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नौकरी के रंग माँ बेटी के संग compleet

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Guest
नौकरी के रंग माँ बेटी के संग

दोस्तो आपके लिए एक और मस्त कहानी पेश कर रहा हूँ आशा करता हू आपको बहुत पसंद आएगी ये कहानी मेरी पिछली कहानियों से ज़्यादा अच्छी ना हो पर बुरी भी नही होगी इसी उम्मीद के साथ कहानी पेश है दोस्तो काफ़ी दिन से देख रहा हूँ अब आप लोगो को शायद कहानियों मे इंटरेस्ट नही आता इसीलिए तो आप लोगो ने कमेंट देना बिल्कुल ही बंद कर दिया है

भाई आप कमेंट पास करेंगे तभी तो पोस्ट करने वाले का हॉंसला बढ़ेगा और तभी आपकी ये साइट तरक्की करेगी

दोस्तो, मैं समीर.. ऊपरवाले की मेहरबानी रही है कि उम्र और वक़्त के हिसाब से हमेशा वो हर चीज़ मिलती रही है जो एक सुखी ज़िन्दगी की जरूरत है।

इन जरूरतों में वो जरूरत भी शामिल है जिसे हम जिस्म की जरूरत कहते हैं यानि मर्दों को औरत के खूबसूरत जिस्म से पूरी होने वाली जरूरत!

मेरे लंड को वक़्त वक़्त पर हसीन और गर्मगर्म चूतों का तोहफा मिलता रहा है फिर वो चाहे कोई जवान अनाड़ी चूत हो या फिर खेली खाई तजुर्बेदार चूत!

दिल्ली है ही ऐसी जगह जहाँ समझदार लंड को कभी भी चूत की कमी नहीं रहती।

वैसे आपको बता दूँ कि मैं रहने वाला बिहार का हूँ, बिहार की राजधानी पटना में ही मेरा जन्म हुआ लेकिन मैंने दिल्ली में अपने रिश्तेदारों के यहाँ रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर यहीं बढ़िया सी नौकरी भी मिल गई।

दिल्ली की चकाचौंध भरी ज़िन्दगी को अलविदा कहना इतना आसान नहीं होता लेकिन किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है।

इसे मेरी ही बेवकूफी कह सकते हैं जो मैं अपने काम को कुछ ज्यादा ही अच्छे तरीके से करता रहा और मेरे कम्पनी के ऊपर ओहदे पे बैठे लोगों ने यह सब देख लिया।

दिल्ली में बस दो साल ही हुए थे और इन दो सालों में मेरे काम से मेरे अधिकारी बहुत प्रभावित थे।

आमतौर पर ऐसी स्थिति में आपको बढ़िया सा प्रमोशन मिलता है और आपकी आमदनी भी बढ़ जाती है।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन इस प्रमोशन में भी एक ट्विस्ट था।

एक सुबह जब मैं अपने दफ्तर पहुँचा तो मेरे सरे सहकर्मियों ने एक एक करके मुझे बधाइयाँ देनी शुरू कर दी।

मैं अनजानों की तरह हर किसी के बधाई का धन्यवाद करता रहा और इसका कारण जानने के लिए अपनी प्यारी सी दोस्त जो हमारी कम्पनी की एच। आर। ऑफिसर थी, उसके पास पहुँच गया।

उसने मुझे देखा तो मुस्कुराते हुए मेरी तरफ एक लिफाफा बढ़ा दिया और मेरे बोलने से पहले मुझे बधाई देते हुए अपन एक आँख मार कर हंस पड़ी।

हम दोनों के बीच यह आम बात थी, हम हमेशा एक दूसरे से इस तरह की हसीं मजाक कर लिया करते थे।

जब मैंने वो लिफाफा खोला तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था क्यूंकि उस लिफाफे में एक ख़त था जिसमें लिखा था कि मुझे प्रमोशन मिली है और मेरी तन्ख्वाह डेढ़ गुना बढ़ा दी गई है।

लेकिन यह क्या… जब आगे पढ़ा तब पता चला कि यह प्रमोशन अपने साथ एक ट्विस्ट भी लेकर आया है।

हमारी कम्पनी की कई शाखाएँ हैं और उनमें से कुछ शाखाएँ अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही थीं। तो उन्हीं में से एक शाखा बिहार के कटिहार जिले में है जहाँ हमारी कम्पनी को पिछले कई सालों से काफी नुक्सान हो रहा था।

