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नए पड़ोसी complete

आंटी का बदन सूखे पत्ते जैसा कापने लगा. शायद वो झड गयी होंगी. फिर ओम ऊपर आ कर आंटी को बोला "ले अब मुँह खोल… और चूस इसे"

ओम ने अपना लंड का लण्ड आंटी के मुँह में ठूस दिया और वो उसे मज़े से चूसने लगी. ओम का लंड बहुत बड़ा नहीं था जैसा की मैं मस्तराम की किताबो में देखता था... खड़ा होकर करीब ६ इंच का रहा होगा पर आंटी के मुह में पूरा नहीं जा पा रहा था. मैंने सोचा फिरंगी औरतें 9-9 इंच के हथियार अपने मुह में कैसे ले लेती हैं और ये ओम ६ इंच का लंड लेकर इतना उछल रहा था हालाँकि मेरा खुद का लंड तो उससे भी छोटा था पर मुझे लगता था की जब मेरी उम्र बढ़ेगी तो मेरा लंड भी ८-9 इंच का हो जायेगा जैसा की ब्लू फिल्मो में लडको का दिखाते है. मैं इसी तरह की फालतू बातें सोच रहा था की तभी आंटी बोली, "तुम्हारा निकल रहा है"

"पी जा उसे, बिलकुल बर्बाद नहीं होना चाहिए" ओम ने लंड वापस आंटी में मुह में डाल दिया. आंटी ने सारा का सारा माल पी लिया और चाट चाट के लंड साफ़ भी कर दिया. फिर आंटी ने ओम को नीचे कर दिया और खुद ऊपर लेट कर ओम के होटों को कस के चूसने लगी. कम से कम दस मिनट तक चूमा चाटी का कार्यक्रम चला.

अब मेरे लण्ड की भी बुरी हालत हो रही थी पर मैंने सोचा की पूरा देखने के बाद ही मुठ मारूंगा. अब आंटी फिर से नीचे आ गई और ओम ने उनकी टाँगे उठा के अपने कंधे पर रखी और अपना एक झटके में अपना लण्ड आंटी की चूत में डाल दिया. आंटी के मुह से एक सिसकी निकल गयी. ओम का पूरा लंड आंटी की चूत के अन्दर गायब हो गया फिर ओम ने झटके लगाना शुरू किये. नीचे से आंटी चूतड़ उठा-उठा कर साथ दे रही थी. दोनों खेले खाए लोग थे. बहुत ही रिदम में चुदाई शुरू हो गयी थी. ओम ने धक्को की रफ़्तार धीरे धीरे बढ़ाना शुरू किया और कमरा थापों से गूजने लगा.

फिर से आंटी की आवाज़े निकलना शुरू हो गई- धीईरे……. धीईर्र……!

 
करीब बीस मिनट की जम के चुदाई के बाद ओम ने अपना माल दुबारा से आंटी की चूत में ही निकाल दिया और वो आंटी के ऊपर ही ढेर हो गया.. आंटी भी शांत पड़ गयी तो मैं समझ गया की दोनों झड़ गए है.

फिर कुछ देर बाद ओम आंटी के ऊपर से हटा तो आंटी बोली की अन्दर क्यों निकाला. कही कुछ हो गया तो? ओम बोला कुछ नहीं होगा मेरी जान. तुम ही तो कह रही थी की तुम्हारे बच्चे नहीं होते.

अरे वो तो इनकी वजह से नहीं होते. आंटी बोली.

ठीक है. आगे से कंडोम लगा के करेंगे. अभी तुम गोली खा लेना.

आगे से क्या मतलब? आंटी बोली.

क्यों मजा नहीं आया क्या? अंकल ज्यादा मजा देते है क्या? ओम ने पुछा.

