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परिवार(दि फैमिली) complete

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कंचन के पाँव अपने आप उसके दादा के कमरे की तरफ बढ़ने लगे। दरवाज़े के पास पुहंचकर वह रुक गयी और अपना कान दरवाज़े पर लगाकर अंदर से आने वाली आवाज़ सुनने की कोशिश करने लगी।

"आह्ह्ह्ह बहु अगर तुम नहीं होती तो मैं तो मर ही जाता कितना ख्याल रखती हो तुम मेरा और तेरा बदन भी कितना ख़ूबसूरत है। मैं शायद दुनिया का सब से ख़ुशनसीब ससुर हूँ जो मुझे तुम्हारी जैसी ख़ूबसूरत बहु मिली" अनिल अपनी बहु की तारीफ करते हुए बोल रहा था।

"बापु जी मुझे तो आपने हर तरीके से भोग लिया है क्या आपका मन अब किसी और को चोदने का नहीं होता?" रेखा जो अपने ससुर के लंड पर उछल रही थी उसकी तेज़ साँसों के साथ आवाज़ आई।

"बेटी करता तो है मगर मैं घर से बाहर कुछ करना नहीं चाहता" अनिल ने अपनी बहु को जवाब देते हुए कहा।

"बापु जी अगर घर में कोई मिल जाए तो" रेखा ने अपने ससुर को देखते हुए कहा।

"घर में मगर कौन?" अनिल ने उत्तेजित होकर अपनी बहु की दोनों बड़ी बड़ी चुचियों को अपने हाथों से मसलते हुए कहा । कंचन बड़े गौर से अंदर से आने वाली आवाज़ सुन रही थी। उसका दिल बुहत ज़ोर से धड़क रहा था आखिर उसकी माँ किसकी बात कर रही थी ।

"मेरी बड़ी बेटी कंचन तुम्हें कैसी लगती है" रेखा ने अपने ससुर से कहा।

"बेटी तुम क्या कह रही हो" अनिल ने उत्तेजना के मारे रेखा को नीचे सीधा लिटाते हुए उसके ऊपर आकर उसकी चूत में अपना लंड बुहत तेज़ी के साथ अंदर बाहर करते हुए कहा।

"हाँ कंचन कैसी लगती है तुम्हें कच्ची कली है" रेखा ने भी अपने चूतड़ों को उछालते हुए अपने ससुर का साथ देते हुए कहा।

"बेटी मुझे तो वह बुहत अच्छी लगती है मगर वह भला क्यों मानेगी?" अनिल अपनी बहु की बातों से बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुका था । इसीलिए वह अपने लंड को पूरा बाहर खींचकर अपनी बहु की चूत में पेल रहा था।

"आजहहहह बापू जी मानेगी क्यों नहीं मैं हूँ न। आप तो उसकी बात सुनकर ही पागल हो गये हैं जब आप उसकी कमसीन जवानी को देखेंगे तो आपका क्या हाल होगा" रेखा अपने ससुर के ज़ोरदार धक्कों से ज़ोर से सिसकते हुए बोली।

"आह्ह्ह्ह बहु ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह" अनिल रेखा की बात सुनकर बुहत जोर से चिल्लाते हुए उसकी चूत में अपना वीर्य छोड़ने लगा । अनिल ने झडते हुए अपने लंड को जड़ तक अपनी बहु की चूत में घुसा दिया था जिस वजह से उसका वीर्य सीधा रेखा की चूत की गहराईयों में गिरने लगा।

"आह्ह्ह्हह्ह पिता जीईईईई आह्ह्हह्हह्ह्" रेखा भी अपने ससुर के गरम वीर्य को अपनी चूत में गिरने से चिल्लाते हुए झडने लगी रेखा ने झडते हुए अपने दोनों हाथों के नाखुनों को ज़ोर से अपने ससुर की गांड पर गडा दिया।
 
कंचन अपनी माँ और दादा की बाते सुनकर बुहत गरम हो चुकी थी । उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अपने दादा के साथ सेक्स करने के ख़याल से ही उसका पूरा जिस्म तपकर आग बन चूका था । कंचन अब वहां से जाते हुए अपने कमरे में जाने लगी क्योंकी उसे पता था की उसकी माँ अब किसी भी वक्त कमरे से बाहर निकल सकती है, कंचन ने अपने कमरे में आकर दरवाज़ा अंदर से बंद किया और खुद अपने पूरे कपडे उतारकर बाथरूम में घुस गयी।

