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परिवार(दि फैमिली) complete

"भइया आप तो बुहत बदमाश हो। कंचन दीदी की चुचियों से मन नहीं भरा क्या जो मेरे पीछे पड़े हो" शीला ने अपने हाथों से अपनी चुचियों को छूपाकर मुस्कराते हुए कहा।

"दीदी यह मरद होते ही ऐसे हैं इनका मन एक जगह नहीं भरता" कंचन ने उनदोनों की बाते सुनकर अपने भाई को टोकते हुए कहा ।

"कंचन दीदी आप लड़कियां भी कुछ कम नहीं हो। तुम्हारा मन तो हर किसी के लंड को लेने का होता है मगर डरती हो की कहीं किसी पता न लग जाए" विजय ने अपनी बहन को करारा जवाब देते हुए कहा।

"दीदी आप इसे छोड़ो और मुझसे बात करो। यह साला मेरी बहन को देखकर पागल हो गया है" इस बार नरेश ने बीच में बोलते हुए कहा।

"हाँ हाँ जाओ मुझे तो सिर्फ शीला दीदी से बात करनी है" विजय ने कंचन को चिढाते हुए कहा ।

"मुझे भी तुमसे बात करने का कोई शौक नहीं है नरेश भैया है न मुझसे बात करने के लिये" कंचन विजय की बात सुनकर जल उठी। इसीलिए उसने विजय को जलाने के लिए सीधा जाकर नरेश के पास बैठ गई।

"दीदी आप का जिस्म कितना गोरा और भरा हुआ है मुझे तो आप दुनिया की सब से अच्छी लड़की नज़र आती हो" नरेश ने कंचन को अपने पास बैठने से उसकी तारीफ करते हुए कहा।

"क्या कहा नरेश भैया। मैं आपको इतनी अच्छी लगती हू" कंचन ने नरेश की बात सुनकर खुश होने की एक्टिंग करते हुए कहा ।

"हाँ दीदी । मैं सच कह रहा हूँ क्या मैं आपकी चिकनी जाँघ को हाथ लगा सकता हूँ" नरेश ने कंचन की गोरी चिकनी जाँघ की तरफ देखते हुए कहा।

"हाँ भैया। आपको मैं कैसे रोक सकती हूँ ।आप मेरी इतनी तारीफ कर रहे हो । मैं आपके लिए इतना तो कर सकती हूँ" कंचन ने नरेश की बात सुनकर वैसे ही एक्टिंग करते हुए कहा।

नरेश को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था । उसने कंचन की बात सुनते ही अपना हाथ उसकी जाँघ पर रख दिया और वह कंचन की मोटी मखमली जाँघ को अपने हाथों से सहलाने लगा । शीला अपने भाई को कंचन के पीछे ऐसे लटू होते देखकर बुहत गुस्सा आ रहा था। मगर वह कुछ कर भी नहीं सकती थी ।

"शीला दीदी देखो वहां तुम्हारी सहेली को। तुम्हारे भैया का साथ दे रही है तुम क्यों इतना शर्मा रही हो" विजय ने जानबूझकर शीला को जलाते हुए कहा।

"भइया शायद आप सही कह रहे हो" शीला ने अपने हाथों को अपनी चुचियों से हटाते हुए कहा।
 
दीदी यह हुई न बात क्या मैं आपकी इन नरम नरम गोरी चुचियों को छु सकता हूँ" विजय ने मौके का फ़ायदा उठाते हुए कहा।

"हाँ भैया क्यों नहीं आप मेरे लिए इतना मर रहे हो। क्या मैं आपका इतना भी ख्याल नहीं रख सकती" शीला ने विजय की बात सुनते ही मुस्कराते हुए कहा ।

"दीदी आप सच में बुहत अच्छी हो" विजय शीला की बात सुनकर खुश होते हुए बोला और अपने दोनों हाथों को आगे बढाते हुए शीला की दोनों गोरी चुचियों को पकड लिया।

"आहहह भैया आराम से आपका हाथ कितना सख्त है" शीला अपनी चुचियों पर विजय के हाथ पडते ही सिसकते हुए बोली।