बहुत मजा आया. अगर ऐसा मजा इन्होने दिया होता तो तुम्हारा नंबर ही न लगता. आंटी हँसते हुए बोली और दोनों वापस कपडे पहनने लगे और मैं धीरे से वापस अपने घर आ गया. मेरा लंड फटा जा रहा था तो मैंने आंटी का नाम लेकर फटाफट मुठ मारी. थोड़ी देर बाद मुझे लगा की मुझसे गलती हो गयी अगर मैं उस समय कमरे में घुस जाता तो आंटी को मुझसे भी चुदवाना ही पड़ता. मैंने भी ठानी कि रुची तो ठीक है पर पहले एक बार तो आंटी की चूत जरुर मारूँगा.

मुझे पता चल गया था की अंकल आंटी को संतुष्ट नहीं कर सकते इसलिए ओम अब तो रोज़ आंटी की लेगा तो ये मौका मुझे दुबारा भी मिल जायेगा बस मुझे थोडा चौकन्ना रहना होगा और मौके पर थोड़ी हिम्मत दिखानी होगी...

 
रात भर आंटी मेरे सपने में आती रही. अगले दिन १० बजे सुबह मैं नहा धोकर मयंक के घर पहुच गया पर अब मेरा मकसद रुची से दोस्ती से ज्यादा आंटी के हुस्न का दीदार करने का था. सन्डे था तो ओम की दुकान बंद थी. सन्डे को वो दुकान देर से खोलता था और जल्दी बंद करता था. मैंने घंटी बजाई तो मयंक ने दरवाजा खोला और मुझे अन्दर अपने कमरे में ले गया पर मुझे आंटी या रुची नहीं दिखी. मयंक बोला की यार आ रहे थे तो रश्मि को साथ लेते आते. तुम तो रुची से बातें करोगे और मैं बोर हो जाऊँगा.

मैं समझ गया की ये सीधे सीधे एक हाथ ले और एक हाथ दे बोल रहा है पर फिलहाल मेरा ध्यान रुची से ज्यादा आंटी पर था. मैंने बोला दीदी सन्डे को देर तक सोती है. अभी तक तो उसने ब्रेकफास्ट भी नहीं किया है तो कैसे बुला लाऊं. मैंने बहाना मारा और पूछ ही लिया यार आंटी नहीं दिखाई दे रहीं. मयंक बोला मम्मी पापा सुबह सुबह गाँव गए है. रात तक वापस आएंगे. तभी तो बोल रहा हूँ की जाकर रश्मि को भी ले आओ.

आंटी घर में नहीं है ये सुन कर मेरा मूड थोडा ख़राब तो हुआ पर ये साला मयंक मेरी बहन के पीछे ही पड़ा हुआ है ये सोच कर मूड ज्यादा ख़राब हो रहा था. पर साला मयंक भी घाघ था. बोला अच्छा तुम रुको मैं रुची से कहता हूँ और वो वही से चिल्ला कर रुची से बोला की सुनो रुची, देखो मनीष आया है. तुम रश्मि को भी फ़ोन करके बुला लो तो हम सब मिल कर टाइम पास करेंगे.

बगल वाला रूम ही रुची का था. उसने भी वही से आवाज लगाई की ठीक है भैया. अभी फोन करती हूँ. इसके बाद मयंक ने जो बोला तो मेरा जलता हुआ दिल फिर से खुश हो गया. वो रुची से बोला की फोन करके तुम भी मेरे कमरे में ही आ जाओ. आज तो मनीष ख़ास तुमसे ही मिलने आया है. रुची बोली ठीक है भैया मैं बस नहा कर १० मिनट में आई.
 
