रेखा अपने बेटे को उठाते हुए वहां से जाते हुए किचन में आ गयी और चाय बनाने लगी, रेखा अभी चाय बना ही रही थी के उसकी बेटी कंचन किचन में दाखिल हुयी।"उठ गयी बेटी इधर आओ चाय का ख़याल करो जब तक में कप धोती हूँ" ।
रेखा कपस को धोकर चाय के पास आ गयी, चाय उबालने लगी थी । रेखा ने जल्दी से गैस को कम किया और चाय को घुमाते हुए कप्स में भरने लगी । रेखा ने तीन कप एक ट्रे में डालकर अपनी बेटी को दिए जिसे वह उठाकर ले जाने लगी ।
"बेटी चाय पीने के बाद अपनी पढाई में लग जाना, बातों में अपना वक्त ज़ाया मत करना", रेखा ने अपनी बेटी को जाते हुए नसीहत करते हुए कहा । "हा माँ हम डेली पढ़ाई ही करते है", कंचन ने जाते हुए जवाब दिया ।
रेखा दूसरी ट्रे में तीन कप रखते हुए उसे अपने कमरे में ले जाने लगी, रेखा ने एक कप अपने पति को देते हुए कहा "मैं बाबूजी को चाय देकर अभी आई", रेखा ने दूसरा कप भी ट्रे से उठाते हुए अपने टेबल पर रख दिया और बाकी बचा एक कप ट्रे के साथ अपने ससुर के कमरे में ले जाने लगी।
रेखा अपने ससुर के कमरे तक पुहंच कर दरवाजे को नॉक करने लगी, "कौन है आ जाओ", अंदर से अनिल की आवाज़ सुनाइ दी । रेखा दरवाजा खोलते हुए अपनी गांड को मटकाते हुए अंदर दाखिल हुयी और ट्रे को टेबल पर रख दिया ।
"क्यों बेटी दरवाज़ा खटका रही थी?" अनिल ने अपनी बहु की तरफ देखते हुए कहा, "बाबूजी मैंने सोचा शायद आप कोई पर्सनल काम कर रहे हो और मेरे आने से डिसट्रब हो", रेखा ने अपने ससुर को छेड़ते हुए कहा।
"वाह बेटी ज़ख़्म पर नमक छिड़क रही हो" अनिल ने मुँह बनाते हुये, "क्यों बाबूजी क्या हुआ?" रेखा ने अन्जान बनने का नाटक करते हुए कहा । अनिल समझ गया की बहु उसे छेड़ रही है इसीलिए उसने रेखा को कोई जवाब न देते हुए टेबल से जाकर चाय उठा ली।
अनिल ने चाय की चुसकी लेते हुए अपनी बहु की चुचियों को देखते हुए कहा "बेटी चाय तो बुहत बढिया बनाई है, मुझे तो ताज़े दूध की लगती है" रेखा अपने ससुर की बात का मतलब समझते हुए शरमाकर वहां से जाते हुए कहने लगी "बाबूजी आप चाय पी लो मैं अभी आयी"।
रेखा अपने कमरे में आ गयी और अपनी चाय उठाते हुई पीने लगी । रेखा ने चाय ख़तम करके वहां से दोनों कप उठाते हुए किचन में रख दिये और अपने पति के साथ बैठकर बातें करने लगी ।
कंचन ने अपनी बहन और भाई के साथ चाय पीने के बाद उनसे कहा "मैं ट्रे किचन में छोड़कर आती हूँ और आज विजय के कमरे में चल कर पढाई करते है" कंचन किचन में ट्रे को रखते हुए अपने कमरे में जाने लगी ।
कंचन ने अपने कमरे में आते ही अंदर से दरवाज़ा बंद कर दिया और अलमारी से सलवार कमीज निकाल कर पहनने लगी, कंचन की कमीज का गला बुहत बड़ा था थोडा भी झुकने पर कंचन की पूरी चुचियां उसकी ब्रा के साथ नज़र आ रही थी ।
कंचन वह कपड़े पहन कर अलमारी के सामने आ गयी और अपने आप को देखते हुए खुश होते हुए दुप्पटा उठा कर पहन लिया । कंचन अपने कमरे से किताब उठाते हुए निकल कर विजय के कमरे में आ गयी, कंचन आते ही बेड पर जाकर बैठ गयी।
कंचन की पीठ कोमल और विजय के तरफ थी, विजय की आदत थी के पढ़ाई के वक्त वह बार बार कंचन से मदद माँगता था । कंचन अपनी बुक खोलकर पढने लगी, थोडी ही देर बाद विजय अपना बुक हाथ में लेते हुए कंचन के पास आ गया ।
"दीदी यह देखो न यह क्या है मुझे समझ में नहीं आ रहा है", कंचन ने विजय से कहा "आओ मेरे सामने आकर बैठो, मैं देखकर बताती हूँ" । विजय बेड पर चढते हुए कंचन के सामने बैठ गया, विजय ने बैठते ही कंचन से कहा ।