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'खबरदार।' रघबर को धमकाया हरिया ने-'काम वैसे ही होगा जैसा भईया ने बताया है। अब फटाफट लपक ले तू यहां से।'
'ठीक है।'
कहकर रघुबर तीव्र गति से एक ओर को चल दिया।
जगतार एक पत्थर पर चित्त लेटा हुआ तारों भरे आसमान को शून्य दृष्टि से घूरता हुआ अपने बाएं कंधे को सहला रहा था जिसमें अचानक ही फिर दर्द की लहरें उभरने लगीं थीं।
जेल से भागते समय जल्दबाजी में एक अजीब-सा झटका लगा और बायां कन्धा उतर गया था। अपने आप ही सिंकाई और मालिश वगैरहा करके उसने उसे काफी हद तक ठीक कर लिया था। लेकिन आज जब उसने कोधावेश में झटके के साथ केसरी को सिर से ऊपर उठा लिया था तो फिर एक झटका सा लगा और दबा हुआ दर्द उभर आया।
'नहीं...।'
साधना की चीख अब भी उसके कानों में गूंज रही थी।
अगर समय रहते साधना ने चीखकर उसे न रोक लिया। होता तो उसने वाकई केसरी को इस जोर से पटक दिया होता कि उसकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती।
उसने कभी सोचा भीई नहीं था कि जिन्दगी में कभी कोई
औरत इस बुरी तरह उसके दिल और दिमाग पर छा जाएगी जिस तरह कि साधना इन कुछ ही दिनों में छा गई थी।
इस जंगल में आते ही उसे लगभग सारी बातों का पता लग चका था। केसरी की हिम्मत की दाद देने को मन हुआ था पर?' उससे हुई पहली मुलाकात कोई खुशगवार नहीं रही थी।
साधना के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार करने की कोशिश की थी यह भी उसे मालूम हो चुका था। उसे चोरी छुपे उसने
देख भी लिया था। उसके गठे हुए शरीर और गम्भीर रूप में एक अद्भुत चुम्बकीय सी शक्ति का अहसास तो उसे हुआ था किन्तु उसने यह नहीं सोचा था कि वह शक्ति उस जैसे पत्थर दिल इन्सान के भीतर भी कोमल भावनाओं की कोपलें उगाने में समर्थ होगी।
उस रात उसने कुछ व्यक्तियों को चोरी छु' गए बंगले की ओर बढ़ते देख लिया था। वह उस समय भी उन्हे देख रहा था जब उन्होंने बंगले पर पत्थर फेंकने शुरू किए थे।
लेकिन कोई हरकत नहीं की।
चुपचाप देखता भर रहा था।
उस समय वह वाकई मोहित सा हो गया था जब साधना को दरांती के साथ दश्मनों की ओर झपटते देखा था। तभो उसे लगा था कि वह कोई साधारण औरत नहीं है।
सहायता के लिए आगे बढ़ा तो चक्कर खाती हुई साधना अपने आप ही उसकी बाहों में आ गई। उसे चूमने का लोभ संवरण न कर सका था वह। उस समय उसने सोचा भी नहीं था कि वह गम्भीर और दृढ़ निश्चयी युवती उसे तलाश करती हुई जंगल में आएगी। पहले दिन वह जान-बूझकर उसके सामने नहीं आया और झाड़ियों में छुपा हुआ उसकी बेचैन खोब का आनन्द लेता रहा था।
जब अगले दिन भी बह आई तो अपने को रोक न सका।
उस समय तो वह चकित ही रह गया जब उसने साधना को अपने जेल अपराधी होने के बारे में बताते हुए अपने से दूर
रहने के लिए कहा तो साधना ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया
था-'तुम जो भी हो जैसे भी हो उसी रूप में चुना है मैंने। अगर आगे के रास्ते पर साथ ले चलने के लिए तुमने मेरा हाथ थाम लिया तो तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि हम लोग कल की सारी कालिमा को धोकर एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेंगे।'
वह चकित सा उसके दीप्ति-युक्त मुख को देखता हुआ उसके शब्दों का सही-सही अर्थ समझने की कोशिश करता रहा था। लेकिन अनुराग के वे क्षण अस्थायी साबित हुए।
प्रेम-महल की भावमानी भित्तियों को केसरी की तेज आवाजों ने हिलाकर रख दिया था।
साधना बौखला कर भागी थी।
यह झाड़ियों में छुरा सब देख रहा था। भाई-बहन के बीच पड़ने का उसका कोई इरादा नहीं था।
लेकिन जब साधना के गाल पर घाटा पड़ा तो वह अपने पर काबू न रख सका।
दुखते हुए कन्धे को सहलाता हुआ बह उठकर पत्थर पर बैठ गया।
उसके बाद झाड़ियों में अपने को छुपाए हुए कई बार बगले का चक्कर लगा आया था। लेकिन उस घटना के बाद जो बंगले में सन्नाटा छाया तो अब तक न टूटा।
उसने आकाश की ओर नजरें दौड़ाकर देखा न जाने क्या टाईम हुआ होगा।
अब तो पहरेदार सिपाही भी आ चुके होंगे।
साधना सो गई होगी या शायद न सोई हो। क्या वह भी उसकी तरह उसके ख्यालों में उलझी हुई होगी?' उसे भी सो जाना चाहिए।
वह फिर लेट गया। कुछ देर काले आसमान में हीरों से जड़े सितारों को देखते रहने के बाद उसने सोने की कोशिश में
आंखें बन्द कर ली।
लेकिन नींद कहां थी?
लग रहा था जैसे साधना अपनी सांसों के साथ उसे पुकार रही है। उठकर बैठ गया। अपनी बेवकूफी पर अजीव ढंग से सिर हिलाता हुआ वह धीरे से हंसा।
कहीं इश्क का भूत उसके सिर चढ़कर तो नहीं बोलने लगा जो यह अजीब किस्म के खुराफाती विचार उसकी खोपड़ी में चक्कर लगाने लगे हैं। साधना भला उसे इस वक्त क्यों बुलाएगी? वह भो अपनी सांसों के द्वारा पुकार कर-क्या बकवास है।
अपनी असलियत को भूलकर किसी विरही प्रेमी की तरह क्या अंट-शंट सोचने लगा है वह। फिर भी वह बैठा न रह सका। उठकर खड़ा हो गया।
अनजाने हो उसके कदम बंगले की ओर बढ़ गए। यह उसकी समझ में भी नहीं आ रहा था कि इस वक्त बंगले पर जाकर वह क्या करेगा। साधना तो मिलने से रही। आराम से सो रही होगी।
सिपाही रोज की तरह पहरा दे रहे होंगे।
लेकिन फिर भी वह चला जा रहा था अरने को झाड़ियों में छुपाए हुए सावधानी के साथ बिना कोई आवाज किए हुए। ताकि पहरा देने वाले सिपाहियों को उसकी कोई भनक न मिलने पाए।
वह एक ऐसी जगह पहुंच गया जहां से बंगले को बाखूबी देख सकता था वह। पहरा देने वाले सिपाही भी उसे नजर आ गए। लेकिन और दिनों की तरह वे सतर्क और चौकन्ने नहीं
थे। बल्कि आज उनकी चाल में अजीब सी लड़खड़ाहट थी।
यहां का माहौल काफी बदला-बदला सा लगा जगतार को।
वह अपनी जगह बैठा चौकन्नी निगाहों से सब कुछ खामोशी के साथ देख रहा था।
एक सिपाही झाड़ी के पीछे जाता था और दूसरा आता था?
ऐसा क्या है झाड़ी के पीछे? लेकिन कुछ ही देर बाद जगतार को अनुमान लगाने में दिक्कत नहीं हुई कि दोनों सिपाही नशे में लड़खड़ा रहे हैं
और झाड़ी के पीछे जो आना-जाना लगा रखा है वहां चूंट मारने जाते हैं?
क्यों?