मेरी कम्पनी ने मुझे वहाँ शिफ्ट कर दिया था। मुझे समझ में नहीं आरहा था कि मैं हंसूँ या रोऊँ…

पहली नौकरी थी और बस एक साल में ही प्रमोशन मिल रहा था तो मेरे लिए कोई फैसला लेना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था।

मैंने अपने घर वालों से बात की और दोस्तों से भी सलाह ली।

सबने यही समझाया कि पहली नौकरी में कम से कम दो साल तक टिके रहना बहुत जरूरी होता है ताकि भविष्य में इसके फायदे उठाये जा सकें।

सबकी सलाह सुनने के बाद मैंने मन मारकर कटिहार जाने का फैसला कर लिया और तीन महीने पहले यहाँ कटिहार आ गया।

कटिहार एक छोटा सा शहर है जहाँ बड़े ही सीधे साधे लोग रहते हैं। दिल्ली की तुलना में यहाँ एक बहुत ही सुखद शान्ति का वातावरण है।

मेरी कम्पनी ने मेरे लिए दो कमरों का एक छोटा सा घर दे रखा है जहाँ मेरी जरूरत की सारी चीज़ें हैं… कमी है तो बस एक चूत की जो दिल्ली में चारों तरफ मिल जाया करती थीं।

खैर पिछले तीन महीनों से अपने लंड के साथ खेलते हुए दिन बिता रहा था।

लेकिन शायद कामदेव को मुझ पर दया आ गई और वो हुआ जिसके लिये मैं तड़प रहा था।

हुआ यूँ कि एक शाम जब मैं ऑफिस से अपने घर वापस लौटा तो अपने घर के सामने वाले घर में काफी चहल-पहल देखी।

पता चला कि वो उसी घर में रहने वाले लोग थे जो किसी रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे और शादी के बाद वापस लौट आये थे।

मैं अपने घर में चला गया अपने बाकी के कामों में व्यस्त हो गया।

रात के करीब नौ बजे मेरे दरवाजे पे दस्तक हुई…

‘कौन?’ मैंने पूछा।

‘भाई साहब हम आपके पड़ोसी हैं…’ एक खनकती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।

मैंने झट से आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोला तो बस एक पल के लिए मेरी आँखें ठहर सी गईं… मेरे सामने हरे रंग की चमकदार साड़ी में तीखे नयन नक्श लिए खुले हुए लहराते जुल्फों में करीब 25 से 30 साल की एक मदमस्त औरत हाथों में मिठाइयों से भरी थाल लिए मुस्कुरा रही थी।

मुझे अपनी तरफ यूँ घूरता देख कर उसने झेंपते हुए अपनी आँखें नीचे कर लीं और कहा- भाई साब… हम आपके पड़ोसी हैं… एक रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे, और आज ही लौटे हैं।

‘जी..जी.. नमस्ते…’ मेरे मुख से बस इतना ही निकल सका।

‘ये कुछ मिठाइयाँ हैं.. इन्हें रख लें और थोड़ी देर में आपको हमारे घर खाने पे आना है…’ यह कहते हुए उन्होंने थाली मेरी तरफ बढ़ा दी।

मैंने थाली पकड़ते हुए उनसे कहा- यह मिठाई तक तो ठीक है भाभी जी, लेकिन खाने की क्या जरूरत है… आप लोग तो आज ही आये हैं और थके होंगे फिर यह तकलीफ उठाने की क्या जरूरत है?

‘अरे ऐसा कैसे हो सकता है… आप हमारे शहर में मेहमान हैं और मेहमानों की खातिरदारी करना तो हमारा फ़र्ज़ है…’ अपनी खिलखिलाती हुई मुस्कराहट के साथ उस महिला ने बड़े ही शालीन अंदाज़ में अपनी बात कही।

मैं तो बस उसकी मुस्कराहट पे फ़िदा ही हो गया।
 
‘अन्दर आइये न भाभी…’ मैंने भी सभ्यता के लिहाज़ से उनसे घर के अन्दर आने का आग्रह किया।

‘अरे नहीं… अभी ढेर सारा काम पड़ा है… आप आधे घंटे में चले आइयेगा, फिर बातें होंगी।’ उन्होंने इतना कहते हुए मुझसे विदा ली और वापस मुड़ कर अपने घर की तरफ चली गईं।

