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ताकत की विजय

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ताकत की विजय

लेखक- अजय जैन

अच्छा दोस्त... अपून की तो छुट्टी हो गई ... आज दोपहर में जेल से रिहा हो जाऊंगा ...

उस भारी मूंछों वाले ने सलाखों के पीछे गुमसुम बैठे उस नौजवान की ओर देखा ..

नौजवान ने गर्दन उठा कर उसकी तरफ देखा फिर पुन: घुटनों पर सिर रख दिया ..

बात सून .... भारी मूंछों वाला बोला, ध्यान पूर्वक उसे देखते हुए बोला ...

नौजवान ने पून: गर्दन उठाइ... उसकी तरफ देखा... दर्द भरी मुस्कान मुस्कुराया ...

तुम रो रहे हो दोस्त ... अब जाकर अपने बीवी बच्चों, माँ बाप, भाई बहन से गले मिलोगे ... एक फांसी की सजा पाए मुजरिम से मिलकर अपशगुनी मत करो ... जाओ भगवान तुम्हारी जिंदगी खुशियों से भर दे .. बस यही दुआ कर सकता हूं मैं तुम्हारे लिए ..

मैरी बात नहीं सुनोगे ? भारी मूंछों वाला गंभीरता से बोला

नौजवान ने गहरी सांस छोडी और खडा हो कर बीमारों की तरह चलता हुआ भारी मूछों वाले के करीब आ गया

अब उनके बीच सिर्फ सीखचों की दीवार थी..

जानते हो... पूरे दस साल की सजा काट कर रिहा हो रहा हूं मैं... भारी मूंछौ वाला बोला... अरे जानते हो मैंने क्या अपराध किया था, अपनी बीवी का खून किया था मैंने ... उस हरामजादी पिशाचनी को मारा था मैंने ... जो हर साल करवा चौथ का व्रत रखती थी... मैरी पूजा किये बगैर रात का भोजन नहीं करती थी... जब भी मैं काम से लौटता तो उसे दरवाजे पर अपने इंतजार में खड़े देखता

मैं तो ऐसी पत्नी पाकर खुद को धन्य महसूस करता था, लेकिन. मुझे नहीं मालूम था कि वो कितनी चालाकी से दूसरे मर्दों का बिस्तर गरम करती थी...

मैरे काम पर जाते ही वह अपने यारौ को घर में बुला लेती और खूब ऐश लूटती ...

घर को उसने चकला बनाकर रख दिया था रंडी ने...

ऐसी बातें आखिर कब तक छुपती है और एक दिन मैंने रंगे हाथों पकड़ लिया और गुस्से में आकर उसका तथा उसके यार का खून कर डाला

अदालत में भी मैंने सीना ठोक कर कहा कि मैंने वै हत्याये की है और मुझे दस साल की सजा हो गई... आज भी मुझे अपने किये पर जरा भी अफसोस नहीं हो रहा ... आज भी यहीं सोचता हूँ कि मैंने जो भी किया, अच्छा ही किया

नौजवान ने ना उसकी तारीफ में कुछ कहा और ना उसकी पत्नी की चरित्रहीनता के बारें में .. बस खामोशी से एकटक उसे देखता रहा ...

भारी मूंछौ वाले ने ध्यानपूर्वक उसके चेहरे को देखा और बोला ... दस साल जेल में गुजारने के बाद अपराधियों को पहचानने का अच्छा खासा तजुर्बा हो गया है मुझे ...

जेल में आने वाले कैदियों को देखते ही पहचान लेता हूं कि वे कितनी पहुंची हूई चीज है ...

मैंने जब तुम्हें देखा तो मैं समझ गया कि तुम बेगुनाह हो और किसी और के किये कि सजा तुम काट रहे हो...

नौजवान की आँखें भरने लगी

त. तुम ठीक कह रहे हो दोस्त... मैं... मैं सचमुच बेगुनाह हूँ ... मैंने कोई अपराध नहीं किया है ...

फिर फांसी की सजा क्यों हूई तुम्हें ... कानून....

किस कानून की बात कर रहे हो दोस्त.... वह जो रंडी की तरह अमीरों के पहलु में पडा रहता है .. पैसे वालो की ऊंगलियों पर नाचता है ... उस कानून की बात कर रहे हो तुम... कहते हुए नौजवान का चेहरा धधक उठा ... अरे मैं लानत भेजता हूँ ऐसे कानून पर... अगर भगवान मुझे सिर्फ दो दिन के लिए आजाद कर दे तो मैं अपने दुश्मनों के बजाय पहले इस चूतीये कानून से टकराऊंगा ... क्योंकि सारे फसाद की जड़ यही कानून है

इसी कानून और कानून के ठेकेदारों ने मैरे बेगुनाह साबित होने के बाद भी मुझे फांसी की सजा दे दी ...
 
क्या हुआ था दोस्त? मुझे भी बताओ.. शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं ...

क्या करोगे जानकर.? कोई फायदा नहीं होगा मेरी दास्तां सुनकर... रही बात मदद करने की... तो एक बात गांठ बांध लो दोस्त... अगर तुम्हारी बाजुओं में दम है और जैब भरी हुई है तो कानून क्या , कानून का बाप भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ... इस देश में सिर्फ पैसे और ताकत का राज चलता है ... गरीब लोगों की ना तो कानून सुनता है और ना ही कोई वकील...

यहां विजय... सिर्फ ताकत की होती है ....

यह तुम्हारी गलतफहमी है दोस्त, भारी मूंछौ वाला बोला... इस देश में कई लोग ऐसे हैं जो केवल सच्चाई का साथ देते हैं और सच के लिए झूठे मंत्रियों तक से टकरा सकते हैं ...

और एेसे लोगों के बारे में तुमने सिर्फ सुना होगा दोस्त... अरे दोस्त, ये सिर्फ जनता को भर्मीत करने की अफवाहें होती है ... असल में ऐसा कुछ नही होता... आज के युग में तो माँ भी अपने बच्चे को दूध पिलाती ही तब है जब वह रोने लगता है और यह कहने से नहीं चूकती की बडा होकर मैरा बेटा मुझे लाखों रुपये कमाकर देगा... जब अपनो का ये हाल है तो फिर एक गैर आदमी किसी गैर की मदद बिना स्वार्थ के क्योकर करेगा ?

