• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

नक़ली नाक

कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ

इधर-उधर की बातचीत के बाद ग़ज़ाला पूछ ही बैठी।

‘‘मगर तुमने यह नहीं बताया कि कुँवर साहब कौन हैं? जहाँ तक मेरा ख़याल है, इससे पहले मैंने कभी उनको तुम्हारे यहाँ नहीं देखा और न अख़्तर भाई के दोस्तों में ऐसे कोई कुँवर साहब थे।’’

सईदा सुनती रही और थोड़ी देर ख़ामोश रह कर बोली।

‘‘ये तुम्हारे उनके बहुत पुराने दोस्तों में से हैं। मैं नहीं चाहती थी कि इतनी जल्द तुमसे उन्हें मिला दूँ। वे कुछ झक्की आदमी हैं। शायद तुम उनसे मिल कर ख़ुश भी न हो सको। शाकिर भाई मरहूम और कुँवर साहब से एक मामूली-सी किताब पर झगड़ा हो गया था।’’

आख़िर जुमला कहते-कहते उसे लगा कि जैसे वह कोई ऐसी बात कह गयी हो जो उसे न कहना चाहिए थी।

अपने साथ ग़ज़ाला को लिये हुए वह बढ़ी। नौकर से मालूम हुआ कि कुँवर साहब उसकी आठ साल की बच्ची रेहाना के साथ बाग़ में खेल रहे हैं।

ग़ज़ाला और सईदा बाग़ में पहुँचीं... कुँवर साहब रेहाना को गोद में उठाये हुए नाच रहे थे। उन्होंने कई तितलियाँ और भौंरे पकड़ रखे थे और उन सबको डोरे से बाँध रखा था और सब डोरों का आख़िर सिरा उनकी गर्दन से बँधा हुआ था। उनके नाचने के साथ-साथ तितलियाँ भी इधर-उधर घूम रही थीं। मासूम रेहाना इस खेल से बहुत ख़ुश थी।

सईदा अब तक ख़ामोश थी। उसने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘ग़ज़ाला... आओ, तुम्हें कुँवर साहब से मिलवाऊँ।’’

‘‘कुँवर साहब... आपसे मिलिए। आप मेरी प्यारी सहेली ग़ज़ाला खानम और आप हैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ।

उनके पुराने जिगरी दोस्त और मेरे बहुत बड़े हमदर्द और सहारा।’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक उठीं।

कुँवर साहब ने सईदा और ग़ज़ाला की तरफ़ देखा और कुछ सूखी और दुखी आवाज़ में बोले। ‘‘चलिए, घर में चल कर बैठें। शाम को आपके कुछ मेहमान भी शायद आयेंगे।’’

शाम के खाने पर हमीद और फ़रीदी को दावत दी गयी थी। वादे के मुताबिक़ उन्हें रात सात बजे पहुँच जाना चाहिए था, मगर साढ़े आठ बज चुके थे और उनका कहीं पता न था। मजबूर हो कर नवाब साहब ने सईदा से कहा। ‘‘अब इन्तज़ार करना बेकार है... खाना लगवा दो... ख़ुद अपने हाथ से म़ुर्ग पकाया था। मगर उन लोगों की क़िस्मत ही में न था। फँस गये कहीं।’’

खाना मेज़ पर लगा दिया गया था। नवाब रशीदुज़्ज़माँ... मुर्ग़ की टाँग काट कर अलग ही करना चाहते थे के झन्न की आवाज़ के साथ कमरे के सब बल्ब टूट कर ज़मीन पर आ गिरे। एक बल्ब नवाब साहब को बेहद पसन्द शाही दाल में गिरा और गर्म-गर्म दाल उनके चेहरे पर पड़ी।

फ़ायर की पहली छै आवाज़ों के बाद एक सेकेण्ड के लिए बिलकुल सन्नाटा हो गया। नवाब साहब ने देखा कि दो लोगों ने सईदा और ग़ज़ाला के मुँह बन्द कर रखे थे और उन्हें उठाये लिये जा रहे थे। वे चीख़े, मगर चीख़ निकलने से पहले ही इतने ज़ोर का वार उनके ऊपर पड़ा कि वे चकरा कर गिर पड़े। हल्की-हल्की, धुँधली-धुँधली शकलें उनके सामने से गुज़रीं। उनमें से एक फ़रीदी भी था। उनका हाथ उठा और फिर गिर पड़ा।

कुँवर साहब इस हादसे के लिए बिलकुल तैयार न थे। बिजली के जाते ही वे हड़बड़ा कर उठे और इससे पहले कि वह कुछ कर पाते, उनके सीने पर पिस्तौल लगा हुआ था। पिस्तौलधारी ने गरज कर कहा। ‘‘ख़बरदार, अगर एक लफ़्ज़ भी मुँह से निकाला... चुपचाप खड़े रहो।’’

आवाज़ उन्हें जानी-पहचानी मालूम हुई। उन्होंने आँखें फाड़ कर देखा। सुबह वाला इन्स्पेक्टर फ़रीदी उन्हें घूर रहा था।

इतने में उनके साथी ने आ कर कहा। ‘‘उस्ताद, काम हो गया। अब चलना चाहिए।’’

‘‘अच्छा... कुँवर साहब ऐसे ही खड़े रहिए। अगर ज़रा-सा हिले तो न सिर्फ़ आप ख़त्म हो जायेंगे, बल्कि यह लड़की भी इस दुनिया में न रहेगी।’’ फ़रीदी ने रेहाना की गर्दन पकड़ रखी थी। मासूम लड़की की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसका भोला चेहरा इस अँधेरे में भी चमक रहा था। उस आदमी ने धीरे से कहा। ‘‘कुँवर साहब अपनी अन्दर की जेब में रखा हआ काग़ज़ मुझे दे दीजिए। नवाबज़ादा शाकिर की मौत के सिलसिले में यह काग़ज़ बहुत अहमियत रखता है। अगर आप वह काग़ज़ मुझे दे दें तो मैं वादा करता हूँ कि क़ीमिया बनाने वाली किताब नवाबज़ादा की क़ब्र से निकाल लाऊँगा। आप नवाबज़ादा के क़ातिल हैं। आपने उनके ख़ून से हाथ रँगे हैं। अच्छा है कि आप काग़ज़ मुझे दे दें। ये सब राज़ मेरे सीने में द़फ्न रहेंगे।’’

‘‘वह काग़ज़ मेरे पास नहीं है।’’ कुँवर साहब ने हकला कर जवाब दिया।

‘‘अच्छी बात है... मैं ख़ुद ही निकाले लेता हूँ।’’ वह अपने साथी की तरफ़ इशारा करते हुए बढ़ा। कुँवर साहब की जेब से एक सुनहरा चाकू, एक रूमाल और एक रबड़ की बिल्ली निकली। काग़ज़ का पता न था। मायूसी ज़ाहिर करते हुए उसने अपने साथी को इशारा किया। वह ग़ायब हो गया। उसने आख़िर बार कहा–

‘‘कुँवर साहब... नवाबज़ादा शाकिर के सौतेले भाई... लेफ़्टिनेंट बाक़िर आ गये हैं। आपकी सईदा को कुछ भी नहीं मिलेगा। ख़ैर, फ़िलहाल वह मेरे साथ जा रही है। मेरे असिस्टेंट हमीद ने उसे पसन्द कर लिया है। आप ख़ुद ही समझदार हैं, मगर आपको बताना मेरा फ़र्ज़ है। अगर मेरा या हमीद का नाम कभी आपकी ज़बान पर आया या मेरे आज के वाक़ये का ज़िक्र छिड़ा... तो क़ीमिया की किताब की दफ़्ती पर लिखी हुई तहरीर अदालत में पेश कर दी जायेगी और ख़ुदकुशी का यह केस क़त्ल का मुक़दमा बन जायेगा... ख़ुदा हाफ़िज़।’’

वह जा चुका था। कमरे में अब बिलकुल सन्नाटा था। कुँवर साहब कुछ बेहोश-से थे। काफ़ी देर के बाद उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। फ़रीदी का कहीं पता न था और भयानक पिस्तौल सामने से हट चुका था। रेहाना बेहोश पड़ी थी। कमरे में अँधेरा वैसे ही था। उन्होंने नौकरों को आवाज़ें दीं, मगर उनमें से कोई न बोला। वे दो क़दम आगे बढ़े और धायँ... ठिठक कर उन्होंने दूसरी तरफ़ क़दम बढ़ाया और फिर वैसी ही आवाज़ सुनाई दी।

‘‘मालूम होता है, पटाखे बिछाये गये हैं।’’ वे बड़बड़ाये। फूँक-फूँक कर क़दम रखते हुए किसी तरह वे दरवाज़े तक पहुँचे। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था... सिटकनी खोल कर वे बाहर आये। उजाले में आते ही उन्होंने चीख़ कर नौकरों को बुलाया। मगर कोई न बोला... तंग आ कर उनके कमरों की तरफ़ गये। हर एक मीठी नींद के मज़े ले रहा था। लाख जगाने पर भी कोई नौकर न जागा। मजबूरन उन्हें नौकरों का ख़याल छोड़ देना पड़ा। उनका ख़याल था कि शायद कनेक्शन काट दिया गया है। फिर भी उन्होंने बरामदे का स्विच दबाया। बरामदे में रोशनी फैल गयी। इसी रोशनी के सहारे वे फिर कमरे में आये। नवाब साहब और रेहाना को वहाँ से उठाने के बाद उन्होंने फ़ोन उठाया।

पुलिस ऑफ़िस में सब-इन्स्पेक्टर ने पूछा। ‘‘हैलो, कौन है?’’

कुँवर साहब ने कहा। ‘‘मैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ हूँ, अख़्तर लॉज से बोल रहा हूँ। क्या माथुर साहब हैं?’’

जवाब मिला। ‘‘नहीं...’’

‘‘अच्छा सुनिए, आप फ़ौरन यहाँ चले आइए और अगर फ़रीदी साहब और हमीद साहब हों तो उन्हें भी लेते आइएगा।’’

‘‘मगर वे लोग सात बजे से ग़ायब हैं।’’

‘‘ठीक है फिर आप ही आ जाइए,’’ यह कह कर कुँवर साहब ने फ़ोन रख दिया।

सब-इन्स्पेक्टर बिमल मुखर्जी के आने तक कुँवर साहब अपनी दिमाग़ी उलझनों पर क़ाबू पा चुके थे। वे बार-बार यह सोच रहे थे कि कहीं उन्होंने धोखा तो नहीं खाया। मगर वह शक्ल बिलकुल इन्स्पेक्टर फ़रीदी की थी। और अगर मान भी लिया जाये कि वह इन्स्पेक्टर फ़रीदी नहीं था तो आख़िर मुझे वह मना क्यों कर गया... अगर फ़रीदी न होता तो... वह मुझे मना न करता... वह अगर फ़रीदी था तो उसने ऐसा क्यों किया... इन्स्पेक्टर फ़रीदी एशिया का मशहूर जासूस और... लुटेरा...? यह नहीं हो सकता।’’

आख़िरकार उन्होंने यह तय किया कि वे सब-इन्स्पेक्टर को यह बता दें कि उस शख़्स की शक्ल बिलकुल फ़रीदी से मिलती थी।

मिस्टर मुखर्जी को पूरा बयान लिखवाने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे देखा था। उसका हुलिया और सूरत...’’ उनका जुमला पूरा भी न हो पाया था कि गोली चलने की आवाज़ आयी और सामने की कॉर्निस पर से एक कबूतर फड़फड़ा कर गिरा और मर गया। कुँवर साहब रुक गये। उनके लिए यह ख़तरे का सिगनल था।
 
मिस्टर मुखर्जी को पूरा बयान लिखवाने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे देखा था। उसका हुलिया और सूरत...’’ उनका जुमला पूरा भी न हो पाया था कि गोली चलने की आवाज़ आयी और सामने की कॉर्निस पर से एक कबूतर फड़फड़ा कर गिरा और मर गया। कुँवर साहब रुक गये। उनके लिए यह ख़तरे का सिगनल था।

‘‘अभी तक वह मौजूद है।’’ दिल ही में उन्होंने फ़रीदी को एक मोटी-सी गाली दी। सामने तड़प कर मरने वाले कबूतर में उन्हें ख़तरे की झलक दिखी। इन्स्पेक्टर मुखर्जी गोली की आवाज़ ही के साथ सिपाही भेज चुका था और जब सिपाहियों ने आ कर यह रिपोर्ट दी कि कोई नहीं है तो उन्होंने सिपाही चारों तरफ़ फैला दिये और कुँवर साहब की तरफ़ मुखातिब हुए। ‘‘आप बयान जारी रखें... मगर ठहरिए... यह कबूतर...? मगर यह पालतू नहीं, जंगली हैं।’’

‘‘जी हाँ... इन कबूतरों को शगुन के ख़याल से रहने दिया था।’’ कुँवर साहब बोले।

इन्स्पेक्टर मुखर्जी ने फिर कहा, ‘‘हाँ आप बयान लिखा रहे थे। उस आदमी का हुलिया...!’’ उन्होंने क़लम उठाया।

‘‘जी वह लम्बा-सा तन्दुरुस्त आदमी था। भयानक और नाक के पास एक तिल था।’’ अनजाने से कुँवर साहब के मुँह से निकल गया।

इन्स्पेक्टर ने बयान नोट किया। हिफ़ाज़त के लिए सिपाही छोड़ कर वह सईदा और ग़ज़ाला की वापसी का य़कीन दिलाते हुए बाहर निकल गया।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बनावटी बीवी

सईदा के घर से वापसी पर ही हमीद के पेट में चूहे कूदने लगे थे कि आख़िर वे कुँवर साहब कौन थे? सईदा की उखड़ी-उखड़ी बातचीत ने उसे य़कीन करने पर मजबूर कर दिया था कि बहरहाल, शाकिर के क़त्ल में कहीं-न-कहीं सईदा का हाथ ज़रूर है। इसके बावजूद, उसके ज़ेहन में सईदा की तस्वीर नाचने लगती थी, मगर फिर भी उसमें बेपनाह रोमाण्टिक खिंचाव था। उसके कान की लवें... उसके तमतमाते गाल... और सबसे बढ़ कर उसकी सुडौल कलाइयाँ... वह गुम हो गया। ख़ामोशी से उकता कर उसने फ़रीदी से पूछा। ‘‘सईदा के बारे में क्या ख़याल है?’’

