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छोटी-छोटी रसीली कहानियां, Total 18 stories Complete

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इस बार दोनों के सिर ‘हाँ’ जल्दी-जल्दी ऊपर-नीचे हिले। नीरा उनका उत्साह देखकर हँस दी। वोह फिर खड़ी होकर बाथरूम की तरफ जाने लगी पर इससे पहले कि लड़के उसे पकड़ते, नीरा इतनी ऊँची हील के सैंडलों में नशे में संतुलन नहीं रख पायी और दो कदम के बाद ही लड़खड़ा कर धड़ाम से गिर पड़ी। कार्पेट की वजह से उसे लगी नहीं। उसने रोहित को बाथरूम से बाडी लोशन लाने को कहा और नितेश ने अपनी टीचर को सहारा देकर खड़ा किया और बिस्तर पे बिठाया।

रोहित जब लोशन लेकर आया तो नीरा ने एक बार दोनों के लौड़ों को देखा। नितेश का लण्ड छोटा तो नहीं था पर नीरा ने निश्चित किया कि वोह रोहित के लण्ड से कुछ पतला था। अचानक नीरा के मन में आशंका होने लगी पर फिर नशे की मदहोशी में उसने गाण्ड मरवाने का निश्चय कायम रखा। नीरा ने थोड़ा सा लोशन नितेश के लौड़े के सुपाड़े पर लगाया। जब नितेश उसे अपने लण्ड पे मलने को हुआ तो नीरा ने उसे रोक दिया। फिर वोह पलट कर बिस्तर पर झुक गयी। नीरा के सैंडल युक्त पैर ज़मीन पर थे और उसका पेट और मुँह गद्दे पर टिका था। नीरा ने अपने चूतड़ पकड़कर फैलाये और रोहित से गाण्ड के छेद पर लोशन लगाने को कहा। नीरा की झुरझुरी छूट गयी जब उसे अपनी गाण्ड-छिद्र पे ठंडा लोशन और अपने स्टूडेंट की अँगुली अंदर घुसती महसूस हुई।

जब रोहित ने ठीक से नीरा की गाण्ड में लोशन लगा दिया तो नीरा ने नितेश को आगे बढ़ने को कहा। नीरा को नितेश के हाथ अपने चूतड़ों पे महसूस हुए, फिर नितेश ने उसकी गाण्ड फैलायी और फिर नीरा को उसके लण्ड का सुपाड़ा अपनी गाण्ड के छेद पे महसूस हुआ। नीरा को जब अपनी गाण्ड में लण्ड घुसता महसूस हुआ तो उसका बदन अकड़ गया पर फिर खुद को शाँत और ढीला करने के लिए नीरा ने गहरी साँसें लीं। उसके स्टूडेंट का लौड़ा धीरे-धीरे उसकी गाण्ड में थोड़ा-थोड़ा आगे घुस रहा था और फिर नीरा को नितेश की जाँघें अपने चूतड़ों पे सटती महसूस हुईं। नितेश का लण्ड जड़ तक नीरा की गाण्ड में घुस चुका था और नीरा ने अपनी बाँहें खिसका कर अपना पूरा वजन अपनी बाँहों पर डाल दिया।

“यह तो बहुत तंग है…” नितेश बोला- “आप ठीक तो हैं… ढिल्लो मैडम?”

“हाँ… मैं ठीक ही हूँ। उम्म्म… गाण्ड में लण्ड अजीब सा लग रहा है…”

नितेश ने धीरे-धीरे आगे-पीछे होकर अपना लण्ड नीरा की गाण्ड में पेलने लगा। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वोह किसी औरत की गाण्ड में अपना लण्ड चोद रहा है। वोह औरत जो कोई और नहीं बल्कि उसकी टीचर थी। नितेश को अपनी टीचर की गाण्ड उसकी चूत से ज्यादा गरम और ज्यादा आरामदेह लग रही थी और लण्ड के इर्द-गिर्द काफी टाइट थी। नीरा की गाण्ड की माँसपेशियों का दबाव और स्पंदन वो अपने लण्ड पे महसूस कर पा रहा था। अपनी टीचर के चूतड़ों को पकड़कर वोह अब जोर-जोर से उसकी गाण्ड में लण्ड पेल रहा था।

“नितेश और जोर से… तेज और तेज… मार ले मेरी गाण्ड… हरामी… बहुत मज़ा आ रहा है…” नीरा भी मस्ती में नितेश को उकसाने लगी और अपने चूतड़ पीछे उचका कर उसका लण्ड अपनी गाण्ड में लेने लगी।

“ठीक है… अब रोहित को भी मौका दो…” नीरा थोड़ी देर बाद बोली। मदहोशी और कामोन्माद में नीरा ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।

“लेकिन मैडम… मैं अभी झड़ा नहीं हूँ…” नितेश ने कराहते हुए फरियाद की।

“तुझे फिर से मौका मिलेगा। रोहित को भी थोड़ी देर मेरी गाण्ड में लण्ड पेलने दे…”

नीरा ने गहरी साँस ली जब नितेश ने उसकी गाण्ड में से अपना लण्ड बाहर खींचा। जो गाण्ड कुछ क्षण पहले भरी-भरी और ठूँसी हुई थी वोह अब बहुत खाली महसूस हो रही थी। लेकिन नीरा को ज्यादा रुकना नहीं पड़ा क्योंकी कुछ ही पलों में उसका दूसरा स्टूडेंट उसके दोनों चूतड़ों को फैलाकर अपना लण्ड उसकी गाण्ड में धकेल रहा था। नीरा को खुशी हुई कि उसने नितेश को पहले अपनी गाण्ड मारने का मौका दिया था क्योंकी रोहित बिल्कुल भी दयालु नहीं था। जल्दी ही रोहित दनादन अपना लौड़ा नीरा की गाण्ड में पेल रहा था।

“तो कैसा लगा रोहित?” नीरा ने पूछा।

“काफी मज़ा आ रहा है पर फिर भी मेरे ख्याल से चूत में ज्यादा मज़ा है…” रोहित बोला।

“रोहित मेरे पास एक आइडिया है…” नीरा बोली- “अपना लण्ड बाहर निकाल। धीरे से प्लीज़…”

जब रोहित का लण्ड उसकी टीचर की गाण्ड से बाहर निकला तो नीरा ने उसे बिस्तर पे चढ़ने को कहा। रोहित को बिस्तर के बीचोंबीच लिटाकर नीरा उसके दोनों तरफ अपनी टाँगें करके रोहित के ऊपर चढ़ गयी।


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“ठीक है… रोहित? तुझे चूत ज्यादा पसंद आयी तो ये ले मेरी चूत…” नीरा बोलती हुई उसके लण्ड को पकड़कर अपनी चूत पे लगा के उस पे बैठ गयी।