कंचन ने शावर ऑन किया और शावर के ठन्डे पानी से अपने तपते बदन को ठण्डा करने की कोशिश करने लगी। मगर ठन्डे पानी के लगने से उसके बदन की आग शांत होने की बजाये ज्यादा भडकने लगी । कंचन ने अपनी एक हाथ को अपनी चूत पर रखा और उससे अपनी चूत को सहलाने लगी, कंचन के ऐसा करने से उसे कुछ सुकून मिलने लगा। इसीलिए उसने अपनी एक ऊँगली को अपनी चूत में घुसा दिया और उसे बुहत ज़ोर से आगे पीछे करने लगी, कुछ देर की मेंहनत के बाद ही कंचन का बदन अकडकर झटके खाने लगा और वह झडने लगी।

कंचन ने झडने के बाद अपने पूरे बदन को ठन्डे पानी से फ्रेश किया और बाथरूम से निकलकर अपने कमरे में आ गयी। कंचन ने कपडे पहने और अपने बेड पर लेटकर अपने दादा के बारे में सोचने लगी, कंचन ने पहले कभी अपने दादा को उस नज़र से नहीं देखा था मगर आज अपनी माँ की बात सुनने के बाद कंचन को अपने दादा का गठीला बदन याद आ रहा था । वह सोच रही थी की क्या उसके दादा का लंड भी उसके पिता की तरह छोटा ही होगा या उसके भाई के लंड की तरह लम्बा और मोटा। यही सब सोचते सोचते उसे कब नींद आ गयी उसे पता ही नहीं चला।
 
कहानी पसंद करने और उत्साह बढ़ने के लिए सभी को थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
रेखा ने अपने ससुर को समझा दिया की उसे कंचन को कैसे पटाना है क्योंकी वह जानती थी की जब उसकी बेटी अपने पिता से चुदवा चुकी है तो वह अपने दादा को इन्कार नहीं करेगी क्योंकी उसके दादा का लंड उसके पिता के लंड से ज्यादा मज़बूत और लम्बा था। रेखा ने एक प्लान बनाकर अपने ससुर को समझा दिया था की कैसे उसे अपनी पोती को सेडयुस करके अपने क़रीब लाना है और उस प्लान की शुरुआत आज से ही करनी थी।

"उठो बेटी शाम होगई है मैं चाय बना रही हू" रेखा ने अपनी बेटी को उठाते हुए कहा । कंचन करवटे लेते हुए उठ गयी और बाथरूम में फ्रेश होने चलि गयी । कंचन फ्रेश होने के बाद अपने कमरे से निकलकर किचन की तरफ जाने लगी।

"बेटी तुम आ गयी न अच्छा हुआ मुझे देर हो रही है । मैं तुम्हारे भाई के साथ बाजार जा रही हूँ कुछ सामान खरीद करने तुम्हारे पिता भी अपने दोस्त के पास चले गए हैं तुम अपने दादा को उठाकर चाय दे देना" रेखा ने कंचन के अंदर दाखिल होते ही कहा और किचन से निकलकर अपने बेटे के कमरे में घुस गयी वह विजय के साथ घर से निकल गयी । अपनी माँ के जाते ही कंचन किचन से निकलकर अपने दादा को उठाने के लिए उसके कमरे में जाने लगी।

कंचन ने कमरे के दरवाज़ा को धक्का दिया तो वह खुल गया। अनिल धोती पहने बेड पर लेटा हुआ था। कंचन अंदर दाखिल होकर अपने दादा को उठाने के लिए बेड की तरफ बढ़ने लगी । कंचन जैसे ही बेड के क़रीब पुहंची उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी और उसकी साँसें बुहत ज़ोर से चलने लगी, अनिल सीधा लेटा हुआ था और उसकी धोती आगे से थोडा हट गयी थी जिस वजह से अनिल का लम्बा और मोटा लंड जो बिलकुल तना हुआ था कंचन की आँखों के सामने आ गया।