‘‘ग़नीमत है तुम्हारे लिए... फ़रीदी ताना मारते हुए बोला।

‘‘नहीं... नहीं... किस ख़च्चर के पट्ठे का ख़याल भी उस तरफ़ गया हो। मैं तो शाकिर के क़त्ल के बारे में पूछ रहा था।’’ हमीद ने झेंपते हुए बोला।

‘‘तुमने कुछ-कुछ तो ठीक ही सोचा है... बहरहाल, शाकिर के घर चल रहे हैं, शायद कोई काम की बात निकल आये।’’

शाकिर की कोठी पर पुलिस का सख़्त पहरा था। पूछताछ से मालूम हुआ कि कोई साहब लेफ़्टिनेंट बाक़िर आये थे और अपने को सौतेला भाई बता गये हैं। आज रात को वे बम्बई जा रहे हैं और परसों तक वापस आ जायेंगे। अदालत से वे शाकिर की विरासत के सिलसिले में इजाज़त निकलवा चुके हैं। इसकी ख़बर शायद सईदा ख़ातून को मिल चुकी होगी।

इतनी बातें जानने के बाद फ़रीदी घर में दाख़िल हुआ। लाइब्रेरी में दो हज़ार के क़रीब किताबें थीं। उनमें से थोड़ी-सी तादाद अंग्रेज़ी और उर्दू के शायरों पर थी, बाक़ी किताबें शैतानों, काला जादू, हिकमत और फ़िलॉसफ़ी वग़ैरह पर थीं। कबूतरों की पहचान, कबूतरों के फ़ायदे पर एक बड़ा-सा नुस्ख़ा था। किताबें कुछ जर्मन, कुछ फ्रेंच, कुछ लातीनी ज़बान में थीं। सामने एक बड़ा-सा सेफ़ था। मेज़ पर रूह और उसकी जानकारी के बारे में एक किताब पड़ी थी। किताब के कवर पर ‘कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ’ का नाम लिखा था। अन्दर का एक पन्ना फटा हुआ था।

फ़रीदी चौंका और पलक झपकते में वह किताब उसकी जेब के अन्दर थी। हमीद ख़ामोशी से अपने उस्ताद का काम का तरीक़ा देख रहा था। उसे उलझन हो रही थी कि आख़िर इस उलट-पुलट का क्या मतलब है और इससे क्या नतीजा मिल सकता है।

उसने झल्ला कर फ़रीदी से कहा। ‘‘मेरे ख़याल में ये किताबें ख़ूनी हैं।’’

‘‘उँ... हूँ... हाँ, बिलकुल ठीक कहते हो।’’ फ़रीदी ने अपनी उलट-पुलट जारी रखते हुए कहा।

‘‘जी हाँ... देखिए... उस मोटी-सी किताब ने अपने पंजों से शाकिर का गला घोंट दिया। वह मर गया... मगर... मगर... यह क्या...!’’ झल्लाहट में एक मोटी-सी किताब उलटते हुए हमीद ने यह जुमले कहे थे। मगर वह किताब बिलकुल सादी थी। अलबत्ता बीच-बीच में तस्वीरें बनी हुई थीं। एक जगह ख़ूनी पंजा था और उसके नीचे कुछ लिखा हुआ था, जिसे हमीद न पढ़ सका। उसने किताब उठाते हुए फ़रीदी से कहा। ‘‘यह भूतख़ाने का नायाब नुस्ख़ा देखिए...’’ फ़रीदी उसे देखते ही दंग रह गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसे किसी साँप ने काट लिया हो। वह चीख़ा। ‘‘हमीद फ़ौरन आओ।’’

‘‘मैं नहीं आता...!’’ भागते हुए फ़रीदी के पीछे उसने दौड़ते हुए कहा।

फ़रीदी बाहर निकला। उसने सिपाहियों को हिदायत की कि किसी शख़्स को अन्दर न घुसने दिया जाये और फिर तेज़ी से पैदल स्टेशन की तरफ़ भागने लगा।

इस तमाम खोज और तफ़तीश में रात के दस बज चुके थे। काफ़ी रात हो जाने की वजह से रामगढ़ का पहाड़ी इलाक़ा सुनसान पड़ा था। सड़क पर सिर्फ़ हमीद और फ़रीदी के दौड़ने की आवाज़ आ रही थी। अचानक उनकी रफ़्तार सुस्त हो गयी। सामने दोनों तरफ़ के पेड़ों से मिला कर रस्सी बाँध दी गयी थी। किनारे से बच कर फ़रीदी निकला और हाँफते हुए हमीद से बोला।

‘‘दुश्मन को मुँह की खानी पड़ी... ख़ुदा के लिए तेज़ चलो... अगर बम्बई एक्सप्रेस छूट गयी तो मुसीबत ही आ जायेगी।’’

‘‘दोनों तेज़ी से भाग रहे थे। स्टेशन सिर्फ़ आधा मील रह गया। फ़रीदी ने सड़क के किनारे से लगे हुए खम्भे की रोशनी में देखा। घड़ी में ग्यारह बजने में दस मिनट बाक़ी थे। और एक्सप्रेस ग्यारह बज कर पाँच मिनट पर छूटती थी। उसने रफ़्तार थोड़ी धीमी कर दी। हमीद बेचारा हाँफ रहा था। उसके क़दम जवाब दे रहे थे कि अचानक उसका सर किसी चीज़ से टकराया और वह बैठ गया और चीख़ा।
 
फ़रीदी मुड़ा... एहतियात से वह बीच सड़क पर आ गया था, ताकि पेड़ों की ओट या सहारा ले कर उस पर हमला न किया जा सके। हमीद इसका ख़याल न कर सका। सड़क के किनारे एक पेड़ की डाल से चारपाई बाँध दी गयी थी और चारपाई से दो इन्सानी सूरतें बँधी हुई थीं।

फ़रीदी ने टॉर्च जलायी।

‘‘उफ़्फ़ोह...!’’ उसके मुँह से निकला और उसने हमीद से कहा, ‘‘मैं इन्हें उतारता हूँ... तुम ठहरो।’’

चारपाई एक झूले की तरह लटका दी गयी थी और सईदा और ग़ज़ाला, दोनों उस चारपाई पर रस्सियों से बाँध दी गयी थीं। उतारने के बाद उसने कोशिश की उन्हें होश आ जाये, मगर उन्हें बुरी तरह से बेहोश किया गया था। ग्यारह बज चुके थे। फ़रीदी ने ग़ज़ाला और हमीद ने सईदा को लादा और चलना शुरू किया। वह दौड़ ख़त्म हो चुकी थी। सईदा हमीद के ऊपर लदी हुई थी। उसका बस चलता तो वह सईदा को पटक देता, मगर फ़रीदी... दबी आवाज़ में उसने फिर पूछा। ‘‘यह क्या क़िस्सा है?’’

‘‘ट्रेन में बताऊँगा... यह समझ लो... अभी तक हम बाज़ी नहीं हारे।’’

स्टेशन की बिल्डिंग दिखने लगी थी। ट्रेन का अभी पता नहीं था। मगर सिगनल हो चुका था... फ़रीदी ने ख़ुश हो कर हमीद से कहा। ‘‘हम जीत गये। पाँच मिनट बाद दुश्मन हमारे हाथ में होगा।’’

‘‘ठहरो... पहले मुझसे फ़ैसला कर लो।’’ एक रोबदार और गरजदार आवाज़ सुनाई दी।

फ़रीदी ने देखा... बग़ल से कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ पिस्तौल लिये... चले आ रहे थे। उनका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो रहा था। उन्होंने फिर कहा। ‘‘इन्हें रख दो।’’

हमीद ने चाहा कि कम-से-कम फ़रीदी की तरफ़ गर्दन घुमा कर देख सके... मगर कुँवर साहब ने देख लिया।

‘‘तुम सब बदमाश हो... मैं आज तुम्हें शूट कर दूँगा... फ़रीदी साहब... अब वह अकड़ कहाँ गयी।’’

फ़रीदी ख़ामोशी से कुँवर साहब की तरफ़ देखता रहा। ‘बदमाश।’ का शब्द सुनते ही हमीद ने झल्ला कर चाहा कि बढ़ कर कुँवर साहब का गला घोंट दे, मगर कुँवर साहब ने इरादा भाँपते हुए कहा। ‘‘ज़रा-सी हरकत हुई तो फ़रीदी इस दुनिया में न होंगे।’’

फिर उसने फ़रीदी को मुखातिब किया और कहा। ‘‘हाँ फ़रीदी साहब... तो कल आप पुलिस से कह देंगे कि शाकिर का क़ातिल मैं हूँ। आप मेरी वह तहरीर भी पेश कर देंगे, जिसमें उसे धमकी दी गयी थी कि अगर वह किताब मुझे न देगा तो मैं उसे मार डालूँगा।’’

अचानक ट्रेन की सीटी सुनाई दी। अपनी पूरी गड़गड़ाहट और शोर के साथ ट्रेन आ रही थी। रेल की पटरियाँ दूर से चमकती हुई साफ़ दिखायी दे रही थीं।

फ़रीदी के मुँह से एक ख़ौफ़नाक आवाज़ निकली और कुँवर साहब एकदम से पीछे हट गये। आँख झपकते ही पिस्तौल फ़रीदी के हाथ में था। उसने जल्दी से कहा। ‘‘आपने मेरा बहुत क़ीमती वक़्त बेकार किया... इन लड़कियों को ले जाइए। आप किसी ग़लतफ़हमी में हैं। हमीद जल्दी करो,’’ कहते हुए फ़रीदी ने फिर दौड़ना शुरू कर दिया। स्टेशन के सीधे दरवाज़े के बजाय अब उसका रु़ख रेलवे लाइन की तरफ़ था... ट्रेन ने प्लेटफ़ार्म से हरकत की। रेलवे लाइन और फ़रीदी में सिर्फ़ पचास गज़ का फ़ासला रह गया था।

ट्रेन प्लेटफ़ार्म छोड़ चुकी थी... फ़ासला दस गज़... ट्रेन औसत रफ़्तार पर थी... फ़ासला पाँच गज़... ट्रेन फ़रीदी की बग़ल से गुज़र रही थी। अचानक वह उछला और सामने से गुज़रने वाले अँधेरे डिब्बे के पायदान पर खड़ा हो गया। हमीद से उसने चीख़ कर कहा। ‘‘फ़ौरन किसी डिब्बे में घुस जाओ...’’ और ख़ुद उसी डिब्बे में घुस गया।

हमीद जिस डिब्बे पर खड़ा था, उसका दरवाज़ा अन्दर से बन्द था। उसने गर्दन उठा कर देखा... डिब्बे के ऊपर बनी हुई दो लकीरें ज़ाहिर कर रही थीं कि यह सेकेण्ड क्लास है। उसने ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीटना शुरू किया। सामने पुल आ रहा था और घाघरा नदी के किनारे कगारों के टूटने की तेज़ आवाज़ों का ज़ोर बढ़ता जा रहा था। भयानक सुनसान रात... उसे डर लगने लगा। फ़रीदी के ऊपर उसे ग़ुस्सा आ रहा था। ख़ुद तो मज़े में होंगे... मेरी भला उन्हें क्या फ़िक्र? अजीब सनकी आदमी हैं... दौड़ा डाला... बैठे-बिठाये मुसीबत... ज़बर्दस्ती... झल्लाहट में उसने खिड़की पर इतने मुक्के बरसाये कि खिड़की का एक ख़ाना टूट गया। अन्दर से बड़बड़ाने की आवाज़ सुनाई दी और किसी ने उठ कर दरवाज़ा खोल दिया। डिब्बे में दाख़िल हो कर उसने देखा... सिर्फ़ चार बर्थ थीं।

एक तरफ़ एक मोटी-सी औरत, जिसकी उम्र बीस साल से ज़्यादा न रही होगी, लेटी हुई थी। सामने एक साहब सो रहे थे। उनके ऊपर वाली बर्थ पर सर से पैर तक चादर ताने कोई पड़ा था।

अलबत्ता औरत की ऊपरी बर्थ ख़ाली थी। डिब्बे में अँधेरा था। लेकिन दूर एक छोटा-सा बल्ब जल रहा था जिसकी रोशनी में हमीद देख सकता था। हमीद ने चारों तरफ़ देखा और ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। तमाम रास्ते की थकान, दौड़ और मेहनत ने सेकेण्ड क्लास के गद्दे पर नींद ने उसको आवाज़ दी और वह सो गया।

उसकी आँख खुली तो दिन अच्छा-ख़ासा निकल आया था... ट्रेन विन्ध्याचल की ख़ूबसूरत पहाड़ी के बीच में से गुज़र रही थी। उसने झाँक कर देखा। वह औरत उठ चुकी थी। रात की उस मोटी-सी औरत ने नज़र उठायी और उसे मुस्कुराते देख कर खिलखिला कर हँस पड़ी और अजीब अन्दाज़ में बोली। ‘‘अब नीचे आओ न...?’’ हमीद को भला कहाँ बर्दाश्त...? इतने दिनों के बाद एक शिकार मिला था? क्या वह उसे भी छोड़ देगा। वह फ़ौरन कूद पड़ा।

जैसे ही उसने चाहा कि बैठे... औरत ने कहा। ‘‘ना...ना... पहले मुँह धो कर चाय पी लो फिर बातें करना।’’ हमीद को उसकी इस बात पर कुछ झटका लगा, मगर सामने बैठे हुए बंगाली को मुस्कुराते देख कर उसे ऐसा लगा जैसे उसकी मुस्कुराहट कह रही हो। ‘‘क्यों बे, डर गया ना आख़िर... बुद्धू... डरपोक,’’ और वह झट से बाथरूम में चला गया। मुँह धो कर जब वह बाहर निकला... औरत थर्मस में से चाय निकाल रही थी। रस से भरी जलेबी और टोस्ट एक प्लेट में रखे हुए थे। भुने हुए आलुओं के टुकड़े दूसरी प्लेट में। सेब की कुछ फाँकें और अंगूर के दाने भी पड़े थे। हमीद के मुँह में पानी भर आया। शाम को लाइब्रेरी में दो उबले हुए अण्डों और एक प्याली चाय के अलावा उसे कुछ न मिल सका था। बैठ कर उसने खाते हुए कहा कि

‘‘आप कहाँ से...?’’