"ओहहहहह दीदी आपकी चुचियां कितनी छोटी और नरम हैं आअह्ह्ह मेरा मन इन्हें चूमने का कर रहा है" विजय ने शीला की दोनों चुचियों को अपने दोनों हाथों से मसलते हुए कहा । शीला की चुचियां छोटी होने के कारण विजय के हाथों में पूरी तरह समां रही थी ।

"आआह्ह्ह भैया आपकी हरक़तों से मुझे कुछ हो रहा है" शीला ने सिसकते हुए कहा।

"दीदी प्लीज एक बार चूमने दो न। आपको अगर बुरा लगा तो मैं फिर नहीं चूमूंगा" विजय ने शीला की चुचियों को वैसे ही अपने हाथों से मसलते हुए कहा।

"आह्ह्ह्ह भैया आपको जैसे अच्छा लगे करो । मगर मुझसे बैठा नहीं जा रहा है" शीला ने वैसे ही सिसकते हुए कहा।

"ओहहहह दीदी आप मेरी गोद में आ जाओ ना" विजय ने अपने हाथों को शीला की चुचियों से हटाते हुए उसके सर को पकडकर अपनी गोद पर रखते हुए कहा ।

"आहहह भैया आप कितने अच्छे हो" शीला ने विजय की गोद में सर रखकर लेटते हुए कहा मगर अगले ही पल उसे वहां पर अपना सर रखकर जो गलती की थी उसका अहसास हो गया । शीला जहां पर अपना सर रखे हुए थी उसके नज़दीक ही विजय के अंडरवियर में उसका लंड पूरी तरह तनकर झटके खा रहा था।

विजय शीला को अपनी गोद में सुलाते ही नीचे झुककर उसकी एक चूचि को अपने हाथ से पकडकर अपने होंठो से चूम लिया और कुछ देर तक उसे चूमने के बाद अपना मूह खोलते हुए उसकी चूचि के दाने को अपने मूह में भरकर चूसने लगा।

"आहहह बदमाश क्या कर रहे हो तुमने सिर्फ चूमने को कहा था" शीला विजय के मुँह में अपनी चूचि के जाते ही सिसकते हुए बोली ।

"ओहहहह दीदी क्या करू आपकी चूचि का रस इतना मीठा है की मुझे उसे चूसने का मन कर रहा है" विजय ने शीला की चूचि को अपने मूह से निकालते हुए कहा।

"भइया आप झूठ बोल रहे हो । मेरी चुचियों में रस कहाँ है" शीला ने विजय की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा।
 
दीदी सच कह रहा हूँ आपकी चुचियों में बुहत रस है जो बिल"दीदी यह हुई न बात क्या मैं आपकी इन नरम नरम गोरी चुचियों को छु सकता हूँ" विजय ने मौके का फ़ायदा उठाते हुए कहा।

"हाँ भैया क्यों नहीं आप मेरे लिए इतना मर रहे हो। क्या मैं आपका इतना भी ख्याल नहीं रख सकती" शीला ने विजय की बात सुनते ही मुस्कराते हुए कहा ।

"दीदी आप सच में बुहत अच्छी हो" विजय शीला की बात सुनकर खुश होते हुए बोला और अपने दोनों हाथों को आगे बढाते हुए शीला की दोनों गोरी चुचियों को पकड लिया।

"आहहह भैया आराम से आपका हाथ कितना सख्त है" शीला अपनी चुचियों पर विजय के हाथ पडते ही सिसकते हुए बोली।

"ओहहहहह दीदी आपकी चुचियां कितनी छोटी और नरम हैं आअह्ह्ह मेरा मन इन्हें चूमने का कर रहा है" विजय ने शीला की दोनों चुचियों को अपने दोनों हाथों से मसलते हुए कहा । शीला की चुचियां छोटी होने के कारण विजय के हाथों में पूरी तरह समां रही थी ।

"आआह्ह्ह भैया आपकी हरक़तों से मुझे कुछ हो रहा है" शीला ने सिसकते हुए कहा।

"दीदी प्लीज एक बार चूमने दो न। आपको अगर बुरा लगा तो मैं फिर नहीं चूमूंगा" विजय ने शीला की चुचियों को वैसे ही अपने हाथों से मसलते हुए कहा।

