• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

तीन बेटियाँ complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
निशा: पर…।

जगदीश राय: बेटी।।यह उम्र तुम्हारे घूमने के… मजा करने के है…खाना तो ज़िन्दगी भर बनाना है…इसलिए जाओ…और कल हाँ कर दो…मुझसे पैसे ले लेना।

निशा खुश होकर, वीर्य लगे गालो से, पापा को चूम ली।

जगदीश राय: पर।।बेटी…एक समस्या है…मेरे इसके क्या होगा…

जगदीश राय ने मुस्कुराते हुए अपने लंड की तरफ इशारा किया।

निशा: इसका …आप…।१५ दिन तक…आराम दीजिये…हाथ से भी नहीं करना ठीक है…।मैं जब आऊँगी तब आपको एक स्पेशल गिफ्ट दुँगी। तब तक यह मुझे तडपता हुआ खड़ा मिलना चाहिये।।।

जगदीश राय: अरे तुम तो यह ही कहोगी।।तुम्हारे टूर पर तो लड़के भी होंगे…क्यूँउउ…

निशा: धत। पापा…मैं तो आपके सिवा किसी को हाथ भी नहीं लगाने दूँगी…

निशा के इस जबाब से जगदीश राय कुछ सोचने लगा।

निशा उठकर बाथरूम चली गयी। और थोड़े देर बाद फ्रेश होकर , साफ़ होकर आयी।

वह नंगी खड़े होकर अपना बाल बनाने लगी।

जगदीश राय: बेटी…एक बात पूछ्ना चाहता हु…।

निशा: हाँ पापा पुछो।

जगदीश राय: बेटी।।तुम अपने पापा के साथ।।मेरा मतलब है…यह सब…यह संबंध।

निशा (सर झुकाते हुए): मैं समझ गयी पापा…

जगदीश राय: बेटी …मैं यह नहीं चाहता की ।।इसकी वजह से ।।तुम और लड़को को पसंद न करो।।मेरा क्या।।आज है कल नहीं…पर तुम्हे शादी करके एक विवाहित जीवन बीतानी है…मैं यह चाहता हु…

निशा: ओह ओह पापा…आप कहाँ चले गए…पापा , आपके साथ रास लीला रचाने के बाद ।।मुझे तो बल्कि फ़ायदा हुआ है…अब मैं अन्य लड़कियों की तरह लड़को को ताकती नहीं रहती…मैं अब लड़को से शरमाती भी नहीं… अब मैं लड़को को उनके क्वालिटीज़ के अनुसार परखती हूँ।…।

जगदीश राय: अच्छा…

निशा: तो अब बेफिक्र रहिये…मैं कोई घर बैठने वाली नहीं हूँ।।

निशा: और अब मेरे पढाई मैं भी मार्क्स अच्छे आने लगे है…क्युकी मैं लड़को और एडल्ट मूवीज से डिस्ट्रक्ट नहीं होती…

जगदीश राय यह सुनकर खुश भी हुआ और आश्चर्य चकित भी।

जगदीश राय: फिर तो…यह…अच्छी बात है… है न…

निशा (हँसते हुए): और नहीं तो क्या…।हे हे…मैं तो कहती हु…हर लड़की का पहला बॉय फ्रेंड उनके पापा होने चाहिये…हे हे

जगदीश राय: निशा को गोद में बिठा लिया। और हँसते हुए चूमने लगा।

 
ऑफिस के सभी लोग गपशप लड़ा रहे थे। पर जगदीश राय को सीट पर बैठना मुश्किल हो रहा था।

आज निशा को घर से गए हुए सिर्फ 2 दिन हुए थे। और जगदीश राय का जीना मुश्किल हो गया था।

ऑफिस में बैठा नहीं जा रहा था और घर में मन नहीं लगता था।

और जगदीश राय से बुरा हाल जगदीश राय के लंड का था। पिचले 2 महीनो से निशा लगातार लंड की सेवा करती थी।

जब निशा के महीने चल रहे होते, उस वक़्त भी निशा लंड को चूस चूस कर उसका रस निकालती।

