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फोरेस्ट आफिसर

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कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता था और यह जानता था कि आजकल के वैज्ञानिक युग में चमत्कारों की कहीं कोई गुंजाईश नहीं है।

उसने बड़ी ही कमजोर सी आवाज में अपने सेक्रेटी से कहा-'वह प्रेस कांफ्रेंस कैंसिल कर दो सेठी। वजह कोई भी बता देना।'

जेल से भागे एक अपराधी द्वारा चंगल के खामोश अंधेरों में

खेला गया रूह को कंप-कंपा देने वाला खूनी खेल।

अखवार की इन सुर्खियों के नीचे छोटे अक्षरों में पूरी खबर इस प्रकार छपी थी-पिछले दिनों जेल से भागकर जगतार नामक एक खतरनाक खुजरिम जंगल में आ छपा। कहा जाता है कि इस मुजरिम की सहायक न केवल कुछ देवी शक्तियां हैं बल्कि इसन एक वशीकरण मंत्र भी सद्ध कया हुआ। यह अजीबो गरीब रक्तरंजित कहानी उसके इस वशीकरण मंत्र से ही सम्बन्धित है।

पिछले दिनों जंगल में एक नए फारेस्ट आफिसर श्री के. सी. केसरी की नियुक्ति हुई। श्री केसरी न केवल एक ईमानदार

और मेहनती अफसर हैं बल्कि एक ऐसे परिवार से सम्बन्धित हैं जिसकी रगों में साहस और तपस्या कूट-कूटकर भरी हुई है। जिसका जीता जागता उदाहरण है उनकी बड़ी बहन कुमारी साधना। त्याग और तपस्या की इस देवी ने बचपन में ही मां बाप के मर जाने के कारण अनाथ हो गए अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी जिस साहस के साथ सम्भाल कर उन्हें पढ़ा लिखा कर शिक्षित किया इसकी मिसाल कहा और मिलनी मुश्किल है।

उस देवी की सुशीलता और सच्चरित्रता की कसमें खाई जाती

था।

किन्तु यहां आते ही अनहोनी हो गई। उस देवी की सुन्दरता पर जगतार की कुटिल दृष्टि पड़ी और उसने कुमारी साधना के धवल यश रूपी चन्द्रमा को राहु की तरह ग्रस लिया।

अपने सिद्ध वशीकरण मंत्र का प्रयोग करके उसने उस देवी की ऐसी बुद्धि हरी कि वह दीन दुनिया भूलकर उसी की दीवानी हो गई। यह बात जब फारेस्ट आफिसर केसरी को मालूम हुई तो एक भाई होने के नाते अपनीवहन की वह हालात देखकर चिन्तित हुए। जो कि स्वाभाविक भी था। बहन को समझाने की कोतिश की लेकिन बेसुद। क्योंकि वह बेचारी तो वशीकरण मंत्र के प्रभाव में होने के कारण कुछ भी सोचने समझने से लाचार थी।

श्री केसरी पुलिस में भी इस रिपोर्ट को दर्ज नहीं कराना चाहते थे। क्योंकि इसमें बदनामी का डर था और एक शरीफ भाई भला अपनी बहन की बदनामी कैसे बर्दाश्त कर सकता था।

आखिर उन्होंने अपने मित्र कालिया से जो कि जंगल के ठेकेदार भी हैं, अपनी परेशानी का जिक्र किया।श्री कालिया ने बातचीत द्वारा मामले को सुलझाने के उद्देश्य से जगतार से मिलने का निश्चय किया।

चूंकि जगतार एक फरार मुजरिम था इलिए वह दिन में मिलने का खतरा तो मोल नही बे सकता था। इसलिए रात में मिलना निश्चित हुआ। निश्चित समय पर थी कालिया अपने छोटे भाई हरिया के साथ जगतार से मिलने के लिए जंगल में गए। उन्होंने जगतार

को प्रेमपूर्वक समझाने की कोशिश की कि वह उस देवी का पीछा छोड़ दे और उसे अपने वशीकरण मंत्र से मुक्त कर दें। बदले में जितना भी धन वह चाहता है वे देने के लिए तयार

लेकिन उस काम लोलुप कुटिल कामी जगतार के कानों पर जूं तक न रेंगी।

जब श्री कालिया ने उस पर किसी भी तरह की बातचीत और अनुनय-विनय का असर होते न देरवा तो उसे डराने के लिए धमकी दी कि अगर वह जंगल छोड़कर नहीं गया तो वे उसके बारे में पुलिस को सूचना दे देंगे। बस इतना सुनते ही वह नरपिशाच इतना उत्तेजित हुआ कि उसने वही श्री कालिया के छोटे भाई हरिया की हत्या कर दी

और श्री कालिया को भी बुरी तरह घायल कर दिया। श्री केसरी ने बीच बचाव किया जिसमें जगतार भी कुछ घायल हुआ।

दोनों का इलाज शहर के अस्पताल में हो रहा है जहां श्री

कालिया की जिन्दगी और मौत के बीच एक गहरी कशमकश चख रही है।

हम अधिकारियों से पूछना चाहते हैं कि जगतार जैसा

भयानक कैदी जेल से आखिर भागा कैसे? उसे फांसी पर क्यों नहीं चढ़ा दिया गया।

हरिया का पिछले ही साल विवाह हुआ था। उसकी विधवा पत्नी अपनी सूनी मांग और उजड़े सुहाग के साथ यह जानना चाहती है कि आखिर कब तक जगतार जैसा क्रूर कर्मी अपराधी उस जैसी सुहागनों के सुहाग को छीनता रहेगा। उसकी छ: माह की अनाथ हो गई अबोध बच्ची अपनी आंसू भरी आंखों के साथ अपने उस बाप को ढूढ़ रही है जो उसे अब कभी नहीं मिलेगा।

आखिर कब तक जगतार जैसा खतरनाक अपराधी लोगों का सुख-चैन छीनता रहेगा। उनकी खूबसूरत जिन्दगियों को रौंदकर मौत के घाट उतारता रहेगा?'

आखिर कब तक?

केसरी ने पूरा अखबार पढ़ा और जगत सेठ की ताकत को मन-ही-मन माना कि स्याह को सफेद और सफेद को स्याह कर देना उस आदमी के बाएं हाथ का खेल है।

अभी साधना को साफ बचा ले गया है वह। लेकिन अगर उसने उसके चंगुल से निकलने की कोशिश की तो तस्वीर के दूसरे पहलू का प्रचार करने में भी वह देर नही लगायेगा।

सुपरवाईजर ही उसे अखवार देकर गया है। अखबार देने के साथ वह उसके बारे में कुछ चर्चा भी करना चाहता था। लेकिन उसे टालकर भेज दिया था।

वह खबर पढ़ने बैठ गया था।

साधना हास्पिटल जाने की तैयारी कर रही थी। वह तो रात

को भी वहीं रुकना चाहती थी लेकिन पुलिस वालों ने रुकने नहीं दिया।

दोनों भाई-बहनों में बातचीत लगभग बन्द-सी ही थी। फिर भी अखबार लेकर वह उसके पास गया।

'अगर हास्पिटल न जाओ तो बेहतर है।' केसरी ने उसकी

ओर अखबार बढ़ाते हुए कहा-'अखबारों तक में चर्चे होने लगे हैं।'

'बदनामी से सिर्फ वे ही लोग डरते हैं जिनके दिल में पाप होता है।' साधना ने अखबार को बिना पड़े ही एक ओर रखते हुए कहा।

'नही।' वह दोषपूर्ण स्वर में बोला-'बदनामी से वो लोग डरते हैं जिनमें थोड़ा भला-बुरा सोचने-समझने की बुद्धि होती है।'

लेकिन साधना ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह जाने के लिए उद्यत थी। लेकिन फिर भी न जा सकी। क्योंकि तभी एक जीप वहां आकर रुकी और उसमें से वही पुलिस अधिकारी नीचे उतरा जिसने कल हास्पिटल में साधना को समझाने की कोशिश की थी।

'लगता है मैं सही वक्त पर आया हूं।' साधना को तैयार देखकर वह बोला-'कल ही तुम्हारी बातों से मैंने अन्दावा लगा लिया था कि तुम काफी जिद्दी किस्म की लड़की हो आर

शायद अखबार पढ़ने के बाद भी रुषेगी नहीं। मेरा अनुमान ठीक ही निकला। मैं वैसे इन मंत्र-वंत्र की बातों में विश्वास नहीं रखता। लेकिन तुम्हारी हालत देखकर मुझे भी यकीन होने लगा है कि वाकई उसने तुम पर किसी वशीकरण मंत्र का प्रयोग किया हुआ है। बहरहाल मुझे इन बातों से क्या लेना-देना। लेकिन तुम अब हास्पिटल न जा सकोगी क्योंकि अखबारों में यह सब छपने के बाद खतरा है कि लोग तुम्हें देखने के लिए हास्पिटल के बाहर जमा होना न शुरू हो जाए। पहले ही हमारी दिक्कतें बहुत बढ़ी हुई हैं। अब उन्हें और बढ़ाने की जरूरत नहीं।'

पुलिस के आगे साधना भी मजबूर थी और उसे विवश होकर रुकना ही पड़ा।

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सांप की कोटर।

वह सुबह के इस वक्त जबकि सूरज आसमान पर काफी ऊंचा उठ आया था दीगर के ऊपर लिखे हुए शब्दों को नहीं देख रहा था। बल्कि बरामदे के बाहर खड़ा सामने के पेड़ की एक कोटर को देख रहा था जिसमें से एक काला सांप अपनी चिरी हुई जोमों को लपलपाता हुमा धीरे-धीरे रेंगकर गहर निकल रहा था।

कालिया नाग-पहले यही शब्द उसके मस्तिष्क में उभरे। फिर वह गर्दन को झटका देता हुत्रा मन-ही-मन बोला कालिया नहीं जगन सेठ। नहीं यह नाग जगन सेठ भी नहीं हो सकता। क्योंकि जगन सेठ तौ आदमी के वेष में इससे भी अधिक खतरनाक और जहरीला नाग है। जिसका काटा पानी भी न मांगे।

नाग कोटर से निकनकर पेड़ की डाल पर बन खाता इमा सरककर आंखों से ओझल हो गया। लेकिन यह फिर मी बपने असम्बद्ध विचारों में उलझा रहा।

तभी सुपरवाईजर की आवाज सुनकर चौंका। देखा कि बहु हाथ में अबजार लिए हुए तेजी से उसी की ओर लपका चला रहा था-'कुछ सुना आपने सर? कमाल हो गया। कल रात जगतार हास्पिटल से कालिया की हत्या करके

भाग गया।'

'क्या कहते हो?' वह एकदम चौंककर आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोला।

'अखबार देखिए सर, आज की सबसे बड़ी सनसनीखेब

खबर तो यही है।' उसने झपटकर सुपरवाईजर से अखबार ले लिया और पढ़ने लगा। मुख पृष्ठ पर ही छपी थी वह खबर-खतरानक कैदी जगतार पुलिस निगरानी के बावजूद हास्पिटल से भागने में कामयाब।

भागते समय भी वह अपना बदला लेना नहीं चूका। जाते-जाते कालिया की हत्या करता गया।

कल रात लगभग दस बजे अचानक ही हास्पिटल की लाईट चली गई और चारों ओर घष्य अंधेरा छा गया। उस अंधेरे का लाभ उठाकर पुलिस निगरानी से भागने में कामयाब हो गया। जब बत्ती आई जोकि जगतार के ही किसी सहयोगी द्वारा मेन- स्विच बन्द कर दिए जाने के कारण चली गई थी, तो एक नर्स ठेकेदार कालिया के कक्ष में प्रविष्ट हुई और यह देखकर वह चीख पड़ी कि ठेकेदार कालिया की लाश फटी-फटी आंखों से उप घूर रही थी। ठेकेदार के मफलर से हा गला घोंट कर उनकी हत्या कर दी गई थी। इन पंक्तियों के प्रेस में जाने तक कोई विशेष विवरण प्राप्त नहीं हो सका लेकिन पुलिस का अनुमान है कि यह जगतार का ही काम है।

पाठकों को याद होगा कि इस संवाददाता ने कल ही

अधिकारियों को जगतार के बारे में सावधान |

लेकिन उसने अन्तिम लाईनों को पूरा पढ़ना जरूरी नहीं समझा। वह अखबार लेकर भीतर गया जहां साधना अपनी पूत्रा की तैयारी कर रही थी।

'लो देख लो अपने उस जगतार का नया करिश्मा।' यह

अखबार उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'अब वह कालिया की हत्या भी करके भाग गया।'

साधना ने अखबार लेकर एक सरसरी सी नजर सुर्खियों पर डाली और उपेक्षा से उसे एक ओर रख दिया।

'क्यों पूरी खबर पड़ने के की हिम्मत नहीं।' बह बोला-'अब तो आंखें खोलो दीदी और समझो कि उस खूनी और बहशी के लिए आदमी की जान की कोई कीमत नही, वह तुम्हारी पवित्र भावनाओं को क्या कभी समझ पाएगा।'

'मुझे कितनी बार कहना होगा केशो कि मैं उनके बारे में एक

शब्द भी गलत नहीं सुन सकती।'

उसक चेहरा फिर कस गया। पुछ क्षण तक अपलक देखता रहा। फिर बोला

'आखिर तुम्हें क्या हो गया है दीदी?' वह अजीब बिबशता

भरे स्वर में बोला-'एक खतरनाक अपराधी के पीछे तुम अपनी अच्छी-भली जिन्दगी खराब करने पर तुली हुई हो। अब तो मुझे भी इस बात का यकीन हो गया है कि उसने तुम पर किसी वशीकरण मन्त्र का ही प्रयोग किया है। कहो तो किसी ओझा को।'

'हां हां वशीकरण मन्त्र का प्रयोग दिया है उन्होंने मुझ पर।' साधना मानो फ्ट-सी पड़ी-'जानते हो बह वशीकरण मन्त्र है उनका उस रात अपनी जान पर खेल जाना जब कालियाने अपने गुण्डे हम लोगों को मारने केलिए भेजे थे। वह वशीकरण मन्त्र है उनका दो रात पहले उस कालिया से उलझ जाना जो रात के अंधेरे में हमें मारने के लिए खुद आया था। उस दरिन्दे से जूझते हुए वे खद मौत के मुंह में पहुंच गए लेकिन हम लोगों पर कोई आंच नहीं आने दी। वेह वशीकरण मन्त्र उस पापी कालिया को उसके किए की सजा देना जिसने हमारी जिन्दगी हराम कर दी थी। नही तो मुझे बताओ कि उनकी कालिया से अपनी क्या दुश्मनी थी?'