उनके मुड़ते ही मेरी आँखें अब सीधे वहाँ चली गईं जहाँ लड़कों की निगाहें अपने आप चली जाती हैं… जी हाँ, मेरी आँखें अचानक ही उनके मटकते हुए कूल्हों पर चली गईं और मेरे बदन में एक झुरझुरी सी फ़ैल गई।

उनके मस्त मटकते कूल्हे और उन कूल्हों के नीचे उनकी जानदार गोल गोल पिछवाड़े ने मुझे मंत्रमुग्ध सा कर दिया।

मैं दो पल दरवाज़े पे खड़ा उनके घर की तरफ देखता रहा और फिर एक कमीनी मुस्कान लिए अपने घर में घुस गया।

घड़ी की तरफ देखा तो घड़ी की सुइयाँ धीरे धीरे आगे की तरफ बढ़ रही थीं और मेरे दिल की धड़कनों को भी उसी तरह बढ़ा रही थीं।

एक अजीब सी हालत थी मेरी, उस हसीं भाभी से दुबारा मिलने का उत्साह और पहली बार उनके घर के लोगों से मिलने की हिचकिचाहट।

वैसे मैं बचपन से ही बहुत खुले विचारों का रहा हूँ और जल्दी ही किसी से भी घुल-मिल जाता हूँ।

खैर, दिल में कुछ उलझन और कुछ उत्साह लिए मैं तैयार होकर उनके दरवाज़े पहुँचा और धड़कते दिल के साथ उनके दरवाज़े की घण्टी बजाई।

अन्दर से किसी के क़दमों की आहट सुने दी और उस आहट ने मेरी धड़कनें और भी बढ़ा दी।

दरवाज़ा खुला और मुझे एक और झटका लगा, सामने एक खूबसूरत सा चेहरा एक कातिल सी मुस्कान लिए खड़ा था।

सफ़ेद शलवार और कमीज़ में लगभग 18 साल की एक बला की खूबसूरत लड़की ने मुस्कुराते हुए मुझे नमस्ते की और अन्दर आने का निमंत्रण दिया।

मैं बेवक़ूफ़ की तरह उसके चेहरे की तरफ देखता रहा और कुछ बोलना ही भूल गया…

‘अन्दर आ जाइये…’ अन्दर से वही आवाज़ सुनाई दी यानि कि उस महिला की जो अभी थोड़ी देर पहले मेरे घर पर मुझे खाने का निमंत्रण देने आईं थीं।

उनकी आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा और मैं भी बड़े शालीनता से उस हसीन लड़की की तरफ देखते हुए नमस्ते कहते हुए अन्दर घुस पड़ा।

घर के अन्दर आया तो एक भीनी खुशबू ने मुझे मदहोश कर दिया जो शायद उस कमरे में किये गए रूम फ्रेशनर की थी।

वो एक बड़ा सा हॉल था जिसमें सारी चीज़ें बड़े ही तरीके से सजाकर रखी गईं थीं।

सामने सोफे लगे हुए थे और उस पर एक तरफ एक सज्जन करीब करीब 50-55 साल के बैठे हुए थे।

मैंने आगे बढ़ कर उन्हें नमस्ते किया और एक सोफे पर बैठ गया।

तभी भाभी भी उस लड़की के साथ आकर सामने के सोफे पर मुस्कुराते हुए बैठ गईं।

अब हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा और हमने एक दूसरे से अपना अपना परिचय करवाया।

बातों बातों में पता चला कि वो बस तीन लोगों का परिवार है जिसमें उस परिवार के मुखिया अरविन्द झा जी एक सरकारी महकमे में सीनियर इंजिनियर हैं और पास के ही एक शहर पूर्णिया में पदस्थापित हैं। उनकी पत्नी रेणुका जी एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैंऔर उनकी इकलौती संतान यानि उनकी बेटी वन्दना बारहवीं में पढ़ रही थी।

थोड़ी देर में ही हम काफी घुल-मिल गए और फिर खाने के लिए बैठ गए।

खाने के मेज पर मैं और अरविन्द जी एक तरफ और रेणुका तथा वन्दना सामने की तरफ बैठ गए।

अरविन्द जी भी बड़े ही खुले विचारों के लगे और मुझसे बिल्कुल ऐसे बात कर रहे थे जैसे कई सालों से हमारी जान पहचान हो।

