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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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अब मेरा मन कुछ शांत था, और आँखे बंद करके अपनी ट्रेन की सीट पर पसर गया. मेरी समझ में आ गया था कि शायद इसलिए मेरे भाइयों को इतना सेल्फिश बनाया है, जिससे मेरा लगाव घर से ना रहे.

मे कॅंप में पहुँच चुका था और वहाँ जाकर मैने केप्टन बत्रा को रिपोर्ट किया, कॅप्टन बत्रा 6’2” लंबा मजबूत शरीर वाला एक बहुत ही कड़क मिजाज़ फ़ौजी था,

ट्रेनिंग के दौरान अपने कॅड्रर के साथ उसका कोई भी सॉफ्ट कॉर्नर नही होता था, पर्षनली वो बहुत ही अच्छा और को-ऑपरेटिव आदमी था.

चूँकि मेरा कोई डिफेन्स फील्ड वाला बॅक ग्राउंड नही था जैसा कि इस कॅंप में ट्रैनिंग ले रहे ज़्यादातर कॅड्रर्स का था, यहाँ ज़्यादातर एनएसजी के कमांडो ही ट्रैनिंग ले रहे थे,

लेकिन मेरा तो पूरा मामला ही स्पेशल था कॅप्टन बत्रा और उस कॅंप के सभी लोगों के लिए.

मेरे लेटर में ना तो कोई रंक थी, नही कोई डिफेन्सिव बॅक ग्राउंड, और नही आनेवाले समय की कोई दिशा निर्देशन की किस काम के लिए ट्रेंड किया जा रहा है.

पीएम ऑफीस से लेटर इश्यू हुआ था कि इस बंदे को कमांडो ट्रैनिंग देनी है.

कॅंप में पहले दिन मेरा रहने खाने पहनने, टाइमिंग शेड्यूल यही सब जानने, लोगों से इनटरेक्षन जिस बॅच में मुझे डाला था उनके साथ यही सब में चला गया.

दूसरे दिन से ही ट्रैनिंग शुरू हो गयी.

सुबह 4 बजे उठकर सब कुछ रेडी होकर 5 बजे तक ग्राउंड में पहुँचना, जहाँ परदे से लेकर और कई तरह की फिज़िकल एक्सर्साइज़,

8 बजे तक पूरे शरीर के कस-बल निकल दिए. फिर फ्रेश होकेर चाइ नाश्ता करके, 2 घंटे आराम, उसके बाद फिर से ग्राउंड ट्रैनिंग, शाम को निशाने बाज़ी, फिर बॉक्सिंग.

फाइट करना और शाम के डिन्नर के बाद स्क्रीन पर थियरेटिकल रूल्स रेग्युलेशन बताना, ये सब, पूरा दिन एकदम टाइट शेड्यूल था 24 घंटे का.

पहले एक महीने में ही 5केजी वेट लॉस हो गया, शरीर की एक-एक पसली चमकने लगी, तब कहीं जाके प्रॅक्टीस में आया ये सब.

जैसे-2 समय बढ़ता जा रहा था, वैसे-2 ट्रैनिंग हार्ड और हार्ड होती जा रही थी, बीच-2 में डमी मिसन देके एक्सपेडाइट करने के तरीक़े सिखाए जाते थे.

3 महीने कैसे निकल गये पता ही नही चला. संडे को सिर्फ़ सुबह का ही सेशन होता था, शाम को फ्री टाइम मिलता था जिसमें आप कहीं भी बाहर वो भी कॅंप के व्हीकल से अपने ग्रूप में ही जा सकते थे.

हमारा कॅंप बहुत बड़े एरिया में फैला था, जिसके अंदर ही सब कुछ होता था, फाइटिंग, फाइरिंग, फुटबॉल खेलना, क्रिकेट से लेकर टेनिस सब कुछ, जो समय-2 पर एक दूसरे ग्रूप के बीच होते रहते थे.

हमारे कॅंप के बराबर में ही पोलीस अकॅडमी थी, जहाँ सूपर कॉप ट्रैनिंग दी जाती थी.

ये हमें सिर्फ़ इतना पता था, लेकिन एक दूसरे से कोई लिंक नही था…ना ही किसी का इधर से उधर आना-जाना रहता था…

एक बार पॉल्टिकल लेवल पर दोनो सेंटर्स के बीच क्रिकेट मॅच का आयोजन होना तय हुआ. चूँकि उनका ग्राउंड हमारे ग्राउंड से वेल मेंटेंड था, मॅच के लिए,

सो उनके ग्राउंड में मॅच होना तय हुआ, मे भी टीम 11 में था, एक ऑल राउन्डर के तौर पर.

मॅच वाले दिन किसी भी तरफ का कोई भी ट्रैनिंग सेशन नही होना था,

प्लेयर्स के अलावा, वाकी के दोनो तरफ के लोग बैठके मॅच का आनंद उठाने वाले थे और अपने-2 प्लेयर्स को चियर-अप करते.

सुबह 7 बजे हम सब उनके ग्राउंड में पहुँच गये. दोनो तरफ की टीम का अलग-2 ड्रेस कोड था, पोलीस ट्रैनिंग कॅंप में फीमेल कॅड्रर भी थे.

मॅच शुरू हुआ.. 25-25 ओवर्स के मॅच में हमारी पहले फीलडिंग थी, उनके साइड के बॅट्समेन अच्छी बॅटिंग कर रहे थे.

मैने भी 5 ओवर बोल्लिंग की और दो विक्केट भी लिए. उन लोगों ने 25 ओवर में 165 रन बनाए, अब हमारे लिए 166 रन का टारगेट था.

दूसरी इन्निंग शुरू हुई, चूँकि हमारे प्लेयर कोई प्रोफेशनल नही थे, वैसे भी हार्ड ट्रैनिंग के बाद इस तरह के मॅच-वेच खेलने का टाइम ही कहाँ मिलता था,

दूसरी तरफ के लोग काफ़ी एंजाय करते थे इस तरह की आक्टिविटीस को.

सो जल्दी ही हमारे साइड की बॅटिंग बिखरने लगी. अभी 10 ओवर का ही मॅच हुआ था कि 40 रन पर ही 4 विक्केट टपक गये.

6त नंबर पर मेरी बॅटिंग आई, हमें अब 15 ओवर में 126 रन बनाने थे जो कि हमारे जैसी टीम के लिए बहुत दूर की कौड़ी लग रही थी.

लेकिन सामने हमारी टीम का ओपनेर जमा हुआ था, तो मेरे लिए आशा ये थी कि अगर मैं भी एक-दो ओवर में जम जाता हूँ, तो कुछ हो सकता था.

