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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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मेरा लंड साला शाम से ही उसकी वाट लगी पड़ी थी… चोट-पे चोट झेल रहा था.. तो अब फटने जैसी पोज़िशन हो चुकी थी.. बुरी तरह ऐंठन जैसी हो रही थी उसमें.

मैने कहा थोड़ा बाहर को झुक कर अपनी गान्ड तो उठा ले रानी… अब लेना ही है तो पूरा मज़ा ही कर लेते हैं… जो होगा सो देखा जाएगा…

तो उसने पहले अपनी गान्ड उचका कर अपनी पेंटी निकाल कर अपने हॅंड बॅग में रखली.. फिर पीछे से साड़ी और पेटिकोट उठा कर कमर पर रख कर दूसरी साइड को झुक गयी…

अब उसकी चूत दोनो जांघों के बीच से पीछे को उभर आई..

मैने भी अपना पॅंट और अंडरवेर घुटनो तक किया… और अपना एक घुटना उसकी गान्ड के पीछे सेट किया और दूसरी टाँग को उसकी दोनो टाँगों के बीच से निकाल कर उसकी उपर वाली जाँघ को अपनी जाँघ पर रखा…

उसकी चूत किसी फूल की तरह खिल कर मेरे लंड को नियौता दे रही थी..

मैने आव ना देखा ताव.. अपना सुपाडा उसके छेद पर रखा और एक ही झटके में पूरा लंड उसकी गीली चूत में फँसा दिया….

उसके मुँह से चीख निकल गयी… जिसे उसने अपने हाथ से कसकर दबा लिया…

मेरा लंड उसकी चूत में एकदम कस गया था… वो धीरे से फुसफुसाई..

अहह…तुमने तो दम जान ही निकाल दी मेरी… अब आराम से करना… फिर मैने धक्के स्टार्ट किए… कुछ देर में वो भी खुलकर साथ देने लगी…

उसकी चुचियाँ मसल्ते हुए में उसकी चुदाई में लगा हुआ था…

सारी बस में लोगों के खर्राटे गूँज रहे थे… आज शाम से सी आकड़ा हुआ मेरा लंड इतनी आसानी से हार मानने वाला नही था…

उसकी चूत लगातार रस बहाए जा रही थी.. ऐसे साइड को झुके-2 वो थक गयी तो मैने उसे अपनी गोद में बिठा लिया…

अब हमें कोई जागे या सोए… कोई परवाह नही थी.. बस किसी तरह से पानी निकल जाए बस तो चैन पड़े…

आख़िर कार मेरा लंड अपनी मज़िल पा ही गया.. और उसकी चूत को उसने लबालब भर दिया…

वो अबतक दो बार झड चुकी थी… सुकून उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था..

अपने कपड़े वग़ैरह सही करने के बाद थोड़ी देर हमने आपस में बात-चीत की.. वो उतरने वाली थी…उसने अपना अड्रेस भी दिया…और फिर मिलने का वादा करके वो अपनी मंज़िल पर उतर गयी……

मेरी नयी कंपनी में भी वही प्रॉडक्ट था जो मेरी प्रीवियस कंपनी में था, सो मुझे काम समझने की तो कोई प्राब्लम ही नही थी.

हां थोड़ी ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ गयी थी यहाँ आकर, मेरा बॉस एक साउत इंडियन टीएन से जो एक निहायत ही इंटेलिजेंट, काम और कूल माइंड बंदा था,

छोटे से कद का राजशेखरण मेरे उपर बहुत ही भरोसा करने लगा था.

यहाँ भी वर्किंग कल्चर लगभग सेम ही था, फाइनल इनस्पेक्षन के लिए 5-6 पहाड़ी लड़कियाँ थी, एक से एक गोरी-चिटी वही 19-23 साल के बीच की उम्र वाली.

पहाड़ी लड़कियों की चुचियाँ नीबू साइज़ से लेके ज़्यादा से ज़्यादा संतरे के साइज़ की बस इससे ज़यादा रेर्ली किसी की बड़ी हों. हां गान्ड थोड़ी चौड़ी ही मिलेगी, शायद पहाड़ चढ़ते-2 हो जाती होगी.

इनमें से एक लड़की थी शांति, उम्र 22 साल, वहाँ के अट्मॉस्फियर से उलट थोड़ी साँवली और चुचे और गान्ड 36 के, ना जाने कैसे ?

थी वो भी पहाड़ी ही. शांति का झुकाव कुछ दिनो बाद ही मेरी तरफ बढ़ने लगा जिसे मे इग्नोर करता रहा.

प्रोडक्षन में एक लड़का था देव जोशी, जो थोड़ा अध्यात्मवादी था उससे मे थोड़ा घुल मिल गया था, कारण था उसकी शुरुआती मदद जो उसने मेरी की थी घर वग़ैरह सेट करने में.

एक दूसरे जोशी जी के ही घर में मैं एक रूम लेकर रहता था, वो एर फोर्स में थे उनकी 5 बेटियाँ थी, उसके बाद एक बेटा जो मेरे सामने ही पैदा हुआ था.

सबसे बड़ी बेटी उस समय 11थ में ही पढ़ती थी दूसरे नंबर की 9थ में. उसी क्रम में वाकी की सब ….

काफ़ी बड़ा घर था, कई कमरे किराए पर दे रखे थे, ज़्यादातर पढ़नेवाले लड़के और एक डायमंड पॉलिशिंग की छोटी सी वर्कशॉप में काम करनेवाला लड़का था.

मेरा रूम सबसे बाहर की साइड था, जिसका एक गेट ओपन रोड पर खुलता था, सो बहुत दिनो तक तो मेरा उन सभी घर के मेंबर और किरायेदारो से परिचय भी नही हो पाया था.

देव जोशी शाम को ब्रह्माकुमारी आश्रम में जाता था, जब हम और खुलने लगे एक-दूसरे के साथ तो वो अपने अनुभव मेरे साथ शेयर करने लगा.

उसकी बातों से मुझे भी अध्यात्म में जिगयासा पैदा होने लगी और योग-ध्यान की किताबें कसेट्स का कलेक्षन शुरू कर दिया.

किताबों और ऑडियो प्रवचन से प्रेरित होकर मैने ध्यान योग की तरफ टाइम देना शुरू कर दिया और सरल विधि के आधार को लेकर लाइट मेडिटेशन से शुरुआत की जो स्वामी विवेकानंद की बताई हुई पद्यति थी.

“एक बार शिष्य नरेन्द्रा डट (विवेकानंद) ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्णा परमहंस से पुछा, गुरदेव क्या आपने परमात्मा को देखा है ?

जबाब में कुछ देर तो उनके गुरु उनकी ओर देखते रहे फिर वो बोले- हां मैने परमात्मा को देखा है और इतना अच्छे से देखा है, जितना मे तुम्हें भी नही देख सकता.”

