• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

बहुरानी की प्रेम कहानी complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
मैं पूरी तन्मयता के साथ बहूरानी की जांगहें और चूत का त्रिभुज चूम चूम के चाटे जा रहा था और बहूरानी अपनी एड़ियाँ बेड पर रगड़ते हुए कामुक सिसकारियां निकाल रही थी.

“हाय पापा जी, खा जाओ मेरी चूत को, ये लो.” बहूरानी बोली और अपनी चूत की फांकें दोनों हाथों से धीमे से खोल दी.

मैंने भी अपनी जीभ उसकी चूत के दाने पर रख दी और उसके निप्पल निचोड़ता हुआ चाटने लगा. बीच बीच में मैं उसकी चूत के दाने को थोड़ा जोर से दांतों में दबा लेता जिससे बहूरानी उत्तेजना के मारे उछल जाती और मेरे बाल मुट्ठी में भर लेती.

ऐसे करने से बहूरानी कुछ ही देर झेल पाई और उसकी चूत का बांध टूट गया, वो भलभला के झड़ गयी और बदन को ढीला छोड़ के गहरी गहरी सांसें लेने लगी.

“अब आप लेट जाओ पापा!”

मेरे लेटते ही बहूरानी ने मेरा लंड पकड़ लिया और जल्दी जल्दी आठ दस बार इसे मुठियाया और फिर सुपारा मुंह में भर लिया और मेरी तरफ मुस्कुरा के देखती हुई चूसने लगी. लंड चूसने में तो मेरी बहूरानी को विशेष योग्यता प्राप्त है. लंड कैसे कहाँ से पकड़ना है कैसे चाटना है, लंड को हाथ से छोड़ के जीभ से कैसे छूना चाटना और मुंह में लेना है; ये सब कला वो बखूबी जानती है.

कुछ देर बहूरानी ने सुपारा चूसने के बाद लंड छोड़ दिया और सुपारा भी मुंह से बाहर निकाल दिया और एक जोरदार चटखारा लिया जैसे कोई पसंदीदा चाट खा कर स्वाद लेते हुए चटखारे लेते हैं या कोई बच्चा अपने मन पसन्द खिलौने से खेल कर हर्षित होता है.

मेरा तमतमाया हुआ लंड छत की तरफ मुंह उठाये किसी खम्भे जैसा खड़ा था, बहूरानी की लार नीचे बह बह के मेरे अण्डों को भिगो रही थी. बहूरानी ने लंड को फिर से चूमा और फिर से इसे चूस चूस कर लाड़ प्यार करने लगी साथ में दूसरे हाथ से अपनी चूत भी सहलाती मसलती जा रही थी.

“पापा जी, अब जल्दी से अपना झंडा गाड़ दो मेरी चूत में.” वो बोली और मेरे बगल में लेट गयी.

मैंने भी देर न करते हुए अपनी पोजीशन ले ली, मुझे भी निपटने की जल्दी थी, आधी रात कब की गुजर चुकी थी मेरे पास बस यही रात थी. कल शाम को साढ़े पांच की ट्रेन से मेरा बेटा बैंगलोर से वापिस लौट रहा था.

यही सोचते हुए मैंने अपना लंड बहूरानी की चूत से सटाया और एकदम से पेल दिया लेकिन लंड फिसल गया, मैंने फिर से उसकी चूत के छेद पर लंड को बिठाया और धकिया दिया आगे.

लेकिन नहीं, बहू रानी की चूत का दरवाजा तो जैसे सील बंद था.

मैंने बहूरानी की ओर देखा तो वो हंस रही थी.

“अदिति तू हंस क्यों रही है?”

“घुसाओ पापा जी, पूरी ताकत लगा दो लंड की.” बहूरानी बोली और वो हंस दी.

मैं भी अचंभित था, जिस चूत को मैं पहले बीसों बार चोद चुका था, जिस चूत के मुहाने पर लंड रखते ही वो लंड को गप्प से लील जाती थी आज वही चूत किसी सील बन्द कुंवारी कन्या की चूत की तरह टाइट सील बंद सी लग रही थी.

मैंने फिर से चूत को अपने हाथों से खोला और चूत के भीतर का जायजा लिया. बहूरानी की चूत की सुरंग जैसे चिपक गयी थी, ‘एडमिशन क्लोज्ड’ जैसी स्थिति लग रही थी.

“ओये अदिति… ये तेरी चूत आज इतनी तंग कैसे हो गयी किसी बच्ची की चूत की जैसे?”

“पापा जी, मैंने कहा था न आपसे कि आपको बेड में सरप्राइज दूंगी. यही सरप्राइज है. अब आप ताकत से लंड घुसाओ और जीत लो मुझे!” बहू रानी जैसे चैलेंज भरे स्वर में बोली.

“अच्छा. देखता हूँ. अभी लो.” मैंने कहा और उसकी चूत को अच्छे से खोल कर चाटना शुरू किया और अपनी बीच वाली उंगली थूक से गीली करके चूत में घुसाई. बड़ी मुश्किल से दो पोर ही घुसीं थीं कि आगे रास्ता बंद मिला.

उधर बहूरानी मुझे देख देख के मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी- क्या हुआ पापा, आपकी उंगली भी नहीं घुस रही है अपना मूसल कैसे घुसाओगे मेरी छुटकी में?

 
“तेरा सरप्राइज अच्छा लगा अदिति बिटिया, अभी देख कैसे घुसता है तेरी छुटकी में!” मैंने कहा और उठ कर बहूरानी की ड्रेसिंग टेबल से हेयर आयल की शीशी में से तेल लेकर लंड को अच्छे से चुपड़ लिया और दो तीन बार फोरस्किन को आगे पीछे कर के लंड को चूत के द्वार पर रखा और धीरे धीरे ताकत से आगे धकेलने लगा.

ऐसे तीन चार बार करने से मेरी कोशिश रंग लायी और मेरा सुपाड़ा बहू की चूत में घुसने में कामयाब हो गया. मैं इसी पोजीशन में गहरी गहरी सांसें भरता हुआ लंड को आगे पीछे डुलाता रहा. कुछ ही देर में लगा की चूत कुछ नर्म पड़ गयी है. बस अब क्या था; बहूरानी के दोनों मम्में कस कर दबोच कर लंड को पूरी ताकत से फॉरवर्ड कर दिया उसकी चूत में.

इस बार पूरा लंड जड़ तक समा गया बहू की चूत में. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा लंड किसी ने अपनी मुट्ठी में पकड़ कर ताकत से दबा रखा हो.

उधर बहू रानी के चेहरे पर तकलीफ के चिह्न दिखाई दिए.

“वेलडन, पापा… यू हेव डन इट. नाउ फ़क मी लाइक एनीथिंग.” बहू रानी मुझे चूमते हुए बोली.

“वो तो अब चोदूँगा ही तेरी चूत को. पहले ये बता कि आज तेरी चूत ऐसी टाइट कैसे हो गयी?” मैंने अधीरता से पूछा.

“पापा जी क्या करोगे आप ये जान के. ये तो हम लेडीज का सीक्रेट हैं.”

“अरे बता तो सही, कैसे चिपका ली अपनी चूत तूने?”

“पापा जी, आपको क्या लेना देना इससे… आपने मुझे जीत लिया अब जैसे चाहो चोदो मुझे… ऍम हॉर्नी नाउ… फाड़ दो इसको!”

“नहीं, पहले बता तू, तभी चोदूँगा तेरे को!” मैंने भी जिद की और अपना लंड उसकी चूत से निकाल लिया.

“लेकिन आप जान के क्या करोगे?”

“तेरी सासू माँ की चूत भी ऐसी ही टाइट करके सरप्राइज दूंगा उसे.” मैंने कहा.

“ओह पापा जी, आप भी ना. अच्छा सुनो वो होती है न… उसे… … …” बहूरानी ने मुझे घिसी पिटी ढीली ढाली चूत को फिर से कुंवारी चूत की तरह टाइट कर लेने का उपाय बताया.