दो ओवर तक हम दोनो ही स्ट्राइक रोटेट करके जमाने के हिसाब से खेलते रहे,

धीरे-2 रनो की रेट भी मेनटेन करते जा रहे थे, लेकिन रिक्वाइयर रेट बढ़ती जा रही थी,

करीब 5 ओवर खेलने के बाद मैने लंबे शॉट खेलने का फ़ैसला लिया.

और अगले ही ओवर में 1 चौका और 1 छक्का लगाकर मैने अपने मंसूबे विरोधी टीम के सामने रख दिए.

 
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अभी 20थ ओवर ही चल रहा था और हम 100 का स्कोर पार चुके थे कि ओपनर एक लंबा शॉट मारने के चक्कर में बाउंड्री पर लपक लिया गया.

अब साला इसकी जात का चोदु मारू, इस भोसड़ी वाले को क्या उतबाल हो रही थी,

अच्छा-ख़ासा पिक-अप बढ़ रहा था. अब सामने सब लल्लू ही आने वाले हैं.

फिर भी मैने हिम्मत नही छोड़ी, चूँकि स्टॅंड चेंज हो चुका था, और अभी दो बाल 20थ ओवर की वाकी थी, मुझे थोड़ा गुस्सा भी था तो मैने अगली ही बॉल को ऐसा उड़ाया कि वो साली गायब ही हो गयी.

चरों तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ी, अब बॉल आने में टाइम लगने वाला था सो मे अपनी क्रीज़ पर बॅट टिकाए खड़ा था,

मेरी नज़र दर्शक दीर्घा की ओर ही थी, जहाँ एक लेडी कॅड्रर बहुत देर तक खड़े होकर अपने दोनो हाथ उपर करके ताली बजा रही थी.

दूर से मे उसे पहचान तो नही पाया पर नोटीस ज़रूर कर लिया….

वो बॉल नही मिली, तो लगभग उसी कंडीशन की दूसरी बॉल ली गयी, और उस लास्ट बॉल पर सिगल लेकर अगले पूरे ओवर को धुनने का सोच लिया,

क्योंकि अब सामने वाले बॅट्स्मन पर भरोसा करना मतलब अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना--- बोले तो मॅच गँवा देना.

सो इस्पिन बोल्लिंग की पहली बॉल से ही धुनाई शुरू कर दी 4 चौके और एक बॉल पर 2 रन दौड़े, फिर लास्ट बॉल पर सिंगल लेकर बॅटिंग अपने पास ही रखी,

लास्ट ओवर के 19 रन की वजह से रन रेट थोड़ी कंट्रोल में आ गई. अब हमे 4 ओवर में 46 रन बनाने थे.

8-10 रन पर ओवर के हिसाब से मैने 3 ओवर आराम से निकाल दिए. अब बचा था लास्ट ओवर.. यानी 6 बॉल 19 रन..

लास्ट ओवर उनका बेस्ट बोल डालने वाला था उनके हिसाब से,

हालाँकि मैने बीच में उसका भी एक ओवर खेला था.

उसने पहली बॉल डाली, जो मे मिस कर गया, टेन्षन क्रियेट होने लगा.

फिर मैने हाथ का इशारा करके एम्पायर को रुकने के लिए कहा और क्रीस छोड़कर आँखें बंद की, 4-6 लंबी साँस ली और रिटर्न गार्ड लिया.

दूसरी बॉल को बात के बीचो-बीच लिया, और एक भनभनाता हुआ गरमा गरम शॉट पड़ा बॉल के थोबडे पर, और उड़ा दिया हवा में 6 रन के लिए,

बॉलर भी तैश में आ चुका था, बिना समय गँवाए उसने तीसरी बॉल डाली और वो भी हवा में और ये 6 रन.

अब मे रेलेक्ष हो चुका था, 3 बॉल में 7 रन तो कर ही देने थे.

लेकिन चौथी बॉल मे फिर मिस कर गया जो उसने बहुत ही स्लो डाली.

अब दोनो साइड के लोगों की एग्ज़ाइट्मेंट बढ़ने लगी थी, मॅच एक रोमांचक स्थिति में पहुँच चुका था, मॅच का नतीजा अगली ही बॉल पर हो जाना था.

5थ बॉल को किसी भी सूरत में बाउंड्री के बाहर भेजना ही था.

उसने बॉल डाली और उसे बीच बल्ले पर लेकर फिर उड़ा दिया 6 रन के लिए,

हमारी ओर के सभी लोग खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे, स्कोर लेवेल हो चुका था और लास्ट बॉल आनी अभी शेष थी.

वो भी आई और उसको भी बाउंड्री के पार करके मैने वो हारा हुआ मॅच जीत लिया.

हमारी तरफ के प्लेयर्स ने मुझे कंधों पर उठा लिया और पूरे ग्राउंड में चक्कर लगाने लगे.

वो लेडी कॅड्रर अपने साइड में एकांत में खड़ी तालियाँ बजा रही थी, अब मैने उसी पर ध्यान दिया तो वो कुछ जानी पहचानी सी लगी.

चक्कर लगाते हुए और थोड़ा नज़दीक आया तो.. ओ तेरी की ट्रिशा रानी… यहाँ इसी कॅंप में ? मेरी तो खुशी दुगनी हो गयी यार !!

फिर जब सेलेब्रेशन ख़तम हुआ तो वो मेरे नज़दीक आई और हाई हेलो करके बोली- कैसे हो अरुण..? पहचाना..?

मे- तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ डियर....!

ऋषभ ने बताया तो था लेकिन तुम इसी कॅंप में मिलोगि ये पता नही था. और सूनाओ, कैसी चल रही है ट्रैनिंग..? और कितने दिन वाकी हैं..? वग़ैरह..2.

हम ये बातें कर ही रहे थे कि मेरा नाम अनाउन्स हुआ, और में एक्सक्यूस मी बोल कर उधर चला गया.

मुझे मॅन ऑफ थे मॅच का अवॉर्ड दिया गया, उसके बाद फिर मे और ट्रिशा कुर्सियों पर आकर बैठ गये और बात चीत करने लगे.

उसके यहाँ अब 6-7 महीने ही बचे थे उसके बाद उसकी पोस्टिंग हो जानी थी, इससे ज़यादा हम यहाँ और कुछ नही कर सकते थे सो एक दूसरे का सेल नंबर एक्सचेंज करके अपने-2 कॅंप में चले गये.

अब हम दोनो सोने से पहले फोन से बातें कर लिया करते थे और इसके अलावा मिलने का कोई चान्स नही दिखाई देता था,

उसके कॅंप में इतनी बाउंडेशन नही थी, लेकिन इधर साला सब कुछ सीक्रेट रखना पड़ता था, सो किसी भी कॅड्रर को फ्रीक्वेंट्ली कहीं भी जाने की पर्मिज़न नही होती थी.

ऐसे ही एक रात हम बात कर रहे थे, तो मैने उसको कुरेदा और पुछा - तो

ट्रिशा अब ट्रैनिंग के बाद कहाँ पोस्टिंग लेने वाली हो..?

