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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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रात का खाना-वाना खा पीके, सब लोग अपने-2 कमरों में सोने चले गये, मे और धनंजय थोड़ी देर गाप्पें लड़ाते रहे, आनेवाले समय के बारे में कैसे क्या करना होगा ये सब, फिर कोई 11 बजे हम दोनो भी सोने चले गये..!

वैसे रेखा ने कुछ बोला तो नही था, कि आज वो आएगी या नही मेरे पास पर मुझे पक्का पता था कि उसकी चूत ज़रूर कुलबुला रही होगी..!

मे अभी लेटा ही था, सोने की कोशिश कर ही रहा था कि आहट हुई…!!

मैने आँख खोल कर देखा तो रेखा अंदर से दरवाजा बंद कर रही थी…!

मे- अरे दीदी तुम यहाँ क्यों आई हो,,? और ये गेट क्यों बंद किया..?

वो- मेरे पास बिस्तर पर बैठती हुई..! अच्छा जैसे तुम्हें कुछ पता ही नही..? हाइन.. कैसे बन रहे हो..?

मे- अरे मुझे कैसे पता होगा…? जानते बुझते उसे चिड़ाते हुए बोला..!

वो मेरे सीने पर प्यार से मुक्के बरसाते हुए बोली- बहुत बुरे हो तुम.. अरुण..!, आग लगा कर पूछते हो कि ये कैसे लगी.. आम्मुन्च.. और मेरे होठों को चूम लिया..

वो बहुत बेसब्री हो रही थी, मैने भी उसको अपनी बाहों में कस लिया और उसके होत चुसते हुए बोला- दीदी क्या ये हम सही कर रहे है..?

किसी को पता चला तो लोग क्या कहेंगे, कि देखो कितना नीच है, अपने दोस्त की बेहन को भी नही छोड़ा..!

वो- अब ये सब सोचने का समय निकल गया है अरुण, मे वादा करती हूँ तुम्हें कोई आँच नही आने दूँगी..! और वैसे भी किसी को पता कैसे चलेगा..? क्या तुम किसी को बताओगे..? या में.?

और मेरे पूरे चेहरे पर चुम्मनों की बारिश सी करदी उस बेसब्री लौंडिया ने, वास्तव मे उसे अब कोई रोक नही सकता था..!

मे पलंग के सिरहाने से टिका बैठा था, उसकी कमीज़ उतार के उसे मैने अपनी गोद में बिठा लिया अपने दोनो ओर पैर करके.. !

मैने उसके 32” मम्मों को अपने दोनो हाथों मे लेके रगड़ दिया..!

सीयी… हआइई… रामम्म… मारीइ…रीए.. धीरीए.. ड्ड.आ.र.ड्ड..हो..त.त्ता.आ. है….!

लगता था, उसके संतरों पर भी अभी तक कोई काम नही हुआ था, थोड़ा बहुत उसी ने उनको छेड़ा होगा..!

उसकी ब्रा निकाल के बिस्तर पे डाल दी.. , वाउ ! क्या चुचियाँ थी, उन्हें देख कर मुझे रिंकी की याद आ गई और उसके हल्के गुलाबी निपल को होंठो से पकड़ के खींच दिया..!

ससुउुुआाहह…मुंम्मिईिइ.. मरी रीई… ओह माआ.. ये क्या हो रहाआ.. है.. मुझीए…ओह्ह्ह…अरुण.. बहुत मज़ाअ.. आरहा है… चूसो इनको… खा जाओ… मेरे राज आआ..!

दूसरे निपल को अंगूठे और उंगलियों के बीच मसल दिया हल्के से…! अब तो रेखा आसमानों में उड़ने लगी..आँखें बंद करके, औंत की तरह गर्दन उठाके मेरे मुँह को बुरी तरह अपनी चुचि पे दबा दिया..!

मेरा मुँह उसकी मुलायम चुचि में दब गया, मुझे सांस लेने में भी मुश्किल होने लगी..!

अरे दीदी मेरा दम घोंटोगी क्या..? मुँह हटा के बोला मे.. वो बुरी तरह शरमा गई..!

फिर मैने दूसरी चुचि के कांचे जैसे खड़े निपल को मुँह में लेके चूसा और दूसरी चुचि को हाथ में भर के ज़ोर्से मसल दिया…!

हआइईईई…ऊहह.. वो हाँफने सी लगी…! मे उसके बारी-2 से निपल चूस्ता रहा, और मेरे हाथ उसकी सलवार का नाडा खोलने में बिज़ी हो गये, इस बीच उसने भी मेरा कुर्ता मेरे शरीर से अलग कर दिया..!

रेखा को बेड पे लिटके, उसकी सलवार निकल दी, और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी कोरी करारी मुनिया को अपने हाथ से सहलाते हुए मुट्ठी में भींच लिया..!

ग़ज़ब ही हो गया…! उसकी कमर धनुष की तरह उपर उठी, और आआययईीीई…न्नाऐईयइ… करती हुई धप्प से गिरी.. उसका ओरगिस्म हो चुका था, पेंटी चूत रस से सराबोर हो चुकी थी…!

अब उसकी पेंटी का वहाँ कोई काम नही रहा.. तो उसको मैने हाथ से खिच के फाड़ ही डाला..! उसको कोई फ़र्क नही पड़ा वो तो बस मस्ती में आखे बंद किए हुए, अभी-2 जो उसके साथ हुआ था उसी में खोई हुई थी…!

मे- दीदी कैसा लग रहा है…?

वो- ये…क्या..था अरुण..? तुम कोई जादूगर हो क्या…? मुझे लगा में यहाँ हूँ ही नही.. किसी और दुनिया में हूँ.. सच में.

फिर मैने अपना पाजामा भी उतार दिया, मेरे नत्थूलाल तो अकड़ के लोहे के डंडे के माफिक खड़े थे, और मेरे अंडरवेर से निकलने के लिए उतावले हुए जा रहे थे.

मैने प्यार से हाथ फेरा और पुच्कार्ते हुए कहा… पूकक्च… शांत मेरे शेर, सब्र कर सब कुछ मिलेगा..

रेखा ये देख कर शरमाते हुए, मंद-मंद मुस्करा रही थी.

मैने अपने लंड को रेखा के होठों पर रख कर इधर-से-उधर फिराया.

