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नए पड़ोसी complete

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StoryPublisher

Guest
दोस्तों आज आपके लिए एक नयी कहानी लेकर हाजिर हुआ हूँ. लेकिन अपडेट जल्दी जल्दी नहीं दे पाऊँगा इसके लिए पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ...

मेरा नाम मनीश है और मैं लखनऊ में रहता हूँ. मैं १२वी क्लास में पढता हूँ. मेरे घर पर मेरे पापा मम्मी और मेरी बड़ी बहन रश्मि है. मेरे मम्मी पापा दोनों नौकरी करते है और मेरी बहन ग्रेजुएशन सेकंड इयर में पढ़ रही है. जहा हमारा घर है वो एरिया अभी नया बसा है. वह अभी ज्यादा मकान नहीं है. जब हम यहाँ आये थे तब हमारी लाइन में सिर्फ हमारा ही घर बना था. धीरे धीरे और घर बन गए सामने भी काफी घर बन गए पर हमारे पड़ोस में कोई नहीं आया. पर पिछले साल हमारे बगल में भी एक नया मकान बन गया था और उसमे एक फॅमिली भी आकर रहने लगी थी. पापा उनसे मिलने गए और लौट कर उन्होंने मम्मी को बताया की अच्छे लोग है. उनके घर में भी 4 लोग ही थे. अंकल एक सरकारी नौकर थे और आंटी घर पर ही रहती थी. उनका बड़ा लड़का मयंक मेरे ही कॉलेज में पड़ता था और उनकी छोटी बेटी रुची ११वी क्लास में पढ़ रही थी. मम्मी ने कहा चलो अच्छा है की कम से कम कोई पडोसी तो आये. पापा ने कहा एक और अच्छी बात है उन्होंने अपने घर में जो दुकान बनवाई है वो भी जल्दी खुल जाएगी. अभी मेरे सामने ही एक लड़का किराये की बात पक्की करके गया है. फिर पापा ने मुझसे कहा की कल कॉलेज जाते समय मयंक को अपने साथ ले जाना क्योंकि वो कह रहा था की उसको यहाँ का बस रूट अभी पता नही है. इस बातचीत में मेरे लिए दो ख़ुशी की बाते थी. एक तो मेरा कॉलेज सिर्फ लडको का कॉलेज है और मेरे मोहल्ले में भी ज्यादा लडकिया नहीं थी इसीलिए मैं रुची की खबर से थोडा खुश हुआ क्योंकि जब से मैंने मस्तराम पढना शुरू किया था बस एक ही सपना था की कैसे भी किसी लौंडिया की मिल जाए. और दूसरा मुझे घर का सामान लेने काफी दूर जाना पड़ता था अगर बगल में दुकान खुलेगी तो मुझे ज्यादा दौड़ना नहीं पड़ेगा.

