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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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पीछे से जाकर छजली से होते हुए उनके बरामदे में जाया जा सकता था लेकिन वो भी नॉर्मल कंडीशन में जब वहाँ कोई ख़तरा ना हो तब.

लेकिन वहाँ तो तीन-2 यमदूत खड़े थे, सबके हाथ में कुछ ना कुछ तो होना ही चाहिए.

छजली 3 फुट उँची थी जो कामन आँगन के चारों ओर बनी हुई थी, मे छजली की आड़ लिए हुए उनके बरामदे के कोने तक पहुँच गया.

अपने मुँह को मैने कपड़े से ढँक लिया था. बरामदे वाले बदमाशों का ध्यान कमरों में हो रही लूट-पाट और औरतों के साथ मार-पीट की ओर था,

मैने मौके का फ़ायदा उठाया और फुर्ती से छजली क्रॉस करता हुआ बरामदे में पहुँच गया.

पहुँच ही नही गया सेकेंड में ही दो के गले भी रेत दिए खुकारी से,

तीसरे को लपकने ही वाला था कि वो पलटा और मेरी खुकारी उसके पेट में.

चीखना चाहता था वो कि तभी मेरा हाथ उसके मुँह पर ढक्कन की तरह जम गया.

उधर जब उपर से काफ़ी देर तक फाइरिंग की आवाज़ें नही आई तो बदमाशों और गाँव वालों को भी कुछ संशय होने लगा और वो ख़ुसर-पुशर करने लगे.

घर के सारे मर्द आगे वाले पोर्षन में ही सोते थे सो वो सब बाहर निकल कर भाग गये थे,

और चौक में खुले में वाकई मोहल्ले के लोगों के साथ खड़े खड़े बस बदमाशों के चले जाने का इंतजार कर रहे थे…

और इसके अलावा वो कर भी क्या सकते थे…घर में सिर्फ़ औरतें ही रह गयी थी.

अब मेरा ध्यान कमरों में हो रही मार-पीट और मेरी भाभी-भतीजियों के साथ छेड़-छाड़ कर रहे बदमाशों पर गया,

सामने वाले कमरे में मेरी वृद्ध चाची और मंझले चचेरे भाई की बेटी थी, उनको चार-2 बदमाश मार-पीट कर रहे थे,

जवान हो रही भतीजी के कपड़े फाड़ डाले थे.

मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया, घुसते ही एक की पीठ में खुकारी घोंप दी दूसरे का गला पकड़ कर ज़मीन पर पटका,

अप्रत्याशित हुए हमले ने उनके पैर उखाड़ दिए और वो दो बचे हुए बदमाश भाग खड़े हुए,

अभी छजली कूद कर पीछे की साइड कूदने ही वाले थे के मैने रेवोल्वेर निकाल कर उन पर फाइयर कर दिया.

गोली किसके कहाँ लगी पता नही पर वो छत से पीछे की तरफ खेतों में कूद गये.

अब मे दूसरे वाले कमरे की ओर गया उसमें भाभी और उनकी बेटी थी जिसकी सगाई करने जाने वाले थे अगले हफ्ते, दोनो के कपड़े फटे हुए थे.

मे अभी उस कमरे में घुसने वाला ही था कि अपने इतने नज़दीक से हुए फाइयर की वजह से वो चोन्कन्ने हो गये और उन्हें छोड़ कर निकल भागने लगे,

मे गेट पर ही खड़ा था, जो सामने आया पेलता गया एक-दो गिरते पड़ते निकल भागने में सफल हो गये.

उपर का सफ़ाया करने के बाद मे बरामदे से उतरने वाले जीने से नीचे आँगन में आया तो वहाँ आँगन में भी दो और मिल गये.

उनको पहले तो पता ही नही चला कि मे कॉन हूँ, जब तक समझते एक को ठोक दिया, दूसरा भागने वाला था कि उसको पीछे से गोली मार दी, जो उसके पीठ में घुस गयी शायद और वो रंभाता हुआ वही गिर पड़ा,

आँगन से होते हुए अपने घर के गेट से अंदर दाखिल हुआ तो वहाँ भी साले 4-4, मेरी बूढ़ी मा और बेहन के साथ मार-पीट कर रहे थे और माल-पानी कहाँ छुपा रखा है ऐसा पुच्छ रहे थे.

मेरी माँ का एक हाथ तोड़ दिया था उन लोगों ने वो बेचारी दर्द से कराह रही थी,

मेरी बेहन के मुँह से भी खून बह रहा था, मेरा गुस्से के मारे बुरा हाल हो रहा था, कपड़े खून से लथपथ थे,

मुँह कपड़े से ढका होने के कारण पहले तो वो लोग अपना ही कोई साथी समझे मुझे लेकिन जैसे ही उनमें से मैने एक की आंतड़िया निकाली, वो मेरे उपर झपटे, एक को रास्ते में ही टपका दिया और दो भाग लिए.

मे उनके पीछे- 2 भागा और जैसे ही मैन गेट से निकल कर बाहर की गॅलरी मे आया वहाँ और दो पहरा दे रहे थे उन चारों को ललकारता हुआ मे उनके पीछे-2 भागा,

भागते ही एक फाइयर और कर दिया, गोली एक बदमाश की पीठ में घुस गयी.

लेकिन मेरी आवाज़ पहचान कर बाहर खड़े लोगों ने भी गॅलरी की तरफ भागना शुरू कर दिया और तीन बचे बदमाशों में से एक को पकड़ लिया, दो भाग गये,

मे उन लोगों के पास पहुँचा और जाते ही उस पकड़े हुए बदमदश के पेट को भी फाड़ डाला.

मेरे सारे कपड़े बदमशों के खून से लथपथ हो चुके थे, मुँह पर कपड़ा देख कर मेरे घरवाले और गाँव वाले भी डर गये.

चूँकि मैने जाते ही उस बदमाश को मार डाला था इसलिए वो कुछ आस्वस्त हुए और चोंक कर मेरी ओर देखने लगे.

जब मैने अपने मुँह का कपड़ा हटाया तो सब की चीख निकल पड़ी.

प्रेम भाई- अरुण ! तू ठीक तो है ? इधर कहाँ से आया..?

मे ठीक हूँ.. अंदर सब बदमाश मरे पड़े हैं, और कुछ भाग गये..मैने कहा तो सब आश्चर्यचकित हो मुझे देखते ही रह गये.. फिर सब अंदर भाग कर गये..

