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Guest
मैने उसकी बात मानी और फिर सीधा धोसी जाके ही दम लिया. बाइक पार्क की और बॅग को कंधे पर लाद के हम उपर जाने को सीढ़िया चढ़ने लगे.
निशा- सूट-सलवार पहन आती तो सही रहता.
मैं- अभी भी क्या परेशानी है .
निःसा- नही परेशानी तो कुछ नही. पर फिर भी.
करीब आधे घंटे की चढ़ाई को हम ने रुकते रुकते पूरा किया पुरानी जगह की कुछ नयी तस्वीरे ली. अतीत के कुछ पन्ने फिर से खुल गये थे जैसे.
निशा- यहाँ अभी भी सब पहले जैसा ही हैं ना.
मैं- पत्थरो और पहाड़ का क्या बिगाड़ना वैसे तुम्हे याद है एक जमाने मे हम ने भी एक पत्थर पर अपना नाम लिखा था .
निशा- तुम्हे क्या लगता है मुझे भूलने की कोई बीमारी है जब देखो कहते रहते हो तुम्हे याद है तुम्हे याद है.
मैं- बस ऐसे ही बोल रहा था.
निशा- याद है बाबा पर वो पत्थर शायद उपर वाले मंदिर के पास था .
मैं- तो चल फिर देखते है वक़्त ने हमारे नाम के साथ कितना सितम किया है.
निशा- चल तो रही हूँ.
उपर जाके हम ने मंदिर मे दर्शन किए और फिर उसी पत्थर की तलाश करने लगे और किस्मत से मिल भी गया.
मैं- नाम कुछ हल्के से पड़ गये है , हैं ना.
निशा- शूकर है मिटे नही.
मैं- कैसे मिट सकते है.
निशा बस मुस्कुरा दी और हम एक नीम के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गये.
निशा- तुम ना होते तो मेरा क्या होता.
मैं- यही बात मैं भी बोलता हूँ.
निशा- मनीष……………..
मैं- क्या हुआ.
निशा- हम क्या से क्या हो गये ना, कभी सोचा नही था ज़िंदगी इस मुकाम पे ले आएगी , आज देखो सब कुछ है हमारे पास जो जीने के लिए ज़रूरी है पर फिर भी हमारे दिल , इन्हे किस चीज़ की कमी है.
मैं- सुकून चाहते है, दो घड़ी अपने उन दिनो को जीना चाहते है जब हम जवान हो रहे थे, वो बेफिक्री वो अल्हाड़पन , वो गुस्ताखियाँ जो बस हम ही कर सकते है.
निशा- पर वो अब कहाँ लाउ मैं.
मैं- वो दौर बीत गया है निशा, अब ये यादे है जो दिल को चीरती है हर पल , पर दोष इन यादो का भी तो नही दोष तो हमारा है जो इस जमाने की रफ़्तार के साथ खुद को बदल नही पाए. आज के आशिक़ बेधड़क माशुका के घर तक पहुच जाते है , मेरे तो पैर काँप जाया करते थे मिथ्लेश की गली मे भी कदम रखते हुए. और तुम , तुम भी तो कितना नखरा करती थी , कितनी देर मैं इंतज़ार करता था जब जाके तुम्हारी खिड़की का दरवाजा खुला करता था.
निशा- मैं कभी जमाने से नही डरी , मैने हमेशा अपने दिल की की है, वो मैं ही तो थी जो घंटो तालाब के किनारे तुम्हारे साथ बैठ कर डूबते सूरज को देखा करती थी. वो मैं थी तो थी जो बारीशो मे भीगते हुए किसी तपते अलाव की लौ जैसी थी.
मैं- सही कहा, याद है एक बार बाज़ार मे बारिश आ गयी थी और दुकान की सीडीयो पर खड़े होकर एक हाथ मे समोसा और दूसरे मे चाय पी थी.
निशा- पर आजकल तुम समोसे खाते कहाँ हो.
मैं- वापसी मे चले आज भी उस दुकान के समोसे से वो ही जानी पहचानी महक आती है.
निशा- तुम कभी कहते नही कि निशा तुम्हारे हाथो का बना ये खाना है वो खाना है.
मैं- मम्मी के आलू परान्ठो के बाद मुझे तुम्हारी बनाई गयी कैरी की चटनी बेहद पसंद है पर तुम अब बनाती ही नही .
निशा- याद है तुम्हे. जानते हो जबसे तुम मुझसे दूर हुए हो मैने कैरी की चटनी नही बनाई क्योकि फिर तुम्हारा ख्याल आ जाता और फिर मुश्किल हो जाती .
मैं- मैने भी आख़िरी बार वो चटनी 2006 मे ही खाई थी जब मेरे फ़ौज़ मे जाने मे कुछ दिन थे वो कॉलेज मे लाई थी उस दिन तुम टिफिन तभी .
निशा- एक बार मुझे गले से लगा लो मनीष, मैं बस रो पड़ूँगी. इस से पहले कि मैं बिखरने लागू थाम लो मुझे अपनी बाहों मे. थाम लो.
मैं- नही यारा, नही लगा सकता तुझे अपने सीने से , डर है कही मेरी चोर धड़कनो को पढ़ ना लो तुम. डर है मुझे मेरे होंठो तक आकर रुक सी गयी हर बात को सुन ना लो तुम.
निशा- तुम्हे कुछ भी कहने की ज़रूरत न्ही और ना ही डरने की मैं जानती हूँ तुम्हारा दिल हमेशा सिर्फ़ मिथ्लेश के लिए ही धड़कता है और यकीन करो तुम्हारी हर धड़कन पर अगर किसी का हक है तो सिर्फ़ उसका.