 
अगले दिन मैं तैयार होकर कॉलेज के लिए निकला और उनके घर जाकर बेल बजायी. आंटी ने दरवाजा खोला तो मैंने देखा की वो एक ३८-४० साल की काफी खूबसूरत महिला थी. रंग एक दम दूध जैसा. लम्बे काले बाल. गुलाबी रंग की साढ़ी में वो बहुत कमाल लग रही थी. मैंने उन्हें बताया की मैं बगल के घर में रहता हूँ और मयंक को साथ ले जाने के लिए आया हूँ. उन्होंने कहा की मयंक तैयार हो रहा है. ५ मिनट वेट कर लो मैं भेजती हूँ. और वो अन्दर चली गयी. मैंने सोचा की जब माँ ही ऐसा माल है तो बेटी तो और भी कमाल होगी. उन्होंने दरवाजा बंद नहीं किया था और तभी मैंने पहली बार रुची को देखा. वो शायद नहाकर अपने रूम में जा रही थी. एक झलक में ही उसने मुझे पागल कर दिया. ख़ूबसूरत तो वो थी ही पर उसका कटीला बदन और भी क़यामत था. उसकी लचकती कमर का तो मैं उसी दिन से दीवाना हो गया. मैं उसके ख्यालों में खोया था की तभी एक लड़का बाहर निकला और मुझसे हाथ मिलाता हुआ बोला की मैं ही मयंक हूँ. मैंने उसे गौर से देखा. स्मार्ट लड़का था. शायद जिम भी जाता होगा क्योंकि उसकी बॉडी काफी फिट थी पर उम्र में वो मुझे थोडा बड़ा लग रहा था. मैं बोला चलो वरना कॉलेज में देर हो जाएगी और हम दोनों बस स्टैंड के लिए चल दिए. अब तो हमारा यही रूटीन था. मयंक अलग सेक्शन में था और मैं अलग सेक्शन में पर हम दोनों साथ ही कॉलेज जाते तो कुछ ही दिनों में हमारी अच्छी दोस्ती हो गयी. तभी मुझे पता चला की मयंक मुझसे 2 साल बड़ा है और एक साल बीमार होने के कारण और एक बार फेल होने की वजह से उसके दो साल ख़राब हो गए और वो मेरी ही तरह १२वी क्लास में पढ़ रहा है. मुझे ये भी पता चला की ये दोनों आंटी अंकल के अपने बच्चे नहीं है बल्कि आंटी की बड़ी बहन के बच्चे है. एक एक्सीडेंट में आंटी की बड़ी बहन और जीजा की मौत हो गयी थी और इनके अपने कोई बच्चे नहीं थे इसीलिए आंटी ने इन दोनों को गोद ले लिया था. मयंक पढने में थोडा कमजोर था तो वो कॉलेज के बाद सीधा कोचिंग पढने चला जाता था और मैं अकेले घर लौट आता था. रुची की मेरी दीदी से अच्छी दोस्ती हो गयी थी और वो अक्सर दीदी से मिलने घर भी आती थी लेकिन रुची से मेरी दोस्ती तो दूर जान पहचान भी नहीं हो पाई थी. इसका एक कारण तो ये था की हमारे कॉलेज और रुची के कॉलेज का टाइम अलग अलग था. हम सुबह ८ से १२ कॉलेज जाते और १ बजे तक घर वापस आ जाते जबकि रुची १० बजे कॉलेज जाती और ४ बजे लौट कर आती थी. दीदी कॉलेज से शाम को ५ बजे तक आती थी और उसी टाइम मैं कोचिंग चला जाता था और ९ बजे तक लौटता था. रुची दीदी से मिलने ५ और ९ के बीच ही आती थी जब मैं घर पर नहीं होता था. मैंने सोचा की कुछ ही दिन में पेपर हो जायेंगे फिर छुट्टियों में २ महीने मैं घर पर ही रहूँगा. रुची वाला प्रोजेक्ट तभी पूरा किया जायेगा.
 
मयंक के घर में जनरल स्टोर भी खुल गया था और मैं अक्सर उस दुकान से सामान लेने जाता रहता था तो मेरी उन दुकान वाले भैया से भी अच्छी दोस्ती हो गयी थी. उनकी उम्र करीब २७-२८ साल थी और उनका नाम ओम था. वो काफी मजाकिया थे और हमेशा गंदे गंदे चुटकुले सुनाते थे तो मैं कभी कभी खाली टाइम में भी उनके पास चला जाता था क्योंकि दोपहर में उनकी दुकान भी खाली ही रहती थी. उन्होंने अपनी दुकान में एक टीवी भी लगा रखा था तो मैं कभी कभी मैच देखने भी उनके यहाँ चला जाता था क्योंकि मेरे घर पर कोई मैच नहीं देखता था तो उनके साथ मैच देखने में बहुत मजा आता था. पर इधर कुछ दिनों से मैं नोटिस कर रहा था की जब भी मैं उनके पास जाता था वहा आंटी पहले से ही उनसे बाते कर रही होती थी. और मेरे जाते ही आंटी घर के अन्दर चली जाती और अब ओम भैया भी मुझसे पहले की तरह ज्यादा बात नहीं करते थे. मुझे थोडा शक हुआ की आंटी ऐसे क्या बाते करती है जो मेरे सामने नहीं कर सकती तो मैं अगले दिन चुपके से उनके घर के पीछे से उनकी दुकान की तरफ गया. आंटी आज भी हंस हंस कर ओम भैया से बातें कर रही थी. मैं दुकान की दीवार के पास बैठ कर उनकी बातें सुनने लगा. ओम भैया बोले, "अरे एक चुटकुला और याद आया भौजी, सुनाऊ."

