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फोरेस्ट आफिसर

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'खबरदार।' रघबर को धमकाया हरिया ने-'काम वैसे ही होगा जैसा भईया ने बताया है। अब फटाफट लपक ले तू यहां से।'

'ठीक है।'

कहकर रघुबर तीव्र गति से एक ओर को चल दिया।

जगतार एक पत्थर पर चित्त लेटा हुआ तारों भरे आसमान को शून्य दृष्टि से घूरता हुआ अपने बाएं कंधे को सहला रहा था जिसमें अचानक ही फिर दर्द की लहरें उभरने लगीं थीं।

जेल से भागते समय जल्दबाजी में एक अजीब-सा झटका लगा और बायां कन्धा उतर गया था। अपने आप ही सिंकाई और मालिश वगैरहा करके उसने उसे काफी हद तक ठीक कर लिया था। लेकिन आज जब उसने कोधावेश में झटके के साथ केसरी को सिर से ऊपर उठा लिया था तो फिर एक झटका सा लगा और दबा हुआ दर्द उभर आया।

'नहीं...।'

साधना की चीख अब भी उसके कानों में गूंज रही थी।

अगर समय रहते साधना ने चीखकर उसे न रोक लिया। होता तो उसने वाकई केसरी को इस जोर से पटक दिया होता कि उसकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती।

उसने कभी सोचा भीई नहीं था कि जिन्दगी में कभी कोई

औरत इस बुरी तरह उसके दिल और दिमाग पर छा जाएगी जिस तरह कि साधना इन कुछ ही दिनों में छा गई थी।

इस जंगल में आते ही उसे लगभग सारी बातों का पता लग चका था। केसरी की हिम्मत की दाद देने को मन हुआ था पर?' उससे हुई पहली मुलाकात कोई खुशगवार नहीं रही थी।

साधना के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार करने की कोशिश की थी यह भी उसे मालूम हो चुका था। उसे चोरी छुपे उसने

देख भी लिया था। उसके गठे हुए शरीर और गम्भीर रूप में एक अद्भुत चुम्बकीय सी शक्ति का अहसास तो उसे हुआ था किन्तु उसने यह नहीं सोचा था कि वह शक्ति उस जैसे पत्थर दिल इन्सान के भीतर भी कोमल भावनाओं की कोपलें उगाने में समर्थ होगी।

उस रात उसने कुछ व्यक्तियों को चोरी छु' गए बंगले की ओर बढ़ते देख लिया था। वह उस समय भी उन्हे देख रहा था जब उन्होंने बंगले पर पत्थर फेंकने शुरू किए थे।

लेकिन कोई हरकत नहीं की।

चुपचाप देखता भर रहा था।

उस समय वह वाकई मोहित सा हो गया था जब साधना को दरांती के साथ दश्मनों की ओर झपटते देखा था। तभो उसे लगा था कि वह कोई साधारण औरत नहीं है।

सहायता के लिए आगे बढ़ा तो चक्कर खाती हुई साधना अपने आप ही उसकी बाहों में आ गई। उसे चूमने का लोभ संवरण न कर सका था वह। उस समय उसने सोचा भी नहीं था कि वह गम्भीर और दृढ़ निश्चयी युवती उसे तलाश करती हुई जंगल में आएगी। पहले दिन वह जान-बूझकर उसके सामने नहीं आया और झाड़ियों में छुपा हुआ उसकी बेचैन खोब का आनन्द लेता रहा था।

जब अगले दिन भी बह आई तो अपने को रोक न सका।

उस समय तो वह चकित ही रह गया जब उसने साधना को अपने जेल अपराधी होने के बारे में बताते हुए अपने से दूर

रहने के लिए कहा तो साधना ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया

था-'तुम जो भी हो जैसे भी हो उसी रूप में चुना है मैंने। अगर आगे के रास्ते पर साथ ले चलने के लिए तुमने मेरा हाथ थाम लिया तो तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि हम लोग कल की सारी कालिमा को धोकर एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेंगे।'

वह चकित सा उसके दीप्ति-युक्त मुख को देखता हुआ उसके शब्दों का सही-सही अर्थ समझने की कोशिश करता रहा था। लेकिन अनुराग के वे क्षण अस्थायी साबित हुए।

प्रेम-महल की भावमानी भित्तियों को केसरी की तेज आवाजों ने हिलाकर रख दिया था।

साधना बौखला कर भागी थी।

यह झाड़ियों में छुरा सब देख रहा था। भाई-बहन के बीच पड़ने का उसका कोई इरादा नहीं था।

लेकिन जब साधना के गाल पर घाटा पड़ा तो वह अपने पर काबू न रख सका।

दुखते हुए कन्धे को सहलाता हुआ बह उठकर पत्थर पर बैठ गया।

उसके बाद झाड़ियों में अपने को छुपाए हुए कई बार बगले का चक्कर लगा आया था। लेकिन उस घटना के बाद जो बंगले में सन्नाटा छाया तो अब तक न टूटा।

उसने आकाश की ओर नजरें दौड़ाकर देखा न जाने क्या टाईम हुआ होगा।

अब तो पहरेदार सिपाही भी आ चुके होंगे।

साधना सो गई होगी या शायद न सोई हो। क्या वह भी उसकी तरह उसके ख्यालों में उलझी हुई होगी?' उसे भी सो जाना चाहिए।

वह फिर लेट गया। कुछ देर काले आसमान में हीरों से जड़े सितारों को देखते रहने के बाद उसने सोने की कोशिश में

आंखें बन्द कर ली।

लेकिन नींद कहां थी?

लग रहा था जैसे साधना अपनी सांसों के साथ उसे पुकार रही है। उठकर बैठ गया। अपनी बेवकूफी पर अजीव ढंग से सिर हिलाता हुआ वह धीरे से हंसा।

कहीं इश्क का भूत उसके सिर चढ़कर तो नहीं बोलने लगा जो यह अजीब किस्म के खुराफाती विचार उसकी खोपड़ी में चक्कर लगाने लगे हैं। साधना भला उसे इस वक्त क्यों बुलाएगी? वह भो अपनी सांसों के द्वारा पुकार कर-क्या बकवास है।

अपनी असलियत को भूलकर किसी विरही प्रेमी की तरह क्या अंट-शंट सोचने लगा है वह। फिर भी वह बैठा न रह सका। उठकर खड़ा हो गया।

अनजाने हो उसके कदम बंगले की ओर बढ़ गए। यह उसकी समझ में भी नहीं आ रहा था कि इस वक्त बंगले पर जाकर वह क्या करेगा। साधना तो मिलने से रही। आराम से सो रही होगी।

सिपाही रोज की तरह पहरा दे रहे होंगे।

लेकिन फिर भी वह चला जा रहा था अरने को झाड़ियों में छुपाए हुए सावधानी के साथ बिना कोई आवाज किए हुए। ताकि पहरा देने वाले सिपाहियों को उसकी कोई भनक न मिलने पाए।

वह एक ऐसी जगह पहुंच गया जहां से बंगले को बाखूबी देख सकता था वह। पहरा देने वाले सिपाही भी उसे नजर आ गए। लेकिन और दिनों की तरह वे सतर्क और चौकन्ने नहीं

थे। बल्कि आज उनकी चाल में अजीब सी लड़खड़ाहट थी।

यहां का माहौल काफी बदला-बदला सा लगा जगतार को।

वह अपनी जगह बैठा चौकन्नी निगाहों से सब कुछ खामोशी के साथ देख रहा था।

एक सिपाही झाड़ी के पीछे जाता था और दूसरा आता था?

ऐसा क्या है झाड़ी के पीछे? लेकिन कुछ ही देर बाद जगतार को अनुमान लगाने में दिक्कत नहीं हुई कि दोनों सिपाही नशे में लड़खड़ा रहे हैं

और झाड़ी के पीछे जो आना-जाना लगा रखा है वहां चूंट मारने जाते हैं?

क्यों?

एक बड़ा-सा प्रश्न जगतार के दिमाग में उभर आया और साथ ही उसे खतरे का अहसास सा होने लगा।

फिर भी मामले को पूरी तरह समझने के लिए वह खामोश

बैठा देखता रहा। उसे कोई सन्देह नहीं रहा था कि आज फिर कोई गलत चक्कर चल रहा है यहां।

उसके देखते-देखते दोनों सिपाही झाड़ियों के पीछे ओझल हो गए और कुछ देर बाद दो व्यक्ति झाड़ियों के पीछे से निकलकर आए।

वे दोनों पहरेदार सिपाही नही थे। न ही वे नशे में थे। पहरेदार सिपाही झाड़ियों के पीछे ही थे। शायद नशे में बेहोश।

वह उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनकर मामले की असलियत जानने की कोशिश करता रहा।

फिर एक व्यक्ति वहीं बंगले के पास रह गया और दूसरा व्यक्ति एक ओर को चला गया।

जगतार क्षण भर के लिए दुविधा में फंस गया कि उस व्यक्ति का पीछा करे या इस बंगले वाले व्यक्ति को संभाले?

