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परिवार(दि फैमिली) complete

"ओहहहहह भैया आप ने तो कमीज के ऊपर से ही इसे अपने मूह में ले लिया" मनीषा अपनी चूचि के दाने को कमीज के ऊपर से ही अपने भाई के मुँह में महसूस करके सिहर उठी और अपने भाई के बालों में हाथ ड़ालते हुए बुहत ज़ोर से सिसकते हुए बोली ।

मुकेश कुछ देर तक अपनी बहन की चूचि को यों ही उसकी कमीज के ऊपर से चूसने के बाद नीचे होते हुए अपनी बहन की कमीज को पकड कर ऊपर करते हुए अपना मुँह उसके गोरे चिकने पेट पर रख दिया।

मुकेश अपनी बहन के गोरे पेट को चाटते हुए ऊपर बढने लगा, मुकेश का लंड उसकी पेण्ट में अब पूरी तरह तन चूका था । मुकेश अपनी बहन के पेट को चाटते हुए उसकी कमीज तक आ गया और वह अपने हाथों से अपनी बहन की कमीज को खीच कर और ऊपर कर दिया, कमीज के ऊपर होते ही मनीषा की चुचियां अब बिलकुल नंगी होकर उसके भाई के मुँह के सामने आ गयी ।

"दीदी क्या चुचियां है। इतने दिन आप कहाँ थी" मुकेश ने अपनी बहन की गोरी नंगी चुचियों को अपना मूह थोडा ऊपर करके देखते हुए कहा । मनीषा अपने भाई की हरक़तों और बातों से बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी । इसीलिए उसने अपने भाई को बालों से पकडते हुए उसका मुँह अपनी एक नंगी चूचि पर दबा दिया।

मुकेश अपना मुँह अपनी बहन की नंगी चूचि पर महसूस करते ही बुहत ज़्यादा उत्तेजित हो गया और अपनी सगी बहन की चूचि के तने हुए नासी दाने को अपने मूह में भरते हुए ज़ोर से चूसने लगा । मुकेश कुछ देर तक अपनी बहन की चूचि के एक दाने को ज़ोर से चूसने के बाद अपना पूरा मूह खोलते हुए अपनी बहन की चूचि को पूरा अपने मूह में भरकर चूसने लगा ।

"आह्ह्ह्हह भैया आप के ऐसा करने से मुझे बुहत ज्यादा मज़ा आ रहा है" मनीषा ने अपने भाई के बालों को वैसे ही सहलाते हुए उसके मुँह में अपनी चूचि को ज़ोर से दबाते हुए कहा।

मुकेश ने कुछ देर तक अपनी बहन की एक चूचि को चूसने के बाद उसकी दूसरी चूचि को भी वैसे ही अपने मूह में भर लिया और उसे बुहत ज़ोर से चूसने लगा । मनीषा की चूत से उत्तेजना के मारे बुहत ज्यादा पानी निकल रहा था और मनीषा भी उत्तेजना के मारे सिसकते हुए अपने हाथ को नीचे करते हुए अपने भाई के लंड पर रखकर उसकी पेण्ट के ऊपर से ही उस पर फिराने लगी ।

"माँ मुझे आपकी चुचियां देखनी है" विजय और रेखा पूरे बर्तन उठाने के बाद किचन में आ गये थे। जहाँ पर रेखा बर्तनों को साफ़ कर रही थी।जिस वजह से उसकी साड़ी का पल्लु नीचे गिर चूका था । जिस वजह से उसके बेटे ने अपनी माँ की बड़ी बड़ी चुचियों को आधा नंगा देखकर उसकी तरफ देखते हुए कहा ।

"बेटे तुम पागल तो नहीं हो गये । मैं तुम्हारी माँ हू" रेखा ने गुस्से से अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा और अपनी साड़ी के पल्लु से अपनी चुचियों को ढक लिया,

"माँ मैं जानता हूँ मगर कब तक आप तडपति रहेंगी।मैं आपको दुनिया की हर ख़ुशी और सुख देना चाहता हू" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर उसे समझाते हुए कहा।

"बेटा तुम उसकी चिंता मत करो जो मेरा नसीब होगा वह ही मुझे मिलेंगा" रेखा ने बर्तनों को धोते हुए कहा। वह अपने बेटे को थोडा तडपाना चाहती थी। इसीलिए वह नाटक कर रही थी।