“इस प्रयोग को क्या कोई भी कर सकती है?” मैंने पूछा.

“नहीं पापा जी, स्त्री की उम्र उसकी चूत की बनावट और ढीलेपन के अनुसार ही इसका प्रयोग कुछ फेर बदल के साथ किया जाता है.”

“ह्म्म्म… बढ़िया. तो बेटा ये बता कि ये ज्ञान तुझे किसने दिया?”

“पापा जी, वो मेरी बड़ी मामी हैं न वो बुरहानपुर में आयुर्वेदाचार्य हैं. उनसे मेरी सहेलियों की तरह बातें होती हैं; एक बार उन्ही ने ये सब प्रयोग मुझे बताये थे. मैंने इस्तेमाल आज पहली बार ही किया है. ऐसे प्रयोग कई तरह के हैं मैं वो सब आपको बता दूंगी.”

“बढ़िया लगा. अब घर जा के तेरी सासू माँ की चूत की खबर लेता हूँ.” मैंने कहा और बहूरानी की तंग चूत में अपना मूसल पेलने लगा.

थोड़ी देर की मेहनत के बाद चूत की पकड़ कुछ लूज हुई तो लंड आराम से मूव करने लगा. बस फिर क्या था, मैंने बहूरानी के दोनों पैर अपने कन्धों पर रखे और उसकी दोनों चूचियां दबोच के चुदाई शुरू कर दी, पहले आराम से धीरे धीरे, फिर तेज और तेज फिर पूरी बेरहमी से. ऐसा लग रहा था जैसे किसी नयी नवेली चूत की पहली पहली चुदाई हो रही हो.

बहू रानी भी मस्ता गयी अच्छे से और कमर उठा उठा के हिचकोले खाती हुई लंड का मज़ा लेने लगीं.

मैं थोड़ी देर रिलैक्स करने के लिए रुक गया. मेरे रुक जाने से बहूरानी ने मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा जैसे आंखों ही आंखों में पूछ रही हो कि रुक क्यों गए.

“बस बेटा एक मिनट” मैंने कहा और लंड को उसकी चूत से बाहर खींच लिया. चूत से ‘पक्क’ जैसी आवाज निकली जैसे कोल्ड ड्रिंक का ढक्कन ओपनर से खोलते टाइम निकलती है.

बहूरानी की चूत रस से सराबोर होकर बहने लगी थी, मैंने नेपकिन से उसकी चूत और अपने लंड को अच्छे से पोंछा और चूत में उंगली घुसा कर भीतर की चिकनाई निकाल कर अपने टोपे पर चुपड़ी और बहू को घोड़ी बना कर लंड को फिर से चूत के ठीये पर रख कर धकेल दिया.

इस बार भी लंड को ठेलना पड़ा तब जा के रगड़ता हुआ घुस पाया.

“आह…धीरे पापा जी. चूत की चमड़ी खिंच रही है.” बहू रानी बोली.

“अदिति बेटा तुम्ही ने तो अपनी चूत कस ली है, अब लंड को थोड़ा सहन करो.” मैंने कहा और धीरे धीरे चोदने लगा बहू को.

एकाध मिनट की चुदाई के बाद बहूरानी की चूत रसीली हो उठी और लंड चूत में सटासट चलने लगा.

“आह… वंडरफुल चुदाई… लव यु माय ग्रेट पापा.” वो बोली और अपनी चूत ऊपर उठा दी.

मैं भी थोड़ा सा ऊपर को खिसका और जम के धकापेल उसकी चूत बजाने लगा. बहूरानी की चूत बिल्कुल वैसा मज़ा दे रही थी जैसे किसी कुंवारी गर्लफ्रेंड की चूत देती है.

 
बेडरूम में बहूरानी की कामुक कराहें और उसकी चूत से निकलतीं फचफच फचाफाच की आवाजें गूंज रहीं थीं उसकी चूत मेरे लंड से लोहा लेती हुई संघर्षरत थी.

जल्दी ही हम दोनों मंजिल के करीब जा पहुंचे और बहूरानी कामुक किलकारियां निकालती हुई कमर उछालने लगी और फिर उसने मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लिया और टाँगे मेरी कमर में लपेट कर झड़ने लगी.

मैंने भी आठ दस धक्के पूरी ताकत से लगाये; बहूरानी अपनी बांहों और टांगो से मुझे जकड़े थी जिससे मेरे धक्कों से उसका बदन उठता और गिरता था लेकिन वो मुझसे चिपटी रही और कुछ ही पलों में लंड जैसे फटने को हुआ और रस की फुहारों से चूत को भरने लगा और शीघ्र ही वीरगति को प्राप्त होकर निढाल बाहर निकल गया.

तो मित्रो, अब ये मेरी सच्ची दास्तान समाप्ति पर है. फिर उस रात हम दोनों नंगे ही लिपट कर बेसुध होकर सो गए.

हमेशा की तरह पांच बजे मेरी नींद खुल गयी, बहूरानी का एक हाथ अभी भी मेरी गर्दन में लिपटा था और वो नींद में किसी अबोध शिशु की तरह गहरी गहरी सांसें लेती हुई निद्रामग्न थी. उसके नग्न उरोज सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे.

जैसा कि सुबह सुबह होता ही है, मेरे लंड महाराज टनाटन तैयार खड़े थे मन तो हुआ कि नंगी बहूरानी के पैर खोल कर लंड चूत में पहना कर फिर से आँख मूंद कर पड़ा रहूँ. लेकिन बहूरानी को जगाने का दिल नहीं किया सो चुपके से बहूरानी के आगोश से निकलने लगा.

जैसे ही उसका हाथ अपनी गर्दन से हटाया वो जाग गयी- ऊंऊं… कहाँ जा रहे हो पापा?

उसने मुझे फिर से लिपटा लिया.

“अरे सुबह हो गयी, मैं तो जल्दी उठ जाता हूँ न. तू सोती रह आराम से!”

“नहीं, आप भी यहीं रहो मेरे पास.” बहूरानी ने मुझे फिर से लिपटा लिया.

थोड़ी ही देर में बहूरानी को मस्ती चढ़ने लगी और उसने मेरा लंड पकड़ के खेलना शुरू कर दिया फिर मेरी कमर में अपना पैर फंसा कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया और मुझे चूमने लगी. मैंने भी उसकी टांगें खोल के लंड को बहु की चूत पर रखा और धीरे से घकेल दिया भीतर.

“बस अब चुपचाप लेटे रहो पापा, धक्के नहीं लगाना.” वो बोली.

मुझे पता था इस पोजीशन का भी अपना अलग ही आनन्द है. चूत में लंड फंसाए पड़े रहो बस. ऐसी पोजीशन में भी बदन में अजीब सी सनसनाहट, सुरसुरी होती रहती है और फिर एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि दोनों पार्टनर मिसमिसा कर लिपट जाते हैं और चूत लंड की लड़ाई होने लगती है.

हुआ भी वही. हम लोग ऐसे ही एक दूसरे के अंगों का आनन्द महसूस करते चिपटे हुए लेटे रहे. लगभग आधे घंटे बाद लंड अनचाहे ही चूत में अन्दर बाहर होने लगा, उधर चूत भी प्रत्युत्तर देने लगी, हमारे होंठ एक दूसरे से लड़ने लगे. बहू रानी की जीभ पता नहीं कब मेरे मुंह में घुस गयी और वो करवट लिए लिए ही अपनी चूत चलाने लगी. जल्दी ही लंड ने लावा उगल दिया और चूत फैल सिकुड़ कर लंड को निचोड़ने लगी.

सुबह की धूप बेडरूम में खिड़की से झांकने लगी थी. हमारे नंगे जिस्म अभी भी चुदाई की खुमारी में थे.

“उठने दो पापा. काम वाली आ जायेगी सात बजे!”