और 2 दिन से लंड को निशा की प्यारी चूत और मुह की कमी महसूस हो रहा था। वह अब निशा को कॉलेज ट्रिप पर भेजने के फैसले से पछता रहा था।

जगदीश राय से मुठ भी नहीं मारा जाता। ऑफिस के औरतो को भी घूरता। उसे डर लगने लगा की ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही वह अपने नौकरी से हाथ धो बेठेंगा।

और आज तो उसकी हालत ज्यादा बुरा था। लंड पिछले 2 घण्टो से खड़ा था। और पूरी शरीर में गर्मी फ़ैली हुई थी।

जगदीश राय ने तुरंत एक सिक लेटर लिख दिया और पिओन के द्वारा अपने बॉस को भेज दिया। और बिना कुछ बोले और कहे, देरी हो जाने से पहले , वहां से निकल गया।

रास्तो की लड़कियो और औरतो को ताकते हुए वह घर पहुंचा। दोपहर के 2:30 बजे थे। आशा और सशा शाम के 4-5 बजे तक आयेंगे। तो उसके पास 2-3 घंटे है। उसने सोचा की किसी तरह मुठ मारकर खुद को थोड़ा आराम दे दे।

दरवज़ा खोलते ही , उसे ऊपर के कमरे से कुछ हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

जगदीश राय(मन में): अरे…यह क्या…आशा घर पर…इस वक़्त…

तभी जगदीश राय को आशा की मदहोश भरी सिसकियाँ और कुछ शब्द सुनाई दिए

आशा: ओह…।इट्स फीलस सो गुड…आहाहहह…।धीरे करो न…।हाँ वही…।आह…और…अंदर…

जगदीश राय आशा की यह आवाज़ सुनकर बुरी तरह चौक गया। वह भागा भागा ऊपर के कमरे की तरफ गया और तेज़ी से दरवाज़ा खोल दिया।

और अंदर का नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।

अंदर आशा पूरी नंगी खड़ी थी। वह बेड के किनारे खड़ी थी।

उसके बदन पे एक भी कपडा नहीं था पर उसने अपने वाइट शूज नहीं उतारे थे।

और आशा के बेड पर एक सांवला सा लड़का बैठा हुआ था। जो आशा की दाए चूचो को मुरा मुह में घूसा कर बेदरदी से चूस रहा था।

 
आशा तेज़ी से सिसकी ले रही थी। और लग नहीं रहा था की उसके साथ कोई जबरदस्ती की जा रही हो।

लडीके ने सिर्फ अपना शर्ट उतारा था।

और जगदीश राय ने देखा की वह पीछे आशा की गांड पर अपना बायाँ हाथ फेरकर अंदर बाहर कर रहा है। जिसकी वजह से आशा भी अपनी गांड और कमर खड़े खड़े आगे पीछे हिला रही है।

दोनो इतने मदहोश थे की दोनों की ऑंखें बंद थी। और उन्हें पता भी नहीं चला की जगदीश राय वहां खड़ा है।

जगदीश राय ने यह सब नज़ारा कुछ चंद सेकड़ो में देख लिया था।

और वह गुस्से से आग बबुला हो गया।

जगदीश राय (गुस्से में): आशा…।।यह क्या हो रहा है…मेरे घर में…यु बास्टर्ड …।कौन है तू…।।साला।

अचानक से हुए शोर से दोनों आशा और वह लड़का चौक गये। और अपने पापा को देखकर आशा चिल्लायी

आशा: पापा…ओह गॉड…।सॉरी पापा…।सॉरी…।हम यही…।।या गॉड

और आशा ने अपने हाथो से पास पड़े उसकी छोटी सी टीशर्ट से अपने चूचो और चूत को छिपाने का असफ़ल प्रयास किया।

जगदीश राय बहुत गुस्से में था। वह तेज़ी से उस लड़के के तरफ बढा। लड़का घबरा गया।

लडका: अंकल…सॉरी…मैं निकल रहा हु…अंकल…सॉरी सॉरी…।

इसके पहले की जगदीश राय कुछ करता लड़का बड़े ही फुर्ति से अपने शर्ट उठा कर वहां से दौड पडा।

