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जिला बिजनौर की एक घटना वर्ष २०१२
चौमासे के दिन थे, उस दिन दो बजे मध्यान्ह का समय रहा होगा, लेकिन बाहर छाये बादलों ने पृथ्वी की सत्ता छीन रखी थी, नृप सूर्य अपदस्थ कर दिए गए थे! बाहर चारों ओर बस मेह की बूँदें और बून्दें और उन बूंदों से गार होती हुई पृथ्वी की नरम त्वचा! कई पक्षी वहाँ पेड़ों की, बल्लियों से बंधी तारों पर बैठे बौछार का लुत्फ़ ले रहे थे! मेरी नज़र ऐसे ही एक कठफोड़वे के जोड़े पर थी, जो समय समय पर चोंच मिलाते और फिर से लुत्फ़ लेने लगते बौछार का! फिर एकदम से वो उड़ गए! स्थान परिवर्तन का लिया, पीछे बंधे मवेशी भी मस्त थे! भैंसें रम्भा रही थीं, बकरियां भी अपनी आवाज़ से अपने होने का प्रमाण दे रही थीं! हवा में मिट्टी की खुश्बू फैली थी! मैं खेस में ढका हुआ, उस पटिया से बने एक कमरे में बैठा था, शर्मा जी एक दूसरी चारपाई पर बैठे थे! बीड़ी चल रही थी दबा कर, वहाँ दो और लोग बैठे थे, बिरजू और केवल सिंह, दोनों रिश्तेदार थे आपस में, घर बिरजू का था, बिरजू एक सरकारी महकमे में मुलाज़िम थे और केवल दिल्ली में अध्यापक थे, उन्ही के कहने पर हम यहाँ आये थे कोई दस बजे करीब, जब चले थे तब भी बारिश थी और बारिश ने यहाँ तक साथ निभाया था, आगे का पता नहीं!
"चाय नहीं आयी, जाने क्या बात हुई?" कहते उठे बिरजू,
छतरी ले बाहर गए और फिर कुछ देर बाद उनका लड़का चाय ले आया, साथ में कुछ बर्फी और नमकीन!
हमारे कप हमे पकड़ाये गए, हमने ले लिए!
चाय पीनी आरम्भ की,
बर्फी भी खायी!
"कितनी दूर होंगे खेत यहाँ से?" शर्मा जी ने पूछा,
"आधा किलोमीटर से अधिक नहीं" केवल बोले,
'अच्छा" वे बोले,
"आखिरी बार कब देखे थे आपने सांप?" मैंने पूछा,
लड़का बता रहा है कि कल तो खेत में घुसने ही नहीं दिया किसी को" बिरजू ने चुस्की भरते हुए कहा चाय की!
"अच्छा!" मैं रोमांचित सा हुआ!
लड़का वहीँ खड़ा था!
"क्या नाम है?" मैंने पूछा,
"नकुल" वो बोला,
"अच्छा" मैंने कहा,
अब फिर से बर्फी खायी मैंने!
लड़का मुझे ही देख रहा था!
"कैसा सांप था वो?" मैंने पूछा,
"हरे-पीले रंग का" वो बोला,
"कितना बड़ा?" मैंने पूछा,
"जी मेरे बराबर होगा" वो बोला,
अर्थात साढ़े पांच फीट!
"और भी थे वहाँ सांप?" मैंने पूछा,
"और नहीं देखे" उसने कहा,
"अच्छा" मैंने कहा,
तभी बिजली कड़की! जैसे मैंने गलत प्रश्न किया हो!
और बारिश तेज हो गयी!
चाय ख़तम हुई तो कप हमने वहाँ नीचे रख दिए!
"किसी को दिखाया नहीं?" मैंने केवल से पूछा,
"दिखाया था जी" वो गला साफ़ करते हुए बोले,
"किसको?" मैंने पूछा,
"एक सपेरा आया था, उसको" वे बोले,
"क्या बोला वो?" मैंने पूछा,
वो गया, सांप देखे, एक एक सांप पकड़ने के पांच सौ रुपये मांगे, बात दो सौ में तय हो गई" वे बोलकर चुप हुए,
"फिर?" मैंने पूछा,
"वो वापिस भाग आया, बोला यहाँ हज़ारों सांप हैं, उसके बसकी बात नहीं" वो बोले,
"फिर?" मैंने हैरान हो कर पूछा,
"फिर की गुरु जी, अब भाग गया वो" उन्होंने बात ख़तम की,
मैं हज़ारो साँपों की कल्पना करने लगा!
"फिर जी एक ओझा बुलाया हमने" अब बिरजू ने बात आगे बढ़ाई,
"अच्छा! फिर?" मैंने पूछा,
"वो खेत में गया और बोला कोई धन का चक्कर है, फिर बोला नहीं कोई चुड़ैल है यहाँ, फिर बोला कि कोई समाधि है यहाँ, फिर वो भी भाग गया!" वे बोले,
"कमाल है" मैंने कहा,
"हम डर गए जी" बिरजू ने कहा,
"अच्छा, स्वाभाविक ही है डरना" मैंने कहा,
"जी फिर एक साधू बाबा आये, बोले, तीन मरेंगे इस कुनबे में" बिरजू ने कहा,
"तीन?" मुझे आश्चर्य हुआ!
"हाँ जी" वे बोले,
"साधू बाबा ने कुछ बताया नहीं बचने का उपाय?" मैंने पूछा,
"नहीं जी" वे बोले,
विचित्र और अद्भुत मामला था ये!
