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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

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बिकास जल्दी-जल्दी सारा सामान एक पोशाक में भरने लगा-लगडाती हुई मुमताज भी कमरे मे प्रविष्ट हो गई ।।

बोली---" समुद्र की गहराइयों मे क्या तुम अकेले' ही स्पर्श सुरगे बिछा सकोगे विक्की?"

" 'हां ।" सामान समेटने में व्यस्त विकास ने कहा ।

"यह काम तुम कब करने जा रहे हो?"

. "आज ही रात को-यह काम मुझे विजय गुरु के उस कैद से निकलने से पहले ही करना हे-यदि किसी तरह आजाद होने में कामयाब हो गए तो फिर मेरी कामयाबी की कोई गारटी नहीं है ।"

मुमताज ने हल्की…सी मुस्कान के साथ कहा…"तुम अपने गुरु से बहुत डरते हो?"

"डरना पडता है-वो चीज ही ऐसी हैं ।"

"तुमने ठीक कहा दिलजले-हम चीज ही ऐसी हैं I"

इस आबाज ने दोनों को इस तरह उछाल दिया जैसे बिच्छू ने डक मार दिया हो-हैरतअगेज फुर्ती से घूमने के साथ ही विकास ने रिवाल्वर निकाल लिया,

परंतु---"धाय" ।

दरवाजे की तरफ से एक गोली चली-विकास का रिबॉंल्बर झनझना कर दूर जागिरा. ।

. विजय दरवाजे के बीचो बीच खड़ा था-हाथ में रिवॉल्वर लिए-"नाल से धुआं निकल रहा था…अचानक ही यूं-उसे अपने सामने. देखकर विकास और मुमताज काप उठे…-जिस्मो मे झुरझुरी-सी दोड़ गई-- चेहरे हवाइयां उडने लगीं ।

एकाएक ही मुमताज के जिस्म में जाने कहा से इतनी ताकत आ गई कि वह लपककर विकास के सामने खडी हो गई…बाहे फैलाकर बोली-'"आप विक्की को नहीं' मार सकते मिस्टर विजय ।"

" ओह अब दिलज़ले .~. का नाम बिकास से विक्की हो ~ गया?”

" मुमताज मुझे विक्की ही कहती है गुरु I".

“ इश्क फरमाने लगे हो तुम-हसीनाएं तुम्हारी ढाल बनने लगी हैं-अपनी इस मुमताज से कहो दिलजले कि बीच में से हट जाए इसे शायद पता नहीं. कि तुम्हारे गुरुदेव लडकी. नाम की वस्तु के. मरने पर कभी रहम नहीं खाते I”

" तुम हट जाओं मुमताज ।"

~ " नहीं ।" मुमताज जिद भरे स्वर में चीख पडी-"मैं नहीं हटूगी-भले ही मुझे मार डालो, लेकिन मेरे विकास तक नहीं पहुच सकेंगे आप I" .

"औह-तों वह तुम्हारा विकास है-क्यों शाहज़हा प्यारे?"

" तुम हट जाओ मुमताज ।" विजय की बात पर कोई ध्यान न देत्ते हुए विकास ने मुमताज से कहा-"मुझे कुछ नहीं होगा…वे मेरे गुरु हैं…"मुझे मार नही सकत्ते ।"

"गोली चलाओ मिस्टर विजय I" मुमताज बिफरे हुए अंदाज में चीख पडी…" यदि आपको खून की प्यास है तो मेरा खून पियो…चलाऔ गोली!"

~ "वाह-क्या कुर्बानी का जज्बा है-लैला-मजनूं तो बहुत पीछे रह गए हैं ।" कहने के बाद बिजय अचानक ही गभीर' नज़र आने लगा, बोला--- "अपने र्दिलजले के फेर में मत पडो. लडकी-वह न कल तुम्हारे साथ था न आज रहेगा-अपने देश को आजादी' दिलाने के लिए जूझ रही हो…जूझो-हम नहीं रोकेंगे,, लेकिन दिलजला तुम्हारी कोई मदद नहीं करेगा-यदि इस वार तुम उसके- सामने से नहीं, हट गई तो मैं अगली चेतावनी नहीँ दूगा ।"

" न-हीं I" मुमताज. ने अभी इतना ही कहा था कि उसके पीछे खडे बिकास ने जबरदस्त फुर्ती के साथ उसकी कनपटी. पर कराट. मारी--मुमताज के कंठ' से चीख निकली. और विकास ने उसे हल्की-सी गुडिया.. की तरह कमरे के एक कोने में उछाल दिया ।

मुमताज कराटे के वार से ही बेहोश हो चुकी थी ।

"ये हुई न प्यारे…-मर्दो बाली बात ।" बिजय मुस्कराया ।

"सचमुच गुरु-उन जजीरो से मुक्त होकर आपने चमत्कार दिखा दिया ।"

"चमत्कार तो हम दिखाते ही रहते हैं प्यारे…फिलहाल तुम इस कमरे से बाहर निकलो ।"

"आप जानते हैं किं यह नहीं होगा I”

"'क्यों नही होगा प्यारे?”