“अरे अभी छह ही तो बजे हैं, चली जाना.”

“नहीं पापा. उठो आप भी और ड्राइंग रूम में सो जाओ. मैं बिस्तर ठीक कर दूं. काम वाली आपको यहाँ सोते देख पता नहीं क्या सोचे… अच्छा नहीं लगेगा.” बहूरानी ने अपनी चिंता जताई.

बहूरानी की समझदारी पर मैं भी खुश होता हुआ बिस्तर से निकल गया.

अब सोना किसे था. मैं तैयार होकर सुबह की सैर पर निकल पड़ा. उसी दिन मेरा बेटा बैंगलोर से वापस लौट रहा था. मुझे भी आज ही रात घर लौटना था. मेरी ट्रेन भी रात में साढ़े दस पर थी. बहूरानी के साथ चुदाई के ये दस दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला.

शाम को सवा पांच बजे मैं और बहू रानी स्टेशन पहुंच गए. बेटे की ट्रेन राईट टाइम थी. फिर मेरे चार पांच घंटे बेटे के साथ अच्छे से गुजरे.

डिनर के बाद बेटा और बहू दस बजे मुझे स्टेशन छोड़ने आये.

तो मित्रो, मैंने इस रियल सेक्स स्टोरी को भरसक ईमानदारी से लिखा है. हाँ कहीं कहीं मिर्च मसाला भी लगाया है ताकि कथा की रोचकता बनी रहे और आप सबके लंड और सबकी चूतें मज़ा लेती रहें पढ़ते पढ़ते.

अब आप सबको अपने अपने कमेंट्स जरूर लिखे और अपने अमूल्य सुझाव देने हैं ताकि मैं अपनी अगली कहानियों में उचित सुधार कर सकूं.

बस दोस्तो अगर बहुरानी और ससुर के बीच आगे कुछ होता है तो आपको जरूर बताऊंगा तब तक के लिए विदा दीजिये

....आपका सतीश

(Not complete)

 
“उफ्फ…अब हट भी जाइये, अब और कितना रगड़ोगे मुझे. आधा घंटा से ऊपर हो गया; मेरा तो दो बार हो भी चुका. थक गयी मैं बुरी तरह से सांस फूल गयी मेरी तो” मेरी रानी ने भुनभुनाते हुए कहा और मुझे परे धकेलने की कोशिश की.

“बस मेरी जान, होने वाला है, मेरा भी बस दो तीन मिनट और!” मैंने कहा और रानी (मेरी धर्मपत्नी) की चूत में ताबड़तोड़ धक्के लगा के जल्दी झड़ने की कोशिश करने लगा.रानी मेरे नीचे अपनी जांघें पूरी चौड़ी किये हुए पड़ी थी और उसकी अथाह गहरी चूत में मैं अपना लंड पेले जा रहा था. बेडरूम रानी की चूत से निकलती फचफच फचाफच की मधुर ध्वनि से गूँज रहा था, उनकी चूत से जैसे रस की नदिया सी बह रही थी. मेरी झांटें, जांघें, बिस्तर सब के सब उसकी चूत के रस में भीग चुके थे.

“उमर हो गयी आपकी, बच्चों की शादियाँ हो गयीं लेकिन आपकी आदतें आज भी वही जवानी वाली हैं जैसे कल ही शादी हुई हो अपनी. अरे अब थोड़ा धरम करम में भी मन लगाया करो!” रानी जी ने मुझे ज्ञान दिया.“ठीक है मेरी जान, तू भी तो पचास की होने वाली है लेकिन तेरी ये मस्त चूत अभी भी वैसी ही जवान छोरी की तरह है जैसी तीस साल पहले थी” मैंने बीवी को मक्खन लगाया और उनकी चूत में फुर्ती से धक्के मारने लगा.

“सैय्याँ जी, अब रहने भी दो ये मक्खन बाजी. मैं पहचानती हूं आपको अच्छे से. बस इसी टाइम मेरी तारीफ़ करते हो आप, मतलब निकल जाय फिर पहचानते नहीं.”“मेरी जान, तू ही तो मेरी अर्धांगिनी है. अरे तेरे सहारे ही तो मैं ये भव सागर पार उतरूंगा ना!” मैं अपनी बीवी को चूमते हुए कहा.“हूंम्मम्म, अच्छा सुनो एक मिनट ध्यान से; मैं वो तो बताना भूल ही गयी; अभी दोपहर में अदिति का फोन आया था आप उससे बात कर लेना कल सवेरे!”

“अदिति बहूरानी का फोन? किसलिए बात करना है?” मैंने कहा. अदिति बहूरानी का नाम सुनते ही मेरा लंड अचानक ही फूल कर कुप्पा हो गया. मैंने रानी के दोनों बूब्स पकड़ के लंड को बाहर तक खींच के एक पावरफुल शॉट उसकी चूत में मार दिया जैसे कि मैं अदिति बहूरानी को चोदता था.“हाय राम मार डाला रे!” रानी ने मुझे कसके अपनी बाहों में समेट लिया और अपनी टाँगे मेरी कमर में कस दीं. मेरे लंड ने भी लावा उगलना शुरू कर दिया उधर रानी की चूत तीसरी बार झड़ने लगी.

हम दोनों पति-पत्नी कुछ देर यूं ही एक दूजे की बांहों में पड़े अपनी अपनी साँसें काबू करते रहे. उनकी चूत रह रह के मेरे लंड को निचोड़ रही थी और फिर वो सिकुड़ गयी और मेरे लंड को बाहर धकेल दिया.पास पड़ी नेपकिन से रानी ने मेरा लंड अच्छे से पौंछ दिया और फिर अपनी चूत में घुसा कर उसे साफ़ करने लगी.

“हां, अब बता, अदिति क्या कह रही थी?” मैंने पूछा.“अरे वो उसके चचेरे भाई की शादी है न दिल्ली में. उसमें आपको जाना है उसी की बारे में बात करनी है उसे!”“ठीक है, मैं कल बात कर लूंगा बहूरानी से” मैंने कहा और सोने की कोशिश करने लगा.

प्रिय मित्रो, कहानी आगे बढ़ाने से पहले कुछ बातें मेरी पिछली कहानी “बहूरानी की प्रेमकहानी”.इस कहानी में आपने पढ़ा था कि मेरे बेटे को दस दिन की ट्रेनिंग पर बाहर जाना था और बहूरानी को अकेली न रहना पड़े इसलिए मुझे उसके पास दस दिनों के लिए जाना पड़ा था. उन दस दिनों में हम ससुर बहू ने क्या क्या गुल खिलाये कैसी कैसी चुदाई हुई, वो सब आप पिछली कहानी में पढ़ चुके हैं. उस बात को डेढ़ साल से कुछ ऊपर ही हो चुका है.

इन डेढ़ सालों में मैंने अपनी बहूरानी को देखा नहीं है और न ही कभी फोन पर बातें कीं और न ही कोई वीडियो चैट की; वैसे बहूरानी का फोन तो लगभग रोज ही आता है लेकिन अपनी सास के पास. लेकिन मुझसे कोई बात नहीं होती; बस सास बहू आपस में ही बतियाती रहतीं हैं.

अब मेरे बेटे का ट्रान्सफर बंगलौर हो गया है, कंपनी की तरफ से फ़्लैट भी मिला है तो बेटा बहू बंगलौर में ही रहते हैं अब.

एक बात और… अभी हफ्ते भर पहले अदिति बहूरानी के चाचा जी हमारे यहां आये थे उनके इकलौते बेटे की शादी का निमंत्रण देने के लिए. वे लोग दिल्ली में रहते हैं लड़की भी वहीँ की है तो शादी में किसी न किसी को दिल्ली तो जाना ही था. इस बारे में मैंने अपने बेटे से बात की तो उसने मना कर दिया कि उसे छुट्टी नहीं मिल रही. अब ऐसी स्थिति में मुझे ही जाना था शादी में.हालांकि अब शादी ब्याह में जाना मुझे अखरने लगा है लेकिन जब कोई खुद आ के निमंत्रण दे के जाए और रिश्ता भी ख़ास हो तो फिर जाना जरूरी हो ही जाता है.