आंटी बोली सुनाओ. मुझे लगा की ये तो बस आंटी को जोक सुना रहे है. तभी ओम भैया बोले "एक आदमी अपनी बीवी के साथ बाइक पर जंगल से जा रहा था की बाइक पंक्चर हो गयी. उन्होंने काफी गाडियों को रोकने की कोशिश की लेकिन रात का वक़्त था किसी ने उनकी मदद नहीं की. तभी बीवी बोली सुनो जी आप सड़क के एक किनारे खड़े हो जाओ और मैं आपका लंड खीच कर सड़क के दुसरे किनारे पर खड़ी हो जाती हूँ फिर तो लोग लंड को रस्सी समझ कर गाडी रोक ही देंगे."

 
अरे ये तो आंटी से खुले आम लंड चूत की बात कर रहा है ये सोच के मेरे कान गरम हो गए. मैं और ध्यान से सुनने लगा. ओम भैया बोले, "तो सड़क के एक कोने में ये आदमी और दुसरे कोने में इसकी बीवी इसका लंड पकड़ कर खड़ी हो गयी. तभी वहाँ से एक ट्रक तेज़ी से निकला और बिना ब्रेक मारे निकल गया बीवी एक तरफ गिरी और आदमी एक तरफ. बीवी उठी और बोली की बाल बाल बचे. तो पति बोला की बस बाल ही बाल बचे."

आंटी जोर जोर से हँसे जा रही थी और मैं सोच रहा था की क्या ओम भैया आंटी को पेलते है जो ऐसे गंदे चुटकुले सुना रहे है. तभी आंटी बोली, "क्या ओम क्या किसी का इतना लम्बा भी होता है जो सड़क के एक किनारे से दुसरे किनारे तक चला जाए." इस पर ओम भैया ने जवाब दिया, "अरे भौजी अभी आपने देखा ही क्या है. एक बार हुकुम तो करो जन्नत न दिखा दूं तो कहना. सेवा का मौका तो दो." "अरे हाथ छोड़ो, कोई देख लेगा." आंटी बोली.

"अरे तो आप अन्दर चलो. मैं शटर डाउन करके आता हूँ." ओम भैया बोले. "तुमको तो बस दिन रात एक ही चीज का सपना दिखता है. टाइम तो देखो अभी एक घंटे में मयंक आ जायेगा." आंटी ने जवाब दिया. ओम भैया बोले, "अरे भौजी आप एक बार असल में दिखा देती तो ये स्वपन दोष भी ठीक हो जाता और एक घंटा तो बहुत है. अपना काम तो आधे घंटे में हो जायेगा." "इतनी बड़ी बड़ी बातें करते हो और बस आधे घंटे में काम हो जायेगा" आंटी फिर से हँसने लगी और घर के अन्दर जाने लगी. मैं समझ गया की अभी तक तो आंटी ने ओम भैया को अपनी चूत के दर्शन नहीं करने दिए है लेकिन अब ओम भैया को आंटी की ओखली में अपना मूसल कूटने में ज्यादा देर नहीं लगेगी क्योंकि आंटी सुबह १० बजे से शाम ४ बजे तक घर में अकेली ही रहती है और ओम भैया से वो जितना खुल चुकी है बस अब किसी भी दिन उनके लिए टाँगे पसार देंगी. मैं वहां से निकल कर सीधे ओम भैया के पास पहुच गया. ओम भैया आंटी का पिछवाडा देख कर अपना लंड मसल रहे थे. अचानक मुझे देख कर चौंक पड़े. बोले "अरे मनीष. आज इधर से कहा से आ रहे हो." "इधर से न आता तो आपकी और आंटी की बातें कैसे सुनता ओम भैया". "कौन सी बातें" ओम ने बहुत आराम से पुछा. "वोही बातें जो अंकल सुनेगें तो बस आपके बाल ही बाल बचेंगे." मैंने मजे लेते हुए बोला. "देखो भाई अगर तुम्हे अंकल को बताना होता तो तुम मुझे न बताते. काहे फडफडा रहे हो. तुम्हे भी दिलवा देंगे." ओम भैया ने कहा.