मैं भी उनसे बातें करता रहा लेकिन निगाहें तो सामने बैठी दो दो कातिल हसीनाओं की तरफ खिंची चली जाती थी… उन दोनों के चेहरे से टपकते नूर ने धीरे धीरे मेरे ऊपर एक नशा सा छ दिया था, मैं चाहकर भी उनके चेहरे से नज़रें हटा नहीं पा रहा था।

और फिर मेरी निगाहों ने अपनी असलियत दिखाई और चेहरे से थोड़ा नीचे की तरफ सरकना शुरू किया… रेणुका जी ने वही चमकदार हरे रंग की साड़ी अब भी पहन रखी थी और इतनी शालीनता से पहनी थी कि उनके गले के अलावा नीचे और कुछ भी नहीं दिख रहा था, लेकिन उनकी साड़ी ने इतना उभर बना रखा था कि एक तजुर्बेदार इंसान इतना तो समझ सकता था कि उन उभारों के पीछे अच्छी खासी ऊँचाइयाँ छिपी हुई हैं।

उनकी रेशमी त्वचा से भरे हुए गले ने यह एहसास दिला दिया था कि उनका पूरा बदन यूँ ही रेशमी और बेदाग ही होगा।

दूसरी तरफ वन्दना अपने सफ़ेद शलवार कमीज़ में अलग ही क़यामत ढा रही थी।

उसने भी अपनी माँ की तरह अपने बाल खुले रखे थे जो पंखे की हवा में लहरा रहे थे और बार बार उसके चेहरे पे आ जाते थे, जिन्हें हटाते हुए वो और भी खूबसूरत लगने लगती थी।

गहरे गले की कमीज़ उसके गोल गोल चूचियों की लकीरों की हल्की सी झलक दे रही थीं जो एक जवान लड़के को विचलित करने के लिए काफी होती हैं।

वैसे उसने दुपट्टा तो ले रखा था लेकिन अलग तरीके से यानि दुपट्टे को मफलर की तरह अपने गले में यूँ लपेट रखा था कि उसका एक सिरा गले से लिपटते हुए पीछे की ओर था और दूसरा सिरा आगे की तरफ उसकी दाहिनी चूची के ऊपर से सामने लटक रहा था।

यानि कुल मिला कर उसकी 32 साइज़ की चूचियाँ अपनी गोलाइयों और कड़ेपन का पूरा एहसास दिला रही थीं।

चूचियों की झलक और उसकी लकीरें दिल्ली में आम बात थीं… वहाँ तो न चाहते हुए भी आपको ये हर गली, हर नुक्कड़ पे दिखाई दे जाती थीं लेकिन यहाँ बात कुछ और थी।

दिल्ली की सुन्दरता थोड़ी बनावटी होती है और अभी मेरे सामने बिल्कुल प्राकृतिक और शुद्ध देसी सुन्दरता की झलक थी।

मेरा एक मित्र है जो बिहार के इसी प्रदेश का रहने वाला है और उसने कई बार बताया था कि इस इलाके की सुन्दरता हर जगह से भिन्न है और मैं वो आज महसूस भी कर रहा था।

रेणुका जी और वन्दना दोनों माँ बेटियाँ बिल्कुल दो सहेलियों की तरह एक दूसरे से बर्ताव कर रही थीं और दोनों ही बिल्कुल चुलबुली सी थीं।

कुल मिला कर वो शाम बहुत ही शानदार रही और उन सबसे विदा लेकर मैं वापस अपने कमरे पर आ गया।

 
कमरे पर आकर मैं सोने की तैयारी करने लगा और अपनी आँखों में उन दो खूबसूरत चेहरे बसाये हुए सोने की कोशिश करने लगा।

यूँ तो मैंने कई खूबसूरत लड़कियों और औरतों के साथ वक़्त बिताया है लेकिन पता नहीं क्यूँ आज इन दो माँ बेटियों के चेहरे मेरी आँखों से ओझल ही नहीं हो रहे थे।

खुली आँखों में उनकी चमक और आँखें बंद करते ही उनकी मुस्कराहट।

बस मत पूछिए की मेरा क्या हाल था, करवट बदलते बदलते रात कट गई।

सुबह आँख खुली तो काफी देर हो गई थी।

मैं झटपट उठा और बाहर का दरवाज़ा खोला क्यूंकि दूध वाले का वक़्त था… लेकिन जब घड़ी पर नज़र गई तो मायूसी छा गई क्यूंकि काफी देर हो चुकी थी और शायद दूध वाला बिना दूध दिए वापस चला गया था।

