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ससुर- क्या बात करती है? मुन्ने की अम्मा। मैं और बहू के साथ? मैं... नहीं... अच्छा चलो... पर मैं ऐसा करूं तो तुझे बुरा नहीं लगेगा?
मैं- बिल्कुल भी नहीं। बल्कि मैं तो चाहती हूँ की आप बहू के साथ ऐसा करें।
ससुर- पर... क्यों मुन्ने की माँ?
मैं- वो इसीलिए मुन्ने का बाबू की मैंने अपने बेटे का लण्ड देखा है।
ससुर- अरे, तूने कैसे देख लिया बेटे के लण्ड को, तुझे शर्म नहीं आई?
मैं- अरे, आप भी ना... मैं उसकी माँ हूँ। बचपन से देखते आ रही हूँ। मेरे बेटे का लण्ड है छोटा... आपके साइज से चौथाई भी नहीं है। उससे बड़ा तो हमरे छोटे बेटवा का है।
ससुर- हाँ... वो तो है।
मैं- इधर आप इतने बड़े चोदू हैं की क्या बताऊँ? मैं आपको संतुष्ट नहीं कर पाती हैं। इसीलिए मैंने अपनी बहन को अपने पास रखा था, ताकी वो आपको संतुष्ट कर सके। और मैं हर पंद्रह दिन में आपसे चुदवाती थी ताकी मेरी भी आदत बनी रहे।
ससुर- तो क्या? तुम्हें मेरे और साली के बारे में?
मैं- अरे, जब मैंने ही उसे आपसे चुदवाने के लिए बुलाया था तो कैसे पता नहीं चलता?
ससुर- पर मेरी साली मुझसे चुदवाने के लिए तैयार कैसे हो गई?
मैं- अरे, वो गाँव में किसी ने उसे चोद दिया। चुदाई का चस्का लग ही चुका था। बाहर मुँह काला ना करे इसीलिए मैंने ही उसे अपने पास रख लिया था। जिससे शादी होने तक उसकी चूत की खुजली भी मिटती रही। आपके लण्ड की प्यास भी बुझती रही। और मेरी फुद्दी भी आपके विशाल लण्ड की चुदाई से फटने से बची रही।
(पाठक सोच रहे होंगे की मैं, उनकी बहू... मुझे कैसे पता चला? अरे जब, मैं सास की मालिश कर रही थी ना... तो उनको उत्तेजित करके उनके मुँह से सब उगलवा लिया।)
ससुर- अरे वाह... मुन्ने की अम्मा, मन गये तोहार दिमाग को। पर अब ये बहू वाला क्या चक्कर है?
मैं- अरे, आप भी ना... देखो, एक तो बेटे का लण्ड छोटा। ऊपर से रविवार को ही आता है। भरी जवानी, कहीं बहू के कदम बहक गये, और इधर-उधर मुँह मार लिया तो तन्निक सोचो कि कितनी बदनामी होगी। हम किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। इससे तो अच्छा है आप ही बहू के साथ?
ससुर- पर... क्या बहू मान जाएगी?
सास- वो... सब आप मुझपे छोड़ दो। बस.. अब लण्ड घुसा दो।
ससुर- ये ले मेरी जान।
मैं- देखकर घुसाना, बहुत बड़ा है आपका लण्ड। कर ना देना मेरी फुद्दी को खंड बिखंड।
ससुर- अरे, बड़े प्यार से चोदूंगा। पर... ये क्या मुन्ने की अम्मा... तेरी फुद्दी की झाँटें सब कहाँ गई? पूरा मैदान सफाचट है।
मैं- अरे रे... मैं तो आपको कहना ही भूल गई। वो बहू ने मेरी झांटों को देखा और मेरे मना करने के बावजूद उसने साफ कर दिया। आपको अच्छा नहीं लगा?
ससुर- अरे, क्या बात करती हो मुन्ने की अम्मा। बड़ी ही प्यारी और खूबसूरत लग रही है तेरी चूत। जी करता है। चुम्मी दे दें।
मैं- तो मना किसने किया। चुम्मी दे दो, चूस भी लो।
ससुर- “अरे वाह... आज तो खूब मेहरवान हो रही है मुन्ने की माँ। मजा आ गया...”