लेकिन जुमला पूरा होने से पहले ही टी.टी. की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

‘‘टिकट प्लीज़...!’’ वह टिकट न दे सकता था। सिवा चार्ज देने के और चारा ही क्या था। फिर जब चार्ज ही देना है तो जल्दी क्या है। खा कर दे देंगे, उसने सोचा और टी.टी. से कहा। ‘‘अभी देता हूँ।’’

औरत की तरफ़ बढ़ कर जब टी.टी. ने हाथ बढ़ाया तो उसने हमीद की तरफ़ इशारा कर दिया, जिसे हमीद न देख सका। ख़ूब पेट भर खाने के बाद उसने टी.टी. से कहा। ‘‘पिछले जंक्शन से चार्ज कर लीजिए। जल्दी में टिकट न ख़रीद सका।’’ चार्ज शीट बनाने के बाद टी.टी. ने कहा। ‘‘बारह सौ रुपये।’’

‘‘कितने...?’’ हमीद ने उछल कर कहा। ‘‘ज़रा देखूँ, कहाँ से चार्ज कर रहे हैं आप...!’’

‘‘जी... जबलपुर से... दो आदमी... सेकेण्ड क्लास...!’’ टी.टी. बोला।

‘‘दो कौन...!’’ हमीद ग़ुर्राया।

‘‘आप और आपकी... यानी कौन हैं ये आपकी...!’’ टी.टी. ने कहा।

‘‘धर्मपत्नी...’’ औरत कुछ झेंपते हुए बोली। फिर हमीद की तरफ़ देखकर कहने लगी। ‘‘अरे, टी.टी. साहब को चाय-पानी के लिए कुछ दे दो... इतना न लेंगे।’’

हमीद को जैसे हज़ारों बिच्छुओं ने डंक मार दिया हो। बटुए में सिर्फ़ एक हज़ार रुपये और ज़बर्दस्ती की मुसीबत अलग सर पर।

उसने बिफरते हुए कहा। ‘‘यह औरत झूठी है... मेरा इससे कोई नाता नहीं।’’

बंगाली बाबू जोश में खड़े हो गये। ‘‘शर्म नहीं आता... अपनी औरत को छोड़ता है... छी थू...!’’

ऊपर वाला आदमी वहीं से लेटे-लेटे बोला। ‘‘अगर बीवी नहीं तो फिर कौन है... अभी तो साथ बैठ कर खा रहा था... कहता है कोई नाता नहीं... चार सौ बीस।’’ ट्रेन अब स्टेशन पर पहुँच रही थी। टी.टी. ने डाँट कर औरत से पूछा। ‘‘सच-सच बता तेरा यह कौन है।’’

‘‘हाय... हाय... टी.टी. साहब... मेरे पति हैं। परसों हमारा...!’’ वह कुछ रोते हुए बोली। ‘‘लो, मेरे पैर देख लो।’’ उसके रँगे हुए पैर और चाँदी के छल्ले गवाही दे रहे थे कि अभी-अभी उसकी शादी हुई है।
 
उसने फिर हमीद का हाथ पकड़ते हुए कहा। ‘‘रुपये के डर से कंगन भी छिपा दिये। हाँ... हाय मेरी तक़दीर फूट गयी।’’ कहते हुए उसने ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर रोना शुरू कर दिया। ट्रेन स्टेशन पर खड़ी हो गयी थी। अच्छी-ख़ासी भीड़ जमा हो चुकी थी। हमीद की जान अजीब मुसीबत में फँस गयी थी... उसकी तलाशी पर जेब से एक बटुआ जिसमें एक हज़ार रुपये, एक कंगन और चार-पाँच विज़िटिंग कार्ड मिले जिस पर लिखा था। ‘धर्मदास बी.ए. कमर्शियल आर्टिस्ट’ औरत से जब नाम पूछा गया तो उसने कहा। ‘‘मैं उनका नाम नहीं ले सकती।’’ बड़ी मुश्किल से उसने एक पर्चे पर वही नाम लिख दिया जिस नाम के विज़िटिंग कार्ड बने थे। हमीद चकरा गया था। चारों तरफ़ से लोग टूटे पड़ रहे थे और उसे बुरा-भला कह रहे थे। हमीद की निगाहें फ़रीदी को ढूँढ रही थीं, उसने कई बहाने करके सिपाहियों के साथ ट्रेन के कई चक्कर लगा डाले, मगर फ़रीदी न मिला। इधर ट्रेन ने सीटी दी, हमीद ने लाख चाहा कि उसे फिर ट्रेन में बैठने दिया जाये, मगर टी.टी. किसी हालत में न माना... वह बार-बार कहे जा रहा था... ‘‘पूरा चार्ज दीजिए... और बैठिए।’’

ट्रेन धीरे-धीरे रेंगने लगी। हमीद ने आख़िर बार कोशिश की कि वह बैठ सके, मगर नाकाम रहा और ट्रेन चली गयी। भीड़ कम हो गयी थी और वह औरत ग़ायब थी।

उसने मुड़ कर टी.टी. से कहा। ‘‘चार्ज लीजिए... मगर मेरी बीवी ढूँढ लाइए।’’

टी.टी. हैरत में पड़ गया। अभी एक सेकेण्ड पहले वह उसकी नर्म-नर्म हथेलियों से मज़ा लेता हमीद से बहस में उलझा हुआ था... ‘‘वह औरत कहाँ गयी।’’

शर्मिन्दा हो कर उसने हमीद से कहा। ‘‘मुझसे ग़लती हुई।’’

हमीद ने जेब से अपना कार्ड जब निकालना चाहा तो वह ग़ायब था।

एक काग़ज़ पर अलबत्ता लिखा हुआ था–‘‘पहली और हल्की-सी चोट अपने हमीद के लिए... उस्ताद की भी ख़बर लेना।’’

हमीद बौखला गया, जैसे ख़्वाब की लहरें... सिनेमा की तस्वीरें या पूरी रेलगाड़ी उसके सिर से गुज़र गयी हो। वह सिर थाम कर बैठ गया... उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे कि इतने में उसी टी.टी. ने उसे आ कर कहा। ‘‘आपका ट्रंककॉल आया है हमीद साहब।’’ उसने रिसीवर से सुना। फ़रीदी कह रहा था। ‘‘रामगढ़ लौट आओ।’’

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

लेफ़्टिनेंट बाक़िर

दूसरे रोज़ सुबह चाय पर बातें करते हुए फ़रीदी ने कहा, ‘‘हमीद मियाँ! मैंने ज़िन्दगी में कभी हार नहीं मानी... मगर मैं मानता हूँ कि मैं उसके सामने स्कूल का बच्चा हूँ... ग़ज़ब का दिमाग़ है ज़ालिम का।’’

कहते-कहते फ़रीदी ठहर गया। हमीद पूरा क़िस्सा जानने के लिए बेताब था, उसने मुँह खोला ही था कि फ़रीदी ने इशारे से रोक दिया और कहना शुरू किया।

‘‘मुझे पूरा य़कीन था कि शाकिर के केस में जाबिर का हाथ है। उस रोज़ सुबह की डाक से मुझे ख़बर मिली थी कि बम्बई के मशहूर व्यापारी सेठ गुन्नूमल छेदी लाल के यहाँ डाके का नोटिस मिल चुका था। इधर नवाबज़ादा शाकिर की जायदाद के एक वारिस और खड़े हो चुके थे। वे भी उस गाड़ी से बम्बई जा रहे थे। जाबिर की यह तरकीब मेरी समझ में आ गयी। मैंने बम्बई पुलिस को तार दे दिया था कि वे लोग स्टेशन पर मौजूद रहें और मेरे साथ जिसे देखें, गिरफ़्तार कर लें। या रास्ते ही में कहीं उसे धर लें। सिर्फ़ इसलिए कि मेरे काम में रुकावट हो और कुँवर साहब मेरे दुश्मन हो जायें, उसने मेरा भेस भरा... दूसरी तरफ़ उसे य़कीन हो गया था कि मैं ज़रूर उसका पीछा करूँगा। मोटर का रास्ता रोकने के लिए उसने टाइम स्विच बम लगाये और रास्ते में रस्सियाँ बाँध कर देर करा दी... और जब उसमें नाकाम रहा तो इत्तफ़ाक़ ने हमें कुँवर साहब की नज़र में गिरा दिया। इस तरह रास्ते में रोड़े अटकाता वह लेफ़्टिनेंट बाक़िर के डिब्बे में बैठने में कामयाब हुआ। आज का अख़बार देखो ‘‘सेठ गुन्नूमल छेदी लाल बुरी तरह लुट गये... और लेफ़्टिनेंट बाक़िर और उनके लड़के ज़ाकिर पर जानलेवा हमला किया गया... वे बच तो गये मगर उनकी तमाम क़ीमती दस्तावेज़ें और ऩकदी लूट ली गयी।’’

‘‘तो फिर आप वापस क्यों लौट आये?’’ हमीद ने बेताबी से पूछा।

‘‘यह मेरी हार और जाबिर की जीत की कहानी है। मैं जिस डिब्बे में घुसा था, उसमें बिलकुल अँधेरा था... मैंने टॉर्च जला कर पूरे डिब्बे में देखा। डिब्बा ख़ाली था... मैं उसी डिब्बे में लेटा रहा। पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी... और जब मेरी आँख खुली तो मैं ब्रांच लाइन के एक छोटे-से स्टेशन पर था... वह डिब्बा जिसमें मैं था, अगले जंक्शन पर काट दिया गया था।

‘‘मैंने देखा, दुश्मन काम कर चुका है। सिवा लौटने के कोई चारा नहीं था। रामगढ़ स्टेशन मास्टर को मैंने तुम्हारे बारे में ख़बर दे दी थी... तुम्हें यहाँ से ट्रंककॉल किया गया... मैं आया और आगे तो तुम जानते ही हो... मगर तुम्हारी बीवी क्या हुई?’’ फ़रीदी ने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया... और हमीद ने झेंप मिटाते हुए कहा।

‘‘वह शाकिर की लाइब्रेरी वाली किताब में क्या था... उसके बारे में आपने कुछ नहीं बताया।’’

फ़रीदी का चेहरा अचानक संजीदा हो गया... उसने ठहर-ठहर कर कहा। ‘‘वह मेरे तर्कश का आख़िर तीर होगा।’’

इतने में नौकर ने मेज़ पर विज़िटिंग कार्ड ला कर रखा।

‘‘लेफ़्टिनेंट बाक़िर... ओ.बी.ई.।’’

‘‘बुला लो...!’’ हमीद ने कहा।

औसत उम्र का आदमी... बायें गाल पर छोटा-सा तिल। छोटी धँसी हुई आँखें... लम्बा चेहरा... और लाल नाक। ये थे लेफ़्टिनेंट बाक़िर... उनके साथ २५-२६ साल का एक नौजवान और था जिसका परिचय लेफ़्टिनेंट साहब ने, ‘‘मेरा लड़का... ग्रैजुएट है... इम्तहान की तैयारी कर रहा है।’’ इन शब्दों से कराया। ज़ाकिर दुबला-पतला, भूरा रंग... बड़ी-बड़ी आँखें... चेहरे से मालूम होता था कि कम बातचीत करने का आदी है।

रस्मी परिचय के बाद लेफ़्टिनेंट साहब ने कहा। ‘‘फ़रीदी साहब, मुझे आप ही बचा सकते हैं। मेरा जवान भाई मर गया...!’’ कहते-कहते वे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। जज़्बात पर क़ाबू पाते हुए उन्होंने कहा। ‘‘मेरी बहन सईदा लालची है। कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ उसे बहका रहे हैं। मुझे जायदाद नहीं चाहिए, मगर बाप-दादा की ड्योढ़ी मैं यूँ नहीं छोड़ सकता।’’ और फिर उनका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया। ज़ाकिर ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा। ‘‘अब्बा जान... सब्र से काम लीजिए।’’ बाक़िर साहब ठहर गये और रुक-रुक कर बोले। ‘‘मशहूर डाकू राहुल मेरे पीछे अलग लगा हुआ है। उसने मुझे कहीं का न रखा। मेरे काग़ज़ात दिलवा दीजिए उससे... फ़रीदी साहब, मैं ज़िन्दगी भर आपका एहसान मानूँगा।’’

फ़रीदी बाक़िर साहब की बात सुनता रहा। बीच में हमीद ने कई बार कोशिश की कि उनसे सवाल करे, मगर फ़रीदी का इशारा पा कर वह भी ख़ामोश रहा।

फ़रीदी काफ़ी देर तक सोचता रहा। रह-रह कर उसकी आँखें चमक उठतीं। उसने बाक़िर साहब के चेहरे पर नज़रें गाड़ दीं जैसे उनके चेहरे में कुछ तलाश कर रहा हो और एक लम्बी ख़ामोशी के बाद बोला।