कंचन की आँखें वहीँ ठहर गयी थी वह बड़े गौर से अपने दादा का मोटा और लम्बा लंड देख रही थी और बुहत ज़ोर से साँसें भी ले रही थी। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था की उसके दादा का लंड भी इतना बड़ा और मोटा होगा । कंचन सब कुछ भूलकर सिर्फ अपने दादा के लंड को घूर रही थी। उसे कुछ भी याद नहीं था की वह यहाँ क्यों आई है, अचानक कंचन के कदम अपने आप आगे बढ़ने लगे और वह अपने दादा की टांगों के पास बेड पर जाकर बैठ गयी।

अनिल का लंड अब कंचन के बिलकुल पास था इतना पास की वह उसे अपने हाथ से पकड़ सकती थी मगर उसे बुहत डर लग रहा था । कंचन की चूत अपने दादा के लंड को देखते हुए उत्तेजना के मारे बुहत ज्यादा पानी बहा रही थी । अनिल जो सिर्फ सोने का नाटक कर रहा था वह अपनी पोती को ऐसे अपने लंड की तरफ घूरता देखकर मन ही मन में खुश हो रहा था उसे अब पूरा यकीन हो गया था की उसकी पोती कंचन बुहत जल्द उसकी बाहों में होगी।

"दादा जी" कंचन ने अचानक अपने दादा को आवाज़ देते हुए कहा। वह देखना चाहती थी की उसके दादा पक्की नींद में है या नही।
 
अनिल अपनी पोती की आवाज़ सुनकर भी चुपचाप लेटा रहा। वह देखना चाहता था की उसकी पोती क्या करना चाहती है।

"दादा जी" कंचन ने इस बार ज़ोर से अपने दादा को पुकारा मगर अनिल फिर भी सोने का नाटक करता रहा । कंचन को अब यकीन हो गया की उसके दादा बड़ी गहरी नींद में है । उसका मन अपने दादा के लंड को छूने का हो रहा था क्योंकी उसका तना हुआ लम्बा मोटा गुलाबी लंड उसे बुहत अच्छा लग रहा था, कंचन ने ड़रते ड़रते अपने हाथ को आगे बढाकर अपने दादा के लंड की तरफ ले जाने लगी। ऐसा करते हुए कंचन को बुहत डर भी लग रहा था मगर उस वक्त तो उसपर हवस का अँधा नशा चढा हुआ था।

कंचन ने अपना हाथ आगे ले जाते हुए अपने दादा के लंड को अपनी मुठी में पकड लिया । कंचन का नरम हाथ अपने लंड पर पडते ही अनिल के लंड ने एक ज़ोर का ठुमका लगाया मगर कंचन की मुठी में क़ैद होने की वजह से वह उछल न सका । कंचन अपने हाथ में अपने दादा का मोटा और लम्बा लंड महसूस करते ही सिहर उठी क्योंकी वह बुहत ही ज्यादा गरम और तना हुआ था, कंचन को अपने दादा का लंड अपनी मुठी में बुहत अच्छा लग रहा था जिस वजह से उसका हाथ अपने आप उनके लंड पर आगे पीछे होने लगा।

अनिल जो सोने का नाटक किये हुए था अपनी पोती के हाथों अपने लंड को सहलाने से मज़े के मारे जन्नत की सैर करने लगा । कंचन का पूरा जिस्म तप कर आग बन चूका था। वह दीवानों की तरह अपने दादा के लंड को सहला रही थी अचानक कंचन को मन में आया की वह एक बार अपने दादा के लंड का गुलाबी सुपाडा चूम ले। मगर ऐसा करना खतरनाक था क्योंकी अगर उसके दादा उठ गए तो वह क्या सोचेंगे, कंचन ने मन ही मन में सोचा । छोड़ो बचपना यह ठीक नहीं है मगर अगले ही पल अपने दादा के लंड के सुपाडे से वीर्य की एक बूँद निकलते देखकर कंचन के मूह में पानी आ गया और वह सब कुछ भूलकर अपना मुँह नीचे करते हुए अपने दादा के लंड को चूमने के लिए झुकने लगी।

कंचन का मूह अब अपने दादा के लंड कुछ इंच ही दूर था कंचन ने एक आखरी नज़र अपने दादा के लंड पर डाली और अपनी जीभ निकालकर उसके सुपाडे से निकलते हुए वीर्य की बूँद को चाट लिया । अनिल का पूरा जिस्म अपनी पोती की जीभ अपने लंड पर लगते ही कांप उठा। अचानक अपने दादा के इस तरह काम्पने से कंचन डर के मारे अपने दादा के लंड को छोडकर दूर खड़ी हो गयी, अनिल मन ही मन में अपने आपको कोसने लगा की अगर वह अपने ऊपर थोड़ा कण्ट्रोल करता तो उसे और मजा मिलता।
 