वो- अब पता नही कहाँ मिलती है, कुछ दिन जहाँ मिलेगी गुजारने ही पड़ेंगे, बाद में देखते हैं क्या हो सकता है.

मे - इस लाइन में आने का विचार कैसे आया..?

वो - बस ग्रॅजुयेशन करने के बाद कुछ नही तो बैठे-2 यूपीएससी का फॉर्म भर दिया, एक साल जमकर तैयारी करके एग्ज़ॅम दिया और हो गया सेलेक्षन.

जाना तो चाहती थी आइएएस के लिए, लेकिन थोड़ी सी कमी रह गयी और आइपीएस रंक मिल गयी.

मे - तो अब ट्रैनिंग के बाद शादी करके सेट्ल हो जाओगी, लाइफ सेट हो गयी तुम्हारी तो.

वो - आपने करली शादी..?

मे - नही..!

वो - क्यों..?

मे - बस नही की.. ! मैने तुम्हें बताया तो था.. ना रीज़न..!!

वो - तो मैने भी तो आपसे कुछ कहा था ना!!

मे - ओह ट्रिश..! तुम बिल्कुल पागल हो, मेरे पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद क्यों करना चाहती हो..?

वो - आपने भी तो किसी के लिए की ही है ना..!! और एक बात कहूँ आपसे, मेरे आइपीएस बनने के पीछे एक यही कारण था,

पिता जी मेरी शादी कर देना चाहते थे, सो मैने इसमें बिज़ी होने का बहाना बना कर जैसे-तैसे टाल दिया बात को.

मे - तो अब क्या बहाना बनाओगी..? अब तो ट्रैनिंग भी पूरी होने वाली है..!

वो - समय बताएगा.. कैसे क्या कर पाउन्गि..?

लेकिन अब कम-से-कम मेरे साथ कोई जबर्जस्ती नही कर पाएगा मेरी मर्ज़ी के खिलाफ.

मे - तुम सच में पागल हो ट्रिशा, प्लीज़ मेरी वजह से अपना जीवन यौं खराब मत करो..!

वो - आप शादी नही कर रहे, इसका मतलब आप अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं..?

मे - उफ़फ्फ़… तुमसे नही जीत सकता मे.. ! ठीक है तुम्हें जो सही लगे वो करो.. और मैने गुस्से में आकर फोन कट कर दिया..!

उस रात में सो ना सका, रात भर सोचता रहा कि इस लड़की को कैसे समझाऊ कि अब मेरा इस मिसन से लौटना कितना असंभव है,

और बिदंबना तो ये थी कि मे अपने मिसन के बारे में किसी को बता भी तो नही सकता था.

 
सोचते-2 मेरा दिमाग़ फटने की कगार तक पहुँच गया, लेकिन इस समस्या से निपटने का कोई मार्ग नही निकल पाया,

मे ये भी नही चाहता था कि मेरी वजह से ये बेवकूफ़ लड़की अपना जीवन यौही गुज़र दे.

बिना सोए ही रात यौही गुजर गयी, 4 बजते ही फिर वही सब रोज़के के काम, आज मेरा मन ट्रैनिंग में भी नही लग रहा था,

आख़िर कैप्टन बत्रा ने मुझे लाइन से बाहर खड़ा कर ही दिया और लगा बुरी तरह झाड़ने, मैने कहा सर आज मेरी तबीयत कुच्छ ठीक नही है, तो उसने मुझे चेक-अप करके रेस्ट करने के लिए बोल दिया.

मे अपने बैरक्क में आके लेट गया, और सो गया…!

उसी रात ट्रिशा ने फोन किया, पहले तो मे उठाने वाला नही था, लेकिन फिर कुछ सोच कर उठा लिया.. हेलो बोलते ही वो कुछ सीरीयस लहजे में बोली-

सॉरी अरुण मैने कल आपको नाराज़ कर दिया, प्लीज़ मुझे माफ़ करदो..!

मे - नही-नही !! इसमें तुम्हरी कोई ग़लती नही थी, मे ही थोड़ा अपसेट हो गया था,

लेकिन मे भी क्या करता, तुम ऐसी ज़िद पकड़ के बैठ गयी जो कभी पूरी नही हो सकती थी.

वो - तो क्या अब मेरी सोच पर भी अंकुश लगाओगे..? मैने आपसे ये तो नही कहा था कि मुझसे शादी ही कर्लो..!!

अब आपको मेरी दोस्ती भी मंजूर नही है..?

मे- ओह्ह्ह.. कम ऑन ट्रिशा ! प्लीज़ डॉन’ट गेट मी एमोशनल..! तुम्हें पता है, तुम्हारे लिए मेरी क्या फीलिंग्स हैं,

मे सच में अगर तुम्हें अपना जीवन साथी बना पाता तो मे अपने आपको धन्य समझता,

लेकिन मे सच में मजबूर हूँ, और प्लीज़ मेरी मजबूरी क्या है ? ये जानने की कोशिश भी मत करना, क्योंकि मे बता नही पाउन्गा और तुम्हें इस चीज़ का दुख पहुँचेगा.

वो - सुबक्ते हुए.. कभी नही पुछुन्गि अरुण..! वादा करती हूँ आपसे !

लेकिन अपने दिल से तो मत निकालो मुझे ! इतनी तो विनती मान लो मेरी..! उसकी आवाज़ काँपने लगी थी.

मे - ओह्ह.. ट्रिशा ! प्लीज़ रो मत, दिल से तो चाह कर भी नही निकल पाउन्गा तुम्हें..! बस मे इतना चाहता हूँ, कि तुम हमेशा खुश रहो,

मे बस इतना जानता हूँ, कि जो तुम सोच रही हो उसमें तुम्हारी खुशी नही है.

वो - अच्छा ठीक है, जो आप कहोगे मे वैसा ही करूँगी, पर मेरी एक शर्त है..!

मे - क्या..? बोलो मे तुम्हारी हर शर्त पूरी करने को तैयार हूँ.

वो - मुझे कुछ समय के लिए आपका साथ चाहिए..! और उतने समय के लिए मे जैसे चाहूं, आपको वैसा ही करना होगा..! बोलो मंजूर है..?

मे - मुझे मंजूर है, ट्रैनिंग के बाद जब तुम कहोगी, जहाँ कहोगी, जितना समय चाहोगी में तुम्हें दे दूँगा..! ठीक है.

वो - ठीक है, बाइ गुड नाइट.. अरुण ..! आइ लव यू !!

मे - गुड नाइट ..आइ लव यू टू जान! टेक केर..!!

अब मेरे सर से थोड़ा टेन्षन कम हो गया था, कम-से-कम कुछ समय मेरे साथ बिताके ये पागल लड़की अपनी हठधर्मी तो छोड़ देगी.