मैं वापस मुड़ा और अन्दर जाने लगा तभी किसी ने मुझे आवाज़ लगाई… ‘समीर जी…ओ समीर जी…’

मैंने मुड़कर देखा तो रेणुका भाभी हाथ हिलाकर मेरी तरफ ही इशारा कर रही थीं।

उनको देखते ही मेरे चेहरे पे छाई मायूसी गायब हो गई और मैंने मुस्कुरा कर उन्हें नमस्ते की।

रेणुका जी ने मुझे ठहरने का इशारा किया और वापस अपने घर में चली गईं।

मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले वो अपने घर से बाहर निकलीं, उनके हाथों में एक बड़ा सा पतीला था।

मेरी नज़र पहले तो पतीले पे गई फिर बरबस ही पतीले से हटकर उनके पूरे शरीर पे चली गई।

उन्होंने लाल रंग की एक मस्त सी गाउननुमा ड्रेस पहन रखी थी जो उनकी सुन्दरता पे चार चाँद लगा रही थी।

वैसे ही खुले बालों में वो मुस्कुराती हुई अपनी कमर मटकती हुई धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगीं।

‘आप क्या रोज़ इतनी देर तक सोते रहते हैं… आपका दूध वाला आया था और कई बार आपको जगाने की कोशिश करी, लेकिन जब आप नहीं जागे तो ये दूध हमारे यहाँ देकर चला गया…’ भाभी ने मुस्कुराते हुए शिकायत भरे लहजे में कहा।

‘अरे नहीं भाभी जी… दरअसल कल रात को काफी देर हो गई थी सोते सोते, इस लिए सुबह जल्दी उठ नहीं पाया।’ मैंने मासूमियत से जवाब दिया।

‘क्यूँ कल रात को कोई भूत देख लिया था क्या… जो डर कर सो नहीं पा रहे थे आप?’ भाभी ने खिलखिलाकर हंसते हुए मजाक किया।

मैंने भी मौके पे चौका मारा और कहा- भूत नहीं भाभी, बल्कि कुछ ज्यादा ही खूबसूरत भूतनी देख ली थी इसलिए उसको याद करते करते जगता रहा।

‘अच्छा जी… जरा संभल कर रहिएगा यहाँ की भूतनियों से… एक बार पकड़ लें तो फिर कितनी भी कोशिश कर लो, जाती ही नहीं…’ भाभी ने बड़े ही मादक अंदाज़ में मेरी आँखों में अपनी चंचल आँखों से इशारे करते हुए चुटकी ली।

‘अजी अगर इतनी खूबसूरत भूतनी हो तो कोई भला क्यूँ भागना चाहेगा, हम तो बस उससे चिपक कर ही रहेंगे।’ मैंने भी उनकी आँखों में झांकते हुए शरारत भरे अंदाज़ में कहा।

‘बड़े छुपे हुए रुस्तम हो आप… हमारी खूब ज़मेगी, लगता है।’ भाभी ने इस बार मुझे आँख मार दी।

मैं समझ गया कि सच में हमारी खूब जमने वाली है क्यूंकि कल रात जब मैंने उनके पति अरविन्द जी को देखा था तभी समझ में आ गया था कि शायद कहीं न कहीं उनकी बढ़ती उम्र की वजह से भाभी की हसरतों का कोई कोना खाली रह जाता होगा और अभी उनकी इस हरकत और इन बातों ने मुझे यकीन दिला दिया था कि जो कमी पिछले तीन महीनों से परेशान कर रही थी, वो अब पूरी होने वाली है।

‘फिलहाल कोई बर्तन ले आइये और यह दूध ले लीजिये…’ भाभी ने मेरा ध्यान दूध की तरफ खींचा।

मगर मैं ठहरा कमीना और मैंने भाभी के नेचुरल दूध की तरफ देखना शुरू कर दिया।

रात को साड़ी में छिपे इन बड़े बड़े दूध कलश को उनके गाउन के ऊपर से अब मैं सही ढंग से देख पा रहा था।

बिल्कुल परफेक्ट साइज़ की चूचियाँ थीं वो।

मेरे अंदाज़े से 34 की रही होंगी जो कि मेरी फेवरेट साइज़ थी, न ज्यादा छोटी न ज्यादा बड़ी…

मुझे अपनी चूचियों की तरफ घूरता देख कर भाभी ने मेरी आँखों में देखा और अपनी भौहें उठा कर बिना कुछ कहे ऐसा इशारा किया मनो पूछ रहीं हो कि क्या हुआ।