"दादा जी उठिये चाय तैयार है" कंचन ने अपने आप को संभालते हुए इस बार अपने दादा को बाज़ू से पकडकर झंझोडते हुए कहा । अनिल भी अब नाटक को ख़तम करते हुए अपनी आँखें को मलते हुए उठ गया।

"अरे बेटी तुम बहु किधर है?" अनिल ने अपनी पोती को देखकर हैंरानी का नाटक करते हुए कहा।

"दादा जी वह बाजार गयी है मैं चाय ले आऊं" कंचन ने अपने दादा को देखते हुए कहा।

"हाँ बेटी ले आओ मैं अभी फ्रेश होता हू" अनिल ने बेड से उठते हुए कहा । अनिल का लंड अब भी उसकी धोती में तम्बू बनाये हुए था।

"ठीक है दादा जी अभी लाई" कंचन ने चोर नज़रों से अपने दादा की धोती में बने तम्बू को देखा और यह कहते हुए वहां से बाहर निकल गयी।

कंचन अपने दादा के कमरे से निकलकर किचन में आ गयी और चाय को गरम करने लगी । वह मन ही मन में अपने आप पर हँस रही थी की उसे यह क्या हो गया था मगर उसकी आँखों के सामने अब भी अपने दादा का लंड घूम रहा था । कंचन सोचने लगी अगर उसके दादा उसका चुदाई कर दे तो उसे कितना मजा आएगा मगर अगले ही पल अपनी सोच पर उसे हंसी आने लगी। कंचन ने चाय को दो कप्स में ड़ाला और ट्रे में कुछ बिस्कुट्स के साथ अपने दादा के कमरे में ले जाने लगी।

कंचन अपने दादा के कमरे में कमरे में दाखिल होकर ट्रे को टेबल पर रखा और खुद सोफ़े पर जाकर बैठ गयी। बाथरूम से पानी के गिरने की आवज़ सुनकर कंचन समझ गयी थी की उसके दादा नहा रहे हैं । कुछ ही देर में पानी की आवाज़ बंद हो गई कंचन अपने दादा के आने का इंतज़ार करने लगी।

"बेटी क्या तुम इधर हो?" अचानक बाथरूम से आवाज़ आई।

"हाँ दादा जी कोई काम है?" कंचन ने हैंरान होते हुए पुछा।

"हाँ बेटी वह मैं टॉवल बाहर ही भूल गया बेड पर पडा होगा मुझे उठाकर दो" बाथरूम से फिर से अनिल की आवाज़ आई।

"ठीक है दादा जी अभी लाई" कंचन सोफ़े से उठते हुए बोली।

कंचन ने टॉवल को बेड से उठाया और बाथरूम की तरफ बढ़ने लगी।

"दादा जी यह रहा टॉवेल" कंचन ने बाथरूम के दरवाज़े पर पुहंचकर चिल्लाते हुए कहा । अगले ही पल बाथरूम का दरवाज़ा खुला दरवाज़े के खुलते ही कंचन का मुँह खुला का खुला रह गया।

"थैंक्स बेटी" अनिल ने अपनी पोती के हाथों से टॉवल को लेते हुए कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया । कंचन के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था क्योंकी दरवाज़े के खुलते ही उसने एक बार फिर से अपने दादा के लम्बे और मोटे लंड को जो पानी से भीगकर झटके खा रहा था देख लिया था, कंचन के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। वह बिलकुल एक बूत की तरह चलते हुए सोफ़े पर जाकर बैठ गयी।
 
कुछ ही देर में अनिल बाथरूम से निकलकर बाहर आ गया वह अब भी सिर्फ एक धोती में था और धोती के आगे एक बड़ा उभार बना हुआ था।

"सॉरी बेटी मेरी वजह से तुम्हारी चाय भी ठण्डी हो गयी" अनिल ने भी कंचन के साथ सोफ़े पर बैठते हुए कहा।

"नाही दादा जी अभी चाय गरम है" कंचन ने एक कप उठाकर अपने दादा के सामने रखते हुए कहा।

