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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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बात शुरू होती है, कुछ महीनों पहले से, आप सभी को याद होगा मेसी के कुछ स्टूडेंट ड्रग मामले में पकड़े गये थे, उन्हें पकड़वाने में इन बच्चों का हाथ था. या यूँ कहा जाए क़ि इन्होने ही पकड़ा था, हमने तो सिर्फ़ उन्हें क़ानून के हवाले किया है बस.

कोई और होता तो बात वही ख़तम कर देता,..! अरुण प्लीज़ कम हियर..! मुझे अपने बगल में खड़ा करके, और मेरे कंधे पर हाथ रख के वो फिर बोले-

ये लड़का, जो अभी मात्र 20 साल का भी नही हुआ होगा, इसने उस बात को ख़तम नही होने दिया, इसकी ज़िद थी की इस बुराई को जब तक जड़ से ख़तम नही करेंगे, ये फिर से खड़ी हो जाएगी, और हमारा ही कॉलेज क्यों, ये शहर क्यों मुक्त नही होना चाहिए इस जहर की खेती से ?

सीमित संसाधनों से, अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए इस साहसी बच्चे ने अपने कुछ साथियों को चुना, जो आप लोगों के सामने खड़े हैं.. अब ये हम नही जानते कि इसने इन बच्चों को किस तरह से इतने बड़े और जोखिम भरे काम के लिया राज़ी किया, इन्हें एक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार भी किया, और मात्र कुछ ही समय में इस कारनामे को अंज़ाम भी दे डाला.

आज इस शहर में ड्रग कारोबार के सबसे बड़े माफ़िया हकीम लुक्का समेत उसके सभी छोटे-बड़े अड्डों को तबाह करके उसके अंज़ाम तक पहुँचाने का काम इन बच्चों ने किया है, पोलीस ने सिर्फ़ अपने भृष्ट लोगों को की पकड़ा है..!

में अब सार्वजनिक रूप से ये घोसित करता हूँ, कि जितना ड्रग हमने इस दौरान जप्त किया है उसकी राशि का सरकार के नियम के मुतविक 10% इनाम इन बच्चों को दिया जाएगा, जो इनका हक़ है, और में मंत्री महोदया से निवेदन करूँगा कि इन बच्चों को पुरस्कृत कर के इनका मनोबल बढ़ाएँ, धन्याबाद.. इतना बोलकर उन्होने अपनी स्पीच ख़तम की.

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा, वहाँ मौजूद हर नज़र हम पर थी, और उनमें प्रसंसा के भाव दिखाई दे रहे थे.

उसके बाद होम मिनिस्टर ने 25-25 हज़ार रुपये का इनाम घोसित किया, और चार शब्द प्रशासा में कहे.. इस तरह से समारोह संपन्न हुआ और हम अपने कॉलेज लौट आए.

एक बार फिर हम लोग अपना ध्यान अपने कोर्स पर केंद्रित करके अपनी स्टडी मे जुट गये, एग्ज़ॅम सर पर आ चुके थे प्रॉजेक्ट वग़ैरह चल रहे थे.

देखते देखते एग्ज़ॅम भी ख़तम हो गये, रिज़ल्ट मे देरी थी, मैने सोचा एक बार घर का चक्कर लगाना चाहिए, लगभग दो साल हो चुके थे, वैसे भी अब मैने पिता जी को लिख दिया था कि पैसे ना भेजें अब मुझे फिलहाल ज़रूरत नही है..

धनंजय का गाँव भी मेरे गाँव के पास ही था, तो वो भी तैयार हो गया साथ में, वाकी दोस्त भी लगभग अपने-2 घर छुट्टियों मे जा ही चुके थे.

सागर और मोहन का तो ये फाइनल ही था, तो वो दोनो तो हमेशा के लिए विदा लेने वाले थे हम लोगों से.

जब वो हमसे विदा हुए तो हम सबकी आँखों में जुदाई के आँसू थे.. जोकि ये स्वाभाविक भी था, इतना बड़ा लाइफ मे काम जो किया था हम सबने मिलकर, जो सपने में भी सोचा नही होगा कभी..

फिर से मिलने का वादा करके वो विदा हुए..!

दूसरे दिन में और धनंजय ट्रेन पकड़के चल दिए घर की ओर, मेरा गाँव पहले पड़ता था, और उसका मेरे बाद कोई 30 किमी आगे.

डिसाइड ये हुआ कि पहले एक हफ्ते हम अपने गाँव मे रहेंगे उसके बाद उसके गाँव जाएँगे.

उसी शाम हम मेरे घर पहुँच गये, देख कर सभी खुश हुए, माँ, पिता जी, चाचा और सभी भाइयों के पैर छुये, मेरे साथ-2 धनंजय ने भी, माँ ने मुझे कितनी ही देर अपने सीने से लगाए रखा उसकी आँखों मे आँसू थे.

पिता जी ने पुछा- तुमने पैसे ना भेजने के लिए क्यों लिखा था ? तो हमने उन्हें सारी कहानी बताई, पिता जी के साथ-2 मेरे कजन, चाचा, श्याम भाई

सभी ने मुझे गले लगा कर शाबासी दी, चाचा ने तो चुटकी लेते हुए कहा—

क्यों रे नालयक, तू तो मेरा भी बाप निकला रे.. मैने कहा- चाचा ये सब आपके सिखाए गये पाठ का नतीजा है.. आपने कभी डरना सिखाया ही नही मुझे.

चाचा ये सुन कर भाव विभोर हो कर मुझे सीने से लगा लिया, जीता रह मेरे शेर.. और ऐसे ही अपने खानदान का नाम रोशन करता रह.

मैने कहा चाचा, इसमे मेरे अकेले का हाथ नही है, मेरे दोस्तों का साथ नही होता तो शायद इतना बड़ा काम नही कर पाता में, उनमें से एक ये है..धनंजय चौहान.

चाचा और पिता जी ने फिर धनंजय के गाँव वग़ैरह के बारे में पुछा, जब उसने बताया तो वो उसके परिवार से परिचित थे. उसके परिवार का भी बड़ा नाम था उसके इलाक़े में.

दूसरे दिन हम दोनो कस्बे में घूमने चले गये, सोचा शायद रिंकी रानी से मुलाकात हो जाए, उसके घर के सामने मेरे पुराने क्लास मेट राजू त्यागी के भाई की रेडीमेड गारमेंट की दुकान थी, सोचा वहीं जाकर बैठते हैं शायद बाहर निकले तो दीदार हो जाएँ.

जब हम उसकी दुकान पर पहुचे, तो हमें राजू ही मिल गया, पता चला 12त के बाद वो भी अपने भाई के साथ उसी बिज्निस में लग गया था.

20-20 किमी तक अकेला बाज़ार था ग्रामीण एरिया का, तो अच्छी-ख़ासी आमदनी हो जाती थी दुकान से. और वैसे भी पढ़ने में वो कुछ खास नही था, सो लग गया उसी धंधे में.

मुझे देखते ही राजू बड़ा खुश हुआ, पूछा क्या कर रहा है, तो मैने उसे बताया, वो बोला चल यार तू तो इंजिनियर बन ही जाएगा, हम तो बस इसी लायक हैं.

मैने कहा- और सुना वाकी सब लोगों का कैसा क्या चल रहा है.. वो बोला- सब ठीक ही है, दो-चार को छोड़ कर वाकी कुछ ज़्यादा नही कर पाए..

और तेरे आस पड़ोस के लोगों के क्या हाल हैं… वो मेरा इशारा समझ गया और हंसते हुए बोला.. कि सीधे बोल ना घुमा फिरा के क्यों पुछ्ता है, मुझे सब पता है तेरा..

 
धनंजय हम दोनो की बातें समझने की कोशिश कर रहा था, राजू बोला मिलना है ?

मे- हां यार अगर हो सके तो मिलवादे....

राजू- अरे इसमे क्या प्राब्लम है ? पड़ोसी हूँ यार, मेरे लिए कोई रोक-टोक नही है इस घर मे.

उसने अपना पानी का जग उठाया, और घुस गया उसके घर मे. करीब 5 मिनट बाद ही वो वापस आया, और मेरे से बोला, जा अकेली है, वही बुलाया है तुझे.

में धनंजय को लेके उसके घर मे घुस गया, वो सामने ही गेट पर आ गई थी, मुझे देखते ही हाथ पकड़ा और अंदर ले गयी..

अंदर जाते ही मेरे सीने से लिपट कर रोने लगी.. उसको ये भी होश नही रहा कि मेरे साथ कोई और भी है वहाँ..

मैने उसे प्यार से अपने से अलग किया, तो वो मेरी ओर शिकायत भरी नज़रों से देखने लगी, जैसे कहना चाहती हो कि अलग क्यों किया..?