अगले ही क्षण उसने निर्णय ले लिया। उस निर्णय के साथ ही वह उस चीते की सी सावधानी और खामोशी के साथ उस व्यक्ति की ओर बढ़ा जो अपने शिकार पर झपटने ही वाला हो।

इससे पहले कि हरिया किसी तरह के खतरे का आभास पाकर सावधान हो पाता, जगतार ने छलांग मारकर उसे दबोच लिया।

उसका हाथ हरिया के मुंह पर था ताकि वह चीख न सके और गर्दन बाहों के बीच में ऐसी फंसी हुई थी कि वह जरा भी हिलने की कोशिश करता तो हड्डी चटक जाए।

'कौन है तू?' जगतार ने हरिया की गर्दन पर अपनी बाहों का

दबाव डालकर पूछा।

मुंह बन्द होने के कारण हरिया सिर्फ मिमयाकर रह गया। साथ ही उसने अपनी जेब से पिस्तौल निकालने की भी कोशिश की। जगतार ने उसकी इस हरकत को भांपा और उसे उठाकर जमीन पर पटक दिया।

गर्दन पर घुटना रखा और जेब से पिस्तौल निकालकर उसके माथे पर रखता हुआ बोला-'अब बोल।'
 
लेकिन न जाने क्या हुआ था हरिया को कि उसने एक झटके के साथ जगतार के बन्धनों से निकल जाना चाहा और जगतार ने उसे दबाए रखने के लिए अपने घुटने पर एकदम पूरा जोर डाल दिया।

कुछ देर बाद जब उसने हरिया को कोई हरकत करते न देखा तो चौंका। उसने हरिया को जांचा तो पाया कि वह मर चुका था। घुटने के अतिरिक्त दबाव ने हरिया की गर्दन तोड़कर रख दी थी।

अनजाने में ही वह सब हो गया था और जगतार जानता था कि उस पर खेद व्यक्त करने का कोई मौका नहीं है।

उसने पिस्तौल अपने कब्जे मे की और हरिया की लाश उठाकर एक ओर झाड़ियों में डाल दी।

फिर उन झाड़ियों को देखा जिनके पीछे दोनों सिपाही गायब हुए थे।

उन्हें बेहोश हालत में रस्सियों से बंधा पाया। होश में लाकर उनके बन्धन खोलने की उसने कोई कोशिश नहीं की।

वह झाड़ियों से बाहर आया बौर फिर तीब गति से उस ओर को चल दिया जिधर वह दूसरा आदमी गया था।

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कालिया ने सिगरेट का कश लिया और अपनी रेडियम डायल की कलाई घड़ी की ओर देखा।

इतनी देर? आखिर कर क्या रहे हैं वे दोनों?

वह मन हो मन बुदबुदाय और फिर बेताबी के साथ अपना दायां हाथ जीप के बोनट पर फेरने लगा। हाथ में पहने हुए बघनखे के कारण धातु से धातु ने रगड़ खाई और एक अजीब

सी आवाज उत्पन्न हुई जिससे चौंककर उसने तुरन्त ही हाथ फेरना बन्द कर दिया।

वह बंगले से काफी दूर जंगल के एकान्त स्थल पर खड़ा सन्देश मिलने का इन्जरनार कर रहा था। क्योंकि इन्तजार कर रहा था इसीलिए ऐसा भी अनुभव कर रहा था कि हरिया

और रघुबर अपने काम में कुछ ज्यादा ही देर लगा रहे हैं। जब रघुबर आता दिखाई दिया तो उसकी बेचैनी फम हुई।

उसके निकट आने पर पूछा-'काम हो गया?'

'बिल्कुल उस्ताद।' रधुबर बोला-'दोनों के दोनों पूरी तरह चित्त हो चुके हैं। किसी भी हालत में सुबह से पहने होश में नहीं आ सकते। फिर भी सावधानी के नाते उन्हें अच्छी तरह से बांध भी दिया है रस्सियों से।'

'ठीक?' उसने सन्तोष के साथ सिर हिलाया-'हरिया वहीं है?'

'हां।' वैसे तो मैंने हरिया से कहा था कि आपको तकलीफ देने की कोई जरूरत नहीं है। मैदान बिल्कुल साफ पड़ा है। मैं ही उस फारेस्ट आफिसर के बच्चे को बाहर निकालकर ऊपर भेज देता।'

'नहीं, यह काम मैं ही करूंगा।'

कालिया ने सिगरेट का अन्तिम कश लेकर अपने जूते से कुचला और फिर बंगले की ओर बढ़ गया।

रघुबर उसके पीछे-पीछे था।

अभी उन्होंने बंगले तक का आधा रास्ता ही तय किया था कि तभी अपने पीछे कुछ अजीब सी आवाज सुनकर कालिया एकदम घूम गया। देखा कि रघुबर जमीन पर बेहोश पड़ा हुआ है और एक आदमी उसकी ओर पिस्तौल ताने हुए कह रहा था-'खबरदार, ज्यादा होशियार बनने की कोशिश की तो गोलियों से शरीर छलनी कर दूंगा।'

जगतार अभी आधे रास्ते में ही था कि तभी उसे खूछ आदमियों के आने की आहट सुनाई दी। वह तुरन्त ही पास के एक मोटे तने वाले पेड़ की आड़ में हो गया।

कुल दो व्यक्ति हैं-सोचा उसने? इन दो को सम्भालना तो कुछ ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। स्थिति कुछ ज्यादा विषम नहीं है।

वह बिल्ली की तरह दबे पांव आगे बढ़ा और कालिया के पीछे जाते हुए रघुबर के सिर पर पिस्तौल के दस्ते की ऐसी खतरनाक चोट जमाई कि वह तुरन्त ही कटे पेड़ की तरह गिर पड़ा। मुंह से कोई आवाज तक न निकाल सका वह।

उसके गिरते न गिरते ही कालिया एकदम पलटा मगर तब तक जगतार उसे अपनी पिस्तौल के निशाने पर ले चुका था।

खामोश निगाहों से कालिया ने उसका ऊपर से नीचे तक निरीक्षण किया और फिर अपनी आवाज को यथा-सम्भव स्थिर रखने की कोशिश करते हुए उसने पूछा

'कौन है तू?' 'तू इस बक्त सवाल पूछने की स्थिति में नहीं है।' जगतार उसे पिस्तौल। के निशाने पर रखता हुआ बोला-'सवाल मैं पूछंगा

और जवाब तू देगा। बता तू कौन है और यहां क्या कर रहा है?'

अंधेरे के बावजूद भी कालिया ने उसे पहचान ही सिया। साधना और जमतार की जो फोटो हरिया और रघुबर ने उसे दिखाई थी, उससे ही मिलता-जुलता हुलिया मजर आया था उसे।

बोला-'तू जगतार है ना?'

'ठीक पहचाना और तू?' शायद कालिया है?' 'पहचाना हे ना मुझे?' 'देखा पहली बार है लेकिन नाम इससे पहले सुन चुका हूं।' 'शायद इस इलाके में नया-नया आया है जो मुझे इससे पहले नहीं देखा।' कालिया उसे आंखों से तौलता हुआ बोला-'कहां से आया है?'

'जेल से।'

'ओह।' कालिया ने समझदारी के साथ गर्दन हिलाई-'छूटकर या भागकर?'

'फेर तो ठीक जगह आया है तू।' कालिया ने धीरे से हंसकर कहा। साथ ही अपने तने हुए शरीर को ढीला छोड़ता हुआ बोला-'अब फिकर मतकर। जब कालिया के इलाके में आ गया है तो उसका शरणागत है तू। अब कोई तेरा बाल बांका

भी नही कर सकता। अब जा यहां से। कल सुबह मुझे मिलिये। कोई-न-कोई इन्तजाम करवा देगा।'

'मगर तुम कहां चले कालिया सेठ।' 'अब फालतू बातें करके वक्त खराब मत कर। अभी मुझे जरूरी काम निपटाने दे।'

'हम भी तो सुने वह जरूरी काम क्या है?'