उसके आगे उन्होने कोई प्रशण नही किया और जो उनके विवेक ने कहा उसी रास्ते पर वो चल पड़े.

ये लाइन्स यहाँ मैने इसलिए लिखी हैं कि किसी बताए गये सदमार्ग की आलोचना करने की वजाय अगर हम उस पर चलने का प्रयास करें तो शायद हम उसकी अन्भुति कर सकते हैं.

खैर तो मैने वो लाइट मेडिटेशन वाला तरीक़ा अपनाया जो देव को भी उसके आश्रम में बताया गया था.

 
हमारे साथ ही एक हरफन मौला टाइप लड़का था लंबा सा लेकिन पतला, सभी प्रकार के नशे की लत थी उसे. उसको जब मेरे ध्यान के बारे में पता लगा तो वो मुझे चेलेंज करने लगा कि आप भांग-गांजे के नशे में भी ध्यान लगा सकें तब हम जानें कि आपका ध्यान पक्का है.

वैसे तो मुझे किसी से कोई फ़र्क नही पड़ने वाला था कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है, पर कुछ बातें समय के हिसाब से या जो होना होता है..

मैने उसका चॅलेंज आक्सेप्ट कर लिया और उन चीज़ों का सेवन शुरू कर दिया, धीरे-2 मुझे नशे की आदत पड़ने लगी, लेकिन उससे मेरे ध्यान में कोई अंतर नही आया, उल्टा और गहरा होने लगा.

लेकिन एक ग़लत लत लग चुकी थी जो अब आदत बनती जा रही थी. पर इतना ज़रूर सुनिश्चित रखा कि वो चीज़ें प्राकृतिक ही हों.

ध्यान और ब्रह्मचर्य से मेरी ज्ञानइंद्रियों की क्षमता बढ़ती जा रही थी, ऐसा मुझे महसूस होने लगा,

जब भी मे थोड़ा विचलित होता किसी भी कारण से तो मध्य रात्रि के बाद त्राटक ध्यान में बैठ जाता और मेरा आत्मबल लौटने लगता जिससे सारी मन की चंचलता मिट जाती और वैचैनि दूर हो जाती.

एक दिन मन किया कि चलो कुछ मनोरंजन कर लिया जाए, वैसे तो मेरा घर शहर की भीड़ भाड़ से दूर बाहरी इलाक़े में था, लेकिन कोई कार्यवश ही शहर जाना होता था,

एक अच्छी परिवारिक मूवी लगी थी तो देखने का विचार हो गया, शायद एक या दो ही हॉल थे उस समय उस शहर में.

मैं चॉक में जो सिनिमा हॉल था उसमें थी वो मूवी, मे टिकेट लेकर टाय्लेट की तरफ जा रहा था, तभी मेरे कानों में कुछ ऐसी आवाज़ें सुनाई दी जो असम्बेदन्शील थी,

अब ये चाहो तो ज्ञानइंद्रियों की शक्ति बढ़ गयी हो या कुछ अनहोनी से बचाने का नियती का प्रायोजन कह लो,...

मे उन आवाज़ों की तरफ गया तो चार व्यक्ति टाय्लेट के पीछे की साइड में खड़े बातें कर रहे थे.

मुझे सच में ये अचंभा हुआ कि कोई व्यक्ति इतनी दूर की आवाज़ें इतनी सुगमता से कैसे सुन सकता है..? लेकिन मैने सुन ली थी.

वो चारों कुछ बॉम्ब ब्लास्ट करने के बारे में बातें कर रहे थे.

उनकी बातें सुन कर मेरे तिर्पन काँप गये, कहीं ये इसी हॉल को उड़ाने की बात तो नही कर रहे..? हे ईश्वर अगर ऐसा हो गया तो पता नही कितनी जानें जाएँगी.

मैने बाहर आकर इधर-उधर नज़र दौड़ाई इस आशा में कि शायद कोई पोलीस वाला दिखाई दे जाए तो उससे इनफॉर्म कर दूं. लेकिन दुर्भगयवस कोई नही दिखा.

अब करूँ तो क्या करूँ..? सच पुछो तो बॉम्ब का नाम ही इतना घातक है कि सुनते ही रूह फ़ना हो जाए. मरता क्या ना करता वाली बात.. खुद ही कूदने का फ़ैसला ले लिया और उन लोगों की तरफ चल दिया.

जैसे ही उधर पहुँचा…! ये क्या..? ये साले नर्पिशाच कहाँ गायब हो गये.. ? अब क्या करूँ..?

मे किन्कर्तव्य विमुड सा वहीं खड़ा रह गया...! फिर कुछ सोच कर कि यहाँ खड़े रहने से कुछ नही होगा मुझे कुछ तो करना होगा..?

मे मुड़कर हॉल के एंट्रेन्स की तरफ बढ़ा दूसरे लोग एंटर होना शुरू हो गये थे पहले वाला शो छूटने के बाद.

अब मेरी बैचैनि बढ़ने लगी थी, अंदर जाउ या नही जाउ, समस्या ये थी कि अगर ये बात में किसी ऐरे-गैरे हॉल के कर्मचारी को बताता हूँ, उसने मेरी बात का भरोसा किया नही किया..?

और ये भी कह सकता है कि में जानबूझकर किसी के कहने से हॉल को बदनाम करने या पब्लिसिटी स्टंट कर रहा हूँ तो खम्खा समय बर्बाद होगा और करने वाले अपना काम करके निकल चुके होंगे.. !

यही सब उधेड़बुन में मे खड़ा था कि तभी मेरी नज़र उनमें से दो लोगों पर पड़ी, वो हाथ में एक छोटा सा हॅंड बॅग लिए हॉल में एंटर कर रहे थे.

मे फ़ौरन उनकी ओर लपका, लेकिन जब तक में उन तक पहुँच पता वो अंदर घुस चुके थे.

उनपर नज़र बनाए हुए में भी अंदर बढ़ता चला गया. हॉल में रोशनी मामूली थी, लेकिन मेरी आँखें सॉफ-सॉफ उन्हें देखने में सक्षम थी.

वो मैं गॅलरी में ही थे कि मे लोगों से बचता बचाता उनके पास और पास होता जा रहा था. इससे पहले कि वो अपनी रो की तरफ मुड़ते मैने पीछे से लपक कर दोनो की गर्दन अपने दोनो हाथों की मजबूत पकड़ में लेली......

अब वो दोनो चाह कर भी अपनी -2 गर्दन पीछे घुमा नही सकते थे.

मेरे हाथों में ना जाने कहाँ से इतनी मजबूती आ गयी, मेरे शरीर की पूरी शक्ति जैसे मेरे हाथों में आ गई हो.

मैने अपने हाथों के जोरे से ही पीछे घूमने पर उन्हें मजबूर कर दिया और बाहर की ओर ले चला.

