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जवाब मुहतोड़ ( उपन्यास )

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"तुम्हारे ख्याल से सिचुयेशन कैसी है ?" कॉनट्रॉलर ने त्रिभुवन की ओर सिगरेट बढ़ाते हुए पूछा.

"सिचुयेशन तो मुझसे बेहतर आप जानते है." त्रिभुवन ने सिगरेट लेते हुए कहा- "उस प्लेन मे जो यह विजय नाम का आदमी इस वक़्त पाइलट की शीट पर बैठा हुआ वो अभी तो बहुत हिम्मत वाला लग रहा है...लेकिन यह परिस्थिति इतनी गंभीर और ख़तरनाक है की बड़े-बड़े हिम्मत वालो के हिम्मत खफा हो जाते है."

"क्या वो प्लेन को सही सलामत नीचे उतरने मे कामयाब हो जाएगा ?" कॉनट्रॉलर ने अपनी और त्रिभुवन की सिगरेट सुलगाते हुए कहा.

"मै अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हू." त्रिभुवन बोला- "लेकिन सब कुछ इस आदमी विजय पर निर्भर करता है.....अगर ऐन वक़्त पर घबराहट के कारण इसके हाथ-पैर फूल गये तो...अब . क्या कहु...उस हालत मे तो समझो कुछ भी हो सकता है."

"यानी जबरदस्त दुर्घटना हो सकती है ?"

"अगर वो सही ढंग से नही उतार पाया तो जबरदस्त क्र्रस हो सकता है...उस हालत मे प्लेन मे निश्चित रूप से आग लग जाएगी...एक आदमी भी बचना मुस्किल हो जाएगा....अगर वो उसे समुन्द्र मे उतारता है तो पानी के आघात से प्लेन बिल्कुल नॅस्ट हो जाएगा...मगर तब हम शायद कुछ लोगो को बचा सके...."

"नेवी को अलर्ट करो." कॉनट्रॉलर ने अपने असिस्टेंट से कहा- "एरफोर्स को भी...उनसे कहो की वे किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहे और अगले निर्देश की प्रतीकच्छा करे."

"लेकिन मै नही चाहूँगा की प्लेन को समुन्द्र मे उतरा जाए." त्रिभुवन बोला- "उसमे बहुत लोगो के मरने का ख़तरा है."

"लेकिन अगर हम उसे एरपोर्ट पर उतारने की कोशिश करते है और वो नही उतार पाया तो सबके-सब लोगो के मारे जाने का ख़तरा है."

"लेकिन अगर वो प्लेन को उतारने मे कामयाब हो गया तो सबके बच जाने का चान्स भी है."

साप-छू छूंदर जैसी हालत हो गयी थी...कुछ समझ मे नही आ रहा था की क्या किया जाए.

"हेलो रडार." त्रिभुवन ने हेडसेट अपने सिर पर चढ़ाने के बाद कहा- "वो प्लेन अभी तुम्हारे रेंज मे आया या नही ?"

"अभी तो नही." दूसरी ओर का जवाब उसके कानो मे गूंजा"- "रूको...एक मिनिट...कुछ आ रहा है...हा कॅप्टन...वो रेंज मे आ गया है...वो ट्रेक से 10 मिल दक्षिण मे है...उससे कहो की वो दाए को 235 की हेडिंग पर जाए."

"ठीक है." कहने के साथ ही त्रिभुवन ने प्लेन से कनेक्ट करने का संकेत दिया.

"हेलो सिक्स-वन-फोर." त्रिभुवन ने माइक्रोफॉन मे कहा- "तुम मेरे निर्देशों को सही ढंग से समझ कर उन पर अमल कर रहे हो ना ?"

"राजनगर." विजय की आवाज़ आई.

"कोई दिक्कत तो नही आ रही ?"

"कोई ख़ास्स दिक्कत तो नही आ रही" विजय का स्वर आया- "ऐसा लग रहा है जैसे छोटी कार चलाने वाले को किसी बड़े भाड़ी ट्रक की ड्राइविंग की शीट पर बैठा दिया हो."

"गुड...वेरी गुड... अब हम तुम्हे रडार पर देख सकते है....तुम सही रास्ते से 10 मिल दक्षिण मे हो...मै चाहता हू की तुम सावधानी के साथ दाए को हो जाओ...अपने "थ्रोट्ल" का ईस्तमाल करते हुए इसी स्पीड को कायम रखो और प्लेन को 235 की हैडिंग पर ले आओ..ठीक से समझ गये ना ?"

"बिल्कुल समझ गया."

"टॉवेर को सावधान करो."कॉनट्रॉलर ने चिल्ला कर अपने असिस्टेंट से कहा- "उनसे कहो की फायर-ब्रिगेड के आदमियो को अलर्ट करे."

"हेलो राज नगर." तभी विजय की आवाज़ गूँजी- "तुम्हारे निर्देश अनुसार हम अब 235 की हेनडिंग पर पहुच गये है."

"बहुत अछी." त्रिभुवन ने अपनी आवाज़ मे ज़बरदस्ती सा उत्साह बरते हुए कहा- "तुम बहुत बढ़िया काम कर रहे हो...जो कुछ भी मैने तुम्हे बताया है उसे एक बार अछीतरह फिर से दोहराव...फिर शायद मौका ना मिले..क्यूंकी अब तुम बहुत जल्दी एरपोर्ट पर पहुँचने वाले हो..."

विजय दोहराने लगा.

 


कॉनट्रॉलर रनवे खाली किए जाने का निर्देश दे रहा था. "बहुत अच्छे विजय". सुनने के बाद त्रिभुवन ने माइक्रोफॉन मे कहा- "अब तुम 10 मिनिट मे एरपोर्ट के पास पहुच जाओगे...इस वक़्त तुम कितनी उचाई पर हो ?"

"हमारी उचाई इस वक़्त 2500 फीट है."

"ठीक है...तुम 2000 फीट की उचाई पर आ जाओ...धीरे-धीरे..नही ठीक नही उतार रहे तुम...उपर को चल जाओ..."

"अब संभव नही है राजनगर...मे अब सीधा नीचे उतार रहा हू."

"लेकिन विजय...."

"मै सीधा उतार रहा हू...मुझे बताओ की कौन से रनवे पर उतारू ?"

"मुझे उससे बात करने दो." घबराए से कॉनट्रॉलर ने कहा. "अब बहस करने से कोई फयडा नही है." त्रिभुवन ने कहा. उसका चेहरा सफेद पर गया था और नथुने काँपने लगे थे.- "हमे उसकी बात माननी पड़ेगी. वो इस वक़्त उस प्लेन को कॉंमांड कर रहा है...रनवे का नंबर बताओ."

"रनवे नंबर 1..इस एरपोर्ट पर वही सबसे लंबा है." त्रिभुवन ने रनवे नंबर 1 का नंबर माइक्रोफॉन मे दोहराया.

प्लेन मे विजय कंट्रोल से जूझ रहा था...उसके निकट प्रताप केलकर तना हुआ और खामोश बैठा था...उपर से तो वो निर्विकार दिखाई दे रहा था मगर भीतर ही भीतर उसका दिल तेज़ी से धरक रहा था...चेहरे पर अब मोटी-मोटी पसीने की बूंदे उभर आई थी...पसीने की मोटी-मोटी बूंदे विजय के चेहरे पर भी उभर आई थी...दिल उसका भी बुरी तरह धरक रहा था...क्यूंकी वो खुद नही जनता था की वो इस विमान को सही-सलामत उतार भी पाएगा या नही...वैसे उसे अपनी ज़िंदगी और मौत की कोई खास परवाह नही थी...क्यू की मौत से आँख-मिचोली खेलना और ख़तरो से जूझना तो उसका शौख था...इसलिए अपनी चिंता नही थी उसे...चिंता थी तो उसे उन निरीह यात्रियो की जिनके प्राणो की ज़िम्मेदारी का बोझ उसके कंधो पर था....