"आह्ह्ह्ह भैया आपको जैसे अच्छा लगे करो । मगर मुझसे बैठा नहीं जा रहा है" शीला ने वैसे ही सिसकते हुए कहा।

"ओहहहह दीदी आप मेरी गोद में आ जाओ ना" विजय ने अपने हाथों को शीला की चुचियों से हटाते हुए उसके सर को पकडकर अपनी गोद पर रखते हुए कहा ।

"आहहह भैया आप कितने अच्छे हो" शीला ने विजय की गोद में सर रखकर लेटते हुए कहा मगर अगले ही पल उसे वहां पर अपना सर रखकर जो गलती की थी उसका अहसास हो गया । शीला जहां पर अपना सर रखे हुए थी उसके नज़दीक ही विजय के अंडरवियर में उसका लंड पूरी तरह तनकर झटके खा रहा था।

विजय शीला को अपनी गोद में सुलाते ही नीचे झुककर उसकी एक चूचि को अपने हाथ से पकडकर अपने होंठो से चूम लिया और कुछ देर तक उसे चूमने के बाद अपना मूह खोलते हुए उसकी चूचि के दाने को अपने मूह में भरकर चूसने लगा।

"आहहह बदमाश क्या कर रहे हो तुमने सिर्फ चूमने को कहा था" शीला विजय के मुँह में अपनी चूचि के जाते ही सिसकते हुए बोली ।

"ओहहहह दीदी क्या करू आपकी चूचि का रस इतना मीठा है की मुझे उसे चूसने का मन कर रहा है" विजय ने शीला की चूचि को अपने मूह से निकालते हुए कहा।

"भइया आप झूठ बोल रहे हो । मेरी चुचियों में रस कहाँ है" शीला ने विजय की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा।कुल मीठा है" विजय ने शीला की आँखों में देखते हुए कहा।

"भइया आप भी न छोड़ो अब। आप जब इन्हें अपने मुँह में लेते हो मुझे अपने पूरे जिस्म में कुछ होने लगता है" शीला ने विजय की आँखों में देखते हुए कहा ।

"दीदी बस एक बार और इन्हें चूसने दो" विजय ने बच्चे की तरह ज़िद करते हुए कहा।

"भइया आप ऐसे नहीं मानेंगे अच्छा बस एक बार ही" शीला ने विजय के सामने हार मानते हुए कहा । विजय की आँखें शीला की बात सुनकर चमक उठी।

विजय ने शीला की चूचि को फिर से अपने मुँह में भर लिया और ज़ोर से चूसने लगा । विजय इस बार कुछ देर तक शीला की चूचि के दाने को चाटने के बाद उसकी चूचि को पूरा अपने मुँह में भरकर चूसने लगा,

"ओहहहह भइया अब छोड़ो ना" शीला की हालत विजय से चूचि के चुसवाते हुए बुरी होती जा रही थी इसीलिए वह ज़ोर से सिसकते हुए कहा रही थी ।

विजय तो जैसे पागल ही हो चूका था। वह शीला की चूचि को ज़ोर से चूस रहा था । अचानक विजय ने शीला की चूचि को अपने मूह से निकाल दिया और उसकी दूसरी चूचि को अपने मुँह में भरकर चूसने लगा।

"आहहह भैया ओह्ह्ह्हह" शीला की मुँह से ज़ोर से सिस्कियाँ निकल रही थी और उसने अपने हाथ को विजय के बालों में डाल दिया था जिन्हें वह सहला रही थी।

"दीदी देखो तो कैसे बेशर्मों की तरह दीदी की चुचियों को चूस रहा है" अचानक नरेश ने अपने हाथ से विजय और अपनी दीदी की तरफ इशारा करके कंचन को ज्यादा जलाने की कोशिश करते हुए कहा ।

"हाँ नरेश भैया यह तो सच में पागल हो गया है" कंचन ने गुस्सा होते हुए कहा।

"दीदी यह दोनों ऐसे मज़े ले रहे हैं और हम बस इन्हें देख रहें है" नरेश ने अपने हाथ से शीला की जाँघ को सहलाते हुए अपने हाथ को उसकी पेंटी तक ले जाते हुए कहा।