“मेरा क्या?” नितेश ने पूछा- “मुझे तो गाण्ड मारने में बहुत मज़ा आ रहा था…”

“मैं तुझे भी भूली नहीं हूँ। मेरे गाँडू स्टूडेंट…” नीरा बोली- “इधर ऊपर आकर तू भी अपना लण्ड मेरी गाण्ड में पेल दे…”

“लेकिन रोहित का…”

“उसकी परवाह मत कर…” नीरा ने उसे ढाढस बँधाया- “मेरे पास दो छेद हैं चुदवाने के लिए…”

नितेश अपनी टीचर के पीछे से पलंग पर चढ़ गया और फिर से एक बार उसकी गाण्ड में अपना लण्ड ठेल कर चोदने लगा। रोहित अपनी टीचर के नीचे लेटा हुआ अपने चूतड़ उचका-उचका कर उसकी चूत नीचे से चोद रहा था। नीरा अपनी चूत और गाण्ड में एक साथ चुद रही थी और इस दोहरी चुदाई का एहसास नीरा की हवस के बारूद में चिंगारी का काम कर रहा था। हालाँकि उनकी चुदाई की लय बहुत अच्छी नहीं थी पर इस चुदाई में उन्हें अब तक सबसे ज्यादा मज़ा आया था।

रोहित ने अपने हाथ बढ़ाकर नीरा की लटकती हुई चूचियां पकड़ लीं और उन्हें मसलने लगा। नीरा ने भी आगे झुक कर अपनी जीभ रोहित के मुँह में डाल दी। नितेश सब कुछ भूलकर जोर-जोर से अपना लण्ड पेलते हुए अपनी टीचर की गाण्ड मार रहा था। पूरे कमरे में उन तीनों की कराहें, सिस्कारियां, बड़बड़ाहट गूँज रही थी और साथ ही नितेश की जाँघों के नीरा के चूतड़ों से टकराने की थाप भी उन आवाज़ों में शामिल थीं। अपनी चूत और गाण्ड में चल रहे दोहरे आनन्द को नीरा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

“हाँ… मारो… सालों… मारो मेरी गाण्ड और चूत… और जोर से… आआआहहहह…”

नितेश सबसे पहले झड़ा। जब वोह पागलों की तरह जोर-जोर से नीरा की गाण्ड में अंदर-बाहर अपना लण्ड पेलने लगा तो उसकी अँगुलियों के नाखुन नीरा के बदन में धँस गये। जल्दी ही उसने बहुत सारा वीर्य अपनी टीचर की गुदा में बहा दिया और थक कर अपना लण्ड बाहर निकालकर बिस्तर पे निढाल हो गया। किनारे पे लेटे हुए, नितेश अपनी टीचर को रोहित के ऊपर उछलते हुए चुदवाते देखने लगा।

अब बिना किसी विघ्न के, नीरा ताव में आकर जोर-जोर से अपने स्टूडेंट के लण्ड पर ऊपर-नीचे उछलती हुई बेहताशा चोदने लगी। नीरा की चूचियां जोर से झूल रही थीं और नीरा अपने एक हाथ से अपनी क्लिट भी मसल रही थी। नीरा जब झड़ी तो उसके मुँह से इतनी चुभने वाली चीख निकली जैसे कि किसी लौमड़ी के कराहने की आवाज हो।

“अरे मैं झड़ी… झड़ी रे माँ… आआआहहहह… आँआआआ…” उसका पूरा बदन थरथरा गया और उसने अपनी चूत की दीवारों को रोहित के लण्ड पे बहुत कसकर जकड़ लिया। रोहित ने अपनी टीचर के चेहरे पर कामोत्तेजना और उन्माद के भाव देखे और अपने लण्ड पे नीरा की चूत कसती महसूस हुई। रोहित ने और सात-आठ धक्के ऊपर की तरफ मारे और फिर वोह भी अपने वीर्य की धार नीरा के चूत में छोड़कर झड़ गया। नीरा, रोहित के ऊपर ही हाँफती हुई गिर पड़ी।

बाद में जब वासना का ज्वर समाप्त हुआ तो रोहित के ऊपर से लुढ़क कर नीरा बिस्तर पर हाँफती हुई लेट गयी और फिर तीनों ने कुछ देर आराम किया। फिर तीनों ने उठकर बारी-बारी स्नान किया और फिर अपने घरों को जाने से पहले फिर एक-दो बार चुदाई की।

घर जाते वक्त नीरा को एहसास था कि यह उसका नया जीवन था। उसे जी भर के चुदाई मिल रही थी और वोह लगभग हर रोज किसी-ना-किसी से चुदवा रही थी। उसे अनैतिक्ता और व्यभिचार का कोई अपराधबोध नहीं था बल्कि वोह खुश थी।


नीरा का विचार था कि दो पल की तो ज़िंदगानी है… जितना मज़ा लूट सकती है, लूट ले… किसी से भी… कहीं भी…

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***** THE END समाप्त *****

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दोस्तों,

कहानी पूरी हो चुकी है।

मज़ा लीजिये।


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आनन्द भरा सुहाना सफर

मिताली और उनके पति पंकज सहारनपुर में रहते थे, पंकज सरकारी बैंक में नौकरी करते थे, लेकिन उनका ताबदला पटियाला हो गया था तो वे अपना कुछ सामान पटियाला लेकर जा रहे थे, वैसे तो काफी सामान उन्होंने छोटे ट्रक से भेज दिया था पर कांच की कुछ चीज़ें, क्राकरी आदि अपनी कार से लेकर जा रहे थे।

हर्षित नाम का एक युवक उनके पड़ोस में ही रहता था। सामान कुछ ज़्यादा था इसलिये पंकज ने हर्षित को भी साथ चलने को कहा ताकि वहाँ जाकर सामान गाड़ी से उतारकर रखवाने में ज़्यादा दिक्कत ना हो। रविवार का दिन होने के कारण हर्षित के कालेज की छुट्टी थी और वैसे भी हर्षित मिताली भाभी का कहा हुआ कभी नहीं टालता था। उनका बात करने का तरीका ही इतना लुभावना था कि जब भी वो प्यार से कोई भी काम कहती, हर्षित मना ना कर पाता था।

सितम्बर का महीना था। हर्षित की पूरी सुबह मिताली भाभी और उनके पति पंकज का सामान उनकी गाड़ी में रखवाने में निकल गई थी। पंकज और मिताली की शादी को अभी ढाई साल ही हुए थे, अभी तक उनके कोई बच्चा नहीं हुआ है।