बहुत बडी गलतफहमी में हो दोस्त... भारी मूंछौ वाला बोला ...

मैं सच्चाई बयान कर रहा हूँ दोस्त... क्या बिगाडा था मैंने किसी का जो मुझे फांसी की सजा हो गई.? दस दिन बाद मुझे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा और असली गुनहगार आजादी से घुमता हुआ किसी नये शिकार की तलाश में लग जायेगा .... नौजवान के स्वर में दर्द और गुस्सा दोनों ही थे

मैंने कहा ना कि तुम बहुत बडी गलतफहमी में हो, कुछ घिनौने लोगों ने तुम पर अत्याचार किए और तुम सारी दुनिया को ही बुरा समझने लगे ...

मैरी नजर में तो सारी दुनिया ही गंदी है ....

नहीं दोस्त, अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो सच्चाई के लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं ... किसी का दर्द दूर करने के लिए अपना सबकुछ लुटा देते हैं .. ऐसे ही कुछ लोगों पर दुनिया टिकी हुई है वरना यह धरती कब की रसातल में पहुंच गई होती

नौजवान कुछ नही बोला, बस हौले से हंसकर रह गया ... जैसे उसका मजाक उड़ा रहा हो ....

और मैं ऐसे ही एक शख्स की बात कर रहा था तुमसे ... उसके मजाक का बुरा न मानते हुए भारी मूंछौ वाला बोला ... अगर उसने तुमसे मिलने की हामी भर ली, जिसका मुझे पूरा विश्वास है, और उसने तुम्हें आजाद करने का वादा कर दिया तो समझ लो कि दुनिया की कोई भी ताकत तुम्हें फांसी पर नहीं चढा सकेगी ... बल्कि वह कहर बनकर दुश्मनों पर टूट पडेगा ....

कौन है वो ... नौजवान के मुंह से शब्द अपने आप फिसल गये....

देव...

देव.???

हाँ देव, पर लोगों ने उसे डेविल के नाम से मशहूर कर दिया है , दिल्ली में उसकी बहुत बड़ी प्राइवेट डिटेक्टिव ऐजैंसी है बिग बॉस के नाम से ... उसकी ऐंजैसी में हर तरह के बंदे काम करते हैं ...

इंजीनियर, डाक्टर, वकील, रिटायर्ड फौजी, जज वगैरह...

हर वो इंसान, जो सच्चाई के लिए जान लगा दे, बिग बॉस के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले रहते हैं ...

 


डेविल साहब का एक भाई है जो वकालत करता है ... जितनी जुबान वो अदालत के अंदर चलाता है उससे कहीं ज्यादा वो अदालत के बाहर हाथ पैर चलाता है ... बड़े बड़े अपराधी सिर्फ उसका नाम सुनकर अपराध करना भूल जाते हैं ... अंडरवर्ल्ड में उसे शनिदेव कहकर पुकारा जाता है क्योंकि उसकी टेढ़ी नजर जिस किसी अपराधी पर पडी, समझ लो या तो वह जेल की सलाखों के पीछे गया या फिर सीधा उपर... भारी मूंछौ वाले ने उंगली आसमान की ओर उठा कर इशारा किया ...

नौजवान कुछ भी नहीं बोला ... चुपचाप बैठे सुनता रहा...

कुछ पल बाद खामोशी को तोडते हुए भारी मूंछौ वाला बोला ... मेरी सलाह मानो तो तुम उनसे मिलो.. और अपनी दास्तां सुनाओ... मुझे पूरा विश्वास है कि वे तुम्हारी मदद जरूर करेंगे ...

ल.. लेकिन, मैं उनसे कैसे मिल सकता हूं ... मैं तो ...

मेरा मतलब तुम्हारी हां से है ... तुम हां करो तो मैं खुद उनके पास जाकर प्राथना करूंगा कि वह तुमसे आकर मिले...

वह.. वह आ जायेगा ?

फौरन...

और उनकी फीस.?

गरीबों का मसीहा माना जाता है वह, फिस की तो बात ही नहीं करेगा तुमसे ...

क्या त. तुम जानते हो उसे ?

पूरा दिल्ली जानता है उसे ... मैने दिल्ली में एक साल गुजारा था, तभी मुझे उसके बारे में जानकारी मिली ...

गहरी सांस छोड़ते हुए नौजवान बोला ... हालांकि जिंदगी की आस छोड चुका हूं मैं, और यह भी जानता हूं की यह डेविल साहब का भाई भी गुनहगारों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा ... फिर भी मैं उस से मिलूंगा ... देखना चाहता हूं कि ऐसा क्या है उसमें जो तुम उसे मसीहा बना कर पेश कर रहे हो ...

म. मैं बाहर निकलते ही दिल्ली रवाना हो जाऊंगा दोस्त, और एक बात अपने जेहन में बिठा लो ...

क्या ???

अब तुम कानून द्वारा फांसी पर नहीं चढाये जा सकते... यह वादा मैं तुमसे डेविल साहब की तरफ से कर रहा हूं ...

इतना विश्वास है तुम्हें उस पर.? हैरानी से बोला नौजवान...

वह बस मुस्कुरा कर रह गया ...

वैसे नाम क्या है डेविल साहब के इस भाई का? नौजवान ने पूछा ...

भारी मूंछौ वाला बोला ...

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पूनीत...

कहो रामभरोसे ... क्या खबर लाये हो ?

लंगोट कस लिजिये हजुर... विशाल की पीठ पर एक बहुत बड़ा हाथ पडने वाला है ...

रामभरोसे अपने सामने बैठे उन चारों आदमियों को देखते हुए बोला, जो कि चेहरे से ही पहुंची हुई हस्तियां नजर आ रहे थे ...

उसकी बात सुनकर चारों बुरी तरह से चौंके और एक दूसरे का मुंह देखने लगे ...

किस हाथ की बात कर रहे हो तुम.? उनमें से एक सोफे पर पहलु बदलते हुए बोला

पुनीत... पुनीत शर्मा का हाथ...