कालिया अप्रसन्नता सी व्यक्त करता हुआ बोला-'देख पिछली बार तूने इस फारेस्ट आफिसर वाले मामले में मेरे आदमियों पर हाथ उठा दिया था। जानता हूं ऐसा अनजाने में हुआ होगा। इसलिए वो कसूर तेरा माफ कर दिया मैंने। अब इस वक्त मेरे काम में टांग अड़ाई तो बहुत बुरा होगा तेरे लिए।' 'बुरा तो तुम्हारे लिए होगा कालिया सेठ, अगर तुम यहीं से

वापिस नहीं लौट गए तो।'

यह तू बोल रहा है या फारेस्ट आफिसर की बहन का इश्क?' कालिया ने क्रोध मे आकर कहा।
 
जगतार का इस तरह बीच में कूदकर टाईम खराब करना उसे उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त था।

'जो कुछ भी बोल रहा है उसकी आवाज अच्छी तरह से सुन लो।' जगतार एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला-'तुमने या तुम्हारे आदमियों ने इस बंगले को तरफ आंख उठाकर देखने की कोशिश भी की तो मैं तुम्हारी ईट से ईट बजा दूंगा।' 'तुम मुझे धमकी दे रहे हो?'

'नहीं।' जगतार मुस्करा कर बोला-'दोस्ताना सलाह दे रहा हूं।'

'मैं तुम्हारे बारे में पुलिस को खबर कर दूंगा।'

'बड़े भोलो हो कालिया सेठ। पुलिस जब मुझे जेल में ही पकड़कर न रख सकी तो इस जंगल में तो क्या पकड़ पाएगी। तुम्हारी बेहतरी इसी में है कि जिस रास्ते से आए हो

चुपचाप उसी रास्ते से वापिस लौट जाओ।'

कालिया ने लाचारी से अपने कंधों को झटका दिया और फिर वापिस लौटता हुआ वह बोला-'मेरी दुश्मनी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी तुम्हें...।'

और जगतार के पास से गुजरते हुए अचानक ही...| उसका वांया हाथ जगतार के पिस्तौल वाले हाथ पर पड़ा

और बाएं हाथ का झपट्टा जगतार की दूसरी बांह पर पड़ा। खाल समेत नुचता चला गया और उसके साथ कमीज का वह हिस्सा भी फटकर खून के साथ भीगता हुआ अलग हो यया।

पिस्तौलै वाले हाथ पर हाथ मारने के बावजूद भी जगतार के हाथ से पिस्तौल न निकली थी।

कालिया के उस अप्रत्याशित आक्रमण से वह हतप्रभ-सा तो रह गया था किन्तु फिर भी उसने फायर किया। एड़ियों पर घूमता हुआ कालिया गोली को वचा गया। साथ ही उसने जगतार की गरदन पर झपट्टा मारा। जगतार को लगा जैसे किसी शिकारी जानवर का मजबूत पंजा उसकी गरदन पर पड़ा हो और गरदन से मांस नुचता चला गया।

इस बार भी पिस्तौल उसके हाथ से न निकल पाई।

फिर भी जगतार पीछे को हटा। खून उसके घावों से किसी तेजधार झरने की तरह उबलता हुआ-सा बहने लगा था। उसने फिर से पिस्तौल का निशाना लेना चाहा।

लेकिन तब तक कालिया फिर से उस पर झपट चुका था।

इस बार जगतार ने उसके दाएं हाथ को कलाई से पकड़ लिया। कालिया ने अपने दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल बाले हाथ की कलाई थाम ली थी।

जगतार ने ट्रिगर दबाया। पिस्तौल का निशाना कहीं और था। इसलिए गोली कालिया को कोई नुकसान पहुंचाए बिना जंगल के अंधेरे में कहीं खो गई।

दोनों एक-दूसरे से क्रुद्ध सांडों की तरह जूझ रहे थे।

जगतार ने कालियों की टांगों के जोड़ पर अपने घुटने की चोट की। लेकिन उसने खुद महसूस किया कि उसकी चोट में कोई दम नहीं है। शायद निरन्तर बहते हुए खून के कारण यह अपने आपको कालिया के मुकाबले कुछ कमजोर-सा होता महसूस कर रहा था।

फिर भी वह अपनी समस्त शक्ति के साथ उसके दाएं हाथ की कलाई पकड़े हुए था। उसकी समझ में न आया था कि कालिया के हाथ में ऐसी क्या चीज है जिससे वह इतने खतरनाक बार करने में समर्थ हुआ था। लेकिन वह इतना जरूर जानता था कि वह बहुत ही खतरनाक चीज है जिसके ब्लेड जैसे तेज धार और पैने आघातों से कालिया उसे चीर-फाड़कर बराबर कर देगा।

इसलिए वह प्राणपण से उसके दाएं हाथ की कलाई को मजबूती से पकड़े हुए उसे अपने से दूर रखने की कोशिश कर रहा था।

आखिर कालिय ने उमे गिरा लिया।

दोनों में जबर्दस्त गुत्थम-गुत्था हो रही थी। कभी वह ऊपर कभी वह नीचे। दोनों ही अपने-अपने हथियारों से सम्पन्न हाथों को एक-दूसरे की पकड़ से छुड़ा लेना चाहते थे।

दो खतरनाक जानवर उस भयानक मृत्यु-संघर्ष में प्राणपण से जूझ रहे थे।

कालिया की मजबूत उंगलियां उसके पिस्तौल वाले हाथ की कलाई पर कसी हुई थीं। और जगतार अपनी समस्त शक्ति से कालिया के उस खतरनाक दाहिने हाथ को अपने से दूर रखने की चेष्टा में लया हुआ था।

लेकिन लगातार बहते हुए खून के कारन निरन्तर क्षीण होती हुई शक्ति जगतार को यह सोचने पर मजबूर कर रही थी कि आखिर वह कब तक कालिया के उस हाथ को रोके रहेगा। उसने कालिया के नीचे दबे-दबे ही अपने घुटनों की चोट उसकी टांगों के जोड़ पर मारनी शुरू की। लेकिन कालिया पर उसका कोई असर नहीं हो रहा था। जगतार को खुद महसूस हो रहा था कि उसकी चोटों में कोई जान नहीं है। वह निरन्तर कमजोर होता जा रहा था। इसके वावजुद भी वह सुनार की ठक-सी किए जा रहा था। हालांकि इस बारे में भी उस कोई शक नहीं था कि कई क्षण जा रहा है जब कालिया लुहार की एक पड़ेगी और फिर सबकुछ खत्म हो जाएगा।

वह नहीं जानता कि वह उसकी ठुक-ठुक का परिणाम था या कुछ और जगतार को अपनी कलाई पर कालिया की पसीने से भीगी हुई उंगलियां कुछ ढीली पड़ती-सी महसूस हुई। उसके साथ ही जगतार के भीतर विस्फोट-सा हुभा-उसके कमजोर होते हुए शरीर में शक्ति का अन्तिम विस्फोट।

वह झटके-से अपना पिस्तौल वाला हाथ कालिया के पेट के निकट ले आया और कमजोर पड़ती उंगलियों से ट्रिगर खीच दिया। और गले से अजीब-सी आगज निकालता हुआ

कालिया किसी आलू के बोरे की तरह उस पर से लुढ़क गया।

अपने ही खून से लथपथ जगतार एक झटके के साथ उठकर खड़ा हो गया। धुंधलाती हुई दृष्टि से उसने देखा कि कालिया दोनों हाथों से अपना पेट पकड़ हुए गुड-मुड-सा पड़ा है।

बंगले की ओर से आवाजें-सी आती सुनाई दी।

गरदन घुमाई। घुमाने में तकलीफ हुई। कुछ स्पष्ट नजर नहीं आया। रात का अंधेरा और भी अधिक काला होता जा रहा था। नजर धुंधलाए चली बा रही थी। फिर भीए उसने देखा दो जने थे। उनमें एक शायद औरत थी।

साधना?

तभी कालिया कुछ हरकत-सी करता हुआ लगा। उसने पिस्तौल का रुख तुरन्त सकी ओर कर दिया। मगर उंगलियों में अब उसे पकड़े रहने की ताकत नहीं बची थी। अपने आप ही स्तिः ऐल उसके हाथ से निकलकर जमीन पर गिर गई।

उसके साथ ही चकराकर वह भी गिर गया।

कुछ अस्पष्ट-सी आवायें सुनाई थी. एक घुटी-पूटी चीख-सी। फिर किसी की कोमल उंगलियों का स्पर्श।

कोमल उंगलियों ने उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया।

'केशो, जल्दी से दौड़कर जीप तो ले आ भइया?'

साधना का स्वर।

उसकी साधना का स्वर।

एक स्वर्गिक शान्ति का-सा अनुभव किया। खुरदरे होंठों पर सन्तोष की मुस्कान ने मचलने की एक असफल कोशिश की।

उसे लगा कि साधना का स्वर कहीं दूर बहुत दूर विलीन-सा होता जा रहा है और वह उसे पकड़ने के लिए उसे आवाजें देता हुआ दौड़ा चला जा रहा है-उसके पीछे।

अजीब-सी आवाजें जो मधु मक्खियों की भिनभिनाहट सरीखी लग रही थी। धीरे से आंखें खोलीं। एक धुंधलाए से बेचैन चेहरे को अपनी ओर ताकते पाया।

साधना?

