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Thriller Sex Kahani छाया ( अनचाहे रिश्तों में पनपती कामुकता एव उभरता प्रेम)

भाग- 30
यह कौन व्यक्ति था जिसने बाथरूम में कैमरा लगाया हुआ था? कहीं इसमें कोई साजिश तो नहीं थी? या फिर होटल वाले ने अपनी कामुकता शांत करने के लिए ऐसा किया था. मुझे बहुत क्रोध आ रहा था. मैंने विवाह भवन के मैनेजर को फोन करने की कोशिश की पर फोन नहीं लगा. मैंने अश्विन को फोन लगाया. (अश्विन मनोहर चाचा का दामाद था जिसकी शादी में हम लोग दो वर्ष पहले शरीक होने गए थे और उसी के बाद से मेरा और छाया का विछोह हो गया था हमारे प्रेम पर हमारा अनचाहा रिश्ता भारी पड़ गया था.) विवाह भवन की सारी व्यवस्था उसी ने की थी.

अश्विन ने फोन उठा लिया था

"जी, मानस भैया"

" तुम मेरे घर आ सकते हो क्या? हमें विवाह भवन चलना है."

"क्या बात हो गयी मानस भैया?"

"यहां आ जाओ फिर बात करते हैं"

"पर भैया मैं तो बेंगलुरु से बाहर हूं"

"ठीक है, मुझे उसके मैनेजर का कोई और नंबर हो तो भेज दो और आने के बाद मुझसे मिलना"

हम समझ चुके थे कि किसी ने बाथरूम में कैमरा लगाया था और वह छाया की नग्न तस्वीरें खींचना चाहता था. हमारी रासलीला के कारण मेरी और छाया की तस्वीरें भी छाया के साथ आ गई थी. हम तीनों ने विवाह भवन में जिस कामुकता का आनंद लिया था फोटो में उसकी एक झलक स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. माया आंटी इन फोटो को देखकर शर्मसार हो रही थी और उन्होंने वहां से हट जाना ही उचित समझा.

तभी मेरी नजर नीचे पड़े खत पर पड़ी. वहां पर हम तीनों ही थे और हमारे बीच कोई पर्दा नहीं था. मैने खत पढ़ना शुरू कर दिया

"प्यारी छाया,

मैंने आज तक जितनी भी लड़कियां देखी है उनमें तुम सबसे ज्यादा सुंदर हो, तुम मेरे लिए साक्षात कामदेवी रति का अवतार हो. मुझे सिर्फ और सिर्फ एक बार तुम्हारे साथ संभोग करना है. मुझे पता है मैं तुम्हारे लायक बिल्कुल भी नहीं हूं पर मन की भावनाएं तर्कों पर नहीं चलती. तुमसे संभोग किए बिना मेरे जीवन की बेचैनी कम नहीं होगी.

मानस के साथ होटल में मनाए गए सुहागरात से मुझे तुम्हारी कामुकता का अंदाजा हो गया है. मानस के साथ निश्चय ही तुम्हारे संबंध पिछले कई वर्षों से रहे होंगे. यूं ही कोई अपने सौतेले भाई के साथ सुहागरात नहीं मनाता.

मैं तुम्हारी इसी अदा का कायल हो गया हूँ. जिस प्रकार तुमने मानस के साथ रहते हुए भी अपने कौमार्य को बचा कर रखा था और उसे अपने विवाह उपरांत ही त्याग किया है मुझे यह बात भी प्रभावित कर गई है. मुझे यह भी पता है कि सोमिल इस समय कहां है और क्या कर रहा है. मेरा विश्वास रखो मैं तुम्हें ब्लैकमेल करना नहीं चाहता हूं पर तुमसे संभोग किए बिना मैं रह भी नहीं सकता हूँ.

तुम कामदेवी हो और अब तुमने अपना कौमार्य भी परित्याग कर दिया है अब तुम्हें किसी पर पुरुष से संभोग से आपत्ति नहीं होनी चाहिए. वैसे भी मैं तुम्हारे लिए इतना पराया नहींहूँ। मुझे सिर्फ और सिर्फ एक बार अपनी उत्तेजना का कुछ अंश देकर मुझे हमेशा के लिए तृप्त कर दो. संभोग के दौरान मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी कामुकता का आनंद लेना चाहता हूं तुम्हें आहत करना नहीं.

उम्मीद करता हूं कि तुम मेरी इस उचित या अनुचित याचना को पूरा करोगी. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं की होटल में हुई सुहागरात की घटना तुम तीनों के बीच ही रहेगी. मैं दोबारा कभी इस बात का जिक्र नहीं करूंगा. मेरे पास तुम्हारे कई सारे नग्न छायाचित्र है भविष्य के लिए तुम्हारी वही यादें ही मेरे लिए पर्याप्त होंगी।

उम्मीद करता हूं कि तुम मुझ पर विश्वास करोगी आज से 2 दिन बाद हमारा मिलन होगा मैं तुम्हें समय और स्थान ई-मेल पर सूचित कर दूंगा. सोमिल स्वस्थ और सामान्य है तथा अपनी कामुकता को जागृत कर रहा है जिसका सुख तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा.

मिलन की प्रतीक्षा में

तुम्हारा ...

छाया डरी हुई थी. आज ही वह डिसूजा के चंगुल से छूटी थी और फिर उसी भंवर जाल में फस रही थी. मैं एक बार तो पत्र लिखने वाले की संवेदना का कायल हो गया. उसने छाया की सुंदरता में इतने कसीदे पढ़ दिए थे कि मुझे उससे होने वाली नफरत थोड़ा कम हो गई थी.

पर वह मेरी छाया को भोगना चाहता था वह भी बिना उसकी इच्छा के यह बिल्कुल गलत था. छाया की कामुकता और उत्तेजना का भोग उसकी इच्छा के बिना लगाना नितांत जघन्य कृत्य था. वह काम देवी थी उससे बल प्रयोग करना या उसे बाध्य करना सर्वाधिक अनुचित था.

हमारे मन में तरह-तरह की बातें आने लगीं. माया जी को हमने यह बात नहीं बताई. यह बात हम तीनों के बीच ही थी और इसका निर्णय भी हम तीनों को ही करना था.

(मैं छाया)

शर्मा जी लगभग 8:00 बजे घर लौटे उनके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी. हम सभी ने उनका भव्य स्वागत किया. सच में आज उन्होंने डिसूजा को इस केस से हटवा कर हम सभी की इच्छा को पूरा कर दिया था. आज वह इस घर के मुखिया के रूप में दिखाई पड़ रहे थे. वह एक बार फिर मेरे पास आये और मेरे माथे को चूम लिया. मेरे दोनों गाल उनकी हथेलियों में थे उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में लेने की भी कोशिश की. मुझे उनका कल का आलिंगन याद था जिसमें मेरे स्तन उनके सीने से सट गए थे. आज सावधानी बरतते हुए मैं आगे झुक गई थी और सिर्फ अपने कंधों को उनके सीने से टकराने दिया.

उन्होंने फिर कहा

"कोई मेरे परिवार पर और खासकर मेरी छाया बेटी पर बुरी नजर डालेगा मैं उसे नहीं छोडूंगा." उनके उदघोष से मां का सीना गर्व से फूल गया था. उन्हें शर्मा जी को अपना जीवनसाथी चुनने पर आज अभिमान हो रहा था. मा ने उन पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. मां को इस खत की जानकारी नहीं थी इसलिए वह बहुत खुश थीं। हम तीनों के चेहरों पर अभी भी तनाव थे. यह बात हमने शर्मा जी से भी बताना उचित नहीं समझा.

(मैं माया)

दो-तीन दिन की तनाव भरी जिंदगी के बाद आज का दिन सुखद था। मेरी बेटी के चेहरे पर आज हंसी दिखाई पड़ी थी। शर्मा जी को मैंने आज अपने हाथों से खिलाया। आज मैं उन्हें हर तरह से खुश करना चाहती थी। मैंने अपनी अलमारी में उत्तेजक वस्त्रों की तलाश की पर मेरे मन मुताबिक कोई भी वस्त्र ना मिला। मैंने छाया की अलमारी से एक सुंदर नाइटी निकाल ली मेरी उम्र के हिसाब से वह कुछ ज्यादा ही कामुक थी। शर्मा जी भी कम कामुक न थे वह बार-बार मुझे ऐसे वस्त्र पहनने के लिए बोलते थे। आज मैंने उनकी मन की इच्छा पूरी करने की ठान ली थी। बच्चों के अपने-अपने कमरे में जाने के बाद मैं नहाने चली गई। जैसे ही मैं बाथरूम से बाहर निकली शर्मा जी मुझे एकटक देखते रह गए। यह ड्रेस वास्तव में बहुत आकर्षक और कामुक थी। मेरा बदन छाया से लगभग मिलता-जुलता था मुझ में उतनी चमक और कोमलता तो नहीं थी पर बदन के उतार-चढ़ाव छाया से मिलते थे। वो मुझे एक टक देखते रह गए। उन्होंने कहा "तुमने छाया की ड्रेस पहनी है ना"

मैं मुस्कुराने लगी वह मेरी चोरी पकड़ चुके थे. उन्होंने उठकर मुझे अपने आलिंगन में ले लिया मेरे बाल गीले थे मैंने उनसे कुछ समय मांगा पर वह सुनने को तैयार नहीं थे। जब तक मैं अपने बाल हेयर ड्रायर से सुखा रही थी तब तक वह मेरे स्तनों और जांघों से खेलना शुरू कर चुके थे। आज उनकी हथेलियों में गजब की उत्तेजना थी। उनका ल** मेरी नितंबों से लगातार टकरा रहा था वह नाइटी के ऊपर से ही मुझे सहलाए जा रहे थे। कभी-कभी वह उसके अंदर हाथ डाल कर मेरी जांघों को सहलाते। मैं भी उत्तेजित हो रही थी कुछ ही देर में हम दोनों बिस्तर पर थे। उन्होंने कहा

"तुमने छाया की नाइटी पहनी है उसे मालूम चल गया तो?"

"उसे कैसे मालूम चलेगा. मैं सुबह वापस रख दूंगी"

"पर इस नाइटी में तुम मुझे छाया जैसी दिखाई दोगी तो मैं तुमसे संभोग कैसे कर पाऊंगा"

"ठीक है लाइए मैं इसे उतार देती हूँ।" उन्होंने मेरे हाथ रोक लिए उन्होंने पूछा "छाया खुश तो है ना?"

"हां, आज वह बहुत खुश थी. और आपकी बहुत तारीफ कर रही थी"

"मैं भी उसे बहुत मानता हूं और उससे बहुत प्यार करता हूं" इतना कहकर उन्होंने मुझे दबोच लिया. उनके होंठ मेरे होठों को अपने बीच ले चुके थे। उनके लिंग का कड़ापन मेरे पेट को महसूस हो रहा था। उन्होंने फिर कहा

"आज तुम छाया की नाइटी पहन कर और भी जवान हो गई हो"

मेरी नाइटी मेरी कमर तक आ चुकी थी. मैंने उसे बाहर निकालने की कोशिश की पर शर्मा जी ने रोक दिया. वह उसी अवस्था में मेरे ऊपर आ गए और उनका लिंग मेरी योनि में टकरा गया.

आज मैं उन्हें भरपूर सुख देना चाहती थी यह बात सोचते हुए मेरी योनि में पहले से ही पर्याप्त गीलापन आ चुका था। शर्मा जी का लिंग के छूते ही मेरी प्यास बढ़ गई और शर्मा जी ने बिना देर करते हुए अपने लिंग को मेरी गहराइयों में उतार दिया। वह मेरे स्तनों को तेजी से मसल रहे थे और अपनी कमर से लगातार धक्के लगाए जा रहे थे। मैं भी उनकी उत्तेजना में उनका साथ दे रही थी कुछ ही देर में मुझे लगा कि मैं स्खलित हो जाऊंगी। शर्मा जी के रंग ढंग से ऐसा लग नहीं रहा था जैसे उन्हें पूरी संतुष्टि हुई हो। मैंने उन्हें नीचे आने का इशारा किया वह नीचे आ गए मैं उनकी कमर पर बैठकर अपनी योनि को आगे पीछे करने लगी। आज मैं स्वयं बहुत उत्तेजित थी और कुछ ही देर में मैं स्खलित होने लगी।

स्खलित होने के पश्चात उन्होंने मुझे अपने सीने से सटा लिया और मेरे माथे को चूमने लगे। मेरे दोनों गालों को सहलाते हुए वह बार-बार बोल रहे थे

मेरी प्यारी माया और माथे पर झूम रहे थे। मैं हारी हुई खिलाड़ी की तरह उनके पेट पर लेटी हुई थी। मेरी पराजित योनि में उनका लिंग अभी भी गर्व से खड़ा था। वह बार-बार मुझे सहलाए जा रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने से उम्र में बड़े आदमी की सीने पर लेटी हुई हूं और वह मुझे बच्चों जैसा प्यार कर रहा है। पर जब मेरा ध्यान मेरी कमर के नीचे जाता मेरी नग्नता उस प्यार की परिभाषा बदल देती थी। शर्मा जी का लिंग अब मेरी योनि में धीरे-धीरे हिलना शुरू हो रहा था कुछ देर बाद शर्मा जी ने मुझे अपने ऊपर से उतरने का इशारा किया। मैं वापस एक बार फिर पीठ के बल लेटने लगी। शर्मा जी बिस्तर से उठ कर नीचे खड़े हो गए वह मुझे डॉगी स्टाइल में आने का इशारा कर रहे थे। आज वह भी पूरे मूड में थे। मैं उन्हें खुश करने के लिए बिस्तर पर डॉगी स्टाइल में आ गई। शर्मा जी ने नाइटी को उठाया और मेरी कमर पर रख दिया मेरे दोनों नितम्ब उनकी आंखों के ठीक सामने थे। नितंबों के बीच से झांक रही मेरी योनि के होंठ भी उन्हें अवश्य नजर आ रहे होंगे।