मैं बेसब्री से १० मिनट ख़तम होने का इंतज़ार करने लगा पर मेरे इंतज़ार से पहले मयंक का इंतज़ार ख़तम हो गया और रश्मि कमरे में दाखिल हो गयी. वो शायद छत से ही आ गयी थी क्योंकि किसी ने घंटी तो बजाई नहीं. मैंने गौर से देखा की दीदी ने सुबह वाले कपडे बदल कर स्कर्ट टॉप पेहन लिया है और हलकी ली लिपिस्टिक के साथ हल्का मेकअप भी किया था. वैसे तो दीदी कहीं पार्टी वार्टी में जाने के लिए ही ऐसा मेकअप करती थी पर यहाँ आने के लिए भी मेकअप. बहुत आग लगी है मेरे दिल से आवाज आई. उसको देखते ही मयंक खड़ा हो गया और बोला यहाँ बैठो रश्मि. दीदी मयंक की चेयर पर बैठ गयी. मयंक साथ की टेबल पर ही बैठ गया. मैंने देखा की ऐसे बैठने से मयंक को दीदी के टॉप के गले के अन्दर जरूर दिखाई दे रहा होगा. अगर दीदी ने ब्रा नहीं शायद चुचिया भी दिख जाएँगी. मैं ध्यान से देखने लगा की दीदी ने ब्रा पहना है या नहीं. दीदी ने ब्रा पहना हुआ था पर इन ख्यालों ने मेरे लंड में हल्का तनाव ला दिया.

तभी दीदी ने पुछा मुझे बुला कर रुची कहाँ चली गयी.

आ जाएगी. कभी हमसे भी बात कर लिया करो. मयंक ने मुस्कुराते हुए कहा.

मेरे सामने मयंक दीदी से ऐसे बोलेगा दीदी को ये उम्मीद नहीं थी. वो अचानक थोडा घबरा गयी. मुझे भी अजीब लगा की साला मेरे सामने ही मेरी बहन पर फुल लाइन मार रहा है. मयंक भी दीदी की दुविधा समझ गया. मुझसे बोला अरे मनीष देखो तो जाकर रुची कहा है. उसको बता दो की रश्मि आ गयी है.

हम दोनों को पता था की रुची नहा रही है. अब मयंक तो मुझे ऑफर दे रहा था की जाकर बाथरूम में झाकूँ जहाँ उसकी बहन नंगी नहा रही होगी और तब तक वो रश्मि के साथ कुछ बात कर सके. मुझे क्या ऐतराज हो सकता था. मैं जल्दी जल्दी बाहर निकला और बाथरूम की तरफ बढ़ा. बाथरूम की खिड़की के पास कुर्सी रख कर जब मैंने अन्दर देखा तो klpd हो चुकी थी यानि की रुची नहा चुकी थी और गुलाबी स्कर्ट और ब्लैक ब्रा में शीशे के सामने खड़े होकर अपने बाल पोछ रही थी. रुची की चुंचिया दीदी से छोटी पर थोड़े बड़े अमरुद के साइज़ की थी. मैंने सोचा की भागते भूत की लंगोटी ही सही. पूरा न सही रुची को अधनंगा तो देख ही लिया है. मैं धीरे से बाथरूम के दरवाजे पर आया और दरवाजा नॉक करके बोला की रुची रश्मि आ गयी है.

रुची बोली ५ मिनट में आई. और मैं दबे कदमो वापस मयंक के कमरे की तरफ वापस आ गया और दरवाजे के पास खड़े होकर अन्दर की बाते सुनने लगा...
 
"पर तुमने उसके सामने ऐसे क्यों बोला." दीदी ने थोडा गुस्से से कहा. शायद वो मेरे सामने मयंक ने उनसे जो फ़्लर्ट किया उससे नाराज थी.

"अब प्यार किया तो डरना क्या." मयंक ने जवाब दिया.

साला एक मैं ही स्लो मोशन में चल रहा हूँ. उधर ओम भी बाज़ी मार गया और अब ये मयंक भी सीधे सीधे दीदी से प्यार मोहब्बत की बात कर रहा है. लगता है इसने दीदी को पहले ही पटा लिया है और मेरे सामने नाटक कर रहा था.

"अभी मैंने तुम्हारा प्रपोजल एक्सेप्ट नहीं किया है." दीदी ने थोडा नरम लहजे में बोला.