मे- रिंकी ये मेरा दोस्त धनंजय चौहान, क्लास-मेट, रूम-मेट सभी कुछ है.

जैसे ही उसने सुना, तब उसका ध्यान धनंजय की तरफ गया, उससे देख कर वो बुरी तरह झेप गयी, शर्म के मारे ज़मीन में गढ़ी जा रही थी रिंकी...!!

धनंजय – नमस्ते भाभी जी…

शर्म से पानी-पानी ही हो गयी वो…और काँपती सी आवाज़ में बोली…

न.आ.म..अस.ते…!. भाभी जी क्यों कहा आपने..?? रिंकी बोली ..

धनंजय- ये मेरा भाई है.. बल्कि भाई से भी बढ़के है… तो आप भाभी ही हुई ना मेरी तो..?

मे- अरे यार अभी से भाभी मत बोल.. देख नही रहा, बेचारी कहीं रो ना पड़े.. वैसे भी रोने मे बहुत माहिर है ये..!

रिंकी ने बनावटी गुस्से से मुझे घूरा और फिर नज़र नीची करके अपने निचले होठ को काटने लगी.

हमें सोफे पर बिठा के खुद चाइ बनाने किचन मे चली गयी, मे भी उसके पीछे-2 चला गया, और पीछे से उसको बाहों में कस लिया.

रिंकी – छोड़ो ना अरुण, क्या करते हो ? तुम्हारा दोस्त बैठा है वहाँ.. कुछ तो शर्म करो ?

मे- अरे मेरी जान वो बैठा है तो बैठा रहने दो, कम-से-कम दो पल तो एकांत में मिलने दो,

रिंकी – तुम बहुत बेसबरे हो सच मे, कैसे रहते होगे वहाँ?? कोई और देख रखी है क्या??

मे- तुम्हें क्या लगता है..? उसके कान की लौ को जीभ से छूते हुए पूछा..

रिंकी – मे क्या जानू..? सीयी.. आई.. मान जाओ ना..!

मे- भरोसा नही है मुझ पर..? गर्दन पर होंठ रख कर चूमते हुए कहा..!

रिंकी- खुद से ज़्यादा.. आँखें बंद करते हुए..!

मे- तो फिर ऐसा क्यों बोल रही हो..? और उसका गाल दाँतों में दबा लिया..!

रिंकी- आई…! मज़ाक भी नही कर सकती?.. सच अरुण मुझे तुम पर अपने से ज़्यादा भरोसा है..! और बताओ कैसी चल रही है तुम्हारी पढ़ाई..

उसकी चुचियों को मसल्ते हुए…एकदम फर्स्ट क्लास..!! तुम बताओ, क्या कर रही हो आजकल..?

रिंकी- बी.ए. कर रही हूँ…, वैसे और कुछ भी किया या सिर्फ़ पढ़ाई मे ही लगे रहे..?

मे- दो महीने पहले एक न्यूज़ पढ़ी थी तुमने मेरे कॉलेज वाले शहर के बारे में..?

रिंकी – वो ड्रग माफिया के सफ़ाए के बारे में…?

मे- हां वोही,

रिंकी- हां पढ़ी थी..

मे- उसका सफ़ाया, मैने और मेरे 7 दोस्तों ने मिलके किया था..

रिंकी- क्य्ाआ??? इसका मतलब उस हकीम लुक्का नाम के ड्रग डीलर को तुम लोगों ने मारा..?

मे- उसको मैने…, मेरे दोस्तों ने उसके गुण्डों को..

रिंकी- क्या ..? सच में ये तुमने किया…? तुम ये भी कर सकते हो..?

मे- करना पड़ा.. समाज और देश की भलाई के लिए.., और फिर तुमने ही तो कहा था, कि खूब नाम कमाओ, सो कमा लिया, अब तुम्हारी इच्छा को तो नही ठुकरा सकता था ना…! और हंसते हुए उसके गले पर किस कर दिया..

रिंकी.. सीयी.. करती हुई पलट गयी और मेरा सर अपने हाथों मे लेके मेरे होठों को चूम लिया…!

सच में तुम स्पेशल हो मेरे अरुण..! पोलीस ने कुछ नही कहा? वो बोली.

मे- पोलीस के कुछ भृष्ट लोग भी उनसे मिले हुए थे, पहले उनको ही पकड़वाया…! और जानती हो खुद होम मिनिस्टर ने हमें सम्मानित किया, इनाम के साथ-2..

रिंकी- सच…! कितना इनाम मिला…?

मे- क्या करोगी जान कर… तुम्हारा हिस्सा ये रहा.. और जेब से एक सोने का लॉकेट निकालके उसके गले मे पहना दिया.. जिसमें “एआर” मर्जिंग पेंडुलम था.

रिंकी लॉकेट देखकर खुशी से झूम उठी…

ऑश..मेरे अरुण.. तुम सचमुच कितने प्यारे हो… और खुशी के मारे उसकी आँखें नम हो गयी..

तब तक धनंजय ने हमें आवाज़ दी, तो मे उसके पास चला गया, 5 मिनट. मे रिंकी चाइ लेके आ गई, हमने मिलके चाइ पी, और इधर-उधर की बातें करने लगे..

 
तभी उसकी मम्मी आ गई..! हमने खड़े होके नमस्ते की, उन्होने हमारे बारे मे रिंकी से पुछा..!

मम्मी- ये कॉन हैं रिंकी..?

रिंकी- मम्मी, ये अरुण है, एक्सवाई गाँव का है, आपको याद है, हमारे कॉलेज का फंक्षन..?

मम्मी- हां..! याद है, मैने तो वो पूरा प्रोग्राम देखा था..

रिंकी- मेरे साथ जो डुयेट गया था… पहचाना नही…?

मम्मी- ओह्ह..अच्छा वो अरुण है…! कैसे हो बेटा, क्या कर रहे हो आजकल..?

मे- मे ठीक हूँ आंटीजी, आजकल इंजिनियरिंग कर रहा हूँ,

रिंकी- वो न्यूज़ याद है मम्मी आपको, दो महीने पहले एक ड्रग माफिया का सफ़ाया वाली..!

मम्मी- हां.. हां वो *** शहर की..?

रिंकी- हां, वो इन्होने ही किया था उस गॅंग का सफ़ाया…

मम्मी- क्याअ..? सच में..? तुम तो बड़े बहादुर हो..? और ये कॉन है बेटा..?

मे- ये मेरा दोस्त है, हम दोनो और भी 6 दोस्त थे सबने मिलके किया था ये काम.

ऐसे ही कुछ देर और बात-चीत होती रही, फिर हम उठके चलने लगे.. तो रिंकी बोली, मम्मी मे इन्हें बाहर तक छोड़ के आती हूँ..!

मम्मी- हम.. ठीक है, जल्दी आना..

धनंजय को मैने इशारा कर दिया तो वो थोड़ा पहले गेट से बाहर आगया, और फिर जैसे ही हम मेन गेट तक पहुँचे, मैने मूड के पीछे देखा कि उसकी मम्मी तो नही आरहि.

फिर उसको पकड़ के एक लंबी सी किस… कि, अपने लौटने का डेट/ टाइम दिया और बाइ बोलके निकल आया..!

वो बहुत देर तक गेट से हमें देखती रही, जबतक उसकी नज़रों से ओझल नही हो गये….!

रास्ते में- अरुण भाभी तो बहुत सुंदर ढूढ़ ली यार, मानना पड़ेगा, हर काम तेरा पर्फेक्षन से होता है कैसे मिली ? बोला धनंजय..

मे- हंसते हुए..! ऐसा कुछ नही है यार.., पता नही हम एक हो पाएगे या नही..? अपने यहाँ जात-पात का बड़ा लोचा रहता है यार.. ये जैन है, मे पंडित तो पता नही आगे क्या होगा..?

और मैने गाँव तक उसको अपने मिलन का पूरा किस्सा सुना दिया, वो बड़ा इंप्रेस हुआ हमारी प्रेम कहानी सुन कर.

कुछ दिन और हमने मेरे गाँव मे निकाले खेत वग़ैरह घूमे.. उसको बताया कैसे मेहनत करके मैने पढ़ाई की, कितने मुश्किल दौर से गुजरा था मेरा बचपन…!

धनंजय- अब पता लगा साले तू इतना टफ क्यों है, और हमारी भी मारके रखता है..!

मे- क्यों तुझे पसंद नही है मेरा बिहेवियर ..?

धनंजय- साले पसंद नही होता तो साथ रहता क्या..? तेरी एक आवाज़ पर मर-खपने को तैयार रहता..? मेरे गले लगते हुए.. अब मत करना ऐसी बात वारना तेरी गान्ड मार लूँगा.. समझा...!!