चूँकि वो ये सब कल रात को देख चुकी थी, सो उसने जीभ से सुपाडे को चाट लिया जिस पर एक बूँद शुद्ध देशी घी लगा था,

उसको स्वाद अच्छा लगा तो मुँह खोल दिया और सुपाडे को गडप्प कर गई, और मेरी आँखों में देखते हुए इशारे से कह रही हो मानो कि अच्छा टेस्ट है….!

थोड़ी देर तक उससे अपना लंड चुसवाने के बाद, मैने उसे लिटा दिया, और उसकी टाँगे खोलके उसकी मुनिया पर हाथ फिराया..

उसकी मुनिया की फाँकें एक-दूसरे से चिपकी हुई थी मानो गले मिल रही हों..! एक बार अपनी जीभ को नीचे से उपर को पूरी लंबाई तक उसकी कोरी चूत के उपर फिराया.. तो उसकी सिसकी एक बार फिर निकल गयी..!

 
उसकी कोरी चूत ऐसी लग रही थी मानो किसी छोटी बच्ची अपने पतले पतले होठों को बंद किए हो. सिर्फ़ एक दरार सी बस, उपर को एक छोटी सी चिड़िया की चोंच जैसी बाहर मुँह चमका रही थी.

उसे देख कर मेरे मुँह और लंड दोनो में पानी आ गया. एक-दो बार पूरी चूत पर जीभ से चाटने के बाद, मैने उसकी फांकों को दोनो हाथों के अंगूठों की मदद से उसके चीरे को खोला…!

मासा अल्लाह !! एक गुलाबी रंग की छटा उसकी चूत के अंदर दिखी..! सिर्फ़ एक बार ही अपनी जीभ फिराई मैने उसके अन्द्रूनि भाग में और फिर अपने लंड को उसमें भिड़ा दिया..!

रेखा आँखें बंद किए मज़े का अनुभव कर रही थी.., धक्का देने से पहले मैने रेखा से कहा…!

दीदी थोड़ा कंट्रोल करना.. दर्द हो सकता है.. ओके.. वारना ज़ोर से चीख पड़ी तो कोई सुन लेगा..!

उसने बस हां में गर्दन हिला के हामी भर दी,

मैने हल्का सा पुश किया अपनी कमर को और सुपाडा पूरी तरह से अड्जस्ट हो गया उसकी अन्चुदी चूत के छोटे से छेद में.

उसको हल्का सा दर्द का आभास हुआ लेकिन सह गई..!

फिर उसके कंधों पर हाथ रख के एक तगड़ा सा धक्का मार दिया…!

लाख कोशिशों के बबजूद उसके मुँह से चीख निकल ही गयी…!

हाययययई….मुम्मिईिइ….मररर..गाइ…रीि…ऊहह… उउफ़फ्फ़… माआ….अरुण प्लस्सस.. निकालो अपना, मुझे नही करवाना.. हाईए.. जल्दी निकालो..मे.. मर्र्रीि…!

मे वही रुक गया और उसको नकली गुस्सा दिखाते हुए बोला… क्या बोली…? निकालो…? ठीक है मे निकाल लेता हूँ.. फिर मत आना मेरे पास अपनी अध-फटी चूत लेकर..! साला चूतिया समझ रखा है मुझे..?

आधा लंड चला गया, झिल्ली टूट चुकी है और अब बोल रही कि निकालो..! बोल क्या करूँ..? निकाल लूँ..?

वो कुछ नही बोली बस मुँह कस के बंद कर लिया, आँखो से पानी निकालती रही..!

मैने उसका दर्द कम करने के लिए, उसकी चुचिओ को मुँह से चूसने लगा और दूसरी को आहिस्ता-2 सहलाने लगा..!

उसका दर्द छमन्तर हो गया और फिर मेरी ओर आशा भारी नज़रों से देखने लगी..!

अब मैने उसके होठों को अपने होठों में जप्त करके एक और तेज झटका दिया कमर में…. सटकककक.. से पूरा लंड जड़ तक चूत के अंदर घुस गया..! उसके मुँह से गुउन्न्ं..गुउन्न्ं.. की आवाज़ निकल रही थी होठ मेरे होंठो से बंद थे, आँखें बरस रही थी मेरे नीचे पड़ी वो दर्द से छट-पटा रही थी..!

थोड़ी देर होंठ चूसने से और उसकी चुचियों को मसल्ने की वजह से वो जल्दी हो नॉर्मल हो गयी और अपनी कमर को जुम्बिश दे कर इशारा किया आगे बढ़ने का..

मैने बहुत ही धीरे से अपने लंड को बाहर की ओर खींचा तो वो फिरसे कराही, फिर अंदर किया तो फिर कराही, ऐसे ही मेने धीरे-2, कुछ देर आराम से लंड को अंदर बाहर किया..

अब उसकी चूत मे थोड़ा गीलापन बढ़ने लगा था, सो स्वाभविक है, दर्द भी कम हो रहा था, लंड और चूत के बीच का फ्रिक्षन कम होने लगा. मैने थोड़े धक्कों को गति दे दी, अब उसका दर्द सिसकियों में बदलता जा रहा था.

वो भी अब अपनी कमर उचका उचका के चुदने लगी..! फिर तो वो तूफान आया--- कि बस पुछो मत, 20 मिनट में ही सब बह गया..! हम दोनो ही पसीना-2 हो गये थे.

साँसें इतनी गति से चल रही थी मानो मीलों की दौड़ लगा के आए हों.

कितनी ही देर हम एक दूसरे की बाहों में पड़े रहे.. जब होश आया और मैने उसकी ओर देखा, तो उसने शरमा कर अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया और मंद-2 मुस्कराने लगी…!

मैने उसके गाल को काट लिया, तब उसने मेरी ओर देखा, आयईयी… काट क्यों रहे हो निशान बन जाएँगे..!

मे- अच्छा और एक बहुत बड़ा निशान नीचे बना दिया तब कुछ नही कहा..?

वो शरमा गई और मेरे सीने में अपना मुँह छिपा लिया..

मे- दीदी.. , उम्म्म.. वो बोली, मे- खुश तो हो. वो- हमम्म.. बहुत.. और तुम्हारी एहसान मंद हूँ, कि तुमने मुझे औरत होने का एहसास करा दिया..

मे- दीदी.., इस बात को यही तक रखना.. दिल तक मत पहुँचने देना.. वरना बड़ा दुख देता है वो बाद में.

वो – नही अरुण में जानती हूँ, और तुम फ़िक्र ना करो.. इससे ज़्यादा की उम्मीद मे कभी होने भी नही दूँगी.