पुनीत शर्मा ... चारों के मुंह से एक साथ निकला

कौन पुनीत शर्मा ? उनमें से एक ने पूछा ..

दिल्ली में वकालत करता है .. दो साल तक मैंने दिल्ली की सेन्ट्रल जेल में नौकरी की है हुजूर... रामभरोसे बोला... आपको जानकर हैरानी होगी कि मेरे वक्त में लम्बी सजा काट रहे 80% कैदी पुनीत शर्मा की बदौलत जेल में पहुंचे थे ... उसके बारे में मैंने बहुत सुना था वहां... एक बार जिसके पीछे हाथ धोकर पड गया, समझ लो उसका बंटाधार हो गया और अब बहुत जल्द वो रायपुर आ रहा है ... आप लोगों के पीछे पडने के लिए...

 


चारों ने पहले एक दूसरे को देखा... मुस्कुराये ... फिर जोर जोर से हंसने लगे...

रामभरोसे आँखें फाडे उस चांडाल चोकडी को देखने लगा ...

आप लोग हंस रहे हैं हुजूर...

हां ... तुमने बात ही ऐसी की है रामभरोसे ... उनमें से एक ने कहा ...

एक मामूली वकील की भला हमारे सामने क्या औकात... यह जानते हुए भी कि मैं यहां का S.P. हूं ... तू मुझे डराने की कोशिश कर रहा है ...

और मैं यहां की अदालत का जज हूँ ... उसके साथ बैठा गंजे सिर वाला आदमी बोला ... रायपुर की अदालत में पहुंचने वाली जिंदगी मेरी कलम के नोक पर रखी होती है ...

मगर उससे पहले ही मैं अदालत में जिरह करके निर्दोष को भी अपराधी साबित कर देता हूँ, ताकि मेरे दोस्त को फैसला लेने में कोई दिक्कत न हो ... उसके साथ वाला चश्माधारी व्यक्ति बोला

और मुझे तो रायपुर का बच्चा बच्चा जानता है... निरंजन चौधरी जैसा नेता भला रायपुर को कहां से मिल सकता है.. महिला सुधार समिति का अध्यक्ष हूं मैं ... जनसेवक के नाम से जाना जाता हूं, मेरे दरवाजे पर आया कोई भी फरियादी खाली हाथ नहीं लौटता... मेरी एक आवाज पर पूरा रायपुर उस व्यक्ति की टिक्का बोटी एक कर सकता है ....

और तुम हमें एक मामूली वकील का डरावा दिखाने आये हो ...

रामभरोसे ने एक गहरी सांस छोडी और बोला ... मैं जानता हूं हुजूर, आप लोगों की ताकत को भलीभांति जानता हूँ, आप लोगों की छत्र छाया में तो मैं फल फूल रहा हूँ, मगर फिर भी यही कहूंगा कि खतरे को अपनी तरफ बढ़ने से पहले ही खत्म कर दिया जाय तो बेहतर होगा ... रामभरोसे हाथ जोड़कर बोला ....

लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि पुनीत शर्मा यहां आ रहा है ? जज प्रताप सिंह ने रामभरोसे को घूरते हुए पूछा ...

रामभरोसे ने प्रताप सिंह की तरफ देखा और बोला ... आज ही शेरसिंह नाम का एक कैदी सजा काट कर रिहा हुआ है, सुबह मैंने उसे विशाल से बातें करते हुए देखा तो मन में तमन्ना जाग उठी और मैंने छुप कर उनकी सारी बातें सुन ली ... शेरसिंह ने ही विशाल को पुनीत शर्मा से मिलने के लिए उकसाया था हुजूर, और फिर उसने विशाल से वादा किया कि वह जेल से बाहर निकलते ही दिल्ली के लिए रवाना हो जायेगा और डेविल साहब से आग्रह करेगा कि वो विशाल की मदद हेतु पुनीत को यहां भेजे ...

अब ये डेविल साहब कौन है ? जज बोला ..

फिर रामभरोसे ने उन्हें डेविल साहब के बारे में बताया और कहा कि आज कल वो फिल्ड में कम ही आते हैं, लेकिन वो भी कम खतरनाक नहीं है और उनकी पहुंच भी बहुत गहरे तक है...

तुम क्या समझते हो ... एस पी राजीव सेन बोला ... डेविल और वह पुनीत शेरसिंह के आग्रह पर दोडै चले आएंगे ...

दीन दुखियों के लिए उनके दिल में कितनी जगह है यह आप दिल्ली जाकर पता कर सकते हो... मुझे पूरा विश्वास है कि शेरसिंह की बात सुनते ही वह रायपुर के लिए रवाना हो जायेगा ...

दिखने में कैसा है वह? वकील सुरेश पाटिल ने पूछा

बेहद खूबसूरत और शांत नजर आने वाला है वह, हरपल एक मौहक मुस्कान उसके होठों पर थिरकती रहती है

और कोई खास पहचान.?

हां , चूईगम चबाने का भी शोक है उसे..

ठीक है रामभरोसे, वकील बोला... तुम जाओ... हम देखते है कि हम क्या कर सकते हैं ..

 


रामभरोसे ने सबके सामने सिर झुकाया और वहां से बाहर निकल गया ...

हरामी का पिल्ला... उसके जाते ही निरंजन चौधरी बड़बड़ाया... हमें डराने आया था ...

नहीं चौधरी साहब, सुरेश पाटिल उसकी तरफ देखते हुए बोला, वह हमें डराने नहीं सावधान करने आया था ...

निरंजन चौधरी ने घूर कर उसकी तरफ देखा ... तुम कहना क्या चाहते हो??

गहरी सांस लेकर वकील सुरेश पाटिल बोला... रामभरोसे के पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालीये चौधरी साहब, उसकी अब तक लाई गई तमाम खबरें दम खम वाली ही थी ...

मगर इस बार वह कोई काम की खबर नहीं लाया... एस पी राजीव सेन बोला... हरामी जरूर पैसे के लालच में आया होगा

हो सकता है उसकी खबर काम की हो, पुनीत शर्मा नाम का वह वकील वाकई में दमखम वाला हो ... सुरेश पाटिल बोला...