जगदीश राय उसके पीछे भागा पर जब तक वह सीडियों से लड़खड़ाते निचे पंहुचा लड़का दरवाज़े से फ़रार हो चूका था।

 
आशा डरकर की उसके पापा कुछ कर न बैठे, नंगी पीछे भागी आयी, अपने टी शर्ट छाती में पकडे।

जगदीश राय ने उसे देखा और जा के दरवाज़ा बंद कर दिया, ताकि बाहर के लोग उसे नंगी न देखे।

आशा तुरंत अपने रूम की तरफ चल दी।

पुरी घर में सन्नाटा छाया हुआ था। जगदीश राय तेज़ी से सास ले रहा था। वह किचन में घूसकर एक गिलास पानी पी लिया और खुद को शांत करने की कोशिश की।

जगदीश राय (मन में): यह सब क्या हो रहा है…आशा की यह मज़ाल …।वह भी इतनी छोटी उम्र में पर मैं करू भी तो क्या…।

तभी जगदीश राय को निशा की बात याद आयी। जवान होने पर, बाप को बेटी का दोस्त बनना पड़ता है।

कोई 5 मिनट वही डाइनिंग टेबल के चेयर पर बैठने के बाद, वह फिर आशा की रूम की तरफ चला।

रूम का दरवाज़ा अभी भी खुला था। आशा अभी भी नंगी खड़ी थी। वह एक छोटी सी टीशर्ट अपने छाती से लिपटाये।

टी शर्ट इतनी छोटी थी की सिर्फ उसकी निप्पल और चूत के बीच का हिस्सा छुप रहा था और वो भी मुश्किल से।

जागदीश राय का ग़ुस्सा आशा को ऐसे देखकर थोड़ा सा ग़ायब हो गया।

जगदीश राय: यह सब …।कब से।।चल रहा है…ह्म्म्मम्म।

आशा चुप बैठी। सर झुकाये खडी थी।

जगदीश राय: बोलो…अब छुपाने की…जरूररत नहीं…कौन था वह हरामी…।बोलो…जल्दी।।

आशा: आप ग़ुस्सा मत होईये…मैं सब बताती हु…

जगदीश राय: अच्छा…।तो बोलो…

आशा: वह मेरा बॉयफ्रेंड है…हम ५ महीने से जानते है…एक दूसरे को…।

जगदीश राय: क्या…5 महीनो से चल रहा है यह सब…वह तुम्हारे स्कुल में पढता है? अभी जाता हु उसके बाप के पास…
 
आशा (थोडा मुस्कुराते): नहीं…वह तो काम कर रहा है…इंजीनियर है…उसकी पढाई सब हो गयी।।

जगदीश राय: मतलब।।वह स्टूडेंट नहीं है…और तुम उसके साथ…कहाँ मिला तुम्हे…बताओ…

सवाल पूछते हुए जगदीश राय आशा की नंगे शरीर को निहार भी रहा था। और धीरे धीरे उसके लंड पर प्रभाव पडने लगा।

आशा भी खूब जानती थी। इसलिए उसने भी जान बुझकर कपडे नहीं पहने।

और वैसे ही नंगी रहकर जावब दे रही थी। वह जान चुकी थी की पापा की नज़रे कहाँ कहाँ घूम रही है।

आशा: एक कॉमन फ्रेंड की ओर से…मेरी एक सहेली है…उसका कजिन भाई है वह…

जगदीश राय: पर तुझे शर्म नहीं आयी…यह सब करते हुए तेरी।।उमर ही क्या है…अगर इस उम्र में कुछ उच-नीच हो गया तो क्या होगा इस घर की इज़्ज़त का…सोचा कभी तूने…

आशा: पापा…मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे घर की इज़्ज़त को धक्का लग सके…बस थोड़ा सा मजा कर रही थी।

आशा ने यह कहते अपने हाथो से टीशर्ट ठीक किया और इसी बहाने अपने हाथो से अपने चूचे मसल दिए।

