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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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सारी रात के जगने के कारण उनमें से एक -दो को झपकी सी आने लगी ! ये मौका सही था हमारी तरफ से उन्हें दबोचने के लिए !

हम बड़े इत्मिनान से एक दम जिन्न की तरह उनके सामने प्रकट हो गए , हमें अपने एकदम सामने देख कर वो लोग हड़बड़ा गए और एकदम खड़े हो गए ..!

में - कौन हो तुम लोग ..?

एक - तुमसे मतलव ..?

में - मतलव है तभी तो पूछा है , यहां छिप कर क्यों बैठे हो ..?

वो लोग खतरे को भांप गए और अपने -2 हथियार इधर -उधर ढूंढने लगे !

में - क्या ढूंढ रहे ..? ये इधर हैं .. और हम चरों की गन उनकी कनपटी पर चिपक गयी !

अब वो हिल भी नहीं सकते थे , लेकिन उनमें से एक फ्री था सो वो होश्यारी दिखने की कोशिश करने ही वाला था की मेरा खंजर उसके पेट में घुस गया !

वो डकारता हुआ धड़ाम से वहीँ ढेर हो गया ! उसका ये हश्र देख कर वाकी चारों की घिग्गी बंध गयी ! और आँखें फाड़ -फाड़ के हमें देखने लगे !

हमने पहले ही ये तै किया हुआ था की जरूरत न हो तब तक फायर नहीं करना है !

में अपने शिकार से बोला - आँखें फाड् -2 के क्या देख रहा है हरामी .. तुम लोग ही जान लेना जानते हो हम नहीं , और उसके साथी के खून से सना खंजर मेने उसके गले में घुसेड़ दिया , थोड़ी देर तक उसके गले से घर्रर —2 की सी आवाज आयी और फिर वो भी शांत हो गया !

इसी तरह हमने बड़ी शांति से उन पांचों का काम तमाम कर दिया और किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई !

उन पांचों को खिंच कर झाड़ियों में पटका , और तेजी से अपने काम में लग गए !

फटाफट सभी बारूद को उखाड़ा , समेटा और वहीँ उनकी लाशों के पास छिपा दिया ! एक बहुत बड़ा संकट टल गया था !

अब हमारे पास सिर्फ 15-20 मिनट ही थे , स्नान शुरू होने वाला था , हम फ़ौरन वहाँ से गोंदिया के अड्डे की तरफ भागे , झाड़ियों ने हमारा रास्ता मुश्किल कर दिया था , ऊपर से अँधेरा , लेकिन कुछ कर गुजरने का जूनून , किसे परवाह थी इन मुश्किलों की , बढ़ते रहे !

अड्डे से बहार पहुँच कर ऋषभ को इशारा किया की वो इंस्पेक्टर का पता करके उसके पास पहुंचे , और जैसे ही फायर की आवाज हो पुलिस एक्शन में आ जानी चाहिए !

फिर में धनञ्जय और जागेश को बोला , तुम दोनों मुझसे 50 कदम दूर रह कर मुझे कवर दो , चारो ओर से सतर्क रहना !

में आगे बढ़ा , मेने अपने मुह पर कपडा लपेट लिया ! थोड़ा आगे बढते ही एक डाकू ऊँघ रहा था , उसे जगाया और उससे बोला - सरदार कहाँ है ? वो बोला क्यों ? सरदार से क्या काम है ? तो मेने कहा - अरे भाई कुछ मत पूछो गजब हो गया , हमारा सारा प्लान चौपट हो गया है और ये बात सरदार को बताना जरुरी है , अभी !

उसने उंगली से इशारा करके जगह बताई , में उस तरफ को बढ़ गया, पीछे से आरहे धनञ्जय और जागेश ने उसको अंतिम यात्रा पर रवाना कर दिया !

में उस डाकू की बताई जगह पर पंहुचा , तो गोंदिया निरदुन्द पड़ा ऊँघ रहा था ! जैसे मेने कद कंठी के हिसाब से उसको पहचान , तुरत रिवाल्वर से फायर कर दिया !

रिवाल्वर के फायर की आवाज सुनते ही पुलिस दल हरकत में आगया गया और पहले से ही तय किये हुए अपने -2 टारगेट को निशाना बनाने लगे !

फायर की आवाज ठीक अपने सर के ऊपर सुन गोंदिया हड़बड़ा कर उठा , और इधर -उधर देखने लगा ! कुछ देर तो उसकी कुछ समझ मैं ही नहीं आया की आखिर हुआ क्या ..? जब तक वो समझ पता की मेरी गन उसकी कनपटी पे टिक चुकी थी !

हिलना भी मत गोंदिया , वार्ना इसकी एक गोली तुझे जहन्नुम पहुंच देगी ..!

वो चोंकते हुए बोला - के के कोन है तू ? क्यों अपनी मौत के मुह में चला आया ..?

मौत तो अब तेरे सर पर नाच रही है गोंदिया , तेरा नदी वाला प्लान तो हमने उखाड़ फेंका , अब तेरी बारी है ! पुलिस ने चारों ओर से तेरे अड्डे को घेर लिया है ..!!

इतना ही बोल पाया में , की चारोँ ओर से फायरिंग की आवाज़ें सुनाई देने लगी , मरने वालों की चीखें गोलियों की आवाजों में दब कर रह गयी !

में थोड़ा असावधान हो गया था ,उसका फायदा उठा कर गोंदिया ने मुझे पीछे को धक्का दे दिया और वहां से भागने लगा !

में इतना भी असावधान नहीं हुआ था , फ़ौरन उठ खड़ा हुआ और तुरंत एक फायर उसके ऊपर कर दिया , गोली उसकी जांघ को चीरती हुई पार हो गयी , वो कुछ देर चीखता हुआ बैठा रहा लेकिन जल्दी ही उठ खड़ा हुआ और लंगड़ाते हुए भागने ही वाला था की में फिरसे एक बार उसके सर पर खड़ा था !

बचने का कोई रास्ता नहीं है हरामजादे , लोगों की जान को खेल समझने वाले नरपिशाच आज तुझे दिखाता हूँ , मौत का दर्द क्या होता है , और रिवाल्वर का भरपूर बार उसकी नाक पर किया !

गोंदिया घायल भैंसे की तरह डकार मारता हुआ जमीन पर गिर पड़ा , फिर मेने उसे लात घूसों पर रख लिया !

इधर पुलिस का घेरा चारों तरफ से तंग होता जा रहा था ! डाकुओं के हौसले पस्त हो चुके थे !

पिटते -2 गोंदिया बिलकुल अनाज के बोरे की तरह जमीन पर पड़ा रह गया , चीखता रहा , चिल्लाता रहा पर कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं था , और ना ही उसका कोई साथी उसकी मदद के लिए आनेवाला था !

10-15 मिनट की कार्यवाही के बाद ही पुलिस टीम और मेरे दोस्तों ने वहाँ मौजूद लगभग सारे गिरोह को ख़तम कर दिया , जो हाथ उठाये समर्पण कर रहे थे उन्हें अरेस्ट कर लिया गया !

ऋषभ के साथ इंस्पेक्टर और दूसरे पुलिस वालों को मेने अपनी ओर आते देखा , तभी मेने एक गोली गोंदिया के सीने में उतार दी और उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया ….!

हम लोगों की थोड़ी सी सतर्कता और विवेक ने एक बहुत बड़े संकट को ही नहीं टाला जिसमें सैकड़ों जानें जाने का अंदेसा था , अपितु उस पुरे इलाके को एक दुर्दांत हत्यारे डाकू के जुल्मों से हमेशा के लिए मुक्ति दिला दी थी !

पर्व का स्नान शांति पूर्वक संपन्न हुआ , उसके बाद ये बात गांव वालों को बताई गयी , सारे गांव के लोग ख़ुशी से झूम उथे , चारों ओर हर्षो -उल्लाश का माहौल पैदा हो गया था !

SP, DSP, पुलिस के और तमाम आला अफसरों ने हमारी खूब तारीफ़ की और एक बहुत बड़े इनाम का एलान भी सरकार की ओर से कराया जो हमने अपनी ओर से मंदिर के आस -पास नदी के घाट बनाने के लिए दान कर दिया !

एक -दो दिन ऋषभ के घरवालों के साथ व्यतीत किये , इस दौरान जागेश और ऋषभ ने उन दोनों बालाओं के साथ जम कर मस्ती की ! मेरा ये व्यवहार देख कर तृषा और ज्यादा प्रभावित हुयी ! फिर एक दिन हम चरों दोस्त अपने कॉलेज वापस लौट आये अपने फाइनल ईयर की पढ़ाई करने !

लौटते समय तृषा की बोलती नज़रें बहुत कुछ कहना चाहती थी , लेकिन समाज और बड़ों के लिहाज ने उसके होठ सिल दिए और उसके मनोभाव दब कर ही रह गए ! पर उसने मेरा एड्रेस रख लिया , जो मेने रति के घर का लिखवा दिया था !

ऋषभ और जागेश, अपने -2 लंड महाराज की खासी सेवा करवा चुके थे , कच्ची कलियों का रसपान करके , और उन दोनों कन्याओं ने भी कामसूत्र का अच्छा खास ज्ञान प्राप्त कर लिया था !

नेहा बेचारी प्यासी ही रह गयी , धनञ्जय ने अपने मित्र धर्म का पालन पूरी निष्ठां से किया था . वर्ना अगर चाहता तो वो भी उसकी सील को तोड़ चुका होता ! ऐसे आदर्शवादी मित्र आज के ज़माने में कम ही देखने को मिलते हैं !