मैं (चम्पारानी)- हाय... मुन्ने के बाबूजी। धीरे-धीरे घुसाना अपने लण्डराज को मेरी बिल के अन्दर। बहुत दिनों से चुदी नहीं हूँ।
मैं- बिल्कुल भी नहीं। बल्कि मैं तो चाहती हूँ की आप बहू के साथ ऐसा करें।
ससुर- पर... क्यों मुन्ने की माँ?
मैं- वो इसीलिए मुन्ने का बाबू की मैंने अपने बेटे का लण्ड देखा है।
ससुर- अरे, तूने कैसे देख लिया बेटे के लण्ड को, तुझे शर्म नहीं आई?
मैं- अरे, आप भी ना... मैं उसकी माँ हूँ। बचपन से देखते आ रही हूँ। मेरे बेटे का लण्ड है छोटा... आपके साइज से चौथाई भी नहीं है। उससे बड़ा तो हमरे छोटे बेटवा का है।
ससुर- हाँ... वो तो है।
मैं- इधर आप इतने बड़े चोदू हैं की क्या बताऊँ? मैं आपको संतुष्ट नहीं कर पाती हैं। इसीलिए मैंने अपनी बहन को अपने पास रखा था, ताकी वो आपको संतुष्ट कर सके। और मैं हर पंद्रह दिन में आपसे चुदवाती थी ताकी मेरी भी आदत बनी रहे।
ससुर- तो क्या? तुम्हें मेरे और साली के बारे में?
मैं- अरे, जब मैंने ही उसे आपसे चुदवाने के लिए बुलाया था तो कैसे पता नहीं चलता?
ससुर- पर मेरी साली मुझसे चुदवाने के लिए तैयार कैसे हो गई?
मैं- अरे, वो गाँव में किसी ने उसे चोद दिया। चुदाई का चस्का लग ही चुका था। बाहर मुँह काला ना करे इसीलिए मैंने ही उसे अपने पास रख लिया था। जिससे शादी होने तक उसकी चूत की खुजली भी मिटती रही। आपके लण्ड की प्यास भी बुझती रही। और मेरी फुद्दी भी आपके विशाल लण्ड की चुदाई से फटने से बची रही।
(पाठक सोच रहे होंगे की मैं, उनकी बहू... मुझे कैसे पता चला? अरे जब, मैं सास की मालिश कर रही थी ना... तो उनको उत्तेजित करके उनके मुँह से सब उगलवा लिया।)
ससुर- अरे वाह... मुन्ने की अम्मा, मन गये तोहार दिमाग को। पर अब ये बहू वाला क्या चक्कर है?
मैं- अरे, आप भी ना... देखो, एक तो बेटे का लण्ड छोटा। ऊपर से रविवार को ही आता है। भरी जवानी, कहीं बहू के कदम बहक गये, और इधर-उधर मुँह मार लिया तो तन्निक सोचो कि कितनी बदनामी होगी। हम किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। इससे तो अच्छा है आप ही बहू के साथ?
ससुर- पर... क्या बहू मान जाएगी?
सास- वो... सब आप मुझपे छोड़ दो। बस.. अब लण्ड घुसा दो।
ससुर- ये ले मेरी जान।
मैं- देखकर घुसाना, बहुत बड़ा है आपका लण्ड। कर ना देना मेरी फुद्दी को खंड बिखंड।
ससुर- अरे, बड़े प्यार से चोदूंगा। पर... ये क्या मुन्ने की अम्मा... तेरी फुद्दी की झाँटें सब कहाँ गई? पूरा मैदान सफाचट है।
मैं- अरे रे... मैं तो आपको कहना ही भूल गई। वो बहू ने मेरी झांटों को देखा और मेरे मना करने के बावजूद उसने साफ कर दिया। आपको अच्छा नहीं लगा?
ससुर- अरे, क्या बात करती हो मुन्ने की अम्मा। बड़ी ही प्यारी और खूबसूरत लग रही है तेरी चूत। जी करता है। चुम्मी दे दें।
मैं- तो मना किसने किया। चुम्मी दे दो, चूस भी लो।
ससुर- “अरे वाह... आज तो खूब मेहरवान हो रही है मुन्ने की माँ। मजा आ गया...”
मैं (चम्पारानी)- हाय... मुन्ने के बाबूजी। धीरे-धीरे घुसाना अपने लण्डराज को मेरी बिल के अन्दर। बहुत दिनों से चुदी नहीं हूँ।