हां, साधना ही थी वह।

दश्य कुछ और साफ हुआ। उसके निकट खड़ा केसरी भी दिखाई दिया। दो सफेद-सी वर्दियों भी। शायद डाक्टर और

नर्स थे। वही तो थे।

तो हास्पिटल में है वह।

'कैसा महमूस कर रहे हो?' उसके पट्टियों बंधे सरीर पर धीरे

से हाथ डुलाते हुए पूछा साधना ने। कितना सुखद और सन्तोषदायक था उसके हाथ का वह स्यर्श।

'ठीक हूं।'

'बोलने में दर्द हुआ था जैसे सारे गले की नसें सूज-सी गई हों। मगर फिर भी उसे इस बात का सन्तोष था कि वह बोल सकता था। उससे भी ज्यादा सन्तोष इस बात का था कि वह

जीवित है।

'रात को वह सब हंगामा अकेले ही कर बैठे?' केसरी आगे को झुकता हुआ बोला -'कम-से-कम मुझे ही जगा लिया होता?'

'इसका मौका न था।' वह अवीब-सी आवाज में बोला। फिर प्रश्न-सा किया-'कालिया?'

'वह भी बचा लिया गया है?' केसरी बोला-'गोलियों की

आवाजों ने हमें चौंका दिया था। बाहर निकलकर देखातो पहरेदार भी नहीं था। कुछ समझ में न आया। तभी गोली की आवाज फिर सुनाई दी। तुम्हारी तरफ दौड़कर पहुंचे। जब तक तुम्हारे निकट पहुंचते तब तक तुम चक्कर खाकर गिर पड़े थे। दीदी ने मुझे फौरन जीप लाने के लिए कहा। फटाफट तुम्हें और कालिया को जीप में डालकर यहां लाए। डाक्टरों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया तुम लोगों को बचाने के लिए।'

'वह भी यहीं है?' पूछा जगतार ने।

'हां इसी मंजिल पर आखिरी वाला कमरा उसका है।' केसरी बोला-'लेकिन अब पुलिस के चंगुल से न बच सकेगा। खून से रंगा बघनखा उसके हाथ में था। साफ जाहिर है कि पिछले फारेस्ट आफिसर को भी किसी जानवर ने नहीं बल्कि इसी कालिया ने मारा था अपने इस बधनखे से, तुम्हें भी तो किसी जानवर की तरह ही नोंच डाला है उसने। शुक्र है कि चेहरा बच गया।'

लेकिन जगतार उसकी बात नहीं सुन रहा था। वह तो साधना के उदास चेहरे को देखे जा रहा था। न जाने क्यों उस चेहरे को देखकर एक अजीब सकून-सा मिल रहा था।

'लेकिन कालिया का भाई हरिया भी तो मारा गया है।'

'उसने केसरी को कहते सुना।

'उसे किसने मारा?'

'मैंने मारा है।'

'यह तुमने मलत किया?'

'मैंने उसे जानबूझकर नहीं मारा। न मेरा इरादा उसे मारने का

था। बस हाथापाई में मारा गया।'

तभी एक पुलिस अधिकारी ने वहां प्रवेश किया। उसके साथ दो सिपाही भी थे।

'यह भीड़ कैसी लगा रखी है आप लोगों ने?' वह आते ही बोला। फिर केसरी की ओर उन्मुख होकर उसने कहा-'चलीए

आप लोग बाहर चलिए।'

केसरी बाहर जाने को हुआ। लेकिन साधना वहीं बैठी रही तो पुलिस अधिकारी उससे भी बोला-'मेहरबानी करके आप भी बाहर चलिए।'

'इन्हें मेरे पास ही रहने दीजिए।' जगतार कमजोर-सी

आवाज में बोला।

'अभी नहीं बाद में।' पुलिस अधिकारी बोला-'पहले तुम्हारी

घेराबन्दी कर लें हम लोग।'

केसरी और साधना बाहर आ गए। भ्रमित-सी साधना दरवाजे के पास ही ठिठककर खड़ी हो गई।

'घर चलो दीदी।' केसरी बोला-'यहां रुकने से कोई फायदा नहीं। पुलिस अब हमें उसके पास नहीं जाने देगी।' 'मैं यहीं रहूंगी।' साधना ने कहा और दरवाजे के निकट ही दीवाल के साथ बनी एक बैंच पर बैठ गई।
 
'मृग तृष्णा के पीछे भागने से कोई फायदा नहीं है दीदी।' केसरी उसे समझाने के ढंग में बोला-मानता हूं जगतार के अहसान हैं हम पर। उसने मेरी जान बचाई है। मगर यह क्यों भूलती हो कि वह जेल से भागा हुआ कैदी है। फिर हरिया की भी हत्या कर दी है उसने। मौत के चंगुल से तो तुम्हारी प्रार्थनाएं उसे बचा लाई। लेकिन पुलिस के चंगुल से उसे कोई नहीं बचा सकेगा। तुम्हारी प्रार्थना भी नहीं।' 'मेरा भाग्य जैसा भी है उसे मैं स्वीकार कर चुक हू केशो।' साधना ने दढू और स्थिर स्वर में कहा-'यह भाग्य नहीं तो और क्या हैं कि हम लोगों की लड़ाई उनकी लड़ाई बन गई। हमारा नुकसान वो सह रहे हैं? आखिर क्यों?'

इसका कोई जवाब केसरी के पास नहीं था। होता भी तो देने का कोई फायदा नहीं था। क्योंकि वह जानता था कि उसकी दीदी के निश्चय को सारी दुनिया के जवाब भी मिलकर नहीं बदल सकते थे।

लाचारी के साथ हइ हास्पिटल के उस गलियारे में इधर से उधर नजरें दौड़ाने लगा।

तभी रधुबर वहा से गुजरा।

केसरी जानता था कि वह कालिया का आदमी है। उसे भी तो कल रात बेहोशी की हालत में जीप में डालकर हास्पिटल लाया था वह। लेकिन कोई ज्यादा चोट भी नहीं आई थी उसे। वस सिर में एक मामूली-सा जख्म आया था। इसलिए प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस उसे अपने साथ ले गई थी।

उसका बयान लेने के लिए। कालिया के कमरे की ओर जाते हुए रघुबर को देखते हुए केसरी सोचता रहा कि पुलिस ने छोड़ दिया इसे। तभी उसने किसी को कहते सुना-'रात जो कुछ घटा उसका मुझे बड़ा अफसोस है मिस्टर केसरी।'

उसने चौंककर सर घुमाया। मेयर खड़ा था उसके निकट।

'आखिर तुमने मेरी बात नहीं मानी।' हास्पिटल में कालिया के पलंग के पास बैठे हुए जगन सेठ ने कहा-'नतीजा देख लिया उसका? खुद भी मरते-मरते बचे और हम सबको भी मुसीबत में डाल दिया।'

'तुम्हीं कहा करते थे जगन सेठ कि आदमी को मुसीबत से नहीं घबराना चाहिए।' कालिया बोला-'सो कालिया न तो

आज तक कभी मुसीबतों से धबराया है और न आगे कभी धबराने वाला है। वैसे क्या मैं जान सकता हूं कि तुम्हें मैंने किस मुसीबत में डाल दिया है?'

जगन सेठ को कालिया का स्वर पसन्द नहीं आया था। फिर भी अपने आपको संयत रखते हुए कहा-'तुम्हें मालूम है कि वह बधनखा खून से लथपथ तुम्हारे हाथ में था। बघनखे ने पिछले फारेस्ट आफिसैर की मौत पर से परदा उठा दिया है। दोनों सिपाहियों का बयान है कि हरिया और रघुबर ने उन्हें शराब पिलाकर बेहोश किया था। बची हुई शराब की पुलिस ने जांच करके देख ली है। उसमें बेहोशी की दवा मिली हुई थी। चारों ओर से फंसे पड़े हो तुम?'

'मैं चारों ओर से फैमा पड़ा हूं।' कालिया जगन सेठ को घूरता हुआ बोला-'और तूम लोन साफ बचे हुए हो।'

'तुम्हारे साथ तो हम भी घिर रहे हैं।' जगन सेठ बोला- अब उस मेयर की बन आएगी। मैंने अच्छी भली उसकी नाक में नकेल डाल दी थी लेकिन तुम्हारी इस बेवकूफी की वजह से...।'

'देखो जगन सेठ यह बेकार की पालिटिक्स मुझसे तो चलो मत।' कालिया उसकी बात काटता हुआ बोला-अगर पुलिस इस सारे मामले को दबा नहीं सकती तो फिर उस पुलिस कमिश्नर को बराबर का हिस्सा देते रहने का हमे फायदा क्या है?'