मैंने मुस्कुराकर उन्हें अपना सर हिलाकर ‘कुछ नहीं’ का इशारा किया और अपने घर में घुस गया और दूध का बर्तन ढूंढने लगा।

सच कहूँ तो उनसे बातें करके मेरे लंड महराज ने अपना सर उठा लिया था और उनकी चूचियों के एहसास ने उसे और हवा दे दी थी।

 
मैं रसोई में एक हाथ से अपने बरमुडे के ऊपर से अपने खड़े लंड को दबा कर बिठाने की कोशिश करने लगा और एक हाथ से बर्तन ढूंढने लगा।

‘क्या हुआ समीर जी… बर्तन नहीं मिल रहा या फिर से भूतनी दिख गई?’ रेणुका जी यह कहते हुए घर में घुस पड़ीं और सीधे रसोई की तरफ आ गईं।

मेरा हाथ अब भी वहीं था यानि मेरे लंड पे!

भाभी की आवाज सुनकर मैं हड़बड़ा गया और जल्दी से अपना हाथ हटा लिया लेकिन तब तक शायद उन्होंने मुझे लंड दबाते हुए देख लिया।

मैं झेंप सा गया और जल्दी से जल्दी दूध का बर्तन ढूंढने लगा।

‘हटो मैं देखती हूँ…’ भाभी ने मुस्कुराते हुए मुझे हटने को कहा और दूध का पतीला एक किनारे रख कर अपने दोनों हाथों से बर्तनों के बीच दूध का बर्तन ढूंढने लगी।

रैक के ऊपर के सारे बर्तन गंदे पड़े थे इसलिए वो झुक गईं और नीचे की तरफ ढूंढने लगीं।

‘उफ्फ्फ्फ़…’ बस इसी की कमी थी।

रेणुका जी ठीक मेरे सामने इस तरह झुकी थीं मनो अपनी गोल गोल और विशाल चूतड़ों को मेरी तरफ दिखा दिखा कर मुझे चोदने का निमंत्रण दे रहीं हों।

अब मुझ जैसा लड़का जिसने दिल्ली की कई लड़कियों और औरतों को इसी मुद्रा में रात रात भर चोद चुका हो उसकी हालत क्या हो रही होगी, यह तो आप समझ ही सकते हैं।

ऊपर से चूत के दर्शन किये हुए तीन महीने हो गए थे।

मेरा हाल यह था कि मेरा लंड अब मेरे बरमुडे की दीवार को तोड़ने के लिए तड़प रहा था और मैं यह फैसला नहीं कर पा रहा था कि क्या करूँ… अभी बस कल रात को ही तो हमारी मुलाकात हुई है और वो भी बड़ी शालीनता भरी। तो क्या मैं इतनी जल्दी मचा कर आखिरी मंजिल तक पहुँच जाऊँ या अभी थोड़ा सा सब्र कर लूँ और पूरी तरह से यकीन हो जाने पर कि उनके मन में भी कुछ है, तभी आगे बढूँ…

सच कहूँ तो दिल्ली की बात कुछ और थी… वहाँ इतनी झिझक न तो मर्द की तरफ से होती है और न ही औरत की तरफ से… कम से कम मुझे जितनी भी चूतें हासिल हुई थीं वो सब बेझिझक मेरे लंड को अपने अन्दर ठूंस कर चुदवाने का ग्रीन सिग्नल पहली मुलाकात में ही दे देती थीं…

लेकिन यहाँ बात कुछ और थी। एक तो यह छोटा सा शहर था और यहाँ के लोगों को मैं ठीक से समझ भी नहीं पाया था… इसलिए इस बात का डर था कि अगर पासा उल्टा पड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

इसी उधेड़बुन में अपना लंड खड़ा किये मैं रेणुका जी को अपनी गांड मटकाते हुए देखता रहा और धीरे से उनके पीछे से हट कर बगल में आ गया और खुद भी झुक कर उनकी मदद करने लगा।

ऐसा करने की एक वजह ये थी कि अगर मैं पीछे से न हटता तो पक्का कुछ गड़बड़ हो जाती… और दूसरा यह कि मुझे यह एहसास था की रेणुका के झुकने से उसकी चूचियों की हल्की सी झलक मुझे दिखाई पड़ सकती थी।

दिल में चोर लिए मैं उनसे थोड़ा नज़दीक होकर अपने हाथ बढ़ा कर बर्तन ढूंढने का नाटक करने लगा और जान बुझ कर उनके हाथों से अपने हाथ टकरा दिए।