दूसरे दिन से फिर वही मुश्किल जिंदगी, अब मात्र दो-ढाई महीने और शेष थे, जो किसी तरह निकालने थे,

लेकिन इस ट्रैनिंग ने मुझे और ज़्यादा टफ बना दिया था, अब में फिज़िकली इतना मजबूत हो चुका था, कि कॅंप में जितने भी लोग थे, उनमें से शायद ही कोई ऐसा हो जो मेरे सामने टिक पाए किसी भी मामले में.

उसका कारण ये नही था कि मे सबसे ज़्यादा ताक़तवर था, उसमें तो बहुत से ऐसे थे जो मुझसे ज़्यादा ताक़तवर थे,

लेकिन मेरा प्रेज़ेन्स ऑफ माइंड इन सबमें ज़्यादा था, जिसकी वजह से सामने वाले के पेन्तरे को समय से पहले समझ ही नही लेता था, अपितु उसकी काट भी सोच लेता था जिससे सामने वाले का बार निष्फल हो जाता और मे अपना पेन्तरा उसी पर चला देता.

यहाँ तक कि गोलियों की बौछार में निहत्था बच निकलना, हालाँकि ट्रैनिंग के दौरान वो गोलियाँ डमी होती थी, लेकिन मेरे शरीर को छु भी नही पाती.

मेरी ट्रैनिंग का ये आख़िरी महीना चल रहा था, कॅप्टन बत्रा मेरी पर्फॉर्मेन्स देख कर खुश था, और उसकी रिपोर्ट देख कर अब जल्दी ही फाइनल डेट आने को थी जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था.

और वो समय भी आ ही गया. ट्रैनिंग कम्प्लीट हो गयी, और अपना फाइनल सर्टिफिकेट लेकर कॅंप से छुट्टी हो गयी,

अपना सामान समेटा और बाहर आकर एक होटेल में रूम बुक कराया और ट्रिशा को कॉल कर दिया.

वो आज शाम को मिलने के लिए तैयार हो गयी.

वैसे तो उसको अभी दो महीने और यहाँ रहना था, लेकिन पूरा फ्रीडम था कहीं भी आने जाने के लिए, सो मेरे साथ मन चाहा वक़्त गुज़ार सकती थी वो….!!

मे होटेल रूम में फ्रेश होकर फ्री हुआ और फिर एनएसए अमित चौधरी को कॉल किया.

अभी शाम के 7 बजे थे, पॉसिब्ली वो अपने ऑफीस में ही होने चाहिए. कुछ देर बेल बजती रही लेकिन कॉल पिक नही हुई, सोचा बिज़ी होंगे या मीटिंग वग़ैरह में होंगे ये सोच के मैने फिर दोबारा कॉल नही किया.

मैने अपनी आँखें बंद कर ली और कुछ पुरानी घटनाओं को याद करने लगा,

मूड थोड़ा रोमॅंटिक जैसा हो रहा था ट्रिशा के इंतजार में सो गोआ की मस्ती याद आ गयी और मेरा मन बीयर पीने का होने लगा.

मैने रूम सर्विस को फोन करके एक बीयर ऑर्डर कर दी.

कोई 10 मिनट में ही वो एक बीयर और कुछ स्नेक्स लेकर आ गया, ग्लास लेकर उसमें डालने लगा तो मैने मना कर दिया.

जब वो चला गया तो मैने बोतल मुँह से लगाई और धीरे-2 शिप करने लगा.

अभी बीयर पूरी ख़तम नही हुई थी कि डोर बेल बजी, मैने उठके डोर खोला तो सामने ट्रिशा एक गुलाबी रंग की साड़ी में दरवाजे पर खड़ी थी,

मे उसको इस रूप में देखता ही रह गया.. लंबा कद साड़ी में कुछ ज़यादा ही लंबा दिख रहा था,

वैसे भी फिज़िकल ट्रैनिंग से वो एकदम फिट हो गयी थी, कहीं भी एक्सट्रा फॅट नही था.

जब देर तक मेरी नज़रें उससे नही हटी तो वो बोली- गेट से ही टरकाने का इरादा था तो बुलाया क्यों..?

मे हड़बड़ा कर गेट से हट गया और बोला- स..सॉरी ! प्लीज़ कम.

वो मेरे आगे-2 अंदर आई, टाइट कस्के साड़ी लपेट कर पहनी होने की वजह से उसके कूल्हे थोड़े से बाहर को दिख रहे थे लेकिन कसरत और एक्सर्साइज़ की वजह से थिरकन नाम मात्र को भी नही थी.

वो आकर सोफे पर बैठ गयी और सामने पड़ी टेबल पर बीयर की बोतल देख कर चुटकी लेते हुए बोली—आअ हाहाहा.. तो आप ये शौक कब्से फरमाने लगे..?

मैने कहा- अरे बस ऐसे ही शौकिया.. टाइम पास करने को मॅंगा ली बस.. और ये यहाँ आने से पहले जब गोआ गये थे तब पहली बार टेस्ट की थी, उसके बाद आज ही ली है. तुम लोगि..?

वो - तौबा-तौबा, मेरे बाप की तौबा.. ऐसे शौक ना ही लगे तो अच्छा है, और इतना बोलकर वो चुप हो गयी, नज़रें नीची करके पैर के अंगूठे से फार्स को कुरेदने लगी.

 
मे उसी सोफे पर उसकी बगल में थोड़ा दूरी बनाके बैठा था. मेरी नज़र उसके चेहरे पर ही टिकी थी, और उसके बोलने का इंतजार कर रहा था.

मैने बाकी बची बीयर भी ख़तम करदी, तब तक भी वो कुछ नही बोली- तब मैने उसका एक हाथ अपने हाथ में लेकर उसकी उंगलियों को अपने अंगूठे से सहलाते हुए बोला- तुमने मुझसे अपने लिए वक़्त माँगा था..!!

उसकी लर्जति हुई निगाहें उपर को उठी, होंठ कांपकपाए, और फिर झुक गयीं.

मैने उसकी चिन को अपनी उंगलियों का इशारा देकर उपर को किया, तो उसकी आँखें बंद हो गयी और होंठ लरज उठे.

मे - ट्रिशा…! कुछ तो बोलो..? क्या बस ऐसे मौन रह कर ही समय बिताना चाहती हो मेरे साथ..?

एक पल उसने मेरी आँखों में देखा और काँपते होठों से बोली - हिम्मत नही जुटा पारही बोलने की..!

मे - तो क्या ऐसी ही डरपोक टाइप की आइपीएस बनोगी..?

वो तपाक से बोली – आपसे किसने कहा कि मे डरपोक हूँ..?

मे - सामने दिख रहा है.. ! जब तुम मेरे सामने अपने मन की बात नही बोल पा रही तो ड्यूटी कैसे करोगी..?