तुम क्या कहने की कोशिश कर रहे हो ? जज प्रताप सिंह बोला...

रायपुर और आस पास के इलाकों में अंडरवर्ल्ड में सिर्फ हम चारों का ही सिक्का चलता है ... बेशक हम अंधेरे में रह कर अपना धंधा करते हैं , फिर भी अगर यह शर्मा कोई पहुंची हुई हस्ती हुआ और हमारे चेहरों पर से नकाब नोचकर पब्लिक के सामने हमें नंगा कर दिया तो जानते हो क्या होगा ?

कोई कुछ नहीं बोला, सब उसकी तरफ़ देख रहे...

लोग हमें जूते मार मार कर खतम कर देंगे ... उन्हें चुप देखकर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुरेश पाटिल बोला.. हमारी टिक्का बोट्टी एक कर देंगे ... इसलिए रामभरोसे की बात पर अमल करो... इससे पहले कि खतरा हमारी तरफ बढ़े, हमें खतरे को ही खत्म कर देना चाहिए...

तुम्हारा मतलब पुनीत शर्मा से है ?

हां ...

पूरे रायपुर की पुलिस मेरे इशारे पर नाचने को मजबूर हैं ... एस पी राजीव सेन बोला.. मैं आज ही तमाम पुलिस फोर्स को आदेश दे देता हुं की जैसे ही पुनीत शर्मा रायपुर में दाखिल हो, उसे खत्म कर दिया जाये...

नहीं... ऐसा भूल कर भी मत करना ...

क्यों ? माथे पर बल पड़ गये राजीव सेन के..

यार, दिमाग से काम लो... अगर पुनीत शर्मा पुलिस के हाथों मारा गया तो दिल्ली पुलिस को पता चलते देर नहीं लगेगी ... अगर पुनीत शर्मा सचमुच कोई तोप हुआ तो जांच सीबीआई से भी हो सकती है और ऐसा हो गया तो फिर समझ लो हम फंसे की फंसे ...

ओह... राजीव सेन के मुंह से बस इतना ही निकला

एडवौकैट सुरेश पाटिल की बात बिल्कुल सही थी...

फिर क्या किया जाए.? तभी मजिस्ट्रेट प्रताप सिंह बोला

काम वो करो कि सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे ... सुरेश पाटिल बोला

मगर कैसे ? इस बार निरंजन चौधरी बोल पड़ा...

एक आइडिया है मेरे दिमाग में ...

बोलो क्या है आइडिया...

पूनीत शर्मा पर हमला हमारी गैंग के आदमी करेंगे ...

उससे क्या होगा ? राजीव सेन ने कहा ...

वे पुनीत शर्मा को खत्म कर देंगे और फरार हो जायेंगे, तब पुलिस कातिलों को ढूंढने के लिए भागदौड़ शुरू करेगी, लेकिन कातिल पकडे नहीं जाएंगे ...

क्या तब सीबीआई जांच नहीं करेगी ?

बेशक करेगी, लेकिन तब सीबीआई का शक हम पर नहीं जायेगा ... तब वह उन गुंडों को ढूंढेगी जिन्होंने पुनीत शर्मा को मारा होगा.. और पुलिस को वह अपना मददगार समझेगी ...

और अगर वह सचमुच दमखम वाला हुआ और उसने हमारे ही दो-तीन आदमियों को मार गिराया तो ? निरंजन चौधरी ने कहा ...

उस सूरत में भी बाजी हमारे हाथों में होगी ... धूर्त मुस्कान के साथ बोला सुरेश पाटिल... पुलिस उसे हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लेगी, फिर उस पर मुकदमा चलेगा और तुम उसे फांसी की सजा दे दोंगे ... उसने जज प्रताप सिंह की ओर देखते हुए कहा ....

वाह... क्या आइडिया निकाला है ... चौधरी उसकी तारीफ करते हुए बोला ...

सुरेश पाटिल बोला कुछ नहीं, बस मुस्कुरा दिया ...

मैं अभी अवतार सिंह को फोन कर देता हूँ, वह चार पांच आदमियों को स्टेशन की तरफ रवाना कर देगा..

और तुम, सुरेश पाटिल राजीव सेन की तरफ देखते हुए बोला ... इंस्पेक्टर तावडे को आदेश दे दो ताकि बाजी पलटते ही पुलिस पुनीत शर्मा को गिरफ्तार कर ले...

इसके लिए मैं खुद तावडे से बात करूंगा, फोन पर हो सकता है कि मैं उसे ढंग से समझा ना पाऊं... राजीव सेन ने कहा ...

वह तुम्हारी सिरदर्दी है कि तुम उसे कैसे आदेश देते हो...

और इधर दिल्ली के एक पॉश इलाके में एक पांच मंजिला भव्य इमारत, जिसके शीर्ष पर बडे बडे सुनहरे अक्षरों से लिखा था ...

बिग बॉस प्राइवेट डिटेक्टिव ऐजैंसी ..

 


इमारत के बाहर दो सिक्योरिटी गार्ड मुस्तैदी से खडे थे... गेट के आगे एक लम्बा रास्ता बना हुआ था जिसके दोनों तरफ हर किस्म के फूलों के पौधे लगे हुए थे ...

इमारत के अंदर चारों तरफ चहल पहल थी, सब कुछ ना कुछ काम कर रहे थे, कोई ऑर्डर दे रहा था तो कोई ऑर्डर लेकर उसे फॉलो कर रहा था ...

और इसी इमारत के एक विशाल कक्ष में डेविल साहब का ऑफिस बना हुआ था... जिसमें वो एक सिंहासन नुमा कुर्सी पर विराजमान थे और उनके टेबल पर ढेरों फाइलें रखी पडी थी,, कम से कम दस बारह फोन लगे हुए थे और टेबल के उस पार विजिटर्स चैयर्स लगी हुई थी वो भी एक लाइन से सात... इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भव्यता का कितना बोलबाला है ...