और फिर एक दिन निकल लिए धनंजय के गाँव..

उसका घर एक हवेली नुमा काफ़ी बड़ा था, घर के सामने बड़ी सी चौपाल जिस पर ज़्यादा तर समय गाँव के बहुत से लोग बैठे रहते थे, हुक्का गुडगुडाते हुए..!

उसके पिता जी इस गाँव के मुखिया थे और लोग भी उन्हें इसी नाम से बुलाते थे..!

जब हम शाम के समय वहाँ पहुँचे तब भी वहाँ गाँव के बड़े-छोटे कम-से-कम 20-25 लोग बैठे थे..!

हमें देखते ही उसके पिता जी खुशी से चीख ही पड़े…धन्नु… मेरा धन्नु आ गया रे.. आ..आजा.. मेरे शेर..!

धनंजय ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए.. तो उन्होने उसे गले से लगा लिया..मेरे बारे में पुचछा, तो उसने सब बताया..मे जब उनके पैर लगने लगा तो उन्होने मेरे कंधे पकड़ के रोक लिया, और कहा..

नही बेटा… ये पाप हम पर ना चढ़ो.. तुम ब्राह्मण पुत्र हो, और ब्राह्मण सदैव हमारे पूज्य,नीय रहे हैं,

मे- अरे अंकल आप मेरे पिता समान हैं, तो मेरा फ़र्ज़ ज़्यादा बनता है..

वो- वो सब शहरों मे ठीक है बेटा, हमें गाँव की परंपरा निभाने दो..!

फिर घर के अंदर गये, धनंजय की माँ से मिले, उसके एक बड़े भाई थे कोई 6 साल बड़े.. शादी हो चुकी थी.. भाभी बड़ी सुंदर और सुशील लगी, हल्के से घूँघट मे,

लंबा कद, 34 के बूबे, कमर एकदम पतली, पर ताजी-ताजी भैया की रातों की मेहनत का असर उसके गोल-मटोल कुल्हों पर सॉफ दिख रहा था.

हो सकता है घोड़ी बनके चोदने मे ज़्यादा शौक रखते होंगे, कसी हुई शादी में कुछ ज़्यादा ही मस्त लग रहे थे.

वैसे भी गाँव देहात और उपर से ठाकुरों के घर की परंपरा.. तो थोड़ा लाज-परदा होता ही है.

एक बेहन जो अरुण से 2 साल बड़ी, उसकी शादी होनी थी अभी.. गोरी चिटी, अच्छे नैन नक्श, गोल चेहरा, लंबे बाल सलवार सूट मे कसी हुई गोल-गोल चुचियाँ ना ज़्यादा छोटी, ना ज़्यादा बड़ी.

एकदम सपाट पेट, पतली कमर, हल्के पीछे को उभरे हुए कूल्हे, कुल मिलकर देसी माल लगती थी वो.

मेरी तरह धनंजय भी अपने बेहन भाइयों मे सबसे छोटा था.

चाइ नाश्ता करने के बाद, हम गाँव घूमने निकल गये, गाँव ज़्यादा बड़ा तो नही था पर ठीक तक था, जैसे गाँव होते थे उस जमाने में.

 
दूसरे दिन सुबह ही धनंजय और उसके पिता जी नज़दीक के शहर निकल गये कुछ काम होगा, बड़े भाई खेतों में थे, रह गया मे अकेला मर्द घर पर..!

भाभी और धनंजय की बेहन रेखा को मंदिर जाना था, सोमवार का दिन था भोलेनाथ की पूजा करनी थी उन दोनो को.

मंदिर गाँव से बाहर कोई 400-500 मीटर की दूरी पर एक नहर के किनारे था.

उसकी माँ बोली, बेटा अरुण, तुम थोड़ा बहू और रेखा के साथ मंदिर तक चले जाओगे…?

मे- क्यों नही आंटी जी, और पड़े-2 करूँगा ही क्या, मेरा भी टाइम पास हो जाएगा.. चलिए भाभ जी, दीदी..!

हम तीनो मंदिर पहुँचे, उन्होने पूजा की, मैने भी भगवान के आगे डंडवत किया, थोड़ी देर वहाँ बैठे.

बड़ा ही मनोरम दृश्य था वहाँ, बड़ी शांति महसूस हुई मुझे तो.

नहर के किनारे बना मंदिर चरों ओर घने उँचे पेड़ों से घिरा, नहर का किनारा, ठंडी-2 हवा बड़ा सुकून दे रही थी, ज़्यादा लोग नही थे वहाँ.

में संगेमरमर के ठंडे फार्स पर लेट गया, अपने आप आँखें बंद हो गयी, और सुकून में लेटा रहा..!

रेखा और भाभी पूजा करके नहर की ओर निकल गयी..!

थोड़ी देर बाद मुझे नहर की तरफ शोर सा सुनाई पड़ा, जैसे कोई औरत चीख रही हो..!

मैने उठके थोड़ा आगे बढ़के देखा तो… ओ तेरी का…!! मेरा तो यहाँ आना ही बेकार हो गया..!

वहाँ चार लड़के रेखा और भाभी को छेड़ रहे थे, छेड़ क्या रहे थे एक तरह से जबर्जस्ती ही कर रहे थे उनके साथ.

एक ने रेखा का हाथ ही पकड़ रहा था, और वो उसे छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, दूसरे ने भाभी की कमर में हाथ डालके पीछे से जकड रखा था.

दो लड़के सामने से उन दोनो के साथ छेड़ खानी कर रहे थे..!

मे लपक के वहाँ पहुँचा, और उन दो लड़कों को जो सामने से छेड़-छाड़ कर रहे थे, पीछे से उन दोनो की गुद्दि पकड़ के उनके सर एक दूसरे से टकरा के दे मारे…कड़क..!

अनायास का हमला वो भी सर पे, चक्कर ख़ाके गिर ही पड़े दोनो साले.

फिर मैने भाभी के पीछे वाले का गला पकड़ के उसे पीछे को धकेला और जोरदार किक उसके थोबडे पे पड़ी, पट्ठा सीधा नहर में.

रेखा का हाथ पकड़ने वाला लड़का तो डर के मारे पहले ही हाथ छोड़ के निकलने की तैयारी कर ही रहा था कि लपक लिया मैने…!

अबे साले…घोनचू ! जाता कहाँ है ? मज़े नही लेने क्या..?

वो ..मिमियाने लगा.. म..मुझे छोड़ दो..म.मुझे म.माफ़ करदो..

मे- क्यों ! मुफ़्त का माल समझा था क्या.. साले.. तेरी तो मे..माँ..

गाली देना चाहता था, पर बेहन और भाभी की वजह से दे नही पाया..और मैने उसे भी नहर में फेंक दिया..

फिर मैने उन दो के जिनके सर टकराए थे उन्हें उठाया और उनके गले पकड़ लिए, रेखा और भाभी से कहा-

अपने-अपने सॅंडल उतारो और लगाओ इन हरमियों थोबड़ों पर..!

उन दोनो ने सॅंडल उतार के दे-दबादब जो लगाए 4-6, सख़्त हील की सॅंडल की मार से उनकी चीखे गूंजने लगी, थोबडे लाल कर दिए सालों के.

उन चारों को अच्छा ख़ासा सबक सिखाने के बाद हम तीनों घर की ओर चल दिए…!

मे भाबी के बगल में चल रहा था, रेखा उनके दूसरे साइड मे थी,

देवर्जी.. इस उमर में ये तेवर..? क्या यही काम करते हो वहाँ कॉलेज में या पढ़ाई भी करते हो…?

मे- थोड़ा हंसते हुए ! नही.. वो पार्ट टाइम ये भी काम कर लेते हैं.. अपने देवर को नही देखा अभी आपने…? वैसे ये लड़के थे कॉन..?

रेखा – अपने गाँव के तो नही लगते, वैसे भी हमारे गाँव के लड़कों की हिम्मत नही कि हमें कुछ कह सकें.

मैने भाभी के कान में फुसफुसा के कहा- वैसे भाभी इन बेचारे लड़कों की फालतू मे ही पिटाई हो गयी..! अब आप लग ही इतनी पटाखा रही हो कि कोई भी छेड़ना चाहेगा.

भाभी शर्मीली स्माइल के साथ तिर्छि नज़र से मेरी ओर देखते हुए- अच्छा जी तो तुम्हें भी मे पटाखा लग रही हूँ..?

मे- पटाखा ही नही, एकदम कड़क माल लग रही हो भाभी सच कह रहा हूँ, अगर आपकी शादी भैया से नही हुई होती ना.. तो मे यहीं आपको किस कर लेता..!