आँगन से ही लाशों की शुरुआत हो गयी.. माँ और बेहन अभी भी थर-थर काँप रही थी,

 
हम लोगों की आवाज़ सुनकर उपर से वो चारों भी नीचे आ गयी ये अच्छा किया कि उन्होने अपने फटे हुए कपड़े चेंज कर लिए थे अब तक.

भाभी बोली उपर डर लग रहा है, चारों ओर लाशें ही लाशें बिछि पड़ी हैं. मुझे देखते ही उन्होने मुझे अपने गले से लगा लिया इस बात की बिना परवाह किए कि मेरे कपड़े खून से सने हुए थे.

तुमने हम सब को बचा लिया अरुण… लेकिन फिर कांपति हुई विशमय के साथ बोली- ये सब तुमने अकेले ही किया है..?

हां भाभी ये सब मैने अकेले ही किया है, और कोई था भी तो नही मेरे साथ जिससे मदद माँग सकता..?

फिर मैने सबको क्या-2 कैसे-2 हुआ सब बताया तो सबकी आँखें फटी रह गयी और सबने मुझे एक साथ भींच लिया.

अरे अब तुम लोग मिलकर मार डालोगे क्या..? मेरा दम घुट रहा है तो सबने झेन्पते हुए मुझे छोड़ा, और सबके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

उधर गाँव का चौकीदार डकैती की खबर सुनते ही थाने की ओर दौड़ा था..

गाँव में उस वक़्त टेलिफोन की सुविधा नही थी, और जो चौकीदार था उसके बेचारे के पास साइकल वग़ैरह भी नही थी, सो पैदल ही 3 किमी तक भागता गया तब जाके थाने में इत्तला दी.

उसके बावजूद भी पोलीस 3 घंटे के बाद पहुँची गाँव में.

लोगों ने आते ही इनस्पेक्टर को लपक लिया, तो वो खीँसें निपोर कर अपनी राम कहानी सुनाने लगा.

जब उसने अंदर के हालत देखे तो उनकी आँखें फटी रह गयी, अब वो उल्टे सीधे सवाल करने लगा कि ये कत्ल किसने किए हैं, कैसे किए हैं वग़ैरह-2.

मे- ओये इनस्पेक्टर ! अकल घास चरने गयी है क्या तेरी...? ये तुझे कत्ल दिखाई दे रहे हैं..?

इंस्पेक्टर- ये लड़का कॉन है..?

प्रेम भाई- ये मेरा भाई है.. क्यों..?

इंस्पेक्टर- इसको सिखाया नही तुमने, पोलीस से ऐसे बात करते हैं.. ? एक डंडा डालूँगा इसकी गान्ड में सारी अकड़ निकल जाएगी..!

लपक के उसका गला पकड़ के दबाते हुए मैने कहा- साले मेरी गान्ड में डंडा डालेगा..तू हैं.

अभी में तुझे भी मारकर इन बदमाशों में शामिल कर दूं तो बोल क्या कर लेगा.

उसकी रूह फ़ना हो गयी, इतने में प्रेम भाई ने उसे छुड़वा दिया और बोले- इनस्पेक्टर हमारे यहाँ 20 बदमाश चढ़ गये,

आप 3 घंटे में अब आ रहे हो ? वो भी 4 सिपाहियों को लेकर..! हम सब गाँव वाले एक होकर इनको नही मारते तो ये लोग हमें मार डालते.

ये नही सोचा आपने और उल्टा हमारे उपर ही धोंस जमा रहे हो.

ये देखो हमारी औरतों को मार-2 कर क्या हालत कर दी है. इलज़ाम लगाने से पहले ये तो सोचा होता कि इतनी रात गये इतने सारे लोगों को हम पकड़-2 के लाए मारने के लिए इनके घरों से, जिनमें ये भी नही पता कि ये कहाँ-2 से आए हैं.

इनस्पेक्टर की सिट्टी-पिटी गुम हो चुकी थी, ढीला पड़ते हुए वो बोला- आइ आम सॉरी मास्टर साब, मेरा कहने का ये मतलब ये नही था..

मे तो बस जानना चाहता था कि ये सब कैसे किया आप लोगों ने ?

फिर उन्होने सब लाशों को वहाँ से उठवा कर थाने पहुँचवाया, हमारी औरतों की मेडिकल जाँच के लिए सिटी हॉस्पिटल ले जाया गया क़ानूनी कार्यवाही की गयी.

इन्ही सब कामों में सुबह हो गयी.

सुबह के उजाले में घर के पीछे से भी दो बदमाश घायल अवस्था में पड़े मिले, उन्हें मेडिकल ट्रीटमेंट देके हिरासत में ले लिया गया.

बहुत सारे मरे हुए बदमाशों की पहचान हो गयी थी, एक दो तो भूरे के रिस्तेदार ही थे,

दो सामने वाले के साले निकले. पूरी साजिश खुल चुकी थी. जिन लोगों का हाथ था वो भी अरेस्ट कर लिए गये.

एक बार और मेरे जीवन का यथार्थ सिद्ध हो गया..और मैने एक लंबी साँस लेकर मन ही मन कहा कि चलो – “मेरा जीवन कुछ काम तो आया”

इस हादसे के बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी, जब भी मे ध्यान लगाने की कोशिश करता, मुझे वो नरसंहार नज़र आने लगता और अपने ध्यान से बिचलित होने लगता,

एक बैचैनि सी होने लगती, मेरी आँखों में हिंसक भाव उठने लगते.

मेरी समझ में नही आ रहा था कि ये सब क्यों हो रहा है और इससे कैसे मुक्ति मिले.

ऐसा भी नही था कि मैने इससे पहले किसी को मौत की सज़ा नही दी थी, कुछ महीने पहले ही उन आतकवादियों को उनके अंजाम तक पहुचाया था लेकिन ऐसा पहले नही हुआ था.

कुछ दिन इसी उधेड़ बुन में निकल गये, मे थोड़ा उदास सा भी रहने लगा, ना किसी से ज़्यादा बोलना और ना किसी से सीधे -2 जबाब देना,

घर वाले भी मेरे व्यवहार से परेशान रहने लगे. और एक नयी मुशिबत ये हुई कि लोग मुझसे बात करने में कतराने लगे थे.

कोई-कोई तो यहाँ तक बोल देता, कि ये कोई नॉर्मल इंशन नही है…ज़रूर इसके उपर कोई भूत-प्रेतों का साया है…

एक दिन मे अपने खेत में जो कि थोड़ी सी ज़मीन थी जहाँ, दूसरे के ट्यूब वेल से पानी दे रहा था गेहूँ खड़े थे उसमें बाली आना शुरू हो रही थी फसल में.