"क्या मतलब भइया" कंचन ने अचानक चौकते हुए नरेश के हाथ को अपने हाथ से पकडकर कहा।

"दीदी मेरा मतलब है क्या मैं आपकी चुचियों को भी नहीं देख सकता" नरेश ने कंचन की आँखों में देखते हुए कहा।

"भइया क्यों नहीं देख सकते। जब यह इतने बेशरम हो सकते हैं तो हम थोडी बुहत मस्ती तो कर सकते है" कंचन ने नरेश की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा ।
 
कंचन अपने भाई को शीला की चुचियों को चूसते हुए देखकर बुहत ज्यादा जल रही थी। जिस वजह से उसने नरेश को हाँ कह दिया।

"दीदी आप अपनी ब्रा को उतार दो ना" नरेश ने कंचन को विजय की तरफ घूरते हुए देखकर कहा।

"भइया आप ही खोल दो ना" कंचन ने नरेश की बात सुनकर अपनी पीठ को उसकी तरफ करते हुए कहा ।

"दीदी आप बुहत अच्छी हो अभी उतार देता हूँ" नरेश कंचन की बात सुनकर ख़ुशी से उछलता हुआ बोला ।नरेश ने अपने दोनों हाथ आगे बढाते हुए कंचन की ब्रा के हुक खोल दिए।

"दीदी मैंने पीछे से खोल दिया है" नरेश ने अपने हाथों को वापस नीचे करते हुए कहा । नरेश का उत्तेजना के मारे बुरा हाल था उसका लंड कंचन की नंगी चुचियों को देखने के ख़याल से ही ज़ोर से उछल रहा था।

कंचन विजय की बात सुनकर सीधा होने लगी । कंचन अब सीधे नरेश के सामने बैठी थी मगर उसकी ब्रा अभी तक उसकी चुचियों में अटकी हुयी थी।

"दीदी अब तो ब्रा को हटा दो ना" नरेश ने कंचन को देखते हुए कहा । नरेश कंचन की नंगी चुचियों को देखने के लिए मरा जा रहा था ।

"भइया मुझे शर्म आ रही है आप खुद ही हटा दो" कंचन ने अपना सर झुकाते हुए कहा।

"दीदी आप भी न । मैं अभी हटाता हूँ" नरेश ने अपने हाथों को आगे बढाते हुए कंचन की चुचियों से उसकी ब्रा को खींचकर उसके जिस्म से अलग कर दिया।

कंचन ने जैसे ही देखा के नरेश अपने हाथ से उसकी ब्रा को उसकी चुचियों से हटाने वाला है उसने शर्म के मारे अपनी आँखों को बंद कर लिया।

"दीदी मैं बता नहीं सकता आपकी चुचियां कितनी ज्यादा सूंदर हैं" नरेश ने कंचन की बडी बड़ी गोरी चुचियों के नंगा होते ही अपने गले में थूक को गटकते हुए कहा । कंचन की चुचियों को देखकर नरेश का लंड उत्तेजना के मारे बुहत ज्यादा तनकर उसके अंडरवियर में झटके मार रहा था ।
 
दीदी आपने अपनी आँखें क्यों बंद कर ली हैं?" नरेश ने कंचन की आँखों को बंद देखकर उससे सवाल किया।

"भइया मुझे शर्म आ रही है" कंचन ने वैसे ही अपनी आँखों को बंद किये हुए कहा।

"अरे दीदी जितना ज्यादा शर्म करोगी उतना ही तुम्हारा नुकसान होगा" नरेश ने कंचन की बात सुनकर उसकी चुचियों को घूरते हुए कहा ।

"भइया आपको मेरी कितनी चिंता है" कंचन ने अचानक अपनी आँखों को धीरे धीरे खोलते हुए कहा।

"दीदी आपकी चुचियां कितनी बड़ी और सीधी हैं मुझे तो यह बुहत ज्यादा अच्छी लग रही है" नरेश ने कंचन की चुचियों की गौर से देखते हुए कहा।

"भइया आप भी न मेरी इतनी तारीफ मत करो। मुझे शर्म आ रही है" कंचन ने नरेश की बात सुनकर शर्म से अपना कन्धा नीचे करते हुए कहा।