"पर माँ जब आपका बेटा आपके सामने आप की सेवा के लिए खडा है तो फिर आप क्यों सारी ज़िंदगी ऐसे ही तडपना चाहती हो" विजय ने फिर से अपनी माँ को देखते हुए कहा ।

"बेटे मुझे यह सब अच्छा नहीं लगेगा यह पाप है" रेखा ने वैसे ही नाटक करते हुए कहा।

"माँ मगर आप मुझे बुहत अच्छी लगती हैं । मैं आपको एक बार बिना कपड़ों के देखना चाहता हूँ" विजय ने फिर से अपनी बात करते हुए कहा।

"बेटे सच में तुम पागल हो गये हो। मैं तुम्हारी माँ हूँ कोई रंडी नहीं जो तुम्हारे सामने नंगी हो जाऊं" रेखा ने फिर से गुस्सा करते हुए कहा।

"माँ अगर आप रंडी होती तो अब तक में आपसे मिन्नतें नहीं कर रहा होता। मगर आपको अब तक चोद चूका होता" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर उसे करारा जवाब देते हुए कहा।

"बेटे चुप करो तुम्हें अपनी माँ से बात करने की ज़रा भी तमीज नहीं है" रेखा ने अपने बेटे की बेचैनी देखकर मन ही मन में मुस्कराते हुए कहा ।

"माँ आपको क्या हो गया है। मैं आपसे प्यार करता हूँ इसीलिए ऐसा बोल दिया मगर आप भी तो मुझसे प्यार करती थी । अब अचानक क्या हो गया आपको" विजय ने अपनी माँ को गुस्सा करता हुआ देखकर अपना मुँह बनाते हुए कहा।

"हाँ बेटे मैं तुम से प्यार करती हूँ मगर मैं यह सब गलत मानती हूँ इसीलिए यह सब नहीं करना चाहती" रेखा ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा ।
 
"माँ मैं कुछ गलत नहीं करूँगा। मगर कम से कम एक बार मुझे अपने प्यार का जिस्म देखने का तो हक़ है" विजय ने अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।

"बेटे अब मैं तुझे कैसे समझाऊँ मैं मजबूर हू" रेखा ने अपना कन्धा नीचे करते हुए कहा।

"माँ मैं समझ गया की आप अब तक मेरे प्यार को समझी ही नहीं है" विजय ने कुर्सी से उठते हुए कहा ।

विजय कुर्सी से उठते हुए जाने लगा।

"बेटे कहाँ जा रहे हो" रेखा ने अपने बेटे को जाता हुआ देखकर कहा।

"माँ मैं आज के बाद आप से कभी बात नहीं करूंगा" विजय यह कहकर वहां से जाने लगा।

"बेटे ज़रा इधर तो देख तेरी माँ तुम्हारे प्यार की खातिर हार मान गई" रेखा ने विजय को जाता हुआ देखकर कहा ।

विजय ने जैसे ही अपना मूह घुमा कर अपनी माँ को देखा । वह हैंरान रह गया उसकी माँ अपनी साड़ी उतारकर सिर्फ ब्लाउज और पेटिकोट में खड़ी थी और वह अपनी बाहों को अपने बेटे को अपने गले लगाने के लिए खोले हुए थी और उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे । विजय अपनी माँ को इस हालत में देखकर भागता हुआ उसके पास जाकर उसके गले लग गया।

"माँ आप रो क्यों रही हो आई लव यू" विजय ने अपनी माँ को अपनी बाहों में भरते हुए उसके गालों पर अपने होंठो को रखकर उसके निकलते हुए आंसू को पीते हुए कहा।

"बेटा मैं कितनी खुशनसीब हूँ । मुझे तुम्हारे जैसे प्यार करने वाला बेटा मिला" रेखा ने वैसे ही अपने बेटे की बाहों में रोते हुए कहा ।
 
माँ मैं जानता था आप मेरे प्यार को पहचानती हो मगर आप सिर्फ ज़माने के डर की वजह से मुझे नहीं कह पा रही थी" विजय ने वैसे ही अपनी माँ को अपनी बाहों में भरे उसके गालों को चूमते हुए कहा।

"बेटे शायद तुम सच कह रहे थे मगर अब मुझसे दूर हटो कोई आ गया तो" रेखा ने अचानक अपने बेटे से दूर होते हुए कहा ।