उनका मजबूत लिंग मेरे नितंबों पर टकरा रहा था। वह कामुक तरीके से मेरी पीठ सहला रहे थे और मेरे नितंबों को चूम रहे थे। अचानक ही उन्होंने मेरी योनि के होठों को चूम लिया मुझे उनसे यह आशा नहीं है आज यह पहली बार हुआ था मेरी योनि एक बार संभोग कर चुकी थी मुझे इस अवस्था में यह कार्य अनुचित लगा मैंने अपनी कमर हिला दी। शायद वह मेरा इशारा समझ गए थे वह वापस खड़े हो गए।

उनके लिंग में आज अद्भुत उत्तेजना थी। कुछ ही देर में लिंग मेरी योनि के मुख से सट गया। मेरी योनि संवेदनशील हो चुकी थी। उसके मुख पर गीलापन अभी भी कायम था। शर्मा जी धीरे-धीरे अपने लिंग का दबाव बढ़ाते गए और वह मेरी योनि में प्रविष्ट होता चला गया। इस अवस्था में शर्मा जी का लिंग मुझे और भी मजबूत और मोटा महसूस हो रहा था। वह मेरे गर्भाशय के मुख तक पहुंच गया था। शर्मा जी अपनी कमर को आगे पीछे करने लगे वह बार-बार मेरी नाइटी को छूते और नाइटी के ऊपर से ही मेरी पीठ को सहलाए जा रहे थे। कभी-कभी वह अपने हाथ नीचे कर नाइटी में ही कैद मेरे स्तनों को छूते। मुझे अद्भुत एहसास हो रहा था। मैं एक बार फिर उत्तेजित हो रही थी। कुछ ही देर में उनके कमर के धक्के बढ़ते गए उनकी लिंग के आने-जाने की गति में अद्भुत इजाफा हो गया था। वह काफी तेजी से अपने लिंग को मेरे योनि में आगे पीछे कर रहे थे। मैं उत्तेजना से कांपने लगी वह मेरी कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़े हुए थे कुछ ही देर में मैने उनके लिंग को अपनी योनि में फूलता पचकता हुआ महसूस करने लगी इस अद्भुत एहसास से मैं भी स्खलित होने लगी। उन्होंने मेरी कमर को पकड़कर तेजी से अपनी तरफ खींचा और अपने लिंग को पूरी ताकत से अंदर तक ले गए जो मेरे गर्भाशय के मुख को फैलाने की कोशिश कर रहा था। मैं उनके इस तीव्र उत्तेजना को पहचान गई थी मैंने उन्हें रोका नहीं । मेरी योनि में वीर्य वर्षा हो रही थी जिसकी मुझे अनुभूति भी हो रही थी शर्मा जी के पैर कांप रहे थे और उनका कंपन मुझे अपने नितंबों पर महसूस हो रहा था उनके मुख से धीमी आवाज आई।

छाया..........की नाइटी बहुत सुंदर है मायाजी आप हमेशा ऐसे ही रहा कीजीए।

उनके मुंह से छाया शब्द सुनकर मैं अचानक डर गई पर पूरी बात सुनकर मैं संतुष्ट हो गई थी। छाया की यह नाइटी निश्चय ही उत्तेजक थी। इसने आज मेरी उत्तेजना में आग में घी का काम किया था। मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि उनकी खुशी के लिए ऐसे कई सारे वस्त्र अपनी भी अलमारी में रखूंगी।

वह अपना लिंग बाहर निकाल चुके थे मैंने उनके चेहरे की तरफ देखा वह तृप्त लग रहे थे। उन्होंने मुझे एक बार फिर अपने आलिंगन में ले लिया और मेरे दोनों गालों को सहलाते हुए मेरे माथे को चूम लिया।

मैं उनके आलिंगन में कुछ देर वैसे ही खड़ी रही। उन्होंने कहा तुमने और छाया ने मेरे जीवन में आकर मेरी वीरान जिंदगी में रंग भर दिए हैं। मैं भगवान से हमेशा तुम दोनों की खुशी मांगता हूँ और मानस की भी। उन्हें पता था, मानस भी हम दोनों को उतना ही प्यारा था।

(मैं शशिकांत शर्मा उर्फ शर्मा जी)

आज माया से संभोग करके मुझे जीवन का अद्भुत आनंद आया था. छाया की उत्तेजक नाइटी माया पर भी खूब खिल रही थी। यह पिछले 2 वर्षों से हो रहे हमारे मिलन से कुछ अलग था. आज माया ने पूरे तन मन से मुझे स्वीकार कर लिया था। आज उसका यह समर्पण मुझे अत्यंत आत्मीय लगा था और वह मेरे हृदय में आत्मसात हो गयी थी।

मैंने भी डिसूजा को इस केस से हटाकर अपने दायित्व का निर्वहन किया था मैं भगवान को शुक्रिया अदा कर रहा था कि आज मेरे संबंधों की वजह से मैं माया और उसकी बच्ची छाया के लिए कुछ कर पाया था।

संभोग के उपरांत मेरी आंख लग गई

मैंने अपने आप को बादलों में पाया मेरे पैर बादलों में थे पर मैं गिर नहीं रहा था। मैं अपने पैरों से बादलों को हटाता और वह हटकर कुछ दूर चले जाते और अगल-बगल के बादल उस जगह को भरने आ जाते। मुझे अद्भुत आनंद आ रहा था कभी मैं स्वयं को एक किशोर की भांति पाता कभी अपनी वर्तमान उम्र में। चारों तरफ पूर्ण सन्नाटा था पर उस दिव्य दृश्य को देखकर मैं आनंद में डूब गया था तभी अचानक मुझे एक दिव्य स्वरूप दिखाई दिया। मुझे बादलों से एक आकार अपनी तरफ आता हुआ दिखाई पड़ रहा था जैसे-जैसे का आकार मेरी तरफ आता मेरा कोतुहल बढ़ता जाता।

वह एक स्त्री थी जैसे जैसे वह करीब आ रही थी उसकी काया अब दिखाई पड़ने लगी थी पर वह अभी भी विशालकाय थी। सामान्य आकार से लगभग कई गुना विशाल। जैसे-जैसे वा मेरे करीब आती गई मुझे उसका आकार और बड़ा दिखाई पड़ने लगा यह निश्चय हो चुका था कि वह युवती की ही काया थी सफेद बादलों के बीच से गेंहुए हुए रंग की उसकी दिव्य काया अपना अद्भुत रूप दिखा रही थी। कामुक अंगो को बादलों ने घेर रखा था परंतु उस सुंदर काया की कामुकता को रोक पाने में बादल नाकाम हो रहे थे। उसके चेहरे , स्तन, नाभि प्रदेश और जाँघों के योग पर बादलों ने अपना आवरण दे दिया था। उस युवती के पूरे शरीर पर कोई भी वस्त्र नहीं था उसका मुख मंडल प्राकृतिक आभा से दमक रहा था। मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था वह मेरे काफी करीब आ चुके थी। अचानक उसके चेहरे पर से बादल हटे मुझे वह कोई देवी स्वरूप प्रतीत हुई । मुझे अपनी गंदी सोच पर घृणा हुई मैं इस दिव्य शक्ति की जांघों और स्तनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया हुआ था यह सोचकर मुझे शर्म और लज्जा आने लगी। मेरी गर्दन चुकी थी । तभी उस युवती की गूंजती हुई आवाज आई

"क्या हुआ आपने गर्दन क्यों झुका ली" मैं कुछ उत्तर न दे सका मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे व दिव्य शक्ति नाराज होकर मुझे कोई श्राप न दे दे। मैंने सर झुकाए हुए ही कहा

"मैं आपके दिव्य स्वरुप को नहीं पहचान पाया मेरा ध्यान भटक गया था मुझे क्षमा कर दीजिए"

"क्षमा मत मांगिए आपने कोई गलती नहीं की है जिस दृश्य को आप देखना चाहते थे आपने वही देखा. स्त्री शरीर के वही अंग आप को प्रभावित करते हैं जो आप पसंद करते हैं यदि आपने मेरे स्तनों और जांघों को देखने की चेष्टा की है तो निश्चय ही आपके मन में वासना ने जन्म लिया है. मैं तो स्वयं कामवासना की देवी रति हूं. धरती पर सभी वयस्क पुरुष मुझे ही ध्यान करते हैं कभी-कभी वह अपने साथी में मेरा स्वरूप पा लेते हैं। कभी पूर्ण तृप्त ना होने पर वह अपनी भावनाओं में मुझे याद कर लेते हैं। कभी मैं उनके समीप ही किसी और रूप में विद्यमान रहती हूँ। मैं उनकी कामवासना संतुष्ट करने में पूरी मदद करती हूं। जिन्हें कोई साथी नहीं मिल पाता वह मेरे ही अंगों पर ध्यान केंद्रित कर अपनी वासना की पूर्ति करते हैं और चरम सुख प्राप्त करते हैं"

मैं कामदेवी का विशाल हृदय देखकर गदगद हो गया. मैंने उन्हें प्रणाम किया उन्होंने फिर कहा

"यदि तुम इस प्रकार नतमस्तक रहोगे तो इस अद्भुत दिव्य दर्शन का आनंद कैसे ले पाओगे?"

मैंने अपनी नजरें उठा दीं वह मुस्कुराती हुई साक्षात मेरे सामने थीं। उनके इस विशाल रूप को देख पाने की मेरी क्षमता नहीं थी मैंने फिर एक बार कहा

"आपके इस दिव्य स्वरूप को मेरी आंखें देख पाने में नाकाम हो रही है. मेरी आंखें इस दिव्य रुप के चकाचौंध में दृष्टि हीन हो रहीं हैं कृपया अपना स्वरूप छोटा करें और मुझे दर्शन दें।"

उनका कद छोटा होता चला गया कुछ ही देर में वह सामान युवती की भांति मेरे सामने खड़ी थीं। चेहरे पर अद्भुत नूर था शरीर की बनावट आदर्श थी स्तनों को अभी भी बादल ने घेरा हुआ था पर उनका आकार स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था ऐसा लगता था सांची के स्तूपों को छोटा करके उनके दोनों स्तनों की जगह रख दिया गया हो।सीने से कमर तक आते आते हैं कमर की चौड़ाई अद्भुत रूप से कम हो गई थी और उसके तुरंत ही पश्चात वह बढ़ते हुए उनके नितंब का रूप ले रही थी।

उनकी जाँघें बेदाग और सुडोल थी ऐसी दिव्य काया को मैं ज्यादा देर नहीं देख पाया। मेरी आँखें फिर झुक गई। उन्होंने फिर कहा

"यदि आपकी तृप्ति से हो गई हो तो मैं अंतर्ध्यान ही जाऊं"

" आपसे कोई आपसे कैसे तृप्त हो सकता है मेरी आंखें फिर खुल गई थी उनके चेहरे और शरीर से बादल हट चुके थे सुंदर सुडोल स्तन मेरी आंखों के सामने थे जांघों के जोड़ पर दो खूबसूरत होठ अपने बीच थोड़ी जगह बनाए हुए दर्शनीय थे। नाभि और जांघों के जोड़ के बीच की जगह एकदम सपाट और बेदाग थी। मैं उस अद्भुत काया को निहार रहा था। तभी मेरी नजर देवी के चेहरे पर गए मेरे मुख से निकल गया "छाया"

वह हंसने लगी

अचानक छाया का चेहरा गायब हो गया और वह चेहरा एक दिव्य स्वरुप में परिवर्तित हो गया. जब जब मैं अपना ध्यान चेहरे से हटाता और कामुक अंगो की तरफ लाता मेरे जेहन में कभी वह दिव्य चेहरा आता कभी छाया का चेहरा दिखाई पड़ता। मैंने एक बार फिर चेहरे की तरफ ध्यान लगाया और फिर छाया का ही चेहरा सामने आयाम

मैं इस दुविधा से निकल पाता तभी एक बार गूंजती हुई आवाज फिर आई

"आइए मेरे आगोश में आ जाइए. मैं धरती पर हर जगह अलग-अलग रूपों में उपलब्ध हूं. मेरी उपासना सारी मानव जाति करती है आप भी उनमें से एक हैं।"

मैं धीरे-धीरे उस अद्भुत काया की तरफ बढ़ने लगा। जैसे ही मैं उनके स्तनों को छु पाता मेरी नींद खुल गई।

मैं बिस्तर पर उठ कर बैठ गया। मैं मन ही मन डरा हुआ भी था पर अपने लिंग पर निगाह जाते हैं मेरा डर गायब हो चुका था। वह पूर्ण रूप से उत्तेजित था। शायद यह कामदेवी का ही आशीर्वाद था।

मैं माया जी की नाइटी हटाकर उनके कोमल नितंबों से अपने लिंग को सटा दिया और उन्हें अपने आगोश में लेकर सो गया। यश स्वप्न अद्भुत और अविश्वसनीय था उसने मेरे मन मे प्रश्न उत्पन्न कर दिया था.... क्या छाया कामदेवी रति की अवतार थी....???