"आप भी जानते हे कि यह स्पर्श सुरंगे बिछाने का सामान हे-अभी

मुझें समुद्र में छुपे सेमिनार के नौसैनिक अड्डे को ध्वस्त करना है I”

विजय का कठोर स्वर…"तुम्हे हमारे साथ फौरन भारत चलना है प्यारे I"

"हरगिज नहीं-मुझे समुद्र में छुपा. . .!"

'धाय' ।

बिजय ने एकदम से फायर कर दिया-विकास को उससे एकदम ऐसी उम्मीद नहीं थी, शायद इसीलिए सग आर्ट का ज्ञाता अपनी आर्ट का प्रदर्शन नही कर सका -गोली उसके दाएं पैर के घुटने में लगी…एक चीख के साथ विकास त्यौराकर फर्श पर गिरा…कदाचित इस बार बिजय उसे सभलने का मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए उसने तुरत' ही फर्श पर पड़े विकास पर दुसरा फायर किया… 'धाय' ।'
 
परंतु इस बार लडका सतर्क था-अतः ट्रेगर दबने से पहले ही उछला और बिजय के ऊपर जा गिरा-विजय बौखला गया…रिवॉल्बर हाथ से निकलकर फर्श पर गिरा-अभी संभल भी नही पाया था कि विकास का जबरदस्त घूसा उसकी नाक पर पड़ा-विज़य उछलकर दूर जा गिरा।

दरवाजा पार करके विकास कमरे से गायब ।

बिजय ने झपटकर फुर्ती से फर्श पर पडा… अपना रिवॉल्वर उठाया और कमरे से बाहर जप लगा दी…गेलरी में लगडाता हुआ विकास भागा चला जा रहा था-दाईं टाग की हड्डी टूट गई थी ..

विजय वहीँ से चीखा…"रूक जाओ विकास, वर्ना मैं. . . ।"

विकास नहीं रूका, तब-'धाय' ।'

इस बार गोली ने विकास के बाएं पैर की हड्डी तोड, दी-तेजी से दौडते. हुए विकास के कठ' से एक चीख निकली और गैलरी के फर्श पर वह दूर तक लुढकता चला गया-जैसा खून उसके जख्मो से निकल रहा था, कुछ बैसा ही विजय के चेहरे पर भी फैल गया ।

दूर…वहीँ, फर्श पर पडा, विकास चीख पडा-"मार दो अंकल--जान से मार दो मुझे, लेकिन वापस नहीं जाऊगा…गोलियों से छलनी कर दो अपने बेटे को I”

हाथ में रिवॉल्वर लिए खामोश विजय उसकी तरफ बढा ।

वह हिस्टीरियाई अदाज में चीख रहा था…" रूक क्यों गए गुरु-चलाओ गोली…विकास अभी मरा नही हे…मेरी लाश को ही आप भारत ले जा सकते हैं ।"

" तुम बहुत जिद्दी हो गए हो विकास ।" उसके नजदीक्र पहुचकर दात भीचे विजय कह उठा-"पहले से कई गुना ज्यादा और पहले के मुकाबले बेवकूफ भी कुछ ज्यादा ही हो गए हो ।"

"गोली चलाओ अंकल…अपने बेटे पर गोलिया चलाने का तो शौक हो गया है आपको ।"

"हां-हमे शोक हो गया है ।" बिजय की आवाज भर्रा गईं…"अरे अगर शौक होता तो ये गोलियां तेरे सीने में लगती-यू कह कि हमें प्यार हो गया है तुझसे…प्यार-वह जौ हमने कभी किसी से नहीं किया. था-उसी प्यार का तो नाजायज फायदां उठाया करता है तू "

" तो आप ये किस बात की सजा दे रहे हैं मुझे-क्या मेरा गुनाह यह हे कि मेने जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई'? क्या मेरा गुनाह यह है कि कमजोर, बेबस और बेगुनाहों का पक्ष लिया मेने? बोलो अकल…'दिल पर हाथ रखकर कहो कि आप मुझे मेरे कौन…से गुनाहों की सजा दे रहे

है !"