जगदीश राय यह देखकर हिल गया।

चूचे इतने मस्त आकार के थे की उसके मुह में पानी आ गया और लंड खड़ा होने लगा।

जगदीश राय (संभालते हुए):मम्म।।मज़ा…क्या यह मजा है…इसे मजा कहते है…

आशा (थोडा मुस्कुराते): और फिर क्या कहते है…जो आप और निशा दीदी करते है वह मजा नहीं तो और क्या है…

जगदीश राय , एक मिनट समझा नहीं की जो उसने सुना वह ठीक सुना या नही। वह दंग रह गया।

 
जगदीश राय:क्या…क्या।।बोल रही है तू…किस किस किसने कहा तुझसे यह सब।

आशा: इसमें कहने की क्या ज़रुरत है…यह दिवार क्या इतनी चौड़ी है की दीदी की चीखे और आपकी सिसकियाँ रोक सके…

अब ऐसा लग रहा था जैसे चोर कोतवाल हो डाट रहा हो।

जगदीश राय: तो क्या…तुम सब जानती हो…क्या तुमने हमे देखा भी…।

आशा: देखा भी और सुना भी… हाँ सब जानती हु…

जगदीश राय: मैं…मैं…वह बेटी…बस…।

आश: शुरू में , मैं भी आपकी तरह चौक गयी थी…पर फिर मुझे लगा की इस मौज में बुरा ही क्या है…

जगदीश राय: तो क्या।।तुमने हमे देखकर यह सब करना शुरू किया?

आशा: अरे नहीं…।मै तो इन सब में 4 महीनो से उलझी हूँ।।

आशा के बिन्दास जवाबो से जगदीश राय को थोड़ी हैरानी और थोड़ी चीढ़ भी आ रही थी।

आशा: क्या ।।अब आपको सब सवालो का जवाब मिला…

जगदीश राय: हा।।क्या तुम उससे और भी मिलेगी…तुम उससे नहीं मिल सकती…यह सब रोक दो…

आशा: अच्छा।।रोक देति हूँ…पहले आप भी वादा करो की आप और निशा दीदी सब रोक दोगे।…

जगदीश राय चुप हो गया।

जगदीश राय: वो।।बेटी…वह…सोचना…।

आशा: देखा पापा…कितना आसन है बोलना…पर सच कहो तो मुझे रोकने में आपसे ज्यादा आसानी है…

जगदीश राय: क्यों…क्या तुम उस लड़के से प्यार नहीं करती…

आशा: प्यार…अरे नहीं…मैं तो सिर्फ उसे इस्तमाल ही करती हु…क्या मैं अभी अपने कपडे पहन सकती हूँ।।।

 
आशा ने ऐसे पूछा जैसे वह नंगी खडी अपने पापा पे मेहरबानी कर रही हो।

जगदीश राय (भूखे नज़र मारते हुए): हाँ…पहन लो…

जगदीश राय को समझ नहीं आया की वह वहां से जाये या नही।

उसने आधे मन से दरवाज़े की तरफ कदम बढाया, पर आशा ने उसकी दिल की सुन ली।

आंसा: आप इतनी जल्दी कैसे आये…आप तो 5 बजे आते है न…

आशा ने टीशर्ट पहनते हुए पूछा।

जगदीश राय मुडा। और सामने आशा बिना कुछ शरम, अपने पापा के सामने चूचे और चूत दीखाते हुए टीशर्ट पहन रही थी।

जहां निशा की चूचे बहुत बड़े और मुलायम थे, आशा के कड़क और गोलदार। निप्पल भी भूरे थे। आशा सांवली होने के बावजुद, उसके सभी अंगो में सही पैमाने पर चर्बी थी।

जगदीश राय चूचो को देखता रहा , और जैसे ही चूचो और पेट का भ्रमण करके चूत की तरफ उसकी ऑंखें पहुंची, आशा ने तुरंत अपने हाथ से चूत को ढ़क लिया।

जगदीश राय के मुह से सिसकी निकल गयी। आशा मन ही मन अपने पापा पर हँस रही थी।

आशा: बताइये ना पापा…।जल्दी कैसे आ गए…

जगदीश राय: क्यों…अच्छा हुआ जल्द आ गया…वरना तुम्हारी यह करतूत देखने को कैसे मिलता।