खैर कुल -मिलाकर हमारा ये वेकेशन एक यादगार वेकेशन रहा जिसमें हमने ये ऐतिहासिक काम किया था !

जब हमने अपनी दास्ताँ प्रिंसिपल को सुनाई तो वो हँसते हुए बोले - जहां -जहां चरण पड़े संतान के तहाँ -तहाँ बंटाधार …है है है लेकिन बुराई का !

Well done my boy's, तुम लोग एक मिसाल हो इस कैंपस के लिए . बहुत दिनों तक तुम्हारी बातें यहां होती रहेंगी, खासकर अरुण की !

ऐसी ही सब बातें करने के बाद प्रिंसिपल बोले - देखो बच्चो ! ये साल तुम लोगों का आखिरी साल है , में चाहता हूँ की, इस साल का प्रेजिडेंट का चुनाव तुम में से ही कोई जीते , जिससे छात्रों में एक नयी जाग्रति आये , आने वाले कुछ सालों के लिए !

कॉलेज प्रशासन और छात्र लीडर जब मिलकर काम करते हैं , तो बहुत कुछ अच्छा कर सकते है आनेवाले भविष्य के लिए !

में - ठीक है सर ! इसमें कोन सी बड़ी बात है , अपना धन्नू सेठ बन जायेगा प्रेजिडेंट ! धनञ्जय मन करने लगा तो प्रिंसिपल सामने से ही बोले !

प्रिंसिपल- में जानता हूँ ! धनंजय , तुम अरुण के रहते प्रेजिडेंट का चुनाव नहीं साधना चाहते , है ना ! पर बेटे, प्रेजिडेंट से ज्यादा उसके कामों को गति देने वाले की इम्पोर्टेंस रहती है , जो पद पर रहते हुए नहीं हो सकती !

और एक बात अरुण ! इतना सरल भी मत समझना चुनाव को ! पूरी तबज्जो देनी होगी तुम्हें , कॉलेज का चुनाव किसी निकाय चुनाव से काम इम्पोर्टेन्ट नहीं होता है ! ये जब तुम लोग इसमें उतारोगे तब पता चलेगा तुम्हें !

बहुत सारे स्टूडेंट्स हैं , जो पूरी ताक़त झोकने को तैयार है ! लोकल लीडर्स का भी सपोर्ट रहता है, उन्हें . मेरी बातें धयान में रखना !

अब जाओ और आज से ही तैयारियां शुरू करदो ! बहुत मेहनत करनी होगी तुम लोगों को , ये चुनाव जीतने के लिए !

बैच शुरू हो चुके थे ! नए स्टूडेंट्स , पुराने स्टूडेंट्स … रैगिंग, इन्ही सब में महीना निकल गया .

हमने धनंजय को प्रेजिडेंट कैंडिडेट प्रोजेक्ट करके न्यूज़ स्प्रेड करदी थी पुरे कैंपस में . वैसे तो कोई सक्षम स्टूडेंट नहीं था जो हमारे ग्रुप को पॉपुलैरिटी में मात देता , फिर भी प्रिंसिपल की अनुभवी बातों ने हमें सोचने पर विवस कर दिया था !

इधर हमारी समिति से 3 लोग कम हो गए थे , वो भी अपडेट करनी थी , तो कुछ उत्सुक लड़कों को ले लिया जिसमें ज्यादातर SY और TY के स्टूडेंट्स थे ! कुल -मिलाकर 12 मेंबर हो गए थे अब समिति में !

सिविल डिपार्टमेंट से एक मंजीत सरदार नाम का कैंडिडेट बड़ी मजबूती से दावा पेश कर रहा था स्टूडेंट्स के बीच !

उसका बाप शहर का जाना मन बिल्डर था , अपनी शानदार गाड़ी से कॉलेज आना , दोस्तों के साथ मौज मस्ती करना , पैसे का घमंड दिखाना ! उसको शहर के कुछ पॉलिटिशियन और बिल्डर लॉबी फुल सपोर्ट कर रही थी !

हम ठहरे फक्कड़ सज्जन टाइप के लोग , पैसा तो हमारे पास था नहीं बस अपनी सादगी और नेक नीयत के दम पर ही चुनाव जीतना चाहते थे !

वैसे पैसे का सपोर्ट हमें भी मिल सकता था , लेकिन अपनी तो अलग ही स्टाइल थी ! खामोखाँ किसी का एहशान क्यों लिया जाये ?

 
इलेक्शन पूरे जोरों पर था , बस कुछ ही दिन शेष थे ! मंजीत अपनी पूरी ताक़त से लगा हुआ था ! लेकिन फिर भी जो रुख था स्टूडेंट्स का वो हमारी अच्छाई की ओर ज्यादा लगता था !

वैसे तो एक -दो कैंडिडेट्स और भी थे लेकिन वो सिर्फ नाम मात्रा के लिए या फिर कह सकते हैं उसके डमी कैंडिडेट्स थे !

जैसे -2 इलेक्शन की डेट नजदीक आती जा रही थी मंजीत की उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी ! अब तो वो जानबूझकर हमसे टकराने के भी बहाने ढूढने लगा था ! पर हम किसी तरह टालते रहते थे !

धनंजय का ठाकुरैती खून कभी -2 उबाल लेने लगता था , पर में उसको शांत करता रहता था !

अब सिर्फ एक हफ्ता ही रह गया था इलेक्शन को, और मंजीत को उसके सूत्रों ने पक्का कर दिया था की उसकी हार निश्चित है ! और वो भी करारी , तो उसके धैर्य का बांध टूट गया और वो .., वो कर बैठा जो एक फाइनल के स्टूडेंट के लिए कतई उचित नहीं था !

एक दिन हम सभी समिति मेंबर मीटिंग कर रहे थे , अपने रूम में बैठ आपस में विचार -विमर्श में लगे हुए थे , की एक लड़का भागता हुआ रूम में दाखिल हुआ और आते ही बोला ! सर वो मंजीत सरदार 20-25 गुंडों को लेकर हॉस्टल की तरफ आ रहा है , ज्यादातर उनमें सरदार ही हैं और सबके हाथों में नंगी तलवारें हैं !

हम सबके होश उड़ गए !… आनन फानन में हॉस्टल में बात फैलाई तो जिसको जो हाथ लगा उठाके चल दिया गेट की तरफ ! चूँकि हम सबको मच्छरदानी लगाने के लिए 4-4 लोहे की सरिया (rod) मिलती थी , तो ज्यादातर वो ही सबके हाथों में लगीं थी !

हम 25-30 लड़कों ने अपनी -2 सरियाएं जो 4-4.5 फ़ीट लंबी थी , संभाल ली और गेट पर खड़े होकर उन लोगों का इंतज़ार करने लगे ! वो सभी वास्तब में ही हाथों में नंगी तलवारें लिए बढे चले आरहे थे हमारी ओर …!

इधर जैसे ही प्रिंसिपल को इस बात की भनक लगी , उन्होंने फ़ौरन फ़ोन खटखटा दिया SP ऑफिस में ! लेकिन पुलिस की मदद तो कम -से -कम आधे घंटे से भी ज्यादा समय लगना था , तो जो भी करना था हमें ही करना था !

में ये भी जानता था , की जब तक हम दो -चार को गिरा नहीं देते , हमारे साथ के लड़कों की हिम्मत आगे बढ़ने की नहीं होगी ! सो बस बढ़ गए आगे को हर -हर महादेव बोलकर !

वो लोग बीच ग्राउंड से थोड़ा ही आगे बढे थे की हमने उनकी ओर दौड़ लगादी , और हॉस्टल से पहले ही उन्हें रोक लिया , और भिड़ गए लेकर प्रभु का नाम !

तड़ाक ! तड़ाक ! ताड !-ताड !… सरिया की मार जैसे ही तलवारों पर पड़ती , या तो तलवार बन्दे के हाथ से छूट जाती या नाकाम हो जाती !

आगे की लाइन में हम 8-10 ही थे जो ट्रेंड थे और इस तरह की परिस्थितियों का सामना भली भांति कर सकते थे !

तलवारों की तुलना में हमारी सरियाएं ज्यादा लंबाई तक मार कर रहीं थी ! विरोधी पार्टी के हाथों से उनकी तलवारें छूटती जा रही थी , और हम लोग उन पर हावी होते जा रहे थे !

मंजीत की पार्टी को जल्दी ही ये एहसास हो गया की उनकी ये बहुत बड़ी भूल साबित हई है , 5 मिनट में ही आधे से ज्यादा वो लोग निहत्थे हो गए और उनके पेअर उखाड़ने लगे !

आवेश में धनंजय और कुछ स्टूडेंट्स भागने वालों के पीछे -2 उनका पीछा करते हुए दौड़ाने लगे !

में उन्हें आवाज देकर रोकना ही चाहता था की तभी , मानो मेरे शरीर में किसी ने आग भरदी हो …! मंजीत की तलवार मेरी पीठ में घुसती चली गयी और में हाथ ऊपर किये हुए जो उन्हें रोकने के लिए उठा था , उठा ही रह गया …! मेरे मुह से बस इतना ही निकला .-. ओ .. माँ आ आ आ …………!

मुझे पता नहीं चला की कब मंजीत मेरे पीछे आया , और कब उसने पीछे से बार कर दिया , उसकी तलवार का बार इतना शक्तिशाली था की तलवार मेरी पीठ को चीरती हुयी आगे से निकल गयी ! मेरे पुरे शरीर में मानो आग भरदी हो किसी ने !