इस बात का कोई जवाब नहीं था उसके पास। उसने नजरें घुमाकर देखा तो सुपरवाइजर के बातें सुनता पाया। उसे अपनी ओर देखता पाकर सुपरवाइजर नाक का चश्मा ठीक करके वहां से सरकता हुआ बोला-अच्छा तो मैं जाकर मजदूरों को देखता हूं सर।'

सुपरवाइजर के पीछे-पीछे वह भी बाहर निकल आया।

दीदी से बहस करने का कोई लाभ नही था।

अचानक उसकी नबर पेड़ के उस कोटर की ओर उठ गई जिसमें से उसने नाग को निकलते हुए देखा था।

पहले रेंगकर नजरों से ओझल हो गया हुआ नाग इस बीच लौट आया था और कोटर के किनारे पर बड़े मजे से फन उठाए धूप सेक रहा था।

उसे लगा जैसे वह नाग नहीं बल्कि खुद जगन सेठ बैठा हुआ उसका मुंह चिढ़ा रहा है। इच्छा हुई कि अभी जाकर इस नाग

का फन कुचलकर मार डाले।

फिर उसने अपने-आपको समझाया कि ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें

सोचने से क्या फायदा? इस नाग को मारने से कोई जगन सेठ थोड़े ही मर जाएगा।

एक दीर्घ निःश्वास के साथ वह धीरे से बड़बड़ाया-'तुम क्या जानो दीदी कि सिर्फ कालिया को मार देने भर से कुछ नहीं होने वाला। और भी न जाने कितने बड़े-बड़े नाग हैं जिन्होंने जिन्दगी में जहर घोल दिया है। तुम्हारा जगतार कितनों को मारेगा?'

सोचते-सोचते उसे लगा कि उसकी आंखें सजल हो आई हैं।

आस्तीन से उन्हें पोंछते हुए उसने महसूस किया कि कितना कमजोर और बेबस हो गया है वह।

जगतार ने अपने भागने का समाचार अखबार में पढ़ा और फिर उसे एक ओर रखते हुए उसने जगन सेठ की ओर

देखकर कहा-'लेकिन यह कालिया बाला किस्सा क्या हुआ? मैंने तो उसे मारा नहीं है।'
 
जगतार ने अपने भागने का समाचार अखबार में पढ़ा और फिर उसे एक ओर रखते हुए उसने जगन सेठ की ओर

देखकर कहा-'लेकिन यह कालिया बाला किस्सा क्या हुआ? मैंने तो उसे मारा नहीं है।'

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धीरे से' मुस्कराया जगन सेठ और उसने अपने पीछे खड़े भैरोंसिंह की ओर संकेत करते हुए कहा-'यह काम हमारे भैरोंसिंह का है। अन्धेरे का लाभ उठाकर जब तुम्हें हास्पिटल से बाहर ले जाया जा रहा था तब भैरों, कालिया का काम तमाम कर रहा था।'

'लेकिन जंगल में जो कुछ मैंने सुना उससे तो लगता था कि

भैरों, कालिया का खास आदमी हैं। उस फारेस्ट आफिसर के पास रिश्वत लेकर सबसे पहले यही तो गया था शायद।'

'हम तो सरकार के गुलाम हैं जगतार गुरु।' भैरों ने जनन सेठ के प्रति खुशामदी से स्वर में कहा-'इन्होंने कहा कालिया की नौकरी करो, हम कालिया की नौकरी में चले गए। भैरों की

जिन्दगानी तो सरकार की जूतियों की नोक पर रखी है। हुक्म दें तो अभी अपनी खाल खिंचवाकर हुजूर के कदमों में बिछवा दूं। "ऐसे वफादार लोग ही जिन्दगी में तरक्की करते हैं।' जगतार ने एक नजर उसकी ओर देखते हुए कहा। फिर जगन सेठ की ओर उन्मुख होकर बोला-'लेकिन मैंने तो यह भी सुना था कि कालिया एक किस्म से दाहिना हाथ था आपका। फिर उसके साथ यह सलूक क्यों किया गया।' 'बहुत कुछ सुन रखा है तुमने?'

'लोगों की जनाने बात करेंगी तो काम सुनेंगे भी।' जगतार अपनी गरदन और हाथ की पट्टियों पर हाथ फिराता हुआ बोला।

'बात तो सही कर रहे हो।' जगन सेठ ने धीरे से मुस्करा कर

कहा, 'दरअसल कालिया कुछ-कुछ यरूरत से ज्यादा ही पसरने लगा था। अपनी बेवकूफियों के कारण उसने इस फारेस्ट आफिसर वाले मामले को इस बुरी तरह बिगाड़ कर रख दिया। तुम जैसे बहादुर और दिलेर आदमी से उसे दोस्ती करनी चाहिए थी लेकिन वह मूर्ख तुम्हें भी अपना दुश्मन बना बैठा। और घायल होने के बाद तो उसका दिमाग कुछ ऐसा खराब हो गया कि बजाए इसके कि वह बिगड़े हुए मामले को सम्हालने का मुझे मौका देता, वह मुझ पर यह जोर डालने लगा कि मैं भैरों से तुम्हारी हत्या करवा दूं। इन सब बातों को देखते हुए मुझे यकीन हो गया कि कालिया अगर जिन्दा रहेगा तो मुसीबतें ही बढ़ाएगा। लिहाजा उसे खत्म करवाने

का फैसला मुझ लेना ही पड़ा।'

'आपने कालिया की बात मानने की बजाए मुझने दोस्ती

करना बेहतर समझा इसके लिए आपका शुक्रिया।' जगतार बोला-'मुझमें आपकी दिलचस्पी का कारण? कहीं जो काम कालिया करता था वह मुझसे तो नहीं करवाना चाहते?'

'नही भाई।' जगन सेठ ने कहा, 'कालिया की गद्दी का

असली हकदार तो भैरोंसिंह है।'

'तो फिर पुलिस की घेराबन्दी के बावजूद मुझे हास्पिटल से निकालने का खतरा क्यों मोल लिया आपने?'

'एक तो यह साबित करने के लिए कि कहीं कालिया का दोस्त होने के नाते तुम हमें भी अपना दुश्मन न समझने

लगो।'

'और दूसरे?' जगतार ने प्रश्न पूर्ण दृष्टि से जगन सेठ की ओर देखते हुए पूछा। 'दूसरे तुमसे दोस्ती करने के लिए।' जगन सेठ ने

कहा-'क्योंकि यह बात हम अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी बहादुर थोर दिलेर आदमी की दोस्ती हमेशा फायदेमंद ही साबित होती है।'

'मुझसे क्या फायदा उठाना चाहते हैं आप?'

'फिलहाल तो सिर्फ तुमसे दोस्ती करना चाहते हैं।' जगन सेठ ने कहा-'इस जगह तुम बेफिक्र होकर आराम के साथ स्वास्थ्य लाभ कर सकते हो। उसके वाद जहां तुम्हारी मरजी हो जा सकते हो। क्योंकि यह मैं जानता हूं कि तुम्हारे जैसा आदमी किसी एक जगह टिककर रहना पसन्द नही करेगा। लेकिन इस सबके बदले में मैं यह उम्मीद जरूर करता हूं कि

अगर मुझे तुम्हारी कभी कोई जरूरत पड़ी तो तुम मेरी मदद के लिए जरुर आओगे।' 'यह भी कभी कोई कहने की बात है क्या जगन सेठ?

जगतार ने जिन्दगी में कभी किसी का कोई उधार रखना नहीं सीखा। वैसे एम मामले में तुम्हारी सलाह लेना चाहता हूं।' 'कौन सा मामला है?'

उत्तर देने से पहले अगतार ने, एक लम्बी सांस ली और फिर बोला, 'अब तक की सारी जिन्दगी आवारा बादल की तरह उड़ते हुए काट डाली। न कानून ही कभी मुझे बांधकर रख सका न किसी किस्म का माया मोह का बन्धन। आजाद पंछी

की तरह मन मरजी की जिन्दगी जी है मैंने।'

'तो अब क्या इस जिन्दगी को बदलना चाहते हो?'

'सोच रहा हूं।' जगतार शून्य में घूरता हुआ बोला-'यह जिन्दगी तो जीकर देख ली। लेकिन एक जगह टिक कर जीने में क्या मजा है यह भी अगर जीकर देख लिया जाए तो क्या बुराई है?'

'कोई बुराई नहीं है।' बयन सेठ ने कहा-'इसमें मेरी जिस मदद को जसरत हो करने को तैयार हूं। लेकिन यह बताओ

दोस्त कि यह परिवर्तन आया कैसे?' कहीं उस फारेस्ट

आफिसर की बहन की हिरण जैसी आंखों ने हमारे इस जंगली शेर का शिकार तो नहीं कर लिया?'

उत्तर में धीरे से मुस्कराया जगतार और फिर बोला-शायद। लेकिन जिन्दगी में पहली बार हुआ मेरे साथ कि मैं अपने बारे

में यह सोचने को मजबूर हुआ कि मस्त पवन के झोंके की तरह इधर से उधर और उधर से इधर तो बहुत भटक लिया अब जरा थोड़ा थम के भी देख लूं कि जिंदगी के तालाब में कौन सी खुशियों के कमल खिलते हैं।'

'फिक्र मत करो सारी खुशियों के कमल खिलेंगे।' जगन सेठ ने उसके घुटने को थपथपाते हुए कहा, 'बस थोड़ा ठीक हो जाओ। सबसे बढ़िया बात यह है कि तुम चल फिर तो आराम से लेते दो। सिर्फ गरदन चौर बांह में घाव हैं सो कुछ दिन में ठीक हो जाएंगे। कुछ दिन में ठीक हो जाएगा। तब तक तुम यहां आराम से विश्राम करो। भैरों और इसके आदमी कमरे के बाहर गोदाम में होंगे ही। हर रोज डाक्टर आकर तम्हारी पट्टी कर जाया करेगा। गाहे बगाहे मैं चक्कर लगाऊंगा ही।

और किसी खास चीज की जरूरत हो तो बताओ?'

'उम्मीद से ज्यादा आराम का इन्तजाम कर रखा है जगन सेठ आपने मेरे लिए।' जगतार बोला, 'फिलहाल तो किसी चोज की जरूरत नहीं लगती। अगर हुई तो बाहर गोदाम में भैरों या इसके आदमी तो होंगे ही।'

'बिल्कुल।' इस बार जवाब भैरों ने दिया, 'चौबीस घंटे कोई न कोई बड़ा मौजूद रहेगा। मैं भी रहूगा ही अगर किसी काम से बाहर नदी गया हुआ तो।'

'तब तो तुमसे काफी गहरी मुलाकातें होती रहेंगी?' 'क्या मतलब?' भैरों ने चौंक कर पूछा।

'सारे आदमियों में एक तुम्हीं तो ऐसे हो जिसके साथ मेरा

सबसे गहरा सम्बन्ध जुडा है।'

'मैं कुछ समझा नहीं।'

'अरे भई कालिया का कत्ल तुमने किया और लोग कातिल मुझे समझ रहे हैं। तो हम दोनों का सम्बन्ध औरों से कुछ गहरा हुआ या नहीं?'

जगन सेठ ने खिलखिलाकर हंसते हुए कहा, 'मजाक अच्छा कर लेते हो तुम। अच्छी निभेगी हम लोगों की। अच्छा अब मे चलता हूं मौका लगा तो शाम को चक्कर लगाऊंगा, नहीं तो कब आऊंगा ही।'

भैरों भी जगन सेठ के पीछे-पीछे बाहर निकल आया।

'लगता है यह तो धर बसाने की सोच रहा है हुजूर।' गोदाम के बाहर दरवाजे के निकट आकर उसने अपनी शंका व्यक्त की जगन सेठ से।

'अच्छा है।' जगन सेठ ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, 'हमें कोई कोशिश नहीं करनी पड़ेगी और यह खुद-ब-खुदय अपना जंगलीपना छोड़कर कुत्ते की तरह दुम हिलाता हुमा हमारे तलवे चाटने लगेगा।' 'मुझे तोर यह आदमी कुछ जंच नहीं रहा सरकार।'

'क्यों?'