तभी वहाँ मेरे ही मोहल्ले की लड़की जिसका नाम भूरी था बथुआ का साग तोड़ने आई, उसके साथ उसी के घर की दो लड़कियाँ और थी.

मे खेत की मेड (बाउंड्री) पर बैठा था तो वो भी मेरे साथ आकर बैठ गयी और मुझसे बात करने लगी,

मे भी उससे नॉर्मली बात करने लगा.

वो मुझसे छोटी थी लगभग 18 के आस-पास की उम्र होगी उसकी, अब गाँव नाते से मुझे भैया बोलती थी.

जिसकी झलक शुरू के अपडेट मे पढ़ी होगी आपने.

 
ग़रीब घर की भूरी, पिता के देहांत के बाद बढ़ती किल्लतो से मुश्किल से परिवार का भरण पोषण हो रहा था.

4 भाइयों के बीच अकेली बेहन, आमदनी का ज़रिया मात्र 10-12 बीघा ज़मीन ही थी,

बड़ा भाई मेरे से कोई 2 साल ही बड़ा था, लेकिन फैल होते-2 मुश्किल से 10थ पास ही कर पाया था,

तीन भाइयों के बाद चौथी औलाद थी वो. बड़े भाई की मुश्किल से शादी हो पाई थी.

भूरी एक हल्के कद की गोरी-चिटी लड़की थी, रंग रूप की वजह से ही उसका नाम उसके पिता ने भूरी रख दिया था.

अधखिलि कली जिसके पास ढंग के पहनने को कपड़े भी नही होते थे, इस समय भी वो एक घिसे घिसाए पुराने से सलवार सूट में थी जो शायद काफ़ी पुराना होने से उसके विकसित हो रहे बदन को ढंग से ढक भी नही पा रहे थे.

वैसे तो उसके संतरे अभी 30” के ही हुए होंगे, लेकिन टाइट कुर्ते मैं लगता था कपड़े को फाड़ के बाहर निकल पड़ेंगे.

बिना ब्रा के उसके छोटे-2 लेकिन नुकीले चुचक उसके झीने कपड़े में सॉफ छटा दर्शा रहे थे.

उसके कपड़े इतने घिस चुके थे की पिंक कलर का कपड़ा भी उसके बदन के रंग का दिख रहा था.

मैने उसे नज़र भर देखा…,

पहले तो मुझे उस पर दया आई, और मैने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा.

फिर जब मुझे उसके कपड़ों से आर-पार उसका शरीर दिखाई देने लगा तो मेरी भावनाएँ बदलने लगी,

अनायास ही मेरा हाथ उसकी पीठ पर चला गया और उसे सहलाने लगा.

मे उसकी पीठ सहलाते हुए बोला- भूरी, तेरे पास और ढंग के कपड़े नही हैं..?

वो- क्यों इनमें क्या खराबी है ..?

मे- पुराने हैं, देखो तुम्हारा शरीर भी चमक रहा है..

जब उसने मेरी नज़रों का पीछा किया तो वो शर्म से दोहरी हो गयी और बोली-

हैं तो एक दो जोड़ी, पर भाभी पहनने नही देती, बोलती है, अभी इनसे ही काम चलने दो जब तक चलता है बाद में निकाल लेना.

मे- और तेरी मम्मी क्या कहती है…?

वो- वो बेचारी क्या कहेगी, चुप ही रहती है.

मे- तेरा मन नही होता अच्छा खाने-पहनने को..?

वो- किसका मन नही होगा… भैया..? लेकिन आए कहाँ से..? दो जून की रोटी हो जाती है वही बहुत है..!

मे - ओह्ह्ह.. भूरी..! मे उसकी दयनीय दशा जान कर कराह कर बोला - अगर तेरा बाहर खाने का मन करता है तो मुझे बता मे तुझे खाने के लिए पैसा दे दूँगा अगर चाहे तो..!

ये बात मैने दया वश कही थी, भूरी थोड़ी एमोशनल होती हुई मेरे कंधे पर सर रख कर बोली-

जलेबी खाने का बहुत मन करता है, जब भी सुबह-2 अजुद्दि लाला की दुकान पर जाती हूँ, उसी समय वो गरम-2 बना रहा होता है,

जब और लोग भी खा रहे होते हैं तो सच कहती हूँ भैया, इतना मन करता है, कि उठा के भाग जाउ….

कंधे से चिपकने से उसके अधखिले संतरे जो की सिर्फ़ एक झीने से कपड़े की दीवार के उस पर थे उसके नन्हे-मुन्ने अंगूर के दाने मेरे बाजू में चुभने से लगे.

मेरा मन किया कि हाथ से सहला दूँ.. लेकिन मन को काबू में करके उसकी पीठ से हाथ लेजा कर उसके दूसरे बाजू को पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया, दूसरे हाथ से उसकी ठोडी को पकड़ कर उठाया और बोला-

मे तुझे पैसे दूँगा जलेबी खाने के लिए, जब जी करे खा लिया करना, ठीक है, लेकिन कोई पुच्छे कि पैसे कहाँ से आए तो क्या कहेगी..?

वो - कोई भी बहाना बना दूँगी, तुम चिंता मत करो, मे तुम्हारा नाम नही लूँगी.

मैने उसे कस कर कहा- ओह्ह.. तू तो बड़ी समझदार है मेरी गुड़िया.. शाबास, ले ये 50 रुपये रख अभी… मैने जेब से निकाल कर उसको एक 50 का नोट दे दिया.

और हां जब ख़तम हो जाएँ ना तो बोल देना और दे दूँगा ठीक है. अब तू जा मुझे काम करना है.

वो हां में गर्दन हिला कर मुझसे और ज़ोर से लिपट गयी और मेरे गाल पे किस करके बोली- ओह्ह्ह मेरे प्यारे अरुण भैया, तुम कितने अच्छे हो..?

फिर वहाँ से चली गयी, और मे अपने काम में बिज़ी हो गया.

शाम को सब काम धंधा निपटा कर घर जा कर खाना-वाना खाया, थोड़ा बहुत इधर उधर बैठा, साथ के लड़कों के साथ थोड़ा गांजे की चिलम में कस लगाया और सोने के लिए ट्यूब वेल की ओर चल दिया.

आज मैने अनुभव किया कि मेरा मन आज अशांत नही था, भूरी के साथ बिताए पलों को याद करते ही मेरा शरीर रोमांच से भर गया.