 
मुझे लगा जब ये खुल रहे है तो मुझे भी खुलना चाहिए. मैंने कहा, "आंटी की चूत आपको ही मुबारक हो, मुझे तो रुची की लेनी है. उसकी दिलवाओ". "ये लो इधर तुम मयंक की बहन की चूत के पीछे पागल हो और मयंक तुम्हारी बहन की लेने की फ़िराक में है. दोनों बहनों की अदला बदली कर लो" ओम भैया की ये बात सुन कर मुझे झटका लग गया. "आपसे ये किसने कहा, मयंक ने?". "उसने तो नहीं कहा पर बेटा ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते है. तुम तो झोला उठाकर कोचिंग चल देते हो. तुम्हे क्या पता की शाम को यहाँ क्या क्या होता है. कैसे मयंक बाबु छत पर टंगे रहते है तुम्हारी बहन की एक झलक पाने के लिए और हो भी क्यों न तुम्हारी बहन है भी तो १००% सोने की बेबी डॉल. अब तो जब रश्मि रुची से मिलने आती है तो थोड़ी बहुत बात भी कर लेती है मयंक से. थोडा अपनी गाड़ी को स्पीड दो वरना मयंक मारेगा झटके और तुम ताड़ने में ही अटके रहोगे". "क्या बकवास कर रहे हो" मैंने गुस्से से कहा. ओम भैया पर मेरे गुस्से का कोई असर नहीं हुआ. वो आराम से बोले, "भाई नाराज़ क्यों होते हो. हम जब आंटी की ले लेगे तो तुमको भी दिलवा देंगे. बाकी रुची कोई रांड तो है नहीं जो मेरे कहने से तुमको दे देगी. या तो खुद मेहनत करो या फिर मयंक के साथ मिल कर जैसा हमने कहा वैसा करो."
 
मुझे ओम की बात सुन कर बहुत गुस्सा आया. "छोडूंगा नहीं साले मयंक को. मुह तोड़ दूंगा मादरचोद का." मैंने गुस्से से कहा. ओम ने मुझसे कहा, "सोच लो मनीष भाई. अगर मयंक से लड़ाई कर लोगे तो रुची के सपने ही देखते रहोगे. हर लड़की किसी न किसी की बहन होती है. भाई तुम अगर उसकी बहन को चोदने की सोच सकते हो तो वो क्यो नहीं सोच सकता. खाली तुम ही खिलाडी हो क्या? मुझे तो लगता है तुम्हारी बहन भी मयंक को पसंद करती है. उससे गिफ्ट वगेरह भी लेती है. कही ऐसा न हो की तुम्हारे झगडे में मयंक का काम हो जाये और तुम्हारे साथ klpd हो जाए. अरे घर जाकर मेरी बात ठन्डे दिमाग से सोचना." मैं ओम की बात सुन कर चुप चाप वापस घर आ गया. मुझे ये भी समझ आ गया था की केवल मयंक ही नहीं ओम भी बड़ा खिलाडी आदमी है. अगर वो आंटी को चोद सकता है तो रुची और रश्मि दीदी को भी तो चोदने की फ़िराक में होगा. मैंने तय किया की मैं अभी मयंक से लड़ाई नहीं करूंगा क्योंकि रश्मि दीदी कॉलेज से शाम को ५ बजे घर आती है और ५.३० पर मम्मी भी लौट आती है तो मयंक को दीदी अकेले नहीं मिलने वाली और इतनी जल्दी वो और कुछ कर नहीं सकता. बस मुझे ये पक्का करना था की दीदी और मयंक का मामला कहा तक पंहुचा है. अभी दीदी के आने में १ घंटा बाकी था तो मैंने सोचा की दीदी के रूम में जाकर देखना चाहिए. हो सकता है की कहीं कुछ मिल जाए जिससे पता चले की क्या हो रहा है.
 
मैं दीदी के कमरे में गया और पहली बार उनकी कपड़ो की अलमारी खोल के देखी. मेरा दिल धड़क रहा था. अलमारी में कागजो के नीचे मुझे एक थैंक यू कार्ड मिला. मैंने उसे पढ़ा तो वो मयंक ने ही दीदी को दिया था. उसमे मयंक ने दीदी को फ्रेंडशिप एक्सेप्ट करने के लिए थैंक्स बोला था. दीदी ने इस कार्ड को छिपा कर रखा था इसका मतलब दीदी को इतनी समझ तो थी की मयंक दोस्ती नहीं कुछ और करना चाहता है. मुझे दीदी के ऊपर भी थोडा गुस्सा आया की इसको भी बड़ी आग लगी है. मैंने थोडा और देखा तो मेरे हाथ में दीदी की स्किन कलर की ब्रा और पैंटी आ गयी. ये एक नेट वाली काफी स्टाइलिश ब्रा पैंटी थी. मैंने यू ही नंबर देखने के लिए उसे उठा लिया. ब्रा का नंबर ३४ था पर पैंटी पर कही नंबर नहीं लिखा था. मैं ध्यान से देखने लगा और अचानक ही देखते देखते मैं दीदी की पैंटी सूंघने लगा. मेरा लंड एकदम लोहे की रॉड की तरह खड़ा हो गया था. अचानक मैंने सोचा की मैं ये क्या कर रहा हूँ और दीदी के कपडे वापस रख कर उनके कमरे से बाहर आ गया. थोड़ी देर में घर की घंटी बजी. मैंने दरवाजा खोला तो सामने दीदी थी. आज पहली बार उनको देख कर मैं ये इमेजिन करने लगा की दीदी उस ब्रा पैंटी में कैसी दिखेगी. आज मैंने पहली बार दीदी के बदन की तरफ ध्यान दिया. मेरे दिमाग में बार बार ओम भैया के बात आ रही थी की तेरी बहन है भी तो सोने की बेबी डॉल. मैंने ये ख्याल अपने दिमाग से झटके और दीदी से कहा की मैं कोचिंग जा रहा हूँ और घर से निकल गया.
 