रेखा भी नज़र तिर्छि करके हमारी बताओं को सुनने की कोशिश कर रही थी.

भाभी- क्या बात है..? तुम तो बड़े चालू निकले..! लगते तो नही हो ऐसे..? घर वालों को बोलके जल्दी शादी करनी पड़ेगी लगता है.

ऐसी ही देवर-भाभी के रिश्ते की छेड़-छाड़ भरी बातें करते-2 हम घर आ गये.

रेखा ने जो वहाँ हुआ, उसको अपनी माँ को बताया, शाम को सभी जब घर में मजूद थे, तभी आंटी ने बात चला दी.

धनंजय के पिता जी और भाई ने मुझे धन्यवाद किया, कि उसने उनके घर की इज़्ज़त पर आँच नही आने दी.

भाई- लेकिन अरुण तुमने अकेले ही उन चारों को पीट डाला, कैसे..? तुम तो अभी इतने छोटे हो..?

धनंजय- अरे भैया, ये दिखता छोटा है, अभी आपने इसके कारनामे नही देखे, वरना आप ऐसा कभी नही कहते..!

मे- और तू कम है..!

धनंजय के पिता जी- तुम लोग क्या बात कर रहे हो..?

फिर धनंजय ने कॉलेज मे हुई दो साल की घटनाए डीटेल मे बताई.. सभी मुँह बाए मेरी ओर देख रहे थे. रेखा तो मानो कोई मूरत बन गयी हो, वो एक तक मुझे ही घूर रही थी, उसकी नज़रों में एक अजीब सी चाहत थी.

रात का खाना ख़ाके, सभी जान अपने-अपने कमरों में सोने चले गये,

 
धनंजय और मे थोड़ी देर तक मेरे बिस्तर पर बैठे बातें करते रहे और फिर वो भी अपने कमरे में सोने चला गया.

मेरी आदत है, कभी गेट बंद नही करता रूम का, तो धनंजय जाते समय मेरा गेट हल्का सा भिड़ा गया, मैने भी सोने की कोशिश की, थोड़ी देर में मे नीद में चला गया.

सुबह भाभी चाइ लेके मेरे रूम में आई, मुझे सोता हुआ देख कर वापस मुड़ने लगी, लेकिन फिर कुछ सोच कर मेरे बॅड पर बैठ गयी, और धीरे से मेरी जाँघ पर हाथ रख के सहलाने लगी,

सुबह-2 का थोड़ा एरेक्षन की वजह से मेरे पाजामे में उठान सा बना हुआ था, मे अपनी आँखों के बीच हल्की सी झिरी बना कर उनकी हरकत देख रहा था.

भाभी कुछ देर तक मेरे उठान को देखती रही और जाँघ सहलाती भी रही.. मेरा मन मचलने लगा था, पर जी कड़ा करके पड़ा रहा, और अपने लंड को भी काबू में रखने की कोशिश की.

फिर उन्होने मुझे हाथ से हिलाने की कोशिश की और धीरे से आवाज़ भी दी..

देवर्जी …देवर्जी.. अरुण… उठो.. लो चाइ पीलो..!

मे यूँही मक्कड़ बनाए पड़ा रहा.. जैसे गहरी नीद में हूँ.

अनायास उनका हाथ जाँघ को सहलाते हुए मेरे लंड पे आ गया, और सहलाने लगी..! अब मुझसे कंट्रोल कर पाना नामुमकिन होता जा रहा था..

मेरा लंड अकड़ने लगा, उसकी अकड़न महसूस करके भाभी ने अपना हाथ हटा लिया और फिर आवाज़ दी..

मे फिर भी नही उठा.. उन्होने सोचा मे गहरी नींद में हूँ.. तो फिर से उन्होने मेरे लंड को पकड़ लिया और पाजामे के उपर से ही धीरे-2 मुठियाने लगी..

मैने अब सीन से परदा उठाने की सोची, और झट से अपनी आखें खोल दी, उनका ध्यान मेरे खड़े लंड पर ही था,

मे- भाभी इसे बाहर निकाल के करो ना…!

वो एकदम चोंक के गर्दन नीची कर के खड़ी हो गयी,

मे- क्या हुआ भाभी खड़ी क्यों हो गयी..?

भाभी- बदमाश कहीं के…? तो तुम सोने का नाटक कर रहे थे..हां..!

मे – अरे भाभी ! सीन इतना अच्छा चल रहा था, तो सोचा थोड़ा और देख लेते हैं, पिक्चर कहाँ तक चलती है..

लेकिन सच में भाभी, आपके हाथों में जादू है..

भाभी- वऊू.. तूओ.. बॅस.. ऐसे ही .. , फिर थोड़ा तड़कर.. लो ये चाइ पीलो..

मे खड़ा हो गया और उनके हाथ से चाइ लेके स्टूल पे रख दी और अपना एक हाथ उनके कूल्हे पर रख कर उसे मसल्ते हुए बोला—

सच में भाभी आप बहुत ही सुंदर हो.. भैया की तो लॉटरी लग गयी..

छोड़ो मुझे, कोई आजाएगा.. वैसे ये सब तुम्हारे लिए नही है.. और आगे बढ़ने की कोशिश भी मत करना.. वो बोली पर उनके लहजे मे विरोध नही था.

एक किस की तो पर्मिशन मिल ही सकती है,

अब आपने इतना कुछ कर लिया, तो मेरा भी तो कुछ फर्ज़ बनता ही है.. और दूसरे हाथ से उनका सर पकड़ के उनके रसीले होठों का रस चूसने लगा..

दो मिनट. ही चल पाया किसिंग सीन, कि उसने मेरे सीने पे हाथ रख के धक्का दिया और खिल-खिलाती हुई चंचल हिरनी सी, कूल्हे मटकाते हुए, तेज कदमों से भाग गयी..

में मुस्कुराता हुआ, थोड़ी देर ऐसे ही खड़ा रहा फिर फ्रेश होकर चाइ पी और बाहर आ गया..!

बाहर आकर धनंजय के साथ कुछ देर चौपाल पर बैठे, कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे, वहाँ से उठके सुबह-2 के खुशनुमा वातावरण का मज़ा लेने खेतों की ओर निकल गये..!

थोड़ी धूप तेज होते ही घर वापस आ गये, चाइ नाश्ता किया और बैठक में आके बैठ गया, धनंजय अपने गाँव के स्कूल फ्रेंड्स से मिलने चला गया.

बैठक में रेखा भी बैठी थी, हम दोनो आपस में बात-चीत करने लगे. बातों के दौरान मैने नोटीस किया कि वो मुझे बड़ी गहरी नज़रों से देख रही थी.

मे- दीदी और क्या चल रहा है आजकल, पढ़ाई वाढ़ाई कर रही हो या नही..

वो- अरे अब कहाँ.. प्राइवेट बीए कर लिया, गाँव के लिए तो इतना ही काफ़ी है.

मे- हुउंम.. तो अब बस शादी का इंतजार है, क्यों..?

वो शरमा गयी… और नज़र नीची करके हस्ती हुई वहाँ से चली गयी..

मे- साला ये क्या किया मैने ? ऐसा सवाल कर दिया कि वो भाग गयी..फिर अकेला रह गया.

आंटी अपने पूजा पाठ में लगी थी, थोड़ी देर में भाभी वहाँ आ गई और मेरे बगल मे सोफे पर बैठ गयी.

भाभी- अकेले-2 बैठे हो, बोर नही हो रहे..?

मे- हाँ हो तो रहा हूँ, लेकिन कर भी क्या सकता हूँ..? आप तो नाराज़ ही हो तो किसके साथ बात करूँ ?

भाभी- तुमसे किसने कहा कि मे नाराज़ हूँ..?

मे- वो सुबह मेरे पास से भागी थी तो … मुझे लगा…कि…

भाभी- भागती नही तो पता नही तुम और कहाँ-2 तक पहुँच जाते..?

मे- उनकी आँखों में झाँकते हुए..! वैसे रास्ता तो आपने ही दिखाया है, फिर उसे बंद क्यों करना चाहती हैं ?

भाभी- डर लगता है अरुण…! किसी को पता लग गया, तो पता नही क्या होगा ?

 
मे- तो फिर मुझे उकसाया क्यों..?

भाभी- तुम्हारी मर्दानगी पर फिदा हो गयी हूँ में…! जो तुमने हमारे लिए किया, उतना तो कोई सगा भी नही करता..!

मे- तो अब पीछे मत हटिए, और अपने दिल की सुनिए.. वो क्या कहता है..?

भाभी- दिल के हाथों ही तो मजबूर होती जा रही हूँ, ये कम्बख़्त तुम्हारी ओर खिचा चला जा रहा है..