मे- हमम्म.. वैसे सच बताना, मज़ा तो आया ना…मैने उसके निपल को हल्के से उंगली से सहलाते हुए कहा..

वो- मेरे गाल को चूमती हुई.. सच कहूँ तो एक बार को लगा कि मर ही जाउन्गी अब, लेकिन तुम वाकई मे कोई जादू जानते हो..

अगले ही पल मुझे लगने लगा कि में स्वर्ग मे उड़ रही हूँ, इतना सुख, इतना मज़ा.. मैने कभी कल्पना भी नही की थी..

सहेलियों से सुना था जिनकी शादियाँ हो गयी हैं, या फिर जो ये सुख ले चुकी है, पर वो भी इतना नही बता पाई, ये तो बस… क्या कहूँ..?

मे- और लेना चाहोगी वो सुख..?

वो- हमम्म.. मन तो है, पर थोड़ा दर्द भी है..

मे- अरे वो तो एक मिनट. में छमन्तर हो जाएगा..

और फिर मैने उठके एक कपड़ा गीला करके उसकी चूत से खून और वीर्य को साफ किया और पूरे हाथ से सहलाने लगा.. उसकी आँखें बंद होती चली गयी..

अब मे पहली बार उसकी चूत चाटने वाला था, सो लग गया अपना हुनर दिखाने.. थोड़ी ही देर में वो अपना दर्द भूलके, उड़ चली ऊडन खटोले पे बैठ के आसमानों में, जब उतरी तो उसकी चूत आँसुओं से तर थी.

 
अब मे पहली बार उसकी चूत चाटने वाला था, सो लग गया अपना हुनर दिखाने.. थोड़ी ही देर में वो अपना दर्द भूलके, उड़ चली ऊडन खटोले पे बैठ के आसमानों में, जब उतरी तो उसकी चूत आँसुओं से तर थी.

मैने उसे पुछा गन्ना चूसना चाहोगी, तो वो तैयार हो गयी और में खड़ा हो गया, वो पंजों के बल बैठ कर मेरे लौडे को चूसने लगी, नौसीखिया थी, पर चलेगा....

थोड़ी देर लॉडा चुसवाने के बाद, जब मेरा जंग बहादुर जंग लड़ने के लिए पूरी तरह अकड़ कर खड़ा हो हो गया, तो मैने उसे लिटाया, और सेट करके, धीरे-2, आहिस्ता-2, दो-तीन बार में पूरा डालके चोदने लगा..

इस बार मैने उसे ज़्यादा दर्द नही होने दिया, और एक मझे हुए खिलाड़ी की तरह चोदने लगा, जब वो एक बार और झड गयी तो फिर मैने उसे घोड़ी बना दिया, और पीछे से उसकी टांगे चौड़वाकर पेल दिया उसकी नयी फटी चूत में..

आहह… क्या मज़ा आ रहा था, लौंडिया मस्ती में अपनी गान्ड को मेरे लंड पे पटक रही थी, मेरे लंड के साइड वाला प्लेट फारम धप्प से उसके चुतड़ों पर टकराता.. लगता जैसे मृदंग पर थाप पड़ी हो कही..

20 मिनट में ही हम हाफने लगे.. पूरा दम लगा दिया हम दोनो ने तब जाके कहीं बादल बरसे.. और जब बरसे तो क्या खूब बरसे… आहह.. बेसूध पड़ गये..

जाने कब तक एक दूसरे की बाहों में पड़े रहे… जाने कब नींद में चले गये… होश ही नही रहा..जब आँख खुली तो 5 बज रहे थे, मैने उसे जगाया..

मे- दीदी..दीदी.. उठो, सुबह हो गयी…

वो हड़बड़ा कर उठी, अपनी हालत देखी, हड़बड़ाहट में जैसे ही पलंग से नीचे उतरी तो खड़ी ना रह सकी, और फिर से पलंग पर गिर पड़ी..

मे- दीदी आराम से, अभी ताज़ा ताज़ा औरत बनी हो.. थोड़ा दर्द रहेगा..

वो फिर जल्दी जल्दी कपड़े पहन कर निकल गई मेरे कमरे से.. क्योकि डर था कोई देख ना ले, गाँव में वैसे भी सभी जल्दी उठते है.. शौच वग़ैरह के लिए,

उस जमाने में गाँव में घरों में तो शौचालय होते नही थे तो खेतों में ही जाना पड़ता था.

उस दिन कुछ खास नही किया, गर्मियो के दिन थे, तेज धूप की वजह से कहीं आने-जाने का मन नही, हम दोनो दोस्त घर में ही पड़े रहे, कभी भाभी से मस्ती मज़ाक चलता रहा, तो कभी मौका पाके रेखा की खबर खबर लेली, उसको थोड़ा दर्द सा था सुबह-2 तो एक पेन किल्लर देदि..

शाम को मे और धनंजय, मंदिर की तरफ नहर के किनारे निकल गये, जहाँ थोड़ा गर्मी के दिनो में ठंडा सा रहता था नहर की वजह से.

मंदिर पे आके भगवान के सामने माथा टेका, और थोड़ी देर ठंडी हवा में मंदिर के चिकने फर्श पर लेट के बातें करते रहे..

कुछ देर बाद नहर के किनरे-2 टहलते हुए पानी के बहाव के बिपरीत दिशा में चल पड़े.. और मंदिर से कोई 1 किमी दूर निकल आए, तब तक नहर का दूसरा पुल (ब्रिड्ज) भी आ गया.

सूरज ढल रहा था, उस ब्रिड्ज से एक रास्ता नहर के उस पार बसे दूसरे गाँव को जाता था, हम अपनी धुन में चलते-2 उस ब्रिड्ज के नज़दीक तक पहुच गये.

हुआ यौं कि जब हम मंदिर में लेटे थे, तब वो जो लड़के मैने ठोके थे उस दिन, वोही लड़के नहर के दूसरी साइड बैठे थे, उन्होने मुझे देख लिया पर मेरी नज़र उन पर नही पड़ी.

लेकिन जैसे ही हम नहर पर टहलने निकले, वो वहाँ से रफ्फु चक्कर हो गये, और अपने गाँव जाके, अपने घरवालों और दोस्तों को ले आए.

हम उस ब्रिड्ज पर थोड़ी देर बैठने के मूड में थे, लेकिन जैसे ही हम ब्रिड्ज के पास पहुँचे, उसी ब्रिड्ज से आते हुए, 8-10 लोग लाठियाँ डंडे हाथों में लिए हमारी ओर आते दिखे..