"अरे दीदी आप हो ही इतनी सूंदर तो आपकी तारीफ ही करूँगा ना" नरेश ने अपने हाथ को आगे करते हुए कंचन के सर को पकडकर ऊपर करते हुए कहा ।

"भइया आप बुहत अच्छे हो" कंचन ने नरेश की आँखों में देखते हुए कहा।

"दीदी देखो आपके होंठ कितने गुलाबी और सेक्सी है" नरेश ने अपनी ऊँगली को कंचन के होंठो पर रखकर फिराते हुए कहा।
 
अगले दो तीन अपडेट बहुत ही धमाकेदार होंगे।जिसमे ग्रुप सेक्स और बहनों की अदला बदली होनेवाली है।आप सभी को कमेंट के लिए थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
"आह्ह्ह्ह भैया क्या कर रहे हो मुझे गुदगुदी हो रही है" कंचन ने सिसकते हुए कहा । अपनी ऊँगली को कंचन के होंठो पर फेरते हुए नरेश के पूरे जिस्म में भी गुदगुदी और अजीब मज़े का अहसास हो रहा था।

"दीदी आप मेरी गोद में आ जाओ न मैं आपके जिस्म को क़रीब से देखना चाहता हू" नरेश ने कंचन के होठो से अपनी ऊँगली को हटाकर उसके काँधे पर फिराते हुए कहा ।

विजय और शीला अब चुपचाप कंचन और नरेश को देख रहे थे । शीला विजय की गोद में लेटी हुयी थी । और विजय उसकी चुचियों के दाने को अपनी उँगलियों से मसलते हुए अपनी बहन और नरेश को देख रहा था।

"भइया आपके हाथ से मुझे पूरे जिस्म में कुछ हो रहा है" कंचन ने नरेश की बात मानकर उसकी गोद में अपना सर रखकर लेटते हुए कहा ।

"दीदी आप चुपचाप लेट जाओ । थोड़ी ही देर में आपको मजा आने लगेंगा" नरेश ने कंचन को अपनी गोद पर सर रखकर सोते ही कहा । नरेश ने अपनी ऊँगली को कंचन के काँधे से नीचे ले जाते हुए उसकी बड़ी बड़ी चुचियों के उभारों के बीच तक आ गया । और अपनी ऊँगली को कंचन की चूचीयों के बीच में फिराने लगा।

"दीदी आपकी चुचियां कितनी नरम है" नरेश ने अपनी ऊँगली को वैसे ही कंचन की चुचियों के बीच फिराते हुए कहा।

"हाहहह भैया मुझे अपने जिस्म में कुछ हो रहा है" कंचन ने नरेश की ऊँगली को अपनी चुचियों के बीच महसूस करते ही सिसककर कहा ।

"आह्ह्ह्ह दीदी आपकी चुचियों का दाना तो कितना सख्त है" नरेश ने अचानक अपनी ऊँगली को कंचन की एक चूचि के दाने पर रखते हुए कहा और उसे अपनी दोनों उँगलियों के बीच लेकर दबाने लगा।

"ओहहहह आह भैया यह क्या कर रहे हो" कंचन ने अपनी चूचि के दाने को दबने से ज़ोर से सिसकते हुए कहा

"दीदी कहा न चुप हो जाओ और मजा लो" नरेश ने कंचन की एक चूचि के दाने को अपने हाथों से मसलने के बाद उसकी दूसरी चूचि के दाने को ज़ोर से दबाते हुए कहा ।

"उईई भैया आराम से दर्द हो रहा है" नरेश के हाथों से अपने चूचि का दाना ज़ोर से मसलने से कंचन ने हल्का चीखते हुए कहा।

"सॉरी दीदी में कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था" नरेश ने कंचन से माफ़ी माँगते हुए कहा।

"कोइ बात नहीं भैया" कंचन ने नरेश की आँखों की तरफ घूरकर मुस्कुराते हुए कहा और अपनी एक आँख को बंद करते हुए नरेश को आँख मार दी।
 
नरेश जो पहले से बुहत ज्यादा उतेजित था। वह कंचन की इस अदा से बिलकुल पागल हो गया और उत्तेजना के मारे उसने कंचन के सर को अपने दोनों हाथों में लेते हुए नीचे झुककर अपने होठ अपनी बहन कंचन के गुलाबी होठो पर रख दिये ।