वो - मुझे शर्म आ रही है, जब आपसे मिलने आने वाली थी तो बहुत सारी बातें थी दिमाग़ में बोलने को, लेकिन जैसे ही आपको देखा तो सब भूल गयी, समझ में नही आरहा कहाँ से शुरू करूँ..?

मे - चलो छोड़ो बताओं को खाना मँगाते हैं, खाना ख़ाके आराम से बातें करेंगे ठीक है, वैसे भी मुझे तो भूख सी लग रही है.

वो - जैसा आप ठीक समझो..!

मैने फोन करके दो डिन्नर लाने के लिए बोल दिया.. और फिर ट्रिशा से बोला- वैसे आज रात की तो पर्मिज़न लेके आई होगी ना,,!

ये सुनते ही शर्म से उसका चेहरा लाल पड़ गया और गर्दन झुका के बस..हमम्म.. ही निकला उसके मुँह से.

मैने उसके दोनो हाथ अपने हाथों में लेकर कहा - कुछ तो बोलो ट्रिशा..! कुछ भी बोलने लायक नही तुम्हारे पास..?

वो - बोलना तो बहुत कुछ है, लेकिन आप नाराज़ ना हो जाओ इसलिए डर लग रहा है..!

मे -मैने तुमसे वादा किया है, आज के दिन सिर्फ़ तुम्हारी मर्ज़ी चलेगी फिर ये डर क्यों..?

वो मेरी आँखों में झाँकने लगी, और फिर ना जाने क्यों उसकी आँखें डब-डबा गयी, उनमें पानी तैरने लगा..!

मे - हे ! मेरी बहादुर आइपीएस ऑफीसर ऐसे आँसू नही बहा सकती..? प्लीज़ चियर-अप..

फिर मैने उसके फॉरहेड को चूम लिया..! वो अपनी भावनाओं को रोक नही पाई और मेरे चौड़े सीने में समा गयी.. और सुबकने लगी..

मे उसकी पीठ सहला रहा था, सुबक्ते हुए वो बोली- मुझे अपना लो अरुण, मे आपकी बाहों में जीना चाहती हूँ..! प्लीज़ मुझे मत ठुकराओ..!

मैने उसके चेहरे को उपर उठाया और उसके लरजते होंठो को चूम लिया, और बोला -

मे तुम्हें कैसे ठुकरा सकता हूँ ट्रिशा, तुम तो मेरे दिल में हो..लेकिन…!

कराहते से स्वर में बोली वो - लेकिन क्या..?.. ऐसी क्या कमी है मुझ में जो आप मुझे अपना नही सकते..? बताओं ना.. जान !!

मे - कमी मुझमे हैं ट्रिश..! तुम में तो कोई कमी निकाल ही नही सकता..? तुम तो साक्षात देवी का रूप हो, जो भी तुम्हें अपनाएगा, वो धन्य हो जाएगा..!

वो - ऐसी बातें मत करो मेरे हमदम !, मे किसी और के बारे में सोच भी नही सकती..?

मे - इतना प्यार ना करो प्रिय… कि मे टूट कर बिखर ही जाउ.! और फिर मैने उसके होठों को फिर से अपने लवो में क़ैद कर लिया…अभी मैने किस शुरू ही किया था कि डोर बेल बजी.

मैने उठके दरवाजा खोला और वेटर को अंदर लिया, वो खाना लेके आया था, हम दोनो ने खाना खाया.. लेकिन दुखी मन से, अब जीने के लिए खाना तो पड़ेगा ही...!

खाना ख़ाके थोड़ी देर बाल्कनी में आकर खड़े हो गये और रोशनी से जगमगाते शहर को खड़े खड़े देखते रहे.., दोनो के ही मन में कस्मकस चल रही थी अपनी-2 मजबूरियों को लेकर…

बाल्कनी से आकर हम पलंग पर बैठ गये, मैने पलग के बॅक से अपनी पीठ टिका रखी थी और ट्रिशा मेरे कंधे पर अपना सर रखकर बैठ गयी..

जब वो कुछ देर तक फिर भी चुप बैठी रही तो मैने चुप्पी तोड़ते हुए कहा-

अच्छा ट्रिशा तुमने मुझसे वक़्त माँगा था, मैने अपना वादा पूरा कर दिया अब आज की रात तुम्हारी है, जैसे चाहो इसे एंजाय कर सकती, और चाहो तो ऐसे ही खामोशी से बर्बाद कर दो,

अब ये तुम्हारे उपर है कि तुम क्या करना चाहती हो, मे तो आज की रात तुम्हारा गुलाम हूँ, जो हुक्म दोगि बजा लाउन्गा.

मेरे मुँह से ये शब्द सुनते ही वो फफक पड़ी और मेरे गले में बाहें डालकर मुझसे लिपट गयी,

उसने बेतहाशा मेरे होठों, माथे और गालों को चुम्मनों से भर दिया. मैने भी उसे अपने आलिंगन में कस लिया.

वो मेरे साथ एककार हो जाना चाहती थी.

अभी मे उसका कोई जबाब दे पाता, कि मेरा सेल फोन घनघनाने लगा..

मैने ट्रिशा को प्यार से अपने से अलग किया और हाथ लंबा करके फोन उठाया,

चौधरी साब की कॉल थी जिसे मे मिस नही कर सकता था, ट्रिशा को रुकने का इशारा करके, मैने बाल्कनी में जाकर फोन पिक किया.

मे - हेलो गुड ईव्निंग सर..!!

चौधरी - यस !! गुड ईव्निंग अरुण .. हाउ आर यू..? तुमने कॉल किया था..?

मे - आइ आम वेरी मच फाइन सर !.. यस सर ! मैने ये बताने के लिए फोन किया था कि आज शाम को ही मेरी अकॅडमी से छुट्टी हो गयी है,

अभी में इसी शहर में ही हूँ फिलहाल.. तो नेक्स्ट.. क्या करना है बस यही जानना था.

चौधरी - वेरी गुड..! अकॅडमी का सर्टिफिकेट लेकर दो दिन में मेरे ऑफीस पहुचो कुछ और ज़रूरी चीज़ें तुम्हें हॅंड ओवर करनी है,

उसके बाद हो जाएगी तुम्हारी ड्यूटी शुरू. ओके.

मे - सर ! सर ! सर ! इफ़ यू डॉन’ट माइंड, मे आइ टॉक टू सम पर्सनल मॅनर…?

चौधरी - यस ऑफ कोर्स बोलो ! तुम्हारे लिए तो टाइम ही टाइम है..

मे - सर एक पागल लड़की है, कुछ साल पहले मुझे मिली, दरअसल मेरे फ्रेंड की सिस्टर है, शी आक्च्युयली फॉल इन लव वित मी..