तो साले ने दीदी को प्रोपोसे भी कर रखा है पर दीदी ने जवाब नहीं दिया. पर दीदी की बॉडी लैंग्वेज से जब मुझे पता चल रहा है तो साले मयंक को तो पक्का पता होगा की दीदी का जवाब क्या है.

"रिजेक्ट भी तो नहीं किया है." मयंक ने जवाब दिया, "और मनीष से क्या शरमाना. वो तो खुद रुची से दोस्ती करना चाहता है. और मैं उसकी दोस्ती रुची से करवा इसीलिए रहा हूँ ताकि हमें उसकी तरफ से कोई चिंता न रहे."

"देखो मैं तुम्हारी जैसे मॉडर्न नहीं हूँ और फिर से मनीष के सामने मुझसे ऐसे बात मत करना. वरना प्रपोजल रिजेक्ट भी हो सकता है." दीदी ने अपनी असहजता बताई.

"तो ठीक है मैं अभी मनीष और रुची को दुसरे कमरे में भेज दूंगा. फिर हम दोनों यहाँ बैठ कर आराम से बात करेंगे." मयंक ने कहा.

"पागल हो क्या. मनीष क्या सोचेगा की दीदी मयंक से क्या बात कर रही होगी." दीदी ने ऐतराज किया.

"वही जो वो रुची से करेगा" मयंक ने जवाब दिया.

"मैंने कहा न की मैं तुम्हारे जैसे मॉडर्न नहीं हूँ. हम सब एक साथ ही बैठेंगे." दीदी ने बोला.

तभी बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई तो मैं कमरे के अन्दर आ गया और बोला की रुची अभी 2 मिनट में आ रही है. मेरे बोलते बोलते रुची कमरे में आ भी गयी. हम सब साथ बैठ गए और बातें करने लगे. दीदी ने मयंक को अल्टीमेटम दे दिया था तो उसने दुबारा ऐसे वैसी हरकत नहीं की. कुल मिला कर हम सब पूरे दिन फालतू की बातें करते रहे मगर एक अच्छी चीज ये हुई की मेरी रुची से बातचीत हो गयी और आगे से मैं उसके साथ कभी भी डायरेक्ट बात करने की हालत में आ गया था.

 
पर मैं रुची की तरफ उस तेज़ी से नहीं बढ़ पा रहा था जैसे की मयंक ने दीदी के साथ दिखाई थी यानी मैंने अभी उसको प्रोपोस नहीं किया था मामला मेरी तरफ से दोस्ती पर ही अटका था. एक दो बार मैंने कोशिश की भी की बात इधर उधर घुमा कर प्यार मोहब्बत तक ले जाऊं पर रुची भी अपने भाई की तरह चालाक लौंडिया थी. वो उल्टा मुझे ही घुमा देती और जब बात प्यार मोहब्बत तक नहीं पहुच पा रही थी तो चुदाई तो बहुत दूर की बात थी.

इधर मैंने मयंक और दीदी पर भी कड़ी निगरानी रखी थी जिससे वो दीदी के साथ कुछ कर न पाए और मैं अपनी इस कोशिश में कामयाब भी हुआ था. हम लोगों की गर्मी की छुट्टियाँ भी शुरू हो गयी थी और मयंक रुची के साथ कुछ दिनों के लिए अपनी नानी के यहाँ चला गया. अब मुझे दीदी की निगरानी से कुछ फुर्सत मिली तो मैं सोचा वापस ओम और आंटी पर लगा जाए. शायद वही कुछ मिल जाए और दो दिन बाद ही मैंने देखा की ओम की दुकान दोपहर में बंद है. मैं समझ गया की आंटी अकेले घर पर ओम के साथ मजे ले रही होगी. मैंने हिम्मत की और उनकी छत पर कूद गया. मैंने तय कर लिया था की आज जब ओम आंटी पर चढ़ेगा तो मैं भी कमरे में घुस जाऊँगा फिर जो होगा देखा जायेगा. पर असलियत में जो हुआ वो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था.
 