में अपने घुटनों पर झुकता चला गया , दाया हाथ ऊपर किये मेरे मुह से बस ओ .. माँ आ आ .. ! ही निकला और जैसे ही उसने अपनी तलवार मेरी पीठ से खिंचा , में औंधे मुह जमीन पर गिर पड़ा , मेरी आँखें बंद होती चलीं गयी , और में अंधेरों में डूबता चला गया ….!!

क्या मार सकेगी मौत उसे, औरों के लिए जो जीता है !

मिलता है जहाँ का प्यार उसे, औरों के जो आँसू पीता है !! .

क्या मार सकेगी मौत उसे….

होना होता है जिनको अमर, वो लोग तो मरते ही आए हैं…! 2..

औरों के लिए जीवन अपना, बलिदान वो करते ही आए हैं…!!

धरती को दिए बदल जिसने, वो सागर कभी ना रीता है…

मिलता है जहाँ का प्यार उसे, औरों के जो आँसू पीता है..!!

क्या मार सकेगी मौत उसे…!!! सन्यासी… बाइ मानदेय.

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एक काली सी छाया मेरे पास हवा में तैरती हुई दिखाई दे रही थी, उस छाया ने अपना दाँया हाथ आगे किया और उसके हाथ से नीले रंग की अत्यंत चमकदार रोशनी निकली और मेरे शरीर में प्रवेश कर गयी.

अंदर जाकर उस रोशनी ने मेरे सूक्ष्म शरीर (आत्मा) को अपने अंदर क़ैद सा कर लिया, अब मेरा सूक्ष्म शरीर अपनी स्वेक्षा से हिल भी नही सकता था.

देखते देखते मेरा सूक्ष्म शरीर मेरे स्थूल शरीर से बाहर आने लगा और उस नीली रोशनी में क़ैद उस काली छाया की ओर हवा में तैरता हुआ बढ़ने लगा.

मे ये सब साक्षी भाव से अपने सामने होते देख रहा था, पर कुछ भी कर पाने की स्थिति में नही था.

उन नीली चमकदार किरणों में क़ैद मेरा सूक्ष्म शरीर हवा में तैरता हुआ उस काली छाया की ओर बढ़ रहा था.

इससे पहले कि वो उस तक पहुँच पाता कि अचानक एक सफेद रंग का सुनहरा चम्कीला तेज प्रकाश उस नीली रोशनी से टकराया और एक अत्यंत तेज प्रकाश युक्त बिस्फोट जैसा हुआ, वो नीली प्रकाश की रेखा बीलुप्त हो गयी और मेरा सूक्ष्म शरीर वही पर हवा में स्थिर हो गया.

मेरी नज़रों ने जैसे ही उस सफेद सुनहरे प्रकाश की किरणों का पीछा किया, तो वहाँ कुछ दूरी पर एक अत्यंत सफेद चम्किली आकृति को हवा में तैरते हुए पाया.

गौर से देखने पर वो आकृति जानी पहचानी सी लगी, कुछ ही क्षणों में मे उस आकृति को पहचान गया, वो वही देवदूत था, जो मुझे मेरे शरीर में पुनः प्रवेश कराके गया था मेरे जन्मकाल में.

वो काली छाया यमदूत थी.. अब मे उन दोनो के बीच होने वाली वार्ता को साफ-साफ सुन रहा था.

देवदूत- ये प्राणी अभी इस पृथ्वी लोक को नही छोड़ सकता तुम फ़ौरन चले जाओ यहाँ से और इसे यहीं छोड़ दो.

यमराज दूत- मुझे जो आदेश दिया गया है, मे उसी का पालन कर रहा हूँ श्रीमान !

देवदूत- नही ! तुम इसे नही ले जा सकते, आदरणीय चित्रगुप्त का आदेश है ये.

यमराज दूत- मुझे ऐसा कोई आदेश नही प्राप्त हुआ, वरना मे यहाँ क्यों आता इसे लेने.

देवदूत- एक ताम्रपत्र को दिखाते हुए.. ये देखो उनका आदेश, अब जाओ यहाँ से.

उस ताम्रपत्र पर देवनागरी में कुछ लिखा हुआ था और नीचे मुन्हर का निशान था, उसे देखते ही वो काली छाया ने अपना सर झुकाया और वहाँ से बीलुप्त हो गयी.

अब वो देवदूत मुझसे मुखातिब हो बोला - हे ! जीवात्मा अब अपने शरीर में वापस जाओ, अभी तुम्हारा काम इस लोक में पूरा नही हुआ है. इससे पहले कि तुम्हारे इस स्थूल शरीर को कोई हानि पहुँचाए, फ़ौरन इसमें चले जाओ.

डॉक्टर और नर्स मेरे निर्जीव शरीर पर लगे पड़े थे, करीब 15 मिनट से उसमें प्राणों का कोई लक्षण नही दिखा, साँसें बंद हो चुकी थी. वेंटिलेटर के सारे सिग्नल बंद हो चुके थे.

थक हार कर डॉक्टर ने फाइनली मुझे मृत घोसित कर दिया और बॉडी को पोस्ट मॉर्टेम के लिए बोल दिया.

मेरे सभी नज़दीकियों की आँखें जार-2 बरस रही थी.

हॉस्पिटल प्रशासन ने मेरे शरीर को ले जाने की तैयारी शुरू कर दी. मैने एक बार अपने शरीर की तरफ देखा और उस देवदूत से कहा.

मे- पर श्रीमान ये तो बुरी तरह घायल है, क्या मेरा वापस जाना उचित होगा..?

देवदूत- तुम उसकी चिंता ना करो वत्स ! और अतिशीघ्र अपने शरीर में प्रवेश करो. नियती को तुम्हारे द्वारा अभी और बहुत सारे काम करने हैं. समय समय पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मेरा मार्गदर्शन तुम्हें मिलता रहेगा. कल्याडमस्तु..!

इतना कह कर वो देवदूत अदृश्य हो गया और मेरा सूक्ष्म शरीर वापस अपने शरीर में आगया…!

अचानक मेरी आँखें खुल गयी, मैने उठने की कोशिश की लेकिन उठ ना सका, पीठ में दर्द की एक तेज लहर सी उठी और मेरे मुँह से कराह निकल गयी.

पास खड़ी नर्स जो अब बॉडी को ले जाने की प्रक्रिया में लगी थी, मेरी कराह सुन कर मेरे पास आई और मेरे कंधों को पकड़ कर मुझे लेटे रहने को कहा और वापस मूड कर डॉक्टर को आवाज़ दी.

अभी-2 हुई अलौकिक घटनायें मेरे जेहन में चलने लगी और एक बार फिर से मेरी आँखें बंद हो गयी.

जब मेरी आँखें खुली तो पाया कि एक अधेड़ उम्र का डॉक्टर मेरे उपर झुका हुआ मुझे फिर से चेक कर रहा था.

मेरी खुली आँखें और मुँह से कराह सुन कर डॉक्टर सर्प्राइज़ हो गया, उसके चेहरे पर आश्चर्य से भरे कीटाणु नृत्य कर रहे थे.

वो खुशी से चिल्लाते हुए बोला - कंग्रॅजुलेशन्स यंग मॅन ! तुम बच गये.. बताओ अब कैसा फील कर रहे हो ?

मेरे मुँह से मरी सी आवाज़ निकली - मेरे पीठ में बहुत दर्द है,

डॉक्टर - अरे वो तो होगा ही, एक तलवार जो तुम्हारे आर-पार हो गयी थी, वैसे तुम बहुत बहादुर हो जो इस जानलेबा हमले में बच गये. एक तरह से तुमने मौत को ही हरा दिया है.

फिर उसने एक इंजेक्षन दिया, रिपोर्ट्स चेक की और मुझे आराम करने की सलाह देकर बाहर चला गया.

उसके जाते ही मेरे दोस्त अंदर आए और मुझे होश में देख कर खुशी से रो पड़े..

मेरे चेहरे पर एक दर्दयुक्त मुस्कान आई और अत्यंत धीमी आवाज़ में बोला- अरे रोते क्यों हो मेरे शेरो अभी तुमहरा ये कमीना दोस्त जिंदा है.

धनंजय जो मेरे सबसे करीब था बोला- ये तो खुशी के आँसू है मेरे यार ! तू नही जानता कि पिच्छले 36 घंटों में हम कितनी मौतें मरे हैं तेरी याद कर-करके, लेकिन ना जाने क्यों कभी दिल ने नही माना कि तू इतनी जल्दी और ऐसे हमें छोड़ कर जा सकता है.

क्या..! 36 घंटे..? तो क्या मे 36 घंटे तक बेहोश था..?

तभी प्रिन्सिपल सर भी अंदर आए और आते ही बोले- हां अरुण तुम 36 घंटे के बाद होश में आए हो, डॉक्टर ने तो तुम्हें डेड डिकलेयर कर दिया था. लेकिन तुमने मौत को भी हरा दिया मेरे बच्चे ! और उनकी आँखें छलक पड़ी.

बातों-2 में पता चला कि मंजीत को कॉलेज से निकाल दिया गया है, और इस समय वो पोलीस हिरासत में है.

हमारी तरफ से और कोई ज़्यादा गंभीर रूप से घायल नही हुआ था, लेकिन उधर से 4-6 लोगों को रोड की मार से भीतरी चोटें आई थी.

मेरा शरीर चमत्कारिक रूप से सही हो रहा था, दूसरे दिन ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गयी,

हॉस्पिटल से रति सीधे मुझे अपने घर ले गयी और मेरी सेवा में उसने अपनी जी-जान एक करदी, खुद से उसने मेरी देखभाल की जबकि उसकी प्रेग्नेन्सी को 7वाँ महीना चल रहा था.