'यह तो मैं नहीं जानता।' भैरों अपनी खोपड़ी खुजाता हुआ बोला-'लेकिन इसकी बातों से कुछ दोगलापन-सा लगता है मुझे।' 'दोगलापन दिखाएगा तो खुद ही नुक्सान उठाएगा।' जगन सेठ ने कहा-'यहां हमारे रहमोकरम पर पड़ा हुआ है। बाहर पुलिस इसकी तलाश में घूम रही है। कालिया के कत्ल का जिम्मा भी अब इसके सिर पर है। चारों तरफ से फंसा पड़ा है बेचारा। फिर घर बसाने का सपना भी देख रहा है। यानि मछली कांटा निगलने ही वाली है। उसके बाद इसकी हमारे बिना गत कहां।' 'हुजूर इन बातों को मुझसे बेहतर समझते हैं। अपनी छोटी

सी बुद्धि के मुताबिक जो मुझे महसूस हुआ वह मैंने आपको बता दिया।'

'तुम्हें यह सब बातें सोचकर अपना दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं है।' जगन सेठ ने कहा, 'हालांकि यह यहां से भागकर कहीं जाएगा नहीं। लेकिन फिर भी तुम इस पर नजय रखे रहो। लेकिन इस बात का भी ख्याल रहे कि इसे कुछ महसूस न होने पाए। जब तक यह तन्दुरुस्त न हो जाए तब तक यहा जताते हो कि यह हमारा सबसे सम्मानित दोस्त ई। उसके बाद हम देखेंगे कि यह यह क्या करता है और हमें इसके साथ क्या करना चाहिए।'

कहकर बगन सेठ गदर अपनी कार की और बढ़ गया।
 
सांप की कोटर।

केसरी की खुद समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ही बह सांप की कोटर उसे बरबस ही अपमी और आकर्षित क्यो करने लगी थी। निकलते बड़ते नजर अपने आप उस ओर उठ जाती।

अपने कमरे में यया तो दीवार पर लिखे वे शब्त-'सांप की कोटर'-अपने आकार से कहीं बहुत ज्यादा बड़े होकर उसके सामने खड़े हो जाते। बाहर जाता तो नजरें अपने आप उस पेड़ की और उठ जातीं और कोटर के पास उस काले सांप को तलाश करने लगतीं।

अब भी ऐसा ही हुआ था और वह उस सांप को देख रहा वा

ओ अपनी काली मखमली रस्सी जैसी आकृति को बल देता हुआ पेड़ से नीचे की ओर रेंग रहा था। देखते-देखते वह सोच रहा था कि क्या इस सांप को उसे मार नहीं देना चाहिए। इस लिए नहीं कि वह सांप उसे जगन सेठ की याद दिला देता था। बल्कि इसलिए कि घर के निकट इतने जहरीले सांप का होना कभी भी खतरनाक हो सकता है।

लेकिन यह तो सादा जंगल ही ऐसे खतरनाक जानवरों से भरा हुआ है?

वह यही सोच रहा था क्षि सांप पेड़ से उतरकर पास की झाड़ियों में घुस गया। वह बंगने में जाने के लिए मुड़ने ही वाला था कि अचानक चौंककर रुक नया क्योंकि अचानक ही झाड़ियां बड़े जोर से हिलीं और उसने उस सांप को बड़ी तेजी के साथ दाहर निकलते देखा।

उसके पीछे-पीछे हो झपटती हुई सी आई एक भूरे धूसर रंग

की आकृति सी। यह एक भक्तिशाली नेवला था जिसने उछलकर सांप को बीच में से पकड़ा और अपने मजबूत दांतों में भंभोंड़ डाला।

सांप भयंकर रूप से फुफराता हुआ तेजी से पलटा और नेवले को डसने ढ़े लिए अपने फन से चोट की। लेकिन चतुर नेवला खतरे को भांप कर फुर्ती से एक ओर को उछल कर कूद गया।

फिर इससे पहले की कि सांप पलट पाता उसने उसके सिर

को अपने दांतों में दबा कर जमीन पर रगड़ना शुरू कर दिया।

पीड़ित सांप का लम्बा शरीर भयंकर रूप से बल खाते हुए नेवले के शरीर की अपनी सशक्त कुंडलियों में फंसाने की कोशिश करने लगा। लेकिन नेवला बड़ी सफाई से अपने शरीर को उसकी गिरफ्त से बचाने की कोशिश करता हुआ पूरी शक्ति के साथ उसके फने को जमीन पर रगड़ता रहा।

मानो उसके खतरनाक विष दंत तोड़ देने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा हो। सांप प्राणापण से अपनी गरदन नेवले के मजबूत जबड़ों से छुड़ाकर उसे अपनी कुंडलियों के बन्धन मे बांध लेने के प्रयत्न में लगा हुआ था। लेकिन नेवला बड़ी चपलता से अपने शरीर को उसके हड्डी-तोड़ बंधनों से बचाता हुत्रा उसके फन को जमीन पर रगड़े चला जा रहा था।

धरती की मिट्टी सांप की गरदन से निकले खून के कारण लाल होने लगी थी।

बह एकटक उस जिन्दगी और मौत की खामोश लड़ाई को देखे जा रहा था। उस भयंकर युद्ध का वह एकमात्र दर्शक था

और उसकी सारी सहानुभूति भावनाएं साकार होकर उस नेवले के साथ जुड़ी हुई थी।

उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह नेवला कोई अन्य प्राणी नहीं बल्कि बह स्वयं है जो जनन सेठ रूपी उस भयानक विषैले नाम का अन्त करने पर तुला हुआ है।

उस नेवले के माध्यम से वह उस काले नाग रूपी जगन सेठ का अन्त कर देना चाहता था। कोई दया ममता नही थी उस नाग के लिए उसके मन में क्योंकि वह तो उस जमन का प्रतीक था जिसने खुद उसकी जिन्दगी को अपने घिनौने हथकन्डों से नागपाश में इस बुरी बरह जकड़ लिया था कि वह चैन से सांस भी नहीं ले सकता।

आखिर नेवले ने सांप की गरदन काट कर फेंक दी। उसका 'काली रस्सी सा शरीर दो हिस्सों में बंटकर भयानक रूप से तड़पने लगा। गरदन कट जाने के बावजूद भी सांप की जीवन अखक्ति अभी नष्ट नहीं हुई थी। उसका कटा हुआ सिर अपना भयानक जबड़ा खोले हुए फिर नेवले की ओर झपटा।

लेकिन नेवला फुर्ती के साथ उसके सामने से हट गया और उसके तड़पते हुए धड़ को मुंह से खींचकर झाड़ियों में ले गया।

सांप का कटा हुआ मुंह अपने प्राणधाती दुश्मन को अपने थामने न पाकर भयंकर रूप से फुफकारते हुए उछल-उछल कर हबर-उधर गिरने लगा।

फिर कुछ देर बाद ठंडा होकर किसी निर्जीव सी गेंद की तरह झाड़ियों के बीच जा गिरा। आसपास की जमीन उसके खून से लालमलाल हो गई थी।

वह खडा सोचता रहा कि काश वह इस नेवले की तप मगन सेठ रूपी नाग का अन्त कर पाता। क्या ऐसा मौका मिलेगा कभी।

नहीं-एक दीर्घ निःश्वास के साथ उसने सोचा-वह सिर्फ भस अनहोनी की कल्पना कर रहा है जो कभी वास्तविकता का प नहीं ले सकती। उसके मुकाबले में जगन सेठ कहीं बहुत ज्यादा ताकतवर है।

कहीं बहुत ज्यादा। यहीं सब सोवता हुआ वह अपने कमरे में चला गया।

अनायास ही नजर दीवार पर लिखे उन अक्षरों की ओर खिच गई--सांप की कोटर।

इच्छा हुई मिटा दे इन अक्षरों कों। सांप मर चुका हए। अब इन अक्षरों क लिखे रहने का कोई महत्व नही रह जाता।

महत्व?'

मस्तिष्क में एकदम जैसे रोशनी का मनाका सा हुआ हो एक दम। अगर अब इन अक्षरों के लिखे रहने का कोई महत्व नहीं रह जाता तो क्या पहले इनका कुछ महत्व था?

क्या यह राब्द किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य से लिखे गए हैं क्या? कहीं इन शब्दों को लिखने के पीछे लिखने वाले का उद्देश्य

आफिसर कोई ग्टू संकेत देना तो नहीं था?
 
क्या गूढ़ संकेत हो सकता है वह-खामोश खड़ा वह इसी बारे में सोचता रहा।

फिर झटके के साथ उसने अपनी टार्च उठाई और बाहक निकल गया। हालांकि अभी दोपहर ही थी लेकिन कोटर के भीतर झांककर देखने के लिए टार्च के प्रकाश की जरूरत पड़ सकती थी। पेड़ पर चढ़कर कोटर के निकट पहुंचा वह। टार्च जलाकर भीतर देखा। कोटर ऊपर से चौड़ी थी किन्तु गहराई की तरख निरन्तर संकरी होती चली गई थी।

कोटर की तली में टार्च का प्रकाश पड़ते ही प्लास्टिक की थैली जैसी कोई चीज चमक उठी। हाथ डालकर उसने उसे बाहर निकाल लिया। उस पर धूल गर्दा इत्यादि तो जमी हुई थी लेकिय मोटी और मजबूत प्लास्टिक की थैली को इससे ज्यादा और कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

उसने एक नजर उसमें रखे कागजातों को देखा और फिज उसके साथ पेड़ से नीचे उतरकर अपने कमरे मे पहुंच गया।

थैली खोलकर कागजात निकाले और अपनी मेज पर बैठकर उन्हें पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते कई बार चौंका वह। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि जगन सेठ और उसके साम्राज्य के विरुद्ध ऐसी शवितशाली चीज अचानक ही उसके हाथ लग जाएगी।

उन कागजातों में कालिया, जमन सेठ, पुलिस कमिश्नर तीनो का कच्चा चिट्ठा खोल कर लिखा हुआ था। विस्तार से पूरा विवरण दिया हुआ था कि किस प्रकार यह तिगड्डा

साम-दाम-दंड भेद की नीति के द्वारा फारेस्ट आक्सिर को

अपने कब्जे में करके करोड़ो की वन-सम्पदा गैर काननी रूप से खुलेआम चराकर बेचते थे। यही नहीं बल्कि जंगले की जटिलता का लाभ उठाते हुए किस प्रकार उसके गुप्त मार्गों का तस्करी के लिए उपयोग करते थे।

वह पूरे मनोयोग से पढ़ रहा थाकि साधना ने खाने के लिए आवाज लगाई किन्तु उसने मना कर दिया।

भाई-बहन के सम्बन्ध पिछली घटनाओं के कारण कटु तो हो चूके थे इसलिए साधना ने भी दोबारा नहीं पूछा। अगर पूछती भी तो भी उसका जवाब इंकार में ही होता। अपने दुश्मनों के खिलाफ इतनी महत्वपूर्ण जानकारी को पढ़ते समय खाने का

हो करने की फुरसत किसे थी।

वह मनोयोग से पढ़ता रहा।

पढ़ते-पढते उसे इस बात का यकीन हो गया कि यह बाख्द ऐसा है जो जगन सेठ के पूरे साम्राज्य को मिट्टी में मिलाकर रख देगा।

लेकिन इसे पहुंचाए किसके पास?'

यहां तो पुलिस कमिश्नर भी खुद लुटेरों से मिला हुआ है।

तभी उसे मेयर का ध्यान आया। पाप की इस लंका में वही तो एक धर्मात्मा विभीपण है। न सिर्फ वह जगन सेठ से टक्कर लेने की हिम्मत रखता है। बल्कि उसकी पहुंच भी काफी ऊपर तक है।

उसने कागज फिर वापिस समेट कर उस प्लास्टिक की थैली में बन्द किए और फिर रिसीवर उठाकर मेयर का नम्बर डायल किया।

'शर्मा जी, केसरी बोल रहा हूं मैं। जगन सेठ के खिलाफ कुछ ऐसे लिखित सबूत हासिल किए हैं मैंने कि उन्हें जेल की चक्की पिसवाई जा सकती है। कोई ताज्जुब नहीं कि फांसी भी हो जाए।'

'तो उन सबूतों को मेरे पास लेते लाओ ना!' दूसरी ओर से मेयर की आवाज काई–'समाज और देश के इन दुश्मनों के खिनाफ ऐसे ही सबूत तो चाहिए। लेकिन यह सबूत तुम्हें मिले कैसे?'

'यह सारी बात मिलने पर बताऊंगा।'

'तो कब आ रहे हो?'