वो त्रिभुवन के एक-एक निर्देश को ध्यान से सुन रहा था और उसपर पूरा अमल भी कर रहा था...मगर जब उसने त्रिभुवन की ओर से यह संदेश सुना की वो प्लेन को उपर ले जाए तो उसे कुछ ख़तरा सा महसूस हुआ की इस भारी मशीन को उतरते-उतरते एकदम उपर ले जाने के चक्कर मे कोई ऐसे गड़बड़ ना हो जाए जिससे प्लेन क्रेस होने का ख़तरा पैदा हो जाए...इसलिए उसने तुरंत उतरने का फ़ैसला कर लिया था.

प्लेन एरपोर्ट के निकट पहुच गया था...उसकी रोशनी को वो सॉफ देख सकता था.

"रनवे नंबर 1 कौन सा है ?" नीचे उतरते प्लेन के कंट्रोल से जूझता हुआ विजय माइक्रोफॉन मे चिल्लाया.

"सिर्फ़ रनवे नंबर एक की बत्तिया जलती रहे..बाकी सबकी बुझा दो." चीख ते हुए त्रिभुवन ने आदेश प्रसारित किया और फिर माइक्रोफॉन मे विजय से बोला- "व्हील डाउन विजय...3 हरी रोशनीयो को चेक करो...अपनी एयर स्पीड को संभालने के लिए थ्रोट्ल को थोरा सा खिचो खिचो...ब्रेक प्रेसर चेक करो...वो 1000 पौंड के करीब होना चाहिए..अपने सामने के पैनल पर हाइड्रोलिक बूसटर के दाए तरफ का मीटर देखो..."

त्रिभुवन की आवाज़ कंट्रोल टॉवेर मे गूँज रही थी जहा उस समय मौत का सा सन्नाटा छाया हुआ था...त्रिभुवन निर्देश पे निर्देश दिए जा रहा था.

इसी बीच एक के बाद एक रोशनीयो की कतारें बुझती चली गयी...सिर्फ़ एक ओर की रोशनीयो की कतार जल रही थी..वो रनवे नंबर 1 था.

"वो बहुत तेज़ी के साथ उतार रहा है." रडार ऑपरेटर ने सूचना दी- "800...750...700..."

"तुम बहुत तेज़ी से नीचे उतार रहे हो..थोड़ा कम करो." त्रिभुवन माइक्रोफॉन मे चिल्लाया.

"लगता है प्लेन उसके कंट्रोल मे नही है." कॉनट्रॉलर चिल्लाया.

"शेट अप." त्रिभुवन गुस्से से चीखा- "उसे डिस्टर्ब मत करो." फिर माइक्रोफॉन मे चिल्लाया- "विजय एयर स्पीड को देखो..प्लेन का अगला हिस्सा ज्यदा उचा है...उसे नीचे करो..."

उपर प्लेन मे विजय के जिस्म से पसीने की धारा बह रही थी..चेहरे से बहता पसीना आँखो मे घुस कर चिरमीराहट पैदा कर रहा था...लेकिन फिर भी वो पूरी कोशिश कर रहा था की उसकी एकाग्रता भंग ना हो पाए...प्लेन दाए-बाए झूल रहा था....वो रनवे के उपर था...उसे ऐसा लग रहा था की जैसे धरती प्लेन से टकराने के लिए तेज़ी से उपर की ओर उठती आ रही हो.

फिर एक झटके के साथ बीच रनवे से टकराया...एक चीखती हुई सी आवाज़ के साथ रब्बर की गंध वाला धुवा सा हवा मे फैला...आघात इतना तेज़ था की प्लेन एक बरगी फिर हवा मे उछल गया..अगले ही छन टायर फिर कॉंक्रीट की सड़क से टकराया.

 


प्लेन किसी गेंद की तरह उछलता जा रहा था...भिंचे दांतो के साथ विजय ने कंट्रोल कोलम को अपनी तरफ खिछा...कुछ देर पहले के काल्पनिक ख़तरे साकार होकर आँखों के सामने नाचने लगे...और फिर प्लेन रनवे पर दौड़ने लगा.

चमत-कारिक ढंग से वे धरती पर उतार आए थे.

अपने पैरो की पूरी शक्ति के साथ उसने ब्रेक दबाए....एक आवाज़ सी गूँजी...मगर स्पीड कम नही हुई...वो पूरी तरह ताक़त के साथ ब्रेक पर खड़ा सा हो गया...इस बीच दो तिहाई के करीब रनवे पार हो चुका था...विजय को लगा की वो टाइम से प्लेन को नही रोक पाएगा.....

"एंजिन बंद करो...एंजिन बंद करो..." रेडियो पर त्रिभुवन चिल्ला रहा था.

विजय ने एंजिन के स्विच बंद कर दिए और वो विस्फोटक नेत्रो से सामने की तरफ देखे जा रहा था..एंजिन बंद हो जाने के बावजूद भी प्लेन गोली की रफ़्तार के साथ दौरा जा रहा था ..और उस समय वो दहशत से कांप सा गया जब उसने देखा की प्लेन रनवे को छोर कर घास के मैदान मे उतर गया....

दमकल गाड़ी पर खड़े फयरमेन ने प्लेन को अपनी ओर आते देखा तो वो गाड़ी से कूद कर ज़मीन पर औंधा लेट गया...प्लेन का बाया पंख गाड़ी के उपर से गुजर गया...फयरमेन भी बच गया...मगर वो ज़मीन पर पड़ा हुआ कांप रहा था.

रनवे से उतरते ही प्लेन एक अर्ध-वृत सा गोला बनाता हुआ दौरता रहा...झटके से विजय अपनी शीट पर दाई ओर गिर गया...प्रताप केलकर के मूह से एक चीख निकल गयी...

यात्री कच्छ मे भयभीत यात्री . के मारे बुरी तरह चीखने-चिल्लाने लगे थे.

विजय ने प्लेन को संभालने की कोशिश की...उसकी कोशिश थी की प्लेन के पंख ज़मीन से टकराने ना पाए...वैसे प्लेन की गति उसके काबू से बाहर थी...प्लेन ने अपने मोमेंट्स मे रनवे के किनारे की रोशनीयो को तोड़-फोड़ कर तहस-नहस कर दिया था.

पोज़िशन विजय के काबू से बाहर हो गयी थी...मगर फिर भी वो उसे संभालने की कोशिश किए जा रहा था...लेकिन प्लेन किसी भयानक राक्चस की तरह दौरा जा रहा था...और विजय को ऐसा लग रहा था जैसे कोई अतिकाय भयानक रक्चाश उन्हे खाने के बाद हजम करने के लिए पूरी भयँकर्ता के साथ उछल-कूद कर रहा हो.

और फिर विजय को ऐसा लगा जैसे सारा ब्रह्मांड ही थम गया हो....कोई आवाज़ नही आ रही थी...सब कुछ जैसे सन्नाटे मे डूब गया हो....... फिर सन्नाटे की गोद मे से आवाज़ निकालने लगी....यात्री कच्छ से लोगो के हसणे की आवाज़ें आ रही थी.

किसी चमत-कारिक ढंग से प्लेन रुक गया था.

यात्री कच्छ मे भय से आतंकित यात्रियो को अभी भी यकीन नही आ रहा था की वे पूरी तरह सही-सलामत और ज़िंदा है...और फिर उनमे से कोई हसा...पहले धीरे से और फिर ज़ोर-ज़ोर से पागलों की तरह...हस्सी का वो दौर छूत की बीमारी की तरह सभी यात्रियो मे फैलता चला गया...सभी उन्मादियो और पागलों की तरह हश्ते हुए ख़ुसी से उछाल रहे थे और एक दूसरे से गले मिलते हुए जिंदगी बच जाने का जश्न माना रहे थे.