मिताली भाभी पंजाबी परिवार से हैं और बला की खूबसूरत हैं, उनका गोरा रंग, नीली आँखें, गदराया बदन और गुलाबी होंठ किसी भी उम्र के मर्द को पागल कर दें, और फिर हर्षित तो एकदम युवा है, सिर्फ़ उन्नीस साल का, उसपर मिताली भाभी का जादू चलना लाज़मी था। वो हर्षित के पड़ोस में दो सालों से रह रही थीं, इतने समय में हर्षित और मिताली भाभी काफी घुलमिल गए थे।

हर्षित तो पहले दिन से ही मिताली भाभी के हुश्न का दीवाना था। उस दिन सुबह से ही हर्षित, मिताली भाभी और उनके पति गाड़ी में सामान रखते-रखते पशीने से लथपथ हो चुके थे। गाड़ी सामान से लगभग भर ही चुकी थी। ऐसा लग रहा था जैसे सारा सामान रखने के बाद किसी और के बैठने की जगह ही नहीं बचेगी। तभी पंकज घर के अन्दर गए ताकि आखिरी बचा हुआ सामान ला सकें।

हर्षित और मिताली भाभी ने जैसे ही उन्हें घर से बाहर आने की आहट सुनी तो मुड़कर देखा तो दोनों हैरान रह गये। पंकज अपना 42 इंच का टीवी उठाए आ रहे थे।

“अब इस टीवी को कहाँ रखेंगे?” हर्षित ने मिताली भाभी को बोलते सुना।

“मुझे नहीं पता, पर इसके बिना मेरा काम नहीं चलने वाला। इसे तो मैं लेकर ही जाऊँगा। थोड़ा बहुत सामान इधर-उधर खिसका कर जगह बन ही जायेगी…” पंकज बोले।

हर्षित ने पिछली सीट पर देखा और कहा- पीछे तो जगह नहीं है। मेरे ख्याल से आगे वाली सीट पर ही रखना पड़ेगा?

“अच्छा? तो फिर तुम्हारी भाभी कहाँ बैठेंगी?” पंकज बोले।

उनके चेहरे से लग रहा था जैसे वो गहन चिंतन में डूबे हुए हैं और कोई न कोई रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने टीवी आगे वाली सीट को लेटाकर इस तरह से रखा कि आधा टीवी आगे ड्राईवर के साथ वाली सीट पर और आधा ड्राईवर के ठीक पीछे वाली सीट पर आ गया। फिर हर्षित से पीछे वाली सीट पर बैठने को कहा। हर्षित के बैठते ही उन्होंने मिताली भाभी को भी हर्षित के साथ बैठने को कहा और गाड़ी का दरवाज़ा बन्द करने की कोशिश करने लगे, पर काफी कोशिश करने के बाद भी दरवाज़ा बन्द नहीं हुआ।


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भाभी कहने को मोटी तो नहीं थी पर जगह ही इतनी कम थी कि किसी भी हालत में दो जने वहाँ नहीं बैठ सकते थे। भाभी ने अपने पति को समझाने की कोशिश की- एक काम करते हैं, आज टीवी यहीं छोड़ दीजिये। आप जब अगली बार जायेंगे तो ले जाना।

“बिल्कुल भी नहीं… कल से क्रिकेट के मैच शुरू हो रहे हैं, मेरा काम नहीं चलने वाला टीवी के बिना…” वो बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं थे।

भाभी पहले ही गर्मी से परेशान थीं, उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई देने लगा था, उन्होंने झल्ला कर कहा- देखिये, फटाफट फैसला कीजिए, इतनी कम जगह में दो लोग नहीं आ सकते।

या तो आप अपना टीवी छोड़ दीजिये, या फिर हर्षित को मेरी गोद में बैठना पड़ेगा और मुझे नहीं लगता कि मैं हर्षित का वज़न झेल पाऊँगी।

इतना सुनते ही उनके पति ने झट से कहा- अरे हाँ। यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। एक काम करो, तुम हर्षित की गोद में बैठ जाओ। वैसे भी तुम हल्की सी ही तो हो, हर्षित को ज़्यादा दिक्कत नहीं होगी। रास्ता भी इतना लम्बा नहीं है, बस कुछ घण्टों की तो बात है।

पंकज हर्षित को बच्चा ही समझते थे, इसलिए उन्हें इस बात से कोई दिक्कत नहीं थी कि उनकी बीवी हर्षित की गोद में बैठे।

“आपका दिमाग तो ठीक है? इतनी गर्मी में यह परेशान हो जायेगा…” भाभी ने अपने पति को गुस्से से घूरते हुए कहा।

“कोई दिक्कत नहीं है भाभी। वैसे भी रास्ता इतना लम्बा नहीं है और ऊपर से दूसरा कोई तरीका नहीं है…” हर्षित ने कहा।

तभी पंकज भी बोले- सही बात है मिताली, मान जाओ ना?

मिताली भाभी के पास पंकज की बात मान लेने के सिवा कोई चारा नहीं था, उन्होंने कहा- चलो ठीक है। अगर हर्षित को दिक्कत नहीं है तो ऐसे ही कर लेते हैं। लेकिन अगर रास्ते में हर्षित को दिक्कत हुई तो थोड़ी देर गाड़ी रोक लेंगे।

भाभी ने हर्षित की ओर देखा तो उसने “हाँ…” में सिर हिला दिया।

भाभी ने कहा- तो ठीक है। चलो सब नहा लेते हैं, गर्मी बहुत है। फिर चलेंगे।

हर्षित अपने घर गया और फटाफट नहा-धोकर वापिस आ गया। रास्ता साढ़े तीन से चार घण्टे का था और काफी गर्मी होने वाली थी इसलिए हर्षित ने थोड़े आरामदायक कपड़े पहनने का फैसला किया और अपनी टी-शर्ट और निकर ही पहन ली।

मिताली और पंकज भी थोड़ी देर में तैयार होकर आ गए।

भाभी ने भी गर्मी को ध्यान में रखते हुए एक पतला सा कुर्ता और सलवार ही पहनी थी। पंकज ड्राईवर सीट पर बैठ गए और हर्षित पीछे की सीट पर बैठ गया। भाभी भी पीछे वाली सीट पर हर्षित की गोद में बैठ गई और गाड़ी का दरवाज़ा बन्द कर दिया।

“तुम ठीक से बैठे हो ना?” भाभी ने हर्षित से पूछा।

“जी भाभी, आप चिन्ता मत करो। मुझे कोई दिक्कत नहीं है। आप तो एकदम हल्की सी हैं…” हर्षित ने जवाब दिया तो भाभी मुश्कुराए बिना न रह सकी।

तभी उन्होंने अपने पति को चलने को कहा। उनके पति को सिर्फ़ उनका सिर ही दिखाई दे रहा था क्योंकी सारी जगह उनके टीवी ने घेर रखी थी।