अब मेरे मन में बैचानी की जगह कुछ और ही तरह की फीलिंग आ रही थी. जिसमें कुच्छ संवेदना, कुछ रोमांच, जैसी कॉलेज के दिनो में आती थी, अब मे भूरी का साथ पाने की कल्पना करने लगा.

सोने की कोशिश की तो आँखें बंद करते ही भूरी ख्वाबों में आ गयी, वोही उसका दोपहर वाला रूप, अल्हड़ कच्ची कली अब धीरे-2 मेरे दिलो-दिमाग़ पर छाने लगी.

जिस मुशिबत से में आज से पहले जूझ रहा था, उससे तो मुक्ति मिल गयी थी, लेकिन एक नयी तरह का रोमांच हाबी होता जा रहा.

दो साल से ज़्यादा समय से मैने सेक्स नही किया था, ध्यान मुद्रा शुरू करने के बाद कुछ महीनो तक तो कभी-2 रात को मेरा अंडरवेर खराब हो भी जाता था,

लेकिन जब से कुण्डलिनी यात्रा वाला प्रयोग किया था तब से तो मेरे वीर्य की कभी एक बूँद भी निकली हो, ऐसा फील भी नही हुआ था.

लेकिन आज ढाई साल के बाद दिन की बातों को याद करके मेरे लिंग में भी कुछ-2 तनाव सा महसूस होने लगा था.

सोचते-2 ना जाने कब मुझे नींद ने अपने आगोस में ले लिया और मे भूरी के अधखिले योवन का अनुभव अपने सपनों में करता हुआ सो गया.

दूसरी सुबह जब मेरी नींद खुली, तो मन एक सुखद अनुभूति से भरा हुआ था, मेरा चित्त एक दम शांत लग रहा था, मानो कोई जादू हुआ हो.

सुबह-2 बहुत सारे काम होते हैं घर खेतों के, तो नाश्ता वग़ैरह करके उनमें लग गया, आज मेरा मन काम में भी लग रहा था,

काम निपटाते-2 कब 12 बज गये पता ही नही चला, दोनो चचेरे भाई, अपने-2 स्कूल चले जाते थे, बच्चों को पढ़ाने,

श्याम भाई ने तो मेरे आने के बाद खेतों की चिंता ही छोड़ दी थी.

मे अभी नहा धो के चुका ही था और कमरे में चारपाई पर लेट कर अपने शरीर को थोड़ा रेस्ट दे रहा था कि दरवाजे पर आहट हुई..,

मैने जब देखा तो भूरी को वहाँ खड़े पाया, उसके भी आधे से खेत हमारे ट्यूब वेल के पास ही थे.

ओह्ह्ह.. भूरी…!! आ.. आजा, और सुना कैसी है, आज जलेबी खाई या नही- मैने पुछा उसे.

उसके हाथ में अख़बार के कागज का एक पॅकेट जैसा था.

वो आकर मेरी चारपाई पर बैठ गयी, मे लेटा ही रहा और थोड़ा साइड में खिसक कर उसे बैठने के लिए जगह दे दी.

वो - आज मैने जी भरके जलेबी खाई, और देखो तुमहरे लिए भी लाई हूँ, लो ख़ाके देखो, बहुत अच्छी है और पॅकेट खोल कर मेरे सामने रख दिया.

मे थोड़ा सा उपर को खिसक कर अढ़लेटा सा हो गया अपनी एक एल्बो का सहारा लेकर- अरे वाह !! लगता है गरम-2 हैं,

मैने अपना हाथ बढ़ाया एक टुकड़ा उठाने को तो उसने मेरा हाथ रोक कर बोली - तुम लेटे रहो मे खिलाती हूँ तुमको,

और एक टुकड़ा मेरे मुँह में दे दिया, मैने जान बूझकर उसकी उंगली काट ली…

आययईीीई… कटखने…कहीं के… मेरी उंगली काट ली… ये कह कर अपना हाथ झटकने लगी..

मे हँसने लगा तो गुस्से जैसा मुँह करके बोली- बहुत गंदे हो तुम..!! मे तो तुम्हें जलेबी खिला रही थी और तुमने मुझे ही काट लिया..

जाओ मे नही खिलाती अब, खुद ही ख़ालो..

 
मैने उसका वो हाथ पकड़ कर उसकी उंगली को अपने मुँह में रख कर चूस लिया और बोला - मेरी प्यारी गुड़िया रानी को दर्द हो रहा है,

और अपने कान पकड़ कर सॉरी कहा तो वो खुश हो गयी और मेरी छाती से लिपट गयी..

ओह्ह अरुण भैया..!! तुम कितने अच्छे हो..? सच में इतना प्यार मेरे भाइयों ने मुझे कभी नही किया जितना तुम कर रहे हो मुझे.

मे उसकी पीठ सहलाता रहा, फिर धीरे-2 मेरा हाथ उसकी कमर तक पहुँचा, वो और ज़्यादा चिपकने लगी,

वो मेरी ओर झुक सी गयी थी इस वजह से उसकी छोटी सी गान्ड का आधा हिस्सा उठ गया,

कमर से होते हुए मेरा हाथ उसके गोल मुलायम चूतड़ पर चला गया, उसका भी एक हाथ मेरी जाँघ पर था, जो और चिपकने की वजह से सरक कर मेरे पप्पू के पास पहुँच गया.

उसके हाथ का नर्म एहसास पाकर वो अकड़ने लगा, और इसी उत्तेजना के कारण मेरा हाथ उसके चूतड़ पर कस गया और मैने उसे ज़ोर्से मसल दिया…

आई.. वो छिटक कर मुझसे दूर हो गयी और गहरी नज़रों से देखने लगी, फिर नज़रें नीची करके शरमा गयी.

मैने उसका हाथ पकड़ कर पुछा- भूरी क्या हुआ..? कुछ ग़लत कर दिया मैने..?

वो कुछ नही बोली, और मुस्कुराती हुई तिर्छि नज़र से देखती रही.

मे जलेबी खाने लगा, जब आधी से ज़्यादा ख़तम करदी मैने तो वो मेरी ओर देख

कर बोली- अकेले-2 ही खा जाओगे..? मुझे नही दोगे..?

मे- ले ना, किसने रोका है ले खा, और एक टुकड़ा उसके मुँह की तरफ बढ़ा दिया जो उसने मुँह खोल कर खा लिया.

जलेबी ख़तम करके मे हाथ धोने चला गया, इतने में उससे कमरे की साफ सफाई कर दी, जब लौटा तो वो बिस्तर सही कर रही थी.

मैने फिर से अपने पास बिस्तर पर उसे बिठा लिया और बात-चीत करने लगे उसके घर परिवार के बारे में.