एलेक्षन गुजर गया, धनंजय प्रेसीडेंट चुन लिया गया था, मैने भी अब कॉलेज आना जाना शुरू कर दिया था, लेकिन रति ने रखा मुझे अपने ही पास.

सब कुछ फिर से एक बार अच्छे से हो गया, कॉलेज प्रशासन और छात्र संघ मिलकर छात्रों के हित में काम कर रहे थे.

इधर रति की डेलिवरी का समय नज़दीक था, तो उसकी सास उसके पास आ गयी, जिसकी वजह से मे अपने हॉस्टिल चला आया.

और फिर एक दिन रति ने एक सुंदर सी परी को जन्म दिया, आलोक और उसके घर वाले सभी बड़े खुश हुए लक्ष्मी को पाकर.

मैने भी मौका पाकर अपनी प्यारी सी गोरी चिटी, छुयि-मुई सी नन्ही परी को गोद में लेकर प्यार किया, रति थोड़ा एमोशनल हो गयी तो मैने उससे आँखों के इशारे से समझा दिया.

4-5 दिन बाद वो हॉस्पिटल से घर आ गई, उसकी सास बच्ची की देखभाल में लग गयी, सब कुछ अच्छे से चलने लगा.

देखते-2 साल का अंत आ गया, एग्ज़ॅम शुरू हो गये थे, हमारा ये अंतिम साल था. प्रिन्सिपल ने हमारे विदाई समारोह के लिए कुछ स्पेशल इवेंट सोच रखा था, डेट फिक्स करके कमिशनर और सिटी एसपी को भी इन्वाइट किया था, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार किया.

वो दिन भी आ गया सबने हमारे बारे में कुछ ना कुछ कहा और हमें हमारे आनेवाले भविश्य के लिए ढेर सारी सूभकामनाएँ दी. सबकी आँखों में विदाई का दुख दिखाई दे रहा था.

लेकिन जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम , किशोरे दा के इस गाने की लाइन भी तो यथार्थ से जुड़ी हुई है.

हमने सबको थॅंक्स बोला, अपने 4 साल बिताए समय को याद किया, खट्टी मीठी यादों को दोहराया और इवेंट ख़तम हुआ.

 
प्रिन्सिपल ऑफीस में कमिशनर, एसपी के साथ हमने स्पेशल भेंट की और उन्हें पर्षनली थॅंक्स कहा. उन्होने वादा किया कि जिंदगी में कभी भी हमें उनकी ज़रूरत लगे बेझिझक माँग सकते हैं, चाहे वो कहीं भी हों, और अपने पर्सनल कॉंटॅक्ट्स शेयर किए.

जाने से पहले सभी दोस्त एक दूसरे से विदा लेते वक़्त थोड़ा सेनटी हो गये थे, जो स्वाभाविक भी था, भविष्य में मिलते रहने के प्रॉमिस के साथ सब एक दूसरे से विदा हुए.

मुझे रति ने ज़िद करके एक हफ्ते के लिए अपने पास रोक लिया. उसकी सास अपने घर जा चुकी थी. हमारी परी अब बैठना जो सीख गयी थी और घुटनों पर थोड़ा बहुत चलने भी लगी थी.

मैने अपना समान पॅक किया और रति के बंगले में लाके पटक दिया. एक हफ़्ता जो माँगा था उसने मुझसे. इस एक हफ्ते को वो मेरे साथ मिलकर बिताना चाहती थी.

अब मुझे सिर्फ़ अपने घर लौटने के अलावा और कोई काम नही था, सो दिन भर अपनी गुड़िया रानी और उसकी माँ के साथ खेलना था.

शाम को हम ऐसे ही अपनी बच्ची को खिला रहे थे, वो मेरी गोद में खेल रही, रति मेरे कंधे पर सर रख कर बैठी थी कि अचानक बोली-

रति – अरुण ! अब तुम हमें हमेशा के लिए छोड़ कर चले जाओगे..?

मे- ये जीवन है जान! एक बहती नदी के समान होता है, जो हमेशा बहती रहती है, अगर ठहर गयी, तो जो उसका पानी अमृत समान होता है वो जहर बन जाता है.

जीवन के किसी मोड पर फिर मुलाकात होगी, अगर नियती हमें मिलाएगी तो.

रति- तो जाने से पहले कुछ और माँग सकती हूँ तुमसे..? अगर दे सको तो..?

मे- मेरे पास है ही क्या..? सिवाय इस नन्ही सी जान के..! ये चाहिए तो अभी दे सकता हूँ.

वो तड़प कर मेरे सीने से लिपट गयी और बोली – आहह... ये भी अब तुम्हारी अकेले की नही है, इसका कुछ हिस्सा तो हम दोनो माँ-बेटी का भी है. मुझे तो इसका भाई चाहिए..! दोगे..?

मे- ओह्ह्ह… जानेमन ! तुम बहुत लालची हो.. है ना !

रति- क्या करूँ..! सामने खजाना देख कर रहा नही गया, सो माँग लिया थोड़ा सा..! बोलो ना..दोगे..?

मे- कोशिश करना हमारा काम है, फल तो उपेर वाले को देना है..! क्या ये सही समय है..?

रति- एकदम परफेक्ट टाइम है, कल ही मेरे पीरियड्स ख़तम हुए हैं.

मे- तो फिर ठीक है कोशिश शुरू कर देते है, और ये कह कर मैने उसको अपनी बाहों में समेट लिया, और उसके रसीली पंखुड़ियों को चूसने लगा.

रति इस समय एक हल्के से कपड़े के वन पीस गाउन में थी, नीचे वो ब्रा नही पहने थी, कुछ देर पहले ही उसने परी को दूध पिलाया था, सो उसके निप्प्लो के उपर वो गीला हो रहा था.

उसके 36” साइज़ की चुचियाँ अभी भी दूध से भरी हुई थी, और उसके कड़क हो चुके निपल जो अब काफ़ी बड़े हो चुके थे गाउन के कपड़े को फाड़ डालने को उतावले दिखा रहे थे.

मैने जैसे ही एक हाथ से उसकी दूध की एक टंकी को मसला… उसका गावन् भीगने लगा और उसके मुँह से एक जोरदार सिसकी निकलने लगी…

आअहह…. रजाआ… ईसीई पीलूओ.. ना… ऐसे क्यों बहा रहे हूऊ…

तो उतारो ना इसको… और उसका गाउन उपर उठाकर उसके शरीर से अलग कर दिया…

एक भरी पूरी काम की प्रतिमुरत.. हस्थिनि औरत, जिसके दोनो दूध की टँकियाँ लबालब भरी हों..! कल्पना कीजिए क्या हाल होता होगा सामने वाले मर्द का…

मे उसकी टँकियों पर टूट पड़ा और जब तक वो दोनो खाली नही हो गये, अपना मुँह नही हटाया…

मेरा पेट भर गया था, ना जाने परी इतना दूध कैसे पीती होगी..? मेरे मुँह से एक डकार निकल गयी जिसे सुन कर रति की हसी निकल गयी..

मैने कहा – बाप रे इतना दूध बनता है तुम्हें.. मेरी बेटी कैसे पीती होगी इतना..?

वो – कहाँ पी पाती है पूरा.. जब मुझे चैन नही पड़ता तो अपने हाथ से मसल-मसल कर इन्हें खाली करती हूँ..

फिर मे उसके पेट को चूमता हुआ उसकी चूत के उपर आ गया जो उसकी पेंटी को गीला कर चुकी थी.

एक बार हाथ से सहला कर मैने उसकी पेंटी को भी निकाल दिया, और उसकी चूत को चूमा, फिर थोडा चाट कर चिकना किया…

रति मज़े में अपनी आँखें बंद किए अपनी कमर को लचका रही थी.

फिर मैने अपने मूसल को उसके मुँह में देकर चुस्वाया, जब वो पत्थर जैसी हालत में पहुँच गया तो मैने उसकी टाँगें चौड़ा कर उसकी चूत में डाल दिया, सरसराता मेरा पूरा लंड उसकी चूत में समा गया, और उसका सुपाडा उसकी बच्चे दानी का मुँह खोल कर उसमें झाँकने लगा...

हम दोनो का मज़े से बुरा हाल हो रहा था.. दोनो ही अपनी तरफ से पूरी कोशिश में लगे थे एक दूसरे को पछाड़ने की.

लेकिन अंत में बाज़ी दोनो के ही हाथ लगी और मॅच बराबरी पर छूटा.…

इस तरह हमारी काम क्रीड़ा शुरू हो गयी, एक दूसरे में खोते चले गये, एक तूफान आता, चला जाता, फिर से आता, और चला जाता. जब तक पूरी तरह निढाल नही हो गये, सेक्स में डूबे रहे. थक कर चूर एक दूसरे की बाहों में सो गये.

शाम को उठे, चाइ नाश्ता किया, बच्ची को दूध पिलाया, फिर से राउंड शुरू. रति ने मुझे हर खुशी देने की कोशिश की और खुद भी तृप्त होती रही.

इसी तरह एक हफ़्ता हम दोनो एक दूसरे में खोए रहे, फिर मैने एक दिन निकलने का मन बना ही लिया.

रति ने बड़े दुखी मन से मुझे विदा किया, कितनी ही देर तक मेरे सीने से लग कर रोती रही, मैने समझा बुझाकर उसे मनाया. अपना अड्रेस दिया कि जो भी खुशख़बरी हो वो मुझे ज़रूर सूचित करे.