"माँ एक बार तो मुझे अपना जिस्म दिखा दो" विजय ने अपनी माँ से अलग होकर उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"बेटे मैं समझ सकती हूँ तुम्हारी बेक़रारी। मगर इस वक्त यह ठीक नहीं होगा" रेखा ने अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा।

"माँ एक काम करते हैं । मैं दरवाज़ा बंद कर देता हूँ और कुर्सी पर बैठ जाता हूँ । आप सिर्फ एक बार अपने कपड़े उतारकर अपना प्यारा जिस्म हमें दिखाओ। हम वादा करते हैं हम यहाँ से चले जाएंगे" विजय ने अपनी माँ से मिनट करते हुए कहा।

"बेटे तुम बुहत ज़िद्दी हो मानोगे नहीं अपनी माँ को नंगा देखे बगैर जाओ दरवाज़ा बंद कर लो" रेखा ने अपने बेटे के सामने हार मानते हुए कहा।

"माँ सच में आप मुझसे बुहत प्यार करती हो" विजय अपनी माँ की बात सुन कर ख़ुशी से उछलते हुए कहा और आगे जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया ।

विजय दरवाज़ा बंद करने के बाद सीधा आकर कुर्सी पर बैठ गया और गौर से अपनी माँ की तरफ देखने लगा, रेखा अपने बेटे को यो घूरता हुआ देखकर शर्म के मारे यों ही पेटिकोट और ब्लाउज में चुप चाप खडी थी।

"माँ उतारो न अपने कपडे" विजय अपनी माँ को चुपचाप खडा देखकर बेचेनी से बोला । विजय का लंड आने वाले पल के बारे में सोचते ही उसकी पेण्ट में झटके खाने लगा।

"बेटे मुझे शर्म आ रही है । तुम अपनी आँखें बंद करो जब मैं अपने कपडे उतार दूं तो तुम अपनी आँखें खोल देना" रेखा ने अपने बेटे को अपनी परेशानी बताते हुए कहा।

"माँ आप भी चलो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली अब जल्दी से आप अपने कपडे उतार दो" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर जल्दी से अपनी आँखों पर अपने हाथ रखते हुए कहा ।

रेखा ने अपने बेटे की आँखें बंद होते ही अपने पेटिकोट में हाथ ड़ालते हुए उसे अपने जिस्म से अलग कर दिया । विजय ने अपनी आँखें ऐसे ही बंद की थी की दूर से रेखा को दिख रहा था की उसका बेटा अपनी आँखें बंद किये हुए है जबकी विजय अपनी माँ को पूरी तरह देख रहा था ।
 
विजय का लंड अपनी माँ की नंगी गोरी चिकनी टांगों को देखकर झटके मारने लगा । रेखा ने अपना पेटिकोट उतारने के बाद अपने ब्लाउज को खोलते हुए उसे अपने जिस्म से अलग कर दिया और ब्लाउज उतारने के बाद फिर से अपने बेटे की तरफ देखने लगी, रेखा ने देखा उसका बेटा वैसे ही अपनी आँखों के सामने अपने हाथों को रखे हुए था । मगर उसकी पेण्ट की तरफ देखते ही रेखा का जिस्म कम्पने लगा उसके बेटे का लंड पूरी तरह तनकर उसकी पेण्ट में तम्बू बनाये हुए था।

विजय की हालत बिगडती जा रही थी। उसकी माँ अब उसके सामने सिर्फ एक छोटी सी पेंटी और ब्रा में खडी थी, रेखा की बड़ी बड़ी चुचियां उसकी ब्रा में पूरी तरह समा नहीं पा रही थी। जिस वजह से उसकी आधी चुचियां नंगी होकर विजय के आँखों के सामने मण्डरा रही थी ।

नीचे से भी रेखा की वही हालत थी उसके बड़े बड़े चूतडों के बीच उसकी छोटी सी पेंटी फँसी हुयी थी। जिस वजह से रेखा की फूली हुयी चूत आधि नंगी होकर विजय को दिख रही थी । रेखा ने अचानक अपना मूह फेरते हुए दूसरी तरफ कर दिया और अपनी ब्रा को नीचे करते हुए उसके हुक्स को आगे की तरफ़ कर दिया, रेखा ने ब्रा के हुक खोलकर उसे अपने जिस्म से उतारकर नीचे फ़ेंक दिया।