मैने अपनी दोनो बाहें उन दोनो के गले में लपेट दी और दोनो हाथों के अंगूठे सीधे खड़े करके उनके गले के कौए (तेंटुवे) की सीध में कर दिए और उनके कदम से कदम मिला कर चलते हुए उन दोनो के कानों में सर्द लहजे में फुसफुसाया-

तुम लोग मेरे हाथों की पकड़ से ही समझ चुके होगे कि मे तुम लोगों का क्या हश्र कर सकता हूँ, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में हैं कि तुम चुपचाप मेरे साथ बाहर की ओर चलो.

इस समय हम तीनों ऐसे चल रहे थे मानो तीन जिगरी चल रहे हों, जिनके कंधे पर मेरे हाथ रखे हों.

उनमें से एक बोला- तुम हो कॉन और हमें बाहर क्यों ले जाना चाहते हो..?

मे- मुझे पता है कि तुम यहाँ क्या करने वाले हो और इस बॅग में क्या है..? अगर मैने तुम्हें इस पब्लिक के हवाले कर दिया तो तुम लोग समझ सकते हो कि क्या हश्र होगा तुम्हारा,

ये पब्लिक 50-50ग्राम बाँट के ले जाएँगे तुम दोनो की बॉडी को. और हां मेरे अंगूठे देख रहे हो..? ज़रा भी चालाकी दिखाने की कोशिश की तो विश्वास करो ये किसी चाकू से कम काम नही करेंगे, सेकेंड्स से पहले तुम्हारे तेंटुवे अंदर घुस चुके होंगे, इसलिए चुप-चाप चलते रहो…

 
उन्हें स्थिति का भान हो चुका था इसलिए वो चुप चाप मेरे साथ बाहर तक आ गये, देखने वाले यही समझ रहे थे कि दोस्त होंगे.

बाहर आकर मैने कहा- अब बताओ जैल जाना चाहोगे या अपनी जान बचना चाहोगे..?

उनमें से एक बोला- देखो हमें छोड़ दो, वादा करते हैं अब हम ऐसा कुछ नही करेंगे और ये शहर अभी छोड़ कर चले जाएँगे.

मे भी तो यही कर रहा हूँ मैने कहा- लेकिन मुझे तुम लोगों पर भरोसा नही है, इसलिए खुद तुम लोगो के साथ शहर से बाहर तक चल कर छोड़ने जाउन्गा, ताकि तुम फिर कोई वारदात यहाँ ना करो…

मैने उनसे अगला सवाल किया – तुम लोग यहाँ कैसे आए थे बोलो..

वो- अपनी बाइक से, मैने कहा कहाँ है चलो वहाँ तक, तो वो इसी पोज़िशन में मेरे साथ हॉल के पीछे खड़ी बाइक तक आए.

ये एक याज़डी 250 मोटर साइकल थी, मैने अपनी पोज़िशन चेंज करके फिर से उनके पीछे से गले पकड़ कर दबा दिए और दोनो को आगे बिठाया बॅग के साथ और खुद सबसे पीछे बैठ गया.

उसने बाइक स्टार्ट की और चल दिए शहर से बाहर जाने वाले रोड पर.

रास्ते में मैने उनसे पुछा- किस तरह का बॉम्ब है ये..?

वो- टाइमर वाला,

मे- कितना टाइम सेट किया है..?

वो- एक घंटे का जिसमें से लगभग 40 मिनट निकल चुके हैं, हमारा प्लान था कि मूवी शुरू होने के 20-25 मिनट्स के बाद ही फटे, हम इससे अपने सीट के नीचे छोड़ कर आने वाले थे.

मे- जल्दी चलो हमें 15 मिनट में जंगल तक पहुँचना है.

उस रोड पर एक बहुत ही घना जंगल है जो मैं सिटी से कोई 20किमी दूर है, जंगल इतना घना और ख़तरनाक है, कि 7 बजे के बाद उससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद कर दिया जाता है और सुबह के 6 बजे ही शुरू होता है.

इश्स समय सबा तीन बजे थे… शहर छोड़ते ही उसने बाइक की स्पीड बढ़ा दी क्योंकि अब उन्हें अपनी जान की भी परवाह होने लगी थी.

आदमी कितना ही बड़ा राक्षस क्यों ना हो खुद की मौत से सबको डर लगता है,

घने जंगल में पहुँचते ही मैने बाइक रोकने को कहा, और साइड में खड़ा करके जंगल के अंदर चलने को कहा, मैने फिर से उनके गले कब्ज़े में ले रखे थे,

रोड से कोई 100 मीटर अंदर जाकर मैने अप्रत्याशित रूप से उन दोनो के सिर एक मोटे से पेड़ के तने पर दे मारे, उन दोनो के सर फट गये, और वो धडाम से वहीं गिर पड़े.

उनके गिरते ही मैने फटाफट उनके कान के पीछे की नस जो नर्वस सिस्टम को कंट्रोल करती है दबा दी जिससे ये अश्यूर हो गया कि अब वो पलट कर मुझ पर अटॅक नही कर सकते.

मैने बॅग से बॉम्ब निकाला, उसकी एमर्जेन्सी लाइट ऑन हो चुकी थी, उसके सेट टाइम में अब मात्र चन्द सेकेंड्स ही बचे थे, फ़ौरन वो उन दोनो की बॉडी के बीच रखा और पूरी शक्ति से दौड़ लगा दी…..

अभी मे रोड तक पहुँच भी नही पाया था कि भडाम….

एक जबर्जस्त धमाका हुआ, उस धमाके की इंटेन्सिटी इतनी ज़्यादा थी कि 100 मीटर दूर पर भी मेरा शरीर हिल गया उसके झटके से मे उच्छल कर एक पेड़ से जा टकराया…

मेरी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया और मे कुछ समय के लिए ही सही अपनी चेतना खो बैठा.

दो मिनट में ही मैने अपने आप को संभाला, ब्लास्ट की दिशा में देखा तो एक दो पेड़ भी उखड़ कर गिर गये थे, कुछ तो बीच से टूट ही गये थे.

मैने आँखें बंद करके उपरवाले का धन्याबाद किया, अगर ये धमाका हॉल के अंदर हो जाता तो..? सोचकर ही मेरी रूह काँप गयी.

मे बाइक के पास आया, स्टार्ट की और शहर की ओर दौड़ा दी.

15 मिनट बाद ही मैने वो बाइक वही खड़ी करदी और वहाँ से हट कर पास के रेस्टोरेंट में बैठ गया बाइक पर नज़र रखे हुए.

मूवी अभी ख़तम नही हुई थी, कोई 15 मिनट ही हुए होंगे कि वो दोनो जो उनके साथ टाय्लेट के पीछे बात-चीत करते देखे थे मैने, बाइक की तरफ आते दिखाई दिए.

उन्होने इधर-उधर नज़र दौड़ाई कुछ देर. मे समझ गया कि वो अपने उन दोनो साथियों को देख रहे होंगे.