‘‘मैं आपको कुछ बता देना चाहता हूँ। वह यह कि यहाँ के मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं। मैं सिर्फ़ अपने दोस्त के लिए यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपसे जो कुछ बताया गया है, वह सच नहीं है। राहुल को मैं अच्छी तरह जानता हूँ और इसीलिए फ़िलहाल मैं यह नहीं कह सकता कि राहुल ही आपके पीछे पड़ा हुआ है। बहरहाल, आप मुझे माफ़ कर दें।’’

दुनिया देखे आदमी की तरह लेफ़्टिनेंट बाक़िर फ़रीदी की बातें सुनते रहे। उनके चेहरे पर मायूसी की एक लहर दौड़ गयी। उन्होंने फिर कहा, ‘‘फ़रीदी साहब... मैं आपसे इन्सानी हक़ और रिश्ते की बिना पर कह रहा हूँ... आप मेरा साथ दीजिए। ख़ुदा आपकी मदद करेगा। मैं अपने हालात आपके सामने रख रहा हूँ। मेरी बदक़िस्मती पर अगर आपको तरस आ जाये तो इस काम में हाथ डालिए, वरना आपको अख़्तियार है।

‘‘मेरे वालिद नवाब ज़ायर अली ख़ाँ थे, उनकी पहली शादी राजा सय्यदपुर की लड़की से हुई थी। शादी के तीन साल बाद मेरी माँ का इन्तक़ाल हो गया। बारह साल तक बाप ने शादी न की। लेकिन आख़िरकार उन्हें शादी करनी ही पड़ी। अपनी दूसरी माँ के रवैये से तंग आ कर मैं भाग निकला... बम्बई के एक कारख़ाने में नौकरी करके पढ़ाई की और फिर इस ओहदे तक पहुँचा। अब बाक़ायदा पेन्शन मिल रही है। मुझे हमेशा शर्म आती थी कि बाप के इन्तक़ाल के बाद अगर घर जाऊँगा तो शाकिर सोचेगा कि जायदाद में हिस्सा बटाने आ पहुँचे, लेकिन मरहूम को ख़ुद मेरा ख़याल था। मरने से एक हफ़्ता पहले उनका ख़त मिला था जिसमें उन्होंने मुझे बुलाया था और अब जब मैं आया हूँ तो वे मरहूम...!’’ बाक़िर साहब जितनी देर तक बातें करते रहे रोते रहे और आख़िर जुमले पर पहुँच कर उनकी हिचकियाँ बँध गयीं।
 
हमीद बुरी तरह उनसे मुतास्सिर हुआ था। उनके बुढ़ापे और उनकी हालत पर उसे रहम आ रहा था। फ़रीदी यह पूरी बात लापरवाही के अन्दाज़ से सुनता रहा। नवाबज़ादा शाकिर का ख़त देखने के बाद वह कुछ देर तक सोचता रहा फिर उसने उसे बाक़िर को वापस करते हुए कहा।

‘‘मगर सईदा का बयान है कि नवाबज़ादा शाकिर का कोई रिश्तेदार नहीं था।’’

‘‘हो सकता है, वह मुझे न पहचाने, मगर उसे मालूम है कि शाकिर का एक बड़ा भाई भी था। ख़ानदान में यह बात मशहूर कर दी गयी थी कि बाक़िर मर गया। इसमें शाकिर के ननिहाल वालों का हाथ था... मगर वे सब मर गये।’’

‘‘सब...!’’ हमीद के मुँह से एकदम से निकला।

‘‘जी हाँ... कुछ साल पहले फैली महामारी में।’’

‘‘बहरहाल... मैं वकील नहीं... लेकिन सुनने से ऐसा लगा कि आपका मुक़दमा काफ़ी मज़बूत है। अदालत में आप दरख़्वास्त दे चुके हैं। वहाँ का फ़ैसला जज के अख़्तियार में है। रह गया आपकी हिफ़ाज़त का सवाल... तो मैं इतना कर सकता हूँ कि पुलिस का बेहतर इन्तज़ाम करा दूँ। अब अगर इजाज़त दें तो बेहतर है।’’ फ़रीदी ने कुछ रुखाई से यह जुमला कहा। मगर लेफ़्टिनेंट साहब का चेहरा वैसे ही संजीदा रहा... वे ख़ामोशी से उठे और एक बार फिर फ़रीदी के चेहरे को ग़ौर से देखा, फिर एक ठण्डी साँस भरते हुए अपने लड़के से बोले। ‘‘आओ बेटा... चलें।’’

दरवाज़े पर पहुँच कर उन्होंने मुड़ कर देखा और धीमी आवाज़ में बोले।

‘‘ज़हमत का शुक्रिया।’’ और चले गये।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

आग, ख़ून और गोले

फ़रीदी और हमीद शहर के नज़दीक पहुँच रहे थे। शहर की चहल-पहल शुरू हो गयी। एक लम्बी साँस खींचते हुए हमीद ने कहा।

‘‘क्या मुसीबत थी।’’

‘‘हूँ...!’’ फ़रीदी ने कहा और चुप रहा।

‘‘मैं समझता हूँ, हमें अब रामगढ़ छोड़ ही देना पड़ेगा।’’हमीद ने मायूसी से कहा।

फ़रीदी ख़ामोश रहा। ‘‘तुम्हें अभी शहर में भी आग मिलेगी,’’ फ़रीदी कुछ देर रुक कर बोला। ‘‘आओ, जल्दी करें।’’

सामने होटल खुला हुआ था। हमीद से न रहा गया।

‘‘सिर्फ़ एक प्याला चाय।’’ हमीद ने घिघिया कर कहा।

और दोनों होटल में दाख़िल हो गये।

एक ख़ूबसूरत नौजवान सामने बैठा हुआ चाय पी रहा था।

एक नज़र में फ़रीदी ने उसे पहचान लिया... उसने शायद अभी-अभी सिगरेट जलायी थी। सिगरेट का हल्का-हल्का धुआँ उठ रहा था। उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ नज़र आ रही थी। वह फ़रीदी को देख कर उठा और सिगरेट का कश खींचते हुए उसकी तरफ़ बढ़ा।

फ़रीदी के पास पहुँचते ही वह ज़मीन पर बैठ गया और ज़ोर-ज़ोर से गला दबाने लगा। ‘‘अरे... अरे... ये तो रुख़्सत हुए।’’ कहता हुआ फ़रीदी उठा। उसकी आँखों से शरारत उबलने लगी। ‘बेचारा ज़ाकिर’ फ़रीदी के मुँह से निकला।

हमीद ने पानी का गिलास उठा कर जल्दी-जल्दी छींटे देने शुरू कर दिये। होटल में एक हंगामा हो गया था। लोग जगहें छोड़ कर वहाँ खड़े हो गये थे। किसी ने फ़रीदी के कन्धे पर हाथ रखा। ‘‘ये ख़त्म हो गये... इन्हें सिगरेट में ज़हर दिया गया है।’’ कहते हुए वह पीछे मुड़ा। ‘‘तारिक़ साहब... अरे आप?’’

‘‘फ़रीदी साहब... फ़ौरन चलिए... ग़ज़ाला की हालत नाज़ुक है।’’

फ़ोन करने के बाद लाश को पुलिस के हवाले करके और हमीद को हिदायत दे कर फ़रीदी तारिक़ के साथ चला।

‘‘वे लोग कहाँ हैं?’’

‘‘सईदा के घर में आग लगा दी गयी। उसके यहाँ के सारे कबूतर ग़ायब हैं और सिर्फ़ ग़ज़ाला ज़ख़्मी है। वे लोग अभी-अभी यहाँ आये हैं।’’

‘‘मगर बाक़िर और ज़फ़र के ताल्लुक़ात...?’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘आपको शायद हालात मालूम नहीं। बाक़िर साहब और सईदा में समझौता हो गया। अदालत ने बाक़िर को शाकिर का भाई मान लिया है, लेकिन उन्होंने अपनी तरफ़ से जायदाद सईदा के नाम कर दी है। सिर्फ़ घर उनके क़ब्ज़े में है। हालाँकि जिस वक़्त आग लगी है, बाक़िर साहब वहीं मौजूद थे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने सबको निकाला।’’

फ़रीदी सुनता रहा... और थोड़ी देर ख़ामोश रह कर बोला।

‘‘मैं नवाब और कुँवर साहब से मिल भी न सका। बहुत-सी बातें मालूम करना थीं। मेरा मुक़ाबला ऐसे आदमी से है, जिसके काम करने के तरीक़े सबसे अलग हैं। वह ताबड़-तोड़ ऐसे हमले करता जाता है कि मुख़ालिफ़ को सोचने का मौक़ा ही न मिल सके। हाँ... ग़ज़ाला का क्या हुआ?’’

‘‘मैं बता रहा था... वे लोग कुछ आपसे नाराज़ मालूम होते हैं। ख़ासकर कुँवर साहब... जिस वक़्त आग लगी है, हमें ऐसा मालूम हुआ जैसे जलती हुई शहतीरों के बीच से आप बच निकलने की कोशिश कर रहे हों। हम सब बढ़े और ग़ज़ाला भी, मगर इससे पहले कि हम में से कोई हिम्मत कर सके, वह आग में दाख़िल हो चुकी थी। जलती हुई आग में से बड़ी मुश्किल से उसे निकाला गया... वहाँ से आने के बाद बाक़िर साहब ने मुझे उस होटल में ज़ाकिर को बुलाने के लिए भेजा और यहाँ आप मिल गये... बेचारे बाक़िर साहब... उनका यही एक लड़का था।’’

फ़रीदी और तारिक़ नवाबज़ादा शाकिर के मकान पर जब पहुँचे हैं, वहाँ भी आग लग चुकी थी। आग मकान के पिछले हिस्से की तरफ़ से लगायी गयी थी और बाहरी हिस्से तक पहुँचने से पहले उसे बुझाने की कोशिश काफ़ी हद तक कामयाब हो चुकी थी। मकान के सामने बाक़िर साहब चीख़-चीख़ कर रो रहे थे। शायद ज़ाकिर के मरने की ख़बर उन्हें मिल चुकी थी। ग़ज़ाला बाहर ही एक पलँग पर लिटायी गयी थी। सिर्फ़ ज़रा-सी ख़राश आयी थी और पैर का निचला हिस्सा जला था।

‘‘बिलावजह तारिक़ ने परेशान कर दिया।’’ फ़रीदी मिनमिनाया और फिर पलट कर नवाब साहब की तरफ़ मुड़ा। नवाब रशीदुज़्ज़माँ बिलकुल गुमसुम थे और सईदा, ग़ज़ाला के पास बैठी हुई फटी-फटी आँखों से देख रही थी। कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ का कहीं पता न था।

‘‘जज सिद्दीक़ अहमद के यहाँ चोरी हो गयी... मगर उनके कबूतरों के अलावा उनकी सब चीज़ें महफ़ू़ज हैं।’’ एक सिपाही ने ख़बर दी... और बाक़िर साहब के घर पर तैनात इन्स्पेक्टर ने फ़रीदी से कहा। ‘‘आग लगाने का मक़सद मेरी समझ से बाहर है। नवाबज़ादा शाकिर के तमाम पुराने कबूतरों के अलावा घर की हर चीज़ मौजूद है।’’
 
‘‘मगर आग लगाने वालों में से किसी को आप देख सके।’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘एक शख़्स गिरफ़्तार हुआ है... उसे भागते हुए देख कर गोली चलायी गयी थी। उसके बायें कन्धे पर गोली लगी है। यह लीजिए, उसे ये लोग ले भी आये।’’

वह आदमी बेहोश था... फ़रीदी ने रोशनी उठा कर उसके चेहरे को ग़ौर से देखा और चौंक कर पीछे हट गया।

‘‘कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ!’’

उसके मुँह से निकला। बाक़िर साहब कुँवर को देखते ही चीख़ने लगे।

‘‘बहन सईदा, देखा तुमने... इसी ने मेरे भाई की जान ली। इसी ने घर में आग लगायी। इसी ने मेरे बेटे को मारा... और अब यह मुझे भी मारना चाहता है। अगर यह मुझसे कह देता तो मैं इसे यूँ ही कबूतर दे देता।’’ उनकी आवाज़ में औरतों जैसा दर्द झलक रहा था। वे बेतहाशा चीख़ रहे थे। उनकी आँखों से आँसुओं की धारें बह रही थीं।

‘‘इन्हें हस्पताल भिजवा दीजिए... दुश्मन हम सबको ग़लतफ़हमी में डालता रहा है... मैं जा रहा हूँ।’’ फ़रीदी कहता हुआ नवाब साहब के पास रुका, ‘‘आप माथुर साहब के यहाँ सईदा, ग़ज़ाला और तारिक़ के साथ चले जाइए... मगर देखिए, कल रात तक वहाँ से कहीं और न जाइएगा...!’’ कहता हुआ फ़रीदी ग़ायब हो गया।

नवाब साहब फ़रीदी की हिदायत के मुताबिक़ चले तो गये। मगर दूसरे रोज़ शाम को ग़ज़ाला की तबीयत सँभलने पर बाक़िर साहब के बुलाने पर उनके घर चले आये। सईदा अपने मकान पर लौट आयी थी और कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ पर नवाबज़ादा शाकिर के क़त्ल और उनके भाई लेफ़्टिनेंट बाक़िर के घर में आग लगाने और चोरी के इल्ज़ाम में लेफ़्टिनेंट बाक़िर की तरफ़ से मुक़दमा चला दिया गया था। वे ज़मानत पर छोड़ दिये गये थे... और हस्पताल में थे।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
फ़रीदी गिरफ़्तार

अपने कमरे में बैठा हुआ फ़रीदी दो किताबों को देखने में लगा था। क़लमी ख़ाके वाली किताब पर नवाबज़ादा शाकिर ने कुछ निशान लगा रखे थे। दूसरी किताब पढ़ते हुए उसने कुछ नोट लिखे... दफ़्ती वाला काग़ज़ फटा हुआ था... उसने कुछ सोचा और फिर दोनों किताबें उठायीं और उन्हें अपनी अलमारी में बन्द कर दिया। थोड़ी देर बाद उसने अलमारी खोली। किताबें अलमारी में नहीं थीं।