मे- भूरी ! तूने बताया नही, तू उस टाइम दूर क्यों हट गयी थी ? कुछ गड़बड़ हो गयी थी क्या मुझसे..?

वो हंसते हुए बोली - तुमने ज़ोर से नही दबा दिया मेरे वहाँ पर..?

मे - कहाँ पर दबा दिया था..? तो वो हंसते हुए मेरी छाती से लग गयी.. और मुँह छिपा कर बोली - गंदे भैया..!

अच्छा जी..!! तो गंदे भैया से चिपकी क्यों है…? हैन्न..हैन्न.. और उसकी बगलों में गुदगुदा दिया,

वो खिल-खिलाकर मेरी पीठ पर हाथ कस्के और ज़्यादा चिपक गयी और बोली- मेरे गंदे भैया बहुत प्यारे भी तो हैं.. !

मे - आजा अपने प्यारे भैया की गोद में बैठ…! और कहते हुए उसे अपनी गोद में खिचने लगा तो वो एक साइड को दोनो पैर करके मेरी गोद में बैठने लगी,

मैने कहा ऐसे नही..! वो मेरी ओर देखने लगी..! मैने कहा जैसे बच्चे बैठते हैं, दोनो ओर पैर करके वैसे.

तो वो झट से मेरे दोनो ओर पैर निकाल कर, मेरी ओर मुँह करके मेरी गोद में बैठ गयी..,

मेरा पप्पू अकड़ने लगा उसकी मुलायम छोटी-2 लेकिन गोल-मटोल गान्ड को अपने उपर पाकर, जो शायद उसको भी अच्छे से फील हो रहा होगा.

मैने उसके गालों को हाथ में लेकर सहलाया और कहा- तुझे अच्छा लग रहा हैं ना मेरी गोद में ? तो उसने हमम्म.. करके मंडी हिलाकर हामी भर दी.

मे - तू बहुत सुंदर सी प्यारी सी गुड़िया है भूरी ! और मैने उसके होठों को चूम लिया,

शायद उसको ये कुच्छ अट-पटा सा लगा और मेरी ओर देख कर बोली..

अरे ये क्या करते हो..? मेरा मुँह क्यों झूठा कर रहे हो..?

मे - अरे पगली इससे मुँह झूठा नही होता ? ऐसे प्यार किया जाता है, ये कहकर मैने फिर से उसके होठों पर किस किया और इस बार उसके निचले होठ को अपने मुँह में लेकर चूस लिया,

वो मेरे होठ चूसने से गन्गना गयी, और उसके होठ थर-थर काँपने लगे, फिर मैने पुछा- कैसा लगा..?

वो मेरी ओर देखने लगी, उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे, कोमल भावनाएँ जाग उठी, और वो बोली –

बहुत अच्छा, मज़ा आ रहा है, और करो ना..!!

मैने फ़ौरन उसके होठों को अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगा,

इस बार उसके उपर के होंठ को चूसा, तो उसने भी मेरे नीचे के होठ को अपने होठों से कस लिया और मेरी तरह ही चूसने लगी,

अब मैने अपनी जीभ को उसके दाँतों के उपर घुमाया तो उसने अपना मुँह खोल दिया,

मेरी जीभ अब उसके मुँह के अंदर जाकर इधर-उधर सैर करने लगी.

जब मेरी जीभ उसकी जीभ से टकराई, तो उसको इसमें मज़ा आया और वो भी अपनी जीभ मेरी जीभ से भिड़ाने लगी,

अब हमारी जीभें एक दूसरे से कुस्ति करने लगी.

जलेबी खाने के बाद मीठी लार का मज़ा एक दूसरे के मुँह में घुलने लगा…

जब 2-3 मिनट ऐसा ही चला, तो मैने किस तोड़कर उससे पुछा- क्यों भूरी.. मुँह झूठा करने में मज़ा आया कि नही..?

वो शरमा कर मेरे सीने से चिपक गयी.. और बोली- तुम कोई जादूगर तो नही हो ? मेरा मन ही नही कर रहा तुमसे अलग होने को.

मेरे दोनो हाथ अब उसके गोल-मटोल नितंबों को सहलाने लगे तो वो और थोड़ा उपर को उचक गयी,

उसकी मुलायम गान्ड को सहलाते हुए मेरे हाथ उपर की तरफ बढ़ने लगे और उसकी पीठ पर होते हुए उसकी दोनो बगलों को सहलाते हुए जैसे ही उसकी गोल-गोल संतरे साइज़ की चुचियों पर पहुँचे..

और हल्के से उसके चूचुकों को सहलाया, वो सिसकते हुए मेरे गले में बाहें डालकर मेरे होठों को चूसने लगी…

 
अब में उसके संतरों को थोड़ा-2 मसल्ने लगा, तो वो पीछे की तरफ को गिरती हुई आँखें बंद करके सीत्कार उठी…

सस्स्सिईईई…..हाइईईईईई…..उउफ़फ्फ़… ऑश…ससुउउऊओ…म्माआ..आअहह..

बहुत मज़ाअ.. आअरराहहाअ.. हाइईइ…और जॉर्रईए…सीईए…ईीई…द.दाब्बाऊओ…हुन्न्ं…

मज़ा आया..? मैने उसके कान में कहा… तो वो शरमा कर बोली- हां बहुत..

मे- और ज़्यादा मज़ा लेना है… तो उसने हां में मुन्डी हिला दी.

मैने उसके कुर्ते को उसके उपर से निकाल दिया, उसकी फक्क गोरी चुचियाँ नुमाया हो गयी, जो एकदम कड़क गोल-गोल जिन्हें देखकर मेरी लार टपकने लगी,

मैने एक को मुँह में भर लिया, दूसरी को हाथ से सहलाने लगा. जैसे ही मैने उसके कंचे के साइज़ के निपल को जीभ लगाके चाटा, उसकी आँखें बंद होती चली गयी, और सिसकने लगी.

कुछ देर चुचियों पर एक्सर्साइज़ करने के बाद मैने उसको उचका कर उसकी सलवार भी निकलवा दी…

हयईए… रब्बा…मारजावां गुड ख़ाके… लंड तो मस्ती में झूम उठा उसकी गान्ड देखकर,

क्या सुडौल, गोल-गोल छोटी सी गान्ड गोरी चिटी एकदम मुलायम,

पाजामा फाड़ने पे उतारू मेरा पप्पू, बुरी तरह फुफ्कारने लगा… जैसे कह रहा हो-खोल पाजामा साले, निकाल मुझे बाहर,

इस गान्ड पर किस करवा दे मेरे भाई… प्लीज़… पर फिलहाल मैने उसकी माँग ठुकरा दी.