"वाह बेटी बुहत बढ़िया चाय बनाई है लगता है ताज़ा दूध से बनी हुयी है" अनिल ने चाय की एक चुसकी लेते हुए अपनी पोती की चुचियों की तरफ देखते हुए कहा। जिसके ऊपर से साड़ी का पल्लु हटने से वह आधी नंगी होकर अनिल के सामने आ गयी थी । अनिल के ऐसा करने से कंचन के पूरे जिस्म में एक झुरझुरी सी फ़ैल गयी और उसकी चूत से उत्तेजना के मारे पानी बहने लगा।

"दादा जी चाय तो माँ ने बनाई थी पता नहीं कौन सा दूध इस्तेमाल किया उसने । वैसे आपको दूध पसंद है" कंचन ने अपने दादा की बात का जवाब देते हुए कहा और थोडा झुककर ट्रे में से बिस्कुट उठाने लगी। जिस वजह से उसकी चुचियां आगे से थोड़ा ज्यादा खुलकर अनिल के बिलकुल सामने आ गयी।

"बेटी दूध का तो मैं दीवाना हूँ मगर मुझे ताज़ा गरम दूध पसंद है" अनिल ने भी अपनी पोती की चुचियों को बड़े गौर से देखते हुए कहा।

"ठीक कहा दादा जी दूध का असल मजा तो तब आता है जब वह बिलकुल ताज़ा और गरम हो" कंचन ने अब सीधे होते हुए कहा।

"ता बेटी कब पीला रही हो ताज़ा गरम दूध" अनिल ने भी बिस्कुट को उठाते हुए कहा।

"जब आप चाहें दादा जी अभी तो आप चाय पी रहे है" कंचन ने शरारती मुसकान के साथ अपने दादा को देखते हुए कहा।

"हाँ बेटी फिर कभी ही पीला देना वैसे तुम्हें क्या पसंद है" अनिल ने भी अपनी पोती को देखते हुए कहा।

"आईसक्रीम दादा जी में मैं आइसक्रीम की दीवानी हूँ बस अपनी जीभ निकालकर उसे चाटने का मन करता है" कंचन ने भी अपने दादा के धोती के आगे बने हुए उभार को घूरते हुए कहा।

"सच्ची बेटी तुम्हें आइसक्रीम पसंद है" अनिल ने अपनी पोती की बात सुनकर कहा । उसका लंड अपनी पोती की बात सुनकर ठुमके मार रहा था।

"हाँ दादा जी कब खिला रहे हो?" कंचन ने अपनी जीभ को निकालकर अपने गुलाबी होंटठो पर फिराते हुए कहा । तभी बाहर का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

"दादा जी लगता है माँ आ गयी है अब जल्दी से चाय ख़तम करो" कंचन ने अपने दादा से कहा और चाय पीने लगी । अनिल भी अब चाय पीने लगा कुछ ही देर में दोनों ने चाय ख़तम कर दी और कंचन चाय के कप ट्रे समेत उठाकर बाहर जाने लगी।

"बेटी मुझे तुम्हारे ताज़े दूध का इंतज़ार रहेगा" अनिल ने कंचन को जाता हुआ देखकर कहा।

"दादा जी जब भी मौका मिला मैं आपको ताज़ा दूध पिला दूँगी" कंचन ने भी जाते हुए अपने दादा से कहा और वहां से निकलकर कप्स को किचन में जाकर रख दिया
 
कंचन ट्रे को किचन में रखने के बाद अपने कमरे में जाने लगी।

"बेटी इधर आओ?" अपने कमरे में जाते हुए रेखा ने कंचन को देख लिया जो अपने कमरे में सामान रख रही थी और उसे अपने कमरे में बुला लिया।

"जी मा" कंचन अपनी माँ के कमरे में जाकर उसके सामने खड़ी होकर बोली।

"बेटी दादा को चाय दे दी?" रेखा ने कंचन को देखते हुए कहा।

"जी माँ और कप उठाकर किचन में रख दिए" कंचन ने अपनी माँ को जवाब दिया।

"ठीक है बेटी अब भले तुम जाओ" रेखा ने अपनी बेटी के बालों में हाथ डालकर उसके बालों को सहलाते हुए कहा।

कंचन अपनी माँ की बात सुनकर वहां से निकलकर अपने कमरे में आ गयी । कंचन अभी बेड पर बैठी ही थी की विजय वहां पर आ गया।