"यही तो दिक्कत है बेटे कि हम तुझे गुनहगार भी नहीं ठहरा सकते ।"

"तो फिर आप स्वार्थी क्यों हो गए हैं गुरू…ये रिवाल्वर फेक क्यों नहीं द्रेते-क्यों नहीं आप भी मेरे साथ कंधे …से…कधा मिलाकर दो

महाशक्तियों की घिनौनी पालिटिक्स के खिलाफ खडे होते ? आप ही ने तो सिखाया था गुरु कि सच्चाई को कहने से डरना नहीं चाहिए। I"

"मुल्क की प्रतिष्ठा-देश. का मान-सम्मान हर सच्चाई से बडा है !"

बिकास ने धीरे से अपनी जेब की 'तरफ हाथ सरकाया l अभी हाथ जेब तक पहुचा भी नहीं था कि…'धाय' I

इस बार बिजय की गोली उसका कंधा तोड गई…एक चीख के साथ विकास लुढकता-चला गया…जब रुका तो पागलों की तरह बोला-" "उफ्फ-आप तो बिल्कुल पत्थर निकले अंकल-यदि आप इतने ही कठोर हैं-यदि आपके सीने में सचमुच दिल नहीं है तो…मार डालिए मुझे…मैं हर कदम पर आपका दिल दुखाता रहा हूं…मुझे मार डालो अकल…एक-सिर्फ एक गोली और गुरु I.”

बस-इतना कहने के बाद विकास फ़र्श पर लुढक. गया । घबराकर बिजय_ जल्दी से उसके' नजदीक बैठा…नब्ज टटोलो-चल रही थी ।

"हम तुझे मार भी तो नहीं सकते गधे…यदि तू न रहा तो दुनिया में हमेँ तुझ-सा दूसरा पाजी कहा मिलेगा?" अजीब--से स्वर में कहते हुए विजय ने उसे कंधे पर डाल लिया ।

रिवॉल्वर जेब में रखकर वह तेजी के साथ इमारत से बाहर निकल गया-उसके कंधे पर बेहोश पडा बेगुनाहों... का मसीहा अपना आखिरी काम नहीं का' सका था I

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होश आने पर विकास ने स्वय को भारतीय सीक्रेट. सर्विस के विशेष वार्ड में पाया-उसफी दोनों टागो और कंधे पर प्लास्टर चढा हुआ था ।

उसे होश में आता देखते ही सीर्कट सर्विस की नर्स भागती हूई. कमरे से बाहर चली गई-जब वह वापस आई तो उसके साथ डाक्टर और नकाब पहने ब्लेक व्वाय था जिसने आत्ते ही कहा-"मुब्रारक हो मिस्टर विकास-आपको सात दिन बाद होश आया हे हम सब लोग तो घबरा ही गए थे ।"

~ "स सात दिन?" विकास बुदबुदाया ।

"'जीं हा।" डाक्टर ने कहा ।

विकास के चेहरे पर अप्रियता और नफरत के भाव उभर आए बोला----" अंकल कहा हैं?"

" अपनी कोठी पर होगे…क्या उन्हें बुलाया जाए?"

"नहीं ।" विकास ने नफरत भरे स्वर में कहा…" उनसे सिर्फ इतना कह देना कि वे मुझे यहा ले तो आए, लेकिन रोक नहीं सकेंगे-क्रिसी दिन तो ये प्लास्टर कटेगे ही-उस दिन विकास फिर मजलिस्तान में होगा।"

"अब तुम्हें उसकी जरूरत नहीं पडेगी विकास ।"

विकास ने दृढ़ता पूर्वक कहा ---- "ज़रूरत है…उस वक्त तक जरूरत है जब तक कि....॥"

" मजलिस्तान आजाद हो चुका है विकास ॥"

"क क्या…कैसे ?" बिकास उछल पडा ।

"आपके सिरहाने इन सात दिनों के अखबार पडे हैं I” ब्लेक ब्वाॅय ने उनमें से एक अखबार उठाकर उसे देते हुए कहा…"इसे पढ लो…यह आज से दो दिन पहले का अखबार है ।”

बिकास ने जल्दी से अपने सही वाले हाथ से अखबार पकडा…मुख्य हैडिंग था---'जबरदस्त जन-आदोलन के बाद मजलिस्तान में नई सरकार की स्थापना-रक्त तिलक की सरदार मुमताज़ मजलिस्तान की नई राष्ट्रपति ।

नीचे थोडे बारीक शब्दों में लिखा था करामाती पपलेट का चमत्कार ।

विकास बुदबुदा उठा-- "तुमने तो सचमुच बिना सहारे के दौडकर दिखा दिया मुमताज ।"

"कहो शाहजहा प्यारे ।" कमरे में विजय की आवाज गूज उठी ।

THE END
 
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