अचानक हाथों के टकराने से उन्होंने थोड़ा सा घूम कर मेरी आँखों में देखा और यूँ ही झुकी हुई मुझे देखते हुए अपने हाथ चलाती रही बर्तनों की तरफ।

उनके जरा सा घूमते ही मैं खुश हो गया और उनके आँखों में देखने के बाद अचानक से नीचे उनके गाउन के खुले हुए गले पे अपनी नज़र ले गया।

उफ्फ्फ्फ़… गाउन का गला उनके झुकने से थोड़ा सा खुल गया था और उनकी बला की खूबसूरत गोरी चूचियों के बीच की लकीर मेरे ठीक सामने थी।

बयाँ नहीं कर सकता कि उन दो खूबसूरत चूचियों की वो झलक अपने अन्दर कितना नशा समेटे हुए थी।

उनकी चूचियाँ अपनी पूरी गोलियों को कायदे से सँभालते हुए गाउन में यूँ लटकी हुई थीं मानो दो खरबूजे… उन लकीरों ने मुझे यह सोचने पे मजबूर कर दिया कि गाउन के अन्दर उन्होंने ब्रा पहनी भी है या नहीं।

कुछ आधा दर्ज़न चूचियों का रसपान करने के मेरे तजुर्बे ने यह बताया कि उन चूचियों के ऊपर गाउन के अलावा और कुछ भी नहीं, तभी वो इतने स्वंतंत्र भाव से लटक कर अपनी सुन्दरता को नुमाया कर रही थी।

 
कहते हैं कि औरतों को ऊपर वाले ने यह गुण दिया है कि वो झट से यह समझ जाएँ कि सामने वाली की नज़र अच्छी है या गन्दी…

मेरी नज़रों का निशाना अपनी चूचियों की तरफ देखते ही भाभी के गाल अचानक से लाल हो गए और वो शरमा कर खड़ी हो गईं।

मैं भी हड़बड़ा कर खड़ा हो गया और हम दोनों एक दूसरे से नज़रें चुराते हुए चुपचाप खड़े ही रहें… मानो हम दोनों की कोई चोरी पकड़ी गई हो!

‘समीर जी, आप ऐसा करें कि फिलहाल मेरे दूध का बर्तन रख लें मैं बाद में आपसे ले लूंगी…’ भाभी ने अपने शर्म से भरे लाल-लाल गालों को और भी लाल करते हुए मेरी तरफ देख कर कहा और कुछ पल के लिए वैसे ही देखती रहीं..

मैं कमीना, जैसे ही भाभी ने दूध का बर्तन कहा, मेरी नज़र फिर से उनकी चूचियों पर चली गईं जो तेज़ तेज़ साँसों के साथ ऊपर नीचे होकर थरथरा रही थीं…

अचानक मेरी नज़रें उनकी गोलाइयों के साथ घूमते घूमते चूचियों के ठीक बीच में ठहर गईं जहाँ दो किशमिश के दानों के आकार वाले उभार मेरे तजुर्बे को सही ठहरा रही थीं…

यानि रेणुका भाभी ने सचमुच अन्दर ब्रा नहीं पहनी थी।

इस बात का एहसास होते ही उनकी चूचियों के दानों को एकटक निहारते हुए मैंने एक लम्बी सांस भरी…

मेरी साँसों की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि भाभी का ध्यान मेरे चेहरे से हट गया और उनकी आँखें नीचे झुक गईं…

यहाँ भी बवाल… नीचे हमारे लंड महाराज बाकी की कहानी बयाँ कर रहे थे।

अब तो रेणुका का चेहरा सुर्ख लाल हो गया… एक दो सेकंड तक उनकी निगाहें मेरे लंड पे टिकीं, फिर झट से उन्होंने नज़रें हटा लीं।

‘अब मुझे जाना चाहिए… आप को भी दफ्तर जाना होगा और वन्दना भी कॉलेज जाने वाली है…’ रेणुका जी ने कांपते शब्दों के साथ बस इतना कहा और शर्मीली मुस्कान के साथ मुड़ कर वापस चल दीं।

उनके चेहरे की मुस्कान ने मेरे दिल पे हज़ार छुरियाँ चला दी… मैं कुछ बोल ही नहीं पाया और बस उन्हें पीछे से देखने लगा अपनी आँखें फाड़े फाड़े!