‘‘ठीक है...!’’ वह बड़बड़ाया। ‘‘मैं जानता था जाबिर कि तुम यहाँ आओगे... इन किताबों के लिए... तुम्हें मेरी सख़्त ज़रूरत है और ये किताबें अब न मिल सकेंगी... ये बहुत दूर चली गयी हैं।’’

जेब से एक तस्वीर निकाल कर उसने ग़ौर से देखा और फिर उसे जेब में रखते हुए बाहर निकल आया।

शाम हो चुकी थी। हमीद का कहीं पता न था। फ़रीदी ने उसे लेफ़्टिनेंट बाक़िर के घर पर निगरानी के लिए तैनात कर दिया था। उसके ख़याल से उसे अब वापस आ जाना चाहिए था... वह होटल के बरामदे में इन्तज़ार करता रहा और आख़िर तंग आ कर लेफ़्टिनेंट बाक़िर के घर की तरफ़ रवाना हो गया।

लेफ़्टिनेंट बाक़िर के घर पर बिलकुल सन्नाटा था। पुलिस के दो सिपाही बैठे ऊँघ रहे थे। लाइब्रेरी में शीशे से छन-छन कर रोशनी आ रही थी। फ़रीदी ने झाँक कर देखा लेफ़्टिनेंट साहब कमरे में किताबों में लगे थे... थोड़ी देर तक वे किताबें देखते रहे फिर उन्होंने दराज़ से पिस्तौल निकाल कर अपनी जेब में रखी और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। फ़रीदी ने फ़ौरन अपने को छुपा लिया... लेफ़्टिनेंट साहब जैसे ही बाहर निकले, वे कुछ अजीब तरीक़े से खाँसे... उन्होंने जेब से रूमाल निकाला और अपने मुँह को एक बार पोंछा... कमरे का दरवाज़ा बन्द किया। ताला लगाया और सिपाहियों को देखते हुए बाहर चले गये।

फ़रीदी उनके जाते ही लपका। जिस जगह वे रुके थे वहाँ पर पड़े हुए काग़ज़ के टुकड़े को उसने उठाया और लाइब्रेरी के दरवाज़े के निचले पट पर उसने अपने डिब्बे से पाउडर निकाल कर छिड़क दिया... देखते-ही-देखते लकड़ी का वह टुकड़ा धुआँ उगलने लगा। जल्दी से फ़रीदी ने अपनी उँगलियाँ रूमाल से बाँध कर उन्हें अन्दर की तरफ़ दबाना शुरू किया। लकड़ी का तख़्ता एक हल्की आवाज़ के साथ नीचे आ गिरा और फ़रीदी उसी रास्ते से अन्दर चला गया। बातचीत करने की हल्की-हल्की मद्धिम-सी आवाज़ें आ रही थीं। फ़रीदी ने कान लगा कर सुना। तारिक़ अपनी सैलानी ज़िन्दगी के क़िस्से सुना रहा था... कभीकभी नवाब रशीदुज़्ज़माँ के बोलने की आवाज़ भी आ जाती। ग़ज़ाला के क़हक़हे की आवाज़ें उसने साफ़ पहचान लीं।

उसने सोचा कि उन लोगों को यहाँ से हटा दे, मगर एक जानी-पहचानी आवाज़ फिर उसे सुनाई दी। माथुर साहब बोल रहे थे। ‘‘ये भी यहीं हैं तब ठीक है।’’

काग़ज़ जेब से निकाल कर फ़रीदी ने एक बार पढ़ा और फिर उसे जेब में रख लिया। अलमारी की बग़ल में रखे हुए स्टूल पर एक मूर्ति रखी हुई थी। फ़रीदी की उँगलियाँ उस मूर्ति पर कुछ तलाश करती रहीं। अचानक उसका हाथ मूर्ति के पिछले हिस्से पर पड़ा और हल्की-सी आवाज़ के साथ मूर्ति का सर बीच से खुल गया। अन्दर एक छोटे-से सन्दूक में बहुत-से ख़त रखे थे। फ़रीदी ने उन्हें निकाला और देखता रहा। एक तस्वीर देखते ही उसका मुँह खुला-का-खुला रह गया। ‘‘मैं इतना नहीं समझा था... इतनी शानदार अदाकारी और ऐसा भेस।’’ फ़रीदी दिल-ही-दिल में बोला।

ख़तों को इकट्ठा करने के बाद उसने उन्हें अलमारी के बिलकुल ऊपर रख दिया... सामने एक किताब खुली हुई थी... ऐसा मालूम होता था जैसे अभी इस पर कोई शख़्स कुछ लिख रहा था और फिर अधूरा छोड़ कर उठ गया है।

किताब के बहुत से पन्ने सादे थे। सरसरी तौर पर फ़रीदी ने पन्ने उलटे... जिस्म की बनावट... शरीर के अलग-अलग अंगों, उनकी हरकत और रूहों के बारे में एक ब्योरेवार मज़मून था। आख़िर उसे वह चीज़ दिखायी दे ही गयी। मेज़ के नीचे कबूतरों के पंजे में डाले जाने वाले तीन छल्ले एहतियात और हिफ़ाज़त के साथ छोटे-से बक्स में रखे थे। बक्स पर धूल जमी हुई थी, मगर ऐसा मालूम होता था जैसे उस बक्स पर से ध्यान हटाने और उसे मामूली–सा जतलाने के लिए धूल-मिट्टी डाली गयी है। बक्स के ऊपर दो जूते और सामने बहुत-सी चप्पलें रखी हुई थीं। बग़ल में एक डिब्बा उसी हालत में था। सिगरेट की तम्बाकू उसमें भरी हुई थी... फ़रीदी ने चुटकी से तम्बाकू सूँघा... ‘‘अरे,’’ उसके मुँह से अचानक निकला।

तम्बाकू और छल्ले वाले ख़त ले कर वह दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। उसकी आँखों में दमदार चमक थी।

अचानक उसे लगा कि वह आगे नहीं बढ़ पा रहा। उसने झुक कर देखा... पैरों में तार से ज़्यादा महीन चीज़ जकड़ी हुई थी... उसने चाहा चीख़े... मगर गर्दन में भी ऐसी ही एक मुसीबत थी... सामने जाबिर खड़ा मुस्कुरा रहा था।

‘‘फँस गये न आख़िर... तुमने मुझे फँसाना चाहा और ख़ुद फँस गये... अगर मुझे पाँच मिनट की भी देर होती तो तुमने तो मुझे ख़त्म ही कर दिया था...’’ वह कुछ धीमी आवाज़ में बोला। फ़रीदी ने हाथ से पिस्तौल निकालने की कोशिश की, मगर पिस्तौल निकालने से पहले हाथों की ताक़त ख़त्म हो गयी... जाबिर हँसा।

‘‘यह अनाड़ीपन छोड़ो... मैं इतना गधा नहीं हूँ कि तुम्हें पिस्तौल निकालने का भी मौक़ा दूँ... ये तार देखो... बड़ी मेहनत से तैयार किये हैं मैंने... इनसे इन्सानी जिस्म की ताक़त ख़त्म हो जाती है। तुम देख सकते हो, सोच सकते हो... मगर न बोल सकते हो और न हरकत कर सकते हो... इस तार का नुस्ख़ा जर्मनी में डॉक्टर वानरीच से हासिल किया गया था।’’

वह बोलता रहा... ग़ुस्से से उसकी भवें तन गयी थीं... उसने अपनी नाक उठायी और अपना मुँह फ़रीदी के बिलकुल सामने ले आया। फ़रीदी की आँखें ख़ौफ़ से बन्द हो गयीं... मुँह के अन्दर उसने एक थैली लटका रखी थी।

‘‘फ़रीदी बेटे।’’ वह चुमकारते हुए बोला। ‘‘दो-चार से भिड़ गये और अपने को तीस मार ख़ाँ समझ लिया... यह थैली देखते हो। मैं इसे निकाल लूँ तो मेरी आवाज़ सुनते ही तुम बेहोश हो जाओ... इसमें एक गोली छोड़ो... आवाज़ टाइट होगी... दो... औसत... तीन... नर्म... चार... टाइट ज़नाना... पाँच... सुरीली ज़नाना आवाज़... समझे।

‘‘मगर देखो... तुम बेहोश होने इरादा कर रहे हो... यह बड़ी बुरी बात है... ख़ैर... यह बताओ... किताबें मुझे दोगे या कुत्ते की मौत मरना चाहते हो? बोलो... अच्छा लो... मैं तुम्हें तुम्हारे एक हाथ की ताक़त वापस देता हूँ।’’

जाबिर ने एक हाथ का तार निकाल लेने से पहले पिस्तौल और ख़तों को अपने पास रख लिया... और फिर फ़रीदी से बोला।

‘‘इशारे से बता दो... किताबें दोगे या नहीं।’’

फ़रीदी ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया।

‘‘बिलकुल घामड़ समझते हो... मैं तुम्हारे पास आऊँ... तुम मार ही दो... कौन जाने? ज़िद्दी तो हो ही...किताब दोगे।’’

फ़रीदी ने इनकार किया... तीन बार उसने पूछा और फ़रीदी इनकार ही करता रहा।

‘‘ख़ैर... तुम अक़्लमन्द आदमी हो... और हिन्दुस्तान में ऐसे आदमियों की कमी है, इसलिए तुम्हें मारना नहीं चाहता... क्या फ़ायदा... बता दो... अच्छा चलो, मैं तुम्हें जाबिर के एक हमशक्ल की लाश दूँगा... शायद चीफ़ कमिश्नर बना दिये जाओ... इसलिए कि तुम्हारी हुकूमत के कुछ अहम तिजारती काग़ज़ात भी मेरे पास हैं। बड़ा नाम होगा तुम्हारा... मैं वादा करता हूँ कि फिर हिन्दुस्तान नहीं आऊँगा... अब देते हो।’’

फ़रीदी ने फिर इनकार किया।

‘‘देखो, ज़िद न करो... तुम मुझसे बहुत पीछे हो... मैं हज़ारों साल ज़िन्दा रहने का तजरुबा कर रहा हूँ। उस किताब से मुझे बड़ी मदद मिलेगी। इन्सानी ख़ून की जितनी मुझे ज़रूरत थी, वह मुझे मिल चुका है। मुझे बता दो... मैं तुम्हारा ऐतबार करता हूँ। मैं तुम्हें छोड़ दूँगा... मेरे पास वक़्त नहीं है। अभी इसी कमरे में पहले तारिक़ आयेगा... फिर तुम्हारे दोस्त माथुर आयेंगे... फिर जज सिद्दीक़ अहमद आयेंगे। उस छोकरे को अच्छी ट्रेनिंग दे रहे हो। ख़ैर... अगर किताब न दोगे तो ये सब मर जायेंगे।’’

फ़रीदी ने फिर इनकार किया।

‘‘तब तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी हो और बेवक़ूफ़ के लिए यही जगह हो सकती है।’’ जाबिर ने एक ठोकर मारी और लाइब्रेरी के बीच का हिस्सा फटा... और फ़रीदी अन्दर धँसता चला गया। उसने तख़्ता रखा और कालीन बिछा दिया। कमरे में बेहोशी की गैस भर रही थी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
नंगी लाशें

फ़रीदी की आँख खुली तो उसने अपने को एक अलमारीनुमा ख़ाने में बन्द पाया... उसके हाथ और पैरों में ताक़त आ गयी थी। वह बोल भी सकता था... लेकिन उसके मुँह पर पट्टी बाँध दी गयी थी और सारा बदन रस्सियों से जकड़ दिया गया था।

कमरे का अजीब माहौल था... चारों तरफ़ इन्सानी पिंजर रखे हुए थे। बड़े-बड़े मर्तबानों में अजीबो-ग़रीब तरह की चीज़ें भरी हुई थीं। कमरे में सीलन और बू थी।

सामने लगे हुए चार्ट पर नम्बर पड़े हुए थे। उसके ऊपर जर्मन भाषा में लिखा हुआ था–

‘‘जाबिर कभी बिलावजह किसी को दावत नहीं देता। अब तक इस चार्ट पर जितनों के नाम लिखे गये हैं, वे सब उसके मेहमान रह चुके हैं और उनसे वह बहुत कुछ हासिल भी कर चुका है।’’

अलमारी के बिलकुल सामने ही वह चार्ट था... चार्ट के नीचे अजीबो-ग़रीब शक्लें बनी हुई थीं। दीवारें बहुत पुरानी मालूम होती थीं। पूरा माहौल भयानक था।

जाबिर अपने कमरे में बैठा हुआ था। कमरा चारों तरफ़ से बन्द था। लैम्प की हल्की रोशनी में वह अपनी मेज़ के सामने पड़ी तीन नंगी लाशों को ग़ौर से देख रहा था। उसने अपना चेहरा छुपा रखा था। मगर उसकी ख़ौफ़नाक छोटी-छोटी आँखें चमक रही थीं। वह अपनी कुर्सी से उठा और लाशों पर झुक कर ग़ौर से देखने लगा। मेज़ पर से एक पुर्ज़ा उठाने के बाद उसने लाश के सीने को देखना शुरू किया। अभी उसका यह सिलसिला जारी था कि एक धमाके के साथ एक चौथी लाश उसके कमरे में गिरी। ‘‘मुझे तुम्हारा ही इन्तज़ार था।’’ वह बड़बड़ाया और उसके कपड़े उतार कर उसने उसे भी बिलकुल नंगा कर दिया और इन तीनों की बग़ल में उसको लिटा दिया। फिर कमरे में लगे हुए एक बड़े से चार्ट पर उसने लिखा नम्बर चार और कुर्सी पर बैठ कर दराज़ में से कुछ काग़ज़ात निकाल कर उसे देखने लगा कि एक दूसरा धमाका हुआ और अब पाँचवीं लाश इस कमरे में पड़ी थी।