वो मुझे स्टेशन तक छोड़ने आई, मैने अपना रिज़र्वेशन करा लिया था सो सीट की कोई समस्या नही थी. सीट के नीचे अपना समान लगा कर में गेट पर आ गया रति परी को गोद में लिए प्लेटफार्म पर खड़ी थी.

सिग्नल हो चुका था, मैने परी के गाल पर किस किया, गाड़ी छूटते वक़्त मेरी नन्ही परी मेरी उंगली को पकड़े हुए थी, जब गाड़ी चली तो वो उसके हाथ से छूट गयी, अनायास ही मेरी आँखें छलक पड़ी.

बहुत दूर तक वो माँ बेटी मुझे देखती रही, हाथ हिला कर मुझे अलविदा करती रही जब तक में उनकी आँखों से ओझल नही हो गया.

मेरी कॉलेज लाइफ का पड़ाव पीछे छूट रहा था, गाड़ी अपनी गति से मेरे अगले पड़ाव की ओर बढ़ी चली जा रही थी.

 
में अपनी सीट पर बैठा अभी भी परी और रति से अंतिम विदाई के पलों को आँखों में बसाए सोच में डूबा हुआ था.

ये एक 2 टीर एसी कॉमपार्टमेंट था, मेरी सीट उपर की थी, मेरे नीचे की सीट पर दो अधेड़ पति-पत्नी थे और सामने उपर की सीट पर उनकी बेटी थी, शायद शादी शुदा लग रही थी. देखने से ही एक सभ्रान्त परिवार लगा मुझे.

जान-पहचान हुई तो वो लोग मेरे से एक स्टेशन आगे जाने वाले थे रात हो चुकी थी, मेरा स्टेशन कोई 10 बजे तक आने वाला था, अभी 7 बजे थे.

अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी और वहाँ से 4 लड़के मेरी उम्र के लग रहे थे वो चढ़े, इधर-उधर देखते हुए चले आरहे थे, अचानक उनकी नज़र उनकी लड़की पर पड़ी तो वो वहीं उनको एक साइड में खिसका कर बैठने लगे.

उन बुजुर्ग ने जब पुछा कि तुम लोगो की सीट कहाँ हैं, ये तो हमारी रिज़र्व सीट्स हैं, तो वो गुंडा गर्दि करने लगे उनके साथ और बदतमीज़ी पर उतर आए...

मे अपने उपर बर्थ पर लेटा अपने ही विचारों में डूबा हुआ था, अब वो लड़के उस लड़की को भी परेशान करने लगे, एक ने तो उसका हाथ ही पकड़ लिया और अपनी ओर खींचा, मेरी नज़र उस पर पड़ी तो वो नीचे गिरने ही वाली थी कि तभी मैने उसे उसका कंधा पकड़ कर गिरने से बचा लिया.

उसने मेरी ओर याचना भरी नज़रों से देखा, मज़रा समझते ही मैने उन लड़को से कहा-

क्यों भाई क्या तकलीफ़ है आप लोगों को ? क्यों परेशान कर रहे हो सवारियों को..?

एक- अब्बे ओये.. लौन्डे..! तू चुपचाप लेटा रह.. हम लोंगों के बीच में टाँग मत अड़ा समझा..

मे- टाँग तो तुम लोग अड़ा रहे हो ! ये रिज़र्वेशन बोगी है, तुम लोग इसमें आ कैसे गये ?

दूसरा- अब्बे साले हमें नियम क़ानून सिखाएगे ? तेरी तो…. और जैसे ही वो मेरी ओर लपका, एक लात उसकी नाक पर पड़ी, धडाम से वो साइड वाली सीट के पार्टीशन से जा टकराया.. नाक से खून बहने लगा उसकी.

उसे देखकर एक और बढ़ा मेरी ओर उसका भी वही हुआ जो पहले वाले का हुआ था क्योंकि मे उपर था और वो नीचे खड़े थे. वो भी उसकी बगल में जा गिरा.

अब मैने नीचे जंप लगा दी और लपक के उन वाकी दो के कॉलर पकड़ के उठाए और गॅलरी में ले जाके धकेल दिया, तब तक और लोग भी आ गये और फिर उनकी वो धुनाई शुरू हुई की बस पुछो मत, बाद में उनको रेलवे पुलिस के हवाले कर दिया.

उन बुजुर्ग दंपत्ति ने मुझे खूब-2 आशीर्वाद दिया और फिर हम सभी नीचे बैठ कर बात-चीत करने लगे. एक दूसरे से जान पहचान करते करते समय का पता ही नही चला और मेरा स्टेशन आ गया.

मे उन लोगो से विदा ले अपने स्टेशन पर उतर गया….!!!

ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोते-2 पिताजी समय से पहले बूढ़े हो गये थे, एलर्जिक तो वो थे ही, उपर से काम और ज़िम्मेदारियों के बोझ ने उनकी कमर ही तोड़ के रख दी थी.

हालाँकि श्याम भाई अपना ग्रॅजुयेशन कंप्लीट कर चुके थे और फिलहाल दो सालों से घर पर ही थे, लेकिन वो अपनी ही मुसीबतों में फँसे हुए थे.

हुआ यूँ कि एक बार कहीं जॉब के लिए इंटरव्यू देने जा रहे थे, रात का ट्रेन का सफ़र था, पॅसेंजर ट्रेन भीड़ थी नही, सो गये लाट साब सामने की सीट पर बॅग रख कर, ले गया कोई उठाके.

सारे पैसे टके, कपड़े लत्ते, और सबसे बड़ी बात डिग्री तक के सारे डॉक्युमेंट्स भी उसी बॅग में थे, एक साल से ड्यूप्लिकेट बनवाने में ही भाग-दौड़ में लगे थे, नौकरी का भूत दिमाग़ से फिलहाल निकल चुका था.

मैने तय किया कि अब में कुछ दिन रह कर यहीं पिता जी का हाथ बाँटता हूँ, जब उनकी तबीयत थोड़ा सुधरेगी, या श्याम भाई अपनी मुसीबतों से फारिग हो जाएँगे, तब देखा जाएगा आगे क्या करना है, सो लग गया खेती वाडी के कामों में जो मेरे लिए कोई नया तो था नही.

जुलाइ का महीना था, बरसात की शुरुआत हो चुकी थी, एक दो बरसात के बाद मौसम में उमस कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती है, हर समय पसीने की चिपचिपाहट होती रहती है.

एक दिन ऐसे ही मे पड़ोसी के लंबे चौड़े चबूतरे पर पीपल के पेड़ के नीचे अपनी शर्ट उतार कर उसकी चारपाई पर बैठा अपना पसीना सुखा रहा था, पड़ोसी अपनी बेटी को लेकर वहीं चारा कूटने की मशीन लगी थी जिससे गाय भैसो के लिए चारी (ज्वार) के चारे को काट रहा था.

आप में से शायद कुछ लोगों ने चारा काटने की मशीन को देखा हो, यह एक 4-5 फीट दिया का आइरन का कस्टेड व्हील होता है, जिसमें आर्क शेप में दो गन्डासे (शार्प ब्लेड) लगे होते, एक गन्डासे के बाहरी साइड में व्हील की परिधि के पास ही एक लोहे की रोड का हॅंडल फिट रहता है जिसके उपर एक लकड़ी का पाइप जैसा चड़ा देते हैं, जिससे हाथों को तकलीफ़ ना हो और वो स्वतः ही पोज़िशन के हिसाब से घूमता रहे.

हॅंडल को पकड़ कर व्हील को घुमाया जाता है, सेंटर में एक मुँह होता है जिसमें से साबुत चारा डाला जाता है, जो अपनी नियमित गति से गियरिंग सिस्टम की वजह से आगे बढ़ता रहता है और गन्डासे उसे एक़ुआली काटते जाते हैं.

कठोर ज्वार के डंठल काटने में एक आदमी की ताक़त से काम नही चलता जिससे दोनो साइड में ऑपोसिट खड़े होकर दो आदमी उस व्हील को घुमाते हैं तब वो काटता है.

बाप चारे को मशीन के मुँह में डाल रहा था, और लड़की उस व्हील को घुमाने में लगी थी जो उसके लिए मुश्किल पड़ रहा था.

मीरा नाम की वो लड़की मेरे से 3 साल छोटी 18-19 साल की गोरी-चिटी 5’4” की हाइट इकहरे बदन की जिसकी 32 की चुचिया, पतली कमर, लगभग 32 के ही कूल्हे, कुल मिलाकर एक नयी-2 जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाली एक आवरेज लड़की थी. गोल चेहरा, आँखें कुछ गोल-गोल सी थी.

चारा लगा के उसके बापू भी उसकी मदद करने व्हील पर लग जाते लेकिन उसमें उनका काम सही से नही हो पा रहा था.

मे अभी चारपाई पर बैठा ही था कि वो काका बोले, मे उस पड़ोसी को काका बोलता था- अरे अरुण ! बेटा थोड़ा हमारी मदद कर दे, मीरा से अकेले मशीन चल नही पा रही.

मे जब से लौटा था तभी से वो मीरा मुझे अजीब सी नज़रों से देखती थी.. मुझे भी उसकी नज़रों का अंदाज़ा था लेकिन ज़्यादा तबज्ज़ो नही देता था.

जब मे उसके सामने जाके उसके साथ मशीन खींचने में लग तो उसका ध्यान मेरी ओर हो गया मशीन खींचने की वजाय, और उसकी वजह से पूरी ताक़त मुझे ही लगानी पड़ रही थी.