जब कुछ देर और उन्हें वो दोनो नही दिखे तो वो खड़ी बाइक की सीट पर ही बैठ गये और उनका इंतजार करने लगे.

मे लंबे-2 डॅग बढ़ा कर अचानक से उनके पीछे से प्रगट होकर बोला- अपने दोस्तों की राह देख रहे हो जो हॉल में बॉम्ब रखने वाले थे..?

वो एकदम चोन्के गये और मेरे मुँह की तरफ देखने लगे.

मे- क्या देख रहे हो..? उनका प्लान फैल हो गया…! शुक्र करो कि में टाइम पर पहुँच कर उनको सुरक्षित निकल लेगया वरना अभी तक तो तुम लोग भी पोलीस हिरासत में होते..!

एक – लेकिन तुम कॉन हो..? और तुमने उन दोनो को क्यों बचाया..?

मे- क्यों ! नही बचाना चाहिए था..?

दूसरा - नही..नही.. इसका कहने का मतलब है कि तुम्हारा क्या फ़ायदा इसमें जो तुमने ये सब किया हमारे लिए...?

मे- मेरा नाम सलीम है, मुझे इस शहर ही नही इस देश के क़ानून से ही नफ़रत है, जिसकी वजह से आज मे अनाथों जैसा जीवन जीने को मज़बूर हूँ.

अभी तुम लोग बस इतना समझ लो, कि जो तुम करनेवाले थे उससे भी बड़ा धमाका होगा लेकिन बेकसूर लोगों की जानें लेकर नही, इस प्रशासन की नाक में नकेल डाल कर. आज ही हम कोतवाली को उड़ाएंगे.

तुम लोग मेरे साथ चलो, वो लोग पब्लिक की नज़र में आ चुके हैं, इसलिए मैने जहाँ उन्हें भेजा है वहाँ वो तुम लोगों का इंतजार कर रहे हैं, जल्दी करो हमारे पास समय नही है.

वो लोग मेरी बातों में फँस गये और उसी बाइक से फिर हम तीनों उसी जंगल में पहुँच गये, बाइक को किनारे खड़ी करके मैने उन्हें जंगल के अंदर चलने को कहा तो उनमें से एक बोला.

यहाँ जंगल में क्यों आए हैं वो लोग..?

मे - मैने उन्हें यहीं पर पहुँचने के लिए बोला था, चूँकि शहर में उन लोगों पर पोलीस को शक़ हो गया है..

अब जो भी प्लान तैयार करना है यहीं बैठ कर करेंगे.

उनमें से एक ने फिर पुछा- लेकिन वो लोग हैं कहाँ..?

मैने उस पहले वाली जगह से ऑपोसिट साइड में इशारा करके कहा- वो लोग इधर ही होंगे, हो सकता है थोड़ा अंदर जाकर बैठे होंगे.

जब हम जंगल के अंदर कोई 150 मीटर तक चले गये तो वो फिर से बोला- वो लोग तो कहीं दिखाई नही दे रहे ? कहीं तुम हमारे साथ कोई चाल तो नही चल रहे..?

मे- तुमने ठीक समझा…! तुम लोग मेरे जाल में फँस चुके हो और जल्दी ही तुम्हें भी उन दोनो के पास भेज दूँगा.

उनमें से एक ने फ़ौरन अपनी गन निकाल ली और मेरे उपर तान दी..,

सेकेंड के सौवें हिस्से में मेरी छटी इंद्री जाग गयी, अब मेरी नज़र उसकी गन की नाल की पोज़िशन और उसके ट्रिग्गर पर टिकी थी.

वो गन लहराते हुए बोला- बता उन दोनो के साथ तूने क्या किया..?

मे- देख उधर धुआँ दिख रहा है..? मैने उधर इशारा करके कहा, तो फ़ौरन उन दोनो की नज़र उस दिशा में घूम गयी.

वो दोनो उसी जगह पर अपने बॉम्ब के साथ उड़ चुके हैं, अबतक तो 72 हूरें उनकी सेवा में लग गयी होंगी.

उस गन वाले ने दाँत पीसते हुए कहा- काफ़िर की औलाद तूने हमारे प्लान को चौपट कर दिया और हमारे साथियों को ही उड़ा दिया,

मे तुझे जिंदा नही छोड़ूँगा, ये कहते हुए उसने ट्रिग्गर दबा दिया.

मे माइक्रो ज़ेक्स में अपनी जगह से थोड़ा सा हट गया और साथ ही उसकी गन की नाल मेरे हाथ में थी, एक हाथ से उसकी गन वाले हाथ की कलाई थाम कर एक ज़ोर का झटका दिया,…

नतीजा ! उसकी गन मेरे हाथ में आ चुकी थी, दूसरे वाले ने जैसे ही मुझ पर हमला करने की कोशिश कि, मेरी टाँग हवा में घूमी और वो औंधे मुँह पीछे को उलट गया.

 
अब बाज़ी मेरे हाथ में थी, मैने फ़ौरन उसकी गन उसके आँखों के बीच माथे पर टिका दी और दबाब डालते हुए सर्द लहज़े में गुर्राया-

बोल हराम्जादे, कॉन कॉन है इस सबके पीछे, और क्यों करना चाहते थे इतना बड़ा नरसंघार..?

वो कुछ नही बोला सिर्फ़ जलती आँखों से मुझे घूरता रहा.. तब तक दूसरा बंदा जो औंधे मुँह गिरा था, उठा और जान बचाकर भागने की कोशिश की,

मैने फ़ौरन गन का रुख़ उसकी ओर किया और एक फाइयर कर दिया, गोली उसकी जाँघ चीरती हुई पार हो गयी और वो चीख मारते हुए वही गिर पड़ा.

दर्द से बुरी तरह तड़प रहा था वो.

मैने फिर अपना निशाना उस गन वाले की ओर करके कहा- जल्दी बोल मेरे पास समय नही है..

वो बस घूरता ही रहा.. कि ढायं, मैने ट्रिग्गर दबा दिया और गोली उसके सर में होल बनाती हुई पीछे से निकल गयी..

सेकेंड के सौवे हिस्से में ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये, और फटी आँखों से आसमान को देखता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा.

अब मैने उस घायल के पास जाकर उसे गले से पकड़ कर उठाया और जबर्जस्ती खड़ा करते हुए पुछा-

अगर अपनी जान बचना चाहता है तो सब कुछ सच- सच बता दे.

वादा करता हूँ तुझे जिंदा छोड़ दूँगा, वरना तू अपनी आँखों से देख ही चुका है,

मुझे तुम जैसे देशद्रोहियों को मारने में कोई हिचकिचाहट नही होती.

वो जीने की चाह में तोते की तरह शुरू हो गया-

मेरा नाम असलम है, मे अकेला ही इस शहर से इनके साथ हूँ.

ये जो अभी-2 तुमने मारा है इसका नाम शमसुद्दीन था, रामपुर का रहने वाला है,

जिन्हें बॉम्ब से उड़ा दिया है उनमें से एक पाकिस्तानी था और दूसरा दिल्ली से आया था.

