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Guest
पीछे से जाकर छजली से होते हुए उनके बरामदे में जाया जा सकता था लेकिन वो भी नॉर्मल कंडीशन में जब वहाँ कोई ख़तरा ना हो तब.
लेकिन वहाँ तो तीन-2 यमदूत खड़े थे, सबके हाथ में कुछ ना कुछ तो होना ही चाहिए.
छजली 3 फुट उँची थी जो कामन आँगन के चारों ओर बनी हुई थी, मे छजली की आड़ लिए हुए उनके बरामदे के कोने तक पहुँच गया.
अपने मुँह को मैने कपड़े से ढँक लिया था. बरामदे वाले बदमाशों का ध्यान कमरों में हो रही लूट-पाट और औरतों के साथ मार-पीट की ओर था,
मैने मौके का फ़ायदा उठाया और फुर्ती से छजली क्रॉस करता हुआ बरामदे में पहुँच गया.
पहुँच ही नही गया सेकेंड में ही दो के गले भी रेत दिए खुकारी से,
तीसरे को लपकने ही वाला था कि वो पलटा और मेरी खुकारी उसके पेट में.
चीखना चाहता था वो कि तभी मेरा हाथ उसके मुँह पर ढक्कन की तरह जम गया.
उधर जब उपर से काफ़ी देर तक फाइरिंग की आवाज़ें नही आई तो बदमाशों और गाँव वालों को भी कुछ संशय होने लगा और वो ख़ुसर-पुशर करने लगे.
घर के सारे मर्द आगे वाले पोर्षन में ही सोते थे सो वो सब बाहर निकल कर भाग गये थे,
और चौक में खुले में वाकई मोहल्ले के लोगों के साथ खड़े खड़े बस बदमाशों के चले जाने का इंतजार कर रहे थे…
और इसके अलावा वो कर भी क्या सकते थे…घर में सिर्फ़ औरतें ही रह गयी थी.
अब मेरा ध्यान कमरों में हो रही मार-पीट और मेरी भाभी-भतीजियों के साथ छेड़-छाड़ कर रहे बदमाशों पर गया,
सामने वाले कमरे में मेरी वृद्ध चाची और मंझले चचेरे भाई की बेटी थी, उनको चार-2 बदमाश मार-पीट कर रहे थे,
जवान हो रही भतीजी के कपड़े फाड़ डाले थे.
मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया, घुसते ही एक की पीठ में खुकारी घोंप दी दूसरे का गला पकड़ कर ज़मीन पर पटका,
अप्रत्याशित हुए हमले ने उनके पैर उखाड़ दिए और वो दो बचे हुए बदमाश भाग खड़े हुए,
अभी छजली कूद कर पीछे की साइड कूदने ही वाले थे के मैने रेवोल्वेर निकाल कर उन पर फाइयर कर दिया.
गोली किसके कहाँ लगी पता नही पर वो छत से पीछे की तरफ खेतों में कूद गये.
अब मे दूसरे वाले कमरे की ओर गया उसमें भाभी और उनकी बेटी थी जिसकी सगाई करने जाने वाले थे अगले हफ्ते, दोनो के कपड़े फटे हुए थे.
मे अभी उस कमरे में घुसने वाला ही था कि अपने इतने नज़दीक से हुए फाइयर की वजह से वो चोन्कन्ने हो गये और उन्हें छोड़ कर निकल भागने लगे,
मे गेट पर ही खड़ा था, जो सामने आया पेलता गया एक-दो गिरते पड़ते निकल भागने में सफल हो गये.
उपर का सफ़ाया करने के बाद मे बरामदे से उतरने वाले जीने से नीचे आँगन में आया तो वहाँ आँगन में भी दो और मिल गये.
उनको पहले तो पता ही नही चला कि मे कॉन हूँ, जब तक समझते एक को ठोक दिया, दूसरा भागने वाला था कि उसको पीछे से गोली मार दी, जो उसके पीठ में घुस गयी शायद और वो रंभाता हुआ वही गिर पड़ा,
आँगन से होते हुए अपने घर के गेट से अंदर दाखिल हुआ तो वहाँ भी साले 4-4, मेरी बूढ़ी मा और बेहन के साथ मार-पीट कर रहे थे और माल-पानी कहाँ छुपा रखा है ऐसा पुच्छ रहे थे.