यह लाश एक ख़ूबसूरत औरत की थी। वह कुछ चौंका। ‘‘आख़िर तुम भी आ गयीं, अच्छा हुआ...’’ वह फिर कुछ बड़बड़ाया और एक बड़ी अलमारी के पास जा कर रुक गया। उसकी आँखों की चमक तेज़ हो गयी थी और फिर... वह कमरे में टहलने लगा। ‘‘लाश के क़रीब आ कर उसने औरत की लाश को भी उन लाशों के बराबर डाल दिया और चार्ट पर नम्बर पाँच लिख कर उसे ग़ौर से देखने लगा। अभी एक ख़ाना ख़ाली था। वह अपनी कुर्सी पर आ कर बैठ गया और धीमी रोशनी में वह छत की तरफ़ देखने लगा। यह छत बिलकुल सपाट मालूम होती थी, जिसे देख कर कोई भी यह नहीं समझ सकता था कि इसमें कोई जोड़ है और यह ज़रा-सा बटन दबाने से खुल सकती है। वह सोच रहा था कि पुरानी छत इसके लिए कारगर साबित हुई है। गर्मी से परेशान हो कर वह टहलने लगा। उसी तरह का एक और धमाका हुआ... छत खुली और लाश अन्दर गिर पड़ी।

‘‘तुमने काफ़ी इन्तज़ार कराया, ख़ैर अब मुझे किसी का इन्तज़ार नहीं करना पड़ेगा।’’

वह फिर बड़बड़ाया और उसको भी बिलकुल नंगा करके उन लाशों की बग़ल में लिटा दिया। चार्ट का वह ख़ाना जो ख़ाली था छै नम्बर से भर चुका था।

उसने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया और दीवार से लगी हुई बड़ी अलमारी का पर्दा हटाया। एक शख़्स रस्सियों में जकड़ा हुआ था। उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया था। ‘‘देखो, तुम्हारे मेहमान आये हुए हैं।’’ उसने लाशों की तरफ़ इशारा किया। बँधे हुए शख़्स की आँखें ग़ुस्से से लाल हो गयीं। उसने रस्सियों से आज़ाद हो जाने के लिए पूरी ताक़त लगा दी, लेकिन रस्सी टस-से-मस न हुई।

‘‘क्यों...’’ वह शख़्स जोर से हँसा। ‘‘मेरा नाम जानते हो... मेरे कामों में रुकावट डालने का नतीजा तुम्हारे सामने है... मैंने तुमसे कई बार कहा कि तुम मेरे रास्ते से हट जाओ... लेकिन तुम मानते नहीं। ख़ैर, यह देखो... इन्हें पहचानो...ग़ज़ाला,’’ उसने लाशों की तरफ़ इशारा किया, ‘‘और ये हैं मिस्टर हमीद। इनसे मिल कर तुमको ज़रूर ख़ुशी हुई होगी और ये बेचारे जज साहब हैं। नवाब रशीदुज़्ज़माँ से तो मिल लो...’’ उसने बँधे हुए शख़्स का कन्धा हिलाया, ‘‘और वह देखो, माथुर साहब बेचारे के चेहरे पर रोशनी कम पड़ रही है। मालूम होता है कि इन्होंने मुजरिमों पर बहुत ज़ुल्म ढाये हैं। क्यों, क्या ख़याल है तुम्हारा...!’’ उसने फिर छेड़ा। ‘‘शायद तुम्हें इन मेहमानों से मिल कर ख़ुशी नहीं हुई।’’ वह बोला। और फिर सबसे आख़िर लाश पर जा कर खड़ा हो गया, ‘‘इधर देखिए सरकार! यह आपके ख़ास क़द्रदानों में से हैं। मिस्टर तारिक़...लेकिन इनका नेवला इस वक़्त इनके कन्धे पर नहीं है।’’ यह कह कर फिर उसने अलमारी पर पर्दा डाल दिया और हमीद की लाश उठा कर कमरे के बाहर चला गया।

थोड़ी देर बाद वह अपने हाथ में एक सफ़ेद शीशी लिये हुए वापस आया... और शीशी में से थोड़ा-सा पाउडर निकाल कर उसने तारिक़ की नाक में डाल दिया और कमरे में टहलने लगा। उसने कमरे की रोशनी कम कर दी और तारिक़ की लाश पर झुक गया। थोड़ी देर बाद लाश को एक छींक आयी। वह जल्दी से हट गया और जेब से एक दूसरी शीशी निकाल कर उसको सुँघायी। तारिक़ के ज़िस्म में हरकत पैदा हो चुकी थी।

‘‘मैं... मैं कहाँ हूँ...!’’ तारिक़ कमरे के चारों तरफ़ देखते हुए बोला और जब उसकी नज़र अपने नंगे बदन पर पड़ी तो वह बौखला कर खड़ा हो गया।

‘‘डरो नहीं।’’

‘‘उसने तारिक़ के कन्धे पर हाथ रखा।

‘‘लेकिन... तुम... तुम... हो कौन... और मैं... मेरे... क... क... कपड़े।’’ तारिक़ ने हकलाते हुए पूछा।

‘‘ये लो, अपने कपड़े, घबराओ नहीं... अभी तुमको मालूम हो जायेगा कि मैं कौन हूँ।’’

तारिक़ जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहनने लगा। जब वह कपड़े पहन चुका तो उसने अपने चेहरे पर से ऩकाब हटाया। ‘‘फ़रीदी,’’ तारिक़ ज़ोर से चीख़ा। ‘‘क्या मैं ख़्वाब देख रहा हूँ?’’

‘‘नहीं, आप ख़्वाब नहीं देख रहे हैं। मैं हूँ इन्स्पेक्टर कमाल अहमद फ़रीदी।’’

‘‘लेकिन यह सब क्या है? तुम पागल तो नहीं हो गये हो।’’ तारिक़ बोला।

‘‘अभी बताता हूँ,’’ वह बोला और बाक़ी लाशों को होश में लाने की कोशिश करने लगा। नवाब रशीदुज़्ज़माँ और ग़ज़ाला के अलावा सबको होश आ चुका था। वह उन सबके कपड़े देते हुए बोला।

‘‘घबराइए नहीं... अभी आप लोगों को सब कुछ मालूम हो जायेगा।’’ और वह नवाब साहब और ग़ज़ाला के मुँह पर पानी के छींटे देने लगा।

सब लोग हैरत से उसको देख रहे थे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि यह क्या मामला है। फ़रीदी यहाँ किस तरह पहुँचा और हम लोगों को किसने गिरफ़्तार किया। वे यह सोच ही रहे थे कि नवाब साहब उठ बैठे और उसने उन्हें भी कपड़े पहनने को दे दिये। नवाब साहब की नज़र जैसे ही ग़ज़ाला पर पड़ी, वे बड़े ज़ोर से चीख़े, ‘‘फ़रीदी।’’

‘‘नवाब साहब परेशान न हों...’’ उसने हमदर्दी से कहा। ‘‘शुक्र है कि मैं वक़्त पर पहुँच गया... वरना आप लोगों का न जाने क्या हश्र होता।’’

‘‘मेरी बच्ची।’’ नवाब साहब की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

‘‘घबराइए नहीं... अभी उनको भी होश आ जायेगा।’’ उसने तसल्ली दी।

‘‘मिस्टर फ़रीदी, कुछ बताइए कि बात क्या है।’’ माथुर ने पूछा।

‘‘बात तो कोई ख़ास नहीं है।’’ वह जेब से पिस्तौल निकाल कर उछालता हुआ बोला। ‘‘इन्हें आप देख रहे हैं। नवाब रशीदुज़्ज़माँ एक बुज़ुर्ग हस्ती, जिनसे कभी इस बात की उम्मीद नहीं रखी जा सकती कि नवाबज़ादा शाकिर अली के क़त्ल में इनका हाथ हो सकता है।’’ उसने पिस्तौल से खेलते हुए कहा।

‘‘क्या बकते हो।’’ नवाब साहब ग़ुस्से में खड़े हो गये। ‘‘मैं तुम्हें इतना गिरा हुआ नहीं समझता था... मैंने तुम्हें आज तक अपने बेटे की तरह समझा, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारी रगों में गन्दा ख़ून दौड़ रहा है... कमीने, ज़लील

‘‘बस... बस... नवाब साहब। आपके मुँह से गालियाँ कुछ भली नहीं मालूम होतीं।’’ वह मुस्कुराया।

‘‘लेकिन तुमको अपने हाथों में क़ानून नहीं लेना चाहिए था।’’ माथुर अफ़सर के अन्दाज़ में बोला, ‘‘और अगर तुम्हारे पास इसका सुबूत था कि नवाब साहब शाकिर अली के क़ातिल हैं या इस क़त्ल में उनका हाथ है तो तुम्हें क़ानूनी तौर पर इन्हें गिरफ़्तार करना चाहिए और हम लोगों का हाथ किस क़त्ल में है, जो इस तरह से यहाँ लाये गये?’’

‘‘माथुर साहब, चूँकि मुझे इस बात का य़कीन है कि नवाबज़ादा शाकिर अली के क़त्ल में नवाब साहब का हाथ है और मेरे पास कोई क़ानूनी सबूत नहीं है, इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा और चूँकि आप पुलिस के एक ज़िम्मेदार अ‍ॅफ़सर हैं, इसलिए आपके सामने इनका बयान होगा।’’

‘‘फ़रीदी, ख़ुदा के लिए होश में आओ... आज तुम्हें क्या हो गया है। यह सब क्या तमाशा है। अगर तुम्हें यही करना था तो कपड़े उतार कर हम लोगों को बेइज़्ज़त करने से तुमको क्या फ़ायदा मिला।’’

‘‘फ़ायदा... जज साहब, आप हमेशा फ़ायदे ही की सोचते हैं।’’ उसने जज साहब को जवाब दिया। ‘‘आप लोगों का असली रूप यही है। आप सब कमीने हैं जो शराफ़त का बनावटी लिबास पहन कर लोगों को धोखा देते हैं। ख़ुद जुर्म करके दूसरों के सर थोप देते हैं। आपके इन जिस्मों को नंगा ही रहना चाहिए। बिलकुल नंगा। एक कुत्ते की तरह ताकि आप किसी को धोखा न दे सकें।’’

वह ग़ुस्से में बके जा रहा था और जज साहब बेचारे सहम कर चुप हो गये थे। ग़ज़ाला को होश आ रहा था। नवाब साहब धीरे-धीरे उसके सर पर हाथ फ़ेर रहे थे। ग़ज़ाला ने आँखें खोल दीं और अपने बाप को अपने पास देख कर उसे कुछ इत्मीनान हुआ। वह उठ कर बैठ गयी और फ़रीदी की बात ग़ौर से सुनने लगी।

‘‘बहरहाल, नवाब साहब को यह क़ुबूल करना पड़ेगा कि शाकिर अली के क़त्ल में उनका हाथ है।’’ उसने कनखियों से ग़ज़ाला की तरफ़ देखा।

‘‘यह झूठ है... यह सब झूठ है...!’’ ग़ज़ाला चिल्लायी।

‘‘क्या आपको भी इससे इनकार है।’’ उसने नवाब साहब से पूछा।

‘‘आख़िर तुम चाहते क्या हो...’’ नवाब साहब तंग आ कर बोले।

‘‘यही कि आप यह लिख कर दे दीजिए कि नवाबज़ादा शाकिर अली के क़त्ल में आपका हाथ है।’’

‘‘यह कभी नहीं हो सकता।’’ नवाब साहब ग़ुस्से में बोले।

‘‘हो सकता है...!’’ उसने पिस्तौल दिखाया।

‘‘ठहरो...!’’ माथुर कुर्सी से उठता हुआ बोला। ‘‘तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो।’’

‘‘ओह... एस.पी. साहब आपको ग़ुस्सा आ गया। कुर्सी पर बैठ जाइए।’’

‘‘लेकिन तुम यह सब क्या कर रहे हो।’’

‘‘मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ... यह काग़ज़ है... इस पर लिख दीजिए। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। जल्दी कीजिए।’’

‘‘लेकिन...!’’

‘‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, जल्दी कीजिए... और एस.पी. साहब आपको गवाही देनी होगी।’’

उसने पिस्तौल की नली का रु़ख उनकी तरफ़ करते हुए कहा।

नवाब साहब मजबूरन क़लम उठाते हुए बोले, ‘‘क्या लिखूँ?’’

‘‘हाँ, लिखिए...मैं आज इन्स्पेक्टर फ़रीदी और एस.पी. माथुर साहब के सामने इस बात का इक़रार करता हूँ कि नवाबज़ादा शाकिर अली का क़त्ल मेरी ही साज़िश थी। नवाब रशीदुज़्ज़माँ बक़लम ख़ुद।’’

‘‘लीजिए माथुर साहब, अब आप भी गवाही कर दीजिए...!’’ वह मुस्कुराता हुआ बोला।

‘‘हूँ...!’’ माथुर ने उसको घूरा और फिर उस काग़ज़ पर अपने दस्तख़त कर दिये।

उसने काग़ज़ अपनी जेब में रखते हुए कहा। ‘‘आप लोगों को बेहद तकलीफ़ हुई, जिसकी मैं माफ़ी चाहता हूँ...’’ ग़ज़ाला ने नफ़रत से मुँह फ़ेर लिया।

‘‘अच्छा, अब आप लोग जा सकते हैं।’’ उसने ताली बजायी और फ़ौरन आठ नक़ाबपोश कमरे में आये।

‘‘इन लोगों को आराम से छोड़ आओ।’’ उसने इशारा किया।

और नक़ाबपोश उन लोगों को ले कर कमरे से बाहर चले गये।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
कबूतरों का ख़ून

‘‘बहुत ही बदतमीज़ी का सबूत है। अगर क़ैद ही करना था तो यह एक सिरे से नंगा करने की क्या ज़रूरत थी।’’ हमीद नक़ाबपोश से बोला।

‘‘मैं क्या जानूँ, यह तो फ़रीदी साहब बता सकते हैं।’’ नक़ाबपोश ने जवाब दिया।

‘‘फ़रीदी साहब... क्या मतलब...!’’