अब मैने भूरी को बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी रस छोड़ती मुनिया को हाथ से सहलाया,

थोड़े-2 बाल आते जा रहे थे, बालों में हथेली का घर्षण बड़ा सुखद लग रहा था,

उसकी कोरी चूत के होंठ बंद थे, जब मैने अंगूठे से उन्हें खोला, आहह… क्या पतले-2 होठ बिल्कुल जैसे उसके उपर वाले थे बिल्कुल वैसे ही.

भूरी मस्ती में आँखें बंद किए पड़ी थी. दीं दुनियाँ से बेख़बर दूर कहीं आसमानों में उड़ती हुई………

मैने उंगली को उल्टा करके उसकी मुनिया की दरार पर बहुत ही हल्के से फिराया नीचे से उपर, उपर से नीचे.. !

भूरी ने एक बार अपने घुटने मोड़ कर अपनी टाँगों को भींचा और फिर से खोल दिया, उसकी कमर में कंपन सा होने लगा.

जब मैने अपनी जीभ को उसकी बंद होठों वाली मुनिया के उपर चलाया तो उसकी कमर थरथराने लगी,

मैने अंगूठों की मदद से उसके बंद होठों को खोला और उसके अन्द्रुनि गुलाबी परत को जीभ से चाट लिया…

आअहह….म्म्मा आंम्मिईिइ….ससिईईई..ऊूउउऊऊओह…हाआसस्स्शह..

आयईयीई….भ..आ..ईयी..इय्य्ाआअ…. हाययईई… मत करो…

और उसकी गान्ड हवा में उठाने लगी…, उपर की ओर मौजूद उसकी नन्ही सी भज्नासा (क्लिट) अब खड़ी होने लगी थी और कुक्कु की चोंच की तरह बाहर को आ गई, जिसे मैने अपने होठों में क़ैद करके चूसने लगा…

भूरी का मज़े के कारण बुरा हाल था, उसकी मुनिया पानी बहाने लगी, बूँद-2 करके चुहुने लगी.

मेरा एक हाथ उसकी एक चुचि को मसल्ने लगा, उसके छोटे से छेद के द्वार पर उंगली को रख कर उसका पोर अंदर कर दिया और जीभ अपना काम कर रही थी,

दो मिनट में ही भूरी अपना आपा खो बैठी, और कमर को हवा में उच्छाल कर उसकी चूत फुदक-2 कर पानी फेंकने लगी.

कुँवारी चूत का टेस्टी रस मेरे पेट में जाने लगा.

एक मिनट तक लगातार झड़ने के बाद भूरी शांत पड़ गयी.. उसकी आँखें बंद थी और लंबी-2 साँसे भर रही थी.

मैने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे हिलाते हुए पुछा- कैसा लगा भूरी..? मज़ा आया..?

उसने आँखें बंद किए ही हमम्म..में गर्दन हिला दी.

इससे भी आगे जाने का मेरा मन था.. सॉरी !! मेरे लंड महाराज का, लेकिन मुझे पता था, कि ढाई साल के ब्रह्म्चर्य को झेलना इस कच्ची कली के बस का रोग नही है.

सो मैने भूरी को कहा- भूरी कपड़े पहन और घर जा.

वो एकदम चोंक कर मुझे देखने लगी.. !

मे- ऐसे क्या देख रही है ? तो वो बोली, और करो ना भैया… इसके आगे..का.

मे- क्यों मज़ा नही आया..?

वो- बहुत आया ! पर मे वो तुम्हारा वो लेना चाहती हूँ अपनी इसमें.. , जैसे मेरे भैया भाभी के साथ करते हैं… प्लीज़ भैया दे दो ना..!

मे- वो भी मिलेगा भूरी धीरज रख, अभी वो तेरे लेने लायक नही है, जब होगा तो ज़रूर दूँगा तुझे..! ठीक है…! अब जा..

वो- उउन्न्हुउ… अभी क्यों नही..? अभी उसमें क्या कमी है..?

मे- देख भूरी ज़िद नही करते मेरी गुड़िया.. ! जल्दी दे दूँगा तू चिंता ना कर हां..! अब जा घर.

जैसे तैसे मैने उसको समझा-बुझा कर घर रवाना किया.

भूरी तो चली गयी, लेकिन अब इस लौडे का क्या करूँ ?

पाजामा फाडे दे रहा है मादरचोद… बैठ साले.. ! मे उसको जितना नीचे को दबाता वो उससे भी दुगनी तेज़ी से उपर को आ जाता.

मैने एक लोटा भरके पानी पिया और खेतों की ओर घूमने निकल गया ये सोच कर कि कुछ मन इधर-उधर लगाके शायद शांत हो जाए.

ज़्यादातर खेतों में गेंहू खड़े थे जो इस समय बाली आने को थे, माने कमर तक उँचाई थी उनकी.

घूमते-2 दो-तीन खेत आगे निकल गया, एक खेत में एक मजदूर घास काट रही थी अपनी भैंस के लिए.

मे उसके पीछे जा कर खड़ा हो गया और अचानक से बोला.

मे- अरे फूलवतिया !! तू ! तू यहाँ अकेली क्या कर रही है..?

वो- पंडितजी ! भैंस के लिए घास काट रही हूँ..!

मे- तो फिर ये अपनी झोली उतार के काट ना, इतनी बड़ी झोली साथ में लटका के काटेगी, तो गेंहू नही टूटेंगे..?

अभी तक उसने मेरी ओर मुड़कर देखा नही था, अब वो उठकर खड़ी हुई और मेरी ओर घूम कर बोली- देखो अभी तक एक भीईीई……,

जैसे ही उसकी नज़र मेरे पाजामा पर पड़ी, वो बोलते-2 अटक गयी और आँखें फाड़-2 के मेरे उठे हुए पाजामा को देखे जा रही थी.

 
फूलवतिया एक गहरे काले रंग की थी, उसकी शादी 8-10 महीने पहले ही हुई थी, काले रंग के अलावा उसका वाकी का सामान बड़ा ही मस्त था,

बड़े-2 पहाड़ जैसे उसके एकदम आगे को सिर उठाए चुचे, बड़ी-2 टीले जैसी मोटी गान्ड, कमर एकदम पतली.

चेहरा भी अच्छा था, कुल मिलकर, रंग काला होने के बावजूद भी चोदने लायक मस्त माल थी.