'बस यह समझिए कि आप तक पहुंचने ही वाला हूं।'

'मैं इन्तजार कर रहा हूं।'

जब वह बंगले से बाहर निकला तो दिन का तीसरा पहर था।

'वाकई।' पढ़ने के बाद उन कार्यों को मेयर ने इस प्रकार

सम्हाला जैसे वे केवल कागज नहीं बल्कि वेशकीमती खबाना हो-'यह तो बड़ी अनमोल चीज हाम लग गई है। कौन सोच सकता था कि तुम्हारे बंगले के पास वाले उस पेड़ की कोटर में अगन सेठ एण्ड कम्पनी की मौत का सामान रखा हुत्रा है। उस पिछले वाले फारेस्ट आफिसर ने तो क्या नाम था उसका सरन महतो ने तो कमाल ही करके रख दिया। मैं तो उसे इन लोगों का दुमछल्ला ही समझता था। लेकिन डसने इनकी बो-वो जानकारियां हासिल' करके लिख डाली कि जगन सेठ और पुलिस कमिश्नर को छठी का दूध याद करा दिया जाए। अब तुम देखना केसरी कि कैसे मैं इन दोनों की नाक में नकेल डाल कर नचाता हुं। 'नचाने-बचाने की क्या जरूरत है सर।' वह बोला -'आप तुरन्त उच्चाधिकारियों से सम्पर्क स्थापित कीजिए और इन अपराधियों के हाथ में हथकड़ियां डलवाइये।'

'वह भी होगा।' कागजों को सम्हालते हुए मेयर उठा और

दीवार में बनी सेफ की ओर बढता हुप्रा बोला-'लेकिन बाद में कुछ भी करने से पहले एक मौका देना होगा जगन सेठ को।'

'मौका?' वह एकदम चौंककर बोला-'कैसा मौका?' कागजात सेफ में सुरक्षित बन्द करने के बाद मुड़ता हुआ बोला मेयर-'असावधान दुश्मन पर वार करना मैं कायरता समझना हुंकेसरी। चाहे दुश्मन कितना भी नीच क्यों न हो किन्तु मैं धर्म और नैतिकता का रास्ता कभी नहीं छोड़ सकता।'

'मेरी समझ में तो आपकी बातें आ न रही।' भ्रमित सा केसरी

वोला-'अपराधियों के विरुद्ध ठोस सबूत हुमारे हाथ में हैं। मैं नहीं समझ पा रहा या कि उच्चाधिकारियों से सम्पर्क स्थापित करके अपराधियों को उनके किए की सजा दिलवाने में कौन से धर्म और कौन सी नैतिकता का शस्त्र छूटा जा रहा है?'

'तुम अभी इन बातों को नहीं समझोगे।' मेयर उसके सामने बैठता उलबा बोला। वह अब पहने सा परेशान और हारा का मेयर नहीं था। अब उसके भीतर से एक खास किस्म का दबंगपना उभर आया था जो उसकी बोलचाल और हाव-भाव

की एक-एक हरकत से व्यक्त हो रहा था।

'तुमने अपना काम कर दिया।' मेयर उससे कह रहा था 'अब मझ अपना काम कर्ने दो। हां इतना अवश्य विश्वास दिलाता हूं तुम्हें कि जिस निष्ठा और ईमानदारी का तुमने

परिचय दिया है उसका पुरा पुरस्टार तुम्हें अवश्य मिलेगा। साथ ही यह आभ्यासन भी देता हूं कि ख्म शहर में अब कोई जगन सेठ अथवा कालिया तुम्हें परेशान नहीं कर सकेगा।

केसरी भी परिवर्तन को लक्ष्य कर रहा था। लेकिन उसका सही मतलब समझ सकने में वह अपने आपको असमर्थ पा रहा था।

'आखिर मुझे भी तो कुछ मालूम हो कि आप करना क्या

चाहते हैं?'

'तम्हारे जाने के बाद मैं जगन सेठ को बुलाऊंगा यहां पच

और उठेसे कहूंगा कि अपने आपको सुधारने का सिर्फ एक मौका और दे सकता हूं मैं उसे। या तो वह सीधे रास्ते पर आ जाए या फिर...।'

असली बात केसरी की समझ में अब आ गई थी। मेयर का मुखौटा भी उतर गया और उसका असली चेहरा नजर आने लगा उसे।

जिसे वह धर्म की सीढ़ी समझा था वह भी वास्तव में जहरीला सांप निकला।

वह अपने भीतर का सारा आक्रोश अपने शब्दों में उंडेलता हुआ बोला-'यानि तम जगन सेठ के साथ सौदेबाजी करोगे?'

'नही, मैं अपराधी को सजा देने से पहले सुधरने का एक

मौका देना चाहता हू।' मेयर बोला-'लेकिन तुम अगर इस बात को सौदेबाजी के ढंग से समझ सकते हो तो ऐसे ही समझ लो।'

'तुम जिसे मैंने एक आदर्श पुरुष समझा था तुम इतने गिरे हुए आदमी निकलोगे मैंने सोचा भी नहीं था। तुम्हारी नीचता तो जगन सेठ से भी बढ़-चढ़ कर है। वे कागजात मुझे वापिस दो।'

'कौन से कागजात?' मेयर ने बड़े भोलेपन से पूछा। 'तुम इतनी आसानी से नही बच पाओगे मेयर चाहे मेरी जान

क्यों न चली जाए मगर तुम्हारी ईट से इंट बजा कर रख दूंगा।'

'अभी तम जोश में हो छोकरे इसलिए होश की बात तुम्हारी समझ में नहीं आएगी। जाओ अभी घर जाकर आराम करो। धन होश उतरने के बाद दिमाग ठिकाने आ जाए तब मेरे पास माना।

विवशता पूर्ण क्रोध से कांपता हुआ यह उठ खड़ा हुआ।

'आस्तीन के सांप तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा मैं।' कहते हुए

उसने उसकी गरदन की ओर हाथ बढ़ाए।

मगर तभी रुक जाना पड़ा उसे। क्योंकि मेज के नीचे छिपे हाथों में से एक ऊपर उठ आया था, उसमें एकपिस्तौल दबी हुई थी।

'आस्तीन का सांप तुम मुझे कह रहे हो?' उसे पिस्तौल की नोंक पर रखता हुश्रा बोला मेयर-'लेकिन जगन सेठ से मिल कर आने के बाद सबसे पहले सम्बन्ध खत्म करने की घोपणा किसने की थी?'

एकाएक इस आरोप का कोई जवाब नहीं दे पाया केसरी।

'जब तुम अकेले इन लोगों से जूझ रहे थे मैं तुम्हारी मदद के लिए आगे बढ़ा।' मेयर उसे पिस्तौल की नोंक पर रखता हुआ बोला-'लेकिन मुझे बीच मंझधार में छोड़कर उससे जा मिले।'

'यह झठ है।' उसने जोरदार शब्दों में विरोध करते हुए

कहा-'और इसका सबूत है वे कागजात जो तुमने सेफ में रख लिए हैं। अगर मैं जगन सेठ से मिला हुआ होता तो यह

कागजात लेकर तुम्हरे पास कभी नहीं आता। रहा तुम्हारा सबसे पहले मेरी मदद के लिए आना तो वह भी सिर्फ तुम्हारा एक ढ़ोंग था। अन्यथा असलियत यह है कि तुमने मुझे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जगन सेठ के खिलाफ एक मोहरा बनाया था। तुम मेरे माध्यम से शहर का जनमत इस तरह से अपने पक्ष में तैयार कर लेना चाहते थे ताकि आने कले चुनावों में तुम्हें ही वोट मिलें।'

'बड़े अक्लमंद होते जा रहे हो।' मेयर धीरे से मुस्करा कर बोला-'लेकिन इस बात से तो तुम इंकार नहीं कर सकोगे कि सबसे पहले धोखा देने की शुरुआत तुमने की थी। तुमने मुझे उस वक्त धौखा दिया जब जगन सेठ मुझ पर भारी होने लगा था।'

'उस वक्त मेरी बहुत बड़ी मजबूरी मेरे सामने आ गई थी!' 'जरा हम भी तो सुने कि वह क्या मजबूरी थी?'

केसरी ने बताया कि किस तरह जगन सेठ ने फोटोग्राफ दिखाकर उसे अपने कालू में कर लिया था।

सब कुछ बताने के बाद वह बोला-'अगर मेरी नीयत जानबूझ कर तुम्हें धोखा देने की होती तो यह कागजात लेकर तुम्हारे पास न आया होता बल्कि सीधा जगन सेठ के पास पहुंच गया होता।'

'खैर मजबूरी में तो आदमी को बहुत कुछ करना पड़ जाता है।' मेयर बोला-'रही तुम्हारी नीयत की बात तो उस पर न मुझे पहले शक था न अब है। हां तुम जरूर मेरी नीयत पर शक किए जा रहे हो। मगर मुझे अपनी सफाई में कुछ नहीं कहना है। फिलहाल मैं तुम्हें दरवाजे तक छोड़ आता हू। जब दिमाग ठंडा हो जाए और मेरे साथ काम करने को जी चाहे तो आ जाना। तुम्हारे जैसे होशियार और होनहार व्यक्ति को अपना सहयोगी बनाकर मुझे वास्तव में बड़ी खुशी होगी।' कहते हुए मेयर अपनी कुर्सी से उठा और उसे पिस्तौल के इशारे से बाहर की ओर ले जाता हुआ बोला-'नाऊ गैट आऊट काम हियर।'
 
'जगन सेठ सेठी बोल रहा हूं मैं तीसरे पहर के करीब फारेस्ट आफिसर आया था यहां पर और अब गया है शाम को "हां कोई रुलन्दा-सा था उसके पास हां मेयर साहब के साथ काफी देर बैठा रदा था वह सारी बातें तो नहीं सुन सका लेकिन लगता है कि काफी गरमा-गरमी भी हुई है साहब उसे दरवाजे तक छोड़ने गए थे. वह बहुत गुस्से मे था साहब अपने कमरे में गए हैं. बस सबसे पहले मौका मिलते ही आपको फोन किया है। जी हां कोशिश करना है मैं

पूरी बात जानने की।'

सेठी जगन सेठ को पूरी रिपोर्ट देने के बाद रिसीवर रखने को हुआ तो एक आवाज सुनकर ऊपर से नीचे तक कांप गया-'रिसीवर रखकर सम्बन्ध-विच्छद मत करना सेठी, जगन सेठ से मुझे भी कुछ बात करनी है।' सेठी ने एकदम घूमकर देखा तो मेयर को बिल्कुल अपने पास खड़े पाया। न जाने कब से वह वहां खड़ा हुआ उसकी बात सुन रहा था। उसके कांपते हाथों से रिसीवर निकल ही गया होता अगर मेयर ने उसे तुरन्त थाम न लिया होता।

सेठी खड़ा कांपता रहा और मेयर उसकी उपस्थिति को एकदम नकारता हुआ रिसीवर कान से लगाकर बोला-'जगन सेठ शर्मा बोल रहा हूं में सबसे पहले नो मेरी बधाई स्वीकार करो कि जाल फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तुमने सेठी नक को अपने शिकंजे में फंसा लिया मानना पड़ेगा भई बड़ी गहरी मार करते हो तुम अब जरा कान खोलकर मेरी भी एक बात सुन लो अब से ठीक तीस मिनट बाद जिसे बोल-चाल की भाषा में आध धण्टा भी कहते हैं, मैं तुम्हें

अपनी कोठी पर हाजिर देखना चाहता हूं अपने साथ अपने उस दूसरे सायी पुलिस कमिश्नर जयकर को भी साथ लेते आना नहीं कोई जबर्दस्ती नहीं है आने की, मगर इतना समझ लो कि पर आध घण्टे में तुम मेरी कोठी पर हाजिर नहीं हुए तो तुम्हारे और तुम्हारे साथियों के हाथों में हथकड़ियां डलवाकर सारे शहर में जलूस निकलवा दूंगा हक है तुम्हें इस बात को बन्दर घुड़की समझने का लेकिन मैं यही सलाह दूंगा कि इस वक्त आनी समझ पर ज्यादा भरोसा न करो तो तुम्हारे लिए ज्यादा बेहतर होगा तुम क्या समझ रहे हो तम्हारी आरती उतारने के लिए बुला रहा हुं मैं तम्हें यहां नहीं जगन सेठ बल्कि इसलिए बुला रहा हूं कि वह चोज अपनी आंखों से देख लो जो मैंने अगर सही हाथों पहुंचा दी तो तुम्हारा और तुम्हारे साथियों का पुलिन्दा बांधकर रख देगी जानता हूं तुम्हारा यह कुत्ता सेठी तुम्हें यहां की सब खबर देता रहता है लेकिन इस फारेस्ट आफिसर ने नहीं बल्कि इससे पहले वाले ने जिसे तुम लोग खास तौर से कालिया हरवक्त साथ लिए घूमता था "हां वही खुद तो मर गया मगर तुम लोगों के लिए ऐसी कब्र खोद गया है जिसमें जब चाहूं तुम्हें दफन कर सकता हूं"हां आ जाओ और अपनी आंखों से देख लो नजर कमजोर हो तो पढ़ने का चश्मा साथ लेते आना ।'

उसने रिसीवर रखकर सेठी की ओर देखा जो एकदम उसके पैर में गिरकर गिड़गिड़ाने लगा-'मुझे माफ कर दीजिए सर।'

लेकिन मेयर ने उसे ठोकर मारकर परे धकेलते हुए कहा-'नमक हराम कुत्ते जिस थाली में खाया उसी में छेद कर डाला निकल जा यहां से और रात-रात में यह शहर छोडकर चला जा. अगर कल सुबह इस शहर के आस-पास भी कहीं दिखाई दिया तो तेरी बोटी-बोटी करके चील-कब्बों को खिलवा दूगा।'

'रहम सरबस इस बार माफ कर दीजिए।'