ये लोग 4 दिन पहले यहाँ आए थे, शहर की रेकी की और इस सिनिमा हॉल को उड़ाने का प्लान फाइनल किया.

मे- क्यों उड़ाना चाहते थे इतने लोगों को..? और तुम इन लोगों का साथ क्यों दे रहे थे..?

वो- हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान इस देश से कितनी नफ़रत करता है, और उसके मंसूबों को अमलीजामा पहनाने में हमारे यहाँ के कुछ लोग भी साथ देते हैं.

रामपुर की मस्जिद का मौलाना अतौल्ला-ख़ान है, उसके पाकिस्तान से सीधे संबंध हैं, चूँकि वो एक मौलबी है तो प्रशासन भी उसपर हाथ नही डालता.

उसी ने मेरे अब्बू को 50,000/- रुपये दिए और मुझे इसमें शामिल होना पड़ा, हमारे परिवार की माली हालत सही नही है, सो अब्बू लालच में आ गये.

मे अपने घर का सबसे बड़ा हूँ जो अब्बू के साथ थोड़ा बहुत कमाता हूँ, वाकी 3 बहनें, 2 छोटे भाई सबका बोझ है उनके कंधों पर.

मे- साले हराम जादे, किसने कहा कि इतनी औलाद पैदा करो, जब नही चलता है तो..?

तुम लोग साले, जिस देश में रह कर खाते हो उसी को नुकसान पहुँचाते हो.

और क्या जानते हो इस बारे में…?

वो- इससे ज़्यादा और मुझे कुछ पता नही है मे सच कह रहा हूँ, अब मुझे जाने दो.

तौबा करता हूँ आइन्दा ऐसा कोई काम नही करूँगा.

मे- तुम देशद्रोही हो, और मेरी डिक्षनरी में देशद्रोहियों के लिए एक ही सज़ा है, और वो है मौत….

ढायं…एक गोली और चली, जो उसका भेजा चीरती हुई पार हो गयी…..!

दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में फ्रंट पेज की हेड लाइन्स … - **** के जंगलों में बॉम्ब ब्लास्ट, दो मानव शरीरों के अंग ब्लास्ट स्थल पर छत-बीक्षत अवस्था में पड़े पाए गये.

घटना स्थल के दूसरी तरफ किसी ने दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी है, जिसमें एक इसी शहर का है नाम है असलम,

उसके घरवालों से पोलीस पुच्छ-ताछ कर रही है.

पुच्छ-ताछ से अभी तक कोई नतीज़ा नही निकाला है, मकतूल के परिवार का कहना है, कि उनका लड़का कल दोपहर से लापता था.

आशंका जताई जा रही है कि ये कोई बहुत बड़ी आतंकी शाज़िश थी, जिसे हो सकता है असलम और उसके दोस्त ने असफल करने की कोशिश की और अपनी जान गँवादी.

पोलीस तहकीकात में लगी है, और सिटी एसपी ने अस्वस्थ किया है कि जल्द ही इस मामले को सुलझा लिया जाएगा. उधर मृतक परिवार शोक संतप्त है.

खबर पढ़ कर मेरे होठों पर मुस्कान आ गई, अपने ऑफीस में बैठा मे सोच रहा था कि देखो, ये पोलीस और मीडीया मिलकर लोगों को किस हद तक बेवकूफ़ बना सकते हैं,

जिस बात का दूर-2 तक कोई नाता नही है उसे लोगों तक परोस देते हैं, और लोगों का क्या..?

वो तो बस खबर पढ़ी, पेपर से गान्ड पोंच्छ कर कचरे के डिब्बे में डाला, फिर लग गये अपने रोजमर्रा के कामों में.

पूरे दिन मे अपने ऑफीस के कामों में लगा रहा, शाम को ऑफीस से सीधा कमरे पर आया,

फ्रेश होकर स्कूटर उठाया और चल दिया शहर की ओर.. मेरे पास एक सेकेंड हॅंड बजाज सुपर स्कूटर था जो मैने यही आकर लिया था.

होटेल में खाना खाया और घुस गया एक टेलिफोन बूथ में. एसपी का नंबर मिलाया…

एक बार रिंग बजती रही, किसी ने फोन नही उठाया, दोबारा ट्राइ किया तो 3-4 रिंग बजने के बाद ही उधर से फोन उठा लिया..

हेलो… कॉन..?

मे- क्या मे एसपी साब से बात कर सकता हूँ..?

एसपी- मे सिटी एसपी नारंग बोल रहा हूँ..! आप कॉन बोल रहे हैं..?

मे- नाम में क्या रखा है एसपी साब आपको तो काम से मतलब होना चाहिए…!

एसपी- क्या कहना चाहते हो..?

मे- वाह एसपी साब ! क्या कहानी बनाई है आपने मीडीया से मिलकर, एक देशद्रोही को हीरो बना दिया और उसे शहीद का दर्ज़ा भी देदिया..!

एसपी- क्या मतलब..?

मे- असलम आतंकवादी था.. ! सच्चाई जानना चाहते हो तो उसके बाप को पकडो… सब उगल देगा..

थोड़ा ढंग से सेवा होगी तो, वैसे तो ये काम भी मे ही करने वाला था, पर आपकी खबर पढ़ कर इरादा बदल दिया..

एसपी- इसका मतलब..वो सब….???

मे- सही सोचा रहे हैं आप..!

एसपी- लेकिन अपना परिचय तो दो..!

मे - एक देशभक्त का कोई पर्सनल परिचय नही होता, पूरा देश उसका घर है, आप बस अपना काम करिए… और मे अपना…

जल्दी ही आपको और भी खबर मिलने वाली हैं… और इतना बोलकर फोन कट कर दिया..

 
दूसरे दिन की न्यूज़ एकदम उलट थी, जिसमें असलम और उसके परिवार को देशद्रोही बताया गया था, उसके बाप ने मौलाना का नाम छोड़कर सब कुछ कबूल कर लिया था,

लोग खबर पढ़ कर सन्न रह गये, कि किस तरह से एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी, पर कैसे बची ये किसी को कुछ पता नही था.

पोलीस की सरगर्मियां तेज हो गयी थी, इसके लिए नही की एक आतंकवादी घटना होने से बच गयी,

बल्कि इसलिए कि इसे बचाने वाला कॉन है ? क्योंकि मीडीया बार-2 ये सवाल उठा रहा था, कि आख़िर ये हुआ कैसे, कॉन है वो देशभक्त जिसने ये सब किया.

उधर पाकिस्तान में बैठे मौलान के आका, बौखलाए हुए थे, और वो उसपर दबाब डाल रहे थे कि ये हुआ तो कैसे हुआ और किसने किया..? जो अभीतक खुद पोलीस की समझ से भी परे था.