जैसे ही हमने उन्हें देखा, मैने झट से उनमें से एक लड़के को पहचान लिया, और धनंजय से बोला…

मे- धन्नु लगता है हम फँस गये… ये लोग हमें ही ठोकने आरहे हैं.

धनंजय - डरते हुए… क्या बात करता है यार..

मे- में सही कह रहा हूँ, ये साले वोही हैं जो उस दिन ठुक के गये थे..

धनंजय - अब क्या करें…?

मे- कुछ नही गान्ड कुटवा लेते हैं और क्या..

धनंजय - मज़ाक नही यार, जल्दी बोल अब क्या करें..

तब तक वो लोग हमारे और नज़दीक आ गये थे..

मे- धीमी आवाज़ में फुसफुसाते हुए… देख हमे सिर्फ़ इनके वार को बचाना है, उससे पहले एक-एक लाठी अपने हाथ में आ जानी चाहिए..

डरना मत हम वेल ट्रेंड हैं इन मामलों में सिर्फ़ विवेक से काम लेना बस.. अब देख एक ड्रामा करते हैं, तू सिर्फ़ साथ देते जा..

और तभी मैने धनंजय का कॉलर पकड़ लिया, वो तुरंत मेरी चाल समझ गया..

मे- उसका कॉलर पकड़ के…! साले फँसा दिया ना मुझे, आख़िर अपने इलाक़े का ही साथ दिया ना तूने, मुझे यहाँ लाने की तेरी चाल थी ना ये..?

धनंजय - मेरे कॉलर पकड़ते हुए..क्या बकवास कर रहा बेह्न्चोद.. उल्टा तेरी वजह से मे भी मुसीबत में फँस गया..ना तू उस दिन उन लड़कों को मारता और ना ये सब नौबत आती..

वो सब आश्चर्य चकित रह गये, और हमें आपस में ही भिडते हुए देखने लगे..

 
मे- साले में सब तेरी चाल समझ गया हूँ, हरम्खोर, चूतिए.. और एक हल्के हाथ का मुक्का उसके मुँह पे जड़ दिया..!

धनंजय ने भी गाली देते हुए मेरे पेट में एक मुक्का जड़ दिया.. इसी तरह लड़ते-2 हम उन लोगों के बीच तक पहुँच गये. वो लोग अब अपनी-2 लाठियाँ ज़मीन पर टिकाए खड़े-2 ये तमाशा देखने लगे, सोच रहे होंगे.. कि ये साले तो आपस में ही लड़ने लगे, हमें कुछ करने की ज़रूरत ही नही पड़ी.

लड़ते-2 मैने धनंजय को इशारा किया, कि पास वाले पहलवान जैसे आदमी की लाठी लेले..

मैने जैसे ही एक मुक्का मारा धनंजय ने पीछे उलटने का नाटक किया, और फिर उस आदमी की लाठी पे हाथ रख के बोला. देना पहलवान अपनी लाठी, साले का सर फोड़ देता हूँ.

उसने अपनी लाठी बड़े प्यार से पकड़ा दी, मैने फिर इशारे से मेरे उपर वार करने को कहा, तो उसने लाठी मेरे उपर चलाई,

मैने घूम के लाठी का वार बचा दिया और पास खड़े दूसरे आदमी के हाथ से लाठी लेली, उसने भी कोई विरोध नही किया.

जैसे ही लाठी मेरे हाथ लगी, पूरा 360 डिग्री घूम कर एक भरपूर लाठी का वार उस पहलवान जैसे आदमी के कंधे पर पड़ा..

कड़क… उसका कंधा, उतर गया, और वो आदमी वही बैठ गया…तबतक धनंजय ने भी अपनी लाठी पूरी ताक़त से घुमाई और तड़क… दूसरे वाले की पीठ गयी काम से, और वो भी मुँह के बल ज़मीन चाटने लगा.

वाकी लोग भोंचक्के रह गये, हमले इतनी फुर्ती से हुए, कि वो कुछ समझ ही नही पाए.. और जब तक उनकी समझ में आया, तबतक हम दो-तीन को और धूल चटा चुके थे..

हम भी गाँव के रहने वाले थे, लाठियों की लड़ाइयाँ हमने भी देखी और लड़ी थी, उपर से हम स्पेशल ट्रेंड…फिर क्या था किसी के हाथ तोड़े, किसी के पाव, किसी की पीठ पे वार तो किसी की टाँग, दो-चार तो नहर में ही जा पड़े..

5 मिनट में नज़ारा देखने लायक था, सभी पड़े-2 कराह रहे थे, फिर हमने उन चार लड़कों में जो उस दिन ज़्यादा हेकड़ी पेल रहा था, उसको उठाया और पुछा बता तू किसका लड़का है और कोन्से गाँव का है.

उसने अपने गाँव का नाम बताया और बोला मे प्रधान जी का लड़का हूँ.

मे- धन्नु लटका ले साले को.. और ले चल अपने गाँव, अब इसका फ़ैसला चौपाल पे ही होगा..

और उन सबको बोला… जाओ तुम लोग और भेजना इसके बाप को मुखिया जी की चौपाल पर अगर अपना लड़का चाहिए तो, वरना ये कल जैल में होगा.

वो लोग गिरते पड़ते सर पे पैर रखके अपने गाँव की तरफ भाग लिए, और हम दोनो ने उस लड़के को लटकाया मरे हुए सुअर की तरह और लाके पटका चौपाल पे.

शाम का वक़्त था, गाँव में लोग ज़्यादातर फ्री टाइम में चौपालों पर जमा होते ही हैं गप्पें मारने और इधर-उधर की खबरें देने-लेने को.

जब हमने उस प्रधान के लड़के को वहाँ लाके पटका, तो कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया, पड़ोसी तो था ही, वो भी ग्राम प्रधान का लड़का, देखते-2 लग गया हुजूम, लगे तरह के सवाल करने, क्या हुआ ? कैसे हुआ? यहाँ क्यों लाए.. वागरह-2..

हमने धनंजय के पिता जी समेत सब लोगों को सारी घटना का विवरण दिया, तो पहले तो सब खुश हुए, फिर आश्चर्य पूर्वक कहा, ये कैसे संभव है कि तुम दोनो ने 10 लठेतो को धूल चटा दी..?

धनंजय बोला- ये सब इसकी करामात है..! तो उसका एक गाँव का दोस्त बोला कि ऐसा हो ही नही सकता.. सच बता कैसे किया तुम दोनो ने ये सब..?