शुक्रवार (पांचवा दिन)
(सोमिल का कैदखाना)
(मैं शांति उर्फ लक्ष्मी)

यहां आने से पहले मेरे मन में भी इस बात का डर था की जिस व्यक्ति के साथ मुझे रहना था वह किस स्वभाव का होगा। मैंने पैसों के लालच में हा तो कर दिया था पर मैं डरी हुई थी। मैंने इससे पहले एक या दो बार ही अपरिचित मेहमानों से सेक्स किया था। वह भी उम्र में मुझसे काफी बड़े थे। उनके साथ सेक्स कर कर मुझे स्वयं को कोई अनुभूति नहीं हुई थी। मैंने सेक्स का आनंद अपने पुराने बॉयफ्रेंड के साथ ही लिया था जो अब दुबई भाग गया था।

भगवान ने मुझे खूबसूरत और हसीन बनाया था पर मेरी गरीबी ने मुझे ऐसे कार्य करने पर बाध्य किया था। मेरी पढ़ाई अब पूरी हो चुकी थी। पैसों के लालच में मैंने आखरी बार यह कार्य करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया था।

मुझे मेरे भाई ने बताया था जो व्यक्ति यहां आ रहा है वह उस रात सुहागरात मनाने वाला था और उसे उसी अवस्था से किडनैप कर लिया गया है। तुम्हें उसका ख्याल रखना है और उसे अगले कुछ दिनों तक उत्तेजित कर उसका मन लगाए रखना है। यदि तुम उसके साथ संभोग कर लेती हो तो यह तुम्हारी विजय मानी जाएगी। इसके लिए तुम्हें उचित इनाम भी दिया जाएगा। पर तुम्हें यह बात ध्यान रखनी होगी कि वह एक सभ्य इंसान है यदि उसे तनिक भी भ्रम हो गया कि तुम एक कॉल गर्ल हो तो वह तुम्हारे पास भी नहीं आएगा।

यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम उसे किस तरह प्रभावित करती हो पर यदि तुमने उसके साथ संभोग कर लिया तो निश्चय ही तुम्हारे ईनाम की राशि बढ़ा दी जाएगी। मैं मन ही मन इस अनोखे चैलेंज को स्वीकार कर चुकी थी। सोमिल सर को देखने के बाद मैं उनकी मर्दानगी की कायल हो गई थी। लंबा चौड़ा शरीर और चेहरे पर आकर्षण एक लड़की को संभोग के लिए जो कुछ भी चाहिए था सोमिल सर में कूट कूट कर भरा था।

मैं उनसे पहली नजर में ही प्रभावित हो गई थी। मुझे मेरे भाई द्वारा दिया गया चैलेंज मेरा खुद का चैलेंज बन गया था। मुझे वियाग्रा की कुछ गोलियां भी दी गई थी जिन्हें निश्चित अंतराल पर मुझे सुनील सर को देना था। मैंने दर्द निवारक दवाओं के साथ उस गोली को भी उन्हें देना शुरू कर दिया था। जिससे उनके लिंग में हमेशा उत्तेजना कायम रहती थी। उनका अंडरवियर हम लोगों ने जानबूझकर हटा दिया था तथा मेरी नाइटी के गायब होने की कहानी भी मैंने स्वयं ही गढ़ ली थी।

उनकी सफेद शर्ट में जब मैं बाहर निकली तो मुझे उनकी उत्तेजना का एहसास हो गया था उनके पजामे से उनके लिंग का आकार स्पष्ट दिखाई पड़ता था। उन्हें उत्तेजित करते-करते मैं स्वयं उत्तेजित होने लगी थी। बीती रात मैंने बिस्तर पर सोते हुए हर जतन किए कि वह मेरी चू** को देखकर मुझसे संभोग का मन बना लें। मैं चाहती थी वह मुझे अपनी बाहों में खींच ले और जी भर कर अपनी और मेरी प्यास बुझाएं। पर वह निहायत ही शरीफ थे। मैंने कुछ सफलता तो अवश्य पाई जब वो मेरे सामने ही हस्तमैथुन कर रहे थे। उनकी आंखें बंद थी पर मैं खुली आंखों से उनके सभ्य और सुसंस्कृत ल** को उनकी हथेलियों में हिलते देख रही थी। मेरी इच्छा हो रही थी कि मैं उसे अपने हाथों में ले लूं और स्वयं उन्हें स्खलित कर दूं पर मुझे सब्र से काम लेना था।

मेरी एक गलती भी उन्हें मेरी हकीकत का एहसास दिला देती और मैं चैलेंज हार जाती। उनके वीर्य की धार जब मेरे स्तनों पर पड़ी तब मुझे अद्भुत एहसास हुआ। मेरी योनि पूरी तरह चिपचिपी हो गई थी। बिस्तर पर बैठे रहने की वजह से उस से निकला प्रेम रस चादर पर अपने निशान बना चुका था। जब वह करवट लेकर सो गए तो मैं बिस्तर से उठी और उस निशान को देख कर मुस्कुराने लगी। मैंने बाथरूम में जाकर अपनी उत्तेजना शांत की और उनके बगल में आकर सो गयी। मेरे पास कुछ ही दिन शेष थे मुझे उनके साथ संभोग करना था यह मेरे लिए चैलेंज कम मेरी दिली इच्छा ज्यादा थी।

आज सुबह नहाने के बाद मुझे उनकी शर्ट उतारने पड़ी। यह शर्ट मेरी कामुकता में चार चांद लगा रही थी। मैं नहाकर नाइटी पहन कर बाहर आ गई। इस नाइटी में मैं चाह कर भी अपने सोमील सर को आकर्षित नहीं कर पा रही थी।

छाया और सीमा के प्रयास
(मैं मानस)

छाया और सीमा ने अपने कॉलेज के दोस्तों और फ्रेंड सर्किल में उस अनजान लड़की की तस्वीरें प्रसारित कर दीं थीं। छाया ने उस फोटो में से सोमिल की फोटो हटाकर सिर्फ उस लड़की की फोटो रखी थी वह समझदार तो थी ही।

हॉस्टल की लड़कियों का नेटवर्क जबरदस्त था। उन्होंने उस खूबसूरत लड़की की तस्वीर अपने सभी फ्रेंड्स को भेज दी यह सिलसिला चलता गया और अंततः हमें यह मालूम चल चुका था कि वह लड़की लक्ष्मी थी जो होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर चुकी थी। वह पैसों के लिए कभी-कभी वह हाई प्रोफाइल कॉल गर्ल बन कर कामुक गतिविधियां भी किया करती थी।

हमें जबरदस्त सफलता हाथ लगी थी छाया और सीमा अपनी इस सफलता से खुश थे। हमें सोमिल जल्द ही मिलने वाला था।
 
छाया और सीमा के प्रयास
(मैं मानस)

छाया और सीमा ने अपने कॉलेज के दोस्तों और फ्रेंड सर्किल में उस अनजान लड़की की तस्वीरें प्रसारित कर दीं थीं। छाया ने उस फोटो में से सोमिल की फोटो हटाकर सिर्फ उस लड़की की फोटो रखी थी वह समझदार तो थी ही।

हॉस्टल की लड़कियों का नेटवर्क जबरदस्त था। उन्होंने उस खूबसूरत लड़की की तस्वीर अपने सभी फ्रेंड्स को भेज दी यह सिलसिला चलता गया और अंततः हमें यह मालूम चल चुका था कि वह लड़की लक्ष्मी थी जो होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर चुकी थी। वह पैसों के लिए कभी-कभी वह हाई प्रोफाइल कॉल गर्ल बन कर कामुक गतिविधियां भी किया करती थी।

हमें जबरदस्त सफलता हाथ लगी थी छाया और सीमा अपनी इस सफलता से खुश थे। हमें सोमिल जल्द ही मिलने वाला था।

अब आगे .....
मैंने विवाह भवन के मैनेजर से मुलाकात कर उस बाथरूम को देखना चाहा। उसने मुझे बताया कि कल ही कोई आदमी उस कैमरे के बारे में पूछता हुआ यहां आया था। हम लोगों ने बाथरूम में चेक करवाया वहां पर कोई कैमरा नहीं था। हालांकि अभी परसों से ही उस लाइन के कमरों की पेंटिंग शुरू हुई है। हो सकता है पेंटर ने उसे निकाल कर कहीं रखा हो। कल पेंटर नहीं आया था मैं आज उससे बात करता हूं। मैंने वहीं इंतजार करना उचित समझा। कुछ देर बाद वह पेंटर आया और मुझे ले जाकर एक तरफ रखा हुआ वह कैमरा दिखाया। मैंने वह कैमरा ले लिया। मैंने होटल मैनेजर को धन्यवाद देते हुए वहां से बाहर आ गया। यह कैमरा एक वाईफाई कैमरा था जिसकी फोटो को दूर बैठे कंप्यूटर पर देखा जा सकता था। इस तरह का कैमरा बेचने वाले बेंगलुरु में कई दुकानें पर जिस एरिया में हम थे वहां पर सिर्फ दो दुकाने थीं। थोड़ा ही प्रयास करने पर मुझे इस कैमरा खरीदने वाले का नाम मालूम चल गया। यह कैमरा हमारे विवाह भवन में प्रवेश करने के ठीक एक दिन पहले खरीदा गया था और हो सकता है उसी दिन उसे इंस्टॉल भी किया गया हो।

जिस आदमी ने यह कैमरा खरीदा था मैं उससे भली भांति जानता था पर अभी उसका फोन नहीं लग रहा था। हम इस साजिशकर्ता के काफी करीब थे बस कुछ समय का इंतजार था।

उधर पुलिस स्टेशन में इस केस के नए इंचार्ज इंस्पेक्टर रॉबिन 30-32 वर्ष का नया और तेज नवयुवक था। वह डिसूजा का असिस्टेंट था जिसे अब इस केस का प्रभारी बना दिया गया था। डिसूजा के अब तक किए गए जांच के बारे में उसे पूरी जानकारी थी। उसने लक्ष्मण को पकड़ने की कोशिश तेज कर दी थी। उसे लक्ष्मण का सुराग भी मिल चुका था सिर्फ उसे पकड़ना बाकी था। सोमिल की खबर उसे नहीं लग पाई पर एक बार लक्ष्मण पकड़ में आ जाता तो सारी बातें स्वयं ही सामने आ जाती रॉबिन यह बात जानता था। मुझमे छाया और सीमा में कामुक संबंध है यह बात भी उसे मालूम थी पर वह जानता था की वयस्कों के बीच में इस तरह के संबंध होना सामाजिक अपराध तो हो सकता है पर कानूनी नहीं। वह इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था।

उसने डिसूजा की जांच की इस दिशा को वहीं पर रोक दिया था। वह सिर्फ और सिर्फ कातिल तक पहुंचना चाहता था और पैसों के गबन करने वाले को पकड़ना चाहता था। गुप्तचर की सूचना के अनुसार लक्ष्मण मुंबई में था। रोबिन और उसकी टीम ने उसे मुंबई से गिरफ्तार कर लिया और हवाई जहाज से बेंगलुरु ले आए। शर्मा जी के दबाव की वजह से डीआईजी ने रोबिन को फ्री हैंड दे दिया था।

रॉबिन ने लक्ष्मण से पूछताछ शुरू कर दी थी।

सोमिल का कैदखाना

( मैं शांति उर्फ लक्ष्मी )

आज मैंने सोमिल सर से दिन भर तरह-तरह की बातें की और उन्हें खुश करती रही। आज शाम को स्नान किया और वापस वही शर्ट पहन लिया। मैं उनसे संभोग करने के लिए आतुर हो चुकी थी मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैंने शाम को फिर उन्हें शराब पीने के लिए आमंत्रित किया पर आज उन्होंने मना कर दिया। मैंने आज हल्का खाना बनाया और उन्हें आज भी वियाग्रा एक डोज फिर से दे दिया।

आज मैं हर हद तक जाना चाहते थी। मैंने मन ही मन सोच लिया था चाहे मेरी असलियत ही क्यों न सामने आ जाए पर मैं आज उनसे संभोग कर करके ही रहूंगी।

मैं कल रात उनके साथ बिस्तर पर सो चुकी थी मुझे पता था मुझे आज भी बिस्तर पर ही सोना है। किचन का काम निपटाने के बाद मैं वापस सोफे पर सोने जाने लगी। उन्होंने कहा शांति यही ऊपर सो जाओ। मैंने थोड़ी है ना नुकुर की और कुछ ही देर में बिस्तर पर आ गयी। मैन कहा

"सर टीवी ऑन कीजिए ना"

"अरे उसमें सब उन्होंने बकवास फिल्में रखी हैं"

"कोई बात नहीं लगाइए तो"

मैने रिमोट अपने हाथों में ले लिया और कोई उचित वीडियो की तलाश में लग गयी। मुझे एक इंग्लिश फिल्म दिखाएं पड़ गई मैंने उसे प्ले कर दिया। फिल्म के शुरुआती दृश्यों में कोई नग्नता नहीं थी। हम दोनों फिल्म देखने लगे। मैंने उनसे कहा कुछ फिल्में अच्छी भी होती है। वह मुस्कुरा रहे थे धीरे धीरे फिल्म में कामुकता आने लगी। जैसे-जैसे हीरो हीरोइन पास आ रहे थे सुनील सर के पाजामे में हरकत हो रही थी। मैंने भी अपनी चादर हटा दी। मेरी जाँघें अब नग्न थीं पर मेरी योनि अभी ढकी हुई थी।

जैसे-जैसे नायक नायिका करीब आते गए उनका लिंग आकार में बढ़ता गया और मेरी जाँघों का फैलाव भी। हम दोनों अपने अपने यौन अंगों पर ध्यान केंद्रित किए हुए थे। मेरी मुनिया भी प्रेम रस छोड़ने लगी वह अपने लिंग को बीच-बीच में मेरी नजर बचाकर सहला देते। यही काम मैं अपनी मुनिया के साथ भी कर रही थी।