निशा- सूट-सलवार पहन आती तो सही रहता.
मैं- अभी भी क्या परेशानी है .
निःसा- नही परेशानी तो कुछ नही. पर फिर भी.
करीब आधे घंटे की चढ़ाई को हम ने रुकते रुकते पूरा किया पुरानी जगह की कुछ नयी तस्वीरे ली. अतीत के कुछ पन्ने फिर से खुल गये थे जैसे.
निशा- यहाँ अभी भी सब पहले जैसा ही हैं ना.
मैं- पत्थरो और पहाड़ का क्या बिगाड़ना वैसे तुम्हे याद है एक जमाने मे हम ने भी एक पत्थर पर अपना नाम लिखा था .
निशा- तुम्हे क्या लगता है मुझे भूलने की कोई बीमारी है जब देखो कहते रहते हो तुम्हे याद है तुम्हे याद है.
मैं- बस ऐसे ही बोल रहा था.
निशा- याद है बाबा पर वो पत्थर शायद उपर वाले मंदिर के पास था .
मैं- तो चल फिर देखते है वक़्त ने हमारे नाम के साथ कितना सितम किया है.
निशा- चल तो रही हूँ.
उपर जाके हम ने मंदिर मे दर्शन किए और फिर उसी पत्थर की तलाश करने लगे और किस्मत से मिल भी गया.
मैं- नाम कुछ हल्के से पड़ गये है , हैं ना.
निशा- शूकर है मिटे नही.
मैं- कैसे मिट सकते है.
निशा बस मुस्कुरा दी और हम एक नीम के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गये.
निशा- तुम ना होते तो मेरा क्या होता.
मैं- यही बात मैं भी बोलता हूँ.
निशा- मनीष……………..
मैं- क्या हुआ.
निशा- हम क्या से क्या हो गये ना, कभी सोचा नही था ज़िंदगी इस मुकाम पे ले आएगी , आज देखो सब कुछ है हमारे पास जो जीने के लिए ज़रूरी है पर फिर भी हमारे दिल , इन्हे किस चीज़ की कमी है.
मैं- सुकून चाहते है, दो घड़ी अपने उन दिनो को जीना चाहते है जब हम जवान हो रहे थे, वो बेफिक्री वो अल्हाड़पन , वो गुस्ताखियाँ जो बस हम ही कर सकते है.
निशा- पर वो अब कहाँ लाउ मैं.
मैं- वो दौर बीत गया है निशा, अब ये यादे है जो दिल को चीरती है हर पल , पर दोष इन यादो का भी तो नही दोष तो हमारा है जो इस जमाने की रफ़्तार के साथ खुद को बदल नही पाए. आज के आशिक़ बेधड़क माशुका के घर तक पहुच जाते है , मेरे तो पैर काँप जाया करते थे मिथ्लेश की गली मे भी कदम रखते हुए. और तुम , तुम भी तो कितना नखरा करती थी , कितनी देर मैं इंतज़ार करता था जब जाके तुम्हारी खिड़की का दरवाजा खुला करता था.
निशा- मैं कभी जमाने से नही डरी , मैने हमेशा अपने दिल की की है, वो मैं ही तो थी जो घंटो तालाब के किनारे तुम्हारे साथ बैठ कर डूबते सूरज को देखा करती थी. वो मैं थी तो थी जो बारीशो मे भीगते हुए किसी तपते अलाव की लौ जैसी थी.
मैं- सही कहा, याद है एक बार बाज़ार मे बारिश आ गयी थी और दुकान की सीडीयो पर खड़े होकर एक हाथ मे समोसा और दूसरे मे चाय पी थी.
निशा- पर आजकल तुम समोसे खाते कहाँ हो.
मैं- वापसी मे चले आज भी उस दुकान के समोसे से वो ही जानी पहचानी महक आती है.
निशा- तुम कभी कहते नही कि निशा तुम्हारे हाथो का बना ये खाना है वो खाना है.
मैं- मम्मी के आलू परान्ठो के बाद मुझे तुम्हारी बनाई गयी कैरी की चटनी बेहद पसंद है पर तुम अब बनाती ही नही .
निशा- याद है तुम्हे. जानते हो जबसे तुम मुझसे दूर हुए हो मैने कैरी की चटनी नही बनाई क्योकि फिर तुम्हारा ख्याल आ जाता और फिर मुश्किल हो जाती .
मैं- मैने भी आख़िरी बार वो चटनी 2006 मे ही खाई थी जब मेरे फ़ौज़ मे जाने मे कुछ दिन थे वो कॉलेज मे लाई थी उस दिन तुम टिफिन तभी .
निशा- एक बार मुझे गले से लगा लो मनीष, मैं बस रो पड़ूँगी. इस से पहले कि मैं बिखरने लागू थाम लो मुझे अपनी बाहों मे. थाम लो.
मैं- नही यारा, नही लगा सकता तुझे अपने सीने से , डर है कही मेरी चोर धड़कनो को पढ़ ना लो तुम. डर है मुझे मेरे होंठो तक आकर रुक सी गयी हर बात को सुन ना लो तुम.
निशा- तुम्हे कुछ भी कहने की ज़रूरत न्ही और ना ही डरने की मैं जानती हूँ तुम्हारा दिल हमेशा सिर्फ़ मिथ्लेश के लिए ही धड़कता है और यकीन करो तुम्हारी हर धड़कन पर अगर किसी का हक है तो सिर्फ़ उसका.