मे मौलाना को जानता नही था, लेकिन जानना तो था, और जब तक वो यहाँ सक्रिय है, कोई ना कोई देश विरोधी गतिविधि फिर से ज़रूर करेगा जिससे वो अपने आकाओं को पुनः विषवास में ले सके.

रामपुर मेरे शहर से 60-65 किमी दूर था, एक सनडे सुबह-2 स्कूटर उठाया और चल दिया उस मौलाना से मिलने.

जब में उस मस्जिद में पहुँचा तो वहाँ दोपहर की नमाज़ चल रही थी, 50-60 की संख्या में लोग कतारबद्ध नमाज़ अता कर रहे थे,

सब लोगों के सामने एक व्यक्ति कोई 50-55 साल का खिचड़ी लंबी दाढ़ी सफेद ट्रडीशनल कपड़ों में, अलग थलग नमाज़ आता कर रहा था.

मे समझ गया यही मौलाना होगा.

मे बाहर खड़ा होकर नमाज़ ख़तम होने का इंतजार करने लगा, क्योंकि अपने को तो ये सब आती नही थी, उस समय मैने भी ऐसे कपड़े पहन रखे थे सर पर एक सफेद रुमाल बाँध लिया,

अब पहली नज़र में कोई ये नही कह सकता था कि मे इन लोगों में से नही हूँ.

नमाज़ ख़तम हुई, उसके बाद मौलाना ने कुछ उर्दू में अच्छी-2 बातें की लोगों के साथ,

मे मन ही मन उसको गाली देता हुआ सोच रहा था कि देखो साला कितना बड़ा नौटंकीबाज़ है ये,

अभी कितनी अच्छी-2 बातें कर रहा है, और साले के काम देखो.

अगर इन लोगों को इसकी असलियत पता लग जाए तो क्या हश्र होगा इसका ? अल्लाह ही जाने.

धीरे-2 सब लोग जाने लगे, जब सब लोग निकल गये तो मे अंदर आया और मौलाना को सलाम बलेकुम कहा.

मौलाना ने भी जबाब में बेलेकम अस्सलाम कहा और घूम कर मेरी ओर देखते हुए बोला - तुम कॉन हो बर्खुरदार..? और यहाँ क्यों खड़े हो..? गये क्यों नही अभी तक..?

मे- जनाब मौलाना साब, अभी-2 आपका कुछ सबक सुना, दिल को अच्छा लगा, कि अपने मौलाना माल्वी इंशनियत के बारे में कितना अच्छा सोचते हैं,

अगर ऐसा हक़ीक़त में हो तो हमारी ये सर-ज़मीन कितनी हसीन हो जाए..क्यों मौलवी साब.. सही कह रहा हूँ ना मे..?

वो कुछ चोन्कन्ने भाव लाकर बोला - हां ये तो तुम सही कह रहे हो मियाँ, और हमारी कोशिश भी रहती है कि इस बाबत अमल भी हो.

मे- तो फिर अभी अभी ****** शहर में जो वाकीया हुआ वो क्या था..?

मौलाना - क्या फर्मा रहे हो मियाँ..? हमारा उस वाकीयत से क्या ताल्लुक ?

मे- लेकिन नूर मुहम्मद. का कहना है कि उसे आपने 50000/- दिए थे इस काम की मदद के एवज में..!

मौलाना- अब्बल तो वो ऐसा बोल नही सकता,… और तुम कॉन हो ? और किस हसियत से ये सब मालूमात कर रहे हो..?

मे- इससे क्या फ़र्क पड़ता है मौलवी साब की मे कॉन हूँ..? फराक इससे पड़ता है कि इस देश के एक मज़हावी इमारत का रहनुमा जिसके उपर एक समाज के आत्म सम्मान का जिम्मा है,

वो दुश्मन देश से मिलकर इस देश को नुकसान पहुचाना चाहता है..!

मौलवी – ये सरासर बेबुनियादी और बेहूदा इल्ज़ाम है हमपर, हम अभी लोगों को बुलाकर उन्हें बतायेंगे कि किस तरह ये आदमी हमें और हमारे मज़हब को बदनाम करना चाहता है.

मे- शौक से बुलाइए ! जब उन्हें आपकी सच्चाई पता लगेगी जिसका मेरे पास पुख़्ता सबूत हैं, सोचिए आपका क्या हश्र होगा..?

मौलाना के हाथ पैर फूल गये.. वो बगलें झाँकने लगा. जब उसे बचने का कोई रास्ता नज़र नही आया तो वो मुझे अंदर ले जाने लगा..

मे - भूल जाओ मौलाना कि तुम मेरा कुछ बिगाड़ सकते हो !

मे ही वो इंसान हूँ जिसने तुमहरे मंसूबों को मॅटीया मेट कर दिया और अब तुम्हारा अंत निकट है,

याद कर्लो अपने खुदा को और माफी मांगलो अपने गुनाहों की जो तुमने उसकी इबादत की आड़ में किए हैं.

मौलाना - तुम अभी बच्चे हो मेरे सामने, और कहते ही ना जाने कहाँ से उसके हाथ में रेवोल्वेर नज़र आने लगी जिसका रुख़ मेरी ओर ही था.

वो आगे बोला- मे इतने दिनो से सोच-2 के परेशान था कि आख़िर ये सब किसने किया होगा, खुदा ने घर बैठे ही तुम्हें मेरी झोली में डाल दिया.

मे - अबे हरामजादे अभी भी खुदा का ही नाम लेगा ? कुछ तो डर उससे..?

और रही बात मुझे ख़तम करने की तो कोशिश करके देख ले, अगर तू कामयाब हुआ तो कुछ दिन और जी लेगा.

चल निकाल ले अपने अरमान, करले कोशिश….,

उसने आव ना देखा ताव और गोली चला दी मेरे उपर.. संग आर्ट का तो मे माहिर था, झुकाई देकर उसके बार को निष्फल ही नही किया, साथ ही उसके रेवोल्वेर वाले हाथ पर के जबर्जस्त किक मार दी.

ऱेवोल्वेर छिटक कर उसके हाथ से दूर जा गिरी, मे उसके सामने खड़ा मुस्करा रहा था.. जिसने उसके गुस्से में घी का काम किया,

और उसने मेरे उपर जंप लगा दी, मे साइड में हट गया और वो अपनी ही झोंक में फर्से पर औंधे मुँह गिरा.

मैने उसकी पीठ पर जूते की एक भरपूर ठोकर लगाई, उसकी पसलियां चटख गयी,

वो चीख मार कर पलट गया, जैसे ही पलटा, एक और जोरदार किक उसके बगल में पड़ी,

फिर तो मैने उससे अपने जूते की नोक पर रख लिया, मस्जिद में उसकी चीखें गूज़्ने लगी,

ये मस्जिद का अन्द्रुनि हिस्सा होने की वजह से कोई भी आवाज़ बाहर जाने का कोई सवाल ही नही था.