'तुम क्या समझते हो कि पुलिस तुम्हारी इस तरह की

खुलेआम गुंडागर्दी को बर्दाश्त करती रहेगी?' 'मैं खुलेआम गुंडागर्दी कर रहा हूं? उस फारेस्ट आफिसर के बच्चे ने मेरे मुंह पर थप्पड़ मारा, तम्हारे कहने पर मैं चुप रहा। वह चौराहे पर मुझे मेरे भाई को पीट गया तुम्हारी वजह से मैं फिर भी चुप रहा और फिर भी तुम कह रहे हो कि मैं

खुलेआम गुंडागर्दी कर रहा हूं। कान लिकर सुन लो जगन सेठ कालिया बहुत बर्दाश्त कर चुका है। अब और बर्दाश्त नहीं करेगा।'

'ज्यादा जोर से मत बोलो।' जगन से ने उसे चेताया-'बरना पेट के जख्मों से खून बहने लगेगा।'

'अब खून बहने की चिन्ता नहीं है जगन सेठ, जितना चाहे मरजी खन वह जाए। लेकिन कालिया का कलेजा तब तक ठंडा नहीं होगा जब तक कि वह अपने भाई की मौत

का अपने अपमान का बदला नहीं ले लेगा।'

कालिया की बे-सिर पैर की ब'तों ने जगन सेठ को खिन्न कर दिया था। फिर भी वोला -'तुम्हारा दिमाग अभी ठिकाने नहीं है। फिलहाल आराम करो मैं फिर आऊंगा।'

'बैठ जाओ जगन सेठ।' कालिया अधिकारपूर्ण स्वर में बोला-'आब तक कालिया तुम्हारी सुनता रहा है आज तुम कालिया की सुनो।'
 
जगन सेठ ने चौंककर कालिया की ओर देखा। उसे उसकी आंखों मे एक यहशियाना सी चमक दिखाई दी। ऐसी चमक जो किसी पागल की ही आंखों में दिखाई दे सकती थी।

'सबसे पहले तो मुझे जगतार की मौत चाहिए।'

'पागल हो मए हो क्या?' जगन सेठ ने एकदम उछलकर कहा-'वैसे मी उसे मारने से फायदा क्या है। अधमरा वह वैसे ही है। जेल से भागा हुआ है वहां की पुलिस को खबर कर दी है। वह आ चुकी होगो या आने वाली होगी। अब उसकी सारी जिन्दगी जेल म चक्की पीसते हुए ही बीतेगी।'

'मुझे उससे चक्की नहीं पिसवानी है।' कालिया अपने एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला-'मुझे उसकी मौत

चाहिए।'

'होश की दवा करो कालिया।' जगन सेठ ने कड़े स्बर में

कहा-'जिस काम को करने से कोई फायदा नहीं उसे करने की क्या जरूरत है। जगतार खुद कानून की उलझनों में इतना उलझा पड़ा है कि अब वह जिन्दगी भर जेल के बाहर की दुनिया नहीं देख सकेगा। हो सका तो हरिया के कत्ल के जुर्म में उसे फांसी पर ही चढ़वा दूंगा मैं।' 'कह चुके या कुछ और भी कहना है?'

'देखो कालिया।' जगन सेठ ने उसे समझाने के से ढंग में कहा-'स्थिति इतनी बिगड़ चकी है कि में तुम्हें बता नहीं सकता। लेकिन मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं कि मैं इसे सम्हाल लूंगा। तुम सिर्फ मेरी इतनी मदद करो कि यहां चुपचाप पड़े हुए तन्दुरुस्त होते रहो। बाकी सब मुझ पर छोड़ दो।'

'और कुछ?' 'बस फिलहाल के लिए इतना ही काफी है।'

'तो अब मेरी सुन लो।' कालिया बोला-'सारे मामले को जैसे तुम सम्हालना चाहो सम्हाल सकते हो। लेकिन रही जगतार की बात तो न मुझे उससे जेल में चक्की पिसवानी है न उसे फांसी के फंदे पर चढ़वाना है। उसने मेरे भाई को मारा है और अपने भाई की मौत का बदला लेना कालिया का धर्म है, कर्ज हैं। इसलिए मुझे जगतार की मौत चाहिए।'

जगन सेठ ने कालिया को घूरा।

'मुझे इतनी बात तुमसे कहने की जरूरत भी नहीं पड़ती

लेकिन भैरो इन दिनों तुम्हारे कहने में जरा ज्यादा चल रहा है

और मैं धायल होने की वजह से भैरों के बिना यह काम नहीं कर सकता। मुझे जगतार की मौत चाहिए जगन सेठ।

'तुम्हारा तो दिमाग मूम गया लगता है कालिया। जगन सेठ ने

शुष्क स्वर में कहा-'पहले तुम्हें उस फारेस्ट आफिसर का बुखार सा चढ़ा था, अब जगतार की गरदन पढ़ रहे हो। मेरी राय मानो और सब कुछ भूल-भाल कर कुछ दिन आराम करो।'

'मुझे बातों से बहलाने की कोशिश मत करो जगन सेठ। फारेस्ट आफिसर का तुम जो चाहे मरजी करो। लेकिन जगतार की मौत के बाद। वरना।'

'वरना क्या?'

'वरना मेरे सीने में जो बदले की आग धधक रही है उसमें मेरा क्या होगा इसकी मुझे अब कोई परवाह नहीं रही है। लेकिन अगर जगतार की मौत मुझे नहीं मिली तो उसमें तुम सब भी जलकर राख हो जाओगे।'

'मतलब?' तिरछी नजरों से देखा जगन सेठ ने।

'मतलब यही कि कालिया तुम्हारी और उस पलिस कमिश्नर की सबकी पोल खोल कर रख देगा।' कालिया बोला-'तुम्हीं कहा करते थे जगन सेठ कि इस दुनिया में हर चीज की कीमत होती है। आज कालिया अपनी दोस्ती की कीमत मांग रहा है। नुझे वह दे दो और कालिया हमेशा की तरह तुम्हारा गुलाम बना रहेगा।'

जगन सेठ को कोई शक नहीं रहा कि कालिया वाकई पागलसा हो गया है। फिर भी अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए उसने कहा-'तुम्हारी भावनाओं को मैं समझ रहा हूं कालिया। भाई की मौत में तुम्हें इतना दुखी कर दिया है कि फिलहाल तुम सही ढंग से सोच नहीं पा रहे। लेकिन तुम्हारी

दोस्ती मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज है। तुम कहते हो तो जगतार की मौत तुम्हें मिल जाएगी। लेकिन इसेके लिए कुछ दिन इन्तजार करना पड़ेगा तुम्हें।'

'कितने दिन?'

'काम तो पहले ही हो जाएगा। लेकिन फिर भी दो-तीन दिन

का वक्त तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।' 'मंजूर है।' तभी रघुवर ने वहां प्रवेश किया।

उसे इधकके ही जैसे जनन सेठ को कुछ याद आया।'

बोला-'और हां, वह उस फारेस्ट आफिसर की बहन से फोटोग्राफ थे तुम्हारे पास।'

'हां।'

'उन्हें जरा मेरे पास भिजवा दो फौरन।' जगन सेठ बोला-'शायद वे ही इस मुसीवत से निकलने में हमारी कुछ मदद कर सके। मैं यहां से सीधा अपने आफिस ही जा रहा

जगन सेठ के जाने के बाद कालिया ने रघुबर को बुलाया और अलमारी की चाबी देता हुआ बोला-'अलमारी में से वे फोटो निकाल कर जगन सेठ के आफिस में दे देना।'
 
'हर बुराई में कोई न कोई अच्छाई होती है मिस्टर केसरी।'। मेयर कह रहा था उससे-'रात जो कुछ भी घटा उसे किसी भी रूप में सही तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन मुझे यह लगता है कि दुश्मन की यह बेककूफी हमारे लिए फायदेमंद ही साबित होगी। लोगों को इस घटना का पता तो लग गया है लेकिन अखबारों में कोई खबर इसके बारे में न होने के कारण कोई खास सनसनाती सी नहीं फैली है। मैं आज शाम को ही एक प्रेस कांफ्रेस बुला रहा हूं। उसमें आप अपना बयान दीजिए। फिर देखिए कल क्या हंगामा मचता है।' वे लोग गलियारे की एक दीवार के साथ खड़े हुए बातचीत कर रहे थे। मेयर उसे समझा रहा था कि किस तरह कालिया के इस शर्मनाक हमले का प्रसारण अखबारों के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए कि वह कालिया और उसके साथियों के अत्याचारों के प्रति उत्तेजित हो उठे।

केसरी अनमने ढंग से ही उसकी बात सुन रहा था। अब उसे मेयर और उसकी जनता की शक्ति में कोई खास विश्वास नहीं रह गया था। लेकिन बह यह भी जानता था कि इस अनजान शहर में केवल वही एक उसका हितचिंतक था। इसलिए स्पष्ट उपेक्षा भी नहीं दिखा सकता था।

वे लोग बात कर रहे कि तभी केसरी ने एक स्थूलकाय व्यक्ति को कालिया के कक्ष से बाहर निकलते देखा। केसरी उसे पहचानता नहीं था। लेकिन कालिया के किसी भी परिचित के लिए उसके दिल में कोई अच्छी भावना उदय होने की सम्भावना नहीं थी।

उस व्यक्ति ने उन दोनों को देखा और फिर निकट गुजरते हुए थोड़ा रुककर बोला-'कहिए शर्माजी क्या हाल है अगर मैं गलती नहीं कर रहा तो आप नये फारेस्ट आफिसर मिस्टर केसरी हैं?'