मे- अरे भाई आप लोगों को अभी तक पता नही है कि नहर के पास एक जिन्न रहता है, जो कमजोर का हमेशा साथ देता है, उसी ने किया है ये सब..

दोस्त- क्या बात करते हो भाई..? हमने तो किसी ने आजतक ना उसे देखा और ना सुना फिर आज कैसे…?

मे- और मज़े लेते हुए.. क्या तुम लोगों पर ऐसी कभी मुशिबत आई..?

दोस्त – नही… पर्रर..!

तबतक धनंजय को हसी आ गई, और वाकी लोग भी समझ गये कि मे उससे चूतिया बना रहा हूँ.. तो सब ठहाका मार मार के हँसने लगे और वो लड़का झेंप कर खिसियानी हँसी हसने लगा.. हहहे…तुम लोग झूठ बोल रहे हो..

 
यही सब वार्तालाप चल रहा था वहाँ, कि तब तक उस गाँव का प्रधान करीब 25-30 लोगों के साथ आ गया.. और आते ही भड़क कर बोला..

मुखिया जी ! ये क्या गुंडागिरी चल रही है, आपके लड़के अब किसी को भी मार-पीट कर उठा लाएँगे और हम देखते रहेंगे.. ऐसा नही चलेगा..

मुखिया जी- पहले आप शांति से बात करिए, यहाँ बदतमीज़ी से बात करने की ज़रूरत नही है.. क्या आपको सारी सच्चाई पता है या बस ऐसे ही भड़क रहे हो, प्रधान हो इसलिए..?

फिर आगे बोले मुखिया जी- आपके लड़कों की एक ग़लती नही है, इन्होने दो-दो ग़लतियाँ की हैं,

पहली ग़लती- तुम्हारे चार लड़कों ने उस दिन मंदिर पर दर्शन करने गयी मेरी बेटी और बहू के साथ बदतमीज़ी की, बदतमीज़ी ही नही, उनका हाथ पकड़ा और छेड़ा, अगर ये बच्छा ना होता तो पता नही क्या अनर्थ कर देते ये उस दिन, क्या आपको खबर है इस बात की..?

प्रधान ने ना में अपनी मुन्डी हिलाई..

दूसरी ग़लती- आज जब ये डन बच्चे नहर के किनारे घूमने गये तो तुम्हारे 10 लठेत इन निहत्तों को मारने के लिए आए.. ये तो पता होगा..?

अगर नही पता तो तुम ग्राम प्रधान बनने के बिल्कुल काबिल नही हो.

अब रही बात यहाँ आकर हमे हमारे ही गाँव में हमारी चौपाल पर धमकी देने की तो एक बात कान खोल कर सुनलो प्रधान जी..जब मेरा एक लड़का तुम्हारे चार लड़कों को मार-2 के भुर्ता बना सकता है, दो निहत्थे बच्चे जो अभी 20-20 साल के ही हैं, तुम्हारे 10 लठेतो की ऐसी की तैसी कर सकते हैं..

तो सोचो ये सारा गाँव तुम्हारे छोटे से गाँव का क्या हश्र करेगा खुद सोच सकते हो, अब जाओ और अपने लड़के की जमानत वग़ैरह का इंतेज़ाम कराओ जाके..

वो प्रधान मुखिया जी के पैरों में पड़ गया, और गिडगिडाने लगा-मुखिया जी मेहरबानी करके इन्हें माफ़ कर दीजिए इन हरामजादो की तो मे घर जाकर खबर लेता हूँ.. आपको मे विश्वास दिलाता हूँ, मेरे गाँव का कोई भी आदमी आपके गाँव की तरफ आइन्दा आँख उठा कर भी नही देखेगा आज के बाद.

नही प्रधान जी पानी अब सर से गुजर गया है, बोले मुखिया जी.. अरे हम तो उसी दिन फ़ैसला कर देते तुम्हारे इन हरामी पिल्लों का पर, इनकी पहचान नही थी हमारे बच्चों को.

अब तो प्रधान की हालत ही खराब, वो बुरी तरह गिडगिडाने लगा, मिन्नतें करने लगा.. तो मुखिया जी ने हमारी ओर देखा.. जैसे पूछना चाहते हों कि क्या करना है अब.

मैने इशारे से उन्हें एकांत में बुलाया और समझाया- अंकल जी, पोलीस केस से हमें कोई फ़ायदा नही होगा, उल्टा थाने-वाने के चक्कर हो जायेंगे और वैसे भी बहू-बेटी का मामला, ज़्यादा ना उछले तो अच्छा है,

मुखियली – जैसा तुम कहो… और वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गये..

मैने बोलना शुरू किया- एक शर्त पर इन बदमाश लड़कों को माफ़ किया जा सकता है, ये चारों अगर रेखा दीदी और भाभी के पैरों पर नाक रगड़ कर माफी माँगे और अपने ही हाथों से कस्के 10-10 थप्पड़ लगाएँ तो वो दोनो शायद इन्हें माफ़ करदें, क्योंकि ये उन दोनो के गुनेहगार हैं.

प्रधान झट से राज़ी हो गया, मैने रेखा और भाभी को बुलवाया, वो जैसे ही आके चौपाल पे खड़ी हुईं, वो चारों लड़के उनके पैरों पर नाक रगड़ते हुए माफी माँगने लगे, फिर खड़े कोकर अपने हाथों से अपने ही हाथों से थप्पड़ मारने शुरू करने ही वाले थे कि मैने कहा.

थप्पाड़ों की आवाज़ यहाँ खड़े सबके कानों तक पहुँचनी चाहिए, अगर एक भी थप्पड़ मुझे कमजोर लगा, तो उसकी जगह भैया या धनंजय मारेंगे ये ध्यान रखना.

उन्होने पूरी ताक़त से 10-10 थप्पड़ पूरे किए, दोनो गाल लाल हो चुके थे हरमियों के, उसके बाद उन्हें जाने दिया, धीरे-2 वहाँ से सारी भीड़ चली गयी.

मुखिया जी और सारे घरवाले मेरे इस फ़ैसले से बहुत खुश थे, पूरे गाँव के सामने उनके मान-सम्मान और जो बढ़ गया था. उनका सीना और ज़्यादा चौड़ा हो गया .

कुछ देर के बाद सब बैठक में खाना खा रहे थे, मुखिया जी बड़े गर्वित स्वर में बोले-

धन्नु बेटे हम सच में अभी तक ये नही समझ पा रहे, कि सब तुम दोनो ने संभव किया कैसे? मतलब मैने अपनी जिंदगी में इतनी बहादुरी कहीं नही देखी हां किस्से कहानी में पढ़ा हो वो बात अलग है..