"एक आश्*चर्या जनक चमत्कार कर दिखाया तुम्हने." प्रताप केलकर गर्म जोशी के साथ विजय का हाथ दबाता हुआ बोला- "कुछ देर पहले तक मुझे ऐसा लग रहा था जैसे हम लोग जिंदा ज़मीन पर पैर ना रख सकेंगे...लेकिन तुमने मेरी सारी आशंकाओं को ग़लत साबित कर दिया...जो मौत का जबरा हम सब लोगो को निगल जाने के लिए बेताब था तुमने उसे तोड़ कर रख दिया...."

"अजी हम तो सुरू से ही आपको समझा रहे थे की हम है विजय गुरु बेजोर..." विजय अपने पुराने रंग मे आता हुआ बोला- "देवे मौत का जबरा तोड़...दुश्मन भागे जूते छोर...जब हम दे जवाब मूहतोड़....पर मुसीबत तो यह है की आप शुरू से ही हमारी बात नही मान रहे थे."

इस बार प्रताप केलकर ने उसकी बात का बुरा नही माना बल्कि विजय की बात सुनकर मुस्कुरा दिया...वो जनता था की यह आदमी बातें चाहे कितनी भी बेतुकी सी करता हो लेकिन वास्तव मे बहुत ही अद्भुत और चम्मत-कारिक छम ता का स्वामी है.

और तभी वाहा एक अजीब सी एक आवाज़ गूँजी...विजय ने चौक-कर देखा तो अ स्पस्ट सी आवाज़ उसके हेडसेट से आ रही थी जो प्लेन के ज़मीन पर उतरने के बाद बुरी तरह उछलने और झटके आने के कारण नीचे गिर गया था...उसने उसे उठा कर सिर पर चढ़ा लिया.

कॅप्टन त्रिभुवन उसे पुकार रहा था.

"मिस्टर. विजय....मिस्टर. विजय...क्या तुम मेरी आवाज़ सुन रहे हो ?"खुशी से उछलता हुआ त्रिभुवन माइक्रोफॉन से चिल्ला रहा था.

प्लेन के रुकते ही उची आवाज़ मे सायरन बजाती हुई दमकल की गाड़िया और एंबुलेंस उसकी ओर लपकी...एरपोर्ट पर चारो तरफ हड़कंप और अफ़रा-तफ़री सी मच गयी थी.

कंट्रोल टॉवर मे भी एकदम सब लोग ख़ुसी से नाचने लगे थे...जिन लोगो को कुछ देर पहले तक विमान के सुरक्चीत ज़मीन पर उतरने का 1% भी यकीन नही था वे अब ख़ुसी से झूमते हुए एक-दूसरे को बधाई या दे रहे थे

"हेलो कॅप्टन त्रिभुवन, मैं विजय बोल रहा हू." विजय की आवाज़ लाउडस्पिकर पर गूँजी.

"मिस्टर. विजय...सबसे पहले तो आप, हम सब लोगो की बधाई स्वीकार कीजिए." त्रिभुवन माइक्रोफॉन मे बोला- "जिस चमत-कारी ढंग से आपने प्लेन को सुरक्चित उतार कर सब यात्रियो की जान बचाई है..वो काबिले-तारीफ है...."

"अज़ी साहब तारीफ़ तो उस खुदा की है जिसने जहाँ बनाया...ये ज़मीन बनाई और आस्मा बनाया...सबसे बड़ी बात यह है की आप जैसा गुरु बनाया जिसने ज़मीन पर खड़े-खड़े हे मुझे आसमान मे वो सब कुछ सीखा दिया जो मै नही जानता था..आप अगर निर्देश ना देते तो मेरे लिए इस लोहे के परिंदे को संभालना मुश्किल था."

 


"तारीफ़ तो आप ही की है जो आप इतनी जल्दी सब-कुछ समझते चले गये...खैर हम सब लोग आपसे मिलने को बेताब है...बाहर टीवी वालो और पत्र-कारों की भीड़ भी इकट्ठा हो गयी है जो आपके फोटो खिचने और बयान लेने के लिए आतुर है..."

"मैने इतना बड़ा काम किया है...इसका कुछ इनाम भी तो मुझे मिलना चाहिए...." विजय की आवाज़ आई.

"इनाम..." चौका त्रिभुवन- "कैसा इनाम..?"

"मुझे पत्र-कारो की भीड़-भाड़ से बचा कर आराम से बाहर निकाल दिया जाए" विजय बोला- "क्यूकी मै इस वक़्त सारीरिक और मानसिक रूप से बुरी तरह से थका हुआ हू और सीधा घर जाकर आराम करना चाहता हू."

"यह तो मुमकिन नही हो पाएगा." त्रिभुवन बोला- "इतनी बड़ी दुर्घटना टाल दी आपने...इस वक़्त आप हीरो है और सब लोग आपसे मिलना चाहते है."

"अजी जनाब लोगो का क्या है...जिसके गले मे फूलों की माला डालकर हीरो बनाते है उसी को जूते मार-मार कर ज़ीरो भी बना देते है."

"वो तो ठीक है...लेकिन आप हमारी भी स्थिति समझने की कोशिस कीजिए की अगर आपको चुप-चाप यहा से निकाल दिया तो बात का बतनगर बन जाएगा...हम लोगो को जवाब देना भाडी पद जाएगा."

"विजय को पत्र-कारो से मिलना पड़ा...इस बीच प्रताप केलकर उसके साथ रहा...एक घंटे बाद जब वो एरपोर्ट से बाहर निकला उस समय भी केलकर उसके साथ था और उसने विजय को अपनी कार मे उसकी कोठी छोर्ने का प्रस्ताव रखा जिसे विजय ने स्वीकार कर लिया...केलकर का ड्राइवर उसे लेने एरपोर्ट आया था.

"यह मेरा कार्ड है." प्रताप केलकर ने विजय को उसकी कोठी पर उतरने के बाद अपना कार्ड देते हुए कहा- " आपको कभी भी किसी काम के लिए मेरी ज़रूरत महसूस हो तो नी-संकोच हुक्म कीजिएगा...जिंदगी मे कभी भी किसी काम आ सका तो अपने आपको बहुत ही सौभाग्या शालि समझूंगा."

केलकर की कार के जाने के बाद विजय ने उचट ती सी नज़र कार्ड पर डाली- 'केलकर माइनिंग & शिप्पिंग कंपनी' लिखा था

फिर लापरवाही के साथ कार्ड जेब मे डालता हुआ वो अपनी कोठी मे घुस गया.

उस समय ना विजय जनता था ना केलकर की अजीबोगरीब हालत मे हुए यह मुलाकात एक और भी अजीब और ख़तरनाक मिशन की भूमिका मात्रा थी.

"मेरा नाम कृष्णन कुट्टी है मिस्टर मेहता." उस दक्षिण भारतीय व्यक्ति ने अपना परिचय महेश मेहता को देते हुए कहा- "और मै आपको आपके भाई गणेश मेहता की मौत की बुरी खबर देने के लिए आया हू."

"क्या गणेश मर गया ?" महेश मेहता ने एकदम चौंक कर पूछा.

हालाँकि दोनो भाइयो मे बचपन से ही आपस मे कोई खास प्यार नही रहा था क्यूकी दोनो के स्वाभाव एक दूसरे से नही मिलते थे. वैसे दोनो ने एक साथ ही साइंस मे एम.एस.सी की थी. उसके बाद महेश ने तो नॅशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ साइन्स मे नौकरी कर ली थी मगर गणेश प्राइवेट नौकरी के चक्कर मे बाहर निकल गया था जहा उसके ख़याल मे वो बहुत ज़्यादा पैसे कमा कर बहुत जल्दी अमीर बन जाएगा. पिछले कई बरसों से दोनो भाइयों मे किसी किस्म का कोई संपर्क नही रहा था. एक प्रकार से महेश अपनी ज़िंदगी से अपने भाई गणेश मेहता को पूरी तरह से ही निकाल चुका था. उसकी कभी याद भी नही आती थी उसे. उसी गणेश मेहता की मौत की खबर सुनकर वो चौंक सा गया था. यह भी सही बात है की भाई की मौंत की खबर सुनकर जिस तरह का आघात उसे लगना चाहिए था वैसा आघात नही लगा था.