'सही पहचाना है आपने।'

'मुझे जगन सेठ कहते हैं।' अपना कार्ड निकालकर उसे देते हुए जगन सेठ ने कहा-'अगर आज मौका निकालकर मुझसे मेरे आफिस में मिल लेगे तो मुझे बड़ी खुशी होगी।'

जगन सेठ के जाने के बाद मेयर ने उससे कहा-'जरूर मिल लेना इससे। पता तो चले कि क्या कहना चाहता है।'

'कमिश्नर साहब, नमस्कार जगन सेठ बोल रहा हूं।'

अपने आफिस में पहुंचते ही जगन सेठ ने पुलिस कमिश्नर को फोन किया-'अभी-अभी कालिया से मिलकर आ रहा हूं।' 'क्या हाल हैं उसके।' दूसरी ओर से पुलिस कमिश्नर की

आवाज आई-'आपने कहा नहीं कि यह क्या बेवकूफियां करता फिर रहा है वह।'

'बहुत कुछ कहा है उसे और उसने भी वह कुछ कह दिया जो

उसे नहीं कहना चाहिए था।'

'मैं कुछ समझा नही।' 'फोन पर सारी बातें नहीं की जा सकतीं। अगर आप मेरे

आफिस में आ जाएं तो बड़ी मेहरबानी होगी।'

'अभी?'

'जी हां।' जगन सेठ ने गम्भीर स्वर में कहा-'क्योंकि इसे आवश्यक से भी अत्यधिक आवश्यक काम समझिए।'

पुलिस कमिश्नर ने वहां पहुंचने में देर न लगाई।

'कालिया क्या पागल हो गया हैं।' सारी बात सुनने के बाद

पुलिस कमिश्नर ने कहा।

'बस ऐसा ही समझिए।'

'जगतार के साथ कुछ भी करना असम्भव है जगन सेठ। पुलिस कमिश्नर ने कहा-'बह इस वक्त बाहर की पुलिस कं

निगरानी में है। मैंने रात ही खबर भिजवा दी थी कि जेल से फरा धह कैदी यहां हास्पिटल में मौजूद है। वे लोग आ गए हैं

और उन्होंने उसके कमरे के गिर्द अपना पहरा लगा दिया है। यह न भी होता तो भी भ्या उसे मार देना आसान था। अगर स्वस्थ होता तब तो चलो यह कहकर मरवा दिया जाता कि भागने की कोशिश कर रहा था या मुठभेड़ में मारा गया। मगर ऐसी हालत में असम्भव उसके हाथ भी लगाया तो लेने के देने पड़ जाएंगें। आप समम रहे हैं ना मेरी बात को।' 'मैं तो समझ रहा हूं। लेकिन कालिया समझे तब ना?'
 
'उसे आपको समझाना पड़ेगा कि वह जो कुछ कह रहा है, सब पागलपन की बातें हैं।'

'वह समझने समझाने की स्थिति से बहुत दूर निकल चुका है।' जगन सेठ ने मेज पर रखा पेपरवेट घुमाते हुए कहा-'अब तो उसका सिर्फ एक ही इलाज बाकी रह गया है।'

पुलिस कमिश्नर ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से जगन सेठ की ओर देखा।

'वही इलाज जो पागल कुत्तों के साथ किया जाता है।'

'यानि?'

'कालिया को खत्म करना होगा।' जगन सेठ ने निर्णायक स्वर में कहा।

पुलिस कमिश्नर ने फिर अपनी सवालिया नजरें ऊंची की।

'इस परिस्थिति से निकलने का और कोई चारा नही है।'

जगन सेठ ने कहा-'कालिया अब जरूरत से ज्यादा ही अपनी मनमानी करने लगा है। इसलिए वह हम लोगों का सहायक बनने की बजाए अब जिम्मेदारी बन गया है। और अब जबकि उसने खुलेआम ब्लैकमेल करने की धमकी दी है तो उसकी उपयोगिता हमारे लिए बिलकुल ही खत्म हो जाती है। अगर इस मौके पर चूक गए तो कल को वह फिर हमारी नकेल अपने हाथों में थामने की कोशिश करेगा।'

'तो क्या सोचा है?'

'बता चुका हूं तुम्हें अपना निर्णय।' जगन सेठ ने कहा-'उसे खत्म करना ही होगा।'

'कहीं बाद में उसके आदमी कोई गुलगपाड़ा करने की न कोशिश करें।'

'इसकी अब कोई गुंजाईश नहीं रही है।' जगन सेठ ने मेंज पर शीशे के पेपरवेट को घुमाते हुए कहा-'उसका भाई हरिया मारा ही गया है और मैरी मेरे कब्जे में है। फिर गुलगपाड़ा मचाने वाला रह ही कौन जाता है। कोई इक्का-दुक्का होगा भी तो उसे सम्हाल ही लेंगे। बस आपको एक काम करना होगा।'

'मुझे तो फिलहाल इस मामले से दूर रखें तो ज्यादा अच्छा हैं।' पुलिस कमिश्नर ने कहा-'इस समय उस जगतार के चक्कर में बाहर से पुलिस के अधिकारी आए हुए हैं। इस सारे मामले को आप ही निबटा लें तो ज्यादा अच्छा है। वे लोग यहां से जगतार को लेकर चले बाएं तो देखा जाएगा। मेरा ख्याल है कि उन लोगों के जाने तक आप भी खामोश रहें तो ज्यादा अच्छा दै।'

'नहीं। वे लोग जगतार को यहां से नहीं ले जाने पाएंगें।'

'क्या मतलब?'

'बताता हूं। बस यह समझ लीजिए कि आपको सिर्फ एक

काम करना है। बाकी सब मैं सम्हाल लूंगा।'

'और वह काम क्या है?'

'जगतार तक किसी तरह यह खबर पहुंचानी है कि अगर वह भागना चाहता है तो इन्तजाम किया जा सकता है।'

तभी चपरासी ने रघुबर के आने की सूचना दी।

जगन सेठ ने उसे अन्दर भेजने के लिए कहा।

रघुबर ने भीतर आकर दोनों को सलाम किया और फिर एक बड़ा सा लिफाफा उसकी ओर बढ़ाता हुझ। बोला-'उस्ताद ने यह भिजवाया है।'

जगन सेठ ने लिफाफा खोला और उसके भीतर रखे सामान

को एक झलक देखने के बाद उसे मेंब की दराज में रखते हुए कहा-'ठीक हे। तुम जाओ।'

रघुबर के जाने के बाद कमिश्नर ने पूछा-'यह क्या है।' 'यह उस फारेस्ट आफिसर के नाक की नकेल है।' जगन सेठ ने कहा-'आपको इतने से काम के लिए भी नहीं कहता। लेकिन जैसा कि आपने बताया कि जंगल के इर्द-गिर्द बाहर की पुलिस ने पहरा लगा रखा है। इसलिए इस काम के लिए आपको तकलीफ दे रहा हूं।'

'लेकिन जगतार को भगाने से क्या फायदा?'

'उससे यह सारी मुसीबत चुटकियों में निबट जाएगी और हम लोगों की तरफ किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा।'

'जगतार भागने के लिए तैयार हो जाएगा तो हम उसकी

भागने में मदद करेंगे। हुआ तो उसे छुपाने के लिए जगह भी दे देंगे। जिस रात जगतार भागेगा उसी रात कालिया का काम करवा दिया जाएगा। लोग यही समझेंगे कि जगतार ने अपना अधूरा काम पूरा किया और भाग निकला।'

'लेकिन जगतार क्या भागने के लिए तैयार हो जाएगा?'