फिल्म की कामुकता अश्लीलता में बदल चुकी थी। नायक और नायिका पूरी तरह नग्न हो गए थे। इधर मेरी शर्ट भी मेरी कमर तक आ गई थी मेरी मुनिया पूरी तरह नग्न होकर ऊपर चल रहे पंखे की हवा खा रही थी। अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी मुझे इस तरह अपनी देख कर वह उत्तेजित हो गए। कमरे में लाइट पहले ही कम थी उन्होंने भी अपना लिंग बाहर निकाल लिया। मेरी नजर बचाकर वह अपने लिंग को बार-बार सहलाने लगे।

मैं भी अपनी मुनिया को धीरे धीरे प्यार कर रही थी। मैंने अपनी शर्ट के बटन भी खोल दिए थे। अब वह मेरे स्तनों के सहारे ही मेरे शरीर पर ठीके हुए थे। थोड़ी भी तेज हवा का झोंका मेरे शर्ट को दो भागों में बांट देता। और वो ऊपर से पूरी तरह नग्न हो जाते।

सोमिल सर की हथेलियाँ अपने लिंग पर तेजी से चल रहीं थी। मैं धीरे-धीरे से सरकते हुए उनके बिल्कुल समीप आ गयी। वह मेरा सरकना महसूस कर रहे थे पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। कुछ ही देर में मेरे पैर उनके पैरों से सट रहे थे। उन्होंने अभी भी पैजामा पहन रखा था। मेरे पैरों का स्पर्श वह पूरी तरह महसूस नहीं कर पा रहे थे। उन्हें भी इस स्पर्श का इंतजार था। धीरे-धीरे उनका पैजामा नीचे की तरफ खिसकता गया और हमारी जाँघें एक दूसरे में सटने लगीं।

उनका हाथ अभी भी लिंग पर था मैंने करवट ली। और अपनी जाँघें उनके ऊपर रख दीं। मेरे जांघों का निचला हिस्सा उनके लिंग से छू राजा था। उन्होंने अपने हाथ लिंग से हटा लिये और मेरी जांघों को छूने लगे। मुझे अपनी सफलता पर गर्व होने लगा। मैंने अपनी हथेलियां आगे बढ़ायीं और उनके लिंग को सहला दिया।

उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। मैंने अपनी हथेलियों से रह रह कर उनके लिंग को छूना शुरु कर दिया था। वह अपने हथेलियों से मेरी जांघों को सहलाते सहलाते मेरे नितंबों तक आ गए। अचानक उन्होंने करवट ले ली और मेरी आंखों में देखा। मेरी आंखों में भी प्रेम की भूख थी। उन्होंने मुझे अपनी आगोश में खींच लिया।

मेरी शर्ट खुल चुकी थी। मेरे नग्न स्तन उनके सीने से सट रहे थे। मैंने उनकी हथेलियों को अपने नितंबों पर महसूस किया। मैंने भी उनके लिंग को अपने हाथों में ले लिया और उसे सहलाने लगी। उनकी हथेलियां मेरे नितंबों को छूते छूते मेरी रानी के मुख तक आ गयीं।

उन्होंने रानी के गीलेपन को अपनी उंगलियों पर स्पष्ट रूप से महसूस किया होगा। मैं उठ कर उनके ऊपर आना चाहती थी और यथाशीघ्र संभोग रत होना चाहती थी।

वह अभी मेरी योनि को अपनी उंगलियों से सहला रहे थे और मैं उनके लिंग को अपनी हथेलियों से उत्तेजित कर रही थी।

मैं उठकर उनके ऊपर आ गयी और लिंग पर बैठने का प्रयास करने लगी। वह पूरी तरह उत्तेजित थे। जैसे ही मुनिया ने उनके लिंग को छुआ वह उठकर बैठने लगे। मैं अव्यवस्थित हो गई। उन्होंने अपने लिंग को मेरी मुनिया से दूर कर दिया था। अब वह हम दोनों के पेट के बीच में आ गया था। मेरे स्तन उनके सीने से सट रहे थे मैं उनकी गोद में आ चुकी थी वह मुझे सहलाए जा रहे थे।

मेरा चेहरा उनके चेहरे के बिल्कुल समेत था मैंने उनसे पूछा "सर क्या हुआ"

उन्होंने मुझे गालों पर चूम लिया और बोला "शांति मैं यह नहीं कर सकता मैंने अपनी प्रेमिका को वचन दिया था कि मैं पहला संभोग उसके साथ ही करूंगा। मुझे माफ कर देना। तुम्हारे जैसी सुंदरी के साथ संभोग को ठुकरा कर मैं अपराधबोध से ग्रसित हूँ। उम्मीद करता हूं तुम मुझे माफ कर दोगी। मैं उनकी दुविधा समझ गयी।

मुझे पता था वह एक आदर्श पुरुष थे वह अपना वचन नहीं तोड़ेंगे। मैंने फिर कहा

"पर हम एक दूसरे को खुश तो कर ही सकते हैं" वह प्रसन्न हो गए. मैंने उन्हें होठों पर चुंबन लेने की कोशिश की जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह दूसरे पुरुष थे जिन्हें मैंने होठों पर चुंबन दिया था. मेरे बॉयफ्रेंड ने जबरदस्ती मेरे होठों को मेरी किशोरावस्था में चुम्मा था. वह मेरे होठों को बेसब्री से चूमने लगे। मेरी हथेलियां एक बार फिर उनके लिंग को सहला रहीं थीं और वह अपनी उंगलियों से मेरे नितंबों के नीचे से मेरी मुनिया को सहला रहे थे। हमारी उत्तेजना चरम पर थी।हमें स्खलित होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।

उनके लिंग से निकली हुई वीर्य की धार हम दोनों को गीला कर गई थी। पर हमने उस पर बिल्कुल ध्यान नही दिया। हम एक दूसरे को प्यार करने में व्यस्त थे। हम दोनों उसी अवस्था में ही बिस्तर पर सो गए।

शनिवार
(मैं शांति उर्फ लक्ष्मी)

सुबह उनके प्यारे लिंग को देखकर मेरे मन में एक बार फिर उत्तेजना पैदा हुई। मैंने अपने होठों से उसे मुखमैथुन देने की सोची। मैंने बिना उनकी सहमति के अपने होठों से उसे छूना शुरु कर दिया। सोमिल सर की आंखें खुल चुकी थी पर उन्होंने जानबूझकर अपनी आंखें बंद कर लीं।

मेरे होठों ने अपनी प्यास बुझाना शुरू कर दिया था। सोमिल सर का लिंग एक बार फिर स्खलन के लिए तैयार था। मैं उनके अद्भुत लिंग के साथ बिताए पल को जी लेना चाहती थी । मेरे जीवन में वह एक अद्भुत पुरुष के रूप में आए थे मैं उनके साथ बिताए पलों को अपनी यादों में संजो लेना चाहती थी। लिंग के वीर्य स्खलन करने के पश्चात मेरा चेहरा और मुह उनके वीर्य से भर गया था। सोमिल सर ने मुझे एक बार फिर अपनी गोद में ले लिया वह मुझसे प्यार करने लगे थे।

मैंने उनसे कोई बात नहीं छुपाई और अपनी असलियत खुलकर बता दीं। वो बिल्कुल नाराज नहीं थे। उन्होंने मुझसे कहा शांति तुम एक अच्छी लड़की हो मैं शादीशुदा हूं। तुम्हारे साथ तीन-चार दिनों में मुझे नारी शरीर और उसके सुखद साथ का एहसास हुआ है मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूँ। मैं तुम्हारी खुशी के लिए जरूरत पड़ने पर तुम्हारी मदद कर सकता हूं। तुम मुझे अपना एक दोस्त मान सकती हो। मैं उनकी सादगी की कायल हो गयी और फिर एक बार उनसे चिपक गयी।

मैंने सुनील सर से कहा

"मुझे आपसे एक बात करनी है पर मुझे शर्म आ रही है"

"बेशक कहो अब हमारे तुम्हारे बीच में कोई पर्दा नहीं है"

"मैं आपसे एक बार संभोग करना चाहती हूं यह मेरी और मेरी मुनिया की दिली इच्छा है"

मैंने अपनी जाँघों के बीच इशारा कर दिया। वो मुस्कुराने लगे।

" मुझे पता है आप यह आज नहीं करेंगे पर अपने वचन पूरा करने के बाद क्या आप मेरी इच्छा का मान रखेंगे?.

उन्होंने कहा

"एक ही शर्त पर यदि तुम मुझसे वादा करो कि किसी भी पुरुष से संभोग तभी करोगी जब तुम्हारी अंतरात्मा और तुम्हारी इस प्यारी सी मुनिया का मन होगा। किसी लालच या प्रलोभन में नहीं। तुम्हारी मुनिया प्रकृति का दिया हुआ अनुपम वरदान है इसे पैसों के लालच में व्यर्थ प्रताड़ित मत करना। इसकी संवेदना और प्यार ही जीवन का रस है।"

मैं उनकी बात समझ चुकी थी।

मैंने कहा "मैं आपसे मिलन की प्रतीक्षा करूंगी"

सोमिल सर द्वारा कही गई बात मेरे दिलो-दिमाग पर छा गई थी वह कुंवारे होने के बावजूद यह बात कैसे जानते थे कि मुनिया सिर्फ और सिर्फ प्रेम से ही उत्तेजित होती है पैसों से नहीं। उनका यह गूढ़ ज्ञान मेरी समझ से परे था पर मैंने मन ही मन यह ठान लिया था कि भविष्य में कभी भी लालच और पैसों के लिए मुनिया को तंग नहीं करूंगी। मैंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि एक बार मेरी मुनिया को सोमिल सर से संभोग सुख प्राप्त हो, और मुस्कुराती हुई बाथरूम की तरफ चल पड़ी।

शानिवार, मानस का घर 6.00 बजे

(मैं मानस)

लक्ष्मी का पता चलते ही मैंने इंस्पेक्टर रॉबिंन से बात की वह बहुत खुश हो गए। हम सुबह सुबह 7:00 बजे ही उस लड़की के घर जाने के लिए निकल गए। वह बेंगलुरु शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर रहती थी।

अचानक आई पुलिस को देख कर लक्ष्मी के घर से निकलकर एक आदमी भागने लगा। रॉबिन की टीम ने उसे दौड़ाकर पकड़ लिया। कुछ ही देर की पिटाई में उसने शांति बनी लक्ष्मी को पहचान लिया और सोमिल के बारे में भी साफ-साफ बता दिया।

पुलिस टीम ने उसे अपने साथ ले लिया और हम सोमिल को कैद की गयी जगह के लिए निकल पड़े। मेरे चेहरे पर खुशी थी। सोमिल मिलने वाला था। मैंने फोन लगाकर छाया को इस बात की सूचना देनी चाही पर तब तक हम नेटवर्क से बाहर आ चुके थे। छाया उस समय निश्चित ही तनाव में होगी। अब से चंद घंटों बाद उसे उस अपरिचित आदमी की हवस मिटाने होटल में जाना था। मुझे धीरे-धीरे यह विश्वास हो चला था कि उस समय से पहले ही हम अपराधी का पता लगा लेंगे।

एक-दो घंटे के सफर के पश्चात हम सोमिल के ठिकाने पर आ गए थे। पुलिस ने बाहर खड़े दोनों गार्डों को अरेस्ट कर लिया। बाहर हुई हलचल से सोमिल और शांति सहम गए थे।

हम अंदर आ चुके थे। लक्ष्मी ने शरीर पर चादर ओढ़ रखी थी। सोमिल सिर्फ पायजामा पहने खड़ा हुआ था। उसका शरीर का ऊपरी भाग नग्न था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह दोनों नग्न अवस्था में एक-दूसरे को बाहों में लिए सो रहे थे और बाहर की हलचल से उठ खड़े हुए थे। शांति ने अपने शरीर पर चादर लपेट ली थी और सोमिल बमुश्किल अपना पजामा पहन पाया था।

यह मेरे मन की सोच थी। पुलिस ने लक्ष्मी को अरेस्ट कर लिया। सोमिल ने उसे रोकना चाहा। लक्ष्मी रो रही थी उसने अपनी कहानी फिर दोहरा दी।

रॉबिन ने कहा आप लोग चिंता मत कीजिए यदि यह निर्दोष है में तो मैं इसे छोड़ दूंगा सोमिल ने शांति से कहा।

"तुम परेशान मत हो तुम सच्ची हो तो तुम्हें निश्चय ही न्याय मिलेगा" वह संतुष्ट हो गयी और बाथरूम की तरफ कपड़े पहनने चली गई। मैंने उसकी खूबसूरती एक नजर में ही पहचान ली थी। वह सच में छाया का कुछ अंश अपने अंदर संजोये हुए थी।

कुछ ही देर में हम वापस बेंगलुरु के लिए निकल गए। मैंने छाया को इस बात की सूचना दे दी। सोमिल के सकुशल मिल जाने पर घर में खुशी का माहौल था बस एक ही कष्ट था कि छाया को कुछ घंटे बाद उस अनजान आदमी से संभोग करने के लिए जाना था। उसके पास सिर्फ एक ही सहारा था वह खत में लिखी हुई भाषा जिससे उस अनजान व्यक्ति का छाया के प्रति प्यार झलकता था। उससे ऐसा प्रतीत होता था जैसे छाया द्वारा किया गया एक बार का संभोग हमारे सब राज गुप्त रखने के लिए पर्याप्त था पर ये हमे स्वीकार नही था। यही सब बातें सोचते हुए मैं खिड़की के बाहर देख रहा था।

बेंगलुरु शहर अब कुछ दूर ही रह गया था तभी मेरे फोन पर घंटी बजी

"हां कुछ पता चला क्या?