इन्ही सब बातों को सोचते सोचते नींद ने कब मुझे घेर लिया पता ही न चला.

अगले दिन कोई साढ़े ग्यारह बजे श्रीमती जी ने मुझे फिर याद दिलाया कि अदिति से बात करनी है.“ठीक है तू अपने फोन से बात करा दे मेरी!” मैंने कहा.

 
अगले दिन कोई साढ़े ग्यारह बजे श्रीमती जी ने मुझे फिर याद दिलाया कि अदिति से बात करनी है.“ठीक है तू अपने फोन से बात करा दे मेरी!” मैंने कहा.

रानी ने नंबर डायल करके फोन मुझे दिया और खुद किचन में चली गयी लंच की तैयारी के लिए. मैं फोन कान से लगाये चेयर पर बैठा था, घंटी जा रही थी. कोई आधे मिनट बाद अदिति ने फोन लिया.“हेलो मम्मी जी, नमस्ते!” अदिति की सुरीली आवाज मेरे कानों में गूंजी.मैं डेढ़ साल बाद इस आवाज को सुन रहा था.

“हेल्लो मम्मी जी??” उधर से फिर वो बोली.“हां, अदिति बेटा, मैं हूं. रानी तो किचन में है खाना बना रही है.” मैं बोला.“पापाजी नमस्ते, कैसे हैं आप?”“आशीर्वाद, मैं बिल्कुल ठीक हूं अदिति बेटा, तू कैसी है?”“मैं भी ठीक से हूं पापा जी!”

“बेटा, रानी कह रही थी कि तुझे मुझसे कोई बात करनी है?” मैंने कहा.“हां, पापाजी, वो मेरे भाई की शादी है न दिल्ली में. उसी के बारे में बात करनी थी.”“बोलो बेटा क्या बात है?”“पापाजी मैं भी चलूंगी शादी में… एक ही तो भाई है मेरा!”“ठीक है बेटा, तू फ्लाइट से दिल्ली आ जाना, मैं यहाँ से ट्रेन से पहुंच जाऊँगा.” मैंने कहा.

“नहीं पापा जी, आप पहले बंगलौर आओ. फिर हम दोनों साथ ट्रेन से ही दिल्ली चलेंगे.”“यह क्या कह रही है तू बहू? मुझे ट्रेन से बंगलौर आने में पच्चीस छब्बीस घंटे लगेंगे और फिर हम दोनों बंगलौर से दिल्ली जायेंगे ट्रेन से. तुझे पता है बंगलौर से दिल्ली जाने में कम से कम पैंतीस छत्तीस घंटे लगते हैं सुपरफास्ट ट्रेन से? बेटा तू तो वैसे ही फूल सी नाजुक है ट्रेन के सफ़र में तेरी हालत खराब हो जायेगी और मैं भी थक जाऊंगा” मैंने बहू को समझाया.

“पापाजी, मैंने ये सब पहले ही सोच रखा है. पहले आप यहां आओ तो सही फिर साथ चलेंगे.” बहूरानी ने जैसे जिद की.“ये क्या जिद है बेटा, तू फ्लाइट से आजा मैं यहां से ट्रेन से आ जाता हूं; इसमें क्या प्रॉब्लम है?”“पापा जी, हम दोनों साथ में और छत्तीस घंटे का सफ़र… जरा फिर से सोचो तो सही आप?”“हां हां, पता है छत्तीस घंटे लगते हैं ट्रेन में इसमें सोचना क्या. ट्रेन की खटर पटर में पूरी दो रातें और एक पूरा दिन निकालना किसी सजा से कम नहीं होगा. अदिति बेटा तेरे बदन की पोर पोर दुखने लगेगी और बुरी तरह थक जायेगी तू और मेरी तो कमर ही अकड़ जायेगी उठते बैठते. इसलिए बेकार की जिद मत कर और तू प्लेन से ही चली जा दिल्ली; मैं यहां से ट्रेन से आ ही जाऊंगा.”

“पापाजी, वही तो मैं चाहती हूं कि मैं थक जाऊं आपके साथ इन छत्तीस घंटों में और आप अच्छे से थका देना मुझे जिससे मेरे बदन की पोर पोर दुखने लगे, मेरे अंग अंग में मीठा मीठा दर्द होने लगे!” बहूरानी जी बेहद मीठी आवाज में बोली.“क्या क्या क्या… मैं समझा नहीं बेटा?” मैंने कहा.

लेकिन बहूरानी की बातों का अर्थ समझ कर मेरे दिमाग की बत्ती झक्क से जल उठी.

“पापा जी, आप भी ना कितने भोले हो… आप जरा गहराई से सोचो तो सही. मेरा मतलब है हम दोनों राजधानी एक्सप्रेस के ऐ सी फर्स्ट क्लास के प्राइवेट कूपे में जिसमें सिर्फ दो ही बर्थ होती हैं और जिसे हम भीतर से लॉक कर सकते हैं… फिर हम चाहे जो भी करें… कोई हमें डिस्टर्ब करने वाला नहीं; वो भी पूरी दो रातें और एक पूरा दिन तक लगातार. फुल स्पीड से दौड़ती राजधानीएक्सप्रेस में वो सब बेफिक्र हो कर करना कितना मजेदार और नया अनुभव होगा न और आपकी कमर जब ऊपर नीचे होती रहेगी तो अकड़ेगी कैसे पापा? ऐसे सोचो न पापा जी. वैसे भी हमें मिले हुए डेढ़ साल से ऊपर ही हो गया. मेरा तो बहुत मन कर रहा है आपसे मिलने को!”

“अच्छा अच्छा… अब समझा. तू जीनियस है अदिति बेटा और मैं कितना बुद्धू हूं.” मैंने कहा और खुद को जोर से चिकोटी काट के सजा दी कि यह बात मुझे पहले क्यों नहीं सूझी कि बहूरानी मुझे ट्रेन से ही चलने के लिए क्यों जोर दे रही है.

“तो ठीक है पापा जी, मैं बंगलौर-निजामुद्दीन राजधानी में ऐ सी फर्स्ट क्लास का दो बर्थ वाला कूपा रिज़र्व करवा लेती हूं आप छह तारीख को यहाँ आ जाना. हम लोग अगले दिन सात तारीख को दिल्ली चलेंगे. शादी तो दस दिसम्बर की है न!”“अदिति बेटा, कोई ऐसी ट्रेन देख न जिसमें छप्पन घंटे लगते हों दिल्ली पहुँचने में!” मैंने कहा.

“अब रहने दो पापाजी, अभी तो आप बात समझ ही नहीं रहे थे; अब मन में लड्डू फूट रहे हैं आपके. अब तो मैं फ्लाइट से ही जाऊँगी दिल्ली और आप आते रहना पैसेंजर ट्रेन से!” बहूरानी खनकती हंसी हंसते हुए बोली.“अरे रे रे… अदिति बेटा, ऐसा जुल्म मत करना अपने पापा पे… तू तो मेरी एकलौती प्यारी प्यारी बहूरानी है न!”“हम्म!” उधर से बहूरानी की आवाज आई.

“ठीक है बहूरानी. ट्रेन में तो मैंने भी कभी चुदाई नहीं की पहले. अब तेरी खैर नहीं. राजधानी से भी तेज स्पीड से चोदूँगा तुझे पूरी दो रातों तक; तेरी तंग चूत का भोसड़ा न बन जाए तो कहना!” मैंने कहा.उधर से बहूरानी की खनकती हंसी सुनाई दी और उसने फोन काट दिया.