‘‘जी हाँ... आप उन्हीं के क़ैदी हैं।’’ नक़ाबपोश बोला।

‘‘क्या बकते हो... इतने बड़े हो गये और तुम्हें झूठ बोलना भी नहीं आया और यह पिस्तौल ताने क्यों खड़े हो। हटाओ इसको, मैं भागा थोड़ी जा रहा हूँ।’’

‘‘लीजिए, आपको य़कीन नहीं आ रहा था तो ख़ुद देख लीजिए। फ़रीदी साहब ख़ुद आ रहे हैं।’’ नक़ाबपोश ने इशारा किया। इतने में वह कमरे में दाख़िल हुआ।

‘‘आप...?’’ हमीद का मुँह हैरत से खुला रह गया।

‘‘इसके दोनों हाथ पीछे से अच्छी तरह बाँध दो।’’ उसने नक़ाबपोश को हुक्म दिया।

हमीद ने ग़ौर से उसको देखा... ‘‘ओह... तुम...!’’ उसके मुँह से निकला।

‘‘अगर तुमने ज़रा भी हरकत की तो...’’

‘‘तो तुम गोली चला दोगे।’’ हमीद ने जुमला पूरा किया। ‘‘लो बाँध लो...!’’ हमीद ने मुँह बना कर कहा।

और जब वह आदमी हमीद के दोनों हाथ बाँध चुका तो उसने नक़ाबपोश से कहा। ‘‘इनको कबूतरख़ाने में ले जाओ। मैं चिराग़ ले कर आता हूँ।’’

थोड़ी देर बाद वह चिराग़ ले कर वहाँ आ गया, जहाँ हमीद उस आदमी के साथ पहले ही से खड़ा था। कमरे में हज़ारों कबूतर पड़े हुए थे जिनके पेट चीर दिये गये थे।

‘‘देखा...!’’ उसने हमीद से पूछा।

‘‘हाँ, देख लिया...!’’ हमीद ने बेदिली से जवाब दिया।

‘‘नहीं, इधर देखो...!’’

उसने अपनी नाक को पकड़ कर एक झटका दिया। हमीद ने देखा कि उसकी बनावटी नाक ग़ायब है और उसकी जगह पर एक बड़ा-सा गहरा छेद है। हमीद ने फ़ौरन आँखें बन्द कर लीं।

‘‘जाबिर,’’ उसके मुँह से निकला।

जाबिर ने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया और अपनी नाक लगाते हुए बोला। ‘‘देखा, यह मेरा एक मामूली-सा करिश्मा है। तुम्हारा उस्ताद भला मेरा मुक़ाबला क्या कर सकता है।’’

‘‘जाबिर, मैं यह मानता हूँ कि भेस बदलने में तुम उस्ताद हो। फ़रीदी का भेस इस स़फाई से बदला है कि कोई तुम्हें पहचान नहीं सकता। मैं ख़ुद थोड़ी देर के लिए धोखा खा गया था, लेकिन यह याद रखो कि तुम सूरत से फ़रीदी बन सकते हो, उसका दिमाग़ नहीं पा सकते।’’ हमीद ने जवाब दिया।

‘‘ख़ैर, छोड़ो... आओ, मैं तुम्हें अपने कबूतर दिखाऊँ। यह देखो, जज सिद्दीक़ अहमद साहब का प्यारा कबूतर क़मरी। यह बिलकुल असल नस्ल का है।’’ जाबिर ने हमीद को साथ ले कर कमरे में दाख़िल होते हुए कहा।

‘‘और यह नवाबज़ादा शाकिर अली का वह अफ़्रीकी ‘शीराज़ी’ है जिसकी मुझे काफ़ी दिनों से तलाश थी। इनकी नस्ल बहुत कम है। यह सिर्फ़ अफ़्रीका के जंगलों में पाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनके ख़ून में कुछ मिठास होती है, जो इन्सान के जिगर को बदल देने की ताक़त रखती है। इत्तफ़ाक़ से मैंने यह कबूतर शाकिर अली के यहाँ देखा और इसको हासिल करने के लिए मुझे एक ख़ून करना पड़ा।’’ जाबिर लाल धागे से बँधे हुए एक कबूतर को उठाते हुए बोला। बदबू से हमीद का दिमाग़ फटा जा रहा था। उसने तंग आ कर कहा। ‘‘हाँ... हाँ, मैंने सब देख लिया।’’

‘‘वाह... लम्पट मक्खी तो तुमने देखा ही नहीं।’’ जाबिर ने एक कबूतर की तरफ़ इशारा किया। ‘‘यह कबूतर ज़फ़र अली साहब के एक दोस्त उनके लिए अरब से लाये थे। इसकी हड्डियाँ बड़े काम के लायक़ होती हैं। उनके चूरे से चेहरे का रंग बदल देने का ऐसा पाउडर तैयार होता है जो बग़ैर दवाओं की मदद से नहीं छूटता। स्विट्ज़रलैण्ड में तीन साल तक मैं इस पाउडर की मदद से अपना रंग बदले हुए था और यह चाँदना है, यह जोगी बीर, यह ग़फूरी, यह लठमाया गिरबाज़...’’ जाबिर ने अलग-अलग कबूतरों की तरफ़ इशारा किया।

‘‘अच्छा, अब तुम चलो, आराम करो... मुझे तुम्हारे उस्ताद से कुछ बातें करनी हैं।’’

जाबिर ने हमीद को एक नक़ाबपोश के हवाले किया और ख़ुद अपने कमरे की तरफ़ चला गया।

कमरे में पहुँच कर उसने अलमारी का पर्दा हटाया। ‘‘कहिए फ़रीदी साहब, जाबिर की ताक़त का आपको अन्दाज़ा हो गया। अब भी बेहतर है कि तुम मेरे रास्ते से हट जाओ...’’ जाबिर ने फ़रीदी का मुँह खोलते हुए कहा। फ़रीदी ने थक कर अपनी आँखें बन्द कर ली थीं।

‘‘अच्छा, अब तुम अलमारी में से निकल आओ।’’

जाबिर ने फ़रीदी के आस-पास लिपटी हुई रस्सियों को खोल दिया, लेकिन उसके हाथ बँधे रहने दिये।

रस्सी खुलते ही फ़रीदी ज़मीन पर गिर कर बेहोश हो गया। जाबिर उसको होश में लाने के लिए उसके मुँह पर पानी के छींटे देने लगा। थोड़ी देर बाद फ़रीदी को होश आ गया।

‘‘फ़रीदी, तुम्हारी अक़्लमन्दी का मुझे इक़रार है और मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे ख़ून से अपने हाथ रँगूँ। बेहतर है, तुम मुझे वे दोनों किताबें ‘रूह और उसकी अहमियत’ और ‘ख़ूनी ख़ाके’ वापस करके मेरा पीछा छोड़ दो। इन किताबों को हासिल करने के लिए मुझे क्या-क्या करना पड़ा है। यह मैं जानता हूँ।’’

‘‘जाबिर, अगर तुम यह समझते हो कि मैं इस वक़्त तुम्हारे बस में हूँ और डर के मारे मैं अपने ज़िम्मेदारी से हट जाऊँगा तो तुम्हारा यह ख़याल ग़लत है। मैं तुम जैसे लोगों को जो एक ख़तरनाक ज़हर की तरह इन्सानों की ज़िन्दगियाँ तबाह करने पर तुले हुए हों, ख़त्म कर देना चाहता हूँ। मैं अगर मौत से डरता तो यह नौकरी न करता। तुम्हारे हाथ में पिस्तौल है, तुम मुझे ख़त्म कर सकते हो... लेकिन वे किताबें... जिनसे तुम और तुम्हारे साथी ग़लत फ़ायदा उठायेंगे, मैं कभी तुम्हारे हवाले नहीं कर सकता।’’

‘‘फ़रीदी...!’’ जाबिर ने ग़ुस्से से कहा, ‘‘बेहतर है कि तुम अपने फ़ैसले पर फिर एक बार ग़ौर करो। तुमने अब तक मुझे काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है और मैं टालता रहा। लेकिन इस बार मैं इतने बड़े नुक़सान को बर्दाश्त नहीं कर सकता।’’

‘‘नुक़सान... और तुम्हारा, जैसे वे किताबें तुम्हारे बाप-दादा की जागीर हैं।’’

‘‘हद से मत बढ़ो फ़रीदी, तुम भूल रहे हो कि इस वक़्त तुम जाबिर से बातें कर रहे हो।’’

‘‘और जाबिर, तुम भी यह न भूलो कि आज तुमने नवाब रशीदुज़्ज़माँ वग़ैरह के साथ बदतमीज़ी की है, इससे मेरा ख़ून खौल रहा है।’’

‘‘अभी क्या किया है। अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो इससे भी बुरा नतीजा होगा... ख़ैर... इस वक़्त रात के ग्यारह बजे हैं, मैं कल बारह बजे रात तक तुमको मौक़ा देता हूँ, क्योंकि कल रात मुझे सेठ चुन्नीलाल की लड़की के गले से हीरे का हार और हर नारायन ऐण्ड सन्स की तिजोरी से सिर्फ़ पचास लाख लेने हैं और लगे हाथों रशीदुज़्ज़माँ से भी मुलाक़ात करूँगा... दोबारा मिल कर वे ज़रूर ख़ुश होंगे और इस तहरीर से कुछ रुपये मिल जायेंगे।’’ जाबिर हँसा। ‘‘जानते हो, फ़रीदी मुझे तुम्हारा भेस और आवाज़ बदलने के लिए काफ़ी दिनों तक प्रैक्टिस करनी पड़ी है और अब मैं इतना कामयाब हो गया हूँ कि नवाब रशीदुज़्ज़माँ, ग़ज़ाला और माथुर – कोई भी मुझे नहीं पहचान सका। मज़े की बात तो यह है कि हमीद भी थोड़ी देर के लिए धोखा खा गया था।’’

‘‘हमीद क्या, मैं ख़ुद तुम्हें एक नज़र में पहचान नहीं सका था। लेकिन जाबिर, याद रखो कि तुम ज़्यादा दिनों तक लोगों को धोखा नहीं दे सकते। एक फ़रीदी मर सकता है, लेकिन यह न भूलो कि हज़ारों फ़रीदी पैदा हो सकते हैं।’’ फ़रीदी बोला।

‘‘मुझे परवाह नहीं... मैं अपने रास्ते में आने वाले लोगों को पत्थर के एक मामूली टुकड़े की तरह अपनी ठोकर से हटा देता हूँ।’’

‘‘अच्छा, अब मैं चला... ठीक बारह बजे यहाँ पहुँच जाऊँगा... तुम अपना फ़ैसला सोच रखना।’’

यह कहता हुआ जाबिर बाहर निकल गया और फ़रीदी को कमरे में बन्द कर गया।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बच गया

रात भर जागने की वजह से नवाब रशीदुज़्ज़माँ की आँखें उस वक़्त खुलीं जब ग़ज़ाला कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ से रात का गुज़रा हुआ क़िस्सा बयान कर रही थी।

‘‘फिर आप लोग यहाँ तक किस तरह पहुँचे।’’ कुँवर ज़फ़र अली ने सवाल किया।

‘‘हम लोगों को आँखों पर पट्टी बाँध कर एक गाड़ी में बिठा दिया गया और तीन घण्टे तक चलने के बाद हम एक सुनसान जगह पर उतार दिये गये। हमारे हाथों की रस्सियाँ खोल दी गयीं और हम लोग काफ़ी देर तक इधर-उधर भटकते रहे। फिर माथुर साहब को रास्ता याद आ गया और हम लोग यहाँ पहुँच गये।’’

‘‘लेकिन इस बुरे काम से फ़रीदी का क्या मक़सद था...’’ कुँवर ज़फ़र अली कुछ सोचते हुए बोले।

‘‘कुँवर साहब, अब उसका नाम न लीजिए। इस दुनिया में अब किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।’’ ग़ज़ाला ग़मगीन आवाज़ में बोली।

‘‘क्या यह मुमकिन नहीं है कि तुम लोगों ने धोखा खाया हो और फ़रीदी के बजाय वह कोई दूसरा शख़्स रहा हो।’’

‘‘नहीं कुँवर साहब, वे फ़रीदी ही थे। वही सूरत, वही आवाज़।’’ ग़ज़ाला ने इनकार किया।

‘‘और हमीद कहाँ हैं।’’ कुँवर ने सवाल किया।

‘‘उनका कुछ पता नहीं।’’ ग़ज़ाला बोली।

‘‘अच्छा, तुम आराम करो, बहुत थकी हुई मालूम होती हो। मैं ज़रा माथुर साहब के यहाँ जा रहा हूँ... फ़रीदी पर मुझे पहले ही से शक था।’’

‘‘बहरहाल, अब मामला ख़तरनाक होता जा रहा है।’’

कुँवर ज़फ़र अली ग़ज़ाला से विदा हो कर सीधे माथुर साहब के बँगले की तरफ़ रवाना हो गये। कुँवर साहब अभी थोड़ी ही दूर चले होंगे कि एक गाड़ी तेज़ी से उनके क़रीब ही एक काग़ज़ का टुकड़ा गिराती हुई गुज़र गयी। उन्होंने उसे उठा कर पढ़ा, लिखा था :

‘‘सुनता हूँ कि मैं फ़रीदी साहब का क़ैदी हूँ, लेकिन य़कीन नहीं आता, आज रात को ये लोग राय बहादुर बिशम्भरनाथ की कोठी पर छापा मारने वाले हैं।

हमीद।’’

कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ ने वह पर्चा अपनी जेब में रखा और तेज़-तेज़ क़दम बढ़ाते हुए माथुर साहब के बँगले पर पहुँच गये।

माथुर साहब अभी-अभी सो कर उठे थे। कुँवर साहब के आने की ख़बर सुन कर वह फ़ौरन बाहर आ गये।

‘‘क्या बताऊँ कुँवर साहब, रात...!’’