उत्तर सुनकर मेरी आंखें आश्चर्य से फटी रह गई। मैंने रॉबिन से बात की उन्होंने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी। उन्होंने थाने से फोन कर कुछ और पुलिस फोर्स मंगा लिया। मेरे कहने पर उन्होंने सोमिल को घर भेज दिया। मैं नहीं चाहता था कि छाया के इस कदम की जानकारी उसको अभी हो।

लक्ष्मी और उसके भाई को अपनी दूसरी टीम को हैंड ओवर कर रोबिन और मैं उनके विश्वस्त सिपाहियों के साथ होटल मानसरोवर की तरफ बढ़ चले। यह वही होटल था जहां उस अनजान व्यक्ति ने मेरी छाया को संभोग के लिए बुलाया था।

मानस का घर (सुबह 9 बजे)

(मैं सीमा)

छाया के मोबाइल पर मैसेज आ चुका था मानसरोवर होटल, दोपहर 1:00 बजे। वह रोते हुए मेरे पास आयी।

आखिर वह दिन आ ही गया था जब छाया को उस अनजान व्यक्ति के पास संभोग के लिए जाना था. नियति के इस निष्ठुर प्रहार से छाया का मन मस्तिक आहत हो चुका था। वह समाज में कुत्सित विचार के लोगों के प्रति अत्यधिक क्रोधित थी जो अपनी काम पिपासा को शांत करने के लिए इस तरह का गलत कार्य करते थे। छाया को कामुकता ऊपर वाले ने स्वभाविक रूप में दी थी। जिसे उसका भोग करना था वह उससे प्यार करता और उसके मन मस्तिष्क पर काबिज हो जाता छाया अपनी कामुकता और अपने यौवन के साथ उसकी बाहों में चली आती। उसका तो जन्म ही पुरुषों की कामुकता शांत करने के लिए हुआ था। पर बिना उससे प्रेम किये इस तरह उसे डरा कर संभोग करना सर्वाधिक अनुचित था। मैं मन ही मन उस दुष्ट व्यक्ति को कोस रही थी।

मैंने और छाया दोनों ने आज सुबह से ही व्रत रखा हुआ था। हम भगवान से यही प्रार्थना कर रहे थे कि हे प्रभु मेरी छाया की रक्षा करना। उसकी कोमल रानी किसी अपरिचित के साथ संभोग के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। छाया का रोम रोम हमेशा खिला रहता था उसके स्तन और यौनांग हमेशा खुश और खिले खिले दिखाई पड़ते थे। जब मैं छाया की रानी को अपने होठों से झूमती तुम मुझे अपने होंठ हमेशा खुरदुरे लगते। छाया के शरीर और यौनांगो में गजब की कोमलता थी।

छाया की हरदम खुश रहने की आदत उसकी कामुकता का प्रमुख कारण थी पर आज छाया दुखी थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी पौधे को कई दिनों से पानी न दिया गया हो। उसने स्नान किया और सादे वस्त्र पहन लिए। उसकी मायूसी देखकर मेरी आंखें भर आयीं थी। एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा जैसे छाया को फांसी पर लटकाया जा रहा है।

मेरी अंतरात्मा रो रही थी। मुझे लग रहा था मैं चीख चीख कर इस दुनिया से कह दूं छाया और मानस एक दूसरे के लिए ही बने हैं इन्हें अलग मत करो। जब मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है तो समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए। छाया को ब्लैकमेल करना सर्वाधिक अनुचित था।

धीरे-धीरे समय हो चला था मैं और छाया उस अनजान को कोसते हुए उससे मिलने निर्धारित स्थल की ओर चल पड़े थे।

(मैं मानस)

हम मानसरोवर होटल पहूच चुके थे। पुलिस ने बिना हल्ला गुल्ला किए होटल के सारे दरवाजे सील कर दिए। छाया और सीमा चौथी मंजिल पर अनजान व्यक्ति के एसएमएस का इंतजार कर रहे थे। छाया मुझ से लगातार संपर्क मे थी। कमरा नंबर का मैसेज उसके फोन पर आते ही उसने हमें सूचित कर दिया। मैंने और रोबिन की टीम ने उस कमरे को घेर लिया। छाया कमरे के अंदर चली गई जैसे ही उस व्यक्ति ने छाया को छुआ, छाया ने मोबाइल से टाइप किया मैसेज भेज दिया जो उसने पहले से टाइप किया हुआ था।

हमें स्पष्ट इशारा मिल चुका था कि वह व्यक्ति छाया के बिल्कुल करीब है। हमारे साथ आए सिपाही ने एक जोरदार लात दरवाजे पर मारी और दरवाजा खुल गया। अंदर मेरी छाया थी और वह आदमी। उसे देख कर मैं हतप्रभ था।
 
[color=rgb(61,]भाग 32[/color]
हमें स्पष्ट इशारा मिल चुका था कि वह व्यक्ति छाया के बिल्कुल करीब है। हमारे साथ आए सिपाही ने एक जोरदार लात दरवाजे पर मारी और दरवाजा खुल गया। अंदर मेरी छाया थी और वह आदमी। उसे देख कर मैं हतप्रभ था।
अब आगे.....

वह आदमी अश्विन था, मनोहर चाचा का दामाद। साथ आई टीम ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया। छाया मेरे से सट गयी थी। वह एक छोटे बच्चे को तरह सुबक रही थी। उसके स्तन मेरे सीने पर सट रहे थे और छाया के बच्ची ना होने का एहसास दिला रहे थे। मैं उसकी पीठ सहला रहा था। रोबिन हमें देख कर मुस्कुरा रहे थे।

पोलिस स्टेशन पहुचने के बाद
[color=rgb(0,](मैं अश्विन)[/color]
मैंने छाया को पहली बार अपने विवाह में ही देखा था। इतनी सुंदर लड़की मैंने अपने जीवन में आज तक नहीं देखी थी वह मेरी साली थी। उसका चेहरा हमेशा के लिए मेरे दिमाग मे कैद हो गया था। अपने विवाह के दौरान भी।हर समय मेरा ध्यान उस पर ही था.
छाया के प्रति मेरी ललक बढ़ती चली गई. मैं उसे देखने के लिए घंटों उसके कॉलेज के सामने रहता। मुझे उससे मिल पाने की हिम्मत तो नहीं थी पर उसे देखने का सुख में नहीं त्यागना चाहता था. शुरू शुरू में मैं मानस के घर जाया करता जिसका मुख्य कारण छाया को देखना होता था परंतु धीरे-धीरे मेरा उनके घर आना जाना बंद हो गया मेरी पत्नी ने साफ मना कर दिया था. मेरी पत्नी को मेरे छाया के प्रति इस कामुक प्रेम की खबर लग चुकी थी. कई बार संभोग के दौरान मेरे मुंह से छाया शब्द निकल आया था जिसे मेरी पत्नी ने तुरंत ही पकड़ लिया था.
मैंने मानस के विवाह में उसके और छाया के बीच में चल रही छेड़छाड़ को कई बार देखा था। उसी दौरान मैंने छाया की नग्न जाँघों के बीच मानस को उसकी योनि को चूमते देखा। मुझे इस बात का यकीन ही नहीं हो रहा था की छाया और मानस के बीच ऐसे संबंध हो सकते हैं। मुझे यह अत्यंत कामुक लगा था। मेरे मन ही मन में यह उम्मीद जाग गई थी की छाया के साथ आसानी से संबंध बनाए जा सकते हैं। उसे एक से ज्यादा पुरुषों के साथ संबंध बनाने में कोई विशेष समस्या नही होगी ऐसा मेरा अनुमान था. पर यह बात छाया से कर पाने की मेरी हिम्मत कभी नहीं थी और ना ही कभी इसका मौका मिल रहा था।
इस बार जब छाया का विवाह हो रहा था तो मुझे उसे नग्न देखने और उसके साथ संभोग करने की इच्छा जागृत हो गई। उसका होने वाला पति सोमिल मेरे दोस्त लक्ष्मण की कंपनी में काम करता था। मैंने और लक्ष्मण ने मिलकर यह प्लान बनाया। लक्ष्मण ने मुझे पैसों का लालच दिया उसने एक कंप्यूटर हैकर हायर किया।
मैं छाया के विवाह में बढ़-चढ़कर योगदान कर रहा था। विवाह मंडप की व्यवस्था में भी मेरा योगदान था। मैंने छाया के कमरे के बाथरूम में एक स्पाई कैमरा इंस्टॉल कर दिया जिससे मैं बाथरूम में छाया को नग्न अवस्था में देख पाता था।
वह होटल जहां पर छाया और सोमिल की सुहागरात होनी थी वहां पर विवाह में आए कई और गेस्ट भी रुके हुए थे। उनकी व्यवस्था भी मेरे ही जिम्मे थी। मेरा होटल में आना जाना सामान्य बात थी। मैं उस दिन कंप्यूटर हैकर को लेकर शाम 9:00 बजे ही सोमिल के कमरे में घुस गया था। लक्ष्मण ने उस दौरान लॉबी के सीसीटीवी कैमरे पर अपना रुमाल डाल दिया था। ताकि हम सोमिल के कमरे में घुसते हुए ना देखे जा सकें। हम छाया और सोमिल का इंतजार कर रहे थे। वह दोनों लगभग 9:30 बजे कमरे में प्रवेश किये मैं और वह हैकर बाथरूम में इंतजार कर रहे थे। हमने सोचा था कि कमरे में सोमिल और छाया आएंगे पर कमरे में 2 से अधिक व्यक्तियों के होने की आवाज आयी। मुझे मानस की भी आवाज सुनाई दी। फिर अचानक ही कमरे से कुछ लोगों के बाहर जाने की आवाज आई और कमरे में शांति हो गयी।
लक्ष्मण ने फोन करके सोमिलको बाहर बुला लिया।
हमने सोचा था की जब छाया कमरे में अकेले रहेगी मैं और मेरा साथी उसे बेहोश कर देंगे उसके पश्चात कंप्यूटर हैकर सोमिल के अकाउंट को हैक कर ओटीपी की मदद से पैसे ट्रांसफर कर देगा। इसके पश्चात कंप्यूटर हैकर को वहां से चले जाना था और मुझे बेहोश हो चुकी छाया को अपने काबू में कर संभोग करना था और वापस आ जाना था।
लक्ष्मण को सोमिल को बाहर निकलने के बाद सीसीटीवी कैमरे को तोड़ देना था और सोमिल को कुछ दिनों के लिए गायब करना था इसकी व्यवस्था लक्ष्मण ने अपने हाथ में ले ली थी।
हम दोनों छाया का इंतजार कर रहे थे।कुछ देर बाद दरवाजा खुला पर छाया की जगह सीमा ने प्रवेश किया था कंप्यूटर हैकर घबरा गया। उसने उसके सर पर प्रहार कर दिया। वह बेहोश हो गई। हैकर को बेहोशी की दवा सुंघा कर छाया को बेहोश करना था पर उसने सीमा को देखकर हड़बड़ी में गलती कर दी।
छाया को कमरे में ना पाकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। मैं जिस निमित्त यहां तक आया था वह अब संभव नहीं था। तभी कंप्यूटर हैकर ने पैसे ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। सोमिल के फोन पर आया हुआ ओटीपी लक्ष्मण ने मेरे फोन पर भेज दिया। उस ओटीपी की मदद से कंप्यूटर हैकर ने लक्ष्मण के द्वारा बताए गए विदेशी अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर दिए।
तभी मेरे फोन पर एक मैसेज आया जिसमें मेरे खाते में ₹ ₹50 लाख ट्रांसफर रुपए आने की सूचना थी। लक्ष्मण ने मुझे फोन किया मैंने तुम्हारे अकाउंट में मैं ₹50, लाख डाले हैं। तुम उस कंप्यूटर हैकर को गोली मार दो मैं तुम्हें 5 करोड़ रुपए दूंगा। तुम मेरी बात का विश्वास करो कमरे में तकिए के नीचे साइलेंसर लगी हुई बंदूक रखी हुई है।
मुझे पैसों की बहुत आवश्यकता थी मुझे अपनी पैथोलॉजी का विस्तार करना था मुझे यह पता था कि लक्ष्मण ने ज्यादा पैसों का गबन किया है और वह मुझे निश्चय ही 5 करोड़ दे सकता है। मुझे उस पर पूरा विश्वास था मैंने तकिए के नीचे से रिवाल्वर निकाली और उस हैकर को मार दिया। उसे कमरे में छोड़कर मैंने लैपटॉप उसका मोबाइल और वह रिवाल्वर तीनों उसी के बैग में रखा और कमरे से बाहर आ गया।
मैं अपनी छाया के साथ संभोग तो नहीं कर सका था पर मेरी पैसों की चाह पूरी हो गई थी। मैंने छाया के साथ संभोग के सपने को कुछ दिनों के लिए टाल दिया। 2 दिनों के बाद डिसूजा का आदमी मेरे पैथोलॉजी लैब पर आया उसने मुझे फोन किया मैं मानस छाया और सीमा का नाम सुनकर खुश हो गया। वह तीनों मेरी क्लीनिक पर आए थे उन्होंने अपना ब्लड सैंपल दिया और उसकी जांच रिपोर्ट मैन भी देखी। उनकी जांच रिपोर्ट आने के बाद मैंने डिसूजा से बात की थी मुझे यह बात मालूम चल चुकी थी उस रात दूसरे कमरे में छाया और मानस ने सुहागरात मनाई थी।
मैं एक बार फिर छाया से संभोग करने का प्लान बनाने लगा। छाया की नग्न तस्वीरें मेरे पास पहले से ही थीं। मैने इन्हीं फ़ोटो को दिखाकर छाया को ब्लैकमेल कर सम्भोग के लिए होटल बुलाया था। रॉबिन के सिपाही उसे लातों से मारे जा रहे थे।
लक्ष्मण ने भी अपना अपराध कबूल कर लिया था।