चौमासे के दिन थे, उस दिन दो बजे मध्यान्ह का समय रहा होगा, लेकिन बाहर छाये बादलों ने पृथ्वी की सत्ता छीन रखी थी, नृप सूर्य अपदस्थ कर दिए गए थे! बाहर चारों ओर बस मेह की बूँदें और बून्दें और उन बूंदों से गार होती हुई पृथ्वी की नरम त्वचा! कई पक्षी वहाँ पेड़ों की, बल्लियों से बंधी तारों पर बैठे बौछार का लुत्फ़ ले रहे थे! मेरी नज़र ऐसे ही एक कठफोड़वे के जोड़े पर थी, जो समय समय पर चोंच मिलाते और फिर से लुत्फ़ लेने लगते बौछार का! फिर एकदम से वो उड़ गए! स्थान परिवर्तन का लिया, पीछे बंधे मवेशी भी मस्त थे! भैंसें रम्भा रही थीं, बकरियां भी अपनी आवाज़ से अपने होने का प्रमाण दे रही थीं! हवा में मिट्टी की खुश्बू फैली थी! मैं खेस में ढका हुआ, उस पटिया से बने एक कमरे में बैठा था, शर्मा जी एक दूसरी चारपाई पर बैठे थे! बीड़ी चल रही थी दबा कर, वहाँ दो और लोग बैठे थे, बिरजू और केवल सिंह, दोनों रिश्तेदार थे आपस में, घर बिरजू का था, बिरजू एक सरकारी महकमे में मुलाज़िम थे और केवल दिल्ली में अध्यापक थे, उन्ही के कहने पर हम यहाँ आये थे कोई दस बजे करीब, जब चले थे तब भी बारिश थी और बारिश ने यहाँ तक साथ निभाया था, आगे का पता नहीं!
"चाय नहीं आयी, जाने क्या बात हुई?" कहते उठे बिरजू,
छतरी ले बाहर गए और फिर कुछ देर बाद उनका लड़का चाय ले आया, साथ में कुछ बर्फी और नमकीन!
हमारे कप हमे पकड़ाये गए, हमने ले लिए!
चाय पीनी आरम्भ की,
बर्फी भी खायी!
"कितनी दूर होंगे खेत यहाँ से?" शर्मा जी ने पूछा,
"आधा किलोमीटर से अधिक नहीं" केवल बोले,
'अच्छा" वे बोले,
"आखिरी बार कब देखे थे आपने सांप?" मैंने पूछा,
लड़का बता रहा है कि कल तो खेत में घुसने ही नहीं दिया किसी को" बिरजू ने चुस्की भरते हुए कहा चाय की!
"अच्छा!" मैं रोमांचित सा हुआ!
लड़का वहीँ खड़ा था!
"क्या नाम है?" मैंने पूछा,
"नकुल" वो बोला,
"अच्छा" मैंने कहा,
अब फिर से बर्फी खायी मैंने!
लड़का मुझे ही देख रहा था!
"कैसा सांप था वो?" मैंने पूछा,
"हरे-पीले रंग का" वो बोला,
"कितना बड़ा?" मैंने पूछा,
"जी मेरे बराबर होगा" वो बोला,
अर्थात साढ़े पांच फीट!
"और भी थे वहाँ सांप?" मैंने पूछा,
"और नहीं देखे" उसने कहा,
"अच्छा" मैंने कहा,
तभी बिजली कड़की! जैसे मैंने गलत प्रश्न किया हो!
और बारिश तेज हो गयी!
चाय ख़तम हुई तो कप हमने वहाँ नीचे रख दिए!
"किसी को दिखाया नहीं?" मैंने केवल से पूछा,
"दिखाया था जी" वो गला साफ़ करते हुए बोले,
"किसको?" मैंने पूछा,
"एक सपेरा आया था, उसको" वे बोले,
"क्या बोला वो?" मैंने पूछा,
वो गया, सांप देखे, एक एक सांप पकड़ने के पांच सौ रुपये मांगे, बात दो सौ में तय हो गई" वे बोलकर चुप हुए,
"फिर?" मैंने पूछा,
"वो वापिस भाग आया, बोला यहाँ हज़ारों सांप हैं, उसके बसकी बात नहीं" वो बोले,
"फिर?" मैंने हैरान हो कर पूछा,
"फिर की गुरु जी, अब भाग गया वो" उन्होंने बात ख़तम की,
मैं हज़ारो साँपों की कल्पना करने लगा!
"फिर जी एक ओझा बुलाया हमने" अब बिरजू ने बात आगे बढ़ाई,
"अच्छा! फिर?" मैंने पूछा,
"वो खेत में गया और बोला कोई धन का चक्कर है, फिर बोला नहीं कोई चुड़ैल है यहाँ, फिर बोला कि कोई समाधि है यहाँ, फिर वो भी भाग गया!" वे बोले,
"कमाल है" मैंने कहा,
"हम डर गए जी" बिरजू ने कहा,
"अच्छा, स्वाभाविक ही है डरना" मैंने कहा,
"जी फिर एक साधू बाबा आये, बोले, तीन मरेंगे इस कुनबे में" बिरजू ने कहा,
"तीन?" मुझे आश्चर्य हुआ!
"हाँ जी" वे बोले,
"साधू बाबा ने कुछ बताया नहीं बचने का उपाय?" मैंने पूछा,
"नहीं जी" वे बोले,
विचित्र और अद्भुत मामला था ये!