कंचन नरेश के अचानक हमले से पहले तो बौखला गयी मगर उसको ही पल वह मज़े के सागर में डुबकियाँ लगाने लगी और उसके हाथ अपने आप नरेश के बालों में जाकर उसके बालों को सहलाने लगे।

नरेश कंचन के दोनों गुलाबी होंठो को बारी बारी चूस रहा था उसे कंचन के मीठे होंठ शहद से ज्यादा मजा दे रहे थे । नरेश न जाने कितनी देर तक वैसे ही अपनी बहन के होंठो को चूसते रहा । अचानक उसकी और कंचन की साँसें फूलने लगी जिस वजह से मजबूरी में उसे अपने होंठ कंचन के होंठो से हटाने पडा, एक दुसरे के होंठो के अलग होते ही कंचन और नरेश बुहत ज़ोर से हाँफने लगे। दोनों हाँफते हुए बुहत ज़ोर से साँसें ले रहे थे ।

सांसों के दुरुस्त होते ही दोनों की नज़रें जैसे ही आपस में मिली कंचन ने शर्म से अपनी नज़रों को नरेश की नज़रों के सामने से फेर लिया । नरेश समझ गया की कंचन को भी आगे बढ़ना है मगर वह शरमा रही है।

"दीदी फिर से सॉरी। मगर आपके होंठो का रस शहद से ज्यादा मीठा था" नरेश ने कंचन के सर को पकडकर अपनी तरफ करके अपने होंठो पर जीभ को फिराते हुए कहा ।

"भइया आप बुहत बदमाश हो। मेरे होंठ में भला कोई चीनी थी जो वह आपको मीठे लगे" कंचन ने अपनी आँखों को ऊपर करते हुए नरेश की तरफ देखते हुए कहा। उसका भी उत्तेजना के मारे बुरा हाल था उसकी चूत से इतना पानी निकल चूका था की उसकी पेंटी पूरी गीली हो चुकी थी ।

"दीदी कसम से आपके होंठ बुहत मीठे हैं। मेरा तो इन्हें छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा था मगर" नरेश ने कंचन की बात सुनकर इतना ही कहा और चुप हो गया।

"भइया फिर आपने मेरे होंठो को क्यों छोड़ा?" कंचन ने नरेश की आँखों में देखते ही कहा।

कंचन की बात सुनकर नरेश की हालत और ज्यादा खराब हो गई और उसने अपने होंठो को फिर से कंचन के रसीले होंठो पर रख दिया और नरेश इस बार अपना पूरा मूह खोलकर कंचन के दोनों होंठो को चाट रहा था।चूस रहा था और कंचन भी उसका पूरा साथ दे रही थी।
 
कंचन बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी और उसकी चूत से बुहत ज्यादा पानी टपक रहा था । अचानक कंचन ने अपनी जीभ को नरेश के मूह में डाल दिया। नरेश कंचन की जीभ को अपने मूह में महसूस करते ही उसे पागलोँ की तरह चाटने और चूसने लगा और अपने हाथों से उसकी दोनों चुचियों को बुहत ज़ोर से मसलने लगा।

नरेश और कंचन कुछ देर तक ऐसे ही एक दुसरे के होंठो को बुरी तरह चूसने के बाद एक दुसरे के होंठो को आपस में से हटा दिए । नरेश ने इस बार कंचन के होंठो से अलग होते ही अपने होंठो से उसके गालों को चूमते हुए नीचे होते हुए उसके गले से होता हुआ कंचन की चुचियों तक आ गया और कुछ देर तक कंचन की चुचियों को ग़ौर से देखने के बाद अपना मूह खोलकर उसकी एक चूचि के दाने को अपने मूह में भर लिया ।

नरेश कंचन की चूचि को दाने को बुहत ज़ोर से चूस रहा था और अपने हाथ से उसकी दूसरी चूचि को दबा रहा था।