मुझे यह समझते देर नहीं लगी की छाया ने अपना कौमार्य मानस को ही समर्पित किया था वह इसका हकदार भी था. मुझे महर्षि की बातों पर यकीन हो चला था. छाया को आने वाले दिनों में कई उतार-चढ़ाव देखने थे . नियति के खेल को प्रभावित करने की मेरी हैसियत नहीं थी. मैंने मन ही मन महर्षि और भगवान को प्रणाम किया। छाया की योनि के होंठ पर तिल का निशान यह आश्चयर्जनक था उसे देखने की बात छाया से नहीं कर पाई आखिर मैं उसकी मां थी।

इतना सब सोचते हुए मेरी रानी लार टपकाने लगी और मैं शर्मा जी से अपने मिलन का इंतजार करने लगी।

(मैं सीमा)

सोमिल अपने घरवालों से मिलने के पश्चात देर शाम हमारे घर पर ही आ गए थे। हम सब उनके आने से बहुत खुश थे। हम चारों मेरे घर में पिछले दिनों हुई घटनाओं के बारे में बातें कर रहे थे। सोमिल मुझे बार-बार कातर निगाहों से देख रहा था। उसके वजन की लाज मुझे रखनी थी। चूंकि आज हम सब थके हुए थे मैंने यह कार्यक्रम कल के लिए निर्धारित कर दिया। वैसे भी मेरी रानी अभी रजस्वला थी वह युद्ध के लिए तैयार नहीं थी।

यह एक संयोग ही था उस दिन भी रविवार था और कल भी रविवार ही था। मैं और मेरी रानी भी रजस्वला होने के बाद नई ऊर्जा और स्फूर्ति के साथ संभोग के लिए तैयार हो रही थी।

छाया रविवार का दिन सुनकर थोड़ा घबरा गई पर हम सब ने उसे समझा लिया था।

रात को बालकनी में मुझे सोमिल ने शांति के बारे में खुलकर बताया। मुझे सोमिल पर बहुत प्यार आ रहा था। उसने मुझे दिए वचन की खातिर उस सुंदरी से संभोग सुख का परित्याग कर दिया था। मुझे लगता था वह निश्चय ही मुझे प्यार करता था। मैं भी खुशी खुशी उसे उसके प्रथम संभोग का आनंद देना चाहती थी। बातों ही बातों में उसने शांति द्वारा दिये गए वियाग्रा का भी जिक्र कर दिया था। मेरे मन में शैतानी आ गयी।

रविवार
(मैं छाया)

स्नान करने के बाद मैं स्वयं को आईने में निहार रही थी आज एक बार फिर हमारी सुहाग रात थी. सीमा भाभी भी अपने कमरे में तैयार हो रही थी. हमें पार्लर जाना था. प्रकृति ने यह कैसा संयोग बनाया था हम सभी अपने अपने साथी का इंतजार कर रहे थे. सोमिल के दिए हुए वचन ने मुझे भी उस दिन मेरी सुहागरात का तोहफा दे दिया था। उनके वचन की वजह से ही मेरा मानस भैया से मिलन हो पाया था. मुझे नहीं पता सीमा भाभी अपने मन में क्या सोचती थी पर यह तय था कि मैं मानस और सोमिल अपनी अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर रहे थे. ऐसा कतई नहीं था कि मैं सोमिल से प्यार नहीं करती थी. सोमिल अब मेरे दिलो-दिमाग पर छा चुके थे उस रात मैं मानस भैया को भूलकर पूर्ण समर्पण के साथ सुहागरात के लिए निकली थी पर भगवान ने मेरे दिल का साथ दिया था.

मानस भैया ने मेरे शरीर और दिलोदिमाग में ऐसी जगह बनाई थी जिसे मिटाया नहीं जा सकता. वह मेरी आत्मा में रच बस गए थे. मेरा ध्यान अपने स्तनों पर गया यह वही स्तन थे जो पहले मेरी छोटी हथेलियों में आ जाया करते थे. मानस भैया ने अपनी हथेलियों से जाने कितनी बार इनकी मालिश की और इन्हें इस आकार में लाया जो अब स्पष्ट रूप से वस्त्रों का आवरण भेदकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं तथा मेरे नारी सुलभ सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं. जब वह स्तनों को अपने हाथों से मालिश किया करते वह बार-बार कहते थे "मेरी छाया के स्तन इस दुनिया के सबसे खूबसूरत स्तन बनेंगे." वह अपनी दोनों हथेलियों से उनका नाप लेते उनके निप्पलों को सहलाते अपनी उंगलियों से गोल-गोल घुमाते और ऊपर की तरफ खींचते. उधर मेरी राजकुमारी उनके प्रेम रस में लार टपकाते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही होती. उनके हाथों ने मेरे शरीर के हर अंग को संवारा था मेरे नितंबों को मालिश करते वक्त भी वह उनके आकार पर विशेष ध्यान देते. मेरी जाँघों और मेरे पैरों को भी आकार में लाने का श्रेय उनको ही है. अपने जिम में ट्रेनिंग करते वक्त वह मेरा विशेष ध्यान रखते तथा मेरे शरीर को एक सुडौलआकार में बनाए रखने के लिए सदैव प्रोत्साहित करते.

वह स्वयं भी एक आदर्श पुरुष की भांति रहते. मेरी राजकुमारी को उन्होंने हमेशा फूल की तरह रखा अपनी उंगलियों के स्पर्श से ज्यादा भरोसा उन्हें अपनी जिह्वा पर था वह कभी भी मेरी राजकुमारी को अत्यधिक दबाव से नहीं छूते थे कभी-कभी मैं खुद इसकी प्रतीक्षारत रहती की वह दबाव बढ़ाएं परंतु वो हमेशा उसे कोमलता से ही छूते. मेरे स्खलन मैं लगने वाला समय बढ़ जाता पर वह अपना दबाव नहीं बढ़ाते वह बार-बार कहते "छाया तुम्हारी राजकुमारी तुम्हारे दिल की तरह पवित्र और कोमल है"

उस दिन मुझे इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था की सीमा दीदी उस दिन मेरी और मानस भैया की सुहागरात होगी. उस दिन भगवान स्वयं सीमा भाभी के रूप में आए थे और मेरे अंतर्मन की इच्छा को पूर्ण किया था.

मेरा ध्यान आईने पर गया, आज मुझे अपनी रात मानस की बांहों में गुजारनी है यह निश्चित था. मैं अपने कामदेव के लिए तन मन से तैयार हो रही थी. रानी के होठों पर आए प्रेम रस को मैंने अपनी उंगलियों से महसूस किया और उसे शाम तक प्रतीक्षारत रहने के लिए थपथपाया और नाइटी पहन कर बाहर आ गई.

मेरा रोम रोम खिला हुआ था मैं बहुत खुश थी. सीमा भाभी के लिए मेरे दिल में अथाह सम्मान और प्रेम उमड़ आया था. मैं उनके प्रति कृतज्ञ थी मैंने मन ही मन में उन्हें हमेशा खुश रखने की ठान ली थी. वह भी मेरा जी जान से ख्याल रखतीं थीं मैं सच में उनकी छोटी बहन थी.

यही बातें सोचते हुए मैं खयालों में गुम थी तभी सीमा दीदी मेरे कमरे में आ गयीं और मुझे अपने आलिंगन में ले लिया.

"अरे छाया आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो सोमिल तो खुश हो जाएगा?"

"सोमिल?"

"क्यों सोमिल के पास नहीं जाना है?"

"पर उनके वचन का क्या?"

वह मेरी मंशा पढ़ चुकी थीं वह मुस्कुराने लगी.

उन्होंने एक बार फिर मुझे आलिंगन में लिया और कहा

"मैंने मेरी प्यारी छाया की इच्छा जान ली है. वचन का पालन आधी रात में ही होगा कह कर हंसने लगी"

उन्होंने मुझे शीघ्र तैयार होने के लिए कहा और हंसते हुए कमरे से बाहर चली गई मेरे मन में अचानक आया संशय गायब हो गया था और मैं फिर से मुस्कुराने लगी थी.
 
जूही जी धन्यवाद। इतना विश्वास रखिए की छाया कभी भी व्यभिचारिणी नहीं थी वह सामान्य अतिसुन्दर युवती थी। जिसमें कामेच्छा कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं करेगी जो पूर्णरूप से अनुचित हो। महर्षि की बातों में उसके जीवन के उत्तरार्ध का जिक्र है जो कहानी के अंतिम भाग में दिखाई पड़ेगा अभी तो उससे अपने पति और प्रेमी के बीच सामंजस्य बिठाना है और मर्यादा में रहते हुए अपनी और अपने आसपास कामुकता जीवित रखनी है।
महर्षि की बातों का असर आपको बाद में दिखाई देगा। वैसे कहानियां कल्पना की देन होती हैं जो निश्चय ही हर व्यक्ति की अलग अलग हो सकती हैं। दोनों पाठकों ( u and lutgaya) के सुझाव मेरे जेहन में हैं. पर निश्चिंत रहिए आप सब निराश नहीं होंगे साहित्यिक कामुकता जारी रहेगी.

[color=rgb(147,]नए पाठकों के लिए मैंने अब तक कि कहानी का सारांश लिखा है जो इस प्रकार है। [/color]
[color=rgb(147,](अब तक की कहानी का सारांश)
माया और उनकी पुत्री छाया को मानस के पिता अपने घर दूसरी पत्नी के रूप में ले आए थे। यद्यपि वह मानस की सौतेली माँ थी परंतु मानस ने कभी भी माया और छाया से संबंध नहीं रखा। छाया जब बड़ी हो गई तो मानस और छाया के बीच प्यार जन्म ले लिया। वह दोनों प्रेमी प्रेमिका की भांति रहने लगे पिता की मृत्यु के बाद मानस छाया और माया को अपने शहर बेंगलुरु ले आया और वह एक ही छत के नीचे प्रेमी प्रेमिका की भांति रहते। कुछ दिनों पश्चात माया ने अपनी पुत्री छाया और मानस को एक दूसरे की बाहों में नग्न अवस्था में देख लिया। मानस और छाया के बीच चल रहा प्रेम संबंध अद्भुत और पावन था। दो-तीन वर्षों तक एक दूसरे के यौन अंगों से खेलने के बावजूद मानस ने छाया का कौमार्य भंग नहीं किया था।
उन दोनों के अगाध प्रेम को देखकर माया ने उनके प्रेम संबंधों को स्वीकार कर लिया तथा इस अनचाहे भाई बहन के रिश्ते को ताक पर रख दिया। वह दोनों खुशी खुशी प्रेमी प्रेमिका की भांति रहते और छाया की पढ़ाई का खत्म होने का इंतजार करते जिसके पश्चात उन दोनों का विवाह होना था।
अचानक एक कार्यक्रम में उनके भाई बहन के रिश्ते पर सब की नजर पड़ गई सामाजिक दबाव से उन दोनों का विवाह होना कठिन हो गया। भाई बहन का यह अनचाहा रिश्ता उनके प्रेम पर भारी भारी पड़ गया और दोनों का बिछोह हो गया।
बाद में मानस की शादी छाया अपनी अंतरंग सहेली सीमा से करा देती है और कुछ ही दिनों में छाया और उसकी सहेली दोनो मानस के साथ फिर अंतरंग हो जाती है। तीनों के बीच त्रिकोणीय प्रेम जारी रहता है। छाया की पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद छाया का विवाह सीमा के पुराने बॉयफ्रेंड सोमिल से हो जाता हैम नाटकीय घटनाक्रम में छाया की सुहागरात के दिन मानस ही उसका कौमार्य भंग करता है। छाया और मानस एक दूसरे के लिए ही बने थे परंतु उनका विवाह नहीं हो पाया था इस भाई बहन के रिश्ते से उन्हें चिढ़ हो चली थी उनका प्रेम अभी भी कायम था। मानस की पत्नी सीमा और छाया के पति सोमिल को भी मानस और छाया के प्रेम के बारे में पता था सोमिल और सीमा भी पुराने प्रेमी थे।
मानस जब युवा हो रहा था तो किसी न किसी रूप में माया ने भी उसे एक पुरूष के रूप में देखा था और उसमें भी संभोग की इच्छा जागृत हुई थी। मानस को अपनी पुत्री के साथ नग्न देखने के पश्चात माया में कामुकता जाग उठी थी उनका प्रेम संबंध शर्मा जी जो उनके पड़ोसी थे और विधुर थे से हो चला था। मानस ने भी शर्मा जी को अपने घर में जगह दे दी थी। शर्मा जी और माया दोनों में कामुकता जागृत थी। माया जी कभी-कभी अपनी कल्पना में मानस को ले आती और अपने संभोग सुख को बढ़ातीं यही कार्य शर्मा जी छाया को याद करते हुए करते।[/color]

[color=rgb(147,]इन सभी पात्रों में सिर्फ छाया और माया के बीच पवित्र मां बेटी का रिश्ता था बाकी सारे रिश्ते परिस्थितियों वश बने थे।[/color]
आगे कहानी जारी है...
 