मैंने फोन को चूमा और किचिन में जा के रानी को दे दिया और उसे अपना बंगलौर और दिल्ली जाने का प्रोग्राम बता दिया.

तो मित्रो, जिस दिन बहूरानी से ये सब बातें हुयीं, उस दिन पिछले साल नवम्बर की 20 तारीख थी और अगले महीने दिसम्बर की तीन तारीख को मुझे बंगलौर रवाना होना था ताकि मैं छह की सुबह बैंगलोर पहुंच सकूं; फिर अगले दिन सात को दिल्ली के लिए निकलना था वहां से. मतलब मेरे पास बारह तेरह दिन ही शेष थे. यह मेरा फर्स्ट चांस था कि मुझे किसी राजधानी एक्सप्रेस के ऐ सी फर्स्ट क्लास में, वो भी दो बर्थ वाले कूपे में ट्रेवल करने का अवसर मिल रहा था. सुन रखा था कि ऐ सी फर्स्ट क्लास का किराया हवाई जहाज जितना ही होता है..

खैर जो भी हो, मुझे कोई ख़ास तैयारी तो करनी थी नहीं, बस यह पता था कि दिसम्बर में दिल्ली में भयंकर सर्दी होती है तो उसी के हिसाब से मैंने अपने सूट टाई वगैरह सब ड्राई क्लीन करवा के रख लिए.हां, मेरी बहूरानी को बिना झांटों वाला चिकना लंड पसन्द है ताकि वो उसे आराम से चूस चाट सके; अब ये काम तो मैं जाने के दिन ही करने वाला था.

मेरी बीवी रानी को झांटों वाला लंड ज्यादा पसन्द है क्योंकि वो कभी इसे मुंह में नहीं लेती बस चुदवाते टाइम उसे अपनी कमर उठा उठा के अपनी चूत का दाना मेरी झांटों से रगड़ने में बहुत मज़ा आता है और वो ऐसे करते हुए अच्छे से झड़ जाती है.सास बहू की पसन्द हमेशा अलग अलग ही होती है न; इन चूत वालियों की माया ही निराली है; किसी को कुछ तो किसी को कुछ और ही पसन्द आता है.

इस तरह हमारा प्रोग्राम सेट हो गया और मैं छह दिसम्बर की सुबह बैंगलोर जा पहुंचा. स्टेशन पर मेरा बेटा अपनी गाड़ी से मुझे रिसीव करने आया हुआ था; स्टेशन से घर पहुँचने में कोई पैंतीस चालीस मिनट लगे. मैं गाड़ी से उतर गया और बेटा गाड़ी को पार्क करने लगा.

ससुर बहू की कामवासना, प्रेम और चुदाई की कहानी जारी रहेगी.

 
मेरी सेक्स कहानी के पहले भाग में आपने पढ़ा कि मैंने अपनी बहू के साथ एक शादी में जाना था. बहू ने इस मौके का फ़ायदा उठाने का पूरा इंतजाम कर लिया था. उसने मुझे अपने पास बैंगलोर लिया. वहाँ से हमने ट्रेन से दिल्ली जाना था. फिर राजधानी एक्सप्रेस के प्राइवेट केबिन में डेढ़ दिन यानि पूरे 36-37 घंटे वासना और चोदन का नंगा धमाल होना तय था. बहूरानी के इस लाजवाब कार्यक्रम का मैं कायल हो गया और आने वाले रोमांच और रोमांस के बारे में सोच सोच कर मेरा मन प्रफुल्लित हुए जा रहा था.

तय कार्यक्रम के अनुसार मैं छह दिसम्बर की सुबह बैंगलोर जा पहुंचा. स्टेशन पर मेरा बेटा अपनी गाड़ी से मुझे रिसीव करने आया हुआ था; स्टेशन से घर पहुँचने में कोई पैंतीस चालीस मिनट लगे. मैं गाड़ी से उतर गया और बेटा गाड़ी को पार्क करने लगा. मेरे हृदय में बहूरानी से मिलने की अभिलाषा तीव्र से तीव्र हो रही थी, मैंने अपने बेटे के आने की प्रतीक्षा नहीं की और मैं अपने बेटे के फ़्लैट की ओर बढ़ गया.

दरवाजे पर पहुंचा और घंटी बजाने पर दरवाजा बहूरानी ने ही खोला.“नमस्ते पापा जी!” बहूरानी ने हमेशा की तरह मेरे पैर आत्मीयता से स्पर्श कर के मेरा स्वागत किया.“आशीर्वाद है अदिति बेटा, खुश रहो!” मैंने भी उसके सिर पर स्नेह से हाथ रख कर उसे आशीष दी और मेरा हाथ अनचाहे ही फिसल कर उसकी पीठ पर जा पहुंचा और उसकी गर्दन के पिछले भाग को सहलाता हुआ नीचे उतर कर उसकी ब्रा के हुक पर ठहर गया. ये सब कुछ ही क्षणों में हो गया. बहूरानी की ब्रा के हुक को मैंने ऐसे ही थोड़ा सा दबा दिया तो मेरी मंशा जान कर बहूरानी का जिस्म सिहर उठा.

बहू रानी तुरन्त उठ के सीधी हुई और मुझे शिकायत भरी निगाहों से लेकिन होंठों पर मुस्कराहट लिए देखती रही, तभी उसके होंठों ने ज़रा सा गोल होकर जैसे हवाई चुम्बन दिया; प्रत्युत्तर में मैंने भी अपने होठों से जवाब दिया.

मैं अपनी बहूरानी के इस आत्मीय और संतुलित व्यवहार से हमेशा ही अचंभित, अवाक्, खुश रहा हूँ. मेरी बहूरानी मुझ से अब तक कम से कम तीस पैंतीस बार तो चुद ही चुकी होगी परन्तु उनके व्यवहार में हमारे इन सेक्स रिश्तों की झलक भी कभी दिखाई नहीं दी.दूसरों के सामने की तो बात ही क्या, जब कभी हम अकेले भी होते तो बहूरानी हमेशा अपने सर पर पल्लू डाल के नज़र नीची करके मुझसे सम्मान से बात करती; उसने कभी भी मुझे यह बात जताई नहीं कि वो मेरी अंकशायिनी भी है.

कोई व्रत उपवास ऐसा नहीं है जिसे अदिति न करती हो. सोमवार तो उसका व्रत हमेशा ही रहता है इसके अलावा एकादशी, प्रदोष और साल में एक बार आने वाले व्रत जैसे जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नवदुर्गा इत्यादि न जाने कितने; सब पूरे विधि विधान से ही करती, निभाती है.अल्प शब्दों में कहा जाय तो सभी स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण है मेरी बहूरानी अदिति… और किसी भी सभ्रान्त परिवार की संस्कारी है मेरी प्यारी बहू!

अब यह बात अलग है कि वो मुझसे चुदवाते समय स्त्रियोचित लाज शर्म संकोच त्याग कर देवी रति का रूप धर किसी चुदासी कामिनी की तरह मेरा लंड हंस हंस के मेरी आँखों में झांकते हुए चूसती चाटती है और फिर उसे अपनी चूत में लील के किसी निर्लज्ज कामिनी की तरह मुझे उसे बलपूर्वक चोदने को उकसाती है और अपनी चूत उछाल उछाल के कामुक बातें कहती हुई अपने स्त्रीत्व को पूर्ण रूप से भोग लेती है. मेरी बहू की कामवासना काफी प्रखर है और मेरे साथ तो वो जैसे कामुकता की मूर्ति बन जाती है.

एक बात यहाँ और, मैं उस दिन अपनी बहूरानी को कोई डेढ़ साल बाद मिल रहा था. इन डेढ़ सालों में उसके जिस्म में आश्चर्यजनक बदलाव मैंने नोट किया; वो पहले से और भी छरहरी हो गयी थी उसका सुतवां जिस्म और भी सांचे में ढल गया था. किशोरियों या टीन गर्ल्स जैसी कमनीयता या आभा, ग्लो, दीप्ति या नूर कुछ भी कह लो; उसके जिस्म के अंग अंग से छलक रहा था.

