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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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मैंने दीदी की फुद्दी से लण्ड निकाला और झरना की फुद्दी में पेल दिया।

झरना- बैंक यू भाभी।

दीदी- “अरी पगली, बैंक यू की क्या बात है? मेरी फुद्दी का रस निकल चुका है, भैया पेले जा रहे हैं। तकलीफ हो रही थी... तुझे मजा मिलेगा...”

झरना चूतड़ उछालते हुए- हाँ... वो बात तो है। भाभी मजा तो आता ही है चुदवाकर.. और रामू भैया के लण्ड से... वाह वाह क्या बात है”

सासूमाँ- अरे... पर रामू के लण्ड से पानी क्यों नहीं निकल रहा है? बेचारा पशीने-पशीने हो गया पर लण्ड नहीं थक रहा है?

दीदी- भूल गई अम्मा... आपने इनके खाने में वियाग्रा की टैबलेट जो मिला दी थी।

सासूमाँ- “अरे हाँ बहू.. तो क्या मैं भी रुकू? झरना के थकने तक..”

मैं- “नहीं सासूमाँ, मेरा भी निकलने ही वाला है...”

दीदी- ठीक है भैया... गुड नाइट स्वीट ड्रीम... चलो सासूमाँ, झरना आ जाएगी... झरना, चुदाई के बाद कमरे में आ जाना। कहीं और एक बार के चक्कर में नहीं रुक जाना, भैया को आराम करने देना। फिर कल फिर से इनके लण्ड से मेहनत करवानी है ना?

झरना- “हाँ हाँ भाभी... कल मेरा एग्ज़म दोपहर तक हो जाएगा... उसके बाद मेरा नंबर रहेगा... ठीक है...” सासूमाँ- “ठीक है बेटी, तेरे कालेज से आते ही तेरा नंबर... ठीक है? झरना- बस बस भैया... मेरा निकल रहा है... निकल रहा है... मैं तो गई।

मैं- “मेरा भी निकल रहा है झरना दीदी... निकला, निकला...”

हम दोनों पशीने-पशीने हो गये थे और एक दूसरे से लिपट गये थे।

 
दो मिनट के बाद.. दीदी- झरना, उठो भाई.. क्या फिर से चुदवाने का इरादा है?

झरना- “नहीं नहीं... अच्छा भैया, गुड नाइट मेरे खयाल से सुबह तो आप देर तक सोएंगे... मैं तो सुबह ही कालेज चली जाऊँगी। दोपहर को मिलते हैं.. ठीक है मेरा राजा?” (झरना मेरे लण्ड को चूमते हुए बोली।)

दीदी- लण्ड को मत चूम मेरी प्यारी ननद। कहीं फिर से ना खड़ा हो जाए?

झरना- सारी सारी... गुड नाइट।

मैंने भी सबसे गुड नाइट कहा और इस बार सचमुच में सो गया।

* * * * *

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दूसरे दिन के सुबह दस बज चुके थे। मैं उठकरके फ्रेश होकर नाश्ते के टेबल की ओर बढ़ा। नाश्ते की टेबल पे सासूमाँ और दीदी ने स्वागत किया।

मैं- गुड मार्निग सासूमाँ... गुड मार्निग दीदी... जीजू और झरना दिखाई नहीं दिए?

दीदी- झरना तो कालेज गई अपना एग्ज़ैम देने, और तेरे जीजू आफिस गये।

सासूमाँ- “पता है बेटे, आज सुबह मेरे बेटे से ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। नाश्ते की टेबल पे भी ठीक से बैठा नहीं जा रहा था। बोल रहा था कि साले ने मेरी गाण्ड की बुरी तरह पुंगी बजा के रख दी...”

मैं- “तो मैंने थोड़े ही कहा था पुंगी बजवाने को? वही खुद आए थे... आ बैल मुझे मार कहने को...”

दीदी- तो भैया... हम दोनों सास बहू तो तैयार हैं अपनी-अपनी पुंगी बजवाने को... क्यों सासूमाँ?

सासूमाँ- हाँ हाँ... हम दोनों ही तैयार हैं... पर सिर्फ आगे वाली पुंगी ही बजवाएंगी कहे देती हूँ.. लो पहले नाश्ता कर लो... ठीक है?