जब वो बहुत देर तक मेरे खड़े अकदे लंड की ओर देखती ही रही तो मैने उससे पुछा- ऐसे क्या देख रही है..? कुछ चाहिए क्या..?

वो- चाहिए तो बहुत कुछ, पर तुम दोगे नही पंडित जी..!

मे- क्या चाहिए..? बोल ना..! देने लायक हुआ तो ज़रूर मिलेगा..!

वो मेरे पास आई और हाथ बढ़ाकर मेरे लंड को पाजामा के उपर से पकड़ लिया.. ये दोगे..?

मे- अबबे साली छोड़ ! चौड़े में ही लेगी..? कोई देख लेगा.., लेना है तो चल कमरे में.

मंत्रमुग्ध सी वो मेरे पीछे-2 कमरे में आ गई.

कमरे में घुसते ही उसने मेरा पाजामा खींच दिया और मेरे अकडे लंड को हाथ में लेकर मसल्ने लगी.

मे - भेन्चोद साली तू तो बड़ी गरम हो रही है, एक मिनट का भी सबर नही है तुझे ?

वो- अरे अरुण बाबू..! ऐसा हथियार सामने देख कर तो किसी का भी मन डोल जाएगा.

और फिर मेरी शादी करके मेरा पति मदर्चोद जाने कहाँ मर गया, भडुए ने मूड कर भी नही देखा.

दिन रात ये निगोडी मेरी चूत खुजाति रहती है.

मे - चल मे आज तेरी इस चूत की ऐसी खुजली मिटाउंगा की तू भी याद रखेगी, ले चल अब इसकी थोड़ी सेवा कर, तभी ये मेवा खिलाएगा तेरी चूत को,

और मैने अपने मूसल को उसके होठों पे रख दिया, उसने फ़ौरन उसे अपने मुँह में ले लिया और मस्त चुसाइ करने लगी.

इतने में मैने उसके बड़े-2 चुचे ब्लाउस खोल कर बाहर निकाल लिए और मसल्ने लगा.

वो उउन्नग्ग-2 जैसी आवाज़ें निकालती हुई अपनी ही धुन में लगी थी, वो तो ऐसी टूट के पड़ी की, जैसे इसके बाद कभी कोई लंड मिलेगा ही नही चूसने को.. हां शायद ऐसा गोरा लंड ना मिले उसे..!

जब उसका मुँह दुखने लगा तो वो फ़ौरन अपना लहंगा उपर उठा कर घोड़ी बनके खड़ी हो गयी चारपाई की पाटी पकड़ के, और बोली-

अब बस पेल दो जल्दी से, पर धीरे-2 आराम से डालना, बहुत दिन से गया नही है इसमें.

मैने उसके मोटे-मोटे चुतड़ों पर थपकी दी गोल-गोल सहलाया और थूक हाथ पे लेके लौडे को गीला किया, रखा उसकी भैंस जैसी चूत के मुँह पर और पेल दिया एक तगड़े से धक्के के साथ.

अरेयययी…माररर ग्ाआईयईई…अमम्माआ…मेरी छूट फाड़ डीईइ… रीए…पा.न्ंदडीत्तटजजििीइ….नईए…

मैने उसकी नंगी पीठ पर एक थपकी दी.. भेन्चोद साली क्यों नाटक करती है.. ऐसी क्या कोरी चूत है तेरी जो इतना चिल्ला रही है..

वो- नही ! सच में फाड़ दी तुमने हइई… बड़ा मोटा है तुम्हारा सोटा… हाईए राम… धीरे से डालना था ना..

मे- अच्छा चल अब ध्यान रखूँगा.. और मैने धीरे-2 करके पूरा 8” का मोटा सोटा उसकी चूत में डाल दिया..!

अब लंड भी बेचारा क्या करे.. 2 घंटे से अकडा पड़ा है, ढाई साल से उसकी कोई सुध नही ली थी सो आ गया अपनी औकात में और कुछ ज़्यादा ही तगड़ा सा लग रहा था आज.

अब मैने धीरे-2 अंदर बाहर करना शुरू कर दिया, पूरा सुपाडे तक निकालु और फिर जड़ तक पेल दूं. फूलवतिया भी पूरी हिल जाए, उसके दोनो पपीते ऐसे हिल रहे थे जैसे झूला झूल रहे हों.

मज़े से मेरी आँखें बंद हो चुकी थी, मुझे अब कुछ भी दिखाई नही दे रहा था बस दिमाग़ में एक ही धुन, जल्दी से माल रिलीस हो कैसे भी.

लेकिन वो तो साला जाने कहाँ सोया पड़ा था, अभी तक तो कोई आसार ही नज़र नही आए,

फूलवतिया की कमर जबाब दे गयी, उसकी चूत बाल्टी भर-भरके पानी फेंक रही थी.

आख़िर वो थक कर खड़ी हो गयी, लेकिन मेरे धक्के बंद नही हुए..

पंडितजी साँस तो लेने दो, मेरी कमर दुखने लगी है,

मे- चल बिस्तर पर लेट जल्दी- और मैने उसे धक्का ही दे दिया, अब में उसकी टाँगे अपने कंधों पर रख कर उसकी धपा-धप चुदाई करने लगा.

मेरे मुँह से हूँ..हूँ, जैसी आवाज़ें निकल रही थी मानो कोई कुल्हाड़ी लेकर किसी पेड़ के तने को काट रहा हो.

फूलवतिया को चोदते-2 एक घंटा हो गया था, उसका कुआँ बिल्कुल खाली हो चुका था,

लेकिन मेरा अभी तक कोई अता-पता नही था, मुझे अब चिंता होने लगी कि साला निकलेगा भी या नही.

मुशिबत ये थी कि जब तक वीर्य नही निकलेगा ये साला लॉडा बैठेगा ही नही, अगर नही बैठा तो..

मे ये सोच ही रहा था कि फूलवतिया हाए..हाए..करने लगी और मुझे छोड़ने के लिए मिन्नतें करने लगी, उसकी चूत बिल्कुल सूख चुकी थी,

सूखी चूत में मेरे मूसल के घर्षण से उसकी चूत में दर्द होने लगा, उसकी चूत छिल्ने लगी.

अब छोड़ दो पंडितजी… मे तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, कभी भूलके भी तुमसे चुदने के लिए नही कहूँगी… भगवान के लिए अब छोड़ दो मेरी चूत में दर्द हो रहा है, हाई री अम्मा कहाँ फँस गयी आज…

 
मैने उसको इस पोज़िशन से चोदना बंद कर दिया, और कुछ देर उसकी चुचियाँ पीने के बाद थोड़ा फिर से उसको गरम किया और खुद पलग पर लेट कर, उसको अपने लंड पे बिठा लिया,

अब वो बेमन से मेरे लंड पर अपनी बहाल हो चुकी चूत को रख कर कमर उपर नीचे करने लगी.