“तुम ठीक से बैठी हो ना?” उनके पति ने पूछा।

भाभी अपनी जगह पर थोड़ा हिली और बोली- हाँ। एकदम ठीक हूँ।

गाड़ी चल पड़ी और चलते ही पंकज ने गाने चला दिये। सफर लम्बा था। करीब एक घण्टा बीत गया था और गाड़ी अपनी पूरी रफ़्तार से चली जा रही थी।


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मिताली आराम से बैठी गाने सुन रही थी कि तभी उन्हें अपने नीचे कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ। उन्होंने खुद को थोड़ा हिलाकर ठीक करने की कोशिश की पर अभी भी उन्हें कुछ चुभ रहा था। वो थोड़ा ऊपर उठी और फिर ठीक से बैठ गई, पर अभी भी मिताली को अपने नीचे कुछ महसूस हो रहा था।

हर्षित साँस रोके चुपचाप बैठा था कि अब तो भाभी को पता लग ही जायेगा कि क्या हो रहा है।

“मैं जब बैठी थी तब तो यहाँ ऐसा कुछ नहीं था तो अब कहाँ से…” मिताली खुद से बातें कर रही थी और तभी अचानक से उन्हें अंदाज़ा हुआ कि वह चुभने वाली चीज़ क्या है।

मिताली के गोद में बैठने के कारण हर्षित के लण्ड में तनाव आ रहा था और वही मिताली की गाण्ड की दरार में चुभ रहा था।

“हे भगवान। हर्षित का लण्ड मेरे बैठने के कारण खड़ा हो गया है…” मिताली ने मन ही मन सोचा- “मुझे उम्मीद नहीं थी कि आज भी मेरी वजह से किसी जवान लड़के का लण्ड खड़ा हो सकता है। कितना बड़ा होगा हर्षित का लण्ड? क्या सोच रहा होगा वह मेरे बारे में मन ही मन? क्या उसे भी मेरे चूतड़ों के बीच की खाईं महसूस हो रही है?” मिताली का मन ऐसे रोमांचक सवालों से प्रफुल्लित हो उठा था।

मिताली ने नीचे कि ओर देखा तो उनका कुर्ता भी खिसक कर ऊपर उठ गया था और उनकी नाभि साफ दिखाई दे रही थी। एक बार तो मिताली ने सोचा कि कुर्ता नीचे कर लिया जाये, पर फिर मिताली ने हर्षित को थोड़ा तंग करने के इरादे से उसे वैसा ही रहने दिया। मिताली को यह विचार बड़ा रोमांचित कर रहा था कि उनकी वजह से हर्षित उत्तेजित हो रहा है।

हर्षित के हाथ उनके दोनों तरफ सीट पर टिके हुए थे। चलते-चलते एक घण्टे से ज़्यादा हो चुका था, पर अभी भी कम से कम दो ढाई घण्टे का सफर बाकी था।

मिताली जानती थी कि पंकज को उनके सिर के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था कि नीचे क्या हो रहा है। उनके टीवी के आड़ में सब कुछ छुपा हुआ था। तभी मिताली ने महसूस किया कि हर्षित थोड़ा उठकर अपने आपको व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहा था। जैसे ही हर्षित दोबारा बैठा तो उसका लण्ड ठीक भाभी के चूतड़ों के बीच में आ गया। मिताली का मन इस एहसास से और भी रोमांचित हो उठा और वो मन ही मन कामना करने लगी कि हर्षित कुछ ना कुछ और करे।

“तुम ठीक से बैठे हो ना हर्षित?” मिताली ने पूछा।

“हाँ भाभी। मैं तो एकदम ठीक हूँ। आपको तो कोई दिक्कत नहीं हो रही ना?” हर्षित ने इस उम्मीद में पूछा कि अगर भाभी को उसके लण्ड की वजह से कोई दिक्कत होगी तो वो इशारों में कुछ कहेंगी।

लेकिन मिताली ने कहा- “बिल्कुल नहीं। बल्कि मुझे तो अच्छा ही महसूस हो रहा है ऐसे बैठकर। तुम्हारे दोनों हाथ एक ही जगह रखे-रखे थक तो नहीं गए ना?”

हर्षित को भरोसा नहीं हो रहा था कि भाभी ने सच में वो सब कहा है, उसने जवाब दिया- हाँ भाभी, थोड़ा सा।

“एक काम करो, तुम अपने दोनों हाथ यहाँ रख लो…” कहकर मिताली ने हर्षित के दोनों हाथ अपनी दोनों जांघों पर रखवा लिये। और पूछा- “अब ठीक है?”

“हाँ, अब तो पहले से बहुत बेहतर है…” हर्षित ने खुश होकर कहा।

मिताली ने नीचे की ओर देखा तो पाया कि हर्षित ने अपनी दोनों हथेलियां उनकी दोनों जांघों पर रख ली थी और उसके दोनों अँगूठे मिताली की चूत के बहुत पास थे। मिताली मन में सोचने लगी के अगर हर्षित थोड़ा सा भी अपने अँगूठों को अन्दर की ओर बढ़ाए तो उनकी चूत को सलवार के ऊपर से छू सकता है, पर मिताली जानती थी कि हर्षित इतनी आसानी से इतनी हिम्मत नहीं करने वाला।

हर्षित की छुअन से मिताली की चूत से रस निकलने लगा था और उनकी पैंटी भीगने लगी थी, उन्हें लग रहा था कि थोड़ी ही देर में यह गीलापन उनकी सलवार तक पहुँच जायेगा और तब अगर हर्षित ने उसे छू लिया तो वह समझ जायेगा भाभी के मन में क्या चल रहा है और वो कितनी गर्म हो चुकी हैं। मिताली ने खुद ही हिम्मत करके बात आगे बढ़ाने की सोची और अपने दोनों हाथ हर्षित के हाथों पर रख लिये।

देखने में भाभी की यह हरकत बड़ी ही स्वाभाविक सी लग रही थी। फिर उन्होंने हर्षित के हाथों को ऊपर से धीरे-धीरे मसलना शुरू किया। मिताली ने एक बार सिर उठाकर अपने पति की ओर देखा। अपने पति के इतनी पास होते हुए हर्षित के साथ ऐसी हरकतें करना उन्हें बड़ा ही रोमांचित कर रहा था। मिताली ने हर्षित के हाथों को मसलते-मसलते उन्हें धीरे-धीरे ऊपर की ओर खिसकाने की कोशिश की ताकि हर्षित के हाथों को अपने चूत के ठीक ऊपर ला सके।

हर्षित भी अब तक समझ चुका था कि भाभी क्या चाह रही हैं, वह खुद भी वासना से भरकर पागल हुआ जा रहा था।