 


"कब..कहा..और कैसे मर गया ?" फिर भी बेतहासा उसके मुँह से निकल गया. आपस के सम्भन्धो मे चाहे कितनी भी दूरियाँ रही हो, लेकिन फिर भी भाई तो था ही गणेश.

"हिन्द महासागर के एक अनाम से टापू मे" कृष्णन कुट्टी ने कहा- "पहले मै आपके घर गया था...मगर वहा ताला लगा था...परोस से आपके ऑफिस का पता लगा कर मालूम करके यहा आ गया."

"मै आपका आभारी हू कृष्णन साहब की आपने यह खबर देने के लिए यहा तक आने की तकलीफ़ की. "महेश बोला- "आप ज़रूर गणेश के घनिस्सठ मित्रो मे से होंगे ?"

"जी नही, मेरी उससे कोई फ्रेंडशिप वग़ैरह नही थी." कुट्टी सर हिला कर अपनी दक्षिण भारतिया शैली वाली हिन्दी मे बोला. सही बात तो यह है की मै उसे जनता भी नही."

"जानते भी नही...फिर आपने यह खबर मुझ तक पहुचाने के लिए दूर दक्षिण से यहा तक आने का कसट् क्यो किया ?"

"अपने काम से मै राजनगर आया था....सोचा इंसानियत के नाते यह खबर भी आप तक पहुचा दू."

"यह खबर तो आप मुझे एक लेटर के ज़रिए भी मुझे दे सकते थे."

"उसमे दिक्कत था जी...मै हिन्दी बोल-पढ़ सकता हू...अँग्रेज़ी भी थोड़ी बहुत बोल सकता...लेकिन लिख कुछ भी नही सकता...अपनी लेंग्वेज मे लिखता तो आप नही पढ़ सकते थे...या आप पढ़ सकते थे ?"

"नही"

"बस इशि वास्ते मै इंसानियत के नाते खुद आ गया...यहा आकर मैने कोई ग़लती की क्या ?"

"नही...आपने तो मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है." महेश ने अपनी रिस्ट वॉच पर नज़र दौराते हुए कहा- "लंच टाइम हो गया है...चलिए किसी रेस्टौरेंट मे चलते है...वाहा कुछ खा भी लेंगे और बाते भी कर लेंगे."

"पास मे कोई ऐसा रेस्तरां है जहा इडली-डोसा और सांभर-बड़ा मिलता हो तो वही चलिए...नॉर्थ इंडियन फुड मेरे को हजम नही होता."

"हमारे नॉर्थ-इंडिया मे आजकल यह सब चीज़े मिलती है."महेश ने मुस्कुरा कर कहा.

महेश कुट्टी के साथ ऑफीस के पास के ही एक रेस्टोरेंट मे जाकर बैठ गया. अपने और कुट्टी के लिए उसने डोसे मंगाए.

"मै और मेरा पार्ट्नर एक बड़ी सी नाव मे समान भड़ कर हाकारों की तरह हिन्द महासागर के बिखरे हुए टापुओ पर अपना सामान बेचते है." खाते हुए कुट्टी ने बताया- "बहुत सारे छोटे-बड़े टापू व्हा फैले हुए है...जिनमे से कुछ के नाम है और कुछ बेनाम से हे है यानी उसे सिर्फ़ लोकल लोग ही जानते है और कोई नही....हम लोग अपना समान बेचते है और लोकल चीज़ो को खरीद कर वापिस मद्रास मे बेचते है..आपको तो मालूम हे होगा की मद्रास को चेन्नई कहते है ?"

"मुझे मालूम है."

"फेरी लगाते हुए जब हम एक टापू पर पहुचे तो मालूम हुआ की वहाँ कोई पंजाबी हिन्दुस्तानी बीमार है ...सो हम उसे यू ही देखने चले गये."

"और वो पंजाबी हिन्दुस्तानी मेरा भाई गणेश मेहता था."

"बिल्कुल सही...और बहुत बीमार था वो." कुट्टी सांभर का घूँट भरता हुआ बोला.

"क्या बीमारी थी उसे ?"

"पहले तो हमे कुछ पता नही चला..मगर डॉक्टर के आने पर पता चला की उसे ख़तरनाक किस्म का डेंगू था.

"यानी वहान पर कोई डॉक्टर भी था ?"

"अगर उसे डॉक्टर माना जाए तो...वरना तो वो एक बूढ़ा शराबी था, जो बरसों से पास के टापू पर रह रहा था....वो दूसरे टापू पर कही रहता था...मेरा पार्ट्नर उसे 30 मील दूर के दूसरे टापू से लेकर आया...तब तक मै तुम्हारे भाई के पास ही रहा."

कुट्टी सांभर का एक और घूँट बढ़ता हुआ बोला- "तुम्हारा भाई उस टापू पर अकेला ही रहता था...बस एक काला सा लड़का उसके साथ था...उसने मुझे बताया की वो कोई साइंटिस्ट है...समुन्द्र मे कुछ खोज करने वाला..."

"ओसिनोग्राफर.... मेरी तरह वो भी एक ओसिनोग्राफर था...समुन्द्रि साइंटिस्ट...और वो समुन्द्र से बहुत सारा पैसा हासिल करना चाहता था.....इतना पैसा जितना की कभी किसी ने नही किया हो." गणेश की पुरानी बातो को याद करता हुआ महेश बोला.

"हा..वो यही बता रहा था की वहाँ उसे समुन्द्र के बारे मे रिसर्च करने के लिए छोरा गया है और लोग आएँगे उसे वहाँ से ले जाने के लिए...."

"लेकिन डॉक्टर को बुला कर लाने के बजाय तुम बीमार गणेश को ही उसके पास क्यू नही ले गये ?" महेश ने पूछा.

"उसकी हालत इतनी खराब थी की हमे उसके रास्ते मे ही दम तोड़ देने का ख़तरा था...आप तो समुन्द्र के साइंटिस्ट है...जानते होंगे की छोटे जहाज़ो मे समुंद्र की उछलती लहरो पर ऐसे झटके लगते है जैसे कच्ची सड़क पर ट्रेक्टर उछलता है."

"यह बात तो सही है."

"मै तुम्हारे भाई के लिए जो कुछ कर सकता था वो मैने किया." कुट्टी बोला- "मैने उसकी टट्टी तक साफ की है...उस बीच उसने मुझे तुम्हारे बारे मे बताया."

"लेकिन उसने यह तो नही कहा होगा की स्पेशली राजनगर पहुच कर मुझे यह सब बताना."

"नही...नही... राजनगर तो मुझे आना ही था...उसने मुझे तुम्हारे घर का पता बताया था." कुट्टी ने कहा- "हम लोगो ने तुम्हारे भाई को बचाने की पूरी कोशिश की थी अपनी तरफ से...मगर उसकी हालत बिगड़ती ही गयी और दो दिन बाद वो मर गया."

"ओह..."

"हम लोगो ने ही उसका अंतिम संस्कार किया..."

"तो क्या तुमने ही वो पॅकिट मेरे पास भेजा है....?"

"कैसा पॅकेट...?"

"एरपोर्ट पर मेरे नाम से एक पॅकेट आया है...वो मुझे लेने जाना है." महेश मेहता ने कहा- "मैने सोचा शायद तुमने ही गणेश का समान पैक्क करके मेरे पास भेजा हो."

"नही...हमने कुछ नही भेजा." कुट्टी ने इनकार मे गर्दन हिलाते हुए कहा- "उसके पास वहाँ उस समय कोई खास समान नही था...ना मरने से पहले इस बारे मे हमसे कुछ कहा...हो सकता है की उसकी रोजाना ज़रूरत का जो थोड़ा-बहुत समान उसके पास था वही पैक्क करके डॉक्टर ने तुम्हारे पास भेज दिया हो."

"उस डॉक्टर का नाम क्या है ?"