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साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
हम तीनों इसी तरह बातें करते हुए नाश्ता कर रहे थे की मेरे मोबाइल की घंटी बजी... सासू माँ के बगल में होने के कारण उन्होंने फोन उठा लिया... फोन का स्पीकर ओन कर दिया ताकी मुझे भी सुनाई दे।

सासूमाँ- हेलो।

कविता- जी मैं कविता बोल रही हूँ... ये रामप्रसाद मस्ताना का ही नंबर है ना... आप कौन बोल रही हैं?

सासूमाँ- मैं उसकी सासूमाँ बोल रही हूँ।

कविता- नमस्ते... पर उन्होंने कल तो बताया था की वो कुंवारे हैं।

सासूमाँ- मैं असल में उनकी बहन की सास हूँ... वैसे आप कहाँ से बोल रही हैं?

कविता- “जी नागपुर से ही गंगा जमुना। अपार्टमेंट...” इतना सुनना था की सासूमाँ गुस्से से तमतमा गई... मेरे प्रिय पाठकों आप लोग निश्चित रूप से जानते होंगे की नागपुर में गंगा जमुना कहके रेड लाइट एरिया है।

सासूमॉ- गंगा जमुना से... साली रंडी कुतिया कहीं की... तेरी हिम्मत कैसे हो गई फोन करने की? तुम्हें ये नंबर दिया किसने? अरे रंडी... मेरा रामू बेटा तो नासमझ है.. पर तू तो रंडी समझदार है... साली कल चुदाई के टाइम कंडोम लगाया था की नहीं?

कविता- लेकिन... आप सुनिए तो?

सासूमाँ- खबरदार... इस नंबर पे दुबारा फोन किया तो?

कविता- लेकिन, आप मेरी बात तो...

सासूमाँ- “चुप साली चुप और फोन रख...” और सासूमाँ ने फोन रख दिया। गुस्से से उनका चेहरा लाल हो चुका था। फोन रखने के बाद वो मेरे तरफ मुड़ी- ये सब क्या है बेटे? मैं क्या सुन रही हूँ? तुम रंडी के पास गये थे? अरे घर में चार-चार जवान फुद्दी होते हुए क्यों गये बेटे? इन रंडियों के पास ऐसा क्या है जो हमारी फुदियों में नहीं है? रंडियों की फुद्दी में दोनों हाथ एक साथ घुसाके तुम ताली बजा सकते हो... हमारी फुदियों में एक साथ चार उंगली ना घुसे... बस यही फर्क है ना बेटे। और क्या फर्क है बता?

 
मैं- अरे सासूमाँ... मैं नहीं गया... कहीं।

दीदी- तो फिर ये फोन?

तभी फोन की घंटी फिर से बज उठी... अबकी बार दीदी ने उठाया, स्पीकर ओन था।

दीदी- हेलो...

सविता- हेलो... हाँ जी कौन बोल रही हैं?

दीदी- अरे फोन आपने लगाया है तो पहले आप बोलो। आप कौन बोल रही हैं?

सविता- जी... मैं सविता... गंगा जमुना अप...

दीदी- अच्छा... पहले कविता... अब सविता?

सविता- अच्छा, तो कविता दीदी का भी फोन आया था?

दीदी- अच्छा तो वो रंडी तेरी बहन है?

सविता- “देखिए थोड़ा तमीज से बात करें... हम इज्ज़त-दार..."

दीदी- अच्छा... रंडियन भी इज्ज़तदार और खानदानी होने लगी... अब?

सविता- “देखिए आप गलत समझ रही हैं..."

दीदी- “कुछ गलत नहीं... चल फोन रख... वरना टेलिफोन में घुसकरके मैं उधर आकर तेरी बुर में डंडा घुसेड़ देंगी की फिर किसी लण्ड से चुदवाने लायक ना रहेगी...”

सविता- बुर मतलब?

दीदी- “साली रंडी होकर बुर का मतलब नहीं जानती? बुर का मतलब होता है फुद्दी... चूत... अग्रेजी में कहते हैं कंट... वेजाइना...”

सविता... ओहह... सारी सारी... मुझे पता नहीं था... और ये लण्ड का मतलब?