जगदीश राय , झूठ का ग़ुस्सा दिखाने का असफल अखरी कोशिश करते हुये।

आशा: सो तो है…पर मेरा प्रोग्राम तो चौपट कर दिया न आपने

जगदीश राय, को आशा की बेशरमी और बदतमीज़ी पर चीढ आने लगा।

आशा (मुडते हुए): मेरा।।शरट्स…हम्म्म…हाँ यहाँ है…।

आशा के गोलदार, उभरी हुई गांड जगदीश राय के सामने थी।

और गांड के बीच में कुछ था जो जगदीश राय देखकर समझ नहीं पा रहा था।

आशा , शॉर्ट्स पहनने के लिए थोड़ा झुकी पर वह सफ़ेद चीज वहां से हिल नहीं रहा था। गौर से देखने पर , उस पर ख़रगोश का मखमल का बाल लगा हुआ था।

जगदीश राय: अरे…यह क्या है।।तुम्हारे पीछे…

आशा, ने तुरंत अपना शॉर्ट्स चढा लिया। अब वह टी शर्ट और एक बहुत छोटी शॉर्ट्स पहने खड़ी थी, और शॉर्ट्स के बटन डाल रही थी।

आशा: क्या पिताजी…

जगदीश राय: यह तुम्हारे पिछवाड़े पर…सफ़ेद सा…फर का…

आशा: अच्छा वह…वह मेरी …पूँछ है…
 
जगदीश राय (चौकते हुए): क्या…क्या है वह…पूछ? क्या पुंछ।

आशा,अपने बुक्स उठाते हुए…

आशा: पूँछ मतलब…पूँछ…टेल है मेरी…

जगदीश राय: टेल…टेल तो जानवारो का होता है…इंसानो को कहाँ…।

आशा: मैं भी तो जानवर हु…रैबिट हु मैं…खरगोश ।

जगदीश राय: क्या…क्या पागलपन है यह…

आशा: पापा…आप समझेंगे नहीं…इसलिए आप रहने दीजिये…मुझे अब पढाई करनी है।।

जगदीश राय: अरे…क्या समझना है…तुम कुछ चिपका रखी हो…अपने गाँड में।।मेरा मतलब…पिछवाड़े पर…और कहती हो की तुम रैबिट हो…

आशा: हाँ बिलकुल…मैं ख़ुद को रैबिट की तरह महसूस करती हु…उछलती कूदती खरगोश…हे हे।।

जगदीश राय: अच्छा…

आशा: और मैंने उसे चिपका नहीं रखी है…घुसा रखी है अपने अंदर…

जगदीश राय (चौकते हुए): क्या…।तुमने कहाँ घूसा रखी है…?

आशा: अपनी गांड में…और कहाँ…

जगदीश राय , आशा की मुह से गांड शब्द सुनकर भी अनसुन्हा कर दिया, क्युकी वह जो यह सुन रहा था वह यकींन नहीं कर पा रहा था।

जगदीश राय, चौक कर, वही चेयर पर बैठ गया।

जगदीश राय: तो…।क्या…तुम…उसे बाहर निकालो…क्या उस लड़के ने तुम्हारे अंदर घुसाया…

आशा: अरे नहि।।यह बाहर नहीं आता…पुरे दिन मेरे अंदर ही रहता है।।यह मेरे शरीर का एक भाग है…जैसे मेरी हाथ पैर वैसे ही…

जगदीश राय: पुरे दिन।।तुम।।इसे अपने अंदर रखती हो…कभी बाहर नहीं निकालति।।???