"नाम तो मुझे कुछ अच्छी तरह से याद नही." कृष्णन कुट्टी अपना सिर खुजाता हुआ सा बोला-"बड़ा अजीब सा बंगाली नाम था...ना जाने क्या अर्जी-वर्जी....इतना ज़रूर है की वो बंगाली था जो बरसो से कान्दल द्वीप-समूह मे रह रहा है...उस द्वीप-समूह के एक टापू पर ही उसका हॉस्पिटल है."

"डॉक्टर कोई भी हो...मेन बात यह है की वो गणेश को बचा नही सका...पिछली बार जब मुझे खबर मिली थी तो पता चला की वो किसी चंगेजी नाम के आदमी के साथ काम कर रहा था...तुम्हे तो इस नाम का कोई आदमी नही मिला ?"

"वहाँ तुम्हारे भाई और उस छोकरे नौकर के अलावा और कोई नही था...मैने किसी चंगेजी-वन्गेजि का नाम नही सुना."

 
"खैर, फिर भी मै आपका अभारी हू मिस्टर. कुट्टी की आपने मेरे भाई की अंतिम समय मे इतनी मदद की उसकी. " महेश बोला- "इस संभंध मे आपका जो कुछ भी खर्चा हुआ हो, मै देने के लिए तैयार हू."

"कैसे बात करते है मेहता साहब." कृष्णन कुट्टी ने कहा- "जो कुछ किया इंसानियत के वास्ते किया...इंसानियत की कीमत नही ली जाती."

"आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मिस्टर. कुट्टी" महेश ने उसे अपना कार्ड देते हुए कहा- "यह मेरा कार्ड है...इस शहर मे आपको किसी भी किस्म की भी कोई परेशानी महसूस हो तो फॉरन मुझसे संपर्क करे. मै आपकी हर संभव सहयता करूँगा."

"ज़रूर..ज़रूर." कुट्टी ने कार्ड जेब मे रख लिया. कृष्णन कुट्टी को विदा करने के बाद महेश मेहता अपने भाई गणेश के बारे मे सोचने लगा की वो धुर दक्षिण मे कान्दल द्वीप-समूह मे उस निर्जन टापू पर सिर्फ़ एक काले से लड़के नौकर के साथ अकेला क्या कर रहा था.

अगर कोई खोज कर रहा था तो वो कैसी खोज थी जिसमे उसके पास ना कोई साज़ो-समान था, ना कोई सहयोगी या फिर वो चंगेजी से भी अलग हो गया.

तभी उसे एरपोर्ट से पॅकेट लाने की याद आई और उसने गणेश को अपने दिमाग़ से निकल दिया

खत छोटा संक्चिपत था.

प्रिय मिस्टर. मेहता,

मुझे यह सूचित करते हुए बहुत दुख हो रहा है की आपका भाई गणेश मेहता मर चुका है. शायद यह खबर आपको इस पत्र के पहुचने से पहले मिल भी चुकी हो. गणेश मेरा बहुत ही अछा दोस्त था. उसकी कुछ चीज़े मेरे पास रखी हुई थी. भाई होने के नाते उनपर आपका हक़ है. इसलिए यह आपको पहुचना मेरा फ़र्ज़ बनता है.

प्रेषक

प.गुप्ता

महेश एरपोर्ट से बक्सा लेकर सीधा अपने घर पहुचा था. बक्शा खोल कर देखा तो अन्य समान के साथ यह पत्र भी मिला. पत्र पढ़ने के बाद वो सीधा उसे लेकर अपने बॉस सी. के.शर्मा के पास पहुचा जो स्वयं भी एक वैज्ञानिक था.

"तो गणेश मर गया ?" पत्र पढ़ने के बाद सी.के.शर्मा ने गंभीर स्वर मे कहा.

"जी हा." महेश बोला- 'इससे पहले कृष्णन कुट्टी नाम के एक आदमी ने भी मुझे यह खबर दी थी."

"यह कृष्णन कुट्टी कॉन है ?"

"मुझे नही मालूम..आज जिंदगी मे पहली बार मिला वो मुझे." महेश ने कहा और फिर शर्मा को कृष्णन कुट्टी के साथ हुई अपनी मुलाकात के बारे मे बताया.

"और यह प.गुप्ता कॉन है ?" शर्मा ने पूछा.

"यह नाम भी मैने पहले कभी नही सुना....इस पत्र से ही यह पता चलता है की वो गणेश का कोई दोस्त है." उस बक्शे मे से और क्या सामान निकला ?"

"दस-बारह आलू जैसे आकर की पिंडिया सी निकली है." महेश बोला- "मेरे ख़याल से वो मेन्गानीस नॉड्यूल्स है...उसके अलावा उसकी कुछ नोट बुक्स...समुद्रि विज्ञान पर कुछ पुस्तके और गणेश के कुछ कपड़े."

"तुम्हे यकीन है की वे पिंडिया मेन्गानीस नॉड्यूल्स ही है ?"

"मेरे ख़याल से तो वही है...लेकिन आप भी उन्हे एक नज़र देख ले तो बेहतर होगा."

"अपने साथ लाए हो कोई पिंडी ?"

"नही अपने साथ तो नही लाया...आप चाहे तो मेरे साथ चलकर देख ले."

"ज़रूर देखूँगा."शर्मा ने सहमति मे सिर हिलता हुआ बोला- "क्युकि गणेश ने एक बार मुझसे जिक्र किया था की ज़मीन के नीचे के खनिज पदार्थ तो ख़तम होते जा रहे है...लेकिन समुन्द्र के भीतर छुपे खनिजो को अभी किसी ने छुआ भी नही है...अगर समुंद्र से खनिज निकाला जाए तो बेतहासा पैसा कमाने का रास्ता खुल सकता है."

 


"ऐसा नही है सर यह बात सिर्फ़ गणेश ने ही सोची हो...दुनिया के बहुत से मुल्को के वाज्ञानिक ने इस बात पर विचार किया है......लेकिन समुन्द्र से खनिज निकालने का खर्चा इतना जय्दा बैठता है की मुनाफ़े के जगह नुकसान ही होता है.....इसलिए लोगो ने इस दिशा मे काम करना बंद सा कर दिया है."

"लेकिन गणेश का ख़याल था की वो कोई ना कोई रास्ता तो निकल ही लेगा जिससे मुनाफ़ा कमाया जा सके."

"गणेश तो पागल और झक्की था."

"यह ठीक है महेश की मैने गणेश को कभी पसंद नही किया...मगर तुम्हे यह बात नही भूलनी चाहिए की कामयाबी ने हॅमेसा ही पागलो और झक्कियो के चरण चूमे है."

"मगर गणेश को तो कामयाबी की जगह कान्दल द्वीप-समूह के उस वीरान टापू पर मौत नसीब हुई है."

"हो सकता है की उसकी मौत की वज़ह उसकी कामयाबी ही हो."

"मै कुछ समझा नही सिर."

"पिछली बार जब हम लोगो के बीच गणेश की चर्चा हुई थी तो तुमने बताया था की वो चंगेजी जैसे बदमाश और ख़तरनाक आदमी के लिए काम कर रहा है.....हो सकता है की गणेश के कामयाब हो जाने के बाद चंगेजी ने ही उसे खत्म कर दिया हो."

"लेकिन गणेश तो डेंगू बुखार की वजह से मारा."

"हो सकता है की मेरा ख़याल बिल्कुल भी ग़लत हो...लेकिन फिर भी ना जाने क्यू मुझे गणेश की मौत के पीछे कोई जबरदस्त रहश्य नज़र आ रहा है...जब मुझे पता चला था की चंगेजी के साथ गणेश काम कर रहा है तभी मेरा मात तंक था..मगर मै कर तो कुछ नही सकता था."

"लगता है आपको चंगेजी के बारे मे काफ़ी कुछ जानकारी है."