मैं तो बहूरानी के कमनीय बदन में जैसे खो सा गया था कि “पापा जी, कहाँ खो गए आप?” बहूरानी की आवाज ने जैसे मुझे नींद से जगाया.“अदिति बेटा, तू इतनी बदल कैसे गयी, पहचान में ही नहीं आ रही आज तो?”“अच्छा, ऐसा क्या दिख रहा है मुझमें जो पहले नहीं दिखाई दिया आपको?” बहूरानी जरा इठला कर बोली.

तभी मेरे बेटे के क़दमों की आहट सुनाई दी, वो मेरा बैग वगैरह ले के आ रहा था. बहूरानी ने अपने होंठों पर उंगली रख के मुझे चुप रहने का इशारा किया; मैंने भी वक़्त की नजाकत को समझा और पास की कुर्सी पर बैठ गया.“बहूरानी, एक गिलास पानी ले आ… और फिर चाय बना दे जल्दी से!” प्रत्यक्षतः मैंने कहा.“जी अभी लाई पापा जी!” अदिति ने मुझे मुस्कुरा कर देखा और रसोई की तरफ चल दी.

 
अदिति के जाते ही मेरा बेटा मेरे पास बैठ गया और कुछ पारिवारिक बातें होने लगीं. मैंने उससे उसकी नौकरी से सम्बन्धित बातें पूछी, उसने घर परिवार के बारे में पूछा. वैसे तो ये सब बातें फोन पर लगभग रोज होती ही रहती हैं लेकिन आमने सामने मिलने पर चाहे औपचारिकता वहश ही सही, दोहराई ही जाती हैं.अदिति के चचेरे भाई की शादी थी तो बेटे बहू का जाना ज्यादा अच्छा लगता. यही बात मैंने अपने बेटे के सामने फिर से दोहराई लेकिन उसने अपने जॉब, करियर की मजबूरी बता दी और प्रॉमिस किया कि आगे से वो ये सब पारिवारिक जिम्मेवारियाँ खुद संभालेगा.

इतने में ही अदिति भी चाय लेकर आ गई और हम तीनों ने हल्की फुल्की यहाँ वहाँ की बातें करते हुए चाय खत्म की. ये सब बातें करते करते मेरी नज़र बार बार बहूरानी के बदले बदले से जिस्म को निहार रही थी और शायद बहूरानी भी मेरे मन के कौतुहल, जिज्ञासा को अच्छे से समझ रहीं थीं. इसीलिए उसने मेरी तरफ नज़र भर के देखा और आँख झपका के गर्दन हिला के मुझे इशारा किया कि वो मेरे मन की बात समझ रही है.

“सुनो जी, आप बाज़ार से ताजा दही ला दो. पापा जी को नाश्ते में दही जरूर चाहिये होता है, और दही ताजा ही लाना, खट्टा मत ले आना!” बहूरानी ने यह कहते हुए मेरे बेटे को बाज़ार भेज दिया.जैसे ही वो घर से बाहर निकला, मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो वो मेरी गोद में आ गिरी. बहूरानी के कूल्हे मेरी जांघों पर थे, मेरी एक बाजू पर बहू का सर टिक गया.“हाँ, पापा जी… अब बताओ, क्या कह रहे थे आप? बहुत इशारे कर रहे थे?” बहूरानी ने मेरी गोदी में बैठ कर मेरे गले में अपनी बांहों का हार पहना कर पूछा. उसकी आंखों से प्यार ही प्यार झलक रहा था.

बहूरानी के होंठ मेरे होंठों से बस चंद इंच की दूरी पर थे, बहू ने होंठों पर कोई लिपस्टिक आदि नहीं लगाई थी, उसके होंठ प्राकृतिक रूप से ही गुलाबी हैं.मन कर रहा था कि अभी बहू के लबों को चूम लूं मैं… लेकिन मैंने सब्र किया… मन में मैंने सोचा कि अभी कुछ देर मैं इन लबों को चूम लेने की लालसा को मन ले लिए तड़पता रहूँगा, इस तड़प में मुझे और ज्यादा आनन्द मिलेगा.

बहूरानी की बात को अनसुना करके और अपने मन में बहू के चुम्बन की इच्छा को दबा कर मैंने उसकी कमर में हाथ डाल के उसे अपने अंक में समेट लिया, पहले तो मैंने बहू को अपनी छाती से चिपटा लिया… अजीब सी शान्ति मिली मुझे बहू को अपने गले से लगा कर…

फिर मैंने बहू के वक्ष पर अपना चेहरा टिका दिया और मेरी नाक उसके मम्मों की गहरी घाटी में धंस सी गई. तब मैंने अपनी जीभ से बहू की क्लीवेज को तीन चार बार चाटा. बहूरानी के जिस्म की सिहरन मुझे स्पष्ट महसूस हुई और उसकी बांहें मेरी गर्दन में कस के लिपट गयीं और उसने मुझे कस के अपने से लिपटा लिया.कुछ पलों तक हम दोनों यूं ही लिपटे हुए एक दूजे के दिलों की धकधक सुनते रहे. बहू रानी के जिस्म की खुशबू में मेरे मन में एक नया उल्लास भर दिया. बहुत लम्बे अरसे के बाद मुझे बहूरानी के कामुक जिस्म की कामुक गंध मिली थी, मैं तो मदहोश ही हो गया था जवानी की गंध पाकर!

“पापा, अब बताओ भी क्या कह रहे थे आप?” बहूरानी ने मेरी ठोड़ी के नीचे हाथ रखकर मेरा चेहरा ऊपर उठा कर मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा.अब मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने बिना कोई जवाब दिए उसे अपने ऊपर झुका लिया और हमारे होंठ स्वतः ही जुड़ गये.किसी नवयौवना के अधरों का चुम्बन, उनका रसपान करना, विशेष तौर पर जब वो भी दिल से साथ निभा रही हो, कितनी स्वर्गिक आत्मिक आनन्द की अनुभूति कराता है, इसे शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं है. हमारे जाने पहचाने होंठ यूं ही पता नहीं कितनी देर अठखेलियाँ करते रहे, हमारी जीभ एक दूजे के मुंह में घुस कर लड़ती झगड़ती रही और तन में वासना का ज्वार हिलोरें लेने लगा.

तभी बहूरानी ने खुद को काबू किया और हाँफती हुई सी मुझसे दूर खड़ी हो गई; उसकी आँखों में सम्भोग की चाहत गुलाबी रंगत लिए तैर रही थी.

“क्या हुआ अदिति बेटा?”“कुछ नहीं पापा जी, अब और नहीं, नहीं तो खुद को रोक नही पाऊँगी. ये दही ले कर आने वाले ही होंगे.”“अरे जल्दी जल्दी कर लेंगे न… देख तेरे बिना डेढ़ साल से ऊपर ही हो गया है.”“पापा जी आज दिन और रात का सब्र कर लो फिर कल की पूरी रात, परसों का पूरा दिन और पूरी रात ट्रेन में अपने ही हैं. आप जो चाहो, जैसे चाहो कर लेना मेरे साथ… मैं मना नहीं करूंगी. अभी वक़्त की नजाकत को समझो आप! मैंने भी तो जैसे तैसे खुद को संभाला है आप भी कंट्रोल करो खुद को!”“ठीक है बेटा, तू सही कह रही है, इतना उतावलापन भी ठीक नहीं है.” मैंने कहा.