बट मैने उसको रेफ्यूज़ कर दिया था, और उसके बाद मे उससे फिर कभी नही मिला.

चौधरी - तो अब क्या हुआ..?

मे - सर हमारे कॅंप के बाजू में जो पोलीस अकॅडमी है उससे वो आइपीएस की ट्रैनिंग कर रही है, और यहाँ मुझे मिल गयी,

वो पागल अभी तक मेरा इंतजार कर रही है, जब मैने उसे समझाया तो बस एक ही रट लगाए है, शादी करेगी तो मुझसे वरना आजीवन अविवाहित रहेगी.

चौधरी - तुम भी उसे प्यार करते हो..?

मे - करता तो था सर..! पर अब इस असाइन्मेंट के बाद कैसे उसको हां करूँ…?

चौधरी - देखो बेटे ये तुम्हारी पर्सनल लाइफ है, इसमें तुम्हारा ही डिसिशन होना चाहिए और रही बात तुम्हारे असाइनमेंट की तो वो एक अलग विषय है,

ऐसा कोई ज़रूरी नही कि शादी-सुदा ये काम नही कर सकते, हां हो सके तो काम शेयर नही होना चाहिए,

और फिर वो भी कोई छोटी-मोटी पोस्ट नही है, ए आइपीएस ऑफीसर ऑल्सो आ वेल रिस्पोन्सीबल पोस्ट फॉर दा कंट्री.

उपर से इतना प्यार करने वाली लड़कियाँ आज-कल मिलती कहाँ हैं. यू आर सो लकी माइ बॉय.

अगर उसको तुम्हारी असलियत पता लग भी जाती है तो डज़न्’ट मॅटर.. वो उसको लीक थोड़ी ना करेगी, और उल्टा उसको गर्व होगा तुम पर.

सो बी एंजाय वित युवर लव. ओके डॉन’ट वरी !!

मे - थॅंक यू वेरी मच सर, आपने मेरी बहुत बड़ी प्राब्लम सॉल्व कर दी. वन मोर रिक्वेस्ट सर..!

चौधरी - यस.. टेल मी..!

मे - क्या ये पासिबल होगा सर कि उसको भी गुजरात में ही पोस्टेड करवा दिया जाए..!!

चौधरी - वो कहाँ से सेलेक्टेड है..?

मे - शायद देल्ही से..!

चौधरी - तब तो देखना पड़ेगा, अगर कोई गुजरात का कॅड्रर चेंज ओवर करना चाहे तो पासिबल हो सकता है, बट यू डॉन’ट वरी, आइ विल डू सम थिंग.

तुम यहाँ आओ फिर डीटेल में बात करेंगे ओके. टेक केर आंड ऑल दा बेस्ट फॉर युवर लव.. बाइ.

मे - बाइ सर थॅंक्स लॉट.. और इसके साथ ही फोन कट हो गया.

में फिर से ट्रिशा के पास आ गया.. और उसको बाहों में भरके बोला- तो मेरी थानेदार्नी तू शादी नही करेगी किसी से भी..?

 
friends update de diya hai ab main chalta hun Holi khelne byyyyyyyyyyyyyyyy
 
मेरी ये बात सुनकर वो थोड़ा टेन्स होते हुए बोली- इस विषय पर अब और बहस करना ज़रूरी है ? जिसका कोई हल ना हो.

और ये क्या कहा आपने मुझे थानेदारनी..? मे थानेदारनी हूँ..?

मे - ओह नो बेबी ! आइ आम सॉरी ! तुम तो अब कलेक्टर बनने वाली हो तो अब कोई कलेक्टर ही तो होना चाहिए ना तुम्हारे लिए..!

वो गुस्सा होकर पलंग से उठ खड़ी हुई.. और बोली- अब आप मुझे यहाँ से टरकाना चाहते हैं,

कोई बात नही, में चलती हूँ.. बाइ..!

ये कहकर वो वास्तव में ही जाने लगी.

मैने फ़ौरन उसका हाथ पकड़ लिया और फिर से अपने उपर खींच लिया.

और स्वतः ही गाने की ये पंक्तियाँ मेरे मुँह से निकल पड़ी…

रुक जा हो जाने वाली रुक जा…!

मे तो राही तेरी मंज़िल का.. !

नज़रों में तेरी मे बुरा सही..!

आदमी बुरा नही मे दिलका…! रुक जा…!!!

वो अभी भी मेरी ओर गुस्से से ही देख रही थी.. तो मैने सोचा कि अब इस नाटक को जल्दी ही ख़तम करना पड़ेगा, वरना कहीं बात बिगड़ ना जाए सो बोला-

तुमने अपने मम्मी पापा से बात की है मेरे बारे में कभी..?

वो मेरी ओर विश्मय से देखने लगी..और बोली- नही ! आपने कभी मुझे हां ही नही कहा तो मे कैसे उनसे बोल सकती थी..

लेकिन ये बात आप एकदम से कैसे बोल रहे हैं..?

मे - इसका मतलब तुम मेरे साथ जीवन भर रहने का खाली नाटक कर रही थी..है ना..!

वो बिना कुछ कहे फफक-फफक कर रो पड़ी..

मैने फ़ौरन अपने कान पकड़े और सॉरी बोला- ट्रिशा प्लीज़ रो मत, मे तो मज़ाक कर रहा था, अब सीरियस्ली बोलो- विल यू मेर्री मे..?

वो बिना कोई जबाब दिए मेरे सीने से लग कर रोने लगी, मे उसे चुप कराता रहा..!

फिर जब वो थोड़ा संयत हुई तो मैने कहा- अब ध्यान से मेरी बात सुनो ट्रिशा ! अब इसमें कोई मज़ाक नही है.

अगर तुम सच में मुझे अपना जीवन साथी बनाना चाहती हो, तो ट्रैनिंग ख़तम होते ही मम्मी-डॅडी से बात कर लेना, और हां अगर वो नही माने तो ये शादी नही होगी बोलो मंज़ूर है.

वो - मुझे पूरा विश्वास है वो मेरी कोई बात नही टालेंगे.

मे - तो फिर तो कोई समस्या ही नही है, और अब हमारी सुहागरात शादी के बाद ही होगी, बोलो ये भी मंज़ूर है..!

वो - मुझे आपकी हर बात मज़ूर है मेरे प्रियतम..मेरे हमदम, मेरे अरुण !..

ये दासी आपका जीवन भर का साथ पाने के लिए कोई भी शर्त मानने को तैयार है,

आपने हां बोलकर मेरे उपर बहुत बड़ा उपकार किया है. आप नही जानते मे आज क्या सोच कर आई थी..?

मे - क्या..?