मिताली ने नीचे की ओर देखा तो हर्षित अपने दोनों हाथ भाभी की टाँगों के ठीक बीच में ले आया था और अपने दोनों अँगूठों से भाभी की चूत को उनकी सलवार के ऊपर से हल्के-हल्के सहलाने लगा था। मिताली ने हर्षित का एक हाथ पकड़कर अपनी चूत के बिल्कुल ऊपर रख लिया और अपनी टाँगों को थोड़ा और चौड़ा कर लिया जिससे हर्षित अच्छे से भाभी की चूत को उनकी गीली हो चुकी सलवार और पैंटी के ऊपर से सहला पा रहा था।

मिताली ने हर्षित का हाथ पकड़कर जोर से अपनी चूत पर दबा दिया तो हर्षित ने भी भाभी की चूत को थोड़ा और जोर से रगड़ना शुरू कर दिया। अब मिताली भी वासना की आग में बुरी तरह जल रही थी, उन्होंने अपने हाथ हर्षित के हाथों के ऊपर से हटा लिए थे पर हर्षित ने अपने हाथ वहीं रखे और भाभी की चूत को रगड़ना बन्द कर दिया।

मिताली बेसब्री से इंतज़ार करने लगी कि हर्षित कुछ करे, पर शायद हर्षित आगे बढ़ने में अभी भी डर रहा था। लेकिन मिताली जानती थी कि उसका डर कैसे दूर करना है, मिताली ने हर्षित का एक हाथ पकड़ा और उसे उठाकर अपने पेट पर अपनी सलवार के नाड़े के ठीक ऊपर रख दिया और उसके हाथ को दबा दिया और दूसरे हाथ से अपना नाड़ा खोलने लगी।

नाड़ा खोलते ही मिताली ने हर्षित का हाथ अपनी सलवार के अंदर की ओर कर दिया जिससे हर्षित का हाथ भाभी की बुरी तरह भीग चुकी पैंटी पर आ गया। हर्षित ने भाभी की चूत को गीली पैंटी के ऊपर से रगड़ना शुरू किया। वह अब भाभी की चूत की फ़ाँकों को अच्छे से महसूस कर सकता था। मिताली ने थोड़ी देर तक तो उसी तरह हर्षित के हाथ का मज़ा लिया, फिर उसे पकड़कर अपनी पैंटी की इलास्टिक की तरफ लेजाकर उसके अन्दर की ओर धकेल दिया। भाभी की पैंटी हर्षित और भाभी दोनों के हाथों के लिए बहुत छोटी थी, इसलिए मिताली ने अपना हाथ बाहर ही रखा और सिर्फ़ हर्षित के हाथ को ही आगे बढ़ने दिया।


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***** to be contd... ...

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नाड़ा खोलते ही मिताली ने हर्षित का हाथ अपनी सलवार के अंदर की ओर कर दिया जिससे हर्षित का हाथ भाभी की बुरी तरह भीग चुकी पैंटी पर आ गया। हर्षित ने भाभी की चूत को गीली पैंटी के ऊपर से रगड़ना शुरू किया। वह अब भाभी की चूत की फ़ाँकों को अच्छे से महसूस कर सकता था। मिताली ने थोड़ी देर तक तो उसी तरह हर्षित के हाथ का मज़ा लिया, फिर उसे पकड़कर अपनी पैंटी की इलास्टिक की तरफ लेजाकर उसके अन्दर की ओर धकेल दिया। भाभी की पैंटी हर्षित और भाभी दोनों के हाथों के लिए बहुत छोटी थी, इसलिए मिताली ने अपना हाथ बाहर ही रखा और सिर्फ़ हर्षित के हाथ को ही आगे बढ़ने दिया।

हर्षित ने भाभी की चूत के होंठों को पहली बार छुआ तो उसके पूरे शरीर में गर्मी सी आती हुई महसूस हुई। हर्षित ने भाभी की चूत की दोनों फ़ाँकों के ठीक बीच में अपनी उंगलियों से सहलाना शुरू किया तो मिताली के मुख से जोर की सिसकारी निकल गई पर गाड़ी के शोर में और गानों की आवाज़ में मिताली की आवाज़ दब कर रह गई।

मिताली की चूत एकदम गर्म होकर तप रही थी और पूरी तरह से भीगकर चिकनी हो चुकी थी। तभी मिताली ने अपने चूतड़ ऊपर की ओर उठाए और अपनी पैंटी की इलास्टिक के दोनों ओर अपने दोनों हाथों के अँगूठे फ़ंसाकर उसे नीचे की ओर खिसका दिया जिससे उनकी पैंटी और साथ ही उनकी सलवार उनके घुटनों तक नीचे खिसक गई।

मिताली के ऐसा करते ही हर्षित ने एक बार भाभी के चूतड़ सहलाए और फिर अपने दूसरे हाथ की उंगली भाभी की चूत में घुसा दी और उसे धीरे-धीरे अन्दर-बाहर करने लगा, पर पैंटी के कारण मिताली की टाँगें ज़्यादा खुल नहीं पा रही थी इसलिए मिताली अपनी पैंटी पूरी तरह उतारने के लिए थोड़ा नीचे झुकने ही लगी थी कि हर्षित ने अपने दूसरे हाथ से उनकी पैंटी को पकड़कर नीचे की ओर खींच दिया जिससे वो भाभी के टखनों तक आ गई।

तभी मिताली ने अपने पाँव ऊपर उठाए ताकि हर्षित उन्हें पूरी तरह निकाल दे। हर्षित ने भाभी की पैंटी के साथ-साथ उनकी सलवार भी खींचकर नीचे उतार दी। अब मिताली ने आराम से अपनी टाँगें पूरी खोल ली थीं, जितना वो खोल सकतीं थीं।

हर्षित को तो जैसे इसी मौके का इंतज़ार था, उसने तुरन्त अपनी दो उंगलियां भाभी की चूत में घुसा दीं।

मिताली के मुँह से हल्की सी “आह…” निकल गई।

“तुम ठीक तो हो ना?” अचानक पंकज ने पूछा। वो मिताली के चेहरे को ही देख रहे थे।

मिताली मुश्कुराई और बोली- मैं तो एकदम ठीक हूँ। मुझे लगा था हर्षित की गोद में बैठने से दिक्कत होगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं है। मुझे लगता है यह सफर काफी अच्छा जाने वाला है। मिताली अपने पति से बड़े आराम से बात कर रही थी और हर्षित की उंगलियां भाभी की चूत को चोद रही थी।

“और कितनी देर चलने के बाद विराम लेना है?” पंकज ने पूछा।

“मैं अभी रुकना नहीं चाहती, थोड़ा और आगे बढ़ना चाहती हूँ…” मिताली ने जवाब दिया- तुम्हारा क्या विचार है हर्षित? उन्होंने हर्षित से पूछा।

“हाँ भाभी, मेरा भी अभी और आगे चलते रहने का मन है…” हर्षित ने कहा।

“अच्छा है, जितना आगे तक चलें, उतना ही बेहतर है…” मिताली मुश्कुराते हुए बोली।

“ठीक है ना?” मिताली ने अपने पति से पूछा।

“हाँ मुझे भी लगता है बिना रुके जितना आगे पहुँच जायें, उतना ही बेहतर है…” उन्होंने जवाब दिया।

मिताली पीछे की ओर मुड़ी और हर्षित की ओर देखते हुए बोली- “मुझे भी… मैं नहीं चाहती कि तुम्हें रुकना पड़े…” मिताली ने धीमी आवाज़ में कहा।

“हर्षित?” पंकज बोले- तुम्हें कोई दिक्कत तो नहीं ना तुम्हारी भाभी के गोद में बैठने से?