"आह्ह्ह्ह भैया आप तो बुहत गंदे हो" कंचन ने ज़ोर से सिसकते हुए कहा। नरेश ने कंचन की बात सुनकर उसकी चूचि को अपने मूह से निकालकर उसकी दूसरी चूचि के दाने को अपने मूह में भर लिया और कुछ देर तक उसे चूसने के बाद अपने मुँह से निकालकर कंचन की दोनों चुचियों के उभारों को बारी बारी अपने दाँतों से काटने लगा ।

"आईई ईस भैया क्या कर रहे हो" कंचन ने अपनी चुचियों को काटने से ज़ोर से उछलकर चीखते हुए कहा ।नरेश कंचन के चिल्लाने से उसकी चुचियों को काटना छोडकर बारी बारी अपने मूह में जितना हो सकता था भरकर चूसने लगा।

"ओहहहह भैया आपने तो मुझे पागल बना दिया। मुझे नीचे कुछ हो रहा है" कंचन ने नरेश को बालों से पकडकर अपनी चुचियों से हटाते हुए कहा ।

"दीदी कहाँ पर?" नरेश ने अन्जान बनते हुए सवाल किया।

"भइया नीचे वहां" कंचन ने शरमाते हुए कहा।

"अरे वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ पर" नरेश ने फिर से अन्जान बनते हुए कहा।

"भइया पेट के नीचे" कंचन ने अपना हाथ अपनी पेंटी पर रखते हुए कहा ।
 
दीदी क्या यहाँ पर दर्द हो रहा है" नरेश ने अपना हाथ कंचन की पेंटी के थोडा ऊपर रखते हुए कहा।

"नही भैया थोडा और नीचे" कंचन ने वैसे ही अपनी नज़रें झुकाये हुए कहा।

"यहाँ पर दीदी" नरेश ने अपना हाथ थोडा नीचे करके कंचन की पेंटी पर रखते हुए कहा ।

"हाहहहहह हाँ भैया यहाँ पर कुछ हो रहा है" कंचन ने नरेश का हाथ अपनी पेंटी पर पडते ही ज़ोर से सिसकते हुए बोली।

"दीदी यह तो बुहत गीली हो गई है । क्या मैं इसे उतारकर देखूँ की आपको यहाँ क्या होरहा है" नरेश ने उत्तेजना के मारे अपने गले से थूक को गटकते हुए कहा।

"भइया जैसे आपको सही लगे वैसे ही करो। बस मुझे सुकून मिलना चाहिये" कंचन ने नरेश को इजाज़त देते हुए कहा । नरेश का लंड कंचन की बात सुनकर उत्तेजना के मारे ज़ोर से ठुमके मारने लगा। नरेश कंचन की चूत को नंगा होने के ख़याल से ही बुहत उत्तेजित हो रहा था ।

"दीदी आप अपना सर इस तकिये पर रख दो । मैं आपकी पेंटी को खोलकर देखता हुँ" नरेश ने एक तकिया उठाकर कंचन के सर के पास रखते हुए कहा । कंचन ने अपना सर नरेश की गोद से उठाकर तकिये पर रख दिया।

नरेश की गोद से अपने सर को उठाते हुए कंचन की नज़र नरेश के अंडरवियर में बने उभार पर गयी जिसे देखकर कंचन को अपने पूरे जिस्म में एक झुरझुरी सी महसूस होने लगी । नरेश कंचन की टांगों के बीच आ गया था। वह कंचन की पेंटी में दोनों तरफ से अपनी उँगलियाँ फँसाकर उतारने लगा ।

कंचन ने अपने चूतडों को उठाकर अपनी पेंटी उतारने में नरेश की मदद की।

"वाह दीदी यह तो बुहत ख़ूबसूरत है" नरेश ने कंचन की चूत के नंगा होते ही उसकी तारीफ करते हुए कहा।

"भइया आप भी" कंचन ने इतना कहा और शर्म के मारे अपनी नज़रों को नीचे करते हुए अपनी टांगों को सिकोड़ने लगी । मगर अपनी टांगों के बीच नरेश के होने के सबब वह ऐसा नहीं कर सकी।

"दीदी सच कह रहा हूँ देखो यह कितनी गुलाबी है और बेचारी भूरे बाल इसे और ज्यादा ख़ूबसूरत बना रहे है" नरेश ने अपने हाथ को कंचन की चूत पर रखकर उसकी चूत के बालों को सहलाते हुए बोला।
 
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