वो - मे आज ये निश्चय करके आई थी कि आपके साथ आज की रात बिता कर उन्ही हसीन लम्हों को सहेज कर उनके सहारे अपना जीवन गुज़ार लूँगी लेकिन किसी दूसरे मर्द का मेरे जीवन में कोई स्थान कभी नही होगा..!

मे - ओह्ह्ह… ट्रिशा ! आइ लव यू ! तुम सच में इतना प्रेम करती हो मुझ से..? ये कहकर मैने उसे अपनी बाहों में कस लिया..!

ना जाने कैसे दो बूँद पानी की मेरी आँखों से बाहर निकल पड़ी

वो – बहुत से भी ज़्यादा मेरे अरुण.. ! आइ लव यू टू मच..!!

और इसी सुखद एहसास में डूबे हम दोनो एक दूसरे की बाहों में रात भर पड़े रहे, कब नींद के आगोश में चले गये पता ही नही चला.

सुबह जब आँख खुली तो काफ़ी देर हो चुकी थी,

उसको अकॅडमी में पहुँचन था, सो वो ऐसे ही अस्त-व्यस्त कपड़ों को थोड़ा सा ठीक-ठाक करके जाने को तैयार हुई,

फिर मैने उसको अपने गुजरात के जॉब के बारे में बताया कि में वहाँ जल्दी ही जाय्न करने वाला हूँ, ये सुनकर वो अत्यंत हैरान होकर बोली-

उस जॉब के लिए आपने ये कमॅंडो की ट्रैनिंग ली है..??

मे - हां..! और क्यों कि है वो मे तुम्हें समय आने पर बताउन्गा, लेकिन एक प्रॉमिस करो, ये बात किसी से भी शेयर नही करोगी कि मैने यहाँ कमांडो की ट्रैनिंग ली है..

वो प्रॉमिस करके खुशी-2 विदा हुई.. और मे अपने गन्तव्य की ओर निकलने की तैयारियों में जुट गया.….!!

एनएसए ऑफीस में मुझे ज़रूरत के सारे रेस्ट डॉक्युमेंट्स और एक फुल्ली कन्फिगर्ड लॅपटॉप मिला,

जिसमें संस्था की वेब साइट जो लाख सर पटकने पर भी हैक नही हो सकती थी, कुछ और सॉफ़्टवरेस वित माइ ईमेल अकाउंट्स मिले.

मे चौधरी साब के साथ पीयेम ऑफीस गया, वहाँ उनको फाइनल सर्टिफिकेट्स सब्मिट किए, और उनसे विदा ले, गुजरात की ट्रेन पकड़ी और आ गया अपने नये ठिकाने पर.

मैने अपना एक पर्सनल ईमेल अकाउंट भी खोल लिया और उसका डीटेल्स अपने सारे दोस्तों को मेसेज कर दिया इंक्लूडिंग ट्रिशा.

गुजरात के **** शहर में आकर पहले मैने ऑफीस जाय्न किया, उसके बाद एक 3बीएचके फ्लॅट किराए पर लिया, उसका अड्रेस इम्मीडियेट ट्रिशा को भेज दिया.

चूँकि ऑफीस तो मेरे लिए मात्र दिखावा था, सो जाना ना जाना, कोई मायने नही रखता था, लेकिन जब तक कोई असाइनमेंट नही मिलती, तब तक मे पन्चुअल रहना चाहता था.

ऐसे ही 3 महीने निकल गये, एक दिन ट्रिशा का फोन आया, और उसने बताया कि दो दिन बाद हम सब लोग ऋषभ भैया के साथ आपके पास आ रहे हैं.

तीसरे दिन वो लोग आ गये, सब बड़े खुश थे ख़ासकर ऋषभ, जब मैने उसको चिडाने के लिए कहा- और साले साब कैसा चल रहा है,

तो वो मेरे बगल में प्यार से मुक्का मारते हुए बोला- कामीने मे तेरे लिए कभी साला नही हूँ, मे तो हमेशा तेरा वोही दोस्त रहूँगा.

मे - तो फिर तुझे मेरी होने वाली बीबी को भाभी बोलना पड़ेगा.. बोल मंजूर है, तो वो थोड़ा झेप्ते हुए ही बोला-

हां यार अब तो मे तेरा साला बन ही गया, लेकिन मुझे बहुत खुशी है कि मेरी बहन को तेरे जैसा जीवन साथी मिल रहा है जो अपनी जान से ज़्यादा उसकी हिफ़ाज़त करेगा.

फिर वो थोड़ा सीरीयस होकर बोला - थॅंक यू अरुण, ट्रिशा ने मुझे सब कुछ बता दिया है तुम दोनो के बारे में, फाइनली तूने उसे अपना कर हम लोगों पर बहुत बड़ा एहसान किया है.

उसके मम्मी-पापा ने भी मुझे थॅंक्स बोला और ढेर सारे प्यार के साथ आशीर्वाद दिया.

 
मैने ट्रिशा से उसके बेच के डीटेल्स ले लिए और ड्यूटी के बारे में पुछा, तो उसने बताया कि फिलहाल उसे यूपी के ही **** शहर में एसपी के तौर पर अगले महीने जाय्न करने वाली है.

फिर मैने उसके पापा को मेरे घरवालों से मिलने के लिए कहा कि अगर वो पर्सनली उनसे मिल लें तो उन्हें अच्छा लगेगा, जिससे वो भी राज़ी खुशी हम दोनो को आशीर्वाद देने आ जाएँगे.

3 महीने बाद की डेट फिक्स करके, वो लोग चले गये. ट्रिशा ने ड्यूटी जाय्न कर ली थी.

मैने यहाँ एक अच्छी सी सूडान मॉडेल कार खरीद ली, और ऑफीस भी उसी से आना जाना रहता था.

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एक दिन ऐसे ही ऑफीस से लौट रहा था, सूर्यास्त हो चुका था, स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थी, मे शहर एक पौष इलाक़े से गुजर रहा था, कि अचानक सामने एक चौराहे पर अफ़रा-तफ़री होते हुए नज़र आई.

मे उस जगह से अभी कोई 300-400 मीटर ही दूर था की चीखो-पुकार की आवाज़ों के साथ लोग इधर-उधर भागते हुए नज़र आए, मैने अपनी गाड़ी की स्पीड कम कर ली, जैसे ही और नज़दीक पहुँचा कि मुझे गोलियों की आवाज़ भी सुनाई देने लगी..

रोड एकदम खाली हो चुके थे, अबतक मे उस चौराहे से मात्र 100-150 मीटर की दूरी पर ही था कि एक बुलेट ससनाती हुई मेरी ओर आई और तड़क से मेरे साइड ग्लास को तोड़ती हुई निकल गयी.

मैने फ़ौरन अपनी कार को साइड में खड़ा किया और अपना एमर्जेन्सी समान बॅग से निकल कर एक पान शॉप की आड़ लेके खड़ा हो गया.