मैने उसको झिड़का, क्यों री मीरा बड़ी चालू है तू…, पूरा मुझसे ही ज़ोर लगवा रही है, तो वो फुफूसाकर बोली ज़्यादा ज़ोर तो आदमी को ही लगाना पड़ता है ना और इतना कह कर उसने मेरे हाथों के उपर अपने हाथ रख दिए.

मैने भी अपने हाथ उसके हाथों के नीचे से निकाल कर उसकी उंगली में नोंच लिया, ये सब करते-2 काम भी साथ-2 होता जा रहा था. उसके बापू का ध्यान चारा डालने में ही था.

अब वो हॅंडल के नज़दीक आके मशीन चलाने लगी थी जिससे जब भी हॅंडल उसकी तरफ जाता तो मेरे हाथ उसकी मुलायम चुचियों से टच हो जाते.

मैने सोचा ये तो बड़ी चालू लौंडिया है, साली से बचके रहना होगा कहीं अपना ही बलात्कार ना कर्दे.

खैर जैसे-तैसे करके मैने उसका चारा कुटवा दिया, हम दोनो ही हाफने लगे थे, क्योंकि पूरी ताक़त लगानी पड़ती है मशीन खींचने में, यह एक तरह की एक्सर्साइज़ भी है, जो मुकलेस को मजबूत करती है.

हम दोनो ही चारपाई पर आकर बैठ गये, उसके बापू मशीन के नीचे से कुटा हुआ चारा निकालने में लग गये. मे पैर नीचे लटका के चारपाई पर लेट गया,

वो चारपाई पर पैर रख के घुटने मोड़ कर बैठ गयी मेरे बाजू में.

मे- मीरा ! तू तो बहुत चालू है, बेह्न्चोद पूरी ताक़त मेरे से ही लगवा दी.

वो- हुउन्न्ं… जैसे मैने कुछ नही क्या .. हीन्न्न..!

मे- तू तो उल्टा मेरे को परेशान और कर रही थी…!

वो- मेरे नंगे बदन पर चुटकी काटते हुए.. अच्छा !! झुटे कहीं के..!

मे- अच्छा साली ये बदमाशी…? और मैने उसकी जाँघ को सलवार के उपर से ही जोरे से कचोट दिया..

वो- आययईीीई… मुम्मि…,

उसका बापू हमें देख कर बोला- क्या हुआ ?

वो- कुछ नही बापू.. कोई चींटी थी शायद..!

ओ तेरी का…! ये तो साली बहुत चालू है..., कैसे अपने बाप को ही घुमा दिया..

मे उठने को हुआ तो वो मेरा कंधा पकड़ कर फिर से लिटाते हुए बोली - अरे अरुण बाबू ढंग से पसीना तो सूखने दो..! कहाँ तुम्हारे लिए भैंस बैठी है जिसका दूध निकालना है तुम्हें ?

मे- एक भैंस से बचने के लिए उठना ही पड़ेगा यहाँ से, पता लगा कहीं वो अपना ही दूध निकलवाने को ना कहने लगे..!!

वो मेरी छाती पर हाथ रख कर दबाते हुए बोली – भैंस किसको बोला हैन्न..? मे भैंस दिखती हूँ तुम्हें…? हैन्न.. बोलो..!

ये करते-2 हँसती भी जा रही थी… और हां !क्या बोले..? में अपना दूध तुमसे निकल वाउन्गी..? क्यों ? शक्ल देखी है कभी शीशे में..? बड़े आए… दूध निकल वाउन्गी मे इनसे. दूध निकालना आता भी है या ऐसे ही पहाड़ हो रहे हो ?

मे- आता तो है..! तू कहे तो मे तेरा भी निकाल सकता हूँ, और इधर-उधर देख कर उसका एक बोबा मसल दिया…!

वो- हाईए…! राम… क्या करते हो ? पागल हो क्या..? कोई देख लेता तो..?

मे- चल कहीं ! निकाल के दिखूं..! बोल निकलवाना है अपना दूध..?

थोड़ा अंधेरा सा होता जेया रहा था, हम दो ही वहाँ बैठे थे, उसके बापू भी घर के अंदर जा चुके थे.

वो- कैसे निकालते हो ..? मैने उसे अपनी ओर खींच लिया और गॉड में बैठके उसकी दोनो मुलायम गोल-2 चुचियों को मुट्ठी में भरके दबा दिया…!

वो एकदम गन्गना गयी… और सिसकारी भरती हुई बोली… नही यहाँ नही…,

तो मैने उसकी चूत को मुट्ठी में भर कर भींचते हुए कहा- बोल कहाँ निकलवाएगी ? जहाँ कहेगी वहीं निकाल दूँगा.

जहाँ मशीन लगी थी उसके ठीक बगल में एक कच्चा बड़ा सा उसका कमरा था.

वो बोली- सुबह 4 बजे से में जानवरों को चारा डालने आती हूँ, तो उस टाइम तुम इस कमरे में आ जाना. बोलो आओगे..?

मे- कभी पहले निकलवा चुकी है अपना दूध किसी से.

वो- ये तो एक दो बार दबा दिए हैं हमारे दूध वाले ने, उससे ज़्यादा कुछ नही हुआ.

इसका मज़ा नही लिया अभी तक ? मैने उसकी चूत पर हाथ फेरते हुए कहा..

तो उसने अपनी जंघें भींचते हुए ना में गर्दन हिला दी और झुरजुरी सी लेती हुई उठ गयी, अपनी मुन्डी नीची करके मुस्कराती हुई घर के अंदर भाग गयी…..!

मैने अलार्म . में 3:45 आम का अलार्म भरा और सो गया लेकिन पता नही क्या हुआ ? साला अलार्म नही बजा और जब मेरी नींद अपने समय से खुली तो 4:30 हो चुके थे, मे लपक के उठा और सीधा उसके उस कच्चे कमरे में पहुँचा,

 
दरवाजा खुला हुआ था, अंदर झपाझप अंधेरा था हाथ को हाथ सुझाई नही दे रहा था, जब साला दिन के उजाले में अंधेरा रहता था इस कमरे में तो अभी तो रात थी.

मैने हल्के से लकड़ी के दवाजे को सांकल से बजाया, तो थोड़ी देर के बाद मेरे पीछे से आवाज़ आई..

अब आए हो..! मे कब से इंतजार कर रही थी. मैने कहा यार साला अलार्म ही नही बजा मे क्या करता.

हम दोनो अंदर आ गये, और अंधेरे में टटोलते हुए वहाँ पड़ी एक बड़ी सी चारपाई पर बैठ गये, दिख तो कुछ नही रहा था बस हाथों की आँखों से काम चलाना था सो जकड लिया उसे अपनी गोद में और अपना मुँह उसके बालों से होते हुए, उसके कान को जीभ से चाटा और फिर उसके गाल को काट लिया.

उसके मुँह से हल्की सी चीख निकल गयी और सरसराती हुई आवाज़ में नाराज़गी दिखाते हुए बोली- जंगली हो क्या बिल्कुल. काटते क्यों हो ? दाँतों के निशान बन गये तो क्या जबाब देंगे किसी को ?

मे- अरे मेरी जान तेरे ये माल पुआ जैसे गाल हैं ही ऐसे की काटने का मन किया सो काट लिया. गेट बंद कर दिया तुमने ?

वो- नही तो ! गेट बंद करने की क्या ज़रूरत है.. यहाँ कॉन देखने वाला है हमें.

मे- अगर किसी ने निकलते करते अपनी बातें सुन ली तो..! जा गेट बंद कर दे, वो उठी और गेट बंद करके अंदाज़े से आके फिर मेरी गोद में बैठ गयी.

मीरा तू तो इतनी जल्दी पट गयी री, तैयार ही बैठी थी क्या..?

वो- कितने दिनो से इंतजार कर रही हूँ अपने दिल की बात बोलने को ? मुझे तुम बचपन से ही अच्छे लगते थे. कल मौका मिला तो कैसे जाने देती ?

मे- ऐसा क्या ? और फिर मैने उसे अपने एक बाजू के उपर लिटाके उसके होठों का चुंबन ले लिया, गाँव में लड़कियों को चुंबन-वुम्बन लेने का पता ही नही होता तो उसने अपना मुँह हाथ से पोंच्छा, और बोली-मेरा मुँह क्यों झूठा करते हो.

तू तो बिल्कुल अनाड़ी है री..! मे बोला- देख इसमें कितना मज़ा आता है और मैने उसके दोनो होठों को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा, कुछ देर तो उसने छुड़ाने की कोशिश की लेकिन कुछ ही देर में उसके बदन में सुरसूराहट होने लगी, अब तो वो भी मेरे होठों को मेरी तरह ही चूसने लगी.

मेरे दोनो हाथ उसकी चुचियों को सहला रहे थे, नीचे मेरा लंड उसकी गान्ड की गर्मी पा कर सर उठाने लगा था, कुछ ही देर में अकड़ कर उसकी गान्ड की दरार में ठोकर लगाने लगा.

मीरा मज़े में आ चुकी थी, मैने उसकी कुर्ता को उतार दिया, वो ब्रा नही पहने थी, बिना ब्रा के ही उसके गोल-मटोल इलाहाबादी अमरूद एक दम सुडौल थे, मैने अपना मुँह नीचे करके उसके एक बोबे को मुँह में भर लिया, दूसरे को एक हाथ में पकड़ कर उसके चुचक को उमेठ दिया.

उसकी कमर हवा में उठ गयी और मुँह से एक लंबी सी सिसकी निकल पड़ी..