धनंजय- पिता जी..! ये जो आपके सामने बैठा मासूम सा लड़का देख रहे हैं, आपको लग रहा होगा, कितना भोला और मासूम है बेचारा… असल में ये दस सर वाला रावण है.. रावण..

वो बोले- ये क्या कह रहे तुम.. ?

धनंजय- मे सच कह रहा हूँ पिता जी, पिछले दो सालों में इसने जो-जो काम किए हैं वो पूरे शहर की पोलीस नही कर पाई,

इसको आज तक हमने घबराते या डरते हुए नही देखा.. मे मानता हूँ, कि इसके साथ हम कुछ दोस्त भी रहे हैं हर जगह, और आज भी में था, लेकिन करवाने वाला यही होता है, पता नही विपरीत परिस्थितियों में जहाँ हमारे जैसा आम इंसान भय से काँपने लगता है वहीं ये ऐसे-2 प्लान बना लेता है कि सफलता हाथ लग ही जाती है.

इसके इसी विस्वास पे हम लोग विस्वास करके आँख बंद करके इसका साथ देने को तैयार हो जाते हैं.

लेकिन हां ये भी अपनी जगह सही है, कि इसने आजतक कभी ग़लत का साथ नही दिया है, और नही ग़लत होने दिया है.

सब मुँह बाए मेरी ओर ही देख रहे थे… भाभी और रेखा की आँखों में तो ना जाने कितना प्रेम और कृताग्यता थी, कि मे उनसे नज़र ही नही मिला सका देर तक.

जब काफ़ी देर खामोशी छाई रही और सबकी सवालिया नज़र मेरे से नही हटी तो फिर मुझे बोलना ही पड़ा…!

मे- ऐसा कुछ नही है अंकल जी, धन्नु तो बस ऐसे ही हर जगह मुझे आगे दिखाने की कोशिश करता रहता है..!

अंकल - फिर भी बेटे… मे अपने बेटों को अच्छी तरह जानता हूँ, उनमें किसी में भी इतना साहस नही है कि वो 10 तो क्या किसी एक लठेत आदमी से अकेले मुकाबला कर सके तो फिर आज जो हुआ वो तो किसी सूरत में संभव नही था.

मे- सच मानिए अंकल जी, आज की लड़ाई में धनंजय बराबर का साथी था, मैने तो बस उसकी क्षमता को उसे दिखाया.

आंटी – वोही..! वोही तो हम समझना चाहते हैं अरुण बेटे..! कि हम माँ-बाप होके अपने बेटे की क्षमताओं को नही देख पाए, वो तुम्हें कैसे दिखाई दे गयी..?

मे- क्योंकि उसकी उन क्षमताओं की आपको ज़रूरत ही नही पड़ी..! हर माँ-बाप अपनी औलाद को हर मुशिबत से दूर रखना चाहता है, जिन बातों की उसे अपने बच्चों से अपेक्षा होती है वोही सिखाता है.

अंकल- ये बात एकदम सही कही है बेटे तुमने, पर ये तो बताओ, तुम में ये गुण आए कैसे, क्या तुम्हारे माँ-बाप ने इन सब बातों के लिए प्रेरित किया था.

मे- नही ! मेरे माता-पिता कोई अलग थोड़ी हैं, हां चाचा के साथ बचपन ज़्यादा बीता है, वो एक निडर व्यक्ति हैं. में जब भी कोई बात पुछ्ता था कि ये आपने कैसे किया, तो उनका एक ही जबाब होता था… कोशिश..! कोशिश करोगे तो ज़रूर होगा.

इसका अनुभव मुझे हुआ जब में कोई 8-10 साल का था, फिर मैने उन्हें अपनी लकड़बग्घा के साथ हुई टक्कर का व्रतांत सुनाया, कि किस तरह मौत सामने देख कर मैने उससे लड़ने का फ़ैसला लिया और में जीत गया..!

बस तभी से मैने एक बात अपने जीवन गाँठ बाँध ली, की कोई भी काम असंभव नही होता, कोशिश करने वाले को हमेशा कामयाबी मिलती ही है.

जीवन का एक मात्र सत्य है, कि जिसने जीवन लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है.. तो जो सत्य है उससे भय कैसा, वो तो अपने निहित समय पर आनी ही है. उससे डर के हम अपना जीवन तो निस्फल नही कर सकते.

और एक बात जो मेरे पिता जी ने मुझे सिखाई है, कि कोई भी अच्छा कार्य करने में ईश्वर की इच्छा सम्मिलित होती है, और वो हमारी किसी ना किसी रूप में सहयता अवश्य करते हैं, फिर चाहे वो आपका अंतर्मन ही क्यों ना हो.

 
तभी धनंजय बोल पड़ा- सही कह रहा है यार तू ! कई बार मैने अनुभव किया इस दौरान, कि जब हम कोई काम करने जाते थे तो एक भय जैसा रहता था, लेकिन काम पूरा होने पर हमें खुद आश्चर्य होता था, कि ये कैसे हो गया.

मे- देखो जिंदगी में भय होना भी ज़रूरी है, अगर हमारा भय चला गया तो हमें अपने आप पर घमंड होने लगेगा, और फिर हम सही ग़लत की पहचान भूल जाते है.

अंकल- सुंदर ! क्या उत्तम बात कही है.. इतनी कम उम्र में इतना ज्ञान.. आश्चर्य जनक है.. है ना जानकी. उन्होने अपनी पत्नी को कहा.

आंटी- सही कह रहे हैं जी आप, हमारा धन्नु भाग्यशाली है, जिसे इसके जैसा गुणवान दोस्त मिला है.

और उन्होने मुझे गले से लगाकर मेरा माथा चूम लिया. अंकल भी अपने आप को रोक नही पाए, फिर धन्नु के भाई, अंत में धन्नु और रेखा ने एक साथ दोनो ओर से जकड लिया.

मैने भाभी से चुटकी लेते हुए कहा, क्यों आपको मेरी बातें पसंद नही आई..? आप गले नही लगोगी..? अरे देवर नही तो छोटा भाई समझ के ही लगा लीजिए..

तो झेप्ते हुए वो भी गले लग गयी, मैने मौके का फ़ायदा लेते हुए, गले को चूम लिया और कान में कहा.. क्यों क्या विचार है आज का ?