हे भगवन… एक और इशारा जिसने मुझे पागल ही कर दिया… उनका गाउन पीछे से उनकी चूतड़ों के बीच फंस गया था… यानि…

उफ्फ… यानि की उन्होंने उस गाउन के अन्दर न तो ब्रा पहनी थी और ना ही नीचे कोई पैंटी-कच्छी…!!

मेरा हाथ खुद-ब-खुद अपने लंड के ऊपर चला गया और मैंने अपने लंड को मसलना शुरू कर दिया।

रेणुका तेज़ क़दमों के साथ दरवाज़े से बाहर चली गईं…

मैं उनके पीछे पीछे दरवाज़े तक आया और उन्हें अपने खुद के घर में घुसने तक देखता ही रहा।

मैं झट से अपने घर में घुसा और बाथरूम में जाकर अपन लंड निकाल कर मुठ मारने लगा।

बस थोड़ी ही देर में लंड ने ढेर सारा माल बाहर उगल दिया…

मेरा बदन अचानक से एकदम ढीला पड़ गया और मैंने चैन की सांस ली।

मैं बहुत ही तरो ताज़ा महसूस करने लगा और फटाफट तैयार होकर अपने ऑफिस को चल दिया।

जाते जाते मैंने एक नज़र रेणुका भाभी के घर की तरफ देखा पर कोई दिखा नहीं।

मैं थोड़ा मायूस हुआ और ऑफिस पहुच गया।

ऑफिस में सारा दिन बस सुबह का वो नज़ारा मेरी आँखों पे छाया रहा.. रेणुका जी के हसीं उत्तेज़क चूचियों की झलक… उनकी गांड की दरारों में फंसा उनका गाउन… उनके शर्म से लाल हुए गाल और उनकी शर्माती आँखें… बस चारों तरफ वो ही वो नज़र आ रही थीं।

इधर मेरा लंड भी उन्हें सोच सोच कर आँसू बहाता रहा और मुझे दो बार अपने केबिन में ही मुठ मारनी पड़ी।

किसी तरह दिन बीता और मैं भागता हुआ घर की तरफ आया… घर के बाहर ही मुझे मेरी बेचैनी का इलाज़ नज़र आ गया।

घर के ठीक बाहर मैंने एक गोलगप्पे वाले का ठेला देखा और उस ठेले के पास रेणुका अपनी बेटी वन्दना के साथ गोलगप्पे का मज़ा ले रही थीं।

मुझे देखकर दोनों मुस्कुरा उठीं।

मैंने भी प्रतिउत्तर में मुस्कुरा कर उन दोनों का अभिवादन किया।

‘आइये समीर जी… आप भी गोलगप्पे खाइए… हमारे यहाँ के गोलगप्पे खाकर आप दिल्ली के सारे गोलगप्पे भूल जायेंगे… ‘

मेरी उम्मीदों के विपरीत ये आवाज़ वन्दना की थी जो शरारती हसीं के साथ मुझे गोलगप्पे खाने को बुला रही थी।

मैं थोड़ा चौंक गया और एक बार रेणुका जी की तरफ देखा.. मुझसे नज़रें मिलते ही वो फिर से सुबह की तरह शरमा गईं और नीचे देखने लगीं, फिर थोड़ी ही देर बाद कनखियों से मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगीं…

उनकी इस अदा ने मुझे घायल सा कर दिया और मैं अन्दर ही अन्दर गुदगुदी से भर गया।

लेकिन जल्दी ही रेणुका जी की तरफ से अपनी नज़रें हटा कर वन्दना की तरफ देख कर मुस्कुराने लगा।

‘अच्छा जी… आपके यहाँ के गोलगप्पे इतने स्वादिष्ट हैं जो मुझे दिल्ली के गोलगप्पे भुला देंगे…?’ मैंने भी उसे जवाब दिया और उनकी तरफ बढ़ गया।

ठेले के करीब जाकर मैं उन दोनों के सामने खड़ा हो गया और गोलगप्पे वाले से एक प्लेट लेकर गोलगप्पे खाने को तैयार हो गया।

‘भैया इन्हें बड़े बड़े और गोल गोल खिलाना… ये हमारे शहर में मेहमान हैं तो इनकी खातिरदारी में कोई कमी न रह जाये।’ वन्दना ने मेरी आँखों में एक टक देखते हुए शरारती मुस्कान के साथ गोलगप्पे वाले को कहा।

 
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