पीटते पीटते मौलाना बेहोश हो गया फिर मैने एक नोट लिख कर उसके सीने पर चिपकाया कि ये देशद्रोही है,

इसका सबूत ***** पोलीस की हिरासत में मजूद नूर मुहम्मद नाम का व्यक्ति है, जो इसकी सच्चाई जानता है.

और उसके माथे पर सुराख बना कर शांति पूर्वक मे वहाँ से निकल आया.

 
शाम की नमाज़ के वक़्त जब लोग मस्जिद में इकट्ठा हुए, तो उन्होने वहाँ मुल्ला को मरे हुए पाया,

लोगों ने पोलीस को खबर कर दी, पोलीस ने आकर वो नोट बरामद किया.

आनन फानन में हवालात में बंद, नूर मुहम्मद को फिर से इंटेरगेट किया गया,

शुरू में तो वो घुमाता रहा, जब 3र्ड डिग्री इस्तेमाल किया तो सब बक दिया.

सारी हक़ीक़त लोगों के सामने आ गयी, और एक आतंकवादी साज़िश, जो पाकिस्तान द्वारा रची गयी थी, फैल हो गयी थी,

जब डिप्लोमॅटिक तौर पर पाकिस्तान से पुछा गया तो वो सॉफ मुकर गया, अब कोई सबूत तो था नही.

पोलीस अंजाने देशभक्त की तलाश करती रही, लेकिन ना कुछ हाथ आनेवाला था सो नही आया.

इस घटना को बीते महीनो गुजर गये, मे अपने काम और ध्यान में डूब गया.

तभी एक दिन ब्रिज बिहारी भैया, जो एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं, और ये यूनिवर्सिटी मेरे प्रेज़ेंट शहर से मात्र 25किमी दूर है,

आ धम्के मेरे ऑफीस में और मुझे अगले सनडे यूनिवर्सिटी में स्थित उनके आवास पर आने का बोल कर चले गये.

अब सगे भाई हैं, क्या काम है ? देखना तो पड़ेगा ही सो अगले सनडे ले स्कूटर पहुँच गया उनके घर.

वहाँ जाकर पता लगा कि मेरी शादी की बात चल रही हैं, उनके ही स्टाफ के एक सज्जन की मामा की लड़की के साथ,

बीए बीएड करके किसी स्कूल में टीचर थी, मैने सोचा तो अब मुझे किसी मास्टरनी के गले बाँधने की कोशिश चल रही है यहाँ तो.

मैने कसम खाई थी रिंकी की मौत के बाद, कि मे अब भविष्य मे किसी और से शादी नही करूँगा,

लेकिन ये बात मेरे घर में किसी को पता नही थी, और ना ही बता सकता था. अब इनको डाइरेक्ट मना तो नही कर सकता, तो अब क्या करूँ….?

तभी मेरे दिमाग़ में आइडिया आया, पक्का ये ऐसी फॅमिली है जो अपनी बेटी का भविष्य किसी सुरक्षित हाथों देना चाहते हैं,

इन्हें मे नही एक रोज़गारी इंजिनियर दिखाई दे रहा है. अगर मे ये जॉब छोड़ के घर बैठ जाउ तो… तो शायद ये लोग पीछे हट जाएँगे.

पर सीधे-2 कैसे छोड़ूं.. इसी उधेड़ बुन में कुछ दिन और गुजर गये, लड़की वाले रोज़ खबर भेजें कि लड़की देखने कब आ रहे हो.

तभी बिल्ली के भाग छीन्का टूट गया- ---

इनक्रीमेंट का टाइम था, मेरी इतनी अच्छी पर्फॉर्मनॅन्स के बाद भी मुझे दूसरे लोगों से कम इनक्रीमेंट दिया मॅनेज्मेंट ने,

बस फिर क्या था, भिड़ गया अपने बॉस से, वो बेचारा वैसे भी सीधा-सदा आदमी था, उसने मुझे एमडी के सामने खड़ा कर दिया,

एमडी पिन्नकी था, चिड गया मेरी बात पर, मैने वहीं बैठे-2 रेसिग्नेशन लिखा और मार दिया उसके मुँह पर.

दूसरे दिन हिसाब लिया और आ गया अपने गाँव सब झोला डंडा टाँग कर.

घर में सभी लोग एकदम से इस तरह आया देखकर अचंभित रह गये, कारण पता लगा तो सब मुझे भला बुरा कहने लगे,

कोई मुझे बेवकूफ़, तो कोई मुझे पागल समझ रहा था. पर में चुप-चाप अपने खेती-वाडी के कामों में लग गया.

श्याम भाई को बोल दिया कि अब में किसी की नौकरी नही करूँगा.

लंबी चौड़ी खेती वाडी थी, आदमी की ज़रूरत तो रहती ही है, लेकिन घर की परंपरा, प्रतिष्ठा तो नौकरी को ही वॅल्यू देती थी,

भले वो चाहे किसी की गुलामी करना ही क्यों ना हो.

मैने अपने को काम में व्यस्त कर लिया, ध्यान की क्रिया लगातार जारी ही थी लेकिन साथ-2 में अब थोड़ा बहुत नशे की लत भी लग गयी थी जो केवल भांग और गांजे तक ही सीमित थी.

मे ज़्यादातर अपने ट्यूबिवेल पर ही रहता था, कभी-2 अपनी माता राम के दर्शन करने आजाया करता था.

गाँव के कुछ हम उम्र लड़के मेरे भक्त बन गये, जो कि इस तरह के नशे का इस्तेमाल पहले से ही करते थे,

मेरी वजह से उनकी नशे की क्वालिटी सुधर गयी थी, जैसे कि जहाँ वो पहले सुखी भांग पीस-2 कर खाते थे वहीं मे उन्हें मेवा युक्त और दूध वाली मलाई दार माल खाने को देता.

बदले में वो मेरी सेवा करते, मेरा काम करते. बस ऐसे ही मज़े में दिन व्यतीत हो रहे थे.

कभी-2 कुछ साधु संत भी आने-जाने लगे मेरे पास, वो मेरे ईश्वरीय गायन से प्रभावित हुए बिना नही रह पाते थे.

मेरा गायन केवल किताबी नही था, मैने ये सब प्रॅक्टिकल करके अर्जित किया था.

“सदा दिन रहत ना एक समान” ……, घर परिवार के कुछ पुराने झगड़े और कुछ नये दुश्मन इकट्ठे हो रहे थे जिसका भान हमें नही हुआ था,

और एक दिन ऐसी घटना घटित हो गयी जिसकी कल्पना हम में से किसी ने नही की थी.

 
सर्दियाँ शुरू हो रही थी, मे अपने ट्यूब वेल पर ही सोता था 24 घंटे में ब मुश्किल 2-3 घंटे के लिए ही गाँव आता था.

एक रात पड़ोसी के खेतों में ट्यूब वेल का पानी चल रहा था, में कुछ नशे की वजह से गहरी नींद में सोया हुआ था.