थक चुकी थी बेचारी, सो ज़यादा देर नही कर पाई तो घुटने डालकर मेरे उपर पसर गयी,

मुझे अब कुछ-2 लगने लगा था कि कुच्छ उठने लगा है मूलाधार से,... कुछ आ रहा है उर्जा श्रोत से मेरे आंडों की तरफ….

अब मेरे रुकने का तो कोई सवाल ही पैदा नही हो सकता था, सो उसकी गान्ड को थोड़ा सा उचका कर नीचे से बुरी तरह कमर चलाने लगा,

उसके पपीतों को दोनो हाथों में थाम लिया, मेरी कमर की स्पीड इतनी तेज को गयी कि बॅंक की नोट गिनने वाली मशीन भी फैल हो जाए…लेकिन संख्या गिन ना सके….

मज़े में मे इतना बाबला हो गया था, कि उसके पपड़ी भरे सूखे से काले-2 होठ जो कभी चूसने की मे सोच भी नही सकता था, अपने मुँह में भर लिए और चूसने लगा.

जब फूलवतिया नही झेल पाई तो उसने अपने हाथों को मेरी छाती पर अड़ाकर जबर्जस्ती मेरे उपर से उठ गयी,

मे अब क्या करता, मज़ा शुरू हो चुका था इस साली ने खड़े लंड पे धोका दे दिया.

लपक के पकड़ा उसका सर, और जबर्जस्ती से अपना मूसल उसके मुँह में घुसेड दिया जड़ तक, जो उसके गले में जाके अटक गया, और जल्दी-2 कमर चलाई.

करीब 8-10 धक्कों में आख़िरकार मुझे मेरी मंज़िल मिल ही गयी और मैने डकार मारते हुए…उसके गले में लंड ठूंस कर दे दनादन पिचकारी पे पिचकारी छोड़ दी..,

कम से कम डेढ़ छटांक गर्म-2 घी उसके गले में उतार दिया जो सीधा उसके पेट में चला गया.

जैसे ही मेरी उत्तेजना थोड़ी शांत हुई और मेरी नज़र उसके मुँह पर पड़ी, उसके गले की नसें फूल चुकी थी, आँखें बाहर को उबलने लगी थी…

फ़ौरन मैने अपना सोटा बाहर खींच लिया,

वो खों-2 करके खांसने लगी मैं दौड़ कर एक ग्लास पानी लाया और उससे पिलाया तब जाके वो सामान्य हुई.

वो हान्फते हुए बोली- हे राम मार ही डाला था तुमने, पंडित जी बहुत जालिम हो, क्या हमेशा ऐसे ही करते हो क्या..?

डेढ़ घंटे से रगड़-2 कर मेरी हालत खराब कर दी.

माफ़ कर्दे मेरी फुलफुल्ली…, भेन्चोद निकल नही रहा था तो मे परेशान हो गया, अब ढाई साल के बाद आज निकाला है तो ये तो होना ही था.., ये बता कैसा लगा.

वो- स्वाद तो अच्छा था मीठा लेकिन बहुत ही गरम, और अब जलन हो रही है गले में. लगता है बहुत गर्मी है तुम्हारे वीर्य में.

मे - अब तू जा अपना काम कर और मुझे थोड़ा आराम करने दे.

मैने जेब से उसे 500 का नोट निकाल कर पकड़ा दिया तो वो खुश हो गयी, और मेरे लंड को चूम कर चली गयी… !

वो तो चली गयी, लेकिन जैसे ही उसने मेरे लंड को चूमा, मेरा शेर फिर दहाड़ने लगा.

लेकिन अब कुछ नही हो सकता था सो मैने उसे पूचकार कर शांत रहने के लिए कहा और जबर्जस्ती सो गया.

करीब एक-डेढ़ घंटा सोने के बाद मे उठ गया, वो साला पाजामे में अभी भी फन्फना रहा था, आज साला इसको हो क्या गया है भेन्चोद मान ही नही रहा.

ये सब सोच ही रहा था कि तभी फूलवतिया अपना घास का गट्ठर लेके आ गयी और मेरे से पानी माँगा.

मैने उसे पानी पिलाया और उसको बोला- फुल्लो रानी देख ना ये साला अभी भी नही मान रहा कुछ करेगी क्या इसका,

तो वो बोली – ना ! पंडित जी, तुम दो-दो घंटे रगड़ते हो इतना मेरे बस का नही है.

मे- अरे अब नही लगेगा इतना टाइम, वो पहले तो दूसरा मामला था, थोड़ा कर ना जल्दी हो जाएगा.. आजा..

वो- वैसे पता नही, जबसे तुम्हारा वो घी पिया है, मेरी रामदुलारी भी बहुत आँसू बहा रही है, पर इस बार मेरी चूत को पिलाना पड़ेगा अपना घी.

मैने कहा ठीक है, और फिर हम दोनो ने आधा घंटा खूब धमा चौकड़ी मचाई, अंत में उसकी पोखर को अपने पानी से लबालब भरके फुल कर दिया तो वो खुश होकेर बोली,

मुझे यही चाहिए था अपनी बच्चेदानी की गर्मी शांत करने को, और उठाके अपना घास का गट्ठर चली गयी.

मे सोचता ही रह गया कि ये क्या बोलके गयी..? और क्यों..? लेकिन जब समझ में आया तो अपना सर पीट के रह गया.

पर चलो आज ये मेरा सारा प्रेशर तो रिलीस कर गयी, अब में और मेरा पप्पू दोनो नॉर्मल थे.

कुल मिलाकर आज का दिन मेरे लिए अच्छा साबित हुआ.

दो दिन ऐसे ही निकल गये मे अपने रोजमर्रा के कामों में लगा रहता, तीसरे दिन दोपहर को मे घर खाना खाने के लिए निकलने वाला था कि भूरी आ धमकी.

आज भी वो जलेबी लेके आई थी.

मैने कहा- अरी भूरिया रानी तुझे जलेबी के अलावा और कुछ अच्छा नही लगता क्या..?

वो - अरे अरुण भैया, और यहाँ गाँव में मिलता ही क्या है, ये कम-से-कम ताजी-2 मिल तो जाती हैं. लो खाओ अच्छी हैं.

हम दोनो ने मिलकर जलेबी ख़तम की और फिर बैठके बातें करने लगे.

 
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