सस्सिईईई…आअहह…उउफ़फ्फ़…हाए रामम्म…मारीइ रीए…ये क्याअ..ह..हहूओ..राहहा…हाई..मुझहहीए.. ओ माआ..उऊहह..

मेरे एक हाथ ने उसकी सलवार का नाडा भी खोल दिया, नीचे वो पैंटी भी नही पहने थी..

अब मेरे मुँह में उसकी एक चुचि थी, एक हाथ दूसरी चुचि पर, दूसरा हाथ उसकी चूत को सहला रहा था, नीचे गान्ड की दरार में मेरा पप्पू ठोकरें लगा रहा था. मज़े के मारे उसका बदन बार-2 कंपकंपा रहा था, उसके पूरे शरीर में जैसे लहरें उठ रही हों, चूत एक दम लिसलिसा गयी उसकी.

जेसे ही मेरी एक उंगली ने उसके कंचे को कुरेदा जो चोंच बाहर निकाले अकड़ रहा था कि उसकी कमर मेरी गोद से 6” उपर उठी और एक लंबी हुंकार सी भरती हुई झड़ने लगी.

मेरा हाथ उसके चूत रस से भीग गया, जिसे मैने उसके मुँह पर रख दिया, पहले तो उसे अंधेरे में कुछ पता नही चला लेकिन जा उसका टेस्ट उसकी जीभ पे लगा तो वो उसे चाटने लगी.

मे- पूरा अकेले ही स्वाद ले लेगी, थोड़ा मुझे भी लेने दे ना, …

वो- किस चीज़ का स्वाद था, बड़ा ही अच्छा था..

मे- तेरी चूत के रस का.., तो वो चोंक गयी और बोली…

वो- छी कितने गंदे हो तुम, मेरा ही पेसाब चटवा दिया..

मे- तेरी माँ को चोदु, भोसड़ा की तुझे ये पेसाब जैसा लगा..? ये तेरा अपना ही अमृत है, देख मे भी चाट रहा हूँ. इससे ताक़त मिलती है समझी..

फिर मैने उसकी सलवार को भी उतार फेंका और अपना पाजामा और अंडरवेर निकाल के उसे चारपाई पर लिटा दिया.

गान्ड के नीचे कुछ दरी सी रखी थी चारपाई पर, तो उसको तह बना कर रख दिया जिससे उसकी गान्ड थोड़ी उपर उठ गयी और उसकी टांगे चौड़ी करके अपने लंड को उसकी लिसलीसी चूत पर दो-तीन बार घिसा.

मेरा लंड लट्ठ की तरह अकड़ गया था. मैने उसका हाथ पकड़ के उसके हाथ में पकड़ा दिया, जैसे ही उसने मेरे लंड को हाथ में पकड़ा और थोड़ा सहला के देखा, वो डरी सी आवाज़ में बोली- हाई..दैयाआ… इतना बड़ाअ…? कैसे जाएगा..ये मेरे अंदर.. मर जाउन्गी… मुझे नही लेना .. छोड़ो मुझे..

मे- मैने उसके कंधो को दोनो हाथों से दबा रखा था, और बोला- अरे मेरी जान ये देखने में ही बड़ा लग रहा है, जब अंदर जाता है ना तो पिचक कर पतला हो जाता है, तुझे पता भी नही चलेगा कि कब घुस गया तेरी सुरंग में, तू देखती जा.

वो- तुम झूठ बोल रहे हो मैने उसे पूरा दम लगा कर दबाया तो भी नही दबा… ज़रूर फट जाएगी मेरी तो..!

मैने कहा- क्या फट जाएगी तेरी..? बता..बकवास कर रही है.. चुप चाप लेटी रह अब..

वो अभी कुछ बोल भी नही पाई थी कि मैने थोड़ा धक्का लगा दिया, जिससे मेरा सुपाडा उसकी चूत में सेट होगया और साथ ही एक-डेढ़ इंच तक जाके फँस गया, इतने में ही उसकी चीख निकल गयी.

मैने उसके मुँह पर अपना हाथ रख दिया और उसके कान में फुसफुसाकर कहा-

साली तब तो अपनी चूत उठाए मेरे पीछे पड़ी थी, अब क्या पूरे गाँव को बताना चाहती है, कि मे चूत फटवा रही हूँ आ जाओ सब लोग देखो.

वो- रोती हुई…बोली - बहुत दर्द हो रहा है, प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज. मान जाओ.. निकाल लो ना.. बाद में कर लेना.. हें..!!

मे- थोड़ा सा दर्द सहन करले फिर तू खुद लेने के लिए कुदक्की मारेगी.. और उसके मुँह पर अपने होठ रख कर एक करारा सा झटका दिया अपनी गान्ड में, फूच..सी आवाज़ करके उसकी झिल्ली फट गयी.

गरम-2 खून का एहसास मेरे लंड पे हुआ, उसके मुँह से गून-2 की आवाज़ आराही थी. मैने उसकी चुचियों को सहलाना शुरू कर दिया, और 2-3 मिनट वही रुके रहा उसके होंठ चुसते हुए.

उसको मैने तसल्ली दी की बस अब सब कुछ हो गया, अब कोई प्राब्लम की बात नही है.

 
थोड़ी देर में ही उसका दर्द कम हुआ और उसकी कमर में थिरकन होने लगी, मैने धीरे-2 अपने 3/4 लंड को 1/2 तक खींचा तो वो सिसक उठी, फिर से अंदर कर दिया उतना ही तो उसके मुँह से हाईए.. निकली, ऐसे ही धीरे-2 अंदर बाहर करता रहा 3/4 चौथाई लंड को.

कुच्छ ही धक्कों में उसको मज़ा आने लगा, अब उसकी कराहें सिसकियों में बदलने लगी थी. वो अभी यही समझ रही थी कि मेरा लंड पूरा उसकी चूत के अंदर है,

जब उसको ज़यादा मज़ा आने लगा और वो भी नीचे से अपनी कमर उठाने लगी तो सही मौका देख मैने एक और लास्ट सुलेमानी धक्का उसकी चूत में मार दिया,

मज़े में फँसी वो चीख तो नही पाई पर मज़े की कराह उसके मुँह से निकल गयी और बोली -.. आईईई… और कितना डालोगे…?

मे- बस लास्ट हो गया मेरी रानी, देख मेरे टटटे भी तेरी चौखट पे अड़ गये. मेरी बात सुनके उसकी हँसी छूट गयी और अपना दर्द भूल गयी.

बस देखते-2 मैने अपने घोड़े को उसकी कीचड़ भरी नयी-2 बनी कच्ची सड़क पर दौड़ा दिया, वो कुछ देर तो हाए-2 करती रही, पर थोड़ी ही देर में जब उसकी सड़क थोड़ी सेट हुई, संभाल लिया मेरे घोड़े को उसने.

सुबह-2 के ठंडे मौसम में भी हम पसीने से लथपथ थे, वो भी बहुत गरम लौंडिया थी, मेरे घोड़े की टॅपो को आराम से झेलती रही, और जब घोड़े को मंज़िल मिली तब तक वो अपनी कच्ची सड़क पर कई बार छिड़काव कर चुकी थी.

हम दोनो एक दूसरे को जकड़े हुए, आधे घंटे तक पड़े रहे, जब उसका फाटक खुलने की आवाज़ आई, तो उसने मुझे धक्का दिया और अपने उपर से धकेला.

झटपट कपड़े पहने और मुझे थोड़ी देर वही रुकने को बोल कर बाहर निकल गयी.

उसकी माँ शौच के लिए निकली थी, जब वो कमरे से बाहर आई तभी उसकी माँ भी फाटक खोल के बाहर निकली हाथ में लोटा लिए हुए.

मीरा की माँ- क्यों री तबसे भैसो को चारा ही डाल रही है ?

वो- दूसरी बार डाला है, पहली बार डालके थोड़ा कमरे में ही लेट गयी थी, अब डालके सानी लगाने वाली हूँ (सानी:- अनाज को मोटा सा पीस कर उसे पानी में घोल कर जानवरों को चारे के साथ खिलाया जाता है जिससे उनको शक्ति मिलती है और गाय-भैंस दूध ज़्यादा देती हैं, कुछ वेस्टर्न यूपी, हरियाणा, पंजाब के रीडर्स शायद समझ भी रहे होंगे).

मीरा की माँ - ठीक है, जल्दी कर फिर दूध भी निकलवाना है मेरे साथ. इतना बोलकर वो चली गयी शौच के लिए और वो फिर मेरे पास आई और बोली- अरुण तुमने पता नही क्या कर दिया है मेरे यहाँ दर्द हो रहा है.

मे- अरे तेरी चूत नयी-2 फटी है, थोड़ा तो होगा, एक काम कर जल्दी से घर जा कर थोड़ा गुनगुना पानी करके सिकाई जैसी कर ले सब ठीक हो जाएगा.

इतना बोल कर मे अपने खेतों की ओर चल दिया और वो अपने घर के अंदर चली गयी......!!

मीरा रानी की चूत क्या फटी, उसको तो चस्का ही लग गया चुदवाने का.. जब भी मौका लगे खींच ले जाए मेरा हाथ पकड़ के.

पड़ोसी तो थे ही, भाई बहनों में सबसे बड़ी थी वो, उसके दूसरे नंबर की भी एक बेहन ही थी उसके बाद 3 भाई…फिर एक छोटी बेहन और लास्ट में एक और भाई. कुल मिला कर 7 भाई बेहन थे वो.