“पापा जी, अब बताओ, आप कुछ कहने वाले थे मुझे देख कर?” बहूरानी सामने वाली कुर्सी पर बैठती हुई बोली.“हाँ बेटा, मैं यह कह रहा था कि अबकी तो तू एकदम बदली बदली लग रही है, तू पहले की अपेक्षा और भी ज्यादा छरहरी सी निखरी निखरी नयी नयी सी लग रही है.” मैंने कहा.“हाँ पापा जी, मैंने सुबह के टाइम योगा और प्राणायाम करना शुरू किया है और शाम को आधा घंटा जिम में वर्कआउट करती हूँ रोज!” बहूरानी थोड़ा इठला के बोली.“गुड, वैरी गुड, कीप इट अप बेटा!” मैंने कहा.

तभी मेरा बेटा दही ले के आ गया और हमारी बातें यहीं खत्म हो गयीं.इसके बाद बहूरानी के घर में क्या हुआ, वो कुछ ख़ास नहीं है कहने को.

अगले दिन शाम को 8 बजे हमारी ट्रेन थी. राजधानी एक्सप्रेस के प्राइवेट कोच में हम ससुर बहू ने क्या क्या किया ये सब जानने के लिए कल ट्रेन चलने का इंतज़ार कीजिये.

ससुर बहू की कामुकता, शारीरिक आकर्षण, वासना, प्रेम और चुदाई की

कहानी जारी रहेगी.

 
मेरा बेटा दही लेकर आ गया था. मैं भी फ्रेश हो के नहा के आ गया और सबने मिल के नाश्ता किया. हमारी ट्रेन अगले दिन शाम को थी.तो रात को सोने के पहले मैं बहूरानी के नाम के मुठ मारी और सो गया.तो अगले दिन…

अगले दिन शाम को साढ़े सात बजे ही हम लोग स्टेशन पहुंच गये और दस मिनट बाद ही राजधानी प्लेटफोर्म पर लग गई. यूं तो मैं हमेशा ही ऐ सी में सफ़र करने का प्रयास करता हूं, कभी मजबूरी में स्लीपर कोच में जाना पड़ा हो तो वो अलग बात है. लेकिन फर्स्ट ऐ सी में वो भी प्राइवेट कूपे में यात्रा करने का वो मेरा पहला मौका था और बहूरानी के साथ आने वाले छत्तीस घंटे बिताने के ख़याल से ही मुझे रोमांच होने लगा था.

ट्रेन के प्लेटफोर्म पर लगते ही हम अपनी कोच में चढ़े और कूपे में जा पहुंचे. वाह क्या शानदार नजारा था कूपे का. ऊपर नीचे दो हाई क्वालिटी मटेरियल से बनी बर्थ थीं, नीचे वाली बर्थ सोफे में भी कन्वर्ट हो जाती थी; कोच में बड़ी सी खिड़की, पर्दे और बड़ा सा शीशा लगा था, साथ में ऐ सी का टेम्प्रेचर अपने हिसाब से कंट्रोल करने के लिए स्विच थे, फर्श पर बढ़िया मेट्रेस बिछी थी.कुल मिला कर उम्मीद से भी बढ़िया सुख सुविधा युक्त डिब्बा था.

ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर ट्रेन ने बंगलौर स्टेशन से रेंगना शुरू कर दिया और जल्दी ही प्लेटफोर्म और शहर की लाइट्स पीछे छूटने लगीं और खिड़की के बाहर अँधेरा दिखने लगा. ट्रेन एकदम स्मूथली बिना आवाज किये दिल्ली की तरफ दौड़ रही थी.मैंने कूप भीतर से लॉक कर दिया. बहूरानी सोफे पर बैठी अभी कूपे की साज सज्जा को देख ही रही थी कि मैंने उसे अपनी गोद में खींच लिया और उसके दोनों गालों को बारी बारी से चूमने लगा. बहूरानी जी बार बार अपना चेहरा अपनी हथेलियों से छुपाने का जतन करती लेकिन मैंने उसकी एक न चलने दी और अब उसके दोनों स्तन अपने अधिकार में करके अपनी मनमानी करने लगा.

तभी किसी ने दरवाजे पर धीरे से तीन बार नॉक किया. मैंने दरवाजा खोला तो बाहर टी सी खड़ा था.“गुड इवनिंग सर, आपकी टिकेट दिखाइए प्लीज!” वो भीतर आते हुए बोला“गुड इवनिंग” मैंने भी जवाब दिया और अपने टिकट उसे चेक करा दिए. उसने चार्ट में कहीं टिक किया और मुझे हैप्पी जर्नी विश करता हुआ चला गया.

मैंने तुरन्त कूपे को फिर से लॉक किया और बहूरानी को अपने आगोश में भर लिया. उसके जिस्म से उठती भीनी भीनी महक मुझे मदहोश करने लगी.“पापा जी अब बस भी करो ना, चलो पहले खाना खा लो फिर ये सब बाद में कर लेना अब तो टाइम ही टाइम है अपने पास!”

“अरे बेटा, इतनी जल्दी नहीं अभी आठ बीस ही तो हुए हैं. नाइन थर्टी पर खायेंगे. तब तक मैं एक दो ड्रिंक ले लेता हूं.” मैंने कहा.

फिर मैंने बैग में से व्हिस्की की बोतल निकाल ली और डिस्पोजेबल गिलास में बढ़िया सा पटियाला पैग बना के सिप करने लगा.बहूरानी ने फ्राइड काजू कागज़ की प्लेट में सजा के मुझे परोस दिए.

“पापा जी, मुझे कपड़े चेंज करने हैं मैं बत्ती बुझा रही हूं अपना गिलास संभालना आप!” बहूरानी बोली.“अरे बेटा, चेंज क्या करना. उतार ही डालो सब कुछ, वैसे भी अभी कुछ देर बाद उतारना ही है न” मैंने हंस कर कहा.

“पापा अब आप रहने भी दो. आप बन जाओ नागा बाबा मैं ना बनने वाली!” बहूरानी ने कहा और अपने बैगेज से रात के कपड़े निकालने लगीं. फिर उसने लाइट ऑफ कर दी और चेंज करने लगी. उसके कपड़े उतारने की सरसराहट मुझे सुनाई दे रही थी.

फिर वो एक एक करके अपने उतारे हुए कपड़े बर्थ पर फेंकने लगीं जो मेरे ही ऊपर गिर रहे थे; पहले साड़ी फिर ब्लाउज… फिर पेटीकोट… पैंटी और अंत में उसकी ब्रा मेरी गोद में आन गिरी. मैं तो जैसे इतना धन पा के धन्य हो गया और अंधेरे में ही बहूरानी की ब्रा और पैंटी को मसल मसल के सूंघने लगा.

 
जब लाइट जली तो बहूरानी एक झीनी सी पिंक नाइटी में नजर आयीं और अपनी पहनी हुई साड़ी वगैरह तह करके रखने लगी.बहूरानी की पारदर्शी नाइटी, जो सामने से खुलने वाली थी, में से उसके गुलाबी जिस्म की आभा दमक रही थी; उसने ब्रा या पैंटी कुछ भी नहीं पहना था. उसके तने हुए ठोस मम्मों पर नाइटी ऐसी लग रही थी जैसे खूँटी पर टंगी हो और उसकी पुष्ट जांघें देख कर और उसके मध्य स्थित उसकी रसीली गद्देदार चूत की कल्पना करके ही लंड में तनाव भरना शुरू हो गया.

बहूरानी चेंज करने के बाद मेरे सामने ही बैठ गयी और किसी मैगज़ीन को पलटने लगी. इधर मैं अपनी ड्रिंक सिप करता रहा और अपने फोन से बहूरानी को शूट करता रहा. कभी उसकी नाइटी घुटनों तक सरका के उसको शूट करता रहा कभी उसका एक पैर ऊपर मोड़ के जिससे उसकी जांघ का कुछ हिस्सा मेरे कैमरे के हिस्से में भी आ जाए.

मेरे यूं उसके फोटो शूट करने से बहूरानी मुझे कभी गुस्से से देखती हुई मना करती. लेकिन उसने मुझे मेरी मनमानी करने दी. बहूरानी अपने भाई की शादी में जा रही थी तो उसके हाथ पैरों में रची मेहँदी, आलता नाखून पोलिश और ऊपर से गोरे गोरे गुलाबी पैरों में सोने की पायल… मेरा एक एक शॉट लाजवाब निकला.