मैं धीरे धीरे नीचे आया. पूरे घर में सन्नाटा था. मैंने आंटी के बेडरूम में झाँका. बेड खाली था. मुझे लगा की घर में कोई नहीं है पर ओम की दुकान तो बंद है तो वो और आंटी यही कहीं होंगे. मैं डरते डरते बाकि के कमरे भी देखने लगा तभी अचानक मुझे बाथरूम से शावर की आवाज आई. मैं धीरे से उसी खिड़की के पास आ गया जिससे मैंने रुची को देखा था.

अन्दर का नज़ारा बहुत बेहतरीन था. आंटी अन्दर एकदम नंगी होकर शावर ले रही थी. वो लम्बे खुले बाल, चूचों पर बहता पानी, वो अपनी झांटों पर से हेयर रिमूवर साफ़ कर रही थी पर तभी मेरा थोडा बैलेंस बिगड़ा और मेरा हाथ खिड़की से टकराया. जब तक मैं भागता तभी आंटी ने खिड़की खोल दी. वो सामने मुझे देख कर एकदम चौंक गयी. मैं वापस छत की तरफ भागा पर तभी आंटी चिल्लाई. खबरदार जो भागे. वही खड़े रहो वरना अभी तुम्हारे पापा को फ़ोन करके बोल दूँगी.

मैं वैसे ही पसीना पसीना हो गया था. आंटी की धमकी से मेरे पैर वहीँ जम गए. मैंने सोचा ये साला ओम कहाँ मर गया. यहाँ तो आंटी अकेले ही है. ५ मिनट बाद आंटी कपडे पहन कर वापस निकल आई. और मेरे पास आकर बोली. अन्दर कैसे आये.

"जी छत से. मयंक को ढूढ़ रहा था." मैंने जवाब दिया.

आंटी चिल्लाई, "शर्म नहीं आती झूठ बोलते हो. तुम्हे अच्छी तरह पता है की मयंक नानी के यहाँ गया है. मुझे नहाता हुआ देख रहे थे. चलो तुम्हारे घर में बताती हूँ"
 
मेरी फट के हाथ में आ गयी. मुझे और कुछ समझ नहीं आया तो मैंने भी बोल दिया की "ठीक है फिर मैं भी अंकल को बोल दूंगा."

आंटी ने मुझे अजीब नजरो से घूरते हुए कहा. "क्या बोल दोगे."

"आपके और ओम भैया के बारे में." मैंने दिल की धडकनों को काबू करते हुए कहा.

"क्या बकवास कर रहे हो. क्या कहा है ओम ने मेरे बारे में?" आंटी ने सकपकाते हुए कहा.

मुझे लगा शायद जान बच जाये. "मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा. मैंने सब अपनी आँखों से देखा है." मैंने जवाब दिया.

"क्या देखा है." आंटी की आवाज ठंडी पड गयी.

मैंने सोचा की अब आर या पार. मैंने ब्लफ मारते हुए कहा. "जब पहली बार ओम ने आपको उस कमरे में चोदा था तब से अभी तक आप लोगो के बीच जो भी हुआ सब देखा है. ओम दोपहर में दुकान बंद करके जो आपके साथ..."

"छि छि. ये कैसी गन्दी बातें करते हो. ये भाषा किसने सिखाई." आंटी ने मुझे रोकते हुए बोला.

"जी आप कर सकती है और मैं कह भी नही सकता." मैंने भी अब पीछे न हटने की कसम खा ली थी.
 
"अच्छा ठीक है. जाओ. मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी और तुम भी नहीं कहना". आंटी ने मुझसे कहा.