मेरी माँ का एक हाथ तोड़ दिया था उन लोगों ने वो बेचारी दर्द से कराह रही थी,
मेरी बेहन के मुँह से भी खून बह रहा था, मेरा गुस्से के मारे बुरा हाल हो रहा था, कपड़े खून से लथपथ थे,
मुँह कपड़े से ढका होने के कारण पहले तो वो लोग अपना ही कोई साथी समझे मुझे लेकिन जैसे ही उनमें से मैने एक की आंतड़िया निकाली, वो मेरे उपर झपटे, एक को रास्ते में ही टपका दिया और दो भाग लिए.
मे उनके पीछे- 2 भागा और जैसे ही मैन गेट से निकल कर बाहर की गॅलरी मे आया वहाँ और दो पहरा दे रहे थे उन चारों को ललकारता हुआ मे उनके पीछे-2 भागा,
भागते ही एक फाइयर और कर दिया, गोली एक बदमाश की पीठ में घुस गयी.
लेकिन मेरी आवाज़ पहचान कर बाहर खड़े लोगों ने भी गॅलरी की तरफ भागना शुरू कर दिया और तीन बचे बदमाशों में से एक को पकड़ लिया, दो भाग गये,
मे उन लोगों के पास पहुँचा और जाते ही उस पकड़े हुए बदमदश के पेट को भी फाड़ डाला.
मेरे सारे कपड़े बदमशों के खून से लथपथ हो चुके थे, मुँह पर कपड़ा देख कर मेरे घरवाले और गाँव वाले भी डर गये.
चूँकि मैने जाते ही उस बदमाश को मार डाला था इसलिए वो कुछ आस्वस्त हुए और चोंक कर मेरी ओर देखने लगे.
जब मैने अपने मुँह का कपड़ा हटाया तो सब की चीख निकल पड़ी.
प्रेम भाई- अरुण ! तू ठीक तो है ? इधर कहाँ से आया..?
मे ठीक हूँ.. अंदर सब बदमाश मरे पड़े हैं, और कुछ भाग गये..मैने कहा तो सब आश्चर्यचकित हो मुझे देखते ही रह गये.. फिर सब अंदर भाग कर गये..
आँगन से ही लाशों की शुरुआत हो गयी.. माँ और बेहन अभी भी थर-थर काँप रही थी,
लेकिन वहाँ तो तीन-2 यमदूत खड़े थे, सबके हाथ में कुछ ना कुछ तो होना ही चाहिए.
छजली 3 फुट उँची थी जो कामन आँगन के चारों ओर बनी हुई थी, मे छजली की आड़ लिए हुए उनके बरामदे के कोने तक पहुँच गया.
अपने मुँह को मैने कपड़े से ढँक लिया था. बरामदे वाले बदमाशों का ध्यान कमरों में हो रही लूट-पाट और औरतों के साथ मार-पीट की ओर था,
मैने मौके का फ़ायदा उठाया और फुर्ती से छजली क्रॉस करता हुआ बरामदे में पहुँच गया.
पहुँच ही नही गया सेकेंड में ही दो के गले भी रेत दिए खुकारी से,
तीसरे को लपकने ही वाला था कि वो पलटा और मेरी खुकारी उसके पेट में.
चीखना चाहता था वो कि तभी मेरा हाथ उसके मुँह पर ढक्कन की तरह जम गया.
उधर जब उपर से काफ़ी देर तक फाइरिंग की आवाज़ें नही आई तो बदमाशों और गाँव वालों को भी कुछ संशय होने लगा और वो ख़ुसर-पुशर करने लगे.
घर के सारे मर्द आगे वाले पोर्षन में ही सोते थे सो वो सब बाहर निकल कर भाग गये थे,
और चौक में खुले में वाकई मोहल्ले के लोगों के साथ खड़े खड़े बस बदमाशों के चले जाने का इंतजार कर रहे थे…
और इसके अलावा वो कर भी क्या सकते थे…घर में सिर्फ़ औरतें ही रह गयी थी.
अब मेरा ध्यान कमरों में हो रही मार-पीट और मेरी भाभी-भतीजियों के साथ छेड़-छाड़ कर रहे बदमाशों पर गया,
सामने वाले कमरे में मेरी वृद्ध चाची और मंझले चचेरे भाई की बेटी थी, उनको चार-2 बदमाश मार-पीट कर रहे थे,
जवान हो रही भतीजी के कपड़े फाड़ डाले थे.
मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया, घुसते ही एक की पीठ में खुकारी घोंप दी दूसरे का गला पकड़ कर ज़मीन पर पटका,
अप्रत्याशित हुए हमले ने उनके पैर उखाड़ दिए और वो दो बचे हुए बदमाश भाग खड़े हुए,
अभी छजली कूद कर पीछे की साइड कूदने ही वाले थे के मैने रेवोल्वेर निकाल कर उन पर फाइयर कर दिया.
गोली किसके कहाँ लगी पता नही पर वो छत से पीछे की तरफ खेतों में कूद गये.
अब मे दूसरे वाले कमरे की ओर गया उसमें भाभी और उनकी बेटी थी जिसकी सगाई करने जाने वाले थे अगले हफ्ते, दोनो के कपड़े फटे हुए थे.
मे अभी उस कमरे में घुसने वाला ही था कि अपने इतने नज़दीक से हुए फाइयर की वजह से वो चोन्कन्ने हो गये और उन्हें छोड़ कर निकल भागने लगे,
मे गेट पर ही खड़ा था, जो सामने आया पेलता गया एक-दो गिरते पड़ते निकल भागने में सफल हो गये.
उपर का सफ़ाया करने के बाद मे बरामदे से उतरने वाले जीने से नीचे आँगन में आया तो वहाँ आँगन में भी दो और मिल गये.
उनको पहले तो पता ही नही चला कि मे कॉन हूँ, जब तक समझते एक को ठोक दिया, दूसरा भागने वाला था कि उसको पीछे से गोली मार दी, जो उसके पीठ में घुस गयी शायद और वो रंभाता हुआ वही गिर पड़ा,
आँगन से होते हुए अपने घर के गेट से अंदर दाखिल हुआ तो वहाँ भी साले 4-4, मेरी बूढ़ी मा और बेहन के साथ मार-पीट कर रहे थे और माल-पानी कहाँ छुपा रखा है ऐसा पुच्छ रहे थे.
मेरी माँ का एक हाथ तोड़ दिया था उन लोगों ने वो बेचारी दर्द से कराह रही थी,
मेरी बेहन के मुँह से भी खून बह रहा था, मेरा गुस्से के मारे बुरा हाल हो रहा था, कपड़े खून से लथपथ थे,
मुँह कपड़े से ढका होने के कारण पहले तो वो लोग अपना ही कोई साथी समझे मुझे लेकिन जैसे ही उनमें से मैने एक की आंतड़िया निकाली, वो मेरे उपर झपटे, एक को रास्ते में ही टपका दिया और दो भाग लिए.
मे उनके पीछे- 2 भागा और जैसे ही मैन गेट से निकल कर बाहर की गॅलरी मे आया वहाँ और दो पहरा दे रहे थे उन चारों को ललकारता हुआ मे उनके पीछे-2 भागा,
भागते ही एक फाइयर और कर दिया, गोली एक बदमाश की पीठ में घुस गयी.
लेकिन मेरी आवाज़ पहचान कर बाहर खड़े लोगों ने भी गॅलरी की तरफ भागना शुरू कर दिया और तीन बचे बदमाशों में से एक को पकड़ लिया, दो भाग गये,
मे उन लोगों के पास पहुँचा और जाते ही उस पकड़े हुए बदमदश के पेट को भी फाड़ डाला.
मेरे सारे कपड़े बदमशों के खून से लथपथ हो चुके थे, मुँह पर कपड़ा देख कर मेरे घरवाले और गाँव वाले भी डर गये.
चूँकि मैने जाते ही उस बदमाश को मार डाला था इसलिए वो कुछ आस्वस्त हुए और चोंक कर मेरी ओर देखने लगे.
जब मैने अपने मुँह का कपड़ा हटाया तो सब की चीख निकल पड़ी.
प्रेम भाई- अरुण ! तू ठीक तो है ? इधर कहाँ से आया..?
मे ठीक हूँ.. अंदर सब बदमाश मरे पड़े हैं, और कुछ भाग गये..मैने कहा तो सब आश्चर्यचकित हो मुझे देखते ही रह गये.. फिर सब अंदर भाग कर गये..
आँगन से ही लाशों की शुरुआत हो गयी.. माँ और बेहन अभी भी थर-थर काँप रही थी,