उसके दूसरे नंबर की बेहन ही उसकी थोड़ी समझदार थी वाकियों के तो सामने ही छेड़ छाड़ करते रहते थे,

जैसे की मे चारपाई पर लेता हूँ वो मेरे बगल में नीचे पैर लटका कर बैठ जाती, मे उसकी चुन्नी के पीछे उसकी चुचियों को मसलता रहता, वो मुँह ही मुँह में सिसक पड़ती.

कभी-2 तो उन बच्चों के सामने ही उसकी सलवार का नाडा खोलकर कुर्ता में हाथ डालकर उसकी चूत में उंगली करता रहता और बैठे-2 ही उसका पानी निकाल देता बड़ा मज़ा लेती रहती वो, बहुत डेरिंग थी उसमें.

कभी-2 खेतों में ही हम चुदाई कर लेते थे.

ऐसे ही समय व्यतीत होता रहा, सावन का महीना था, मीरा के मामा की लड़की जिसका नाम अंजलि था, आई हुई थी अपनी बुआ के घर.

लंबी छरहरि हल्के साँवले रंग की गोल चेहरा, मस्त चुचियाँ, एकदम सतर खड़ी आगे को नोक निकाले, मानो बड़े-बड़े दो लट्टू (घूमने वाले) नयी-2 ताज़ा-2 जवान नाम था अंजलि.

मीरा से भी बड़ी थी उसकी चुचियाँ, लेकिन उससे ज़्यादा रसीली. पतली कमर उसके नीचे गोल-2 हल्की उभरी हुई गान्ड का उठान. एकदम मस्त लगी मुझे.

मे भी मीरा की चुदाई करते-2 ज़्यादातर गरम ही रहता था, सो उसको पहली बार देखते ही मेरा लॉडा खूँटा तोड़के फनफनाने लगा, जैसे कह रहा हो कि ये चोदनी है, इसकी चूत चाहिए मुझे.

अब मे तो आजकल लौडे के वशीभूत हो चुका था सो उसे हाथ से सहलाते हुए पूछकर कर बोला.. सबर कर मेरे शेर उपरवाले ने चाहा तो ज़रूर मिलेगी.

एक-दो दिन में ही वो लौंडिया ताड़ गयी कि मेरा और मीरा का कोई चक्कर ज़रूर है, खेली खाई थी वो भी, मीरा की तरह नयी-2 चुदास रहती थी शायद उसको भी, सो उसकी नज़र हम दोनो पर ही रहती.

मे भी यही चाहता था कि ये हमें देखे, सो जान बूझकर उसके सामने ही मे मीयर्रा के साथ कोई ना कोई छेड़-छाड़ कर ही देता था.

मैने एक दिन मीरा को बोल ही दिया.. कि मुझे इसको चोदना है, बोल क्या कहती है, तो वो बोली- कैसी बातें करते हो, वो मेरे मामा की लड़की है, मे कैसे कह सकती हूँ उसको..?

मे- तुझे कुछ कहने की ज़रूरत ही नही है, वो खुद ही चुदना चाहती है, तू बस मौका दिलवादे उसके साथ.

वो- क्या बात करते हो..? तुम्हें कैसे लगा कि वो भी करवाना चाहती है..?

मे- अरे मेरी जान ! हम वो हैं जो उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं, और ये चिड़िया तो हमारी डाल पे बैठने के लिए उतावली हो रही है, तू बस मौका दिला फिर देख तुम दोनो को मिला के क्या मज़े कराता हूँ.

एक दिन उसने वो मौका निकल ही लिया..! मुझे इशारा किया कि मे उसे लेकर खेतों पर जा रही हूँ, थोड़ी देर में तुम आ जाओ.

 
उस दिन उसके बापू बाज़ार गये थे बच्चों को कुच्छ किताब-कॉपी और दूसरा त्योहार का समान लेने जाना था, रक्षाबन्धन जो आने वाला था, वो पैदल ही जाते थे तो लगभग पूरा दिन ही निकाल कर आते थे.

उसकी दूसरी बेहन घर पर अपनी माँ की काम काज में मदद के लिए घर पर थी.

मौका अच्छा था, मेरे भी कुछ खेत उसके खेतों के पास थे, कुछ फसल तो नही थी उस समय उनमें, खाली हरी खाद के लिए ऐसा ही कुछ बो दिया था जिसे जोत कर हरी खाद खेतों को मिल सके, फिर भी देखने के बहाने अपने खेतों पर चक्कर लगाने चला गया.

मीरा अपने ज्वर के खेत से चारा काट रही थी और उसके मामा की लड़की झोपड़ी में ही चारपाई पड़ी थी उसपर लेटी थी.

मे सीधा मीरा के पास गया और उसको पकड़ लिया पीछे से, और उसकी चुचियों को उमेठने लगा, वो हड़वाड़ा कर मूडी और नकली गुस्सा दिखाते हुए बोली- क्या करते हो ? कोई आजाएगा.? छोड़ो मुझे..!

मे- थोड़ा उँची आवाज़ में जिससे मेरी आवाज़ झोपड़ी तक पहुँच जाए- अरे रानी कॉन देख रहा है यहाँ, बारिस का मौसम है, किसको पड़ी है जो आएगा यहाँ.

मैने उसके गाल पर काट लिया तो वो हल्की आवाज़ में चिल्लाई.. छोड़ो.. नही मानोगे..अभी बताती हूँ रूको और उसने अपनी दरान्ती फेंकी और मूड के झपट लिया मेरे खड़े लौडे को और मरोडने लगी…!

मेरी सिसकी निकल गयी.. जब सामने नज़र पड़ी तो उसकी मामा की लड़की हमें देख कर हंस रही थी और अपने नीचे के होंठ को दांतो से काट रही थी, मैने मीरा को इशारा किया तो उसने मेरे लंड को छोड़ दिया और झेंप गयी.

अब वो भी हमारे पास आकर खड़ी हो गयी और बोली- कोई नही मीरा लगी रह, ऐसा लंड नसीब वालों को मिलता है, तुझे नही चाहिए तो मुझे दिलवादे, और बेशर्मी से हँसने लगी.

मीरा अवाक खड़ी उसके मुँह की तरफ देख रही थी....

मे- देखा मीरा ! धीरे से उसके कान में कहा- मैने क्या कहा था..? और प्रत्यक्ष मे उस लड़की से बोला- अरे रानी चिंता क्यों करती हो, तुम दोनो ही लेलो इसे, ये दोनो को बराबर मौका देगा.

फिर हम तीनो झोपड़ी में आ गये…मे चारपाई पर बैठ गया और वो दोनो मेरे अगल-बगल में बैठ गयी, मैने जैसे ही उस लौंडिया की चुचि पर हाथ लगाया…. हाईए… क्या मुलायम गद्देदार थी उसकी चुचि, बिना ब्रा के भी एकदम आगे को खड़ी चोंच निकाले हुए.

वो साड़ी ब्लाउज में थी और मीरा सलवार सूट में. ब्लाउस के उपर से ही उसकी चुचि का एहसास मेरे हाथ को ऐसा लगा जैसे मैने कोई वूल का गोला हाथ में ले लिया हो. हाए मेरी छम्मक्छल्लो क्या चुचियाँ हैं तेरी तो, मैने उसको बोला तो वो शर्मा कर मुस्कराने लगी..

अब में मीरा को भूल गया और उसकी पतली कमर में हाथ डालकर अपनी गोद में खींच लिया और पूरे हाथों से उसकी चुचियों को मसल्ने लगा, सच कहता हूँ, इतनी जानदार वेल शेप चुचियाँ मैने आजतक नही देखी थी.

मेरा और कुछ करने का मन ही नही कर रहा था बस मसले जा रहा था, वो सीसियाए जा रही रही थी, अपने हाथ मेरे हाथों के उपर रख कर काँपति आवाज़ में रोक रही थी मुझे..

आअहह… जोरे से नही… दर्द्द्द..होता है…हाईए…नाहहिईिइ…सस्सिईईई….ऊहह…प्लेआस्ीईईई… नहिी..उउफ़फ्फ़…ऊहह….माआ…म्माअरीी.. रीई…हाईए…रामम..

इसी तरह की सिसीक़ियों में डूबी आँखें बंद किए मेरे हाथों को अपनी चुचियों से हटाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसका प्रयास नाम मात्र का था.

मीरा उसके लाल पड़ चुके चेहरे को ही देखे जारही थी और अपनी चुचियों को अपने ही हाथ से मसल्ने लगी.

मुझसे सबर नही हुआ, अब मेरा मन उसकी चुचियों को नंगी देखने का होने लगा सो मैने फटाफट उसके ब्लाउस को उतार फेंका, हड़बड़ी में उसका एकाध बटन भी टूट गया.

नंगी चुचियाँ जैसे ही मेरी आँखों के सामने आई…. ऑम्ग !!! लगा जैसे दो बड़े-2 कुल्हड़ चिपका दिए हों..
(कुल्हड़ समझते हो?-

जी हां वोही जो लालू प्रसाद ने रेलवे में चाइ के लिए लागू किए थे जब वो रेल मंत्री बने थे) ये मलाई वाला दूध पीने वाले जैसे थे.

अभी भी ना समझ आया हो तो कभी मथुरा जाकर रात 9 बजे के बाद किसी हलवाई के यहाँ मलाई वाला दूध पीना, पता लग जाएगा.


लपक के मुँह में भर लिया एक उनमें से और वो चुसाइ की बदल-2 कर कि वो लाल हो कर और ज़्यादा गदरा गये, चुचक कन्चे की तरह कड़क हो गये जिन्हें मैने मसल दिया… उसका मुँह औंत की तरह उपर को हो गया और मुझसे लिपट गयी.
 
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