[color=rgb(41,]भाग - 33
दिन रविवार
सोमिल के वचन की लाज
(मैं सीमा)[/color]
रविवार को हमने दूसरा होटल बुक किया था। छाया ने सिर्फ हमारा कमरा विशेष रूप से सजाया था. हम चारों के बीच सिर्फ सोमिल ही ऐसा था जिसने आज तक संभोग सुख नहीं लिया था छाया अपने पति का संभोग सुख सुहागरात की तरह मनाना चाहती थी. सोमिल को उसकी सुहागरात के दिन दूसरे कमरे में हुई मानस और छाया के मिलन की जानकारी नहीं थी। उसे यह बताना उचित भी नही था।
मैं और छाया एक बार फिर उसी तरह सज धज कर होटल पहुंच गए थे। पार्लर वाली महिला हम दोनों को इस तरह दोबारा सजते हुए देख कर मुस्कुरा रही थी। उसे शायद यह हमारी कामुकता का प्रतीक लग रहा था। उसे हमारे साथ हुयी घटना की कोई जानकारी नहीं थी.
इस बार मानस स्वयं सोमिल को लेकर उस होटल में आए थे। मैं और छाया सोमिल के कमरे में बैठकर बातें कर रहे थे। मानस और सोमिल कमरे में आ चुके थे हमने उन्हें बिस्तर पर बैठा दिया और वापस दूसरे कमरे में आ गए। छाया भी हमारे पीछे पीछे चली आई थी सोमिल अपने सुहागरात के दिन की घटनाओं को एक बार फिर होते हुए महसूस कर रहे थे।
मानस और छाया के कमरे में आने के बाद उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया। मैंने भी अपने मिशन पर जाने की तैयारी कर ली थी। जाते समय मैंने मानस और छाया के साथ थोड़ा-थोड़ा पेप्सी पी और सोमिल के वचन की लाज रखने निकल पड़ी । छाया ने मुझे आलिंगन में लेकर मेरी रानी को अपनी हथेलियों से सहलाया और मेरे कान में बोला
"सीमा भाभी अपने मुझे और मानस को अपनाया है अब सोमिल को भी अपना लीजिए वह भी अब अपना ही है."
मैंने उसे गालों पर चुम लिया पर मैंने अपनी शैतानी कर दी थी। मानस की ग्लास में मैंने वियाग्रा की एक गोली डाल दी थी।
मैं भी चाहती थी कि मेरी प्यारी ननद और सहेली छाया रात भर मेरे साथ साथ जागती रहे। आखिर मै उसके वैवाहिक सुख के लिए ही सोमिल के पास जा रही थी..।
मैं मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर आ गयी वह दोनों मुझे सोमिल के कमरे में जाते देख रहे थे और मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

(मैं सीमा)

सोमिल बिस्तर पर बैठा इंतजार कर रहा था. मैं मानस और छाया को छोड़कर वापस आई और दरवाजे की सिटकनी लगा दी. वह यह देख कर बहुत खुश हुआ. उसे पूरी उम्मीद हो गई कि आज ही उसके वचन का पालन हो जाएगा. वह उठकर मेरे पास आ गया. मैं जानबूझकर उससे चिपक गई. मैंने उसके राजकुमार को अपने हाथों से सहलाया और बोला
"आज मैं आपकी हूं. अपने वचन का पालन कीजीए."
सोमिल खुश हो गया था. और उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया. मैंने उसके पसंद की हल्के हरे रंग की साड़ी पहनी हुई थी. उसने मुझे माथे पर चुंबन दिया धीरे-धीरे उसके चुंबन मेरे गालों तक पहुंच चुके थे. पर वह मेरे होठों को नहीं चूम रहा था शायद उसे इसकी अहमियत पता थी. मैं अब किसी और की पत्नी थी. कुछ ही देर में मैंने उसके कपड़े खोलने शुरू कर दिए उसकी पजामी निकल कर बाहर आ चुकी थी. और राजकुमार मेरे हाथों में खेल रहा था . मैं अभी तक राजकुमार को देख नहीं रही थी क्योंकि वह मुझे अपने से चिपकाए हुए था और मेरे गालों जो चूमे जा रहा था. राजकुमार को हाथों में लेकर एक अलग प्रकार की अनुभूति हो रही थी. इस राजकुमार को मैंने अपनी किशोरावस्था में दो-तीन वर्ष तक खिलाया था और जाने कितनी बार इसका वीर्य प्रवाह कराया था.
पर आज इसकी कद काठी कुछ अलग ही लग रहा थी. ऐसा लगता था जैसे पिछले दो-तीन वर्षों में सोमिल का राजकुमार और जवान हो गया था. मैं अभी भी उसे देख नहीं पाई थी.
मुझे अपनी पीठ पर सोमिल की उंगलियां महसूस हुयीं. वह मेरे वस्त्रों को खोलने के लिए व्याकुल था पर खोल नहीं रहा था. मैं अब उसकी प्रेमिका नहीं बल्कि सलहज थी. शायद वह शर्मा रहा था. मैंने उसके कान में बोला
"आज कपड़ों में ही अपना वचन पूरा करोगे क्या ?" वह हंस पड़ा. उसकी उसकी उंगलियां अब उसकी पसंदीदा साड़ी को मेरे शरीर से अलग कर रही थीं. कुछ ही देर में मैं गहरे हरे रंग का पेटीकोट और सजे धजे ब्लाउज में उसके सामने थी. मेरे सीने पर मंगलसूत्र ठीक वैसा ही था जैसा छाया के पास था. मैंने भी आज अपनी नथ दुबारा पहन ली थी. ब्लाउज हटाते ही उसकी नजर स्तनों पर की गई मेहंदी की सजावट पर गयी. उसे देखकर वह अत्यंत खुश हो गया वह स्तनों को चूमने लगा. उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी की मैं इस तरह सज धज कर आउंगी . मेरे पास उसकी खुशी के लिए अभी और भी बहुत कुछ बाकी था.
वह मेरी नाभि को चुमता हुआ वह नीचे आया और मेरे पेटीकोट का नाडा खोल दिया. मेरी जांघों और राजकुमारी के ऊपर की गई मेहंदी से सजावट देख कर बहुत खुशी से झूम उठा. उसने अपना चेहरा मेरी राजकुमारी के पास रख दिया. और उसे बेतहाशा चूमने लगा. वह घुटनों के बल आ चुका था. मैं अभी भी खड़ी थी उसके हाथ मुझे आलिंगन में लिए हुए थे. उसके हाँथ मेरी जाँघों को पकडे हुए थे और उसका गाल मेरी रानी पर सटा था. वह अपने गालो और होंठों से मेरी जाँघों और पेट को चूमे जा रहा था. मैं खुद भी उसके बालों पर उंगलियाँ फिरा रही थी. आज हम दोनों जल्दी में नहीं थे. कुछ देर के बाद वह वापस उठ खड़ा उसकी आँख में खुसी के आंसू थे.
मेरी नजर उसके राजकुमार पर पड़ी वह पहले से ज्यादा बलिष्ठ और मजबूत लग रहा था. उसे देख कर मुझे एक अजीब तरह की सनसनी हुयी. यह मानस से अपेक्षाकृत काफी बड़ा था. मुझे मानस का लिंग लेने की आदत पड़ चुकी थी वह मेरी गहराइयों के हिसाब से उपयुक्त हो गया था परंतु सोमिल के राजकुमार की कद काठी देखकर मैं खुद दंग थी. एक बार के लिए मैं डर गई. कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे सुहागरात में अनुभव किया गया दर्द आज मुझे दोबारा मिलने वाला था. मैं थोड़ा डरी हुई थी. मेरा डर उसने पहचान लिया और मुझे चूम लिया.
कुछ ही देर में हम दोनों बिस्तर पर थे. मैंने बिस्तर पर पड़ा हुआ लाल तकिया अपनी रानी पर रख लिया था. शर्म तो मुझे भी आ रही थी. अपने पति को छोड़कर मैं अपने पुराने प्रेमी के सामने इस तरह सज धज कर नंगी लेटी हुयी थी.
वह मेरी रानी के दर्शन करना चाहता था. उसने कहा
"सीमा मैंने तुम्हारी योनि को याद कर हमेशा से अपना वीर्य बहाया है मैं उसके दर्शन करना चाहता हूँ" वह मासूम सा लग रहा था.
मैंने उसे प्यार से अपने पैरों के बीच ले लिया और अपनी जांघें फैला दी. पर तकिया अपनी जगह पर ही था.
मैंने कहा
"लो कर लो अपने वचन का पालन" यह कहकर मैंने तकिया हटा दिया.
वह ध्यान से मेरी राजकुमारी को देखने लगा. रानी के ऊपर लिखे आई लव यू से उसे बहुत खुशी हुई. उसने उसे चूम लिया. वो अपनी उंगलियों से मेरी रानी के होठों को छू रहा था. उसकी उंगलिया मेरे प्रेम रस से भीग रहीं थीं. वह उसकी खूबसूरती से हतप्रभ था. उसने धीरे से अपना चेहरा मेरी रानी के समीप लाया और उसे चूम लिया.
कुछ ही देर में वह अपनी जानकारी के आधार पर योनि को खुश करने लगा. मुझे उसकी इस अदा पर बहुत प्यार आ रहा था. पहले का अधीर सोमिल अब काफी परिवर्तित हो गया था. पहले वह इन सब गतिविधियों के दौरान खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाता था पर अभी वह बिल्कुल बदला बदला सा लग रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे उसमें मानस के कुछ गुण आ गए थे. वह मेरी राजकुमारी जो अब रानी बन चुकी थी को प्यार से चूम रहा था था तथा रानी से निकलने वाला प्रेम रस के अद्भुत स्वाद का आनंद भी ले रहा था. कुछ देर बाद मैंने उससे ऊपर की तरफ बुलाया मेरी रानी भी अब अधीर हो चुकी थी. अब तक उसके होंठ मेरे होंठों से नहीं मिले थे. मेरे दोनों स्तनों के बीच मंगलसूत्र देखकर वह थोड़ी देर के लिए रुका पर कुछ सोच कर आगे बढ़ गया. मैं उसकी मनोस्थिति समझ रही थी. मैंने उससे यही कहा आज के दिन में तुम्हारी वधू हूं मुझे ही अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करो. ऐसा कह कर मैंने उसके होठों पर अपना चुंबन जड़ दिया. मुझे उस पर एक बार फिर प्यार आ गया था.
वह अत्यंत खुश हो गया. उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी. वह मेरे होंठों को अपने होंठों के अंदर लेकर चूसने लगा. कुछ ही देर में हम दो जिस्म एक जान हो चुके थे. सिर्फ उसके राजकुमार का मेरी रानी में प्रवेश का इंतज़ार था.
बहती नदी अपना रास्ता खुद खोज लेती है. इसी प्रकार राजकुमार ने रानी का मुख खोज लिया था. बहता हुआ प्रेमरस राजकुमार को रानी के मुख तक ले आया था. राजकुमार उस पर बार-बार दस्तक दे रहा था. होठों के चुंबन के दौरान मैंने उसकी पीठ पर अपने हाथों का दबाव बढ़ाया यह एक इशारा था. कुछ ही देर में सोमिल ने अपना राजकुमार मेरी रानी के मुख में उतार दिया. मुझे अपनी रानी में एक अद्भुत कसाव महसूस हो रहा था परंतु प्रेम रस के कारण राजकुमार अंदर घुसता ही चला जा रहा था मैंने अपनी जांघे पूरी तरह फैला लीं थीं ताकि दर्द कम हो. कुछ ही देर में मुझे लगा जैसे मैं भर चुकी हूं. राजकुमार के लिए आगे कोई जगह नहीं बची थी. मैंने अपनी रानी को देखने की कोशिश की परंतु देख ना सकी क्योंकि सोमिल पूरी तरह मेरे था. उसने अपने सीने को मुझ से थोड़ा अलग किया तब जाकर मैं अपनी रानी को देख पायी. राजकुमार अभी भी लगभग 1 इंच के आसपास बाहर ही था. मुझे पता था लिंग के बिना पूरा प्रवेश हुए सोमिल को आनंद नहीं आएगा. मैंने एक बार फिर हिम्मत करके उसे अपनी तरफ खींचा. सोमिल ने अब अपना लिंग पूरी तरह मेरे अंदर उतार दिया था. मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे राजकुमार का मुख मेरे गर्भाशय से टकरा रहा था. मुझे थोड़ा दर्द की अनुभूति भी हुई फिर भी मैंने उसे बर्दाश्त कर लिया. मुझे लगा जैसे मेरी सात नंबर की जूती में कोई आठ नंबर का पैर डाल दिया हो.