'क्यों उसे क्या परेशानी होगी। जो आदमी जेल तोड़कर भाग सकता है वह यहां पुलिस के कब्जे से नहीं भागना चाहेगा?' 'लेकिन बाद में अगर जगतार ने हमारे लिए सिरदर्द बनने की कोशिश की।'

'अगर ऐसा हुआ तो आपका नाम अखबारों में छप जाएगा कि आपने जगतार को घेरने की कोशिश की। उसने मुकाबला किया और मारा गया।'

पुलिस कमिश्नर और भी देर तक जगन सेठ से बात करता रहा, जब उठा तो पूर्ण प्रसन्न था।

मुस्कराकर हाथ मिलाता हुआ बोला-'आपकी अक्ल का भी जवाब नहीं जगन सेठ। हारी हुइ बाजी को जीतना कोई

आपसे सीखे। अच्छा अब चलता हूं।
 
जिस समय केसरी जगन सेठ के यहां पहुंचा उस समय पुलिस कमिश्नर जयकर जगन सेठ के केबिन से बाहर निकल रहा था। अपनी वर्दी में न होने के कारण केसरी जान न पाया कि वह' कोई पुलिस कमिश्नर है। लेकिन उसके बहुमूल्य कपड़ों से और उसके बाहर निकलने पर चपरासी ने उठकर जिस जोरदार ढंग से सलाम ठोंका उससे उसने यह अवश्य अनुमान लगा लिया कि यह कोई बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति है।

उस्के गुजर जाने के बाद उसने यूं ही सहब उत्सुकतावश चपरासी से पूछ लिया-'यह कौन थे?'

'आप नहीं जानते।' चपरासी ने आश्चयं से उसे देखते हुए

कहा-'पुलिस कमिश्नर साहब थे।' केसरी की समझ में नहीं आया कि पुलिस कमिश्नर यही क्या कर रहा था।

फिर भी उसने और कोई सवाल किए बिना चपरासी से

पूछा-'जगन सेठ है भीतर?'

'आप कौन?'

'उनसे कहो क्र फारेस्ट आफिसर केसरी मिलने के लिए आया है।'

चपरासी अन्दर गया और थोड़ी देर बाद ही बाहर लौटकर बोला-'जाइए।'

केसरी अन्दर प्रविष्ट हुआ।

बिना किली औपचारिकता का प्रदर्शन किए बिना जगन सेठ ने उसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने का संकेत किया और फिर बोला-मुझे खुशी है कि तुमने यहां आने का फैसला करके अपनी अक्लमंदी का सबूत दिया है। जाहिर है कि हम लोग दोस्ताना बातचीत के जरिये किसी अच्छे नतीजे पर पहुंचने की कोशिश हर सकते हैं। बैसे तुम यहां भेरे बुलाने पर अपनी मरजी से आए हो या उस मेयर शर्मा ने सलाह देकर भेजा है तुम्हें?'

'आपने मुझे किसलिए बुलाया है।' उसके सवालों को नजर

अन्दाज करते हुए उसने पूछा।

'तुम्हारे यहां आने के बाद बहुत कुछ ऐसा हो गया जो नहीं होना चाहिए था।' जगन सेठ ने अपनी कीमती कुर्सी की पुश्त से पीठ टिकाते हुए दोनों हाथों की उंगलियां एक-दूसरे में फंसाकर कहा-'वह क्यों हुआ? किसकी गलती से हुआ? इस

बहस में पड़कर मैं मामले को और नही उलझाना चाहता। मैंने तुम्हें यहां इसलिए बुलाया है कि यह जो विकट स्थिति पैदा हो गई है. पहले तो तुम मुझे यह बताओ कि वर्तमान स्थिति को तुम विकट स्थिति समझते भी हो या नहीं?'

उसकी समझ में न आया कि क्या जवाब दे। इसलिए खामोश बैठा हुआ जगन सेठ के चेहरे की ओर देखता रहा।

'तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?' जगन सेठ ने उसकी

आंखों में झांकते हुए पूछा। 'जवाब तो तब दूं जब आपका सवाल मेरी समझ में आए।' 'हूं, और यह सवाल तुम्हारी समस में कैसे आएगा?'

'जब आप मुझे यह बताएंगे कि कालिया से बापके क्या सम्बन्ध हैं।'

'अगर मैं कहूं कि अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं तो?' 'तो मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि कालिया की और मेरी लड़ाई झूठ और सच की लड़ाई है। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका फर्ज बन जाता है कि इस लड़ाई में आप मुझे सहयोग दें।'

'यानि तुम्हारा यह दावा है कि तुम सब की राह पर हो?'

'जी हां।'

'लेकिन सिर्फ तुम्हारे कहने मात्र से कैसे मान लूं कि तुम सच

पर हो।' जगन सेठ ने कहा-'क्या जेलसे भागेहुए कैदी को इस जंगल में पनाह देना जिसके कि तुम आफिसर हो तुम्हारे सच के असूलों का ही एक अंग है?'

'लेकिन मैंने उसे पनाह नहीं दी।' उसने विरोध किया-'मैं तो

उसे जानता तक भी नहीं था कि वह कौन है?'

'लेकिन यह सिर्फ तुम कह रहे हो जबकि घटनाएं और हालात कुछ ओर ही कहानी बताते हैं।' जगन सेठ ने कछ-'क्या यह सच नहीं है कि कालिया के दस-बारह

आदमियों ने एक रात तुम्हारे बंगले पर हमला किया था?'

'बिलकुल सच है।' वह मेज पर आगे को झुकता हुत्रा उत्साहित स्त्रर में बोला-'यही मैं आपको।' 'क्या यह सच नहीं है कि जेल से भागा हुआ कैदी तुम्हारी मदद के लिए एकदम वहां पहुंच गया?' जगन सेठ ने उनकी बात काट कर कहा।

'यह भी सच है मगर ।'

'क्या यह सर नहीं है कि कालिया कल रात कोई षड्यंत्र रच कर जंगल तें पहुंचा था और उसके साथियों ने तुम्हारी सुरक्षा के लिए तैनात पहरेदारों को शराब पिला कर बेहोश कर दिया ला।'

'सच है।'

'क्या यह सच नहीं है कि जगतार फिर बीच में कूद पड़ा और वे दोनों इस बक्त धायलावस्था में हास्पिटल में पड़े हुए हैं?'

'यह भी सच है।'

'क्या रिश्ता है तुम्हारा उस मुजरिम कैदी से जो अपनी जान

जोखिम में डालकर हर वक्त तुम्हें बचाने की कोशिश में लगा हुआ है।'

'मेरा उससे कोई रिश्ता नहीं है। यहां आने से पहले मैं उसे

जानता तक नहीं था।'

'मैं अगर तुम्हारी बात पर यकीन कर भी लूं तो क्या तुम समझते हो कि और लोग तुम्हारी बात पर यकीन कर लेगई?'

'सांच को आंच नहीं होती जगन सेठ। मैं आपको पूरा किस्सा बताता हूं।'

'किस-किस को पूरा किस्सा बताते फिरोगे आफिसर। कोई तुम्हारी बात पर यकीन नहीं करेगा और एक दिन आएगा जब तुम्हारा वह सच या तो तुम्हें पागल कर देगा या फिर आत्महत्या करने पर मजबूर।'

वह जगन सेठ की ओर देखता रह गया।

जगन सेठ अपने शब्दों पर जोर देता हुआ कहे जा रहा था-'अपनी बात साबित करने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है। जबकि तुम्हारी हर बात को गलत सावित करने के लिए सबूत मौजूद हैं।' 'कैसे सबूत?'

जगन सेठ ने दराज से लिफाफा निकाला और फिर मेज की सतह से नीचे रखकर उसने उसमें से एक फोटो निकालकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा-'एक सबूत तो यही देख लो।'

केसरी ने देखा और उसका सारा शरीर शर्म और अपमान से झनझना उठा। वह जगतार और साधना की फोटो थी। साधना उसकी छाती पर सर रखे हए आसमान की ओर देखती हुई खिलखिलाकर हंस रही थी।

'यह एक तस्वीर जब लोगों की नजरों के सामने पहुंचेगी तो तुम्हारा सारा सच तुम्हारी सारी दलीलें आसमान में धुआं बनकर उड़ जाएंगी। ऐसी और भी तस्वीरें मेरे पास हैं। लेकिन उस जेल से भागे हुए कैदी जगतार से तुम्हारे कोई सम्बन्ध हैं या नहीं? इसका जवाब देने के लिए यह एक ही तस्वीर काफी है।'
 
केसरी के मुंह से कोई बोल न फूटा। तस्वीर उसने उल्टी रख दी-साधना की जरा-सी नादानी की वजह से उसकी लड़ाई

कितनी कमजोर हो गई इसे वह महसूस कर रहा था। जगन सेठ गलत नहीं कह रहा था-उसने महसूस किया-यह तस्वीर लोगों के सामने पहुंची नहीं कि लोग उसकी किसी बात पर यकीन नहीं करेंगे।

'हो सकता है कि इस तस्वीर का तुम्हारे पास कोई जवाब हो।' जगन सेठ कहे जा रहा था-'मैं और लोगों की तरह बन्द दिमाग का आदमी नहीं हूं। हर बात को खुले दिमाग से सोचने का आदी हूं। माने लेता हूँ कि तुम्हें अपनी बड़ी बहन के इस गुप्त प्रेम व्यापार के बारे में कुछ भी मालूम न हो। मैं यह भी मान लेता हू कि इन दोनों के प्यार मे कोई अश्लीलता अथवा वासनात्मक सम्बन्ध की बात नहीं होगी। हालांकि एक जेल से भागे हुए कैदी के दिल में इस तरह की पवित्र भावनाओं की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी मैं माने लेता हूं कि इन दोनों का यह प्यार प्रेम का दिव्य रूप है। लेकिन

क्या इसे देख लेने के बाद कोई भी समझदार आदमी अपने इन विचारों पर टिका रह सकेगा क्या?'