डेविल साहब इस वक्त किसी केस की फाइल में गहरे तल्लीन थे कि दरवाजे की आहट ने उनका ध्यान भंग कर दिया

उन्होंने सर उठाकर देखा तो उन्हीं के एक डिटेक्टिव के पीछे पीछे एक भारी मूंछौ वाले व्यक्ति को अंदर आ रहा था ...

वह व्यक्ति चेहरे से काफी सहमा सहमा सा नजर आ रहा था, निश्चय ही वह वहां के वैभव से प्रभावित हो रहा था...

वह आदमी शेरसिंह को छोड़कर वहां से चला गया ..

आईये... बैठिये ... डेविल साहब ने पूरी ईज्जत से पेश आते हुए बोले ...

कुछ पल सन्नाटा छाया रहा ...

जिसे डेविल साहब अपनी रोबदार आवाज से तोड़ते हुए बोले ... कहिये आप को क्या तकलीफ है...

शेरसिंह बहुत नर्वस महसूस कर रहा था और बडी मुश्किल से एक बेतुका सवाल कर दिया .. मु... मुझे डेविल साहब से मिलना है ...

मैं ही देव हैं ... आप बैठिये.

डेविल साहब को अपने सामने देखकर उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमकने लगी, निश्चय ही वह हीनता का शिकार हो रहा था ...

आप बैठे नहीं अभी तक, बैठिये न.. डेविल साहब स्वयं अपनी कुर्सी पर बैठते हुए बोले ...

हिचकिचाते हुए वह कुर्सी नुमा सोफे पर इस तरह बैठ गया मानो किसी भी पल उठने का आदेश मिल सकता है ...

आराम से बैठिये, घबराने की कोई बात नहीं है ... डेविल साहब तनिक नर्म स्वर में बोले

शेरसिंह को कुछ ढाढ़स बडा, वह आराम से बैठ गया ...

कहिये... डेविल साहब ने एक बार फिर से कहा और पैनी नजरों से उसे देखा...

शेरसिंह ने जोरो से थूक निगली और बोला ... मेरा नाम शेरसिंह है, रायपुर की सैंट्रल जेल से दस साल की सजा काट कर मैं सीधा आपके पास आया हूं...

डेविल साहब हल्के से चौंके और सीधे होकर बैठ गए...

तभी कक्ष में एक आदमी चाय बिस्कुट लेकर आया और उनके सामने रख कर चला गया ...

चाय पीजिए... डेविल साहब उसे पूरी इज्जत बख्शते हुए बोले ...

शेरसिंह ने चाय का कप उठाया और उसे चुसकने लगा..

चाय पीने तक कोई बात नहीं हुई..

शेरसिंह ने खाली कप टेबल पर रखा और फिर डेविल साहब की तरफ देखने लगा..

क्या किया था आपने जिसके कारण आपको दस साल की सजा हुई...

अपनी पत्नी का खून कर दिया था ...

चौंके डेविल साहब... अपनी ही बीवी को खत्म कर दिया, लेकिन क्यों ?

वह चरित्रहीन थी साहब, घर जैसे मंदिर को उसने चकला बना कर रखा दिया था ..

ओह..

मुझे अब भी उसकी मौत पर कोई दुख नहीं है और ना अपने किये पर पछतावा ...

मगर अब मेरे पास किस काम से आये हो?

मैंने तो अपनी करनी पर दस साल की सजा काट ली है लेकिन रायपुर की जेल में एक कैदी ऐसा भी है जिस बेचारे का कोई दोष नहीं है और उसे फांसी की सजा सुनाई गई है ..

क्या ???

 


जी हां, दस दिन बाद उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा...

और आप कह रहे हैं कि उसने कोई गुनाह नहीं किया ...

जी हां ...

ऐसा कैसे हो सकता है ..

ऐसा ही हुआ है डेविल साहब... द्रढ स्वर में बोला शेरसिंह... वह बेगुनाह तो अपनी जिंदगी से मायूस हो चुका है, मैंने उसके सामने आपका और पुनीत भाई का जिक्र किया और बडी मुश्किल से उसे मना सका कि वह आपसे मिले... आप तो रक्षक हो कानून के, गरीबों के मसीहा माने जाते हो... और आप की जानकारी में किसी बेगुनाह को फांसी हो गई तो क्या आप उसे बर्दाश्त कर लेंगे ?

डेविल साहब के चेहरे पर सोचो का तूफान गर्दिश करने लगा ...

शेरसिंह ने उनके सामने हाथ जोड़ दिये...

वह मेरा कुछ नहीं लगता साहब, लेकिन मैंने उसे विश्वास दिलाया है कि आप उसकी मदद जरूर करेंगे ... वह फांसी चढ भी गया तो मुझे उससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा... लेकिन इसमें कानून की पराजय होगी... इसलिए मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं, आप उसकी मदद जरूर किजीये... कहते हुए शेरसिंह का स्वर भर्रा गया ...

डेविल साहब अपने स्थान से उठे और उसके जुड़े हुए हाथों को अलग करते हुए बोले ... तुम्हारा विश्वास नहीं टूटेगा शेरसिंह, मैं आज ही नहीं अभी पुनू को रायपुर के लिए रवाना कर देता हूँ.... आगे क्या और कैसे करना है वो स्वयं देख लेगा..

शेरसिंह की आँखों में चमक उभर आई, चेहरा खिल उठा..

आज मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इस धरती पर भगवान हैं और मैंने भगवान के साक्षात दर्शन भी कर लिए आज... शेरसिंह श्रद्धा पूर्वक डेविल साहब को देखते हुए बोला ..

नहीं शेरसिंह, मैं भगवान नहीं, मैं सिर्फ इंसान हूं... सिर्फ इंसान.... मुझे उस कैदी का नाम और नम्बर बताओ...

विशाल नाम है उसका और नम्बर तीन सो दस.... शेरसिंह ने बताया ...

सब ठीक है ना ? अवतार सिंह अपने सामने खड़े क्रूर चेहरे वाले व्यक्ति के चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला ...

निरंजन चौधरी एन्ड कम्पनी में अवतार सिंह की हैसियत गैंग के बॉस की थी ... गैंग के लगभग सभी ओहदेदार उसे ही अपना बॉस मानते थे... केवल कुछ ही ओहदेदारो को मालूम था कि अवतार सिंह की डोर निरंजन एन्ड कम्पनी के हाथों में है ... उनका आदेश मिलने पर ही अवतार सिंह आगे आदेश दिया करता था ....