मे- उसके कान की लौ को जीभ से टच करते हुए.. तो फिर भूल जाओ सबको..और उसके गाल को काट लिया…!

भाभी- उ…माआ.. क्या करते हो ..? अभी नही, आज रात को आती हूँ तुम्हारे पास..!

मे- तो अभी के लिए स्टार्ट-अप ही हो जाए..! और उसके होठों को चूम लिया..एक हाथ से उसकी गोल-मटोल नेविया बॉल को मसल दिया..

भाभी- ससिईई… आयईयीई.. अब्भी छोड़ो…प्लस्सस.. समझा करो.. कोई भी आ सकता है यहाँ.. और वो उठके चली गयी..!

में खुश हो गया कि चलो आज रात को इसकी जम के बजाता हूँ..! उसकी चौड़ी गान्ड मेरी आँखों के सामने घूमने लगी..!

रात को सभी खाना खा पीकर, सोने चले गये, में थोड़ी देर वहीं बैठा रहा, धनंजय ने कहा, सोना नही है, मे बोला तू जा मुझे अभी नींद नही आरहि, थोड़ी देर में आता हूँ.

वो भी चला गया, मौका देख कर किचन की तरफ गया, वहाँ भाभी बरतन सॉफ कर रही थी, चुपके से जाके उसे अपनी बाहों मे कस लिया पीछे से… !

आअहह…! मेरे लौडे का कनेक्षन जैसे ही उसकी गद्देदार गान्ड से हुआ.. पुछो मत….?

सला कपड़ों के उपर से ही इतना मज़ा है इसकी गान्ड का, तो बिना कपड़ों के क्या होगा..? सोचा मन में.

मेरे अचानक इस तरह पीछे से पकड़ लेने से वो चिंहूक गयी…! और बोली.. अरे बेसबरे, थोड़ा तो इंतजार करो.. ये काम निपटा कर, थोड़ी देर तुम्हारे भैया का मन बहला दूं, फिर आती हूँ, जो जी मे आए कर लेना.. अब जाओ यहाँ से… प्लस्सस..

उसके गाल पे पप्पी लेके मे अपने कमरे में आ गया, और आने वाले हसीन पलों में खो गया..!

रात करीब 1 बजे को वो मेरे रूम में आई.. तबतक मे सो चुका था, काफ़ी देर तक वो मेरे पलंग के साइड में खड़ी होकेर मुझे देखती रही, फिर धीरे से मेरे साइड में घुटने मोड़ कर बैठ गयी.

आहिस्ते से पाजामे को खींचकर निकाल दिया, और मेरे सोए पड़े लल्लू के उपर हाथ रख कर प्यार से उसे सहलाने लगी.

लंड महाराज को अपने स्वामी की नींद से कोई वास्ता नही, उन्हें तो जो प्यार से दुलार दे बस, उठ खड़े होते हैं, सीना चौड़ा के.

जैसे ही साहिब बहादुर तन्तनाये…! मेरा अंडरवेर भी गायब हो गया, अब नीचे से बिल्कुल नंगा था. थोड़ी देर हाथ से सहलाने के बाद उसने लंड की खाल खींच कर सुपाडे को भी नंगा कर दिया.

टमाटर जैसे लाल-लाल सुपाडे को देख कर उसको सब्र नही हुआ और उसे चूम लिया.. धीरे-2 वो उसे चाटने लगी..

जब मुझे कुछ-2 गीले होने का एहसास हुआ, तो मेरी नींद खुल गयी, थोड़ा सर उठाके देखा तो मेरे… मेरे मुँह से किल्कारी निकल गयी..!

ळौडे को छोड़, उसने अपने होठों पे उंगली रख के मुझे चुप रहने का इशारा किया..!

मैने उसे कंधों से खिच कर अपने उपर कर लिया,, अब वो आधी मेरे उपर थी और आधी पलंग पर.

पेट के बल लेटी, कमर के नीचे वो पलंग पर थी, उसकी एक चुचि मेरे सीने से दबी थी, दूसरी मेरे बगल में दब गयी, उसके होंठ मेरे होठों पर.

मेरा एक हाथ उसकी पीठ पर था, दूसरा उसके नितंबों के उपर, उसकी पहाड़ियों की चढ़ाई-उतराई चेक कर रहा था.

उसके बाद उसने अपनी एक जाँघ मेरे लौडे के उपर रख कर उसे रगड़ने लगी.

5-6 मिनट की होठ चुसाइ के बाद मैने उसे पलट दिया, और अब मे उसके उपर चढ़ गया, उसके हाथों को दोनो साइड से फैला के अपनी उंगलियाँ उसकी उंगलियों में फँसा दी और उसखे होठों को चूसने लगा…

वो बहुत गरम हो चुकी थी, उसकी साँसें उखड़ने लगी, दोनो के बदन भट्टी की तरह तपने लगे…!

मेरे दोनों हाथों ने उसकी चुचियों को ब्लाउज के उपर से ही मसलना शुरू कर दिया…!

सीयी.. हीईिइ…ड्यूवर जी, खेले खाए लगते हो.. उउउऊहह.. आहह.. धीरे—

आहह.. एक दिन में ही इन्हें तरबूज बनाओगे क्या रजाअ…!

हेईए… राणिि.. तेरी.. ये आम.. बड़े रसीली..लग रहे… है.. बहुत रस भरा है इनमें…निकालने तो दो..!

आहह… मेरे रजाअ… सीयी..रस को चूसाआ…जाताअ.. है..मसलाअ.. नही..!

मैने फटाफट उसके ब्लाउस के बटन खोल दिए, कसी हुई ब्रा में उसके कबूतर बाहर निकलने को फड़फड़ाने लगे.. मे अब उसके ब्रा के बीच की घाटी को जीभ से चाटने लगा..

उसने अपनी पीठ उठा दी और ब्रा को भी निकलवा दिया.. अब उसके दोनो कबूतर चोंच उठाए गुटरगूं करने लगे, बोले तो चुसवाने को तैयार थे.

उसके निपल कंचे की तरह कड़क हो गये थे, मैने हल्के-2 अपनी जीभ से दोनो को बारी-2 से चाटा, तो उसकी छाती और उपर को उठ गयी, और मुँह से सिसकारी फुट पड़ी.

आहह…देवर्जी चूसो इन्हें… उऊहहू.. खा जाओ…ज़ोर-2 से… उहहुउऊ…ऐसी..हिी…हहानं… और ज़ोर से हाईए….नहिी…ज़ोर से मत कॅटू…!!

में अपने काम में बिज़ी था, वो सिसकारियों में डूबी थी.. कमरे का माहौल चुदाईमय हो चुका था……!!!

कुछ देर में हम दोनो जन्मजात नंगे थे, वो पलंग पर चित्त लेटी थी, थोड़ी देर तक में उसके बदन के कटाव देखता रहा, क्या फिगर थे उसके..?

एकदम परफेक्ट फिगर, 34-22-34..चुचियाँ एकदम उपर को मुँह उठाए हुए तनी हुई, लटकन नाम मात्र को भी नही.. गोल-गोल कसी हुई एक दम सॉफ्ट ..रूई के माफिक…

मैने उसके पूरे शरीर को चुंबनों से गीला कर दिया, होंठो से शुरू करके, गले, चुचियाँ, उसके बाद पेट पर आकर उसकी गहरी नाभि में जीभ डाल दी..

वो सिसकार भर उठी, अब मेरी जीभ जांघों के बीच पहुच गयी थी, पहले मैने उसकी जांघों के अन्द्रुनि हिस्से को चाटना शुरू किया, उसकी टाँगे अपने आप खुल गयी, जैसे ही मेरी जीभ उसके बिना बालों वाली चिकनी चूत पर गयी, स्वतः ही उसकी कमर थिरकने लगी..

ससिईईयाअहह…. हाईएईई..ये सब कहाँ से सीखा..देवर्जी… मेरी तो जान ही निकाले दे रहे हो…हाईए.. राम इतना मज़ा मुझे आजतक नही आया..

ससुउउ…आह..पूरे कलाकार हो तुम तो…!

वो ना जाने क्या-2 बोले जारही और मे पूरे मन से उसकी चूत को चाट रहा था, 5 मिनट. में ही उसने पानी छोड़ दिया..!

उसने झट से मुझे अपने उपर खींच लिया और मेरे होठों पे टूट पड़ी..

बहुत मज़ा देते मेरे प्यारे देवरजिी.. आहह.. अब डाल भी दो अपना ये मूसल और कूट दो मेरी ओखली को..!

रानी ! थोड़ी हमारे बबुआ की भी तो सेवा करदो.. तभी तो वो तुम्हारी रामप्यारी को अच्छे से प्यार करेगा..!!

