभी को तुमको नहीं देने वाला…” मैंने ऐसे ही मजाक में कहा।

“देख ले, फिर मैं भी सुजाता भाभी को तुझे हाथ नहीं लगाने दूँगा…” रचित ने कहा।

मैंने कहा- “अच्छा बाबा, आ जा…”

और वो भाभी को पीछे की तरफ से डालकर थोड़ा हिलाकर और बाहर निकालकर भाभी के मुँह में कर दिया।

उसका भी भाभी ने अंदर गटक लिया और कहा- “आज तो मजा आ गया तुम दोनों का वीर्य पीकर। मेरा तो पेट भर गया…”

उसके बाद मैं घर के लिए रवाना हुआ। मेरे दिमाग में अजीब से ख्याल आ रहे थे, अगर सुजाता पूछेगी तो क्या कहना है, वगैरह। और उन दोनों से जो वादा किया है, सुजाता को रचित से चुदवाने का। यह बात कैसे करूँगा? ऐसे ही सोचते हुए मैं घर आ गया

घण्टी बजाई तो वो उठ कर आ गई, मैंने कहा- “तुम सोई नहीं क्या अभी तक…”

वो बोली- “नहीं यार, नींद नहीं आ रही थी, तुम्हारी याद आ रही थी। आज बहुत मन है मेरा…”

मेरे तो हाथ पैर ढीले हो गए, मैंने कहा- “यार मेरा मन नहीं है…”

वो नहीं मानी, उसने मेरे कपड़े खोल दिए और खुद भी नंगी हो गई और मेरा लण्ड निकालकर मुँह में ले लिया और बोली- “यह क्या? आज तो तुम्हारे लण्ड से वीर्य की खुशबू आ रही है…”

मैंने सब सच बताने की ठानी और सोचा कि इसी बहाने आगे की बात भी हो जाएगी। मैं बोला- “वो छोड़ो डार्लिंग, आओ मेरे पास…” और मैंने उसकी चूत में उंगली डाल दी और आराम से बात करने लगा।

मैंने कहा- “यार मैं एक बात कहूँ, तुम बुरा तो नहीं मानोगी?”

वो बोली- नहीं बोलो।

मैं- “कसम खाओ…”

वो बोली- “कसम से…”

मैंने कहा- “क्या तुम किसी और लण्ड का मजा लेना चाहती हो? सच सच बताना…”

वो थोड़ा शरमा गई और कुछ नहीं बोली।

मैंने कहा- “तुमने वादा किया है…”

वो बोली- “नहीं…”

मैं- “सच बोलो, तुमको मेरी कसम…”

वो बोली- “हाँ पर…”

मैंने कहा- “रचित के लण्ड का तुमको पता ही है ना?”

वो झुंझला कर बोली- मेरे को कैसे पता?

मैंने कहा- “बबीता भाभी ने मुझे सब बता दिया है कि तुम दोनों हमारे लण्ड की बात करती हो, जैसे हम दोनों रचित और मैं करता हूँ ऐसे…”

सुजाता बोली- तुम भी ऐसी बातें करते हो?

मैंने कहा- “हाँ…” और फिर मैं शुरू हो गया, एक हाथ से उसके चूचे दबा रहा था और एक हाथ उसकी चूत में था। वो मस्त हो रही थी, तो मैंने कहा- “रचित का लम्बा लण्ड लेकर तुम मस्त होना चाहती हो न? सच बताओ…”

उसने हाँ कहा।


.
 
Back
Top