अगले दिन रोज की तरह मयंक और मैं कॉलेज के लिए घर से निकल पड़े. कल की बातों की वजह से मैं मयंक से बात नहीं कर रहा था. मयंक ने बस में मुझसे पुछा, "क्या बात है. आज बड़ा चुप चुप है." मैंने कहा "नहीं कोई ख़ास बात नहीं है." मयंक बोला "सुन आज कॉलेज छोड़ और मेरे साथ चल. तेरा मूड ठीक कर दूंगा." मैंने पुछा "कहा?" तो मयंक बोला "चल तो सही." और वो मुझे लेकर बस से उतर गया और एक सिनेमा हाल के सामने पहुच गया जहा मोर्निंग शो में एक इंग्लिश फिल्म चल रही थी. मयंक ने टिकेट खरीदी और हम दोनों अन्दर चले गए. मैंने डरते हुए मयंक से पुछा "यार अगर कोई जान पहचान का मिल गया तो?" मयंक बोला "पहली बार मोर्निंग शो देखने आये हो क्या? अरे अन्दर कोई किसी को नहीं पहचानता. जो दिखेगा वो भी तो फिल्म देखने ही आया होगा." मैंने पहली बार इतनी गरम फिल्म देखी थी वरना मैं तो अभी तक बस मस्तराम के ही भरोसे था. फिल्म के बाद मयंक बोला "मजा आ गया. आज तो इसी हेरोइन को याद करके मुठ्ठ मारेंगे. क्यों भाई."

"बिलकुल भाई" मैंने जवाब दिया. वैसे तो मयंक से मेरी दोस्ती अच्छी थी पर हम एक दुसरे की नज़र में आज तक शरीफ बने थे. आज जब मयंक और मैंने वो शराफत का नकाब उतार फेका तो हमारे बीच ज्यादा पर्देदारी नहीं बची थी. मैंने मयंक से सीधे ही पूछ लिया "भाई कोई बोल रहा था की तुम मेरी बहन के बारे में कुछ गलत बोल रहे थे इसीलिए मेरा मूड कुछ ख़राब है." मयंक ये सुन कर थोडा चौंका तो पर फिर आराम से बोला "मैंने रश्मि के बारे में किसी से कोई गलत बात नहीं की. तुमने क्या सुना है." मैंने कहा "तुमने किसी से कहा है की वो तुम्हारी गर्ल फ्रेंड है." मयंक ने साफ़ मना कर दिया. वो बोला "मैंने किसी से ऐसा नहीं कहा. हां कभी कभी रश्मि रुची से मिलने घर आती है तो बात हो जाती है. इसीलिए हमारी थोड़ी दोस्ती जरूर है पर इसमें तुम्हे परेशान होने वाली क्या बात है."