खंजर को मैने अपनी बेल्ट में खोंसा, और रेवोल्वेर हाथ में लेके मैने स्थिति का जायज़ा लिया.

वो चार आतंकवादी जिनके पास अक-47 ऑटोमॅटिक राइफल्स थी, चौराहे के बीचो-बीच एक दूसरे की तरफ पीठ करके खड़े दनादन फाइरिंग कर रहे थे,

कुछ लोगों को गोलियाँ भी लगी थी और वो इधर-उधर रोड पर पड़े तड़प रहे थे.

मे पान की शॉप के पीछे से निकल कर अगली शॉप की आड़ में पहुच गया, ऐसे ही धीरे-2 आड लेते हुए अब में उन लोगों से मात्र कुछ ही मीटर की दूरी पर था.

मैने अपना चेहरा कपड़े से ढक लिया, मेरे हाथ अपनी गन पर कस चुके थे,

आड़ से निकल कर मैने हवा में जंप लगाई और जब तक उन चारों को कुछ पता चलता मे उन चारों के बीच खड़ा था.

मेरे पैर अभी ज़मीन को टच भी नही हुए थे कि उनमें से एक बंदा ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था, मेरा खजर उसकी पीठ में धँस चुका था, उसकी राइफल एक ओर छिटक कर गिर गयी.

जब तक वो तीनों स्थिति को समझते और मेरी ओर पलटे, दो फाइयर मेरी गन से निकले और उनमें से दो के भेजे बाहर निकल पड़े.

चौथे आतंकवादी को मेरे उपर फाइयर करने का मौका मिल गया, और उसकी ऑटोमॅटिक गन ने एक सेकेंड में दर्जनों फाइयर कर दिए.

मेरा शरीर ज़मीन पर लुढ़कता हुआ उस आतकवादी के एकदम नज़दीक पहुँच गया,

वो अपनी गन की नाल को मेरी ओर करता उससे पहले में उठ खड़ा हुआ.

मेरा एक हाथ उसकी गन पर था और दूसरे हाथ में दबी रेवोल्वेर उसके माथे पर सट चुकी थी.

बिना किसी अल्टीमेटम के मैने गोली चला दी और वो आख़िरी शिकार भी जहन्नुम पहुँच चुका था, मैने फ़ौरन उस ज़ख्मी बंदे को उठाया, अपने कंधे पर डाला और अपनी गाड़ी की तरफ दौड़ लगा दी.

फ़ौरन गाड़ी की पिच्छली सीट पर डालके मैने गाड़ी दौड़ा दी और पलक झपकते ही वहाँ से ओझल हो गया.

घटना क्रम इतनी तेज़ी से हुआ कि डरे सहमे लोग अपनी जगह से निकल कर आते तब तक तो मैं वहाँ से जा चुका था.

आनन फानन में चारों ओर पोलीस वॅन भागने दौड़ने लगी.

जैसे ही लोगों को पता चला कि वो आतकवादी मारे जा चुके हैं तब कही जाकर डरे सहमे से बाहर आए, तब तक पोलीस की कई गाड़ियाँ भी वहाँ पहुच चुकी थी,

आनन-फानन में आंब्युलेन्स बुलाई, घायलों को हॉस्पिटल पहुचाया, शुक्र था कि कोई जान नही जा पाई थी.

क्योंकि गोलियों की आवाज़ सुनते ही लोग इधर-उधर भागने लगे थे जिससे आतंकवादी ज़्यादातर उनके पैरों को ही नशना बना पाए थे, और उनके गिरते ही नये टारगेट को देखते. फिर भी एक-दो सीरीयस कंडीशन में थे.

पोलीस ने लाख सर पटका कि लोगों से पता कर सके कि उनको मारने वाला कॉन था, लेकिन एक-दो को छोड़ कर किसी का ध्यान ही नही था उधर, वो तो बेचारे अपनी -2 जान की हिफ़ाज़त में लगे थे.

कुछ लोग जो वहाँ से काफ़ी दूर थे, उनमें से एक-दो ने बताया कि एक शख्स जिसके मुँह पर कपड़ा बाँधा था ना जाने कहाँ से हवा में उड़ता हुआ आया और एक मिनट में ही उन सबका सफ़ाया करके एक घायल आतंकवादी को उड़ा ले गया.

अब सारे शहर की पोलीस सारे काम धंधे छोड़ कर मुझे खोजने में जुट गयी.

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शहर के साउत वेस्ट छोरे से निकलते ही नॅशनल हाइवे पर एक कार तूफ़ानी रफ़्तार में दौड़ी चली जा रही थी, जिसमें ड्राइवर के अलावा एक घायल आदमी कार की पिच्छली सीट पर बेहोश पड़ा था,

अभी भी उसके पीठ में एक खंजर धसा हुआ था…

शहर से निकल कर दूसरे फ्लाइओवर से आकस्मात वो गाड़ी लेफ्ट टर्न लेके एक सिंगल रोड पर दौड़ने लगती है, जिसके दोनो ओर उँचे-2 पेड़ कतार में खड़े थे.

टर्न लेने के बबजूद भी कार की स्पीड में कोई खास अंतर नही आया, सिंगल रोड पर हाइवे से कोई 15 किमी आगे चलने के बाद ये गाड़ी राइट तुर्न लेके एक कच्चे रास्ते पर दौड़ने लगती है,

अब उसकी स्पीड में काफ़ी कमी आ चुकी थी.

रोड से अभी कोई आधा किमी ही कच्चे रास्ते पर चली होगी कि सामने एक फार्म हाउस आता है,

वो कार उस फार्म हाउस के एक लोहे के पुराने से गेट के पास जा कर रुक जाती है, ड्राइविंग सीट पर बैठा सख्स गाड़ी से उतरता है और गेट खोल कर गाड़ी अंदर ले जाता है.

गाड़ी अंदर करके फिर से उतर कर वो गेट बंद करके गाड़ी को गेट से करीब 100 मीटर अंदर जाकर बने एक बिल्डिंग के पिच्छवाड़े जाकर गाड़ी खड़ी करता है.

गाड़ी से उतर कर वो पिछली सीट पर पड़े घायल को सीट से खींच कर अपने कंधे पर डालता है, और बिल्डिंग के पिछले गेट से अंदर ले जाकर एक स्टोर रूम जैसे कमरे में लाकर फार्स पर लिटा देता है.

फिर लौट कर गाड़ी में आता है और उसके डेश बोर्ड से एक फर्स्ट एड बॉक्स निकालकर अंदर चला जाता है. उस शख्स की फक्क सफेद रंग की शर्ट का दाया बाजू खून से लाल सुर्ख हो चुका था.

उसके कंधे पर शर्ट में एक सुराख भी नज़र आरहा था.

उस शख्स ने घायल आदमी की कमर में घुसे खंजर को बाहर निकाला.

 
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