अवतार सिंह करीब पैंतालिस साल का मोटी तोंद वाला जाट था ... क्रूरता उसके चेहरे पर थोक के भाव नजर आती थी, उसकी आँखों में हर वक्त हिंसक भाव छाये रहते थे ... अपनी जिंदगी में वह कितने कत्ल कर चुका था, इसका पता उसे खुद मालूम नहीं था ...

यस बॉस... उसके सामने खडा व्यक्ति तत्परता से बोला ... रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, और हवाई अड्डे पर हमारे आदमी फैल गये हैं ... पुनीत शर्मा के रायपुर में प्रवेश करते ही हमारे आदमी मौत बनकर उस पर टूट पडेंगे ....

गुड... बोला अवतार सिंह. ध्यान रहे, पुनीत शर्मा शहर में दाखिल ना होने पाये...

आप निश्चिंत रहें बॉस, पुनीत शर्मा का हुलिया हमारे हर आदमी के जेहन में बैठा हुआ है, उसे पहचानने में हमारे आदमी एक पल भी नहीं गवायेंगे ...

अवतार सिंह के चेहरे पर संतुष्टी नजर आने लगी...

अब उन बेचारों को क्या मालूम कि पुनीत कार द्वारा भी रायपुर में आ सकता है ...

और ऐसा ही कुछ हुआ... पुनीत निर्विरोध रायपुर पहुंच गया...

राह चलते एक व्यक्ति से उसने सैंट्रल जेल का पता पूछा और कार आगे बढा दी... करीब आधे घंटे बाद उसकी कार सैंट्रल जेल के सामने खडी थी

जेल की चारदीवारी के चारों और गहरी खाई बनी हुई थी और खाई के पार झाडीया और छोटे बड़े पेड़ नजर आ रहे थे, तथा बीच में कंक्रीट की लम्बी सड़क जो कि जेल तक पहुंच रही थी ...

पुनीत चुइगम चबाता हुआ उस सडक पर चलता हुआ आगे बढने लगा...

पांच मिनट बाद वह जेल के विशाल फाटक के सामने खड़ा था... फाटक के बाहर एक संतरी राइफल लटकाए हुए कहा था, राइफल की नोक पर लम्बी संगीन चमक रही थीं

संतरी ने प्रशन भरी निगाहों से पुनीत को देखा... वास्तव में वह पुनीत शर्मा के व्यक्तित्व से प्रभावित नजर आ रहा था ...

कहो... आवाज़ में थोड़ा रूआब लाने की असफल कोशिश करते हुए बोला संतरी...

मुझे जेल अधीक्षक से मिलना है ...

संतरी उसके करीब आ खडा हुआ... कोई हथियार वगैरह हैं तुम्हारे पास.?

हां रिवॉल्वर है, कहकर पुनीत ने जेब से रिवॉल्वर निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा दी ...

पुनीत शर्मा जानता था कि हथियार लेकर जेल में जाना निषेध है ...

संतरी ने रिवॉल्वर अपने कब्जे में की और फिर अपनी संतुष्टि के लिए उसकी सरसरी तौर पर तलाशी ली ...

संतुष्ट होकर वह सीधा हुआ और फाटक के बीच बने छोटे से दरवाजे को खोलते हुए बोला ... दांयी तरफ सबसे अंत में जेलर साहब का ऑफीस है ....

पुनीत शर्मा मुस्कुराया और सिर झुका कर उस छोटे से दरवाजे में प्रवेश कर गया ...

सामने गलियारा था, गलियारे के दोनों तरफ कमरे, दांयी तरफ भी एक गलियारा था, उसके दोनों तरफ भी कमरे थे... वह तमाम कमरे जेल में काम करने वाले वार्डनो और अधिकारियों के थे...

पुनीत शर्मा दांयी तरफ वाले गलियारे में आगे बढ़ गया ...

आगे जाने पर उसे एक कमरे के बाहर बैठा संतरी नजर आया, उसे अपने आने का तात्पर्य बताया और जेलर साहब से मिलने की इच्छा जताई...

संतरी ने उसे वहीं रूकने का इशारा किया और दरवाजे के आगे लगे पर्दे को हटा कर भीतर दाखिल हो गया ...

 
शीघ्र ही वह वापस लोटा और पुनीत शर्मा से बोला ... जाईये

पुनीत शर्मा पर्दा हटाकर अंदर दाखिल हो गया ..

सामने एक बड़ी ऑफिस टेबल के पिछे ऊंची पुश्त वाली कुर्सी पर जेलर की वर्दी में एक तंदुरुस्त और आँखों में जहानत लिए व्यक्ति बैठा था

पुनीत ने सिर को हिलाकर उसका अभिवादन किया और टेबल के करीब पहुंच कर पुनः अपना परिचय दिया ...

फरमाइये क्या सेवा कर सकता हूं मैं आपकी... शिष्टता से बोला जेलर

पुनीत एक कुर्सी पर बैठ गया और बोला, आपकी जेल में विशाल नाम का एक कैदी हैं और नम्बर है 310

चौंका जेलर... उसे तो फांसी की सजा मिली है ...

जी हां, मैं उससे बात करना चाहता हूं ..

जेलर ने कुछ पल सोचा, फिर टेबल पर रखी घंटी पर हाथ मारा ...

तुरंत बाहर बैठा संतरी भीतर प्रविष्ट हुआ...

वकील साहब को 310 नम्बर कैदी से मिलवा दो... जेलर आदेश भरे स्वर में बोला

आइये... संतरी अदब से बोला

संतरी के पीछे पीछे पुनीत शर्मा बाहर आया और गलियारे में आने बढने लगा...

गलियारे के अंत में पहुंच कर संतरी दांयी तरफ वाले गलियारे में पहुंचा और आगे बढने लगा...

पुनीत शर्मा उसके पीछे पीछे ...