विजय को अपनी माँ की चुचियां तो नहीं दिख रही थी मगर उसका लंड अपनी सगी माँ की चुचियों के नंगे होने के ख़याल से ही उसकी पेण्ट में ज़ोर के झटके खाने लगा, विजय से अब बर्दाशत से बाहर हो गया उसका लंड अब उसकी पेण्ट में अकड़कर दर्द करने लगा था ।

विजय ने अपनी पेण्ट में हाथ ड़ालते हुए कुर्सी से उठकर उसे नीचे करते हुए अपने पेरों में फ़ेंक दिया और अपने अंडरवियर को भी थोडा नीचे सरकाते हुए अपने लंड को नंगा करते हुए वापस कुर्सी पर बैठ गया । रेखा ने अपनी ब्रा को उतारने के बाद अपनी पेंटी में हाथ ड़ालते हुए उसे अपने चूतडों से नीचे सरका दिया।

रेखा ने नीचे झुकते हुए अपनी पेंटी को अपने पैरों में से निकालकर ज़मीन पर फ़ेंक दिया । विजय अपनी माँ के नंगे चूतडों को देख कर पागल होने लगा और रेखा ने जैसे ही नाचे झुककर अपनी पेंटी को अपने पाँव से निकाला उसके चूतड पीछे से निकलकर विजय की आँखों के सामने आ गये। विजय अपनी माँ की फूली हुयी काले बालों वाली चूत को नंगा देखकर अपने लंड को हाथ में लेकर ज़ोर से हिलाने लगा और उसकी साँसें बुहत ज़ोर से चलने लगी ।
 
विजय ने ज़िंदगी में आज दूसरी चूत देखी थी । पहली उसकी बहन की गुलाबी चूत जो बुहत छोटी सी थी । और दूसरी उसकी माँ की जो वह अभी देख रहा था। मगर उसकी माँ की चूत उसकी दीदी की चूत से बुहत ज़्यादा बड़ी और फूली हुयी थी और विजय को अपनी माँ की चूत अपनी बहन की चूत से बुहत ज़्यादा अच्छी लग रही थी ।

विजय की साँसें अपनी माँ की फूली हुयी चूत को देखकर बुहत ज़ोर से चल रही थी।

"बेटा अब अपनी आँखें खोलों मैंने अपने कपडे निकाल दिए है" रेखा ने वैसे ही उलटे खडे हुए कहा । उसे क्या पता उसका बेटा उसे कब से देख रहा है।

"माँ सीधी हो जाओ ना" विजय ने अपने मुँह से जाने कैसे यह लफ़्ज़ निकाले। वह उत्तेजना के मारे मरा जा रहा था । रेखा अपने बेटे की बात सुनकर सीधी हो गई मगर उसने अपना एक हाथ अपनी दोनों चुचियों के ऊपर और दूसरा अपनी चूत के आगे रखे हुए सीधा हो गयी, रेखा ने अपनी आँखें बंद किये हुयी थी ।

"माँ यह क्या है प्लीज अपने हाथ हटाओ ना" विजय ने अपनी माँ को अपने सामने ऐसे देखकर अपने गले से थूक को गटकते हुए कहा।

"विजय मुझे शर्म आ रही है" रेखा ने वैसे ही अपनी आँखें बंद किये हुए कहा। उसे पता नहीं था की उसका बेटा भी उसकी सामने बिलकुल नंगा बैठा हुआ है।

"माँ अगर आप ने अपने हाथ नहीं हटाए तो मैं आपके पास आकर आपके हाथ हटा देता हू" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर उत्तेजना के मारे अपने लंड को सहलाते हुए कहा।

"नही बेटा प्लीज ऐसा गज़ब मत करना" रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर जल्दी से कहा ।

"माँ फिर आप खुद ही अपने हाथ हटा दो । अब मुझसे सबर नहीं हो रहा है" विजय ने वैसे ही बेचैनी से कहा।

"हाँ बेटा मैं हटाती हू" रेखा ने यह कहते हुए अपना एक हाथ अपनी चुचियों से अलग कर दिया।

"वाह माँ आपकी चुचियां कितनी बड़ी हैं और कितनी सूंदर ओहहहह माँ आपके चुचियों के दाने कितने कठोर दिख रहे हैं" विजय ने अपनी माँ की बड़ी बड़ी गोरी चुचियों को देखकर उत्तेजना के मारे ज़ोर से सिसककर उसकी तारीफ करते हुए कहा।