आशा: बस सिर्फ नहाते वक़्त और ओफ़्कोर्स लैट्रिन जाते वक़्त।

जगदीश राय: मतलब स्कूल…टयुशन…सोते समय…हर वक़्त अंदर रहता है…

आशा (मुस्कुराते हुए): हाँ…हर वक़्त…मेरी गांड को सहलाते रहता है…

जगदीश राय , कुछ वक़्त के लिए चूप हो जाता है।

सभी जानते थे की आशा थोड़ी विचित्र है, पर इतनी सनकी हुई है आज जगदीश राय को मालुम हुआ।

और वह जानता था की अब मामला हाथ से निकल चूका है।

आशा, अपने पापा की यह हालत, बड़ी ही शीतल स्वाभाव से देखते रहती है।

जगदीश राय: यह…कब से…

आशा: यहि कोई 4 महीने से…पहले थोड़े समय के लिए रखती थी…पर अब तो हर वक़्त मेरे शरीर का हिस्सा बन चूका है।।

जगदीश राय के मन में हज़ार सवाल आ रहे थे, पर उसे पता नहीं चल रहा था की कहाँ से शुरू करे।

जगदीश राय: तुम स्कूल मैं बैठती कैसे हो…

आशा: आराम से…टेल का बाहर का हिस्सा मुलायम रैबिट के खाल से बना हुआ है। तो स्कर्ट से बाहर भी नहीं आती और आराम से बैठ पाती हूँ। शुरू शुरू में तो तक्लीक होती थी। हर घन्टे में टॉइलेट जाकर ठीक करना पड़ता था।।हे हे।।पर अब कोई प्रॉब्लम नहीं होती।।

जगदीश राय: पर…पर…तुम्हे यह मिला कहाँ से…किसने बताया…और क्यों…

आशा: मेरी एक फ्रेंड है लवीना, वह अपने दीदी को मिलने अमेरिका गयी थी। वहां से ले आयी। हम दोनों रैब्बिटस है।

 
जगदीश राय: तुम्हारी उस ब्यॉफ्रेंड लड़के को भी पता है…उससे कोई प्रॉब्लम नहीं है इसमें…

आशा (हँस्ती हुए): प्रॉब्लम…हा ह।।वह तो मरा पडा रहता है।।टेल को देखने के लिए…एक बार अपनी गांड दिखा दूँ तो पागल हो जाता है। कभी कभी उससे खेलने देति हूँ उसे।

आशा की यह बेशरमी बात सुनकर अब जगदीश राय कुछ गरम होने लगा था और लंड पर प्रभाव पड रहा था।

आशा , अपने पापा को बोतल में उतार चुकी थी।

जगदीश राय (गरम होकर): ठीक है…वैसे मुझे यह सब पसंद नही।।बंद कर दो यह सब…अच्छा नहीं है यह…

आशा: क्या अच्छा नहीं है…आपने कहाँ देखा मेरे टेल को…देखेंगे?

जगदीश राय: अब…।नही…।हा…ठीक है…।दिखाओ…अगर।।तुम…

इसके पहले जगदीश राय अपनी बात ख़तम करता आशा पापा के सामने खड़ी हो गयी। और पीछे मुडी

और अपने गाण्ड पर से शॉर्ट्स निचे सरका दिया।

ईद के चाँद की तरह, अपने पापा के सामने आशा की गोलदार गांड खिलकर आ गई।

आशा: यह देखिये…

गांड के बिचो बीच, गालो को चिरते हुई, ख़रगोश के पूँछ के जैसे एक पूँछ , निकल कर बाहर आ रहा था।

इतनी चिपककर घूसा हुआ था की गांड का छेद दिखाई नहीं दे रहा था।

जगदीश राय का लंड पुरे कगार में खड़ा हुआ था।

आशा , बड़ी ही नज़ाकत से चेहरा घूमाकर, अपने पापा के ऑंखों में देखी। उसे पापा के पेंट में से खड़ा लंड साफ़ दिखाई दे रहा था।

निशा को चोदते हुए पापा का लंड वो कई बार देख चुकी थी। और वह उसका आकर जानती थी।

आशा: कैसी है …पापा…कुछ बोलो तो…बस यूही ताक़ते रहोगे।।?