लेकिन मेयर ने एक न सुनी।

धक्के मारकर सेठी को बाहर खदेड़ दिया।

हालांकि जगन सेठ को इस बात की रंच मात्र भी आशा नहीं

थी कि मेयर के हाथ अचानक ही कोई ऐसो चमत्कारिक चीज लग जाएगी जो उसकी काया पलट करके रख देगी। लेकिन उसके बदले हुए अन्दाज और धमकी भरे स्वर ने उसे चौंका जरूर दिया था।

उसने अपनी आंखों से एक बार उन चीजों को देख लेने का निश्चय किया जिनके बल पर मेयर इतना अकड़ने लगा था। उसने पुलिस कमिश्नर जयकर को फोन करके मेयर की कोठी पहुंचने को कहा और स्वयं भी कार में उधर रवाना हो गया।

कोठी से कुछ इधर ही सेठी खड़ा नजर आया। जैसे उसी के इन्तजार मे वहां खड़ा हुआ था। उसकी कार को देखते ही रुकने का इशारा करता हुआ वह उसके पास पहुंचा और खिसियाए से स्वर में बोला-'जगन सेठ मैं तो तबाह ओर बरबाद हो गया। अब तो बस आपका ही सहारा है। मेयर साहब ने तो शहर छोड़कर चले जाने की धमकी दे दी है।'

'अभी जग मैं मेयर से मिल आऊं।' जगन सेठ ने अपनी कलाई वड़ी की ओर देखते हुए कहा-'फिर बात करूंगा तुम्हारे से। वैसे जो कुछ तुमने मुझे फोन पर बताया है उसके अलावा और तो कोई ऐसी बात नही जो बतानी भूल गए हो।'

वह सेठी से बात कर ही रहा था कि पुलिस कमिश्नर की जीप भी आ गई। दोनों गाडियां मेयर की कोठी की ओर बढ़ चलीं।

'मैं यही आपके लौटने का इन्तजार करूगा जगन सेठ।' सेठी पीछे से चिल्लाया। लेकिन जगन सेठ ने कोई जवाब नहीं दिया।

मेयर उन्हें दरवाजे पर ही मिल गया जैसे उनके पहुंचने का इन्तजार ही कर रहा था।

'आइए आइए, आप दोनों को एक साथ देखकर आंखें ठंडी हो गई। मुझे अफसोस है कि कालिया बेचारा मारा गया वरना

आप लोगों की शैतानी त्रिमूर्ति का स्वागत करते हुए आज बहुत आनन्द आता मुझे।'

'तुमने हम यहां अपमानित करने के लिए बुलाया है क्या शर्मा?' जगन सेठ ने कड़े स्वर में कहा।

'ऊंची आवाज में बोलने से पहले एक बात अच्छी तरह से समझ लेना जगन सेठ।' मेयर ने तलख स्वर में कहा-'कि मुझे तुमसे समझौता करने में किसी किस्म की कोई दिलचस्पी नहीं है। यह तो सिर्फ पुरानी दोस्ती का लिहाज है कि तुम्हें अपनी भूल सुधारने का मौका दे रहा हूं मैं।' 'बक-बक ही किए जाओगे या वह जीज भी दिखाओगे जिस

पर अकड़े जा रहे हो।'

'वह चीज ही दिखा रहा हूं तुम्हें।'

मेयर उन दोनों को अपने निजी कक्ष में ले गया। सावधानी से सेफ खोली। उन दोनों को दिखा दिया कि कागजों का मोटा ताजा पुलिन्दा है उसके पास। फिर उसमें से एक कागज छांटकर निकाला उसने य् तो बहुन कुछ लिखा हुआ है इन कागजों में। वह कागज उनकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'लेकिन सिर्फ इस एक कागज से ही तुम लोगों को मालूम हो जाएगा कि मैं क्या कुछ कर सकने की ताकत रखता हूं।'

उन दोनों ने ही बेताबी से कागज पढ़ना शुरू किया। कुछ लाइनों के पढ़ने ही वे एकदम सन्न से हो गए थे। पूरा कागज पढ़ते-पढ़ते तो सारा शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था।

सूखे होंठों पर जबान फिराते हुए जगन सेठ ने मेयर की ओर अजीब-सी भयभीत दृष्टि से देखा।

मेयर ने बड़े आराम से हाथों में से कागज खिसका लिया और उसे वापिस सेफ में रखकर मबबूती से बन्द करने के बाद वह उनकी ओर घूमा। उनके पिटे हुए से चेहरों को देखने का आनन्द लेता हुआ वह चरखारा-सा लैकर बोला-'क्या ख्याल है आप लोगों का?'

'क्या चाहते हो?'

'चाहता तो यह हूं जगन सेठ कि तुम्हारे हाथों में हथकड़ियां

और पैरों में बेड़ियां डलवाकर मुंह पर कालिख पुतबाऊं और गधे पर उल्टा बिठाकर सारे शहर में जलूस निकलवाऊं।

लेकिन ।'

यहां थोड़ा रुकते हुए जरूरत से ज्यादा ही दीर्घ निःश्वास लेकर उसने आगे कहा-'लेकिन आदमी जो चाहता है वह पूरा थोड़े ही हो जाता है। लेकिन तुम जो चाहते है। वह मैं तुम्हें जरूर दूंगा। बोलो जेल में चक्की पीसना चाहते हो या इस शहर में विस ढंग से रहते आए हो उसी ढंग से रहना।'

'समझौते की क्या शर्त हैं तुम्हारी?' 'सिर्फ एक कि तुम्हें बिना किसी शर्त के झुकना होगा।'

'मुझे मंजूर है।' 'आज से मेरे दोस्त होंगे और मेरे दुश्मन तुम्हारे दुश्मन।' 'जी।' अपमान का घूट निगलते हुए जगन सेठ ने कहा। वह जानता था कि तुरुप के सारे पत्ते अब मेयर के हाथ में हैं। अब अगर उसने जरा भी सर उठाने की कोशिश की तो मेयर उसे अपने जूते की नोंक से चींटी की तरह कुचलकर रख देगा।

'मेरी इजाजत के बिना तुम्हारा कोई भी आदमी जंगल के पास फटकता हुआ न दिखाई दे।' 'जैसा आप कहेंगे वैसा ही होगा।'

'सुना है कि इस फारेस्ट आफिसर की बहन के कुछ फोटो ग्राक्स तुम्हारे पास हैं। वे फोटो ग्राक्स फौरन मेरे पास पहुंच जाने चाहिए।'

'मैं अभी भिजवा देता हूं।'

'और वह सेठी जो मेरे यहां तुम्हारे जासूस के रूप में काम कर रहा था। उसे मैंने यह शहर छोड़कर चले जाने के लिए कहा है। तुम्हारे जिम्मे यह काम है कि वह अब इस शहर में न रहो।'

'वह अब इस शहर में नहीं रह सकेगा। 'और आने वाले चनाव के बारे में तो तुम्हें कुछ समझाने की जरूरत नहीं है। तुम मंरी निश्चित जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा होने। जो भी विरोध में खड़ा हो उसकी जमानत जब्त हो जानी चाहिए।'

'जी।'

'फिलहाल तम जा सकते हो अगर कोई और काम याद आया तो मैं तुम्हें तलब कर लूंगा।'

दोनों जाने के लिए उठे तो पुलिस कमिश्नर को टोकते हुए मेयर ने कहा-'तुम बैठो जयकर।'

पुलिस कमिश्नर बैठ गया।
 
जगन सेठ ने एक बार उसकी ओर देखा और फिर सर झुकाकर वहां से बाहर निकल गया। 'तुमने तो सारी बातें सुन ही ली जयकर?' 'मैं आपका गुलाम हूं सर।' 'मुझे गुलाम नहीं दोस्त चाहिए। तुम्हारे खिलाफ जो सबूत मेरे हाय लगे हैं वे तुम्हें वापिस मिल सकते हैं अगर अपनी दोस्ती के सबूत देकर तुमने मुझे खुश कर लिया। आज से तुम जगन सेठ पर पूरी नजर रखोगे और कहीं वह मेरे खिलाफ षड्यन्त्र रचता नजर आया तो उसकी खवर फौरन मुझे दोगे। लेकिन इतना याद रखना कि मेरी इस उदारता का लाभ उठाकर तुम फिर से जगन सेठ के साथ साजिश करने मत लग जाना। इस बार मुझे जरा भी भनक लगी तो समझ लेना ।'

और मेयर ने जानबूझकर अपना बाक्य अधूरा छोड दिया।

'आइन्दा आपको शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा सर।'

'अब तुम भी जा सकते हो।'

जयकर ने उठकर सलाम किया और बाहर निकल गया।

सेठी उसी तरह खड़ा जगन सेठ के लौटने का इन्तजार कर रहा था। जगन सेठ ने भी उसे देख लिया था और ड्राइवर को कार उसके निकट रोकने के लिए कहा।

घबराया सेठी लपककर कार की पिछली सीट के निकट पहुंचा और बड़े ही आशापूर्ण स्वर में बोला-'तो मेरे लिए क्या हुक्म है जगन सेठ।'

संठी।' जगन सेठ ने अपनी घबराहट और परेशानी को छुपाने की कोशिश करते हुए कहा-'तुम्हारे लिए यही बेहतर होगा कि जितनी जल्दी हो सके यह शहर छोड़कर निकल जाओ।' सेठी को जैसे जबर्दस्त झटका लगा हो।

अविश्वसनीय पूर्ण दृष्टि से जगन सेठ की ओर देखता हुआ आहत से स्वर में बोला-'यह आप कह रहे हैं जगन सेठ? मैंने इतनी सेवा की आपकी और आप भी।'

'वक्त खराब मत करो सेठी।' जगन सेठ ने उपेक्षा के साथ उसकी ओर देखे बिना कहा-'फोरन भाग लो यहां से।'

सेठी गिड़गिड़ाया लेकिन जगन सेठ पर उसका कोई असर नहीं हुआ। मजबूरन रोते-कलपते सेठी को वहां से हट जाना पड़ा।

जगन सेठ वहीं कार रोके हुए पुलिस कमिश्नर जयकर के लौटने का इन्तजार करने लगा। कुछ देर बाद ही जीप आती नजर आई तो जगन सेठ कार से नीचे उतर गया।

जीप उसके निकट आकर रुकी।

इससे पहले कि जगन सेठ कुछ कहता जयकर ने उपेक्षा के साथ कहा-'अब किसी किस्म की कोई बात करने की गुन्जाइश नहीं रह जाती है। मैंने समझा था कि तुम बहुत होशियारी से सारे मामले का संचालन करते रहोगे। इसीलिए तुम्हें खुलकर खेलने का मौका देते हुए खुद परदे के पीछे बना रहा। लेकिन लगता है तम्हारी अक्ल की धार अब कुंठित होती जा रही है। खुद तो डूबे-ही-डूवे, मुझे भी ले डूबे।'

'तुम भी गिरगिट की तरह रंग बदल गए जयकर?'

'खाल बचाने के लिए रंग वदलना ही पड़ता है जगन सेठ।' जयकर बोला-'आखिर तुमने और कालिया ने समझ क्या रखा था कि यह शहर तुम्हारी बपौती है या कोई खानदानी

जागीर? आखिर कितनी बार मना किया था मैंने कि उस फारेस्ट आफिसर को इतना मुंह लगाने की जरूरत नहीं। लेकिन किसी ने कोई सुनी मेरी बात। वह साला साथ रह-रहकर सारे रहस्य जान गया और उन्हें कलम बन्द मी करता गया। अब भुगतो उसका नतीजा।'

'सारे दिन एक जैसे नहीं रहते जयकर।'

'यह बात तो अब तम्हें समझ होनी चाहिए जगन सेठ कि अब तुम्हारे वो पहले बातें दिन गए।' जयकर बोला-'अब तक बहुन सुनार की ठुक-ठुक कर ली तुमने। मेयर के हाथ में इस बार लुहार का हथौड़ा है। एक मारेगा तो हम दोनों साफ हो जाएगे।' जयकर ने कहा और जाप आगे बढा ले गया।

जगन सेठ ने हाथों की मुट्ठियां भींचते हुए विवशता से दांत पीसे। कल्पना भी नहीं की थी उसने जीती बिताई बाजी इस तरह एक्दम हाथ से निकल जाएगी।

वह कार में बैठा और अपने आफिस पहुंचा। वहां से तस्वीरों

का लिफाफा लेकर गोदाम पहुंचाता कि उसे भैरों के हाथ मेयर के पास भिजवा दे। यूं तो किसी के भी हाथ भिजवा सकता था किन्तु भैरों के हाथ भिजवाना वह ज्यादा बेहतर समझता था

ताकि मेयर को इस बात का अहसास हो सके कि वह वाकई उसके आगे पूरी तरह झुक गया है अपने सभी खास आदमियों सहित।

लेकिन दिमाग के फोड़े मेयर के चंगुल से निकल भागने के लिए कोई तरकीब सोचने की कोशिश में तड़फड़ा रहे थे।

काश एक बार वे कागजात उसके हाथ में आ जाते तो फिर देख लेता मेयर को भी। मगर कागजात हाथ में आएं कैसे?'