"हल्लो भैया कहाँ घूमने गए थे माँ के साथ?" कंचन ने अपने भाई को देखते ही कहा।

"दीदी बस माँ को कुछ सामन खरीद करना था तो मुझे भी साथ ले गई" विजय ने भी अपनी बहन के पास बेड पर बैठते हुए कहा।

"भइया तुमसे एक बात कहनी है" कंचन ने अपने भाई को देखते हुए कहा।

"क्या बात है दीदी हुक्म करो" विजय ने भी अपनी बहन की बात सुनकर रोमांटिक होते हुए कहा।

"भइया ज्यादा मस्का मत लगाओ कोमल दीदी के बारे में बात करनी है" कंचन ने अपने भाई की बात को सुनकर हँसते हुए कहा।

"कोमल दीदी क्या हुआ उसे कोई परेशानी है क्या उसे कॉलेज में?" विजय ने जल्दी से परेशान होते हुए कहा।

"नही भैया ऐसी कोई बात नही" कंचन ने अपने भाई को देखते हुए कहा।

"ता फिर बताओ न क्या बात है?" विजय ने फिर से परेशान होते हुए कहा।

"अरे भैया तुम परशान क्यों होते हो बस हमारी छोटी अब जवान हो गई है और उसे भी अब किस्सी मरद की ज़रुरत है" कंचन ने अखिरकार अपने भाई को सही बात बताते हुए कहा।

"क्या कहा दीदी कोमल दीदी को मरद की ज़रुरत है मगर तुम्हें यह सब कैसे पता चला" विजय ने एक्साईटमेंट और हैंरानी से कंचन को कमर से पकडकर अपनी गोद पर बिठाते हुए कहा।

"ओहहहह भैया आप भी न ज़रा सबर रखो न इतनी जल्दी आप को क्या हो जाता है" कंचन ने अपने भाई के खड़े लंड को अपनी साड़ी के ऊपर से अपनी गांड पर लगने से सिसकते हुए कहा।

"दीदी आपने बात ही ऐसी की है की मैं अपना कण्ट्रोल खो बैठता हूँ" विजय ने अपनी बहन के नंगे पेट को अपने हाथों से सहलाते हुए अपने होंठो से उसके काँधे को चूमते हुए कहा।
 
"भइया दोपहर को जब में उसके कमरे में गयी तो वह अपने हाथ से अपनी छोटी सी चूत को सहला रही थी और जल्दी में उसने दरवाज़ा भी बंद नहीं किया था" कंचन ने भी अपनी गांड को थोड़ा उठाकर सही तरीके से अपने भाई के लंड पर रखते हुए कहा।

"तो दीदी अब क्या करना होगा" विजय अपनी बहन की बात को सुनकर नशीले अन्दाज़ में बोला।

"भइया इससे पहले की वह अपनी जिस्म की आग को किसी गैर के हाथों मिटवाए आपको घर की इज़्ज़त को बचाने के लिए खुद ही उसकी जिस्म की आग को ठण्डा करना होगा" कंचन ने अपनी आँखों को बंद करते हुए मज़े से अपनी गांड को अपने भाई के लंड पर दबाते हुए कहा।

"दीदी मगर क्या कोमल दीदी इसके लिए राज़ी होगी?" विजय के लंड अपनी बहन की बात सुनकर एक ज़ोर का ठुमका अपनी बहन की गांड पर मारा और विजय ने अपनी बहन को ज़ोर से अपनी बाहों में भरते हुए पूछा।

"भइया में हूँ न आप रात को तैयार रहना मैं छोटी को आपके कमरे में ले आऊँगी" कंचन ने अपने भाई के हाथों को अपने पेट से हटाकर उसकी गोद से उठते हुए कहा।

"क्या हुआ दीदी आप उठ क्यों गयी?" विजय ने अपनी बहन के अचानक उठने से हैंरानी से उसके हाथ को पकडते हुए कहा।

"भइया अब यह मेरी छोटी की अमानत है इसीलिए मैं इसके साथ कोई हरकत नहीं कर सकति" कंचन ने अपने दुसरे हाथ से अपने भाई के लंड को उसकी पेण्ट के ऊपर से ही सहलाते हुए कहा और अपने होंठो को अपने भाई के होंठो पर रखकर उसे एक चुम्मा दिया । कंचन अपने भाई के होंठो को चूमने के बाद उससे अलग हो गई और सोफ़े पर जाकर बैठ गयी।