जगदीश राय , अपने गले से थूक निगलती हुयी।

 
जगदीश राय: अच्छी है…।ठीक है…

आशा: आप चाहे हो पूँछ को छु सकते हो।

काँपते हाथो से जगदीश राय, आशा के गांड के तरफ ले गया।

जगदीश राय (मन में): नहीं जगदीश…क्या।।कर रहा है तू…नहीं…रुक ज।।आशा नासमझ है…

पर लंड के सामने न दिल न दिमाग की बात न सुनी।

आशा को तुरंत अपने गाण्ड पर प्रभाव महसूस हुआ। और वह समझ गई की पापा अपने हाथो से उसके पूँछ को सहला रहे है।

जगदीश राय , को आश्चर्य हुआ की , पूँछ कितनी टाइट गांड में फँसी है। क्युकी बिच में, उसने पूँछ को धीरे से खीचा पर , पूँछ अपनी जगह से हिली भी नही।

आशा: बाहर नहीं निकलेगी।।ऐसे…अंदर 2 इंच का मोटा गोलदार भाग उसे अंदर ही रखता है।

आशा की गांड इतनी मादक और कोमल लग रही थी, की जगदीश राय से रहा नहीं जा रहा था। और उस मादक गांड से निकलती हुई पूँछ , उसे और मादक बना रही थी।

जगदीश राय ने तुरंत अपना हाथ पूँछ से निकालकर गांड पर रख दिया , और गाण्ड को दबा दिया।

आशा ने तुरंत , अपनी शॉर्ट्स ऊपर कर ली।

आशा (लंड की तरफ इशारा करते हुए): पापा…अब आप नॉटी बॉय बन रहे है…निशा दीदी की बहुत याद आ रही है क्या…हे हे।

जगदीश राय अपने इस करतूत से थोड़ा शर्माया ।

जगदीश राय: सोर्री।।।वह बस…नहीं…ठीक है तूम पढाई करो…मैं…

आशा: अरे सॉरी क्यों…मैं जानती हूँ।।ऐसे टेल से सजा हुआ गांड तो किसी को भी पागल कर सकता है।

जगदीश राय, अपने लंड को हाथो से सम्भालते हुये, मुस्कुराते हुये, रूम से निकल जाता है।

कमरे से निकल कर , अपने रूम में घूसने से पहले ही जगदीश राय अपना लंड हाथ में लिए हिलाना शुरू कर दिया।

दिमाग पर आशा की गांड और उसमे घूसि हुई पूँछ

और निशा की यादें, लंड को झडने से रोकने वाले नहीं थे।

निशा की चूत और आशा की गांड दोनों सोच सोचकर, जगदीश राय ने ऐसा जोरदार मुठ निकाला की झरते वक़्त वह चीख़ पडा।

कुछ 2 घन्टे बाद जब जगदीश राय निचे हॉल में आया, आशा वही किचन में चाय बना रही थी।

उसने अपने कपडे चेंज कर लिए थे। एक टाइटस और सलवार पहनी थी।

जगदीश राय की नज़र उसकी गांड पर गयी, और आंखें ख़रगोश वाली पूँछ को ढून्ढने लगी।

आशा: क्या देख रहो हो पापा।।

जगदीश राय: नही।।कही।।बाहर जा रही हो।।

आशा: हाँ यही बुकशॉप तक…कुछ बुक्स लेने हैं…पैसे चाहिये होंगे…यह लिजीये चाय…

जगदीश राय और आशा दोनों एक दूसरे के सामने बैठकर चाय पीने लगे।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था।

जगदीश राय , दोपहर की घटनाओ के बारे में सोच रहा था। और खास कर आशा की पूँछ और गांड के बारे में।

आशा के चेहरे पर कोई भाव नज़र नहीं आ रहा था। वह बस एक ही भाव से अपने पापा को देखे जा रही थी।

आशा की यह दिल चीरने वाली नज़र से जगदीश राय सोफे में करवटें लेने लगा।

जगदीश राय( मन में): क्या वह अभी भी गांड में घुसायी रखी होगी…नही।।देखो कितनी आराम से बैठी है…आराम से कोई ऐसे बैठ सकता है…गांड में लिये।

पर वह आशा से पुछने की हिम्मत नहीं जूटा पा रहा था।
 
Back
Top