"बहुत जयदा तो नही मगर तुम चाहो तो मै उसके बारे मे जानकारी हासिल कर सकता हू." शर्मा बोला- "खैर, यह बाते तो होती रहेंगी...पहले मै एक नज़र उन पिंडियो को देख लेना चाहता हू."

"चलिए."

वे दोनो बाहर निकल आए.

आसमान से किसी विशाल काले राक्षश जैसा घाना काला अंधेरा ज़मीन पर उतर आया था.

सर पर चोट लगते ही महेश मेहता बुरी तरह लड़खड़ा कर गिरा और साथ ही उसे सी.के शर्मा की चीख सी सुनाई दी जिसे किसी अंजाने हाथ ने गिरेबान से पकड़कर झटके के साथ अंदर खिच लिया था.

जिस इमारत मे महेश मेहता रहता था उसकी लिफ्ट दवारा वो और सी.के.शर्मा उस मंज़िल पर पहुचे जिस पेर मेहता का अपार्टमेंट था. जेब से चाभी निकाल कर महेश ने ताला खोला और उसने अंधेरे कमरे मे घुस कर लाइट ऑन करने के लिए स्विच ऑन करने के लिए हाथ बढ़ाया ही था की तभी उसके सिर पर चोट लगी और शर्मा की चीख सुनाई दी.

एक झटके के साथ लड़खराता सा महेश फर्श पर जा गिरा.

घुपप्प अंधेरा छाने से पहले और महेश को फर्श से उठने की कोशिश करने से भी पहले एक काली सी छाया अपनी ओर झपटती हुई सी महसूस हुई...उससे बचने के लिए महेश एक ओर को करवट बदल गया....और इस चक्कर मे कैसे उस आक्रमण कारी की टाँग उसके हाथ मे आ गयी और इसका पता उस बेचारे को खुद भी ना चल सका...लेकिन टाँग हाथ मे आते ही उसने उसे ज़ोर से खिच लिया.

नतीज़ा यह हुआ की कमरे से बाहर भागने की कोशिश करता हुआ वो अग्यात व्यक्ति गलियारे मे जाकर गिरा...महेश सम्भल कर उस व्यक्ति को दबोचने के लए उठा...मगर आक्रमणकारी उससे जयदा तेज़ और फुर्तीला था...वो बिज़ली की सी तेज़ी के साथ उठा और सीढ़ियो की तरफ भगा.

उस समय महेश ने देखा की उस व्यक्ति के हाथ मे वो सूटकेस था जो प.गुप्ता द्वारा भेजे गये बक्से मे से निकला था. महेश उसके पीछे भागा.

लेकिन वो व्यक्ति नीचे की सीढ़िया उतरने के बजाय उपर की मंज़िल की ओर जाने वाली सीढ़ियो की ओर मूड़ कर नज़रो से लोप हो गया...नीचे की सीढ़ियो की ओर से आती कदमो की आवाज़ से महेश उस आदमी के रुख़ बदलने का कारण भी समझ गया था.

वो भी उस व्यक्ति का पीछा करता हुआ उपर की सीढ़िया चढ़ने लगा.

महेश वैसे चाहे वैज्ञानिक था लेकिन कॉलेज के जमाने मे बहुत अच्छा खिलाड़ी और एथलीट भी था...इसलिए उस आक्रमणकारी चोर के आँखो से लोप हो जाने के बाबजूद भी उसने उसका पीछा नही छोड़ा और उपर की मंज़िल पर पहुचते ही वो उसे लिफ्ट का बटन दबाता हुआ दिखाई दे दिया.

 


संयोग से लिफ्ट उस समय किसी और मंज़िल पर थी.

महेश को अपनी ओर लपकता देख कर वो आक्रमणकारी फायर-एस्केप की सीढ़ियो की ओर भगा...भागते-भागते ही उसने अपनी जेब से पिस्टल निकाली और लोहे की सीढ़ियो के किनारे पर पहुचते ही उसने एकदम घूमते हुए फायर किया...गोली महेश की बाह से रगड़ खाती हुई गुजर गयी...मगर एक्शन की उत्तेजना और गर्मी मे उसे कुछ महसूस नही हुआ.

वैसे भी बीच का फासला कम हो चुका था. एक ही छलाँग मे महेश ने उसे दबोच लिया था और अब उसके पिस्टल वाले हाथ को दोनो हाथो से पकड़कर वो उसे फायर-एस्केप की फौलादी रेल्लिंग से टकरा रहा था.

आक्रमणकारी चोर ने अपने दूसरे हाथ मे पकड़ा सूटकेस रेलिंग से पार नीचे फेक दिया और खाली हाथ से महेश का गला दबोच लिया...तभी महेश ने अपनी पूरी शक्ति के साथ उसका पिस्टल वाला हाथ एक बार फिर फौलादी रेलिंग से टकराया...इस बार उसकी उंगलिया पिस्टल पर जमी ना रह सकी और पिस्टल भी उसके हाथ से निकल कर नीचे के अंधेरे मे गुम हो गयी.

अब दोनो खाली हाथ एक-दूसरे से झुझ रहे थे.

आक्रमणकारी महेश का गला पकड़ते हुए उसे नीचे को दबाया जा रहा था...तभी महेश ने अपने घुटने की चोट उसके झंघो के ज़ोर पर की...नाज़ुक जगह पर जोरदार चोट पड़ते ही आक्रमणकारी ने एक भयानक चीत्कार के साथ महेश को छोड़ते हुए दोनो हाथो से अपने पेडू के नीचे के हिस्से को पकड़ लिया.

जोश मे आए हुए महेश ने तानकर एक घुसा उसकी कनपटी पर मारा और वो व्यक्ति झटके के साथ लोहे के रेलिंग पर आकर गिरा...भय से आतंकित और विसफरीत नेत्रो के साथ महेश ने देखा की वो व्यक्ति रेलिंग के उपेर से कलाबाजी सा खा गया...उसका सिर नीचे और पैर उपर हो गया.

दहशत से जड़े महेश ने उसे नीचे की ओर गिरते देखा. नीचे गिरते उस व्यक्ति के हलक से निकला भयानक आरतनाद गूँजता चला गया.

वो भयानक चीख तभी रुकी जब कई मंज़िल नीचे जाकर उसका शरीर पक्की ज़मीन के साथ धराम से जाकर टकराया.

महेश उस समय हथ्प्रव सा खड़ा हुआ जब पास के फ्लेट का दरवाज़ा खोल कर एक लंबा सा आदमी बाहर निकला.

"आख़िर यह सब क्या हंगामा हो रहा है ?" लंबे से आदमी ने जोरदार आवाज़ मे कहा- " तुम्हारे इस बेहूदा शोर-शराबे से कोई सरीफ़ आदमी अपने घर मे चैन से नही बैठ सकता."

"पुलिस...फ़ौरन पुलिस को फोन करो". महेश बोला- "इस बिल्डिंग मे चोर और कातिल घुस आए है."

सुनते ही उस आदमी का चेहरा सफेद सा पॅड गया और वो उसकी बाह से बहता हुआ खून को देखने लगा.

"जल्दी करो." महेश ने कहा और फिर वो तेज़ी के साथ लिफ्ट की ओर दौर पड़ा.

मगर तभी उसे अपने बॉस सी.के.शर्मा की याद आई जिसकी चीख उसने सुनी थी और वो लिफ्ट के आने का इंतज़ार किए बिना सीढ़ियो के द्वारा नीचे पहुचा.

शर्मा उसे गलियारे मे ही मिल गया. उसके एक हाथ से खून बह रहा था.

"हराम जादे मेरे हाथ मे चाकू मार कर भाग गया." शर्मा अपना हाथ दिखता हुआ बोला. गनीमत यह थी की हाथ की सारी उंगलिया सलामत थी.

"तुम भी झखमी हो गये हो ?" शर्मा ने उसकी बाह से बहते हुए खून को देखते हुए कहा.

"वो चोर जो गणेश का सूटकसे लेकर भाग रहा था फायर-एस्केप की सीढ़ियो से गिरकर मारा गया है शायद. महेश बोला.