"दीदी यह तो कोई बात नहीं हुई अब यह रात कब होगी?" विजय अपनी बहन की बात सुनकर मायूस होते हुए बोला।

"हो जाएगी मेरे बेसबरे भाई ज़रा धीरज रखो मैं छोटी के कमरे में जा रही हू" कंचन ने अपने भाई को देखकर हँसते हुए कहा और सोफ़े से उठकर बाहर निकल गयी । कंचन के जाते ही विजय भी वहां से उठकर अपने कमरे में आ गया और बेड पर लेटकर अपनी छोटी बहन के बारे में सोचने लगा। विजय ने पहले कभी कोमल को उस नज़र से नहीं देखा था मगर कंचन की बाते सुनने के बाद वह अपनी छोटी बहन को याद करके अपने लंड को सहलाने लगा।
 
विजय जानता था की कंचन की तरह कोमल भी बुहत ही ख़ूबसूरत जिस्म की मालिक है मगर उसे सिर्फ यह ही चिंता थी की वह कंचन की तरह गरम भी होगी या नहीं । विजय कोमल के जिस्म को याद करते हुए अपने लंड को सहला रहा था । वह मन ही मन में सोच रहा था की क्या कोमल का जिस्म अंदर से भी कंचन के जिस्म की तरह ख़ूबसूरत होगा, कंचन अपने कमरे से निकलकर अपनी बहन के कमरे में आ गयी और दरवाज़े को अंदर से बंद कर दिया।

कंचन ने देखा की वहां पर कोई नहीं था मगर बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी। कंचन मन ही मन में मुस्कुरायी और अपने कपड़ों को उतारने लगी । कंचन बिलकुल नंगी होकर बाथरूम की तरफ बढ़ने लगी और बाथरूम के दरवाज़े को धक्का देकर खोल दिया।

"दीदी आप इस वक्त और आपने कपडे भी उतार दिये है" अचानक दरवाज़े के खुलने से कोमल चोंक गयी मगर अगले ही पल अपनी बहन को अपने सामने बिलकुल नंगा देखकर वह हैंरानी से बोली।

"हाँ छोटी तुम नहा रही थी तो मेरा दिल भी नहाने को हो गया क्या मैं अपनी छोटी बहन के साथ नहीं नहा सकती" कंचन ने बाथरूम में दाखिल होकर अपनी छोटी बहन के साथ शावर के नीचे खड़े होते हुए कहा।

"हाँ दीदी क्यों नही" कोमल बड़े गौर से अपनी बड़ी बहन के जिस्म को घूर रही थी।

"क्या देख रही हो मेरे पास भी वही है जो तुम्हारे पास है" कंचन ने अपनी छोटी बहन को यो अपनी तरफ घूरता देखकर मुस्कराते हुए कहा।

"हाँ दीदी है तो वही मगर आपका जिस्म कितना ज्यादा ख़ूबसूरत है" कोमल ने कंचन को देखते हुए कहा।

"पगली मैंने कहा था न की औरत का जिस्म को मरद ही सजाता है और जब औरत मरद के साथ सम्बन्ध शुरू करती है तो उसका जिस्म खिलना शुरू होता है" कंचन ने अपने दोनों हाथों से अपनी बहन की दोनों छोटी सी चुचियों को पकडते हुए बोली।

"आह्ह्ह्ह दीदी आप क्या कर रही है?" कोमल अपनी बड़ी बहन के हाथ को अपनी चुचियों पर महसूस करते ही काँपते हुए कहा।

"तुम भी पकडो न मेरी चुचियों को तुम्हें अच्छी नहीं लगती क्या मेरी चुचियां" कंचन ने अपनी छोटी बहन को देखते हुए कहा।

"दीदी आपकी तो बुहत सूंदर हैं" कोमल ने कंचन की बात सुनने के बाद अपने दोनों हाथों से उसकी चुचियों को थामते हुए कहा और वह बुहत ज़ोर से कंचन की चुचियों को दबाने लगी।

"आहहह आराम से दबाओ पगली" कंचन अपनी छोटी बहन के हाथों ज़ोर से अपनी चुचियों के दबने से सिसकते हुए बोली।

"सॉरी दीदी" कोमल ने अपनी बहन से कहा और बड़े आराम से कंचन की चुचियों को दबाने लगी।
 
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