यह काम भैरों और उसके आदमियों के बस का नहीं था। वे लोग किसी की खोपड़ी तो तोड़ सकते हैं लेकिन तिजोरी तोड़ना उनके बस की बात नहीं। वह भी मेयर की वह मजबूत तिजोरी।

इसके लिए तो किसी पेशेवर तिजोरी तोड़ की आवश्यकता है। इतनी जल्दी कहां से लाए वह तिजोरी तोड़ को। कल तक तो वह मशहूर से मशहूर तिजोरी तोड़ को अपनी सहायता के लिए उपलब्ध कर सकता था। लेकिन साथ ही उसे यह भी

यकीन था कि कल तक वे कागजात मेयर की तिजोरी में भी नहीं रहेंगे। तब तक तो वह उन्हें किसी बैंक के लॉकर में सुरक्षित जमा करा देगा। उन कागजातों की फोटो स्टेट कापियां भी करा ले तो कोई ताज्जुब नहीं।

गोदाम पहुंचा तो भैरों वहां नहीं था।

घायल जगतार आराम कर रहा था। लेकिन उसे देखते ही उठकर बैठ गया।

'क्या बात है जगन सेठ बहुत परेशान नजर आ रहे हो?'

'परेशानियां ही परेशानियां तो अपने मुकद्दर में लिखी है जगतार खलीफा।' हताश से स्वर में जगन सेठ ने उसके निकट बैठते हुए कहा-'अब तो लगता है तुम्हें भी अपना बोरिया विस्तर गोल करना पड़ेगा यहां से।'

'बात क्या है?'

जगन सेठ ने उसे सारा किस्सा सुनाकर कहा-'यह सब तुम्हारे उस होने वाले साले की कारस्तानी है। वो हरामजादा ।'

'क्या कह रहे हो सेठ।' जगतार उसे टोकता हुआ बोला-'मेरे ही सामने मेरे होने वाले साले को गाली दे रहे हो।'

'तुम्हारा ही लिहाज करके चुप हूं वरना जी तो कर जा है कि उस हरामजादे की बोटी-बोटी करके कुत्तों को खिला दूं।'

'अरे मैं तो मजाक कर रहा था।' जगतार धीरे से हंसकर वोला-'मेरी तरफ से जितनी चाहे गाली दो उसे। और कुछ दिन उस मेयर को भी खुश होने दो। फिर देखना तुम हंसोगे

और वह मेयर तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाएगा।'

'वो कैसे?'

'कुछ दिन में घाव वगैरहा अच्छी तरह से भर जाएंगे मेरे। उसके बाद वे कागजात मेयर की सेफ से निकालकर तुम्हारे पास पहुंच जाएंगे।'

जगन सेठ ने प्रश्न पूर्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा तो जगतार बोला-'लगता है तुम्हें मेरे बारे में कोई बहुत ज्यादा जानकारी हासिल नहीं है जगन सेठ जो ऐसी निगाहों से देख रहे हो। पूरे हिन्दुस्तान में मेरी टक्कर का उस्ताद तिजोड़ी तोड़ दूसरा नहीं मिलेगा। बेजान तिजोरियां जब जगतार का नाम सुनती हैं तो डर के मारे अपने ताले खुद व जुद खोल देती हैं।'
 
क्षण भर को तो जगन सेठ की आंखें फटी की फटी रह गई। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जिस काम के आदमी की उसे तलाश थी वह खुद उसके गोदाम में मौजूद है। उसने जगतार को कोई शातिर, हत्यारा और कातिल वगैरहा तो समझा था किन्तु यह नहीं सोच पाया था कि वह तिजोरी तोड़ने के फन का भी उस्ताद हो सकता है।

उसे लगा जैसे मनमांगी मुराद मिल गई हो उसे। फिर भी उसे थोड़ा जांच लेने के इरादे स वह बोला-'लेकिन यह मेयर की तिजोरी मामूली तिजौरी नहीं है। कुछ लोग पहले भी कोशिश कर चुके हैं लेकिन आज तक कोई कामयाब नहीं हो सका।'

'नौसिखियों ने कोशिश की होगी।' जगतार तनिक दर्प पूर्ण स्वर में बोला-'दुनिया में ऐसी कोई तिजौरी नहीं जो जगतार

की उंगलियों के आगे अपने ताले बन्द रख सके।'

'तब तो यह काम तुम्हें आज ही करना होगा।'

'आज कैसे कर सकता हूं।' जगतार बोला-'जरा मेरी हालत तो देखो। बुरी तरह घायल पड़ा हूं। थोड़ा जरा ठीक हो लेने दो।'

'नहीं जगतार खलीफा।' जगन सेठ ने सिर हिलाते हुए

कहा-'अगर आव यह काम नहीं हुआ तो फिर कभी यह काम नहीं हो सकेगा।'

'वह क्यों?'

'तुम इस साले मेयर को नहीं जानते। सौ हरामियों का एक हरामी है। वे कागजात सिर्फ रात-भर ही उस तिजौरी में रहेंगें। सुबह होते ही वह उनकी फोटो स्टेट कापियां करवाएगा और

अलग-अलग बैंकों के लकर में रख देगा।'

'ओह। फिर तो मामला गड़बड़ हो जाएगा।'

'इसलिए तो कह रहा हूं कि यह काम आज रात ही करने का है।'

'लेकिन।'

'लेकिन-वेकिन कुछ नहीं।' जगन सेठ जगतार को उत्साहित करता हुआ बोला-'बस हिम्मत मार लो आज की रात। सच कहता हूं जगतार गुरु अगर तुमने वे कागजात लाकर मुझे दे दिए तो समझ लो कि मालामाल कर दूंगा तुम्हें। तुम्हारे ऊपर में अपनी सारी दौलत न्यौछावर कर दूंगा। पुलिस तुम्हारी

छाया को भी नहीं छू सकेगी। उस फारेस्ट आफिसर की बहन साधना के साथ घर बसाने की सोच रहे हो ना तुम। तुम्हारे सारे सुनहरे सपने सच करवा दूंगा। बस आज रात हिम्मत मार लो और वह कागजात निकालकर ले आओ।'

'जब तुम कहते हो तो हिम्मत तो मैं मार लूंगा सेठ।' जगतार बोला-'लेकिन थोड़े बहुत औजार भी तो चाहिए मुझे।'

'औजारों की चिन्ता मत करो। भैरों के आते ही मैं औजारों

का इन्तजाम करवा दूंगा।'

और तभी वहां भैरों भी पहुंच गया, जैहे नाम सुनते ही प्रगट होने का इन्तजार कर रहा था। 'हुजूर यहां बैठे हैं और मैं पता नहीं कहां-कहां टेलीफोन कर-करके आपको ढूंढ़ता फिर रहा हूं।' भैरों जगन सेठ को देखते ही बोला।'

'क्यों क्या बात है?'

'वह अभी कुछ देर पहले अचानक ही फारेस्ट आफिसर ।'

'जिक्र मत कर उस कमीने के बच्चे का मेरे सामने।' जगन

सेठ ने एकदम क्रुद्ध होकर कहा।

'सुन तो वो जगन सेठ कि यह कह क्या रहा है?' जगतार

बोला-'सुन लेने में क्या बुराई है।'

चूंकि जगतार से तुरन्त काम लेना था तो उसकी बात मानते हुए जगन सेठ ने भैरों से कहा-'कहां मिल गया तुझे दो फारेस्ट भाफिसर?'

'रलिया राम के बार में।'

'रलिया के वार में।'

'हां हुजूर मैं वहां रलिया से मिलने गया था तो बाहर फारेस्ट डिपार्टमेट की जीप देखकर ही चौंका। बन्दर नया तो देखा फारेस्ट आफिसर बैठा हुआ पी रहा है।'

'शराब पीता है बो।'

'पीता ही होगा हुजूर जब वहां पी रहा था तो।' भैरों बोला-'मुझे देखते ही एकदम लपककर मेरे पास आया और मुझे जबर्दस्ती खींचकर अपनी मेज पर ले गया।'

'अच्छा? तब तो कोई खास बात ही करनी होगी।'

'जी हां हुजूर, मुझसे एक पिस्तौल मांग रहा था।'

'पिस्तौल किसलिए?'

'कह रहा था कि मेयर को जान से मारेगा।'

जगन सेठ ने जगतार को देखा। दोनों की आंखें मिलीं। फिर जगतार ने भैरों से पूछा-'तुमने क्या कहा?' 'में हुजूर सेठ साहब से पूछे बिना कुछ कैसे कह देता? इसी लिए तो जगह-जगह फोन करके ढूंढ रहा था। वैसे मैं उसे तसल्ली जरूर दे आया हूं कि कोशिश करके देखता हूं।'

'वह इस वक्त हैं कहां?'

'वही बार में बैठा है।' भैरों बोला-'मैंने फिलहाल रलिया राम

को ही लगा दिया है उसके साथ। अब जो हुक्म हो सो करू।'

जगन सेठ ने फिर जगतार की ओर देखकर पूछा-'क्या कहते हो?' दें दें पिस्तौल उसे?'

'हां जीजा तो अपराधी है ही साले को भी मुजरिम बना बेना

चाहते हो?'

'तो फिर टाल जाते हैं बात को।' 'नहीं।' जगतार कुछ सोचते हुए वोला-'मेरे ख्याल से पिस्तौल दे ही दो उसे। क्योंकि वह भी मुजरिम बन जाएगा तो अपनी बहन की शादी एक अपराधी से होने पर ज्यादा श ओर नहीं मचाएगा।'

'जैसा तुम कहो।'

'अब जरा औजारों का प्रबन्ध करवा दो। आज रात यह काम कर ही लिया जाए। ओर हां उसे पिस्तौल देने से पहले सारी योजना मुझसे समझ लेना।' 'पहले मैं भैरों से औजारों का इन्तजाम करवा लेता हूं ताकि तुम उन्हें एक दफा चैक भी कर लो। फिर उस फारेस्ट

आफिसर के लिए तुम्हारी क्या योजना है यह समझ लोते हैं तुमसे।'

जगन सेठ जगतार को वहीं छोड़कर भैरों के साथ बाहर निकल आया।
 
गोदाम के एक कोने में ले जाकर उसने भैरों से कहा-'सबसे पहले तो यह लिफाफे ले जाकर मेयर को देना और उसके बाद।'

अच्छी तरह समझा कर उसने भैरों को विदा किया।

जगतार का भरोसा हो जाने के बाद भी वह तब तक मेयर की बात मानने से इंकार करने की हिम्मत नही दिखा सकता था

जब तक कि वे कागजात उसके हाथ में न आ जाएं। मेयर का भरोसा बनाए रखने के लिए वे फोटो ग्राफ्स उसे भिजवाने जरूरी थे। उसे यकीन था कि वे फोटो ग्राफ्स भी मेयर अपनी तिजोरी में ही रखेगा। या तो कागजों के साथ उन्हें भी निकाल

लाएगा जगतार या हो सकता है कि इन फोटो ग्राक्स की वजह से मेयर और जगतार की दुश्मनी और भी अधिक गहरी हो जाए।

बस एक बार जगतार उसकी तिजोरी में से कागजात निकाल भर लाए उसके बाद अगर उसने इस मेयर के बच्चे को और उस दोगले जयकर को लोहे के चने न चबवा दिए तो उसका नाम भी जगन सेठ नहीं। यही सब सोचता हुआ वह जगतार की योजना समझने के लिए उसके पास लौट चला।

जगतार ने उसे अपनी योजना सुनाई, जगन सेठ एकदम

भड़क कर बोला-'मान गए जगतार गुरु तुम्हारी अक्ल को। कागवाल तुम निकाल लाओगे और केसरी मेयर को खत्म करके अपराधी बन जाएगा और तुम उसके सरपरस्त। साधना पहले से ही तुम्हारे चक्कर में फंसी पड़ी है। सब झगड़े-टंटे खत्म। इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार। बस

आय रात यह सब कर ही डालो।'

मेयर की कोठी से निकला तो केसरी बुरी तरह क्षुब्ध और उत्तेजित था। उसे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि मेयर जित वह एक सच्चा और ईमानदार आदमी समझता था इस तरह उसके साथ धोखा कर जाएगा।

जीप को निरुद्देश्य सड़कों पर दौड़ाए लिए जा रहा था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाए। अपने चारों ओर उसे झूठ, मक्कारी और फरेब का जाल सा बुना हुआ लग रहा था। कहीं निस्तार नहीं मिलेगा उसे इस जाल से। सारी दुनिया ही उसे अपनी दश्मन सी दिखाई दे रही थी। कोई कीमत नहीं है यहां सचाई और ईमानदारी की। उसे जिन्दा रहना है तो इन चोरों के साथ चोर बनना ही पड़ेगा।

काफी देर तक वह जीप इधर से उधर दौड़ाता हुआ सड़कों पर भटकता रहा। फिर अचानक उसकी नजर एक बड़ से साईन बोर्ड पर पड़ी। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था-रलियाज बार।

हां शराब। लोग कहते हैं कि जलते हुए दिल के लिए शराब अमृत का काम देती है। उसका भी टो दिल जल रहा है प्रतिहिंसा की ज्वाला में। इस ज्वाला को अगर उसने नहीं बुझाया तो बह खुद उसे जलाकर राख कर देगी।

उसे पता भी नहीं चला कि कब वह जीप रोककर बार के

अन्दर घस कर एक मेज पर बैठा। कब उसने शराब मंगाई

और पीनी शुरू कर दी।

पीते-पीते ही वह सोच रहा था कि काश उसे एक पिस्तौल कहीं मे मिल जाए तो वह इस मेयर को तो मौत के घाट उतार ही देगा। अचानक उसे भैरोंसिंह नजर आया।

उठकर उसके पास पहुंचा। शराब के नशे ने उसे और भी ज्यादा दिलेर और बेबाक बना दिया था।

बोला-'अगर मैं गलती नहीं कर रहा तो तुम भैरोंसिंह ही हो ना?'