एक बड़ा-सा प्रश्न जगतार के दिमाग में उभर आया और साथ ही उसे खतरे का अहसास सा होने लगा।
फिर भी मामले को पूरी तरह समझने के लिए वह खामोश
बैठा देखता रहा। उसे कोई सन्देह नहीं रहा था कि आज फिर कोई गलत चक्कर चल रहा है यहां।
उसके देखते-देखते दोनों सिपाही झाड़ियों के पीछे ओझल हो गए और कुछ देर बाद दो व्यक्ति झाड़ियों के पीछे से निकलकर आए।
वे दोनों पहरेदार सिपाही नही थे। न ही वे नशे में थे। पहरेदार सिपाही झाड़ियों के पीछे ही थे। शायद नशे में बेहोश।
वह उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनकर मामले की असलियत जानने की कोशिश करता रहा।
फिर एक व्यक्ति वहीं बंगले के पास रह गया और दूसरा व्यक्ति एक ओर को चला गया।
जगतार क्षण भर के लिए दुविधा में फंस गया कि उस व्यक्ति का पीछा करे या इस बंगले वाले व्यक्ति को संभाले?
अगले ही क्षण उसने निर्णय ले लिया। उस निर्णय के साथ ही वह उस चीते की सी सावधानी और खामोशी के साथ उस व्यक्ति की ओर बढ़ा जो अपने शिकार पर झपटने ही वाला हो।
इससे पहले कि हरिया किसी तरह के खतरे का आभास पाकर सावधान हो पाता, जगतार ने छलांग मारकर उसे दबोच लिया।
उसका हाथ हरिया के मुंह पर था ताकि वह चीख न सके और गर्दन बाहों के बीच में ऐसी फंसी हुई थी कि वह जरा भी हिलने की कोशिश करता तो हड्डी चटक जाए।
'कौन है तू?' जगतार ने हरिया की गर्दन पर अपनी बाहों का
दबाव डालकर पूछा।
मुंह बन्द होने के कारण हरिया सिर्फ मिमयाकर रह गया। साथ ही उसने अपनी जेब से पिस्तौल निकालने की भी कोशिश की। जगतार ने उसकी इस हरकत को भांपा और उसे उठाकर जमीन पर पटक दिया।
गर्दन पर घुटना रखा और जेब से पिस्तौल निकालकर उसके माथे पर रखता हुआ बोला-'अब बोल।'
'ठीक है।'
कहकर रघुबर तीव्र गति से एक ओर को चल दिया।
जगतार एक पत्थर पर चित्त लेटा हुआ तारों भरे आसमान को शून्य दृष्टि से घूरता हुआ अपने बाएं कंधे को सहला रहा था जिसमें अचानक ही फिर दर्द की लहरें उभरने लगीं थीं।
जेल से भागते समय जल्दबाजी में एक अजीब-सा झटका लगा और बायां कन्धा उतर गया था। अपने आप ही सिंकाई और मालिश वगैरहा करके उसने उसे काफी हद तक ठीक कर लिया था। लेकिन आज जब उसने कोधावेश में झटके के साथ केसरी को सिर से ऊपर उठा लिया था तो फिर एक झटका सा लगा और दबा हुआ दर्द उभर आया।
'नहीं...।'
साधना की चीख अब भी उसके कानों में गूंज रही थी।
अगर समय रहते साधना ने चीखकर उसे न रोक लिया। होता तो उसने वाकई केसरी को इस जोर से पटक दिया होता कि उसकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती।
उसने कभी सोचा भीई नहीं था कि जिन्दगी में कभी कोई
औरत इस बुरी तरह उसके दिल और दिमाग पर छा जाएगी जिस तरह कि साधना इन कुछ ही दिनों में छा गई थी।
इस जंगल में आते ही उसे लगभग सारी बातों का पता लग चका था। केसरी की हिम्मत की दाद देने को मन हुआ था पर?' उससे हुई पहली मुलाकात कोई खुशगवार नहीं रही थी।