ठीक तभी एक कमरे में से रामभरोसे बाहर निकाला... जैसे ही उसकी नजर पुनीत शर्मा पर पड़ी, बुरी तरह से चौंका... मगर तुरंत ही उसने अपनी चौंकाहट पर काबू पा लिया और पुन: कमरे में चला गया ...

लेकिन पुनीत शर्मा की तेज नजरें उसके चेहरे के बदलने वाले भावों को देख चुकी थी, तभी तो वह हैरान रह गया था ... साथ ही वह इस सोच में भी डूब गया था कि वह आदमी उसे देखकर चौंका क्यों, जबकि वह उसे जानता तक नहीं ....

पुनीत शर्मा कदम तेज कर संतरी के बराबर आ गया और उसके साथ चलते हुए बोला ... क्या नाम है तुम्हारा?

सलीम... संतरी ने उतर दिया

और वह जो अभी अभी कमरे से बाहर निकाला था, उसका क्या नाम है ?

रामभरोसे... जेल में वार्डन है

रामभरोसे ... पुनीत शर्मा मन ही मन बड़बड़ाया....

गलियारे के अंत में कारावास शुरू हो गया, कारावास के मेन फाटक पर एक बड़ा सा ताला झूल रहा था, जिसके पीछे एक संतरी खडा था ...

इन्हें तीन सौ दस नम्बर कैदी से मिलना है ... सलीम बोला

संतरी ने पुनीत शर्मा को उपर से नीचे तक देखा... फिर ताला खोला और ऊंचे स्वर में बोला ... तीन सौ दस के पास ले जाओ इसे...

तभी एक वर्दीधारी वार्डन उसके करीब आया और पुनीत शर्मा को विशाल की बैरक तक ले आया..

विशाल, देखो तुमसे कोई मिलने आया है ... वार्डन बोला...

विशाल घुटनों पर बाहें रखे, बाहों पर ठुड्डी रखे खाली नजरों से एक तरफ देख रहा था ... वार्डन की आवाज सुनकर विशाल ने सूनी सूनी निगाहों से पुनीत शर्मा की तरफ देखा... मगर उसकी मुद्रा में कोई फर्क नहीं आया ...

वार्डन ने जेब से चाबियां निकाल कर बैरक का दरवाजा खोला तो पुनीत शर्मा भीतर दाखिल हो गया... वार्डन ने वापस दरवाजा बंद कर के ताला लगा दिया और वहां से हट गया ...

पुनीत शर्मा विशाल के नजदीक आया और उसकी आँखों में झांकते हुए बोला ... मेरा नाम पुनीत शर्मा है ...

बहुत बुरी तरह से और जोर से चौंका विशाल...

शेरसिंह की बात सुनकर बड़े भाई ने मुझे सारी बातें बताईं और मैं बिना देर किए यहां के लिए रवाना हो गया ...

विशाल की आँखों में उम्मीद की हल्की सी किरण जागी

म.. मैं बेगुनाह हूं पुनीत शर्मा जी... उन लोगों ने मेरे साथ...

घबराओ मत विशाल, अगर तुम बेगुनाह हो तो मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि दुनिया की कोई ताकत तुम्हें फांसी पर नहीं चढा सकती...

शेरसिंह भी यही कह रहा था शर्मा जी... ल.. लेकिन मुझे मालूम है कि आप फिर भी उन कुत्तों का कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे, बहुत ताकतवर है वो लोग...

तुम मुझे बताओ क्या हुआ, कैसे फांसी की सजा मिली तुम्हें ... फिर में तुम्हें दिखाऊंगा कि मैं क्या कर सकता हूं ...

विशाल ने गहरी सांस छोडी और बैरक की छत की तरफ देखने लगा...

बीती हुई घटनायें उसकी आँखों के सामने नाचने लगी..

 


विशाल ने जूते पहने और सीधा होकर बैठते हुए ऊंची आवाज में बोला ... नाश्ता नहीं बना क्या अभी ?

तुरंत रानी कमरे में दाखिल हुयी, हाथो में ट्रै उठाये जिसमें नाश्ता रखा हुआ था ...

जरा धीरे बोला करो भैया ... रानी टेबल पर ट्रे को रखती हुई बोली ...

पड़ोसी सुनेंगे तो वे तो यही सोचेंगे कि बहन भाई को खाना तक नहीं खिलाती या फिर यह समझेंगे कि बहन भाई आपस में लड़ रहे हैं ... मुस्कुराती हुई रानी कहने लगी

बहुत जुबान चलने लगी है तेरी विशाल भी मुस्कुराते हुए बोला .. अब तो लड़के वालों को खबर भेजनी ही पडेगी कि जल्दी से मुहूर्त निकलवाओ और इस बला को ले जाओ...

रानी ने कमर पर हाथ रखा और आँखें तरेरते हुए बोली... मैं तुम्हें बला नजर आती हूँ ..

तू तो मेरी दादी है, चल बैठ जा, पहले ही काफी देर हो चुकी है

रानी उसके सामने सोफे पर बैठ गई...

विशाल ने हाथ आगे बढ़ाया और जैसे ही ट्रे में से नाश्ता उठाने लगा, रानी ने उसका हाथ परे कर दिया... विशाल ने हडबडा कर उसकी तरफ देखा...

कितनी बार तुम्हें समझाया है मेरे प्यारे भुलक्कड़ भैया, फिर भी तुम्हारी अक्ल में यह बात नहीं आती ..

विशाल असमंजस भरे स्वर में बोला ... कौनसी बात...

हाथ धोये? रानी ने पूछा

हां... हां.. धो लिये ... हडबडी में कह बैठा विशाल

अब झूठ भी बोलने लगे, चलो पहले हाथ धोकर आओ फिर नाश्ते को हाथ लगाने दूंगी ..

गहरी सांस छोड़ते हुए विशाल घुटनों पर हाथ रखकर खडा हो गया ...

इतनी सख्ती तो कोर्ट में भी नहीं बरती जाती जितनी मेरे ऊपर बरती जा रही है...

हाथ धोकर आओ... मधुर मुस्कान के साथ बोली रानी...