 
दीदी- “लण्ड का मतलब भी तुझे समझाना पड़ेगा? लण्ड का मतलब होता है लड़के की बड़ी साइज की नूनी... उसे लण्ड कहते हैं... कोई-कोई लौड़ा भी कहते हैं... अग्रेजी में पेनिस कहते हैं... कल तूने चुदवाया तो था ना भैया से... अपनी चूत। बुर में मेरे भाई का लण्ड घुसवाया तो था...”

सविता- “अरे नहीं नहीं... मैं अभी तक अनचुदी हूँ... कुँवारी कन्या हूँ..”

दीदी- “अच्छा... तो तू नहीं तो तेरी बहन ने चुदवाया होगा मेरे भाई के बारह इंची लौड़े से..”

सविता- क्या? क्या आपके भाई का बारह इंची लौड़ा है? हे भगवान्... किसी लड़की को चोदेगा तो वो बेहोश ना हो जाए?

दीदी- अच्छा... कल तेरी रंडी बहन क्या नाम बताया था?

सविता- “कविता दीदी...”

दीदी- हाँ कविता... कविता दीदी तेरी कल बेहोश नहीं हुई क्या?

सविता- “नहीं तो...”

दीदी- बेहोश कैसे होगी? रंडी जो ठहरी।

सविता- देखिए... आप जो समझ रही हैं, गलत समझ रही हैं?

दीदी- गलत समझ रहीं हैं?

सविता- लीजिए मेरी बड़ी बहन बबीता दीदी से बात करिए... वो आपको ठीक से समझा पाएंगी। और मैं स्पीकर ओन कर रही हूँ ताकी मैं भी सुन पाऊँ कि आप क्या बोल रही हैं?

दीदी- “दे दे... अपनी उस रंडी बहन को भी दे। जो कल मेरे भाई के बारह इंची लण्ड से चुदी है...”

बबीता- “नमस्ते दीदी...”

दीदी- नमस्ते... ओह... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे दीदी कहने की? मैं तुम्हारी तरह रंडी नहीं हूँ जो गंगा जमुना एरिया में बैठकरके अपनी चूत सबको बेचे?

बबीता- “ओहह... सारी दीदी... लगता है आपको कुछ गलतफहमी हो गई...”

दीदी- क्या गलतफहमी?

बबीता- “हम गंगा जमुना में रहते जरूर हैं, पर रेड लाइट एरिया में नहीं... हमारे अपार्टमेंट का नाम गंगा जमुना है, और हमारी कम्पनी में कल आपके भाई रामप्रसाद मस्ताना इंटरव्यू देने आए थे...”

दीदी- क्या? क्या कहा आपने? इंटरव्यू देने गये थे... ओहो... सारी सारी बहन जी... और मैंने गुस्से में न जाने आप तीनों बहनों को... क्या से क्या कह दिया। पर आपको बताना तो चाहिए था?

 
बबीता- हमने कोशिश तो की थी दीदी... पर आप लोग हमारी कहाँ सुन रहे थे। आप तो... बस.. वैसे, क्या सचमुच आपके भाई का लण्ड... मेरा मतलब है पेनिस बारह इंची का है?

दीदी- “हाँ... पूरा बारह इंच का है... पर उसके लिए सारी...” दीदी फिर बोली- अच्छा अच्छा... तो अपने फोन कैसे किया?

बबीता- “वो हमारी माताश्री रामप्रसाद मस्तनाजी से कुछ बातें करना चाह रही थीं... कल मेरी माँन आफिस में इंटरव्यू के समय नहीं थीं...”

दीदी- लीजिए मेरी सास कुछ बातें करना चाहती हैं।

सास- “आई आम वेरी वेरी सोरी बेटा... कुछ गलतफहमी के कारण मुझसे गालियां निकल गई...”

बबीता- “कोई बात नहीं अम्माजी, लीजिए मेरी माँ से बात कर लीजिए...”

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कन्फ्यू जन ही कन्फ्यू



सासूमॉ- नमस्कार बहन जी।।

बबीता की माँ (सुमनलता)- नमस्कार बहन जी... और कैसे हैं?

सासूमाँ- बहुत ही अच्छे और आप?