"माँ नीचे से हाथ हटाओ ना" विजय ने अपनी माँ की चुचियों को जी भरकर देखने के बाद अपने होंठो पर अपनी जीभ को फिराते हुए कहा।

रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर अपना हाथ अपनी चूत से हटा दिया।

"आआह्ह्ह्ह माँ क्या गज़ब है आपकी चूत कितनी बड़ी और फूली हुयी है और बेचारी काले बाल इसे और ज़्यादा सूंदर बना रहे है" विजय ने अपनी माँ की चूत को देखकर अपने लंड को ज़ोर से हिलाते हुए उसकी तारीफ करते हुए कहा।
 
"बेटे अब मैं कपडे पहन लुँ" रेखा अपने बेटे के मुँह से अपनी इतनी तारीफ सुनकर बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी। जिस वजह से उसकी चूत से पानी निकल कर उसकी चूत के बालों पर गिरने लगा और रेखा ने ज़ोर से साँसें लेते हुए अपने बेटे से कहा।

"माँ इतनी जल्दी क्या है ज़रा आपकी चूत को गौर से देखने तो दो, हमें भी तो पता चले जिस चूत से हम निकले हैं वह कितनी सूंदर है ओह्ह्ह्ह माँ आपकी चूत से तो रस टपक रहा है" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर उसकी चूत से निकलता हुआ पानी देखकर ज़ोर से सिसकते हुए कहा ।

"बेटे अब मैं तुम्हारे सामने नंगी नहीं खडी हो सकती। तुम बुहत बदमाश हो तुम मेरी ऐसी तारीफ कर रहे हो की मेरी चूत से उत्तेजना के मारे रस टपक रहा है" रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर अपना मुँह दूसरी तरफ घुमाते हुए कहा।

"माँ तुम हो भी इतनी सूंदर। तारीफ नहीं करुं तो फिर क्या करूं" विजय ने अपनी माँ का मूह दूसरी तरफ होते ही उससे कहा ।

विजय कुर्सी से उठ गया और अपने पाँव से पेण्ट और अंडरवियर को निकाल दिया । विजय ने अपनी शर्ट को भी उतार दिया और आगे बढते हुए अपनी माँ के पास जाने लगा।

"माँ आप जेसी ख़ूबसूरत औरत मैंने आज तक नहीं देखी" विजय सीधा अपनी माँ के पीछे से सटकर खडा होते हुए बोला।

"बेटा तुम यहाँ कैसे। जाओ मुझसे दूर हटो" रेखा अपने नंगे चूतडों पर अपने बेटे का नंगा लंड महसूस करके पूरी तरह से काँपते हुए सिहर उठी और अपने बेटे के लंड से अपने चूतडों को आगे करते हुए खडी हो गई ।
 
माँ हमसे दूर क्यों हो रही हो" विजय आगे बढ़कर अपने खडे लंड को फिर से अपनी माँ के चूतडों में दबाते हुए कहा।

"आआह्ह्ह्ह बेटे तुम्हें शर्म नहीं आती तुम नंगे क्यों हो गये । तुमने सिर्फ मुझे देखने को बोला था" रेखा ने अपने चूतडों के बीच फिर से अपने बेटे के लंड को महसूस करके सिसकते हुए बोली।

"माँ आपने भी तो मुझे अपने आप को सही तरीके से कुछ नहीं दिखाया" विजय ने अपने लंड को ज़ोर से अपनी माँ के चूतडों में दबाते हुए अपने हाथ आगे बढक़र अपनी माँ की बड़ी बड़ी चुचियों पर रख दिया,

"ओहहहहह बदमाश क्या कर रहे हो । हटो दूर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारी चुचियों को छुने की" रेखा ने अपने बेटे के हाथों को अपनी चुचियों पर पड़ते ही ज़ोर से सिसकते हुए कहा और अपने बेटे के दोनों हाथों को पकडकर दूर झटकते हुए उससे दूर खडी हो गयी।

"माँ थोडी देर छूने दो ना" विजय ने आगे बढते हुए कहा।

"बेटा यह सब ठीक नहीं मेरे क़रीब मत आओ" विजय जैसे जैसे अपनी माँ की तरफ बढता रेखा वैसे वेसे आगे बढते हुए बोली।