कोई एक घंटे बाद मेरी ड्रिंक्स खत्म हुई तो बहूरानी ने खाना निकाल लिया और बर्थ पर अखबार बिछा कर कागज़ की डिस्पोजेबल प्लेट्स और कटोरियाँ सजा दीं. फिर अल्युमिनियम फोइल्स में लिपटे हुए परांठे, सब्जी, पिकिल्स, प्याज, नमकीन सेव और स्वीट्स परोस लिया.हम लोगों को ट्रेन का खाना पसन्द नहीं आता इसलिए कोशिश हमेशा यही रहती है कि हमेशा अपना घर का खाना पानी साथ ले के चलें; हालांकि राजधानी और शताब्दी ट्रेन्स में चाय नाश्ता खाना मिलता ही है और उसका चार्ज पहले ही टिकट के साथ ही वसूल लिया जाता है.अब जो भी हो अगली सुबह से तो हमें ट्रेन पर मिलने वाले दाना पानी पर ही निर्भर रहना था.

खाना सजाने के बाद बहूरानी ने पहला कौर मुझे अपने हाथों से खिलाया; ऐसा पहली बार था कि उसने यूं मुझे खिलाया हो फिर मैंने भी उसको एक छोटा सा निवाला उसको खिलाया. फिर मैं खाने पर टूट पड़ा क्योंकि ट्रेन के सफ़र में मुझे भूख नार्मल से कुछ ज्यादा ही लगती है.

खाना समाप्त करते करते दस बजने वाले थे. खाने के बाद मैंने एक चक्कर पूरे कोच का लगाया ताकि कुछ टहलना हो जाय.

वापिस अपने कूपे में लौटा तो बहूरानी जी शीशे के सामने अपने उलझे हुए बाल संवार रही थी. मैंने कूपे को भीतर से लॉक किया और बहू रानी की पीठ से चिपक के उसको अपने बाहुपाश में कैद कर लिया और उसके स्तन मुट्ठियों में दबोच के उसकी गर्दन के पिछले हिस्से को चूमने चाटने लगा.

बहूरानी एकदम से घूम के मेरे सामने हुई और उसने हाथ में पकड़ी कंघी फेंक कर अपनी बाहें मेरे गले में पहना दीं, मैंने भी उसको अपने सीने से लगा लिया. उसके पुष्ट स्तन मेरे सीने से दब गये और मैंने अपनी बाहों का घेरा उसके गिर्द कस दिया. हमारे प्यासे होंठ मिले जीभ से जीभ मिली इधर मेरे लंड ने अंगड़ाई ली और उधर शायद उसकी चूत भी नम हुई क्योंकि वो अपना एक हाथनीचे ले गयी और उसने नाइटी को अपनी जांघों के बीच समेट कर दबा ली.

हम दोनों यूं ही देर तक चूमा चाटी करते रहे; मैं उसके मम्में नाइटी के ऊपर से ही दबाता रहा और वो मेरी पीठ को सहलाती रही.अब मेरा लंड भी पूरे तैश में आने लगा था.

फिर मैंने बहूरानी की नाइटी उसके बदन से छीन के बर्थ पर फेंक दी; नाइटी के भीतर तो उसने कुछ पहना ही नहीं था तो उसका नग्न यौवन मेरे सामने दमक उठा. उसके पहाड़ जैसे स्तन जैसे मुझे चुनौती देने वाले अंदाज में मेरे सामने तन के खड़े हो गये.
 
मैंने भी उसकी चुनौती स्वीकार की और उसको दबोच लिया, उसको मीड़ने गूंथने लगा… अंगूरों को चुटकियों में भर के उमेठने लगा, नीम्बू की तरह निचोड़ने लगा… प्यार से हौले हौले. बहूरानी कामुक सिसकारियाँ लेने लगीं और मुझे अपने से लिपटाने लगी.

फिर उसने मेरी शर्ट के बटन जल्दी से खोल दिए जिसे मैंने खुद ही बनियान सहित उतार के फेंक दिया और बहूरानी के नंगे जिस्म को पूरी ताकत से भींच लिया.“आह… पापा जी. धीरे धीरे… मेरी पसलियाँ टूट जायेंगी इतनी ताकत से तो!” बहूरानी अत्यंत कामुक स्वर में बोली और उसने मेरे चौड़े सीने में अपना मुंह छुपा लिया और वहीं चूमने लगी.

फिर उसका एक हाथ नीचे मेरे लोअर के ऊपर से ही मेरे लंड को टटोलने लगा. उसने मेरे लोअर में हाथ घुसा के लंड को पकड़ लिया उसके ऐसे करते ही मेरा लंड और तमतमाने लगा.

मैंने अपना लोअर और अंडरवियर नीचे खिसका के निकाल फेंका. अब मेरा फनफनाता लंड पूरी तरह से आजाद होकर हवा में लहराया और फिर उसने एक हाई जम्प लगा कर बहूरानी को जैसे सलाम ठोका, बहूरानी ने भी इस अभिवादन को स्वीकार करते हुए इसे प्यार से अपनी चूत पर टच किया और फिर पकड़ कर इसकी फोर-स्किन को पीछे करके टोपा को दबाने मसलने लगी, फिरलंड को जड़ के पास से पकड़ कर दबाया सहलाया साथ में अण्डों को भी दुलारा.

रात धीरे धीरे गुजर रही थी और राजधानी अपने पूरे दम से दिल्ली की ओर भाग रही थी जिसके किसी डिब्बे में भीतर ससुर बहू के नंगे जिस्म सनातन यौन सुख का रसपान करते हुए एक दूसरे में समा जाने को मचल रहे थे. हमारे जिस्मों की ताप पर ऐ सी की कूलिंग भी कोई असर नहीं डाल पा रही थी.

फिर जो प्रतीक्षित था बहूरानी ने वही किया; वो नीचे झुकी और पंजों के बल बैठ कर मेरे लंड को तन्मयता से चाटने चूमने लगी. फिर उसने अपना मुख खोल दिया और मेरा लंड स्वतः ही उसकी मुख गुहा में प्रवेष कर गया और फिर बहूरानी के होंठ और जीभ मेरे लंड पर क़यामत ढाने लगे.मेरे लिए एक तरह से यह यौन सुख की पराकाष्ठा ही थी. जो सुख मुझे मेरी सगी बीवी, मेरे बेटे की माँ नहीं दे सकी थी वो सुख उसकी बीवी, मेरी पुत्रवधू… कुलवधू मुझे दे रही थी.

बहूरानी के लंड चूसने चाटने का तरीका भी कमाल का था… खूब चटखारे ले ले कर, अपनेपन और पूरे समर्पण भाव से बिना किसी हिचकिचाहट के लंड पर अपना प्यार उड़ेलती और उसके यूं लंड को पुचकारने चूमने से निकलती, पुच पुच की आवाज मुझे मस्त करने लगी.

“अदिति बेटा, शाबाश, ऐसे ही… हां… आह मेरी जान बहूरानी जी तू तो कमाल कर रही है आज!” मैंने मुग्ध होकर कहा.“पापा जी, आज पूरे डेढ़ साल बाद ये मेरे हाथ आया है. इसे तो मैं जी भर के प्यार करूंगी.” बहूरानी मेरी तरफ देख के बोली और फिर से लंड को चाटने चूसने में मगन हो गयी.

कुछ ही देर बाद :“बस मेरी जान रहने दे. अब तू बर्थ पर बैठ जा.” मैंने बहूरानी के सिर को सहलाते हुए कहा.“ठीक है पापा जी!” बहूरानी बोली और लंड को छोड़ के बर्थ पर जा बैठी.

ससुर बहू में मधुर समागम की कहानी जारी रहेगी.

 
Back
Top