‘‘मुझे ग़ज़ाला से सब कुछ मालूम हो गया है। वाक़ई यह बहुत ही हैरत-अंगेज़ वाक़या है।’’

‘‘य़कीनन,’’ माथुर ने कहा।

‘‘आप किस नतीजे पर पहुँचे?’’ कुँवर साहब ने सवाल किया।

‘‘भई, अभी तक तो कुछ भी सोचने और समझने का मौक़ा नहीं मिला।’’ माथुर साहब ने सिगरेट का कश लगाते हुए कहा।

‘‘हाँ... अभी जब मैं आपके यहाँ आ रहा था तो एक नया वाक़या पेश आया।’’ कुँवर साहब ने वह पर्चा दिखाया जो मोटर कार से गिराया गया था।

माथुर ने वह पर्चा पढ़ते ही जल्दी से सवाल किया। ‘‘आपने मोटर कार का नम्बर देखा था।’’

‘‘जब तक मैं पर्चा उठाऊँ, मोटर कार बहुत दूर निकल चुकी थी और पहले से यह बात मालूम नहीं थी, वरना फ़ौरन नम्बर नोट कर लेता।’’ कुँवर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

इतने में नौकर चाय ले कर आ गया।

‘‘अच्छा आइए कुँवर साहब... अब चाय पी ली जाय।’’ माथुर प्याली में चाय उँडेलते हुए बोले।

‘‘हमीद की इस लिखावट पर क्या कार्रवाई कीजिएगा।’’ कुँवर ने चाय का घूँट लेते हुए कहा।

‘‘मुझे यह लिखावट फ़र्ज़ी मालूम होती है।’’ माथुर ने कहा।

‘‘बहरहाल, आप जैसा ठीक समझिए... लेकिन नवाब साहब के उस काग़ज़ के बारे में क्या होगा, जिसे फ़रीदी ने ज़बर्दस्ती लिखवाया है और जिस पर आपके भी दस्तख़त हैं।’’
 
‘‘हाँ, यह मामला क़ानूनी तौर पर ज़रा अहम है। बहरहाल, आज मैं इन्स्पेक्टर जनरल को फ़ोन करके सारी कहानी उनसे बयान करता हूँ। आप ज़रा तकलीफ़ करके नवाब साहब और मिस्टर तारिक़ से कह दीजिए कि वे मुझसे दफ़्तर में ज़रूर मिल लें।’’

‘‘अच्छी बात है... तो अब मुझे इजाज़त दीजिए। ज़रा नवाब साहब का ख़याल रखिए... ग़ज़ाला बेहद परेशान है।’’

‘‘हाँ... मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा, ज़्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है।’’ माथुर ने तसल्ली दी।

कुँवर साहब वहाँ से निकल कर सीधे अपने घर पहुँचे। नवाब रशीदुज़्ज़माँ और तारिक़ को माथुर साहब के यहाँ भेज कर वे सईदा और ग़ज़ाला की बातें सुनने लगा।

‘‘मुझे सख़्त हैरत है कि फ़रीदी ने कुँवर साहब को कैसे छोड़ दिया। क्योंकि कुँवर साहब उनके ख़िलाफ़ रहते हैं और एक बार वे उनको पिस्तौल का निशाना भी बनाने जा रहे थे।’’

‘‘ख़ैर... होगा। तुम लोग बातें करो, मैं खाना खाने जा रहा हूँ। बहुत भूख लग रही है।’’ कुँवर खाना खा कर काफ़ी देर तक किताब पढ़ते रहे और किताब पढ़ते-पढ़ते सो गये।

उनकी आँखें उस वक़्त खुलीं जब रेहाना उन्हें जगा रही थी। शाम हो चुकी थी। वे जल्दी से उठे और मुँह-हाथ धो कर बरामदे में निकल आये जहाँ नवाब रशीदुज़्ज़माँ और तारिक़ बैठे हुए बातें कर रहे थे।

‘‘कहिए, माथुर साहब ने क्या कहा।’’ कुँवर ने सवाल किया।

‘‘कुछ नहीं... वे उस वक़्त मशगूल थे। हमीद के उस ख़त पर, जो तुमको मिला था, उन्होंने एहतियाती तौर से वहाँ पुलिस तैनात कर दी है और इस सिलसिले में उन्होंने ज़रूरी ऑर्डर दे दिये। आज रात को वे ख़ुद यहाँ आयेंगे। तब त़फसील से बातें होंगी।’’

नवाब रशीदुज़्ज़माँ, तारिक़ और कुँवर साहब में काफ़ी देर तक उसी मामले पर बात होती रही। तब तक खाने का वक़्त आ गया। नवाब साहब और तारिक़ खाना खाने चले गये। कुँवर को भूख नहीं थी। इसलिए उन्होंने खाने से इनकार कर दिया और वे सईदा से इधर-उधर की बातें करने लगे।

खाना खाने के बाद वे लोग फिर आ कर लॉन में बैठ गये।

‘‘अभी तक माथुर साहब नहीं आये।’’ नवाब रशीदुज़्ज़माँ साहब बोले।

‘‘हाँ, उनसे यह ज़रूर कह दीजिएगा कि वे यहाँ भी पुलिस तैनात कर दें, क्योंकि ग़ज़ाला बेहद डर गयी है।’’ सईदा ने नवाब साहब से कहा।

इतने में कुछ आहट सुनाई दी। तारिक़ ने कहा। ‘‘लो शायद माथुर साहब आ गये।’’

सबकी नज़रें उठ गयीं। लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था कि अचानक टॉर्च की चार-पाँच तेज़ रोशनी उनके चेहरों पर पड़ने लगीं जिससे सबकी आँखें चौंधिया गयीं। दूसरे पल रोशनी बुझ गयी और एक आदमी काला ऩकाब डाले पिस्तौल लिये हुए खड़ा था। पीछे तीन नक़ाबपोश और खड़े थे।

सईदा के मुँह से चीख़ निकल गयी। कुँवर साहब और नवाब साहब चिल्लाना ही चाहते थे कि उसने पिस्तौल सामने कर दी।

‘‘मुझे राहुल डाकू कहते हैं।’’ नक़ाबपोश बोला। ‘‘लेकिन नवाब साहब मुझे आपके साथ हमदर्दी है और हमदर्दी सिर्फ़ इसलिए है कि इसमें मेरा फ़ायदा है। मैंने आपकी वह तहरीर हासिल कर ली है जिसे आप फ़रीदी को लिख कर दे आये थे।’’ उसने नवाब की तहरीर जेब से निकालते हुए दिखाया।

नवाब साहब ने हाथ बढ़ाया।

‘‘ठहरिए।’’ वह बोला। ‘‘इस तहरीर के लिए आपको सिर्फ़ पंद्रह लाख रुपये देने पड़ेंगे। जल्दी कीजिए।’’

‘‘लेकिन...!’’

‘‘कुछ नहीं। अगर आपके पास रुपये न हों तो अपनी यह हीरे की अँगूठी उतार दीजिए। बहुत जल्द... मेरे पास वक़्त नहीं। मैं ज़बान का पक्का हूँ... अँगूठी मिलते ही यह तहरीर आपको मिल जायेगी।’’

नवाब साहब ने मजबूरन अपनी अँगूठी उतार कर उसके हवाले कर दी।

‘‘यह लीजिए अपनी तहरीर।’’ उसने काग़ज़ नवाब साहब की तरफ़ फेंका और पिस्तौल दिखाता हुआ पीछे हटने लगा। कुछ दूर पहुँच कर उसने कोई चीज़ उन लोगों की तरफ़ ज़मीन पर फेंकी जिसके गिरने से सब लोगों की आँखों में धुआँ भर गया और पानी बहना शुरू हुआ।

थोड़ी देर बाद जब गैस का असर ख़त्म हुआ तो कुँवर साहब बोले, ‘‘मामला सिर से ऊपर होता जा रहा है।’’

‘‘हाँ, यह सब पुलिस की लापरवाही का नतीजा है।’’ तारिक़ ने कहा।

‘‘भई, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। इस बुढ़ापे में सब मुझे ही निशाना बनाने पर तुले हुए हैं। आख़िर मैंने उन लोगों का क्या बिगाड़ा है।’’ नवाब रशीदुज़्ज़माँ ने रुँधी हुई आवाज़ में कहा।

ग़ज़ाला ख़ामोश बैठी हुई थी, उसके सोचने की ताक़त जवाब दे चुकी थी। इस फ़रीदी ने, जिसके लिए उसने अपनी जान तक की परवाह नहीं की थी, कैसा बुरा बर्ताव किया है। फिर दूसरों से क्या उम्मीद रखी जा सकती है।

‘‘बेटी, ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं, अब मैं नवाब साहब को यही राय दूँगा कि वे जल्द-से-जल्द वापस चलें।’’ तारिक़ ने ग़ज़ाला को तसल्ली दी।

अभी ये बातें हो ही रही थीं कि फ़रीदी हाँफता हुआ आता दिखायी दिया। उसके कपड़े मिट्टी से भरे हुए थे और मुँह पर जगह-जगह ख़राशें पड़ी हुई थीं।

कुँवर साहब फ़रीदी को देखते ही उसकी तरफ़ ग़ुस्से से बढ़े। नवाब रशीदुज़्ज़माँ और तारिक़ भी खड़े हो गये।

‘‘ठहरिए।’’ फ़रीदी बोला। ‘‘आप लोगों को बहुत ज़बर्दस्त धोखा दिया गया है।’’

‘‘धोखा... बेईमान कहीं का।’’ कुँवर ने बढ़ कर फ़रीदी का कॉलर पकड़ा।

‘‘मैं कहता हूँ ख़ुदा के लिए मेरी बात सुन लीजिए। सिर्फ़ दो मिनट के लिए, वरना दुश्मन हाथ से निकल जायेगा। अगर मुझे आप लोगों को धोखा देना होता तो मैं ख़ाली हाथ यहाँ कभी न आता। वह जाबिर था जिसने मेरे भेस में आप लोगों को गिरफ़्तार किया। वह यहाँ भी आने वाला है, आपकी तहरीर दिखा कर आप को ब्लैकमेल करेगा। मैं ख़ुद उसकी क़ैद में था। बड़ी मुश्किल से छुटकारा मिला। ये देखिए, मेरे हाथ जल गये हैं।’’ फ़रीदी ने एक ही साँस में सारी बात कह दी और उसने अपने हाथ दिखाये जो बुरी तरह से जल गये थे।

कुँवर साहब की पकड़ ढीली हो गयी और वे फ़रीदी को छोड़ कर कुर्सी पर बैठ गये। नवाब रशीदुज़्ज़माँ और तारिक़ भी ग़ौर से उसको देखने लगे।

‘‘नहीं बेटा, वाक़ई हम लोगों को बहुत बड़ा धोखा दिया गया है। मुझे तो ख़ुद हैरत थी कि तुम क्या कर रहे हो। बस, पहचान नहीं सके।’’

‘‘हाँ... और उसने चालाकी यह की थी कि आप लोगों को होश में लाने से पहले लैम्प की रोशनी भी कम कर दी गयी थी कि चेहरा साफ़ नज़र न आये। अच्छा, ये सब बातें बाद में होंगी। वह यहाँ आता ही होगा... इसलिए हम लोगों को तैयार हो जाना चाहिए। मैंने हमीद को माथुर साहब के बँगले पर भेज दिया है। वे आते ही होंगे।’’ फ़रीदी बोला।

‘‘लेकिन अभी थोड़ी देर हुई कि चार नक़ाबपोश आये थे, जिसमें से एक अपने को राहुल बताता था, और वह नवाब साहब को यह तहरीर दे कर उनकी हीरे की अँगूठी ले गया।’’

‘‘ले गया...!’’ फ़रीदी ने इस तरह कहा जैसे उसे उसका पहले से य़कीन रहा हो।

इतने में माथुर साहब भी आ गये और नवाब रशीदुज़्ज़माँ ने ‘राहुल’ की ताज़ा वारदात बयान करना शुरू कर दी।

‘‘ओह... फ़रीदी... अगर हमीद मुझसे सारे वाक़यात न बयान करता तो मैं धोखे में तुम्हें ज़रूर गिरफ़्तार कर लेता...!’’ माथुर साहब मुस्कुराते हुए बोले।

‘‘अच्छा माथुर साहब, वक़्त बहुत कम है। जल्दी कीजिए, वरना दुश्मन फिर हाथ से निकल जायेगा। शायद आपने चुन्नीलाल और हर नारायन एण्ड सन्स के यहाँ पुलिस का पूरा इन्तज़ाम कर दिया होगा।’’ फ़रीदी बोला।

‘‘हाँ... मैंने वहाँ के लिए सारे इन्तज़ाम पूरे कर दिये और कल रात के हादसे की ख़बर मैंने फ़ोन से इन्स्पेक्टर जनरल को कर दी थी। वहाँ से बहुत सख़्त ऑर्डर मिले हैं। वे परसों ख़ुद यहाँ पहुँच रहे हैं।’’

‘‘अच्छा... ख़ैर... अब जल्दी करना चाहिए।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘लेकिन अभी तक हमीद नहीं आये।’’ माथुर बोले।

‘‘वह आ जायेगा, मैंने उसे पता बता दिया है, अब चलिए... एहतियाती तौर पर आठ-दस कॉन्स्टेबलों को यहाँ छोड़ दीजिए और आप लोग इत्मीनान से सोइए। पुलिस आप लोगों की हिफ़ाज़त के लिए है। कोई डरने की बात नहीं।’’ फ़रीदी नवाब रशीदुज़्ज़माँ से बोला।

फ़रीदी और माथुर सिपाहियों को ले कर नवाबज़ादा शाकिर की लाइब्रेरी की तरफ़ रवाना हो गये।
 
Back
Top