साधना के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार करने की कोशिश की थी यह भी उसे मालूम हो चुका था। उसे चोरी छुपे उसने
देख भी लिया था। उसके गठे हुए शरीर और गम्भीर रूप में एक अद्भुत चुम्बकीय सी शक्ति का अहसास तो उसे हुआ था किन्तु उसने यह नहीं सोचा था कि वह शक्ति उस जैसे पत्थर दिल इन्सान के भीतर भी कोमल भावनाओं की कोपलें उगाने में समर्थ होगी।
उस रात उसने कुछ व्यक्तियों को चोरी छु' गए बंगले की ओर बढ़ते देख लिया था। वह उस समय भी उन्हे देख रहा था जब उन्होंने बंगले पर पत्थर फेंकने शुरू किए थे।
लेकिन कोई हरकत नहीं की।
चुपचाप देखता भर रहा था।
उस समय वह वाकई मोहित सा हो गया था जब साधना को दरांती के साथ दश्मनों की ओर झपटते देखा था। तभो उसे लगा था कि वह कोई साधारण औरत नहीं है।
सहायता के लिए आगे बढ़ा तो चक्कर खाती हुई साधना अपने आप ही उसकी बाहों में आ गई। उसे चूमने का लोभ संवरण न कर सका था वह। उस समय उसने सोचा भी नहीं था कि वह गम्भीर और दृढ़ निश्चयी युवती उसे तलाश करती हुई जंगल में आएगी। पहले दिन वह जान-बूझकर उसके सामने नहीं आया और झाड़ियों में छुपा हुआ उसकी बेचैन खोब का आनन्द लेता रहा था।
जब अगले दिन भी बह आई तो अपने को रोक न सका।
उस समय तो वह चकित ही रह गया जब उसने साधना को अपने जेल अपराधी होने के बारे में बताते हुए अपने से दूर
रहने के लिए कहा तो साधना ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया
था-'तुम जो भी हो जैसे भी हो उसी रूप में चुना है मैंने। अगर आगे के रास्ते पर साथ ले चलने के लिए तुमने मेरा हाथ थाम लिया तो तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि हम लोग कल की सारी कालिमा को धोकर एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेंगे।'
वह चकित सा उसके दीप्ति-युक्त मुख को देखता हुआ उसके शब्दों का सही-सही अर्थ समझने की कोशिश करता रहा था। लेकिन अनुराग के वे क्षण अस्थायी साबित हुए।
प्रेम-महल की भावमानी भित्तियों को केसरी की तेज आवाजों ने हिलाकर रख दिया था।
साधना बौखला कर भागी थी।
यह झाड़ियों में छुरा सब देख रहा था। भाई-बहन के बीच पड़ने का उसका कोई इरादा नहीं था।
लेकिन जब साधना के गाल पर घाटा पड़ा तो वह अपने पर काबू न रख सका।
दुखते हुए कन्धे को सहलाता हुआ बह उठकर पत्थर पर बैठ गया।
उसके बाद झाड़ियों में अपने को छुपाए हुए कई बार बगले का चक्कर लगा आया था। लेकिन उस घटना के बाद जो बंगले में सन्नाटा छाया तो अब तक न टूटा।
उसने आकाश की ओर नजरें दौड़ाकर देखा न जाने क्या टाईम हुआ होगा।
अब तो पहरेदार सिपाही भी आ चुके होंगे।
साधना सो गई होगी या शायद न सोई हो। क्या वह भी उसकी तरह उसके ख्यालों में उलझी हुई होगी?' उसे भी सो जाना चाहिए।
वह फिर लेट गया। कुछ देर काले आसमान में हीरों से जड़े सितारों को देखते रहने के बाद उसने सोने की कोशिश में
आंखें बन्द कर ली।
लेकिन नींद कहां थी?