“बिल्कुल नहीं। भाभी थोड़ी-थोड़ी देर में उठकर अपना स्थान बदल लेती हैं जिससे एक ही जगह ज़्यादा देर भार नहीं रहता और मुझे भी आसानी रहती है…” हर्षित पंकज से बात कर रहा था और भाभी की फुद्दी में अपनी उंगलियां और भी गहराई में उतारे जा रहा था।

हर्षित ने फिर से अपनी उंगलियां भाभी की योनि में तेज़ी से अन्दर-बाहर करनी शुरू कर दी थी।

मिताली को अपनी सिसकारियां रोके रखने के लिए अपने होंठों को कसकर दबाए रखना पड़ रहा था। मिताली ने कसकर हर्षित की कलाई पकड़ ली थी। ऐसा करके मिताली हर्षित को यह एहसास दिलाना चाह रही थी कि उन्हें कितना आनन्द आ रहा है और वे चाहती हैं कि हर्षित अपनी उंगलियां और अन्दर तक घुसाता रहे।

हर्षित भाभी का इशारा समझकर अपनी उंगलियों को भाभी की चूत में जितनी अन्दर तक घुसा सकता था, घुसाने लगा।


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मिताली ने हर्षित की उंगलियों के साथ-साथ धीरे-धीरे अपने कूल्हे भी हिलाने शुरू कर दिये। उन्होंने अपने पति की ओर देखा, खुशकिस्मती से उनके टीवी की वजह से वो कुछ नहीं देख पा रहे थे। अगर उन्हें पता होता कि हर्षित की उंगलियां उनकी बीवी की चूत में घुसी हुई हैं तो जाने क्या होता। मिताली का पूरा बदन हर्षित की उंगलियों की गति के हिसाब से सिहर रहा था।

तभी हर्षित ने अचानक से अपनी उंगलियां भाभी की चूत से बाहर निकाल ली। मिताली को थोड़ी निराशा हुई, पर उन्हें ज़्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ा। हर्षित ने तुरन्त भाभी के कुर्ते के बटन खोलने शुरू कर दिये। मिताली ने गर्मी के कारण ब्रा नहीं पहनी थी।

जैसे-जैसे हर्षित भाभी के कुर्ते के ऊपर से नीचे तक के बटन खोल रहा था, मिताली को गाड़ी के ए॰सी॰ की ठंडी हवा के झोंके अपनी चूचियों पर लगते महसूस हुए जिससे उनके निप्पल सख्त होने लगे। हर्षित ने भाभी के कुर्ते का आखिरी बटन खोलकर कुर्ता सामने से पूरा खोल दिया।

अब मिताली आगे से भी बिल्कुल निर्वस्त्र हो गई थीं। हर्षित ने भाभी के नंगे बदन पर अपने हाथ ऊपर से नीचे तक फिराने शुरू कर दिये। वो भाभी की चूचियों को मसल-मसलकर उनसे खेलने लगा। मिताली ने अपनी चूचियां आगे की तरफ धकेल दी ताकि हर्षित अच्छे से उन्हें दबा सके। मिताली ने अपने चूतड़ उठाए और अपना कुर्ता नीचे से निकालकर हटा दिया।

हर्षित भाभी का इशारा समझ गया, वह अपने हाथ नीचे लेजाकर अपनी निकरके हुक खोलने लगा। मिताली को एक बार फिर थोड़ा ऊपर उठना पड़ा ताकि हर्षित ठीक से अपनी निकर का हुक और चेन खोल सके। हर्षित का लण्ड अभी भी भाभी के चूतड़ों के ठीक बीच में सटा हुआ था, मिताली ने अपने कूल्हे थोड़े और ऊपर उठा लिये।

“सब ठीक है ना मिताली?” उनके पति ने पूछा- क्या तुम्हें हर्षित की गोद में बैठने में दिक्कत हो रही है? क्या मैं गाड़ी रोक दूँ ताकि तुम दोनों को थोड़ी देर आराम मिल सके?

“अरे नहीं। सब ठीक है। वो तो मैं थोड़ी जगह बदल रही थी ताकि हर्षित को दिक्कत ना हो। अगर मैं ठीक जगह पर बैठ जाऊँ तो हम दोनों के लिए बड़ा आराम हो जायेगा…”

भाभी के यह कहते ही हर्षित ने अपने निकर और अंडरवियर खींचकर नीचे उतार दिये। मिताली को हर्षित का लण्ड अपने नंगे चूतड़ों के बीचोबीच फँसता हुआ महसूस हुआ।

“हर्षित, क्या मैं अपनी जगह थोड़ी बदलूँ ताकि तुम्हें आराम मिल सके?” मिताली भाभी ने हर्षित से पूछा।

हर्षित ने अपने दोनों हाथ भाभी के चूतड़ों के दोनों ओर रखे और कहा- भाभी अगर आप थोड़ा ऊपर उठें तो मैं खुद को सही जगह पर ले आऊँ। फिर हम दोनों के लिए सब ठीक हो जायेगा…”

मिताली समझ गई कि हर्षित ऐसा क्यों कह रहा है, वो जितना ऊपर उठ सकती थी उतना उठ गई। हर्षित का एक हाथ उनके चूतड़ से हट गया, वो समझ गई हर्षित उस हाथ से क्या करने वाला है।

हर्षित ने अपना लण्ड पकड़कर भाभी की चूत के मुँह पर सेट किया और दूसरे हाथ से भाभी के चूतड़ को नीचे की ओर धकेल कर उन्हें नीचे आने का इशारा किया।

मिताली ने धीरे-धीरे अपने चूतड़ नीचे की ओर करने शुरू कर दिये। मिताली को हर्षित के लौड़े का ऊपरी हिस्सा अपनी चूत के प्रवेशद्वार पर लगता हुआ महसूस हुआ। मिताली और नीचे होने लगी तो हर्षित का लण्ड बड़ी आराम से उनकी चूत में फिसलते हुए घुसने लगा।