सुमनलता- बस बहन जी। चल रहा है, जाये जैसे तैसे। कल बबीता, कविता, सविता मेरी तीनों बेटियां ही बोल रही थी की रामप्रसाद की बहन की सास बहू अच्छी हैं।

सासूमाँ- अरे बहनजी, पर उनसे तो मैं मिली ही नहीं हूँ। और आज सुबह-सुबह पंगा अलग से हो गया। मैंने गलफहमी में आकर उनको बहुत ही गंदी-गंदी गलियां दे दी। आइ एम सारी बहनजी। मुझे प्लीज माफ कर दें।

सुमनलता- कोई बात नहीं दीदी... ओहह... बहनजी, क्या मैं आपको दीदी बोल सकती हैं?

सासूमाँ- क्यों नहीं बहनजी। फिर मैं भी आपको दीदी ही कहूँगी, ओके? हाँ तो दीदी, आप लोगों का क्या बिजनेस

सुमनलता- हमारा क्या है दीदी? बस चू-दाने का बिजनेस है। मस्त चल रहा है हमारा ये बिजनेस।

सासूमॉ- अरे बहनजी क्या बात कर रही हैं? चुदाने का बिजनेस?

सुमनलता- हाँ हाँ... बहनजी। चू-दाने का बिजनेस। क्या आपको चू- दाना अच्छा नहीं लगता?

सासूमाँ- चुदाना किसको अच्छा नहीं लगता है दीदी। मुझे तो चुदाना बहुत ही अच्छा लगता है। मेरी बहू और बेटी को भी चुदाना बहुत ही अच्छा लगता है।

 
सुमनलता- मुझे भी दीदी चू- दाना बहुत ही अच्छा लगता है। मेरी तीनों बेटियों को भी चू- दाना बहुत ही अच्छा लगता है। बचपन से ही।

सासूमाँ- क्या बात कर रही हैं दीदी। उनको भी चुदाना अच्छा लगता है?

सुमनलता- हाँ हाँ... दीदी। वो तीनों तो बचपन से ही चू-दाने की शौकीन हैं।

सासूमाँ- छी... छी... छी... बहनजी। पर उनकी तो अभी तक शादी भी नहीं हुई है।

सुमनलता- पर दीदी... चू-दाने के शौकीन होने में और शादी में क्या लिंक है?

सासूमाँ- वो तो है दीदी। मैं भी शादी से पहले चुदाने की शौकीन थी। और मेरी बेटी भी चुदाने की बहुत बड़ी शौकीन है।

सुमनलता- “याने दीदी आपने माना की चू-दाने के सभी शौकीन होते हैं। इसमें उमर का कोई बंधन नहीं है। मेरी अस्सी साल की सास भी चू-दाने की बहुत शौकीन हैं। बिना चू-दाने के उन्हें रात को नींद ही नहीं आती...”

ये सब बातें मैं और दीदी भी सुन रहे थे। मैं और दीदी मजे ले लेकर बातें सुन रहे थे। सासूमाँ और सुमनलता जी जो कविता, बबीता, और सविता की माँ भी हैं। पहले मुझे कुछ कन्फ्यू जन हो रहा था अभी मालूम पड़ा की कल जिन तीन खूबसूरत हसीनाओं ने मेरा इंटरव्यू लिया था। ये वही तीनों हैं। दीदी अपने हाथ को मेरी जांघों । पर फिरा रही थीं तो मैं भी अपने हाथ को उनकी जांघों के ऊपर सहला रहा था। इधर सासूमाँ और सुमनलता के बीच बातचीत जारी थी।

सासूमाँ- दीदी, आपकी अस्सी साल की सास चुदाने की बड़ी शौकीन हैं। पर दीदी, आपके ससुर?

सुमनलता- उनको गुजरे दस साल हो गये हैं दीदी।

सासूमाँ- तो अब... आपकी सास?

सुमनलता- वो पहले तो थोड़ा सा उदास रही। पर थोड़े दिन के बाद वो और उनका चू- दाना। सुबह चू- दाना, दोपहर चू- दाना, शाम को चू- दाना और फिर रात को भी चू- दाना। यही उनकी रुटीन रह गई है अब तो।

 
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