पर यही तो मौका था. ये गया तो हमेशा के लिए मौका गया क्योंकि आगे से आंटी सतर्क हो जाएगी. इसीलिए मैंने बोला, "नहीं कहूँगा पर आपको मेरे साथ भी एक बार..."

"चुप रहो. एक तो मैं तुमको जाने दे रही हूँ. तुमको क्या लगता है की जब मैं उनको बताऊंगी की तुम मुझे नहाते देख रहे थे तो उसके बाद बी वो तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेंगे. चुपचाप चले जाओ वरना सच में तुम्हारे पापा को फ़ोन कर दूँगी." आंटी ने गुस्से से कहा.

"कर दीजिये." मैंने आराम से कहा. "और सोचिये की अगर एक परसेंट भी अंकल ने मेरी बात पर विश्वास कर लिया तो आपका क्या होगा. इसीलिए कह रहा हूँ और वैसे भी आपको क्या फरक पड़ता है. जैसे ओम वैसे मैं."

"तुम अभी बच्चे हो." आंटी ने शायद मन में मेरी बात पर गौर किया था.

मैंने हिम्मत करके फिर से बोला, "बिना मौका दिए ये आप कैसे कह सकती है."

आंटी ने थोड़ी देर कुछ सोचा फिर मेरे पास आई और बोली, "ठीक है. चल आज मैं तुझे मौका देकर भी देख लेती हूँ."
 
और मुझे लेकर बेडरूम में आ गयी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की ये सच है या सपना. ये और बात है की मैं इस घडी का दिन रात सपना देखता था लेकिन मन के किसी कोने में मैं जानता था की ये होना संभव नहीं है. पर तभी आंटी ने मेरा लंड कर दबा दिया तो मैं हकीकत की दुनिया में आ गया. आंटी बोली "लगता तो बच्चे जैसा ही है."

मैंने कहा "अभी तो बाहर से देखा है."

फिर आंटी धीरे से अपना हाथ मेरे कपड़ो के अंदर डाल कर लण्ड को सहलाने लगी. मैंने कभी कुछ किया तो था नहीं बस देखा ही था ओम को करते हुए. मैंने ओम जैसा ही आंटी को किस करने की कोशिश की पर आंटी ने मुझे रोक दिया. फिर भी मैंने भी उनके शरीर को इधर उधर छूना शुरू कर दिया. उनके शरीर से साबुन की भीनी भीनी सुगंध आ रही थी और उनका हाथ मेरे लंड को सहला रहा था. इन दोनों बातों का असर जल्द ही मेरे लंड पर दिखने लगा और लंड पूरा खड़ा हो गया. अब मैं वासना से मस्त होकर आंटी के मम्मे दबाने लगा.

आंटी ने हाथ बाहर निकाला और अपने ब्लाउज़ के हुक खोल कर उसे उतर दिया और वापस मेरे लण्ड के साथ खेलने में मस्त हो गयी. मैंने उनके मम्मे को ब्रा से बाहर निकल कर नंगा कर दिया और उससे खेलने लगा. मेरा एक हाथ उनके मम्मे पर और दूसरा हाथ उनकी साड़ी के ऊपर से उनकी चूत रगड़ रहा था. अचानक आंटी रुकी और उन्होंने मेरे सारे कपडे उतार दिए. फिर उन्होंने अपनी साड़ी भी उतार दी. अब हम दोनों लगभग पूरे नंगे थे सिर्फ आंटी की ब्रा उनके कंधो पर लटक रही थी. उसको उतारने का शुभ काम मैंने किया और उनके एक मम्मे को मुँह में ले कर कस कर चूसने लगा. इतने में आंटी की सिसकारियाँ शुरू हो गई. आंटी भी अब बहुत गर्म हो चुकी थी. फिर आंटी ने मेरा लंड ध्यान से देखा और बोली, "हम्म्म. इतना बच्चा भी नहीं रहा तू. तेरे अंकल से तो बड़ा ही है. अच्छा है.
 
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