वो समझ गयी और मुझे नीचे करके मेरे लंड पर टूट पड़ी… आअहह.. क्या मस्त लॉडा चुस्ती थी वो..! कभी सुपाडे को मुँह मे लेके आइस्क्रीम की तरह चाटती, कभी पूरे लौडे को मुँह में भर लेती, साथ-2 में मेरे सिपाहियों को हाथ से दुलार्ती..

मज़े की अधिकता में मेरे मुँह से स्वतः ही आहह.. निकल रही थी, अपने हाथ से उसके सर को लंड पर दबाने लगा..

उसके मुँह से लार बह-2 कर बाहर आ रही थी और अंडों को भी गीला कर रही थी,

में अपनी कमर चला कर उसके मुँह की चुदाई करने लगा.

अब मुझसे कंट्रोल करना मुश्किल होता जारहा था.

 
झटपट उसे नीचे लिटाया, और उसकी टाँगों को फैलाक़े, अपने लंड को उसकी गीली चूत के उपर फिराने लगा, मज़े की वजह से भाभी की आँखें बंद हो गयी, और वो आनेवाले सुखद पलों का इंतजार करने लगी.

आहह…देवर्जी अब डाल भी दो ना… और कितनी घिसाई करोगे.. शिकायती लहजे में बोली वो..

में भी तो आतुर था परम सुख पाने के लिए, लंड को चूत के छेद पर रखा, और पेल दिया उसकी आँसू बहती चुन-मुनिया के अंदर..

आहह… ससिईईई.. हाईए… धीरे… रजाअ..!

मे- क्यों भाभी क्या हुआ…? इतने दिनो से चुद रही हो फिर भी धीरे करने को बोल रही हो..!

असईईई..!! तुम्हारा लंड थोड़ा मोटा है… थोड़ा दर्द हुआ.. !

मे- क्यों भैया का इतना मोटा नही है…

भाभी- नही ना ! इसके लिए तो..

अभी मेरा आधा लंड ही गया था, फिरसे एक सुलेमानी धक्का दिया, पूरा साडे-साती लंड भाभी की चूत में समा गया…

हाईए… मारीी रईए.. जालिमम्म.. और कितना लंबा है,,?

बस पूरा हो गया भाभी.. अब बस मज़े लो..!

और धीरे-2 मैने स्ट्रोक लगाना शुरू किया..

2-4 धक्कों में ही भाभी की चूत लंड पे सेट हो गयी.. मुझे ऐसे लग रहा था मानो बिना किसी टॉलरेन्स के बोर में शाफ्ट ठोक दी हो.. एकदम कस गया था मेरा लंड चूत में.

जैसे-2 धक्के लग रहे थे उसके आहें अब मादक सिसकियों में तब्दील होती जा रही थी…

10 मिनट के ताबड़तोड़ चुदाई से भाभी की चूत पानी दे गयी, और वो कमर उचका-2 के लंड को अंदर और अंदर लेने की कोशिश करने लगी..

ढका-धक धक्के लग रहे थे,…जब उसकी चरम सीमा आई तो वो कमर उठाके चीख मारती हुई बुरी तरह से झड़ने लगी, उसके पैरों की एडियाँ मेरी गान्ड पे कसने लगी..

मेरा भी अब होने ही वाला था, सो 4-6 तगड़े शॉट मारके, मैने भी अपना कुलाबा उसकी चूत में खोल दिया…!

बहुत झडा…! जी लगाके झडा !! चूत लबालब उपर तक भर गयी, ओवरफ्लो होने लगा, लंड की साइड से हम दोनो का वीर्य, जहाँ से जगह मिली निकलने लगा..

2 मिनट. उसके उपर पड़े रहने के बाद मैने अपना लंड बाहर खींचा…भलल-भलाल करके ढेर सारा पानी चूत से निकला, और बहता हुआ गान्ड के छेद से होता हुआ बेड शीट को गीला करने लगा.

भाभी ने मुझे कस के चिपका लिया और बोली…!

जीवन में पहली बार इतना मज़ा मिला है मुझे.. तुम्हारे सुलेमानी लंड ने मेरी मुनिया की धुनाई सी कर दी.

मे- मज़ा तो आया ना…भाभी..?

वो- मज़ा..? पुछो मत.. ऐसी चुदाई मेरी अभी तक नही हुई..!

मे- और कितने लंड लिए हैं भाभी सच बताना..!

वो- शादी से पहले एक बाय्फ्रेंड था मेरा.. उससे कई बार हुआ था, पर ऐसा कभी नही..!

ऐसे ही थोड़ी देर बातें करते रहे, एक दूसरे की बगल में लिपटे हुए..!

मेरा हाथ, भाभी की गान्ड पे पहुँच गया, और उसके कल्शो को सहलाने लगा, और फिर एक उंगली उसकी गान्ड की दरार में डालके फिरने लगा.

मे- भाभी आपकी गान्ड बड़ी मस्त है.. एकदम गोल मटके जैसी लगती हैं.

भाभी- मुझे पता है, तुम्हारी नज़र मेरी गान्ड पे है..!

मे- तो दो ना..प्लस्सस.. भाभी .. बस एक बार.. फिर नही कहूँगा.. बच्चों जैसी ज़िद करते हुए कहा मैने.

भाभी- मैने अब तक कभी ट्राइ नही किया है, पता नही क्या होता होगा..!

मे- अरे कुछ नही होगा, चूत भी तो पहली बार मराई होगी.. ऐसे ही ये पहली बार… लेके देखो.. चूत में तो झिल्ली होती है जिसे टूटने में ज़्यादा दर्द होता है, इसमें तो वो भी नही होती, बस पहली बार थोड़ी टाइटनेस ज़्यादा होगी बस.

भाभी- तुम्हें सब चीज़ का अनुभव है..? लगता है, कई तोड़ चुके हो..

मे- नही सच में भाभी.. आप दूसरी हो, झूठ नही बोलूँगा.

भाभी- कॉन है वो पहली..?

मे- है एक.. मेरा फर्स्ट लव… मेरी जानेजिगर.. जो मुझे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है..!

भाभी- ओह ! तो मजनू जी इश्क भी फरमाते हैं…क्यों..? सच मे तुम बड़े अच्छे हो वो बड़ी खुशकिस्मत है, जो तुम्हारा प्यार उसे मिला.. तो कब कर रहे हो शादी उससे..?

मे- पता नही भाभी, हो पाएगी भी या नही..?

भाभी- क्यों..?

मे- अपने-2 घरों के संस्कार.. ये जात-पात, रीति-रिवाज आड़े आ रहे हैं… फिर भी देखते हैं, क्या संभव हो सकता है..?

वो मेरे उपर लेटी हुई थी और मे उसकी चुचि पीने लगा, कुछ देर में वो गरम हो गयी, तो मैने उसे घोड़ी बनने को बोला और उसके पीछे आ गया.

वाह ! सच में उसकी गान्ड देखके मेरा शेर दहाड़ने लगा.. मैने उसके एक कूल्हे में दाँत गढ़ा दिए और काट लिया..

वो- अरईी.. दैयाअ… काटते क्यों हो,,?

मैने अनसुनी करते हुए, दूसरे कूल्हे में भी काट लिया.. वो सिसकारी लेने लगी दर्द और मज़े में.

फिर मैने उसकी गान्ड को चूमा, और चाटने लगा.. गान्ड में मुँह डालके उसकी चूत चाटी और फिर उसकी गान्ड के छोटे से भूरे रंग के छेद पर जीभ की नोक लगाके अंदर करने की कोशिश करने लगा..

सुरसूराहट में उसकी गान्ड का छेद खुल-बंद हो रहा था.. बड़ी ही मनोहारी गान्ड थी भाभी की…!

मैने जैसे ही अपना मूसल हाथ में पकड़ के उसकी चूत और फिर गान्ड पे फिराया, तो वो बोली..

देवर्जी पहले एक बार चूत में डालना थोड़ी देर..! फिर बाद में गान्ड मारना..!!

मैने कहा ठीक है, और लंड एक ही झटके में उसकी चूत में पेल दिया.. उसकी आहह… निकल गयी.. !!

सीयी…आअहह… बहुत जालिमम्म.. हो तुम अरुण… सच में…, एक ही बार में डालने की क्या ज़रूरत थी.. हान्ं..! धीरे-2 नही डाल सकते थे..?

मे- सॉरी भाभी.. आपकी गान्ड देखके सब्र नही हुआ मुझसे.. झटका लग गया ज़ोर से.. आप कहो तो निकाल लूँ..?

नही अब करते रहो..लेकिन आराम से.. हां ..!, धीरे-2 उसको मज़ा आने लगा और वो अपनी गान्ड लंड पे पटाकने लगी..