लग रहा था जैसे साधना अपनी सांसों के साथ उसे पुकार रही है। उठकर बैठ गया। अपनी बेवकूफी पर अजीव ढंग से सिर हिलाता हुआ वह धीरे से हंसा।
कहीं इश्क का भूत उसके सिर चढ़कर तो नहीं बोलने लगा जो यह अजीब किस्म के खुराफाती विचार उसकी खोपड़ी में चक्कर लगाने लगे हैं। साधना भला उसे इस वक्त क्यों बुलाएगी? वह भो अपनी सांसों के द्वारा पुकार कर-क्या बकवास है।
अपनी असलियत को भूलकर किसी विरही प्रेमी की तरह क्या अंट-शंट सोचने लगा है वह। फिर भी वह बैठा न रह सका। उठकर खड़ा हो गया।
अनजाने हो उसके कदम बंगले की ओर बढ़ गए। यह उसकी समझ में भी नहीं आ रहा था कि इस वक्त बंगले पर जाकर वह क्या करेगा। साधना तो मिलने से रही। आराम से सो रही होगी।
सिपाही रोज की तरह पहरा दे रहे होंगे।
लेकिन फिर भी वह चला जा रहा था अरने को झाड़ियों में छुपाए हुए सावधानी के साथ बिना कोई आवाज किए हुए। ताकि पहरा देने वाले सिपाहियों को उसकी कोई भनक न मिलने पाए।
वह एक ऐसी जगह पहुंच गया जहां से बंगले को बाखूबी देख सकता था वह। पहरा देने वाले सिपाही भी उसे नजर आ गए। लेकिन और दिनों की तरह वे सतर्क और चौकन्ने नहीं
थे। बल्कि आज उनकी चाल में अजीब सी लड़खड़ाहट थी।
यहां का माहौल काफी बदला-बदला सा लगा जगतार को।
वह अपनी जगह बैठा चौकन्नी निगाहों से सब कुछ खामोशी के साथ देख रहा था।
एक सिपाही झाड़ी के पीछे जाता था और दूसरा आता था?
ऐसा क्या है झाड़ी के पीछे? लेकिन कुछ ही देर बाद जगतार को अनुमान लगाने में दिक्कत नहीं हुई कि दोनों सिपाही नशे में लड़खड़ा रहे हैं
और झाड़ी के पीछे जो आना-जाना लगा रखा है वहां चूंट मारने जाते हैं?
क्यों?
एक बड़ा-सा प्रश्न जगतार के दिमाग में उभर आया और साथ ही उसे खतरे का अहसास सा होने लगा।
फिर भी मामले को पूरी तरह समझने के लिए वह खामोश
बैठा देखता रहा। उसे कोई सन्देह नहीं रहा था कि आज फिर कोई गलत चक्कर चल रहा है यहां।
उसके देखते-देखते दोनों सिपाही झाड़ियों के पीछे ओझल हो गए और कुछ देर बाद दो व्यक्ति झाड़ियों के पीछे से निकलकर आए।
वे दोनों पहरेदार सिपाही नही थे। न ही वे नशे में थे। पहरेदार सिपाही झाड़ियों के पीछे ही थे। शायद नशे में बेहोश।
वह उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनकर मामले की असलियत जानने की कोशिश करता रहा।
फिर एक व्यक्ति वहीं बंगले के पास रह गया और दूसरा व्यक्ति एक ओर को चला गया।
जगतार क्षण भर के लिए दुविधा में फंस गया कि उस व्यक्ति का पीछा करे या इस बंगले वाले व्यक्ति को संभाले?
अगले ही क्षण उसने निर्णय ले लिया। उस निर्णय के साथ ही वह उस चीते की सी सावधानी और खामोशी के साथ उस व्यक्ति की ओर बढ़ा जो अपने शिकार पर झपटने ही वाला हो।
इससे पहले कि हरिया किसी तरह के खतरे का आभास पाकर सावधान हो पाता, जगतार ने छलांग मारकर उसे दबोच लिया।
उसका हाथ हरिया के मुंह पर था ताकि वह चीख न सके और गर्दन बाहों के बीच में ऐसी फंसी हुई थी कि वह जरा भी हिलने की कोशिश करता तो हड्डी चटक जाए।
'कौन है तू?' जगतार ने हरिया की गर्दन पर अपनी बाहों का
दबाव डालकर पूछा।
मुंह बन्द होने के कारण हरिया सिर्फ मिमयाकर रह गया। साथ ही उसने अपनी जेब से पिस्तौल निकालने की भी कोशिश की। जगतार ने उसकी इस हरकत को भांपा और उसे उठाकर जमीन पर पटक दिया।
गर्दन पर घुटना रखा और जेब से पिस्तौल निकालकर उसके माथे पर रखता हुआ बोला-'अब बोल।'