'हुजूर फारेस्ट आफिसर साहब ने सही पहचाना है मुझे।'

'तुम मेरा एक काम कर सकते हो?' अपनी मेब पर बैठने के बाद उसने भैरों से कहा।

'हुक्म कीजिए, हुजूर। करने लायक होगा तो जरूर करेंगे।'

'मुझे एक पिस्तौल चाहिए।'

भैरोसिंह ने चौंककर सावधानी से इधर-उधर देखा और फिर बोला-'यह बातें इतनी जोरदार आवाज में करने की नहीं होती हे आफिसर साहब। वैसे पिस्तौल का करेंगे क्या आप?'

'मुझे मेयर की हत्या करनी है।' उसने आगे की और झुकते हुए उसे अपना मजबूत इरादा बताया। 'बड़े ऊचे इरादे हैं।' भैरों बोला-'कब?'

'आज ही।'

'में देखता हूं कहीं से पिस्तौल हासिल की जा सकती है या नहीं। भैरों ने कहा-'लेकिन फिलहाल आप इस तरह खुले में मत बैठिए। किसी केबिन में बैठने का इन्तजाम करवा देता हूं मैं। और हां शराब भी जरा थोड़ी पीजिएगा। कहीं ऐसा न हो कि अपना इरादा पूरा करने से पहले आप खुद ही नशे में चित्त हो चुके हों।'

भैरों ने रलियाराम को उसका इन्तजाम करने के लिए कहा और चला गया। रलियाराम ने उसे एक केबिन में ले जाकर बैठा दिया।

कई घंटे बाद जब भैरों लौट कर आया तो उसे पिस्तौल दिखाता हुआ बोला-'काम तो हो गया है।'

उसने पिस्तौल हाथ में लेकर देखी, साथ ही मन ही मन सोचा कि आज मेयर को उसकी दगाबाजी की सबा देकर रहेगा।

'जरा सम्हाल कर रखिएगा बिना लायसेंस की है यह।' भैरों सिंह कह रहा था-'अगर भूमि. ने इस समेत पकड़ लिया तो बिना भाव के अन्दर हो जाएंगे।'

'कितने की है?'

'वह हिसाब भी बाद में हो जाएगा। पहले माप मेयर से तो

अपना हिसार-किताब चुकता कर लीजिए।'

एक खतरनाक निश्चय के साथ केसरी ने उस पिस्तौल पर हाथ फेरा-धाज रात सबसे पहले मेयर से ही हिसाब चुकता करेगा वह।
 
आधी रात के वाद केसरी बड़ी खामोशी के साथ चहार दीवारी पर करके मेयर की कोठी के कम्पाऊन्ड में कूद गया। पहले भी कई बार आ चुकने के कारण कोठी का नक्शा अच्छी तरह उसके दिमाग में छाया हुआ था। अन्धेरी झाड़ियों में अपने आपको छुपाता हुआ वह कोठी की इमारत के निकट पहुंचा।

वह जानता था कि मेयर का बैठरूम दूसरी मंजिल पर है। वहां तक पहंचने के लिए उसे पाईप का सहारा लेना पड़ेगा। लेकिन तभी उसकी नजर निचली मंजिल की एक खिड़की पर पड़ी। लगा खिड़की पूरी तरह बन्द नहीं है। निकट जाकर देखा।

वाकई खिड़की का एक दरवाजा खला हुआ था। भाग्य साथ सगा। खामोशी के साथ वह खिड़की के रास्ते भीतर प्रविष्ट हो गया। फिर इस बात की सावधानी बरतता हुआ कि कहीं अन्धेरे में किसी चीज से टकरा न बैठे, वह सीढ़ियों की ओर बढ़ चला।

बिना कोई आवाज किए विल्ली की सी खामोशी के साथ वह सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच गया। मेयर के बैडरून का दरवाजा धकेलकर खोलने का प्रयत्न किया उसने। तब तो दरवाजा नहीं खुला लेकिन थोड़ा हैंडिल घुमा कर उसने जोर लगाया तो वह खुल गया। बड़े धीरे से बहु भीतर सरक गया। इतनी आसानी से अपने शिकार तक पहुंच जाएगा यह तो उसने सोचा भी नहीं था।

छोटे से नीले रंग के नाईट बल्ब की रोशनी में उसने मेयर को बड़े आराम से अपने पलंग पर लेटा हुआ पाया।

जेब से पिस्तौल निकाल कर उसकी ओर तान दी। इच्छा हुई अभी शूट कर दे। लेकिन नहीं। मरने से पहने कम से कम उसे यह तो मालूम हो ही जाना चाहिए कि वह क्यों मर रहा है और उसे कौन मार रहा है।

आगे बढ़कर उसने बुरी तरह झिंझोड़ दिया मेयर को।

बौखला कर झट-पट उठते हुए मेयर ने निकट रखे टेबिल लैम्प का स्विच ऑन कर दिया और उसकी रोशनी में जो उसका चेहरा और उस पर छाए खतरनाक भावों को देखा तो वह बोला-'केसरी तु तु तुम?'

'हां मैं।

'तुम यहां क्या कर रहे हो?'

'जो आज दिन में नही कर सका।' केसरी उसके चेहरे की

ओर अपनी पिस्तौल तानता हुआ बोला-'क्योंकि ईश्वर से तो तेरा कभी दूर का भी वास्ता नहीं रहा मेयर। इसलिए अपने शैतान क याद कर ले क्योंकि अब तुझे मेरे हाथों से दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकता।'

पिस्तौल को अपनी ओर तना देखकर मेयर की हवा खराब हो गयी थी। उसकी सारी चेतना, सारी बुद्धि केसरी के हाथ में दबी पिस्तौल पर केन्द्रित हो गई थी जिससे निकली कोई भी गोली उसकी मौत का कारण बन सकती थी।

वह उसे रोकने के लिए विधियाया-'केसरी'।'

लेकिन केसरी पर उसकी घिघियाहट का कोई असर नहीं हुआ। वह पिस्तौल का ट्रिगर दबाने ही जा रहा था कि तभी उसे लगा जैसे उसका सिर घूम गया हो। किसी ने पीछे से उसके सिर पर चोट की थी। उस अज्ञात आक्रमण का मुकाबला करने के लिए वह एकदम घूम गया।

तभी सिर पर एक और चोट हुई और वह अपने कदमों पर खड़ा न रह सका।

लेकिन बेहोश होकर नीचे गिरने से पहले उसने अपने आक्रमणकारी को पहचान लिया था कि वह कोई और नहीं बल्कि फरार मुजरिम जगतार ही था।

इतना जानने के बाद उसे कोई होश नहीं रहा।

मेयर को इस बात का पता भी न लग सका कि किसने कहां से आकर उसे निश्चित मृत्यु के भयानक मुख से बचा लिया। उसकी समस्त चेतना इस तरह केन्द्रीभूत हो गई थी कि कुछ देर के लिए उसे सब कुछ दिखाई देना बन्द हो गया था।

दिखाई दे रही थी तो सिर्फ केसरी के हाथ में दबी हुई पिस्तौल।

मौत के भय से पथरा सी गई आंखों को कुछ अजीब सी हलचल का अहसास तो हुआ किन्तु वह न समझ 'पाया कि यह सब कैसे हो गया।

जब कुछ देखने समझने योग्य हुआ तो अपने तेजी से धड़कते दिल की रफ्तार कम करने के लिए छाती को सहलाते हुए

एक नजर बेहोक्ष पड़े केसरी की ओर देखा और अपने सामने खड़े जगतार से बोला-'सही टाईम पर पहुंच कर बचा लिया तुमने मुझे। लेकिन तुम हो कौन भाई?'

'मैं एक चोर हूं।' जगतार ने बड़े आराम से जवाब दिया।

'चोरी करने के इरादे से आए थे?' 'जाहिर है कि कोई चोर किसी दूसरे के मकान में चोरी करने

के इरादे से ही प्रविष्ट होगा।' 'अब तुम्हें चोरी करने की जरूरत नहीं।' मेयर पलंग से उठता हुआ बोला-'जितना पैसा चाहोगे मैं तुम्हें दे दूंगा। बैठो, आराम से बैठा अब तुम।' जगतार बैडरूम में ही रखी एक कीमती गद्देदार कुर्सी पर बैठ गया।

मेयर एक कोने में रखे फिन की ओर बढ़ता हुआ बोला-'बीयर पियोगे?'

'कोई इससे सख्त चीज नहीं है?'

'व्हिस्की है वह चलेगी?'

'हां तुम्हारा साथ देने के लिए व्हिस्की चला लेंगे।' मेयर ने गिलास बोनल एक मेज पर रखी और फिर बर्फ की ट्रे लाकर दोनों गिलासों में व्हिस्की डाली।

गिलास जगतार से टकराता हुआ वह बोला-'अपने चोर दोस्त की सेहत के लिए।

फिर कूछ बूंट भरने के बाद वह बेहोश केसरी की ओर देखता हुआ बोला-'लेकिन यह समझ में नही आया कि यह यही आ कैसे गया?'

'जब मुझे आने में कोई दिक्कत नहीं हुई तो इसे ही क्या दिक्कत दोती।' जगतार रोना-'इमारत का पहरा देने वाले जो

तुम्हारे शेर जैसे दो खतरनाक बुलडाग थे वे मेरा खिलाया गोश्त खाकर बेहोश पड़े हैं। चोरी करके लौट रहा था तो जो रास्ता मैंने अपने लिए बनाया था उससे इसे अन्दर आते हुए देखा। पहले तो समझा कि यह कोई अपना ही भाई-बन्द है

और चोरी के इरादे से अन्दर घुसा है। लेकिन जब इसकी हरकतें कुछ अजीब-सी लगी तो उत्सुकतावश इसके पीछे लग गया। जब मैंने देखा कि यह तो तम्हें जान से ही मारने वाला है तो फिर मेरे लिए अपने-आपकाँ छिपाए रखना बहुत मुश्किल हो गया।'

'भगवान जो करता है अच्छा ही करता है।' मेयर अपना गिलास खाली करता हुआ बोला-'मैं तो कहूंगा कि भगवान ने, आज मेरी रक्षा करने के लिए ही तुम्हें चोरी करने की प्रेरणा दो है। लाओ गिलास आगे लाओ।' जगतार अपना गिलास उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'नहीं, भगवान ने मुझे कोई प्रेरणा-प्रेरणा नहीं दी। वह तो।'

'अरे तुम नहीं समझोगे उस अन्तर्यामी के तरीकों को।' मेयर गिलास में डालकर उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'सब अपने-अपने कर्मों के मुताबिक दुःख-सुख उठाने के लिए उसी के द्वारा प्रेरित होते हैं। यह मूर्ख भी अपने पुराने पापों का फल भोगने के लिए उसी की माया से प्रेरित हुआ और तुम्हारे पुण्य फलों का लाभ देने के लिए उसी ने तुम्हें मेरे यहां चोरी करने की प्रेरणा दी।'

'मुझे नहीं मालूम कि आपके उस भगवान ने किमको क्या दिया।' जगतार बोला-'लेकिन मुझे अपना मालम है कि अपके यहां चोरी करने की प्रेरणा मुझे जगन सेठ ने दी थी।'

उसकी वात सुनकर ह्विस्की पीते हुए मेयर को ऐसा लगा जैसे उसे किन्हीं अज्ञात हाथों ने बुरी तरह झकझोर दिया हो। हलक से नीचे को जाती हुई ह्विस्की झटका खाकर नाक के रास्ते से बाहर निकल आई। गिलास हाथ से छूटकर निकल गया।

एक ही झटके में सारा अध्यात्म भूल गया वह।

'तु"तुम"म्हें जगन सेठ ने भेजा है चोरी करने के लिए?' बह एकदम हकलाए से स्वर में बोला।

'हां।' जगतार ने गरदन हिलाई और ह्विस्की का चूंट भरा।

'क्या चराने आए हो?'