 
मैंने मौके पर चौका मार दिया और बोला "अगर मेरी रुची से दोस्ती होती तो तुम्हे कोई परेशानी नहीं होती क्या?" "इसमें परेशानी की क्या बात है. अगर तुम्हे विश्वास नहीं है तुम आज ही शाम को घर आना. मैं खुद तुम्हारी रुची से दोस्ती करवा दूंगा." मुझे लगा की या तो मयंक बहुत बड़ा हरामी है या फिर वो ओम झूठ बोल रहा था पर तभी मुझे याद आया की दीदी की अलमारी में वो कार्ड जिस पर मयंक का नाम था. नार्मल दोस्ती में कौन लड़का लड़की को कार्ड देता है. मैंने बोला "शाम को तो मैं कोचिंग जाऊँगा. कल सन्डे है. कल सुबह मेरी रुची से दोस्ती करवा देना." मयंक सोच में पढ़ गया, उसने सोचा नहीं था की मैं सच में उससे कहूँगा की मेरी दोस्ती उसकी बहन से करवा दो. फिर वो बोला "ठीक है. आ जाना. अब मैं जाता हूँ. कोचिंग में देर हो जाएगी." मैं वापस घर लौट आया. मैं थोडा जल्दी घर पहुच गया था. मैंने देखा की ओम की दुकान बंद है. मुझे थोडा अजीब लगा की ये दुकान बंद करके कहा चला गया. तभी मेरे दिमाग में ख्याल आया की कहीं ये आंटी के साथ तो नहीं लगा हुआ.

मैं फटाफट ताला खोल कर घर में आया और छत के रस्ते से मयंक के घर अन्दर चला गया. मेरी फट तो बहुत रही थी पर मैंने सोचा की जो होगा देखा जायेगा. मैं दबे कदमो से नीचे आया तो मैंने देखा की आंटी के बेडरूम के दरवाजा बंद था. मैं धीरे से दरवाजे से कान लगा कर सुनने लगा. मेरा शक सही निकला अन्दर से आंटी की हँसने की आवाज आ रही थी. तभी ओम की आवाज आई, "मेरी जान. अब और न तड़पाओ". मैं बिलकुल सही समय पर पंहुचा था अभी कांड शुरू नहीं हुआ था. मैंने सोचा की सुबह मयंक ने एक फिल्म दिखाई और अब मयंक की मम्मी दूसरी फिल्म दिखाने वाली है. मैंने फ़ौरन खिड़की के पास आया और अन्दर देखा. अन्दर ओम के हाथ में आंटी की साड़ी और ब्लाउज था और आंटी ब्रा और पेटीकोट में बेड पर लेटी थी.

 
कमेंट्स के लिए शुक्रिया दोस्तों और देरी के लिए माफ़ी

अब आगे

"तड़प तो मैं रही हूँ. आओ आकर मेरी प्यास बुझाओ." आंटी ने बड़े फ़िल्मी अंदाज से कहा. ओम आंटी की साड़ी एक तरफ फेंक कर आंटी के ऊपर कूद गया. उसने आनन फानन में आंटी का पेटीकोट और ब्लाउज ब्रा समेत उतार फेंका. आंटी ने पैंटी नहीं पहनी थी और उनकी चूत पर एक भी बाल नहीं था. ओम से रहा नहीं गया और उसने अपना मुह आंटी की दोनों टांगो के बीच घुसा दिया.

ओम जोर जोर से आंटी की चूत चाट रहा था और आंटी बुरी तरह सिसकार रही थी. मैं जिंदगी में पहली बार एक नंगी औरत लाइव देख रहा था वरना इससे पहले तो मैंने सिर्फ फ़ोटो में और आज सुबह फिल्म में ही औरतों को देखा था. वासना से मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था तभी शायद ओम ने आंटी की चूत में काटा तो आंटी जोर से चिल्ला पड़ी.

जल्दी से ओम ने अपना हाथ उनके मुँह पर रख दिया और बोला "चिल्ला क्यों रही हो? कोई सुन लेगा तो?

आंटी बोली, "ऐसे करोगे तो चिल्लाऊँगी ही. ऐसा तो शादी के इतने सालों में आज तक कभी इन्होने भी नहीं किया."

तो ओम बोला "ठीक है जानेमन अब आराम से करूंगा."

"आराम से करवाने के लिए तो ये है ही फिर तुमसे करवाने का क्या फायदा." आंटी ने मुस्कुराते हुए कहा और ओम का मुह फिर से अपनी चूत की तरफ धकेल दिया और ओम जोर जोर से आंटी की चूत चाटने लगा.

आंटी फिर से सिसकारियाँ भरने लगी "आआह्ह्ह्ह्ह् य्य्य्याआ. हां ऐसे हीईईईइ. फाड़ मत देनाआआआआ. वरना इनको क्या कहूँगी. आआअह्ह्ह. खुश कर दो तो रोज दूँगी... मैं कही भागी नहीं जा रही हूँ.... हाआअ आआआह्ह्ह्ह. मैं गयीईई. ईईई.
 
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