 
इस पोज़िशन में चूत मारने में बहुत मज़ा आरहा था, बार-2 मेरी झंघें उसकी चौड़ी गान्ड पे थपकी सी देती..ठप्प-ठप्प.. बड़ा अच्छा लग रहा था..

मैने अपनी बीच की उंगली मुँह से गीली करके उसकी गान्ड के संकरे छेद में डाल दी, शुरू में तो उसको दर्द हुआ, पर बाद में मज़ा लेने लगी.

कुछ देर चुदाई के साथ-2 गान्ड में एक उंगली अंदर बाहर करता रहा, उसके बाद दो उंगली पेल दी..

भाभी मज़े में थी सो उसकी गान्ड दोनो उंगली खा गयी..

धक्कों की रफ़्तार तेज और तेज होती गयी.. दोनो छेदों में एक साथ अटॅक होने से, 10 मिनट. में ही उसकी चूत पानी छोड़ गयी.. और वो झड़ने लगी..

लंड चूत रस से सराबोर तो था ही, देर सारा थूक लेके और गान्ड पे लगा दिया, और अपने मूसल को हाथ मे लेके गान्ड पे सेट करके दबा दिया, थूक और चूत रस से चिकनी गान्ड आसानी से सुपाडे को निगल गयी.

फिर मैने थोड़ा ज़ोर लगाके लंड अंदर किया, तो वो दर्द से छटपताई और कराहते हुए बोली…

ओह्ह्ह.. माआ.. हाइईई.. मारीी.. निकालो अरुण… बाहर निकालो प्लस्सस… मुझसे नही होगा…बाद में कर लेना… हाईए… जल्दी निकालूओ..

मे थोड़ा रुक गया और अपने दोनो हाथ उसकी कमर से लपेटे हुए उसके दोनो आमों को थाम लिया और मसल्ने लगा.. फिर एक हाथ से उसकी चूत भी सहलाना शुरू कर दिया.

थोड़ी देर में ही उसको फिर से मज़ा आने लगा और अपनी गान्ड को उचका दिया.. मौके पे चौका मारते हुए..एक धक्का और कस्के मारा.. मेरा तीन चौथाई लंड उसकी गान्ड में धुंस गया..

अब तो मारे दर्द के उसका बुरा हाल था.. अगर किसी जंगल उंगले में ये चुदाई हो रही होती ना, तो शर्तिया वो दहाड़ें मार-2 के चिल्ला रही होती..

थोड़ी देर रुक के मे फिरसे उसकी चूत मे अपनी दो उंगली डाल दी और दूसरे हाथ से उसके निपल को मसल दिया…

निपल के मसल्ने से उसका दर्द गान्ड से निपल में आ गया और उसीका फ़ायदा उठाते हुए मैने पूरा लंड उसकी गान्ड में ठूंस दिया.. उसका दर्द और बढ़ गया..

पर अब मैने रुकने की वजे धीरे-2 लंड को अंदर बाहर करने लगा, और दोनो चुचियों को मसल्ने लगा.. कुछेक ही देर में उसकी गान्ड मेरे लंड के हिसाब से सेट हो गयी, और उसका दर्द अब मज़े में बदलने लगा.

वो भी अब अपने गान्ड को आगे-पीछे करने लगी…आज मैने भी पहली बार गान्ड मारी थी, लेकिन इसमे एक अलग ही तरह का मज़ा आरहा था.

कसी हुई गान्ड ने मेरे लंड को जल्दी ही पस्त कर दिया और मे 10 मिनट. में ही उसकी गान्ड में झड गया.. मेरे वीर्य की गर्मी अपनी गान्ड में महसूस करके वो भी झड़ने लगी..

कितनी ही देर मे उसके उपर पड़ा रहा.. उसकी गद्देदार गान्ड के उपर से उठने का मन ही नही कर रहा था.. पर उठना तो था ही..

हम दोनो बुरी तरह थक चुके थे, और समय भी अब 4 बजने वाले थे, सो

भाभी अपने कपड़े पहन कर अपने रूम में चली गयी और में खाली पाजामा पहन कर ही सो गया.

सुबह देर तक मेरी आँख नही खुली, आज भाभी भी चाइ लेके नही आई, शायद उसकी भी नींद नही खुली हो.

8 बजे के करीब धनंजय मेरे रूम में आया, तब उसने उठाया,

धनंजय- क्या बात है भाई, आज सारे नियम ताक पे रखके अभी तक सो रहा है..

मे- हां यार देर रात तक नींद ही नही आई, सो सुबह आँख नही खुली..

धनंजय- चल अब उठ फ्रेश हो चाइ नाश्ता करके निकलते हैं, शहर की तरफ कोई मूवी-ुओवी देख के आते हैं. अमिताभ बच्चन की नयी मूवी लगी है.

मैने कहा ठीक है, तू चल मे एक घंटे में तैयार होता हूँ फिर चलते हैं.

चाइ नाश्ता करके जब हम रेडी हुए, धनंजय ने अपने पिता जी से शहर जाने के लिए बात की और बताया कि क्या प्लान है तो उसकी मम्मी बोली, कि तुम लोग रेखा को भी साथ ले जाओ, वो भी देख आएगी.

हम तीनों चल दिए शहर की ओर, साधन के नाम पे उसके यहाँ एक बजाज का स्कूटर था, उसे लेके चल दिए. धनंजय स्कूटर चला रहा था, मे बीच में था, मेरे पीछे रेखा बैठ गयी दोनो पैर एक तरफ को करके.

बजाज स्कूटर की दो अलग-2 सीट होती हैं, मे आधा आगे की सीट पे और आधा पीछे की सीट पे अड़जस्ट हो गया. रेखा के लिए भी पीछे ज़्यादा जगह नही बची थी, सो वो मेरी पीठ से सटी हुई थी, वो थोड़ी तिर्छि होके बैठी थी, तो उसकी एक राइट साइड की चुचि मेरी पीठ में गढ़ रही थी, या वो जान-बुझ के और ज़्यादा गढ़ा रही थी.

उसकी कठोर चुचि मेरी पीठ से दबी हुई थी, उसके आभास से मेरा लॉडा तन्तनाने लगा, अब मुझे ये भी डर था कि साला कहीं आगे धनंजय की गान्ड में जाके ठोकर ना मारने लगे..इस वजह से मे और थोड़ा पीछे को दब गया,.

रेखा ने पकड़ने के लिए मेरी कमर में हाथ डाल दिया, और अब वो एक तरह से मेरी पीठ पे सवार ही थी, मेरी हालत बहुत खराब थी साला एक तो आगे को नही जा सकता, दूसरा वो पीछे से मुझे ठेस रही थी.

 
अब तो वो पूरा अड्वॅंटेज लेने पे उतरती जा रही थी, उसका हाथ अब प्रोहाइबिटेड एरिया की तरफ भी आने लगा, और मेरे लंड पे अपनी उंगलिया टच करने लगी.

मेरे से रहा नही गया और मैने उसका हाथ पकड़के उपर कमर पे रख दिया, अब वो कुछ संभली, और थोड़ा ठीक से बैठी लेकिन चुचि ठोकना बंद नही किया, रास्तों के झटकों का पूरा-2 लाभ लेती रही.

राम-राम करके शहर पहुँचे, शो में थोड़ा टाइम था तो कुछ आइस्क्रीम वग़ैरह खाई.. फिर टिकेट लेके हॉल के अंदर चले गये.

उपर की सीट मिली तो मे धनंजय के बाजू में बैठ गया और रेखा जानबूझ कर मेरे बाजू में बैठ गयी, मतलब मे दोनो के बीच में था.

मूवी शुरू हुई, थोड़ी देर मे वो भी शुरू हो गयी, मैने मन में कहा, ये लौंडिया तो बड़ी गरमा रही है यार.. क्या करूँ दोस्त की बेहन है.. कुछ गड़बड़ ना हो जाए.. साला टेन्षन होने लगा था मुझे अब.

मूवी शुरू होने के थोड़ी ही देर के बाद रेखा ने अपना हाथ मेरी जाँघ पे रख दिया, थोड़ी देर वो ऐसे ही हाथ रखे रही, सिनिमा हॉल में झापा-झप्प अंधेरा था. हाथ को हाथ सुझाई नही दे रहा था, सो लेने लगी उसका फ़ायदा.

अब उसका हाथ धीरे-2 मेरी जाँघ को सहला रहा था, मूवी अच्छी थी, मेरे मनपसंद सूपर स्टार की “नमक हलाल”, पर क्या करूँ साला ध्यान बार-2 भटक रहा था..