"गणेश का सूटकसे कहा है ?"

"वो उसने नीचे फेक दिया था पहले ही."

"और जिन पिंडियो का ज़िक्र तुम कर रह थे वो कहा है ?"

"वो उसी सूटकसे मे थी."

ये चोर ज़रूर उन्ही पिंडियो के पीछे होंगे." शर्मा के भीतर का वैज्ञानिक हाथ के जख्म की परवाह किए बिना बोला- "आओ पहले उसी सूटकेस को देखते है."

वे दोनो दौड़ते हुए से नीचे पहुचे.

बिल्डिंग से बाहर निकालकर जैसे ही वो दोनो उसके पिछवारे की ओर बढ़े जहा की फायर-एस्केप की सीढ़िया थी की तभी एक कार तेज़ी के साथ बाहर निकली और मुख्य सड़क पर दौड़ती चली गयी.

वे दोनो ठगे से मुख्य सड़क पर दौड़ती हुई उस कार को देखत रहे जिसकी रंगीन तेज़ लाइट तेज़ी से दूर होती चली जा रही थी.

"भगवान जाने यह सब क्या हंगामा हो रहा है." महेश मेहता ने अजीब ढंग से बड़बड़ाते हुए कहा.

उसके बाद वो शर्मा के साथ फायर-एस्केप के पास पहुचा. पीछे की सड़क पर जो भी मधिम रोशनी थी उसमे उसे एक आदमी पड़ा हुआ दिखाई दिया...उसका सिर तरबूज़ की तरह फटा पड़ा हुआ था..यह जान ने के लिए दिमाग़ पेर ज्यदा ज़ोर देने की ज़रूरत नही थी की वो मर चुका है.

आस-पास काफ़ी खोजने के बाबजूद भी गणेश के सुटकेस का कही कोई पता ना चला.

 


"यानी चोरो ने तुम्हारे घर से उस सूटकेस के सिवाय और कुछ भी नही चुराया जो तुम आज ही एरपोर्ट से लेकर आए थे ?" सारी कहानी सुनने के बाद विजय ने महेश मेहता से पूछा.

जिस समय इस घटना की सूचना कोतवाली पहुची उस समय विजय वहाँ रघुनाथ के साथ ही मौजूद था. फिलहाल कोई खास काम हाथ मे ना होने की वजह से वो रघुनाथ के साथ ही घटना स्थल पर पहुच गया.

सबसे पहले उन लोगो ने फायर-एस्केप के पास पड़ी लाश का निरीक्षण किया और प्रारम्भिक पुलिस कार्यवाही करने के बाद लाश को पोस्ट-मार्टम के लिए रवाना कर दिया.

उसके बाद उन लोगो के बयान लिए. इस समय वे लोग महेश के ही फ्लेट मे मौजूद थे. इस बीच एक डॉक्टर को बुलाकर उसके और क के.शर्मा के झख्म की मरहम-पट्टी भी करा दी थी.

"जी नही..." महेश ने जवाब दिया- "उस सूटकेस के अलावा वे और कुछ नही ले गये." "उस सूट-केस मे कोई कीमती चीज़ थी ?"

"नही ऐसी तो कोई ख़ास चीज़ नही थी की जिसे कीमती कहा जा सके." महेश बोला.

इसका मतलब है की चोर साले बेमतलब ही जीगर वाले बनकर चोरी के लिए तुम्हारे फ्लैट मे घुस पड़े " विजय बोला.

"मेरा ख़याल है की चोर चोरी के उद्देश्या से फ्लैट मे घुसे होंगे की उपर से मिसटर मेहता और मिस्टर. शर्मा पहुच गये." रघुनाथ बोला- "लिहाजा जल्दिबाजी मे उन्होने सूट-केस उठाया और भाग लिए."

"मिया सूपर साहब बड़ी ही मायूसी के साथ मुझे आपको जासूसी का यह पॉइंट समझाना पड़ रहा है की अपना कोई भी ख़याल बनाने से पहले दूसरो के बयानो को लेकर तबादलाए-ख्याल करना चाहिए." विजय बोला- "उसके बाद अपने दिमाग़ को फैक्ट्स एंड फिगर के सामान से भरना चाहिए.....यह सब मसाला जब तैयार हो जाए तब अपनी सोच की कराही मे ख़यालो की जलेबियो को तलना चाहिए...आया कुछ मिज़ाज़ेसरीफ़ मे ?"

"इन लोगो की सारी बाते सुनने के बाद ही मैने अपने ख़याल का इज़हार किया था." रघुनाथ बुरा सा मूह बनाकर बोला.

हालाँकि रघुनाथ सवय्म पुलिस सुपरिटेंडेंट था.....लेकिन वो विजय की अकल का भी कायल था जिसने कई बहुत उलझे हुए केसेस को सुलझाने मे उसकी सहयता भी की थी...इसलिए वो विजय से कुछ दब्ता भी था...मगर कभी-कभी विजय की बेतुकी बातो से भड़क भी उठता था...किंतु इस समय ना जाने क्यू अपने आपको संयम रखते हुए शांत ही रहा.

"हा तो मिस्टर. मेहता." विजय महेश की ओर मुखातिब होते हुए बोला- "तुम्हारे ख़याल से उस सूट-केस मे कोई ख़ास कीमती चीज़ नही थी...क्या तुम यह बताने की तकलीफ़ गवारा करोगे की उस सूट-केस मे क्या समान था ?"

"कुछ पुराने कपड़े और 10-12 पिंडिया."

"कैसी पिंडिया ?"

"हम उन्हे अपनी वैज्ञानिक भाषा मे मेन्गानीस-नॉड्यूल्स कहते है." महेश ने बताया- "वे पिंडिया काफ़ी गहरे समुन्द्र मे मिलती है."

"किसी आम आदमी के लिए तो वे पिंडिया मामूली पत्थरो से ज़्यादा कोई महत्व नही रखती है." सी.के शर्मा ने कहा- "लेकिन हमारे वैज्ञानिक परिक्च्छन के लिए वे काफ़ी बहुमूल्य समझी जाती है....उन्हे देखने के लिए ही मै मेहता के साथ यहा आया था."

"आपकी बातो से यह अनुमान लगाने मे तो कोई बुराई नही की उन पिंडियो को किसी दूसरे वैज्ञानिक ने अपने परिक्च्छन के लिए उड़वा लिया हो ?" विजय बोला.

"अनुमान तो कुछ भी लगाया जा सकता है." सी के.शर्मा बोला- "लेकिन मै नही समझता की कोई भी वैज्ञानिक उन पिंडियो को हासिल करने के लिए ऐसे ख़तरनाक चोरो और हत्यारों का सहारा लेगा जो पिस्टल और चाकू का ईस्तमाल करने से भी नही डरते हो."

"बात तो आपकी भी ठीक है."विजय उन दोनो के झख्मो पर बँधी पट्टी को देखते हुए बोला- "लेकिन हालात बता रहे है की मामला ज़रूरत से ज़्यादा ही ख़तरनाक है....पहले कोई कृष्णन कुट्टी नाम का आदमी धुर दक्षिण से मिस्टर. मेहता के भाई की मौत की खबर देने के लिए इनके पास आया...कुछ मालूम है की यह करामाती कुट्टी राजनगर मे कहा ठहरा है ?"

"जी नही...यह तो मुझे नही मालूम." महेश मेहता ने जवाब दिया- "ना मैने उससे पूछा की वो कहा ठहरा हुआ है ?"

"उसने खुद भी नही बताया की वो कहा ठहरा हुआ है ?"

"जी नही...लेकिन मैने उसे अपना कार्ड दे दिया था की अगर इस शहर मे उसे कोई भी दिक्कत मह्सुश हो तो वो मुझे फोन करे...मै हर संभव उसकी सहयता करूँगा."