"माँ अपने बेटे की बात नहीं मानोगी। सिर्फ एक बार हमें इन्हें छूने दो" विजय वैसे ही आगे बढता हुआ बोला।

"बेटे अब रुक जाओ वरना आज के बाद मैं तुम से कभी बात नहीं करूंग़ी" रेखा आगे बढते हुए दीवार के बिलकुल क़रीब पुहंच चुकी थी। अब उसके पास आगे जाने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था ।

"माँ ऐसा मत करो। कम से कम मुझे एक बार इन्हें जी भरकर देखने तो दो" विजय अपनी माँ की बात सुनकर वहीँ पर रुक गया।

"बेटे मुझे शर्म आती है मैं तुम्हारे सामने सीधी नहीं हो सकती" रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर उसका जवाब देते हुए कहा।

"माँ आपको मेरी कसम एक बार सीधी हो जाओ और अपनी बाहों को ऊपर कर लो" विजय अपनी माँ की बात सुनकर आखरी कोशिश करते हुए बोला।

"बेटे यह तुम ने क्या किया अपनी कसम क्यों दी" रेखा अपने बेटे की कसम को सुनकर चीखते हुए बोली,

"माँ सिर्फ एक बार" विजय अपनी माँ से मिन्नत करते हुए बोला।

"ठीक है बेटा मगर इसके बाद मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूँगी" रेखा ने आख़िरकार अपने बेटे के सामने हार मानते हुए कहा ।

"माँ मैं आपका सारी ज़िंदगी गुलाम बन कर रहूँगा" विजय ने अपनी माँ को राज़ी होता हुआ देखकर खुश होते हुए कहा । विजय का लंड उसकी माँ को सीधा नंगा देखने की कल्पना से ही ज़ोर के झटके खाने लगा। रेखा सीधे होते हुए दीवार से सटकर खडी हो गई और अपनी बाहों को ऊपर करते हुए दीवार पर लटका दिया जैसे उसकी दोनों बाहें किसी रस्सी से बाँधी गयी हो।
 
" बेटे लो देखो अपनी माँ को नंगा आअह्ह्ह्ह बेटे तुम भी बिलकुल नंगे खडे हो" रेखा ने अपने बेटे को नंगा देखकर सिसकते हुए कहा।

"आआह्ह्ह्ह माँ आपकी चुचियां ओह्ह्ह्हह कितनी बड़ी और ख़ूबसूरत हैं माँ आपकी चूत भी इन काली झाँटों में कितनी ख़ूबसूरत लग रही है, माँ मैंने आज तक आपसे ज्यादा सेक्सी और ख़ूबसूरत औरत कभी नहीं देखी" विजय अपनी माँ की बड़ी बड़ी चुचियों और उसकी काली झाँटों वाली बूर को देखकर अपने लंड को अपने हाथ से सहलाते हुए बोला ।

"बेटे अब देख लिया बस ना" रेखा अपने बेटे के मुँह से अपनी इतनी तारीफ सुनकर बुहत ज्यादा गरम हो चुकी थी और वह सीधा खडी होकर बुहत ज़ोर से साँसें ले रही थी।

"माँ कहाँ देखा अभी तो मुझे आपके पूरे जिस्म को अपनी आँखों में क़ैद करना है आअह्ह्ह्ह माँ आपकी बाहों के नीचे के बाल कितने सेक्सी हैं" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर फिर से उसकी तारीफ करते हुए कहा ।

"बेटे मुझे बुहत शर्म आ रही है । मैं अपनी आँखें बंद कर देती हू" रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर कहा।

"हाँ माँ आप अपनी आँखें बंद कर लो मुझे आपके पूरे जिस्म को नज़दीक से देखना है" विजय अपनी माँ की बात सुनकर बोला । रेखा ने अपने बेटे की बात सुनकर अपनी आँखों को बंद कर दिया ।

विजय अपनी माँ की आँखों के बंद होते ही उसके नज़दीक चला गया और अपनी माँ की सामने नीचे घुटनों के बल बैठते हुए उसकी चूत के बालों को अपने हाथों से इधर उधर करते हुए अपनी माँ की चूत को गौर से देखने लगा।

"आआह्ह्ह्ह बेटे तुम यहाँ क्यों आ गये। तुमने सिर्फ देखने को कहा था" रेखा ने अचानक अपनी चूत पर अपने बेटे के हाथों का स्पर्श पड़ते ही ज़ोर से सिसकते हुए अपनी आँखें खोलकर कहा।