उन्होने हल्की सी सिसकी ली और बाय्ल…. कोशिश…

मुझे हँसी आ गयी….और वो शरमा गयी…

रात को अपने पति के सो जाने के बाद भाभी मेरे रूम में आई और फिर 2-3 घंटे हमारी खत कबड्डी जम के चली.

सुबह मैने धनंजय को बोला यार ! अब चलना चाहिए.. अपने क्लासस शुरू होने वाले हैं, तो माँ का दिल, बोली बेटा दो साल में तो ये अब आया है, अभी 4 दिन ही तो हुए हैं, और दो-चार दिन रुक जाओ, मैने कहा- आंटी जी 2-4 क्या मेरा तो हमेशा के लिए यही रहने का मन है, लेकिन कुछ उत्तरदायित्व होते हैं जीवन में, वो भी निभाने पड़ते हैं.

आंटी- अच्छा ज़्यादा नही दो दिन और रुक जाओ, परसों चले जाना.. मैने धनंजय की ओर देखा, वो भी बोला, हां यार परसों चलते हैं.

मे- ठीक है भाई ! गाम करे सो राम करे.. इस बात पर सभी एक साथ हंस पड़े..

वो दिन भी बीत गया, शाम हुई, रात का खाना ख़ाके, सोने भी चले गये सब लोग, आज दोनो जुगाड़ो में से किसी से कोई बात नही हो पाई थी, पता नही क्या होगा, मे अपना पलंग पकड़ के सो गया…!

…………………………..

…………………………………

थर्ड एअर की हमारी क्लासस शुरू हो चुकी थी, कॉलेज आकर सबसे पहले हमने अपनी कमिटी को अपडेट किया, सागर और मोहन हमेशा के लिए जा चुके थे तो हमें और नये मेंबर बढ़ाने थे.

कुछ अति उत्साहित स्टूडेंट्स में से चार लोगों को चुना जिनके नाम थे :

मनोज और राजेश – लास्ट एअर , विक्रम- फर्स्ट एअर, और विकास- सेकेंड एअर से..

अब हमारी कमिटी में 10 मेंबर्स हो गये थे.

नये मेंबर्ज़ को सख़्त हिदायत दी गयी थी, चाहे ज़रूरत हो या ना हो अपने को फिज़िकली और मेंटली फिट रखना ही है. और डेली अपने साथ 5 बजे से जिम में एक्सर्साइज़ और फाइटिंग टिप्स लेते रहना है.

समय गुजर रहा था, घर से आए हुए हमें 3 महीने हो चुके थे. एक दिन धनंजय के घर से खत आया, तो वो उसे पढ़कर उच्छलने-कूदने लगा, खुशी से नाचने लगा..

मे- अब्बे क्या बात है ? क्यों बंदर की तरह उच्छल-कूद कर रहा है…

धनंजय- याहू…!!! मत पुच्छ यार..!! आज मे इतना खुश हूँ.. इतना खुश हूँ कि बता नही सकता..?

ज – अरे भाई, जब बता ही नही सकेगा, तो हमें तेरी खुशी का राज़ कैसे पता चलेगा..?

धनंजय- पता है..! मे अपने घर में सबसे छोटा था, तो मुझे कोफ़्त सी होती थी.. लेकिन अब मे सबसे छोटा नही रहूँगा…! अब चाचा बनाने वाला हूँ.. याहू..!

र- ये तो वाकई खुशी की बात है… कंग्रॅजुलेशन्स !!

मे- फिर तो आज पार्टी हो जाए.. क्यों?

धनंजय- अरे तू जो बोले…! आज कोई कुछ भी बोलो…! मे करूँगा तुम लोगों के लिए.

फिर तय हुआ, कि कॉलेज के बाद हम सभी कमिटी मेंबर्ज़ मूवी देखने जाएँगे, और फिर शहर में थोड़ी मस्ती करेगे, और किसी रेस्टोरेंट में डिन्नर करके ही वापस लौटेंगे.

उठाई प्रिन्सिपल की जीप और चल दिए अपने प्लान के मुतविक मस्ती करने..!

हम लोग मूवी देखने के बाद थोड़ी देर यूही सड़कों पे भटके, और फिर एक अच्छे से रेस्तरा में खाना खाने घुस गये.

हमारे लिए मॅनेजर ने दो टेबल इकट्ठा लगवा दी. हमसे दो टेबल छोड़ के चार हसीनायें वो भी शायद किसी कॉलेज की स्टूडेंट्स थी, बैठी खाना खा रही थी, हम में से कुछ की नज़र उनपर पड़ी, तो उधर से भी लड़कियों की नज़र हमारे कुछ साथियों पर, दोनो तरफ से सैन मटक्का होने लगा.

शायद नयन सुख लिया जा रहा था, हम खाना थोडा पहले स्टार्ट कर चुके थे, वैसे भी आदमी और औरत के खाने में फ़र्क होता है.

आदमी जहाँ खाने पर टूट के पड़ता है भुक्कड़ की तरह, वो भी हमारे जैसा मास का खाने वाला, वहीं लड़कियाँ थोड़ा नजरो से बातें करती हुई समय लेती हैं.

 
धनंजय बिल पे करने काउंटर पे खड़ा था और हम टेबल पर बैठे उसका इंतजार कर रहे थे, कि तभी वहाँ 10-12 लड़के एंटर हुए, फुल ऑफ मस्ती नशे में झूमते हुए..

घुसते ही हंगामा, चारों तरफ नज़र दौड़ाई, और फिर जैसे ही उनकी नज़र उन लड़कियों पर पड़ी, वो उधर को ही बढ़ गये.

लड़कों का लीडर जो एक मरियल सा दिखने वाला, यही कोई 25-26 साल का लंबे मिथुन कट बाल आँखें चढ़ि हुई..

“सीना संदूक, गान्ड बंदूक ! हाथ अगरबत्ती, पाँव मोमबत्ती”. शायद ये उपमा काफ़ी थी उसके व्यक्तित्व को दर्शाने के लिए…

हां बाकी सब ज़्यादातर हट्टे-कट्टे थे, शायद उसके पैसों का नाजायज़ फ़ायदा ले रहे होंगे उसकी चमचागिरी करके..!

मरियल लड़का, लड़कियों की टेबल के पास खड़े होते हुए जो साथ में हिल भी रहा था बोला- अरे वाह ! यहाँ तो सुंदरियों का मेला लगा है, और हम साला शहर में भटक रहा है..