"तो फिर तुम मेरा भी एक कार्ड रख लो." विजय महेश को अपना कार्ड देता हुआ बोला- "अगर वो करामाती कुट्टी तुम्हे फिर फोन करे तो उसके ठहरने का पता मालूम करके फ़ौरन ही मुझे फोन करना."

"मेरे ख़याल से तो आप मिस्टर. विजय इस मामले को बेकार ही रहस्यमयी रंग देने की कोशिश कर रहे है." महेश मेहता बोला-"मै सूपर. रघुनाथ की बात से सहमत हू की चोर मेरे घर मे चोरी के उद्देश्य से घुसे...उपर से मै और शर्मा जी अचानक पहुच गये तो उन्होने घबरा कर हम दोनो पर हमला कर दिया और जल्दी मे सूट-केस हाथ लगा तो उसे ही लेकर भाग गये."

 


"आप लोगो ने जो अपने ख़यालो के पुलाव पकाए है...हो सकता है की वे बहुत ही स्*वादिष्ट और जायकेदार हो." विजय बोला- "लेकिन मेरे सामने जो तुम लोगो के बयानो के दाल-चावल पेश हुए है उनसे मुझे कुछ अलग किस्म की खिचड़ी पकने के लिए मज़बूर होना पर रहा है."

"कैसी खिचड़ी ?"

"आपका भाई धुर-दक्षिण मे हिंद महासागर के किसी सुन्शान और निर्जन द्वीप समूह पर डेंगू बुखार से मर गया और यह खबर देने के लिए कोई करामाती कुट्टी इतनी लंबी दूरी तय करके यहा तक आया."

"सिर्फ़ इंसानियत के नाते." महेश मेहता बोला.

"मै मानता हू की अभी इस दुनिया मे इंसानियत पूरी तरह से ख़तम नही हुई है." विजय सहमति मे सिर हिलता हुआ बोला- "लेकिन आजकल जमाना ऐसा हो गया है की लोग घर पर पानी पीने के बहाने से आते है और घर-वालो को मार कर सारा घर लूट कर ले जाते है..मेरे ख़याल के पुलाव से अख़बार मे इस तरह की खबरें आप लोग आए-रोज ही पढ़ते होंगे."

"मै आपकी बात नही समझ पा रहा."

"मेरा ख़याल है की इन्ही हालात से घबरा कर गदर के जमाने मे चाचा ग़ालिब ने कहा था और क्या खूब कहा की यारब वो ना समझे है ना समझेंगे मेरी बात....दे और दिल उनको जो ना दे मुझको ज़ुबाँ और."

"आप तो मेन मुद्दे से भटक रहे है."

"कैसे ना भटक जाए भला काफिले वाले...भटके हुए रहबर के कदम देख रहा हू." विजय ने तरन्त्रुस मे गाया.

"आप इस शेरो-शायरी को छोर कर सीधी-साधी भाषा मे बात क्यू नही करते ?" महेश मेहता तनिक झुंझलाए हुए स्वर मे बोला.

"मै तो सीधी-साधी भाषा मे ही बात कर रहा हू जनाब साइन्स्दान साहब." विजय बोला- "सीधी-साधी भाषा मे बात यह है की आप रह्बर यानी मार्गदर्शक है और हम काफिले वाले यानी आपके पीछे चलने वाले....आप जो कुछ बता रहे है, हमारी सोच की गारी उसी रास्ते पर दौड़ी जा रही है...अब चूँकि अपनी सोच की गारी के ड्राइवर हम खुद है तो हमे तो आगे डेंजर ज़ोन दिखाई दे रहा है."

"कैसा डेंजेर ज़ोन ?"

"पहले कोई करामाती कुट्टी आया.... फिर तुम्हारे पास किसी पी. गुप्ता नाम के अंजान आदमी का भेजा हुआ पॅकेट आया. बाइ दी वे तुमने उस कुट्टी को उस पॅकेट के बारे मे नही बताया था."

"नही......" महेश मेहता ने कहा और फिर आगे कुछ और कहता हुआ अचानक रुक गया.

"नही के बाद भी और कुछ कहना चाहते थे तुम." विजय महेश को घूरता हुआ बोला- "अचानक एकदम रुक कैसे गये तुम ?"

मुझे याद आया की शायद मैने उससे एरपोर्ट पर आने वेल पॅकेट का ज़िक्र करते हुए पूछा था की वो पॅकेट कही उसी ने तो नही भेजा."

"और उसने कहा की नही वो पॅकेट उसने नही भेजा."

"हा... वो बोला की शायद डॉक्टर ने भेजा हो" महेश बोला. फिर विजय को आश्चर्या से देखते हुए बोला "लेकिन आपको कैसे मालूम की कुट्टी ने यही कहा था की वो पॅकेट उसने नही भेजा?"

"मिस्टर. मेहता हर आदमी अपनी-अपनी लाइन का वैज्ञानिक होता है." विजय धीरे से मुस्कुराता हुआ बोला- "बाल की खाल निकालना हमारा पेशा है...इसलिए हम भी अपने लाइन के वैज्ञानिक है.....कोई और माने या ना माने साहब हम तो मानते है."

"हो सकता है की आप बाल की खाल निकालने मे माहिर हो..."शर्मा बोला.

"हो नही सकता साहब....है." विजय उसे आगे बोलने का मौका दिए बगैर बोला-"डंके की चोट पर."

"चलिए मान लिया...है."सी के.शर्मा ने बिना कोई बहश किए कहा-"वो भी मान लिया की जो तस्वीर आपके सामने साफ है उसे हम साफ नही देख पा रहे..."

"अभी दिखा देते है." विजय ने कहा- "बाल की खाल निकलना और सफाई के साथ निकालना यही तो हमारा पेशा है...क्यूंकी हम इस बात को मानते है की जो आदमी अपना काम सफाई से ना कर सके वो तो सिर्फ़ बेबकुफी का भाई हो सकता है....अब हम तस्वीर साफ करते है...आप ज़रा गौर से देखिए...मेहता साहब आप ख़ास तौर से देखिए...करामाती कुट्टी आया और आपके भाई की मौत की खबर लाया...ठीक है ?"

कोई कुछ नही बोला.

बोलिए....ठीक है या नही ?"

"ठीक है" महेश मेहता बोला.

"तुम्हारे भाई गणेश के किसी प्यारे दोस्त पी.गुप्ता ने आपको उसका समान पॅकेट बना के भेजा....यह बात आपने जाने या अंजाने मे उस करामाती कुट्टी को भी बता दी....ठीक है ना ?"

"ठीक है."

"उसके बाद तुम्हारी गैर-हाज़िरी मे चोर तुम्हारे घर मे घुसे और गणेश का सूट-केस लेकर भागे....यह अपनी आँखो से तुमने देखा....देखा या नही ?"

"बिल्कुल देखा."

"तो प्यारे इतने सॉफ तस्वीर देखने के बाबजूद भी तुम्हारे समझ मे नही आ रहा की चोर उस सूट-केस के चक्कर मे ही चोरी करने आए थे...और इस चक्कर मे एक ने तो फायर-एस्केप वाली सीढ़ियो से गिरकर अपनी जान भी दे दी."

"लगता है आप ठीक कह रहे है." महेश ने विचार-पूर्ण स्वर मे कहा.

"मिस्टर. विजय की बात अब मेरी समझ मे आ रही है." सी. के.शर्मा ने समर्थन सा करते हुए कहा.

"अगर समझ मे आ रही है तो बताए की नौ तेरह बाईस डाले पाँच निकाले सत्ताईस तो बाकी क्या बचा ?"

"मतलब?"

"मतलब यह की बाकी बचा झुँ-झुनना, जिसे झुँ-झुनाते हुए हम यहा से जा रहे है....कार्ड तुम्हारे पास है...ज़रूरत पड़े तो मिल लेना...अछा रघु डार्लिंग...तुम अपना पुलिसिया कार्यवाही करते रहना....यार तो चले "

और विजय रघुनाथ को वही छोर कर सिटी बजाता हुआ वहाँ से बाहर निकल गया.

 
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