और जगन सेठ ने लिफाफे की तस्वीरों में से छांटकर एक और तस्वीर केसरी की ओर बढ़ाई।

यह तस्वीर भी साधना की ही थी लेकिन जगतार के साथ नहीं। इसमें साधना बिल्कुल नग्न थी और आंखें बन्द किए हुए किसी अन्य पुरुष की बांहों में जकड़ी हुई थी। उसे याद आ

गया झाड़ियों वाला वह किस्सा जब उसने साधना को नग्नावस्था में बेहोश पाया था।

'यह एक षड्यन्त्र है।' 'माने लेता हूं तुम्हारी बात को कि यह एक षड्यन्त्र है।' जगन सेठ ने कहा-'लेकिन दुनिया में किस-किस को बताते फिरोगे यह। और कौन यकीन कर लेगा तुम्हारी इस बात पर। इन तस्वीरों को एक साथ अखबारों में छपी देखने के बाद लोगों को कुछ समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे अपने आप ही अनुमान लगा लेंगे कि इस उन्मत्त ढंग से विभिन्न व्यक्तियों के साथ प्रेम सागर में किल्लोल करने वाली युवती को क्या समझा जाए? साध्वी या वेश्या?'

उसके कसते चेहरे और भिंचते जबड़े को देखकर जगन सेठ ने कहा-'बेकार उत्तेजित होने से कोई फायदा नहीं होगा। ठण्डे दिमाग से उन हालात की गम्भीरता को समझने की कोधिश करो जिनमें कि तुम फंस गए हो। मैं अपनी बात आगे कहूं उससे पहले लो यह एक फोटो और देख लो।'

जगन सेठ ने एक फोटो और छांटकर उसकी ओर बढ़ाई।

वह उसके छोटे भाई शिबू की फोटो थी। आदिवासी लड़कियों के साथ अश्लील मुद्राओं में रंगरेलियां मनाते हुए।

'यह सब फोटुएं जव अखबारों में छपेंगी तो तुम्हारे खानदान

के बारे में जो राय कायम होनी वह ऐसी होगी कि लोग तुम्हारे सच को दुनिया का सबसे बड़ा झूठ समझेगे। तम्हारा सव अपनी जिन्दगी यर लाख-लाख आंसू बहाएगा क्योंकि अपने-आपको साबित करने के लिए उसके पास कोई सबूत नहीं है। जबकि झूठ उछल-उछलकर खुशी के गीत गाएगा। क्योंकि सच को सरेआम बदनाम करने के लिए उसके पास भरपूर सबूत हैं।'

उसे लगा कि जगन सेठ सच कह रहा है। इन सारे सबूतों के आगे वह कितना निस्सहाय-सा हो गया था। साधना दीदी उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन वह ताकत ही उस फरार मुजरिम जगतार के कारण इस नाजक वक्त में उसकी

सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।

'अब बताओ कि अब भी मेरा सवाल तुम्हारी समझ में आया

या नहीं?' जगन सेठ उससे पूछ रहा था।

अच्छी तरह समझ चुका था वह कि वाकई एक विकट परिस्थिति में फस गया है वह। जिससे निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नल आ रहा था। चारों ओर बस । मधेरा-ही-अंबेरा थाम। अंधेरे के सिवा और कुछ भी नहीं।

'इससे कैसे निकला जा सकता है?' पूछ बैठा वह।

जगन सेठ मुस्कराया धीरे से। जैसे यही सुनने की आशा करता था वह।

बोला-'मैं निकाल सकता हूं तुम्हें। लेकिन इसके लिए सबसे पहले तो तुम्हें उस मेयर का साथ छोड़ना होगा।'
 
जगन सेठ को बात खत्म हुई ही थी कि तमी फोन की घंटी वज उठी। उसने रिसीवर उठाया और कुछ देर बात करने के बाद रख दिया।

फिर केसरी की ओर देखकर बोला-'बोलो तैयार हो?'

'इस शहर मे वे ही तो अकेले एक हित-चिंतक हैं मेरे।'

'बकवास।' जगन सेठ ने जोर से हवा में हाथ हिलाकर कहा-'वह आदमी अपना हित नहीं देख सकता तो तुम्हारा हित कहां से देख लेगा। क्या तुमने देखा नहीं कि जो अखबारी लड़ाइ उसने शरू की थी उसमें वह कैसे खुद-ब-खुद मुंह की खा गया है। उसेको नाव डूबने वाली है। अगर तुम भी उसके साथ डूबना चाहते हो तो फिर मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना।'

'अगर मैं उनका साथ छोड़ दूं तो सब किस्से खत्म हो जाएंगे?'

'खत्म कुछ नहीं होगा।' जगन सेठ ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा-'लेकिन सबकुछ दब जाएगा और तब तक दबा रहेगा जर तक तुम मेरे कहने पर चलते रहोगे।'

'ओह।' दीर्घ निश्वास के साथ वह बोला।

'अगर परिस्थितियों का मुकाबला न किया जा सके उनके

अनुकूल ढल जाने में ही अक्लमन्दी है।' जगन सेठ ने कहा 'अगर तुम मेरे अनुकूल चलने को तैयार हो तो मैं वायदा

करता हूं कि कालिया फिर तुम्हें कभी तंग नहीं कर पाएगा। अगर तुम चाहोगे तो जगतार भी तुम्हारी और तुम्हारी बहन की जिन्दगी से बहुत दूर भेज दिया जाएया।'

ऐसा हो जाए तो कैसा सुख मिलेगा उसे। एक फरार मुजरिम कैदी के साथ उसकी साधना दीदी के सम्बन्ध हों यह वह सहन नहीं कर पा रहा था। जगतार उन लोगों की जिन्दगी से निकल जाएगा तो शायद साधना के सिर से उसका भूत उतर

जाए।

'और यह तस्वीरें?'

'इन्हें मैं नष्ट कर दूंगा। लेकिन यह मत भूलना कि इनके नैगेटिव हमेशा मेरे कब्जे में रहेंगे।'

उसने धीरे-से गरदन हिलाई।

कुछ देर के लिए वहां एक अजीब सन्नाटा-सा छाया रहा।

फिर जयन सेठ ने ही उस सन्नाटे को तोड़ते हुए पूछा-'तो क्या मैं समझू कि तुम मेचे कहे अनुसार चलने को तैयार हो?'

'और कोई चारा भी तो नहीं है।'

.

'मुझे तुमसे इसी अक्लमन्दी की उम्मीद थी।' जगन सेठ बोला-'अब सुनो तुम्हें क्या करना है। आज शाम को मेयर जो प्रेस कांफ्रेंस बुलाने वाला हैं।' 'आपको कसे मालूम?' उसने एकदम चौंककर पूछा।

क्योंकि यह बात मेयर और उसके बीच हास्पिटल में बात करते हुए ही तय हुई थी। कोई तीसरा वहां मौजूद नहीं था। उसकी समझ में नहीं आया कि उन दोनों के बीच की वह गोपनीय वार्तालाप की खबर इतनी जल्दी जगन सेठ तक

कैसे पहुंच गई।

'इस शहर में और इसके आसपास जो कुछ होता है वह मुझे मालूम रहता है।' जगन सेठ ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा 'उस प्रैस कांफरेंस में जाओ ही नहीं और अगर जाओ तो फिर वहां जो बयान देना है वह मुझसे सुन लो।'

जगन सेठ ने उसे जो कुछ कहने के लिए कहा उसे सुनने के बाद उसने यही बेहतर समझा कि वह मेयर द्वारा बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में न ही जाए तो अच्छा है। वैसे भी अब उसे जनन सेठ के कारण मेयर से अपने सम्बन्ध तो खत्म करने ही पड़ेंगे।

दफ्तर से बाहर निकलते हुए उसके कानों में जगन सेठ के

कहे शब्द गूंज रहै थे-अगर परिस्थितियों को अपने अनुकूल न बनाया जा सके तो अक्लमन्दी परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाने में ही है।

जगन सेठ के अनुकूल चलने के अलावा और कोई चारा नहीं था उसके पास।

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