और एक लड़की का हाथ पकड़ते हुए बोला- चलो उठो रानी हमारे साथ, तुम लोगों को जन्नत की सैर करते हैं, यहाँ क्या इस सडेले से रेस्तरा में बैठी हो..! और अपने साथियों की तरफ घूम कर..

चलो रे एक-एक करके उठा लो इनको और ले चलो अड्डे पे….

वो साले सांड भी पक्के गुलाम निकले उस मरियल के, उसके बोलते ही उन्होने बिना सोचे समझे उन लड़कियों को उठा भी लिया,

लड़कियाँ चीख पुकार करने लगी, छूटने के लिए हवा में हाथ पैर भी मार रही थी, मज़ाल कि कोई माई का लाल उस पूरे रेस्टोरेंट में उठा हो उनकी मदद के लिए.

अबतक धनंजय लौट रहा था बिल देके और वो लड़के निकल रहे थे उन लड़कियों को लेके, तो सामने आ गया, और उस मरियल से बोला.

धनंजय – आए..! भाई कहाँ ले जा रहे हो इन बेचारी लड़कियों को..?

मरियल - तेरे से मतलब…! हट आगे से और उसने धनंजय को धक्का देना चाहा, लेकिन वो तो टस-से-मस नही हुआ उल्टा वो मरियल अपनी झोंक में ही एक तरफ लूड़क गया.

तब तक उसके चार साथी आकर धनंजय से भिड़ गये, दो ने उसके दोनो हाथ पकड़ लिए और एक ने उसके मुँह पर मुक्का मारा,

मेरे वाकी साथी, मेरी ओर देख रहे थे और सोच रहे थे कि मे कुछ कर क्यों नही रहा और ना ही किसी को बोला उसकी मदद के लिए..

उधर जैसे ही उस गुंडे ने मुक्का घुमाया उसे मारने के लिए, धनंजय झुक गया, नतीजा उस गुंडे का मुक्का उसके एक साथी के थोबडे पर पड़ा जो धनंजय को पकड़े था एक तरफ.

वो गुंडा धडाम से पीछे को गिरा और धनंजय एक तरफ से आज़ाद हो गया, और फ्री हुए हाथ का मुक्का उस दूसरे वाले की कनपटी पे मारा..

तबतक चौथा उसे मारने बढ़ा तो धनंजय ने एक फ्लाइयिंग किक उसकी कनपटी पे रसीद करदी और वो बुरी तरह चीखते हुए जिधर से आया था उधर ही ढेर हो गया.

जब उनके चार-चार साथी फर्श की धूल चाट गये, तो जो गुंडे लड़कियों को उठाए हुए थे उन्होने उन लड़कियों को नीचे उतारा और अपने साथियों की मदद के लिए आगे आए, झट से हम सभी दोस्त उठा खड़े हुए और उनके सामने आ गये, मैने उनसे कहा,…!

ये फाउल है भाई.. 4 के उपर 1 तो ठीक है, अब और नही.. और फिर हम सबने मिलकर उन गुण्डों की वो धुलाई की… वो धुलाई की… कि निर्मा की सफेदी भी फीकी पड़ गयी..

वो लड़कियाँ हमें कृीतग्यता से देख रही थी. तब तक मॅनेजर ने पोलीस को फोन कर दिया था, सो पोलीस भी वहाँ आ गई और उन गुण्डों को उठा लेगयि, और हमें उन लड़कियों के साथ थाने आकर स्टेट्मेंट देने के लिए बोल गये.

अब जीप में तो इतनी जगह थी नही कि वो लड़कियाँ भी बैठ सकें क्योंकि हम ही 10 लोग थे. तो धनंजय और रोहन को उनके साथ टॅक्सी में लेकर जाने को बोलकर हम 8 जाने जीप से थाने पहुँच गये…!

उधर थाने में तो मामला ही उल्टा निकला, पोलीस उन गुण्डों को हवालात में डालने की वजाय, थाना इंचार्ज अपने ऑफीस में बिठा कर उनकी खातिरदारी कर रहा था,

हम थाने में धनंजय वग़ैरह से पहले पहुँच गये थे, हमें देखकर इनस्पेक्टर ने हमसे लड़कियों के बारे में पुछा, तो हमने बताया कि वो आती ही होगी आप एफआइआर लिखो….

हमारी बात सुनकर उस इनस्पेक्टर ने जो हमसे कहा, उसे सुनकर हम दंग रह गये….!

इंस्पेक्टर- एफआइआर..? कोन्सि एफआइआर..? किसकी एफआइआर..? और किसके खिलाफ…?

मे मुँह फाडे उसकी तरफ देखता रह गया..! फिर कुछ देर बाद बोला- इन गुण्डों के खिलाफ और किसके खिलाफ..? ये उस रेस्टोरेंट में उन लड़कियों को उठाके ले जेया रहे थे ज़ोर ज़बरदस्ती से, इसलिए..!

इंस्पेक्टर- तुम लोगों को शायद कोई ग़लत फहमी हो गयी है, ये तो बहुत सरीफ़ लोग हैं, मे इन्हें व्यक्तिगत तौर से जानता हूँ.

फिर आगे बोला- जानते हो ये कॉन हैं..? उस मरियल की तरफ इशारा करके बोला.. ये मुन्ना बाबू हैं, यहाँ के एमएलए साब के सुपुत्र…!

अब मुझे बात समझ में आई कि क्यों ये इनकी मेहमान नवाज़ी कर रहा है..?

मे- अच्छा तो ये एमएलए का कपुत है, इसलिए आप लोग इसकी चापलूसी में लगे हो..! अब कुछ-2 मेरी समझ में आरहा है.

इंस्पेक्टर- आए लड़के तमीज़ से बात कर वरना…

मे- वरना…? वरना क्या..? क्या करोगे, फाँसी चढ़ा दोगे हमें..?

इंस्पेक्टर- देखो ये एमएलए साब के सुपुत्र हैं, मामले को समझने की कोशिश करो.. और तुम लोग यहाँ से चले जाओ.. मे उन लड़कियों से बात कर लेता हूँ सब कुछ सही है कोई प्राब्लम नही होगी.

मे- आप ये बार-2 एमएलए का नाम लेके क्या साबित करने चाहते हो..? क्या एमएलए जनता ने गुंडागर्दी या अयाशी करने के लिए चुना है..?

हमारी ये वार्तालाप चल ही रही कि तबतक धनंजय और रोहन भी उन लड़कियों को साथ लेकर आ गये..!

 
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