घनघोर अंधेरी रात थी, वो बंदा जिसके यहाँ पानी चल रहा था, भागता हुआ आया और मुझे झकझोर कर जगाया…

अरुण भैया… उठो… मे हड़बड़ा कर उठा और पुछा कि क्या हुआ..? क्यों इतना हड़बड़ाया हुआ है..?

वो बोला- सुनो देखो गाँव की ओर से लगातार फाइरिंग की आवाज़ें आ रही हैं.. लगता है किसी के यहाँ डकैती पड़ रही है.

मे अब नींद से पूरी तरह बाहर आ चुका था, मैने उसे पुछा कि ये कब से आ रही हैं तो वो बोला कि कोई 10 मिनट तो हो गये होंगे.

जब ध्यान दिया तो…! ओ तेरी की !! ये तो हमारे ही छोर की तरफ से आरहि थी, मैने उससे कहा कि तू यहीं रुक मे देखता हूँ, तो वो बोला,

भैया अब मे यहाँ अकेला नही रह पाउन्गा, मे भी तुम्हारे साथ चलता हूँ, मैने कहा ठीक है चल फिर.

मैने अपना समान निकाला (खुकारी और रेवोल्वेर) जो उसको भी नही पता था कि मेरे पास ये समान भी हो सकता है.

सब कुछ अच्छी तरह से बेल्ट में लगाया और बिना देर किए दौड़ पड़े घर की ओर.

जैसे-2 हम गाँव के नज़दीक आते जा रहे थे, तस्वीर सॉफ होती जेया रही थी, और एक फरलॉंग पहले ही ये क्लियर हो गया की डाकू मेरे ही घर में हैं.

हमारे घर के पिछे वाले हिस्से में एक सेकेंड फ्लोर भूरे लाल ने बना रखा था,

एक डाकू उसके ही उपर था, जिसके पास एक राइफल थी और एक बंदा उसके नीचे वाली छत पर टॉर्च लेकर इधर से उधर चक्कर लगा रहा था ये सुनिसचीत करने कि कोई आ ना जाए.

हमारे घर से सटा हुआ पड़ोसी का कच्चा मिट्टी का बड़ा सा मकान था, जिसका पिछला हिस्सा गिर चुका था और उसकी मिट्टी से उस हिस्से का प्लॅटफार्म दूसरे लेवेल से करीब 4-5 फीट उँचा था,

कई बार हम वहाँ से अपनी छत पर चढ़ जाते थे, ये बात हमारे अलावा और किसी को पता नही थी.

राइफल वाले और टॉर्च वाले डाकू का अटेन्षन सामने की ओर ही था क्योंकि हमारा घर गाँव में लास्ट में है,

गाँव मोहल्ले और आस-पास के लोग जिनके पास असलह थे वो चला रहे थे, जिनके जबाब में वो डाकू जबाबी फाइयर करता.

हम दोनो गाँव के बाहर एक मंदिर है भोले नाथ का, उसकी आड़ में खड़े हो गये.

मैने उस लड़के को घूम कर आगे जाने को बोला कि जहाँ सब लोग हैं वहाँ चला जा, और किसी को अभी बताना कुछ मत.

वो बोला- तुम यहाँ पर रह कर क्या करने वाले हो..? तो मैने कहा ! अभी कुछ कह नही सकता… पर कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा.

मुझे यहाँ से अभी तक इतना ही पता लग पाया था,

अंदर कॉन क्या कर रहा है ? कितने आदमी हैं ? कुछ पता नही था.

मैने अपना टारगेट, उपर खड़े राइफल वेल को चुना उसके बाद आगे का पता लगेगा क्या सिचुयेशन बनती है.

वो लड़का जब वहाँ से चला गया, तो मे दबे पाँव घर के पीछे आ गया और उस कच्चे मिट्टी के मकान के पिछले हिस्से के उँचे प्लेट फार्म पर जाके दीवार से चिपक कर स्थिति का निरीक्षण किया,

अंधेरा उनको मदद कर रहा था तो मुझे ज़्यादा कर रहा था.

जब मैने पाया कि इन दो के अलावा इस हिस्से में और कोई नही है, और इन दोनो का अटेन्षन भी आगे की ओर ही है,

मे जिस तरह से बचपन से चढ़ते आरहे थे छत पर उसी तरह से आसानी से चढ़ गया.

अब ये देखना था, कि वो टॉर्च वाला टॉर्च का फोकस इधर ना कर्दे.

दम साधे मे थोड़ी देर सेकेंड फ्लोर वाले कमरे की दीवार से चिपका खड़ा रहा,

जब देखा कि वो टॉर्च वाला दूसरे छोर पर राउंड लगाने गया है,

मौका देख कर मैने अपनी साँस रोक के खड़े- 2 जंप लगाई और उच्छल कर एक ही प्रयास में मैने सेकेंड फ्लोर की छत के किनारे को पकड़ लिया.

मैने अपने दोनो बाजुओं के ज़ोर से खुद को उपर उठाया, मेरा लक अच्छा था या उस राइफल वाले का खराब,

वो अगले सिरे पर ही खड़ा फाइरिंग कर रहा था.

बंदर की तरह उच्छल कर मे छत पर पहुँच गया, कमर से खुकारी निकाली और बैठे-2 ही दम साढ़े उसके पीछे से उसकी ओर बढ़ता गया,

जैसे ही मे उससे दो कदम के फ़ासले पर पहुँचा, एकदम गॉरिला की तरह जंप लगा कर में उसके उपर झपटा.

मैने एक साथ दो काम किए एक उसके मुँह पर अपने हाथ का ढक्कन लगाया, दूसरे में लगी खुकरि से उसका गला रैत दिया.

उसके मुँह से आवाज़ भी नही निकल पाई और वो दूसरी दुनिया की सैर पर चला गया……

अब उसकी राइफल भी मेरे कब्ज़े में आ चुकी थी, तो सबसे पहले उस टॉर्च वाले को ही उड़ा दिया.

फाइरिंग तो समय-2 पर चल ही रही थी, किसी को पता ही नही चला कि हो क्या गया.

अब छत के इस पोर्षन पर मेरे सामने कोई नही था, अब में सब कुछ देख लेना चाहता था.

अब सबसे पहले पता करना था, कि कितने लोग कहाँ-2 हैं, किस पोज़िशन में क्या-2 कर रहे हैं ?

उसके सामने वाले पोर्षन में प्रेम चन्द भाई का दो मंज़िला था, उनकी सारी फॅमिली उपर ही सोती थी.

उनके बरामदे में मे यहाँ से सब कुछ देख सकता था, लेकिन धुप्प अंधेरे के कारण कुछ भी ठीक से नही देख पाया…

फिर भी अंधेरे में काफ़ी देर रहने की वजह से इतना अनुमान लग गया क़ी वरांडे में तीन लोग खड़े दिख रहे थे.

 
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