उसका हाथ जैसे ही मेरे लंड के उपर आया, मैने उसका हाथ हटा दिया, और उसके कान में बोला- दीदी क्या कर रही हो ठीक से बैठो ना प्लस्सस..

वो भी मेरे कान में बोली, भाभी के साथ तो रात भर खूब मज़े किए, मेरे हाथ में काँटे निकल आए…हान्ं..?

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया….!

इंटर्वल हो गया था, टाय्लेट वग़ैरह जाने के बाद वेंडर’स लॉबी में आके कुछ खाने-पीने को लिया, और फिर से हॉल में आ गये.

इंटर्वल के बाद फिल्म फिर शुरू हो गयी, धनंजय मूवी में खो गया, मैने रेखा के कान में जाके पुछा, दीदी क्या कह रही थी तुम..?

रेखा- मैने तुम्हारी और भाभी की रात वाली पूरी मूवी देखी है अब अगर तुमने ज़्यादा शरीफ बनने की कोशिश की तो देख लेना.. हां.

मे- लेकिन तुम मेरी दीदी जैसी हो वो भाभी है,

रेखा – दीदी जैसी ही तो हूँ, दीदी तो नही.. फिर थोड़े रिक्वेस्ट वाले स्वर में बोली- प्लीज़.. अरुण मे भी तुम्हें पसंद करने लगी हूँ, मेरा दिल आ गया है तुम्हारी मर्दानगी पर, देखो मना मत करना.

मे मन में-ये साली मर्दानगी क्या दिखाई, यहाँ तो जिसे देखो पीछे ही पड़ गया है यार, अब क्या करूँ..? इसको मना करता हूँ तो पता नही क्या हंगामा खड़ा कर दे.. ? फिर कुछ सोच के..

अच्छा दीदी एक बताओ, पहले भी किसी के साथ….? मेरा मतलब है कि…

रेखा- नही .. नही… अरुण ! मे उस टाइप की लड़की नही हूँ, वो बस तुम भा गये हो मन को इसलिए, और फिर तुम्हारा भाभी के साथ वो सब देखा तो ….. और फिर से उसने मेरी जाँघ पे हाथ रख के मेरे गाल को चूम लिया..

मैने भी अब अपना हाथ उसकी जाँघ पर रख दिया और सहलाने लगा..इसका मतलब अभी तक कुवारि हो…?

रेखा- हां..! और शर्म से नज़रें झुका ली..

अब मेरी भी झिझक कम होती जा रही थी, सोचा एक नयी चूत का उद्घाटन करने को और मिल रहा है, अपना क्या जाता है, लौंडिया सामने से ही कह रही है तो कर देते हैं इसकी भी इक्षा पूरी, और उसकी कुवारि चूत पे सलवार के उपर से ही हाथ ले जा कर सहला दिया.

ससिईई…! हाइईई...! उसकी सिसकी निकल गयी, धनंजय बोला क्या हुआ दीदी…?

रेखा- कुछ नही भाई, कोई कीड़ा शायद पैर पे आ गया था, अब चला गया तू मूवी देख..! मैने पैर झटक कर हटा दिया है.

मैने एक हाथ उसके गर्दन के पीछे से ले जाकर उसकी चुचि पे रख दिया… कसम से क्या सॉलिड चुचि थी उसकी बिल्कुल रिंकी के जैसी..!

मेरा एक हाथ उसकी चुचि पे, दूसरा हाथ उसकी चूत पे था, कैसा लग रहा है दीदी मैने उसके कान में पुछा…!

धीमी आवाज़ मे सिसकी लेते हुए.. सीयी.. आह.. बहुत अच्छा..! कह कर मेरा लंड पकड़ लिया उसने पेंट के उपर से ही और मरोड़ दिया..!

मे तो सिसक भी नही सकता था, वरना धन्नु को पता चल जाना था, मे उसी की तरफ जो था. फिर भी उसके कान में फुसफुसाकर कहा..! क्या करती हो दीदी..? तोड़ॉगी क्या उसे,,?

तूने भी तो मेरी पेंटी का बुरा हाल कर दिया है कमिने..! सच मुच उसकी सलवार तक गीली हो चुकी थी..!

अब इससे ज़्यादा यहाँ हम कुछ नही कर सकते थे, सो अब मूवी ख़तम होने का इंतजार करने लगे..!

 
मूवी ख़तम हुई, बाहर आकर थोड़ी बहुत खरीददारी की, मैने अपनी तरफ से रेखा के लिए कानों के लिए बलियाँ खरीदी, और भाभी के लिए एक अंगूठी.

फिर उसी स्कूटर पे लौट लिए घर को, लेकिन अब मुझे इतनी टेन्षन नही थी हम दोनो धनंजय के पीछे बैठे-2 गुप-चुप मस्तियाँ करते रहे रास्ते भर.

घर आते-2 शाम हो गयी थी, थोड़ा बहुत बैठके बातें की, मूवी की, इधर-उधर की..! इस दौरान भाभी नज़र नही आई..! मैने आंटी से पुछा भी.., तो उन्होने कहा, उसकी तबीयत ठीक नही है, कुछ कमर में दर्द बता रही थी..

मे और रेखा कुछ-2 समझ रहे थे उसकी प्राब्लम..!

मैने कहा मे देखता हूँ क्या प्राब्लम है, और उनके कमरे में चला गया..! भाभी बिस्तेर पे लेटी हुई थी, एक बाजू आँखों के उपर रखा था..!

मे- भाभी..क्या हुआ आपको..? वो चोंक के उठी..!

वो- दर्द देकर पूछते हो क्या हुआ..? पूरी गान्ड पके फोड़े की तरह दुख रही है, बैठा भी नही जा रहा है, चलने फिरने की तो बात ही छोड़ो..!

मे हंसते हुए..! अरे तो गरम पानी से सेंक ही ले-लेती.. चलो लो ये टॅबलेट खलो, और मैने एक पेन किल्लर उनके हाथ में रख दी, जग से पानी लिया और खिला दी.

अब देखो 10-15 मिनट. दर्द कम हो जाएगा..!

वो- तुम बताओ, देख आए मूवी.. ?

मे- हां..! अच्छी मूवी थी.. मे आपके लिए कुछ लाया हूँ..? और रिंग निकाल कर उनकी उंगली में पहना दी..

वो- रिंग देख कर.. तुम लाए हो..? मेरे लिए..?

मे- हां.. क्यों आपको पसंद नही आई..? तो मे वापस रख लेता हूँ..!

वो- अरे नही..नही..नही..! सच में बहुत अच्छी है, मुझे तो बहुत पसंद आई.. !

मे- तो आज इसका इनाम मिलेगा..?

वो- अरे नही..नही..! आज तो बिल्कुल भी नही.. वरना कल तो खड़ी भी नही हो पाउन्गी.. !

मे- ठीक है, वैसे भी आज संभव नही है.. !

वो- क्यों आज रात कहीं जा रहे हो..?

मे- नही.. जा कहीं नही रहा..! किसी से कुछ वादा किया है..!

वो- क्या..? किससे..?

और फिर मैने रेखा वाली बात बताई…! वो अवाक रह गयी और बोली- हे राम.. अब क्या होगा.. ? उसने किसी से इसका जिकर कर दिया तो..?

मे- इसलिए तो आज उसका मुँह बंद करना है, कुछ तो उसको भी देना ही पड़ेगा..?

वो- क्या वो करने देगी..?

मे- अरे उसी ने पूरे रास्ते मुझे परेशान किया, सिनिमा हॉल में भी छेड़ती रही, जब मैने उसे रोकने की कोशिश की, तो उसने सामने से ये बात बताई और प्रॉमिस लिया कि वो उसको भी वो सब देगा जो भाभी को दिया है, तभी चुप रहेगी.

वो- इसका मतलब ये लड़की भी महा चालू है..!

मे- नही…! वो अभी तक कुवारि है..!

वो- सच !!, फिर तो बड़ा मुश्किल होगी उसे आज..!

मे- क्यों ? आपने पहली बार किया था तो आपको मुश्किल हुई थी..?

वो- ज़्यादा तो नही..! पर तुम्हारा हथियार बहुत तगड़ा है इसलिए कह रही हूँ, रेखा की तो आज खैर नही, थोड़ा ध्यान से, कहीं ज़्यादा चीख पुकार कोई सुन ना ले..!

मे- आप चिंता ना करो, आपकी गान्ड फाडी.. तो आपने क्या घर सर पे उठा लिया था

क्या.. ? वो भी समझती है ये सब..!

थोड़ी देर में उसका दर्द कम हो गया, और मे वहाँ से आकर सब के साथ बैठ गया, रेखा ने इशारों में पुछा क्या हाल है अब, मैने भी आँखों के इशारे से बता दिया की सब ठीक है.

 
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