"माँ मेरा कोई क़सूर नहीं है आपकी झांटें इतनी बड़ी हैं की मैं आपकी प्यारी चूत को ठीक से देख ही नहीं पा रहा था। इसीलिए इन्हें अपने हाथों से इधर उधर करके देख रहा हू" विजय ने अपनी माँ की बात सुनकर उसका जवाब देते हुए कहा ।

विजय ने कुछ देर तक अपनी माँ की चूत को गौर से देखने के बाद अपने होंठो को आगे करते हुए अपनी माँ की चूत का एक चुम्मा ले लिया और उठकर सीधा खडा हो गया।

"ओहहहहह विजय क्या कर दिया तुमने" रेखा ने अपने बेटे के होंठो को अपनी चूत पर महसूस करते ही ज़ोर से चीखते हुए अपने बेटे को अपने गले से लगाते हुए उसे अपनी बाहों में भर लिया।
 
दोस्तों आपलोगों के सहयोग के लिए बहुत बहुत थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
"आह्ह्ह्ह माँ" विजय अपनी माँ की बड़ी बड़ी चुचियों को अपने सीने में दबने और अपने खडे लंड को उसके पेट में दबने से ज़ोर से सिसक उठा।

"ओहहहह बेटे अब तो बस करो" रेखा भी अपनी चुचियों को अपने बेटे के ठोस सीने में दबते ही ज़ोर से सिसकते हुए बोली।

"माँ इतनी जल्दी क्या है। कुछ देर तक तो अपने हुस्न को निहारने दो" विजय ने अपनी माँ की दोनों बाहों को पकडते हुए उसे वैसे ही ऊपर करते हुए खडा कर दिया जैसे वह पहले खडी थी । फर्क बस यह था की अब उसकी माँ की बाहें उसके बेटे की बाहों में क़ैद थी ।

विजय ने अपनी माँ को कुछ देर तक यों ही देखने के बाद अपने होंठो को अपनी माँ के होंठो पर रख दिया। रेखा पहले अपने होंठो को विजय के होंठो से अलग करने की कोशिश करने लगी। मगर जैसे ही विजय ने अपनी माँ के होंठो को अपने मूह में लेकर चूसना शुरू किया रेखा ने विरोध करना छोड दिया और अपने होंठ चुसवाते हुए अपने बेटे का साथ देने लगी।

रेखा अपने बेटे के साथ यह सब करते हुए बुहत गरम हो चुकी थी, विजय ने अचानक अपने होंठो को अपनी माँ के होंठो से अलग कर दिया । रेखा अपने बेटे के होंठो के अलग होते ही जोर से साँसें लेते हुए उसे हैंरान होते हुए निहारने लगी ।

विजय ने अपनी माँ को यों अपनी तरफ निहारता हुआ देखकर अपने होंठो को थोडा नीचे करते हुए अपनी माँ के क़रीब कर लिया । रेखा ने जैसे ही देखा उसका बेटा उसे चूमने के लिए आ रहा है उसने फ़ौरन अपने मूह को आगे करते हुए अपने बेटे के होंठो को चूमना चाहा। मगर विजय ने जल्दी से अपने होंठो को ऊपर कर दिया, रेखा अपने बेटे की इस हरकत से हक्का बक्का रह गयी और अपने बेटे को निहारकर बुहत ज़ोर से हाँफते हुए साँसें लेने लगी।

विजय समझ गया की उसकी माँ अब बुहत गरम हो चुकी है। इसीलिए उसने अपनी जीभ को निकालकर अपनी माँ के होंठो के क़रीब कर दिया । रेखा ने अपने बेटे की जीभ को जल्दी से अपने मुँह में भरते हुए ज़ोर से चूसने लगी । विजय का लंड अब हलकी हलकी वीर्य की बूँदे टपका रहा था जो उसकी माँ के पेट पर गिरकर उसकी चूत की तरफ जा रहा था ।

विजय कुछ देर तक अपनी माँ से अपनी जीभ को चुसवाने के बाद खुद उसकी जीभ को पकडकर चाटने लगा, विजय अपनी माँ की जीभ को जी भरकर चाटने के बाद उसे अपने मूह से निकालते हुए अपने होंठो को अपनी माँ की बाहों के नीचे बने बालों पर रख दिया ।
 
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