जैसे-जैसे मिताली अपने चूतड़ नीचे ला रही थी, वैसे-वैसे हर्षित का लण्ड भाभी की चूत को चौड़ा करता हुआ और अंदर घुसे जा रहा था। भाभी की गर्म और चिकनी हो चुकी चूत में लण्ड घुसाने से होने वाले एहसास से हर्षित के आनन्द की सीमा ना रही।

तभी मिताली खुद को रोक नहीं पाई और उनके मुँह से जोर की सिसकारी निकल गई- आआह्ह्ह।

उनके पति ने तुरन्त उनकी ओर देखा और कहा- मुझे लगता है हमें थोड़ी देर आराम करने के लिए रुक जाना चाहिये।

मिताली खुद को तब तक और नीचे करती रही जब तक कि हर्षित का लिंग पूरी जड़ तक उनकी चूत की गहराइयों में नहीं उतर गया और फिर अपने पति पंकज से बोली- “नहीं, नहीं, रुको मत। मैं चाहती हूँ अभी तुम चलते रहो। फिलहाल अगले एक घण्टे तक भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं सही कह रही हूँ ना हर्षित?

“हाँ भाभी। अब जब आप दोबारा बैठने लगीं तो मैंने खुद को सही जगह पर सेट कर लिया ताकि हमें कोई दिक्कत ना हो। बस मुझे एक बार थोड़ा ऊपर और उठना है अगर आपको कोई दिक्कत ना हो तो। ठीक है ना भाभी?”

“क्या मैं भी तुम्हारे साथ-साथ ऊपर उठूँ, हर्षित?”

“नहीं, आप बस मेरी गोद में बैठी रहिए और मैं आपको अपने साथ-साथ खुद ऊपर उठा लूँगा…” इतना कहकर हर्षित ने खुद को थोड़ा ऊपर उठाया और अपना लण्ड भाभी की चूत में और भी गहराई में घुसा दिया। मिताली को एक बार तो लगा जैसे वो उसी पल स्खलित हो जाएंगी।

“चलो मैं भी खुद को थोड़ा ठीक कर लेती हूँ…” कहकर मिताली ने अपनी गाण्ड आगे पीछे हिलाई जिससे हर्षित का लण्ड भाभी की चूत में और अच्छी तरह अन्दर-बाहर हो गया। हर्षित के लौड़े की सवारी करते-करते मिताली ने अपने पति की ओर देखा।

हर्षित अभी भी अपना लण्ड पूरा जोर लगाकर भाभी की चूत में घुसा रहा था और पूरी गति के साथ अपनी मिताली भाभी को चोद रहा था।


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मिताली मन ही मन सोचने लगी- मेरे बेवकूफ पति को क्या पता कि उसकी बीवी कैसे लगभग नंगी होकर, उसके इतनी पास होकर भी एक जवान लड़के से चुदाई का आनन्द ले रही है। अपने पति के इतनी पास होते हुए हर्षित से चुदना मिताली को बहुत ज़्यादा रोमांचित कर रहा था। तभी हर्षित ने एक जोरदार धक्का लगाकर भाभी को उनके विचारों की कैद से बाहर निकाला।

हर्षित ने धीरे से मिताली से पूछा- आपका कितनी देर में हो जायेगा भाभी?

“बहुत जल्द हर्षित, बहुत जल्द…” मिताली ने उत्तर दिया।

तभी भाभी को महसूस हुआ कि उनका स्खलन होने ही वाला है, उन्होंने हर्षित के दोनों हाथ अपने चूतड़ों से हटाकर अपनी चूचियों पर रख लिए और जोर से दबा दिया। हर्षित जोर से भाभी की चूचियां मसलने लगा और तेज़ी से अपना लण्ड भाभी की चूत में अंदर-बाहर करने लगा।

तभी उसे महसूस हुआ भाभी का पूरा बदन अकड़ने लगा और उनकी चूत की अंदरूनी दीवारें उसके लण्ड को ऐसे दबाने लगीं जैसे वो उसे निचोड़ लेना चाहती हों।

काफी क्षणों तक ऐसे ही चलता रहा।

हर्षित समझ गया कि भाभी स्खलित हो गई हैं।

यह शायद मिताली का आज तक का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला और सबसे आनन्ददायक स्खलन था। थककर मिताली हर्षित के सहारे टेक लगाकर पीछे की ओर लेट गई।

हर्षित अभी भी स्खलित नहीं हुआ था, वह लगातार अपने लण्ड को अन्दर-बाहर करते हुए भाभी की चूत चोदे जा रहा था। तभी हर्षित ने अपनी गति बढ़ा दी और तेज़ी से लण्ड अंदर-बाहर करते-करते एक जोर का धक्का लगाकर अपना लण्ड भाभी की चूत की गहराई में पूरा अंदर तक घुसा दिया और अपने वीर्य का फव्वारा भाभी की चूत में छोड़ दिया।

हर्षित का गर्मागर्म वीर्य मिताली को अपनी चूत को पूरा भरता हुआ महसूस हुआ। मिताली तब तक ऐसे ही पड़ी रही जब तक कि हर्षित ने अपने लण्ड से वीर्य की आखिरी बूँद उनकी चूत में नहीं खाली कर दी। हर्षित और मिताली भाभी दोनों ही अब तक थक चुके थे।

“एक बोर्ड लगा हुआ है, जिस पर लिखा हुआ है लगभग दस किलोमीटर दूर एक रेस्टोरेंट है। क्या तुम दोनों को भूख लग गई है?” मिताली के पति पंकज ने पूछा।

“हाँ, मेरे ख्याल से हमें कुछ खा लेना चाहिये…” हर्षित ने कहा।

मिताली ने पीछे मुड़कर हर्षित की ओर देखा तो वह मुश्कुरा दिया- आप क्या कहती हो भाभी?” हर्षित ने पूछा।

“वैसे तो मैं एकदम फुल हूँ, पर मेरे खयाल से कुछ हल्का-फुल्का खाया जा सकता है…” मिताली ने शरारती अंदाज़ में हर्षित की ओर आँख मारते हुए कहा। मिताली झुकी और अपनी पैंटी उठाने लगी जो काफी देर से नीचे पड़ी थी।

उसी समय हर्षित का लण्ड उनकी चूत से फिसल कर बाहर निकल गया। मिताली ने अपने पाँव अपनी पैंटी में डाले और उसे ऊपर की ओर खींच लिया।

जैसे ही उनकी पैंटी उनकी चूत को ढकने वाली थी, तभी हर्षित ने एक बार फिर अपनी उंगली उनकी चूत में घुसा दी।

मिताली ने प्यार भरे अंदाज़ में हर्षित के हाथ पर थपकी दी और हर्षित ने अपनी उंगली बाहर निकाल ली। फिर मिताली ने अपनी सलवार पहनकर नाड़ा बांध लिया और फिर अपने कुर्ते के बटन बन्द करने लगीं।