विशाल ने मुंह बनाया और कमरे से बाहर निकल गया

थोडी देर बाद ही वह नाश्ता करके काम पर जाने के लिए तैयार था

घर का ध्यान रखना ... जाने से पहले हमेशा की तरह विशाल ने उसे समझाया

रानी ने समझने वाले अंदाज में सिर हिलाया और मुस्कुरा दी

फिर दोनों ने एक दूजे को बाय बाय कहा और रानी दरवाजे को बंद करके अंदर आ गई

रानी आदमकद शीशे के सामने खडी हो कर अपना रूप सौंदर्य निहारने लगी... अपने भाई की बात अभी भी उसके कानों में गूंज रही थी...

" लडके वालो को संदेशा भिजवा देता हूँ कि मुहूर्त निकलवाओ... "

सचमुच जवान हो चुकी थी वह, बहुत ज्यादा जवान... इतनी ज्यादा कि जवानी उससे संभाले नहीं संभल रही थी ... उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की चमक उभर आई थी, कूल्हे भारी हो गये थे, छातियां उसकी कमीज के खुले गले में से झांककर अपनी कयामत खैज जवानी का प्रदर्शन कर रही थी... उसका एक एक अंग मानो अपने मुंह से बोल रहा था कि वह जवान हो चुका है और अब उन्हें किसी चीज की जरूरत है

रानी के हाथ स्वयं ही अपने उरोजौ पर फिरने लगे... अपने ही स्पर्श से उसकी आँखों में गुलाबी डोरे नाचने लगे, सांसो में तेजी आने लगी

 
शीशे में देखते हुए उसने अपने गुलाबी होंठों पर बडे ही दिलकश अंदाज में जीभ फिराई... फिर मधू रस से लबरेज अपने रसीले होंठों पर जैसे ही उसने आगे के दो दांतों से काटा तो ऐसा लगा जैसे अंग अंग अंग में एक नशा छा गया हो... एक हाथ अब भी उरोजौ को सहला रहा था ...

एक बार फिर उसने आदमकद शीशे में खुद को देखा और अपने दुपट्टे को सीने से उतारकर फेंका ... शीशे में अपनी छातियों को प्यार से निहारने लगी... उसके हाथ

खुद-बा-खुद अपने बूब्स की ओर बढ गये और दोनों हाथों से अपने दोनों उरोजौ को तोलने लगी

अनायास ही हुई इस किर्या के समझ आते ही उसके होंठों पर एक शर्मीली मुस्कान तैर जाती है पर हाथों के स्पर्श से जो आनंद की लहरें उसके पूरे शरीर में उठने लगी थी जिसकी वजह से उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगते हैं और उसके हाथ उरोजौ पर कस जाते हैं और उन्हें मिसने लग जाती है ...

आंनद की अनुभूति जब अपने चरम पर पहुंच जाती है तो उसके घुटने मुड जाते है और धडाम से फर्श पर गिर जाती है और अपनी बेकाबू सांसो को काबू में करने की कोशिश करने लग जाती है

बडी मुश्किल से उसने अपने होशो हवास पर काबू पाया और वहां से उठकर बाथरूम की ओर बढ़ गई... गहरी सांसे छोडते हुए वह बाथरूम में प्रविष्ट हुई और पानी का नल चला कर कपडों समेत ही नल के नीचे बैठ गई...

जिस्म में लगी आग धीरे धीरे ठण्डी होने लगी... लगातार पंद्रह मिनट तक वह पानी के नीचे बैठी रही... साथ ही साथ गायत्री मंत्र का जाप भी करती रही, तब जाकर उसके मन की भटकन खतम हुई

नहाकर जब रानी बाथरूम से बाहर निकली तो बिल्कुल सामान्य थी

किचन में जाकर उसने नाश्ता किया और फिर घर के कामों में व्यस्त हो गयी

हुक्म किजीये चौधरी साहब

अवतार सिंह ने निरंजन चौधरी के सामने सिर को झुकाते हुए कहा

निरंजन चौधरी ने हाथ में पकड़ा पैग समाप्त किया और उसे मेज पर रखते हुए गुर्राया... कामचोर हो गया है अब तू....

यह आप क्या कह रहे हैं चौधरी साहब... अवतार सिंह हडबडाया..

अपने मालिकों का तुझे ध्यान ही नहीं रहता ..

ये कैसी बातें कर रहे हैं आप...

लगता है अब तेरी जगह किसी दूसरे अवतार सिंह को बिठाना पडेगा ... उसे घूरते हुए गुर्राया निरंजन चौधरी...

अवतार सिंह का रंग उड गया, आँखों में हल्का सा खौफ उमड़ आया... मुझे मेरा कसूर तो बताओ चौधरी साहब.? उसका स्वर रुआंसा हो गया

निरंजन चौधरी ने स्काच का पैग तैयार किया, उसे उठाया और अपनी उंगलियों में घुमाते हुए बोला ... आज छठा दिन है, छ: दिन से बासी माल खा रहा हूँ... तुझे पता भी है कि मैं चार दिन से ज्यादा एक लड़की के साथ नहीं सो सकता... बड़ी हद चोथे दिन तक मुझे नई लड़की चाहिए होती है और पिछले डेढ़ साल से तीसरे दिन ही नई लड़की को भेज दिया करता था ... इस बार क्या सांप सूंघ गया तुझे ?

म.. म.. मैंने भेजी तो थी एक लड़की ... मिमीयाता सा बोला अवतार सिंह...

और मैंने उसे रिजेक्ट करके वापस भेज दिया था, वह लड़की भेजी थी तूने ? पच्चीस साल से भी अधिक उम्र की थी ... बेशक खूबसूरत थी मगर शक्ल सूरत से ही खेली खायी नजर आ रही थी, उससे तो अच्छी पहले वाली थी जो कि अब है..

मैं किसी नई लड़की का बंदोबस्त करता हूं ...

कल तक कोई नई लडकी नहीं आई तो समझ ले, तेरी जगह कोई और ले लेगा... चौधरी ने कठोर स्वर में कहा ...

भेजने को तो तू कई लड़कियों को भेज देगा, लेकिन इस बार मेरी डिमांड जरा ऊंची है ...

म. मैं कुछ समझा नहीं चौधरी साहब...

 
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