'चुराने आया नहीं हूं बल्कि अब तो चुराकर जा रहा हूं।'

'यानि ।'

'शायद तुम समझ गए होगे।' जगतार बोला-'तुम्हारी सेफ में रखे कुछ कागजात की सख्त बरूरत थी जगन सेठे को। बस

वही ले जा रहा हूं।' 'लेकिन तुमने वह सेफ कैसे खोल ली?' भ्रमित-सा मेयर बोला-'बहु दुनिया की सबसे मजबूत ।' 'दुनिया की सबसे मजबूत चीजें तोड़ने के लिए ही दुनिया में सबसे मजबूत आदमी पैदा होते हैं।'

'नहीं में तुम्हें वह कागजात नहीं ले जाने दूंगा।'

कहने के साथ ही मेयर बेहोश केशरी की गिरी हुई पिस्तौल उठाने के लिए झपटा। लेकिन तभी जगतार के पैर की ठोकर उसकी पसलियों में पड़ी और वह उछलकर पलंग पर जा गिरा।
 
उसने पलंग पर पड़े पड़े ही विस्फारित नेत्रों से अपने निकट

आ गए जगतार को देखा जो उस खतरनाक ढंग से घूरता हैजा क रहा था-'ऐसा दुनिया मैं कोई माई का लाल आज तक पैदा नहीं हुआ जो जगतार को कहीं आने-जाने से रोक सके।'

'तो तुम जगतार हो-वह फरार मुजरिम।'

'अब पहचान लिया ना तुमने मुझे अच्छी तरह से?' 'देखो जगतार वह कागजात मुझे दे दो।' मेयर ने एकदम

अपना अन्दाज बदलते हुए उसे फुमलाने के से ढंग में कहा-'बदले में तुम जितना चाहोगे मैं पैसा देने को तैयार हूं। लाख डेढ़ लाख जो कहो।' "मुंह मांगा पैसा तो जगन सेठ भी देने को तैयार है।'

'जो कुछ भी जगन सेठ देगा मैं उससे पच्चीस हजार फालतू देने को तैयार हूं।'

'यद हुई ना कुछ बाद।' जगतार धीरे से मुस्कराया-'अब तुम दोनो में से इन कागजातों की जो सही कीमत देगा यह इन्हें ले लेगा।'

'यानि तुम इन कागबातों को नीलाम करोगे?'

'जब दोनों पार्टियां एफ-दूसरे से ज्यादा बढ़-चढ़कर बोली लगाने के लिए तैयार हैं तो ज्यादा-से-ज्यादा पैसा हासिल करने में बुराई क्या है।' जगतार बोला-'सिर्फ एक बुराई है।'

'वह क्या?'

'इस मक्करबाजी में जगन सेठ तो निश्चित रूप से तबाह हो जाएगा लेकिन बच तुम भी नही सकोगे। ज्यादा सम्भावना इसी बात की है कि एक-दूसरे के चक्कर में तुम दोनों खत्म हो जाओगे ओर मुझे कुछ लाख का पायदा हो जाएगा।'

'आखिर तुम कहना क्या चाहते हो।'

'वही बतान जा रहा हूं।' जगतार बोना-'जरा गिलास में ह्विस्की डालो।' मेयर उसके गिलास में ह्विस्की डालने लगा।

ह्विस्की के बूंट भरता हुआ जगतार बोला-'तुम जगन सेठ से

पच्चीस हजार फालतू देन को तैयार हो, जगन सेठ तुमसे पचास हजार देने को तैयार हो जाएगा। इन कागजातों की कीमत बढ़ती जाएगी और उसके साथ ही तम लोगों की आपसी दुश्मनी भी। मैं तो शायद इन कागजों के बदले में कई लाख कमाकर चला जाऊं। लेकिन तुम दोनों की बढ़ी हुई दुश्मनी एक-दूसरे को पूरी तरह बरबाद कर देगी। मैं गलत तो नहीं कह रहा?'

'कह तो तुम ठीक रहे हो लेकिन इसके अलावा कोई चारा भी

तो नही है।'

'है एक चारा।'

मेयर ने उसकी ओर प्रश्नपूर्ण दृष्टि से देखा। 'अगर आपसी झगड़ों को भूलाकर अगर तुम दोनों मिल जाओ।'

'नहीं।' उसकी बात पूरी होने से पहले ही मेयर झटके के साथ बोला-'यह असम्भव है।'

'पहले मेरी बात सुन लो।' जगतार बोला-'अगर तुम दोनों का आपस में मिलना असम्भव है तो एक काम तो यह हो सकना है कि मैं अभी तुम्हें गोली मार दूं। तब बच जाएगा जगन सेठ

और जगन सेठ के साथ में अपना चक्कर चला लूं। वह चककर पहले से ही चला हुआ है। लिहाजा आसान तरीका यही है कि तुम्हें रास्ते से हटा दिया जाए।'

'जगन सेठ कमी वफादार नहीं हो सकता तुम्हारे साथ?' मेयर

अपने सूखते होंठों पर जबान फेरता हुआ बोला।

'तब दूसरा तरीका यही है कि मैं तुमरे साथ मिल जाऊं और हम दोनों जगन सेठ का सफाया कर दे।'

'यही बात तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं।' मेयर उत्साहित

स्वर में बोला।

'उसने पहले मुझे यह बता दो कि तुम्हारी और जगन सेठ की खोपड़ी आपस में मिल जाए तब इस शहर से ज्यादा फायदा उठाया जा सकता है या नहीं?'

'बिल्कुल उठाया जा सकता है और पहले मिलकर फायदा उठाया है, वह तो जगन सेठ जरा अपनी तड़ी में ।'

'जो हो चुका उसे भूल जाओ। अगर हम सब मिल जाएं तो फायदा ज्यादा उठा सकते हैं या नहीं?'

'मैं तुम्हार बात मान भी लूं तो क्या जगन सेठ मिलने की तैयार हो जाएगा?'

'तुम अगर मिलने को तैयार हो तो जगन सेठ को मिलने के लिए मैं मजबूर कर दूंगा।'

'मैं तो तैयार हूं। लेकिन ।'

'अब लेकिन क्या?'

'कहीं कोई गड़बड़ न हो।'

'इसे देख रहे हो?' जगतार ने बेहोश केसरी की ओर संकेत करते हुए कहा-'अगर ऐन वक्त पर मैंने इसे न रोक लिया होता तो इतनी बड़ी गड़बड़ हो गई होती कि तुम कुछु कहने-सुनने की हालत में न होते इस वक्त। तुम्हें मौत के मुंह से निकाल लाया। क्या यह मेरी सच्चाई का सबूत नहीं है।' मेयर ने कुछ देर उसकी ओर देखा और सोचा। फिर अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और जैसा तुम कहोगे मैं करने को तैयार हूं।'

जगतार ने उससे हाथ नहीं मिलाया।

बोला-'पहले तुम्हारे और जगन सेठ के हाथ आपस में मिलवा दूं फिर तुम लोगों से हाथ मिलाऊंगा मैं। हां चलने में पहले एक बार फिर से गिलास जरूर टकराऊंगा तुम्हारे साथ।'

मेयर ने उससे गिलास टकराते हुए कहा-'उन कागजातों के साथ तुम्हें कुछ फोटो ग्राक्स भी मिले होगे।' 'साधना के?'

'उसमें मेरा कोई दोष नहीं हई वे सब जगन सेठ की

कारस्तानी...।'

'उसे भूल जाओ।' जगतार ने कहा-'बड़ी बातों के आगे ऐसी छोटी-माटी बातें नहीं सोचनी चाहिए। फोटो ग्राफ्स और नैगेटिव के लिफाफे भी अपने साथ लिए जा रहा हूं। आराम से बैठकर देखूगा।'

मेयर के सिर से जैसे बोझ-सा हटा हो। वह सोच रहा था कि रहीं उन्हें उसके सेफ में पाकर वह उसकी ही कारस्तानी न समझे।

अपना खाली गिलास मेज पर रखता हुआ बोला जगतार-'अच्छा तो में चलता हूं। कल सुबह नौ बजे मेरे फोन का इन्तजार करना।'

'लेकिन इसका क्या करें?' मेयर ने बेहोश केसरी की ओर संकेत करते हुए पूछा।

'अगर मेरा एक हाथ घायल न होता तो इसे ऐसे ही उठाकर कहीं डाल देता। लेकिन अब तो होश में ही लाना पड़ेगा।'

कहते हुए जगतार ने बर्फ की ट्रे का ठण्डा पानी बेहोश केसरी के मुह पर डाल दिया।

केसरी एकदम चौंककर उठा तो जगतार बोला-'उठिए साले साहब यह कोई सराय या रेलवे स्टेशन नहीं है जहां आराम से पड़े हुए हैं। जाइए धर जाकर आराम कीजिए।'

'काम हो गया?'

मेयर की कोठी से कुछ दूर हटकर अंधेरे में खड़े जगन सेठ ने उसे देखते ही बेताबी के साथ पूछा। उसके पीछे के और भो गहरे अंधेरे में जगन सेठ की कार और फारेस्ट आफिसर की जीप खड़ी हुई थी, जिसकी पिछली सीट पर लेटा भैरों उनके पहुंचने की आहट सुनते ही कूदकर बाहर आ गया था।

जगतार ने जगन सेठ की बात का कोई जवाव न देकर केसरी को जीप की ओर धकेलते हुए कहा-'भैरोसिंह जरा इस मिट्टी के शेर को इसके बंगले तक पहुंचा देना।'

'आइए फारेस्ट आफिसर साहब।' भैरों ने केसरी को जीप में

बैठाया और वहां से चल दिया।

'वो कागजात कहां हैं?' जगन सेठ ने बेताबी के साथ पूछा।

'सारा किस्सा बताता हूं पहले यहां से खिसक तो लो।'

जगतार ने घावों की पट्टियां छुपाने के लिए ओढ़ी गई चादर को ठीक करते हुए कहा। ड्राइवर नहीं था। इसलिए चालक की सीट पर जगन सेठ को खुद ही बैठना पड़ा। जगतार उसके साथ ही अगली सीट पर बैठ कर औजारों का बरसा उसने पिछली सीट पर पटक दिया।

'तुमने सच ही कहा था जगन सेठ।' जब कार वहां से चल दी

तो जगतार बोला -'वह सेफ वाकई बहुत सख्त है।'

'वो कागजात लाए या नही?'

'जब सेफ ही नही खुली तो कागजात कहां से ले आता।'

जगतार की बात सुनते ही जगन सेठ ने झटके के साय गाड़ी रोकी और चौंककर उसकी ओर देखा।

'गाड़ी तो चलाते रही या सड़क पर ही सवेरा करने का इरादा है?'

'तुम तो बड़ी डींग मार रहे थे कि दुनिया की कोई सैफ ऐसी नहीं जो तुम्हारा हाथ लगते ही न खुल जाए। यह न हो जाए वो ना हो जाए मगर वक्त पर हुआ कुछ नहीं टांय-टांय फिस्स...।'

'डीम तो गलन नहीं मार रहा था जगन सेठ।' जगतार एक

लम्बी सांस के साथ वोला-'लेकिन उस वक्त यह नहीं मालूम था कि ऐन वक्त पर मह साला तूसरा हाथ साथ देने से बिल्कुल ही इन्कार कर देगा।'

जगन सेठ को जैसे ही उसकी धायलावस्था का ध्यान आया तो वह कुछ ढीला पड़ा। निराशापूर्ण ढंग से सिर हिलाता इआ बोला-'लगता है मेरी

कुछ किस्मत ही खराब है। जब तुम अन्दर गए थे तो गोचा था कि जब तुम बाहर आओगे तो कागजात मेरे हाथों में होगे

और मेयर के मरने की खार मेरे कानों में।'

'जब सेफ नहीं खुली तो मुझे सारी योजना बदलनी पड़ी। यह फारेस्ट आफिसर तो मेरे बनाए हुए रास्ते पर चलता हुआ बड़े आराम से पहुंच गया था उसके बैडरूम में उसे जान से मारने के लिए। वह नो शुक्र समझो कि ऐन वक्त पर मैं वहां पहुंच गया और इसे रोकने के लिए पीछे से इसके सिर पर वार किया।

'मर जाने देते साले को तुम्हें रोकने की क्या जरूरत थी।'

'उस साले को तो मर जाने देता मगर मेरा होने वाला साला विना मतलब के कत्ल का अपराधी बन जाता तो उससे क्या

फायदा होता। अब तुम जरा एक बढ़िया-सी सिगरेट पिलवाओ तो फिर तुम्हें एक ऐसी बढ़िया खबर सुनाता हूं कि फड़क उठोगे।'

जगन सेठ ने अपना कीमती सिगरेटकेस और लाइटर निकालकर उसे दे दिया। उसने एक हाथ से सिगरेटकेस खोलकर सिगरेट निकाली और उसे होंठों में लगाता हुधा बोला-'अब जरा इसे जला तो दो।'

जगन सेठ ने उपेक्षा से उसकी सिगरेट जला दी।

'मेरी नाकामयाबी पर नाराज हो तुम।' जगतार सिगरेट का धुआं उड़ाता हुआ बोला-'लेकिन जब कामयाबी के बारे में सुनोगे तो खुशी के मरे उछल पड़ोगे।'

'अब कौन-सी कामयाबी रह गई है तम्हारी?' भरे हुए-से स्वर में जगन सेठ ने कहा-'मेरी गरदन तो उस साले मेयर के चंगुल में ही फंसी पड़ी है।'

'कल मेयर कागजातों के साथ आएगा और हाथ जोड़कर तुमसे समझौता करने की विनती करेगा। कहो कैसी रही?' 'अव मुझे तुम्हारी किसी बात का कोई विश्वास नहीं हो सकता।'

'गाड़ी रोको जगन सेठ।'

जगतार ने ऐसे सख्त से स्वर में कहा कि जगन सेठ ने एकदम गाड़ी रोक दी। जगतार ने झटके से दरवाजा खोला और नीचे उतरकर बोला-'अब बाकी की वातें तभी होंगी जब तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास होने लगेगा। कल सुबह नौ बजे फोन का इन्तजार करना।'

इसते पटले कि जयन सेठ कुछ कह पाता जगतार बाहर के

अंधेरे में विलीन हो चुका था।

 
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