हर्षित ने भी अपनी निकर और अण्डरवीयर फिर से पहन लिए और अपना लौड़ा अन्दर करके ज़िप बन्द कर ली।

“खाना खाने के बाद कितना रास्ता और बचा है?” मिताली ने अपने पति से पूछा।

“बस आधा घण्टा और, मेरे ख्याल से तब तक तो तुम दोनों काम चला ही लोगे?” उनके पति ने कहा।

“मुझे कोई दिक्कत नहीं है…” मिताली ने अपने पति से कहा- “अगर हर्षित को मेरे गोद में बैठने से दिक्कत ना हो तो मैं तो चार घण्टे और इस तरह से बैठ सकती हूँ।

“तुम्हारा क्या कहना है हर्षित? तुम्हें तो अपनी भाभी को गोद में आधा घण्टा और बैठाए रखने में कोई दिक्कत नहीं होगी ना? मुझे लगा था तुम दोनों में से कोई एक तो अब तक परेशान हो ही गया होगा…”

“अरे नहीं भैया। मुझे भी कोई परेशानी नहीं है। अगर भाभी चार घण्टे और मेरी गोद में बैठी रहें तो भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है…” यह कहकर उसने भाभी की ओर देखा, वह पहले से ही हर्षित की ओर देखकर मुश्कुरा रही थीं।


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***** THE END समाप्त *****

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गुड़िया से बन गई चुदक्कड़ मुनिया

लेख़िका: गुड़िया

सबसे पहले सभी पाठकों को मेरा प्रेम भरा प्रणाम। मेरा नाम गुड़िया है और मैं पंजाब की रहने वाली हूँ। जिला मैं नहीं बता सकती, सिर्फ इतना जान लीजिये कि मैं ‘मस्त पंजाबन’ हूँ। मेरे गाँव के लड़कों ने मेरा नाम ट्रैक्टर की ट्राली रख दिया है। वे कहते हैं कि मैं उनमें से हूँ जिसे कोई भी, कभी भी अपने ट्रैक्टर के पीछे डालकर ले जा सकता है।

मुझे उनके ऐसे कटाक्ष हमेशा ही रोमांचित करते रहते हैं।

मेरी ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। अपने मुँह से खुद की तारीफ तो नहीं करनी चाहिए, मगर मुझे ऐसा ही जिश्म मिला है। रंग मेरा गोरा नहीं बल्कि सांवला है, मगर ऊपर वाले ने जो जिश्म मुझे दिया है, जिस सांचे में मुझे बनाया है, उसपर हर गबरू जवान मरता है। पतली सी बलखाती कमर है मेरी। दिलों को हिला के रख देने वाले मस्त गोल-गोल उभरे हुए चूतड़। जी हाँ पूरे गोल-गोल, मानो किसी ने दो खरबूजे रखकर उसपर पैंटी डाल दी हो। मगर इन्हें कौन समझाए कि मेरे पास तो यह कुदरत की देन है। मेरे मम्मे देखकर अगर किसी जवान का हथियार खड़ा ना हो तो मेरा नाम गुड़िया नहीं।

हर मर्द, हर लड़का, यहाँ तक कि बुजुर्ग भी मेरी मारना चाहतें हैं। मैंने भी शुरू से ही जवानी के मजे दोनों हाथ खोलकर चखवाए हैं और मजे लिए हैं। बात उन दिनों की है जब हम गाँव में रहते थे। आप सभी तो जानते ही हैं कि गाँव में रहकर जवानी दबाये नहीं दबती। पापा और चाचा जब से जर्मनी गए थे, तब से ही मैंने घर में कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें एक लड़की को अपनी शादी के बाद देखने चाहिए। माँ और चाची दोनों की तो भट्टी ही गरम रहती था, बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।

हम तीन बहनें और दो भाई हैं। मेरा एक भाई मुझसे डेढ़ साल बड़ा है और एक भाई हम भाई बहनों में सबसे छोटा है। बड़ा भाई डलहौजी हास्टल में था और छोटा भाई एक अच्छे स्कूल में पढ़ता था। मगर हम लड़कियों को सरकारी स्कूल में डाला गया था।

मेरी चाचाजी की भी दो लड़कियां और एक लड़का है जो की डलहौजी हास्टल में पढता था। हमारी गाँव में पुश्तैनी ज्यादाद है और काफी अच्छा काम धंधा है। हम बहनों को घर के कामों में हाथ बंटाना पड़ता था। हम सभी के काम बाँध दिए गए थे। जैसे कि खेतों में काम कर रहे लोगों के लिए खाना बनाना व चाय बनाना आदि।

वैसे तो सारे मजदूर खाना लेने खुद ही आते थे मगर कभी-कभी खेतों में जाकर चाय पानी पहुँचाना भी पड़ता था। इसलिए हम बहनें बारी-बारी से खेतों में जाकर चाय पानी पहुंचा आते थे। एक दो बार जब मैं खेतों पर गई तो मैंने गौर किया कि सबकी नज़र मेरी छाती पर ही रहती थी, जो इतनी कम उम्र में विकसत हो रही थे। उनकी तिरछी नज़र से मेरे जिश्म में अजीब सी सिहरन उठने लगती थी। अब तो खेतों में काम कर रहे लोग मुझ पर कटाक्ष भी कसने लगे थे।

मुझे यह सब बड़ा अच्छा लगता था। मैंने एक बार एक जवान मजदूर के साथ चाची को गन्ने के खेतों में और मोटर वाले कमरे में घुसते भी देखा था और अब उसी जवान मजदूर की नजरें माँ और चाची की जवान हो रही बेटियों पर जाने लगी थीं। मेरी बड़ी बहन के तो कुछ लड़कों के साथ चक्कर चल पड़े थे। यह सब देख-देखकर मेरा भी मन मचलने लगा था और मेरा दिमाग गन्दा हो चुका था।

अक्सर जब हम बहनें अकेली होतीं तो आपस में लिपट -लिपटकर अपने मम्मे दबवाने और दबाने के मजे लेतीं थीं। मेरी बड़ी बहन और मेरे चाचा जी की बड़ी लड़की को तो मैंने कई बार एक दूसरे की चूत पर हाथ फेरते भी देखा था, वे दोनों एक दूसरे के दानों को चुटकी में लेकर मस्ती के साथ रगड़ने लगती थी और यह करते समय उनकी आँखें मुंद जाती थी। यह सब देखकर मेरे भीतर भी वासना की हल्की चिंगारी लग चुकी थी। एक दिन मैं खेतों में मोटर पर काम कर रहे मजदूर को चाय और खाना पकड़ाने गई।


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