धीरे- धीरे सोमिल ने अपने राजकुमार को अंदर बाहर करना शुरू किया. रानी के सारे कष्ट अब खत्म हो गए थे. राजकुमार का आवागमन उसे प्रफुल्लित कर रहा था और मैं आनंद के सागर में डूब रही थी. सोमिल के चेहरे पर तृप्ति का भाव था. उसने अपना वचन पूरा कर लिया था. धीरे- धीरे उसकी गति बढ़ती चली गई. मैंने भी आज उसके इस उद्वेग को रोकने की कोशिश नहीं की. जब सोमिल अपने राजकुमार को पूरी तरह अन्दर कर देता तो मुझे कभी-कभी हल्का दर्द महसूस होता पर उसी समय मेरी भग्नासा पर रगड़ होती थी. यह रगड़ मुझे बहुत पसंद थी. सुख और दुःख साथ साथ मिल रहे थे. सुख ज्यादा था.
हम दोनों एक दूसरे से काफी देर तक प्यार करते रहे. रानी भी जैसे राजकुमार को हराने में लगी हुई थी. कोई पहले स्खलित नहीं होना चाह रहा था. और अंततः राजकुमार का उछलना बढ़ गया. मैं अपने राजकुमार को पराजित होता नहीं देख सकती थी. सोमिल की सांसे फूलने लगी थीं. मैंने अपने स्तनों की तरफ इशारा किया वह तुरंत ही मेरे स्तन चूसने लगा. स्तनों का चुसना रानी को स्खलित होने पर मजबूर कर दिया.
मैंने खुद ही अपनी रानी को हरा दिया था. मैं स्खलित हो रही थी. रानी के कंपन राजकुमार ने महसूस किए होंगे और वह भी स्खलित होना प्रारंभ हो गया. किसके कंपन ज्यादा थे यह समझ पाना बड़ा कठिन था. जब तक मेरी राजकुमारी स्खलित होती रही उसका राजकुमार उछलता रहा. रानी में उसके उछलने लायक जगह तो नहीं थी फिर भी वह अपनी उछाल का अनुभव मुझे दे रहा था. सोमिल ने अपने सारा वीर्य मेरी रानी के अंदर उड़ेल दिया था. उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वह मुझे गर्भवती कर सकता है. मैंने भी उसे नहीं रोका आखिर मैं विवाहिता थी. वह बहुत खुश दिखाई पड़ रहा था. मैंने उसके होठों पर फिर चुंबन लिया.
कुछ देर बाद वह मुझसे अलग हुआ और मेरे बगल में लेट गया. हम दोनों अभी भी एक दूसरे की बाहों में थे. मुझे मेरी जांघों से सोमिल का वीर्य बहता हुआ महसूस हो रहा था पर मैंने उसे यथास्थिति में छोड़ दिया.
कुछ ही देर में हम दोनों फिर से पुरानी बातें करने लगे. उसने अचानक मुझसे पूछा
"छाया कहाँ है?"
"वह भी संभोग में लिप्त होगी."
"पर किसके साथ?"
"अपने प्यारे मानस भैया के साथ"
उसकी आँखे फटी रह गयीं.
"परेशान मत हो तुम्हारे वचन ने ही उन्हें यह मौका दिया है। छाया अपनी सुहॉगरात के दिन तक कुवारी थी। मैंने तुम्हे ये बात बतायी भी थी" वह पुरानी बाते सोचने लगा.
मैंने उसे छाया और मानस के प्रेम संबंधों के बारे में विस्तार पूर्वक बता दिया. वह बड़े आश्चर्य से यह बात सुन रहा था और अपने मन ही मन उन परिस्थितियों की कल्पना कर रहा था.
यह जानने के बाद की छाया के साथ मानस ने सुहागरात मनाई हैं सोमिल के मन में साहस आ गया और वह एक बार फिर से अपने राजा बन चुके राजकुमार को मेरी रानी में प्रवेश कराने को उत्सुक था. मैं उसका इशारा समझ चुकी थी. इस बार मैंने कमान संभाल रखी थी. सोमिल नीचे लेटा हुआ था और मैं उसके ऊपर थी. मै राजकुमार को मैं अपनी स्वेच्छा से अपने अंदर ले सकती थी. मैंने पिछले कुछ महीनों में मानस के साथ संभोग करते हुए अपनी कमर को हिलाने में दक्षता प्राप्त कर ली थी. सोमिल को आज रात मैं सारे सुख दे देना चाहती थी जिसकी तलाश में वह कई दिनों से भटक रहा था. उसकी रात को यादगार बनाने के लिए मैंने अपनी सारी कुशलता का प्रयोग कर दिया था. हम दोनों एक बार फिर स्खलित हो चुके थे.
तुम्हारा वचन पूरा हो गया है. वह कुछ बोला नहीं सिर्फ मुस्कुराता रहा. हम दोनों ने कुल 5 बार संभोग किया वह खुश था और मैं भी. मैंने उसकी सुहागरात यादगार बना दी थी.

मानस के कमरे में
(मैं छाया)

मुझे अपनी तकदीर पर गर्व हो रहा था. मैंने हमेशा भगवान से यही मांगा था कि मेरा कौमार्य भेदन मानस के हाथों ही हो पिछले रविवार मेरी सुहागरात के दिन मुझे वह सुख प्राप्त हो चुका था. मैं भगवान की शुक्रगुजार थी . मेरा विवाह अवश्य सोमिल से हुआ था पर मेरे मन में मानस की छवि बसी हुई थी. पिछले दिनों जिन परिस्थितियों का निर्माण हुआ था और जिस तरह मानस और सीमा ने उसे संभाला था यह एक करिश्मा ही था.
सीमा के सोमिल के कमरे में चले जाने के बाद मैं और मानस भैया अपने कमरे में आ गए थे। सीमा दीदी ने आज मुझे जबरदस्ती सजवा दिया था। मेरी सुहागरात तो पहले ही पूरी हो गई थी और हमने उसका जी भर कर आनंद भी उठाया था पर सीमा शायद इतने से संतुष्ट नहीं थी।
आज उसे हमें पास लाने का एक और मौका मिल गया था। पिछले छह दिनों में जो मानसिक दंश मैंने झेला था शायद वह उसे मुझे मानस की बाहों में सौंप कर उसे मिटाना चाहती थी।
मैं और मानस भैया बिस्तर पर लेटे सीमा को ही याद कर रहे थे। हमारे संभोग में अब पहले मिलन वाली बात नहीं थी। हम उसके पश्चात भी संभोग कर चुके थे। सीमा की बातें करते करते मानस भैया के लिंग में उत्तेजना बढ़ने लगी।
मानस भैया के साथ संभोग करना हर दिन एक नया अनुभव देता था। वह मेरे कामदेव थे और मैं उनकी रति। आज भी हम दोनों अपने कौशल के साथ पुनः संभोग रत हो गए थे। आज मुझे मानस भैया के लिंग में अद्भुत तनाव महसूस हो रहा था। इतना तनाव मैंने पहली बार महसूस किया था। उनका राजकुमार फूल कर थोड़ा मोटा भी हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर खून का अद्भुत प्रवाह हो रहा था। मेरी रानी इस बदलाव को महसूस कर रही थी।
संभोग करते समय यह पहली बार हुआ था कि मैं स्खलित हो चुकी थी पर राजकुमार का तनाव जस का तस था। वह अपने राजकुमार को लगातार हिलाये जा रहे थे अंत में मुझे हार माननी पड़ी। मैं उनके उत्तेजित लिंग को स्खलित नहीं करा पायी थी।
मैं मानस भैया की बहुत इज्जत करती थी पर कामकला में उनसे हारना मेरी फितरत में नहीं था। हम दोनों ने कामकला एक साथ सीखी थी।
मैं पुनः अपनी थकी हुई रानी को लेकर उनके ऊपर आ गई थी। मैं अपने छोटे अनुभव और कौशल से उन्हें स्खलित करने का प्रयास करने लगी। परंतु जाने आज उसे कौन सी विशेष शक्ति प्राप्त थी। मेरे जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी मैं मानस भैया को स्खलित नही कर पायी। राजकुमार उद्दंड बालक की तरह तन कर खड़ा था मेरी मान मुनहार और आलिंगन का उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था मैं थक चुक्की थी मेरी रानी स्खलित होकर दूसरी बार पराजित हो चुकी थी।
मानस भैया अपनी विजय पर आनंदित थे वह मुझे बच्चे की तरह प्यार कर रहे थे उनका राजकुमार मेरी हथेलियों के स्पर्श से उछल तो जरूर रहा था पर अपना वीर्य त्याग करने को तैयार नहीं था मैं पशोपेश में थी।
मैंने अब मैंने राजकुमार को अपने होठों के बीच ले लिया और अपनी जीह्वा के प्रहार से उसे उत्तेजित कर दिया उसकी उछाल लगातार बढ़ रही थी। इसी अवस्था में मैंने मानस भैया को संभोग के लिए आमंत्रित कर दिया। मैं पीठ के बल लेट गई और अपनी जांघो को फैला दिया अपनी सुंदर रानी के दोनों होठ मैंने स्वयं ही अपनी उंगलियों से अलग कर दिया। मानस भैया इस कामुक आमंत्रण से बेचैन हो उठे। वह पूरे उद्वेग से अपने राजकुमार को मेरी रानी में प्रवेश करा कर प्रेमयुद्ध में कूद पड़े। उनकी कमर अद्भुत तेजी के साथ हिलने लगी। उनका राजकुमार द्रुतगति से मेरी रानी के अंदर बाहर होने लगा। मेरी रानी पहले ही दो बार स्खलित हो चुकी थी और आकार में फूल गई थी जिससे राजकुमार पर उसका दबाव और भी बढ़ गया था। मुझे मीठा मीठा दर्द का एहसास भी हो रहा था। उस अद्भुत दबाव से अंततः मानस भैया का राजकुमार स्खलित होने के लिए तैयार हो गया था। मानस भैया की आंखें लाल थी उन्होंने जैसे ही मेरे होठों को छू कर मुझे प्यार किया। राजकुमार ने अपना लावा उगल दिया। मैं अपने अंदर एक बार फिर अपने राजकुमार को फूलते और पिचकते हुए महसूस कर रही थी।
मैं थक कर चूर हो चुकी थी। मानस भैया ने मुझे ढेर सारे चुंबन लिए और अपनी गोद में लेकर प्यार करते हुए मुझे सुलाने लगे। वह मुझसे इतना प्यार क्यों करते थे यही सोचते हुए मैं सो गयी।
दोनो सहेलियों का मिलन
[मैं सीमा]
मैंने देखा घड़ी में 7:00 बज चुके थे. हम लोग खुद सुबह 4:30 बजे तक संभोगरत थे. मुझे पूरी उम्मीद थी छाया और मानस भी लगभग ऐसे ही जगे होंगे मेरी वियाग्रा ने छाया को सोने नही दिया होगा।. घर जाना आवश्यक था. मैंने छाया के दरवाजे पर अपनी हथेली से दस्तक दी. वह उठी और पास आकर पूछा कौन है? उसे पूरी उम्मीद थी मैं ही होंउगी क्योंकि हमने पहले ही निश्चित कर लिया था कि सुबह 7:00 बजे उठ जाएंगे. छाया सफेद चादर में लिपटी हुई थी दरवाजा खोलने आई थी. उसे सफेद चादर में लिपटा हुआ देखकर मुझ से रहा न गया मैं अंदर आ गई. बिस्तर पर मानस पेट के बल सोये हुए थे. कमरे में हल्की रोशनी थी. मैंने रूम की एक लाइट जला दी. मैंने छाया की तरफ देखा. वह मुस्कुरा दी. मैंने अपनी नाइटी पहनी हुई थी मैंने छाया की चादर हटाने की कोशिश की. वह शर्मा रही थी पर मैने उसकी चादर हटा दी. वह आकर मुझसे लिपट गई वह पूर्णता नग्न थी. मैंने उससे कहा "मुझे राजकुमारी माफ करना रानी साहिबां के दर्शन करने हैं." वह हंसने लगी. पास पड़ी टेबल पर अपने नितम्बों को सहारा देकर उसने अपनी जांघे फैला दीं. उसकी रानी फूली फूली दिख रही थी. मैंने अपनी हथेली से उसे छूना चाहा पर छाया ने कहा
"दीदी अभी नहीं"
मैं समझ गइ की रानी पर एक साथ हुये प्रहारों ने उसे संवेदनशील बना दिया था. मैंने फिर से उसे चूम लिया. छाया भी कहां मानने वाली थी. उसे मेरी वह बात याद थी कि सोमिल का लिंग मानस से अपेक्षाकृत बड़ा है. उसने मुझसे बिना पूछे मेरी नाइटी उठा दी. और झुककर मेरी रानी साहिबा को देखा. जो स्थिति छाया की थी लगभग वही स्थिति मेरी थी.
हम दोनों एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा दिए. एक बार फिर गले लग कर मैंने उसे तुरंत तैयार होने के लिए कहा और वापस अपने कमरे में आ गयी. हम दोनों ननद भाभी ने आज फिर अद्भुत सुख को प्राप्त किया था और आज हम सभी की मनोकामना पूर्ण हो गयी थी.

समाप्त
 
मेरी वर्तमान कहानी

"आह तनी धीरे से ....दुखाता" कहानी का अब तक का सारांश...

यह कहानी बनारस अंचल के आसपास की है जिसमें नजदीकी रिश्तो में स्वतः ही बन रहे कामुक संबंधों का विवरण है। नए पाठकों के लिए अब तक की कहानी का सारांश इस प्रकार है..

सरयू सिंह और बिरजू दो भाई हैं। बिरजू अपनी पत्नी कजरी को गर्भवती कर साधुओं की टोली के साथ भाग जाता है। सरयू सिंह कजरी के साथ संबंध बना लेते हैं परंतु उससे विवाह नहीं करते हैं पर दोनों में परस्पर प्रेम और मिलन कायम रहता है। कजरी रतन को जन्म देती है।

अपनी जवानी के दिनों में सरयू सिंह का संबंध अपने मामा गांव की एक विवाहिता पदमा से हो जाता है जो एक फौजी की पत्नी है। उससे कामूक संबंधों के दौरान सरयू सिंह के अंडकोशों के पास एक कीड़ा काट लेता है जिसका दाग उनके शरीर पर अब भी है।

कालांतर में फौजी की मृत्यु हो जाती है। पदमा के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए सरयू सिंह उसकी बड़ी पुत्री सुगना का विवाह अपने भतीजे रतन से कर देते हैं। क्योंकि यह विवाह रतन की असहमति से होता है और बाल विवाह का रूप होता है रतन इसे स्वीकार नहीं करता और वह मुंबई चला जाता है। वहां उसके संबंध एक अन्य युवती बबीता से बन जाते हैं जो शुरुआत में तो पतिव्रता रहती है परंतु बाद में उसके भी विवाहेतर संबंध हो जाते हैं। रतन का गांव आना जाना लगा रहता है पर सुगना उससे दूरी बना लेती है।

कुछ विशेष परिस्थितियों में सुगना अपने ससुर के करीब आने लगती है और पुत्र की लालसा में अपनी सास कजरी की सहमति से अपने ससुर सरयू सिंह से अनैतिक संबंध बना लेती है। सुगना से अनैतिक संबंध बनाते समय उनके माथे पर भी एक दाग उत्पन्न होता है जो सुगना के साथ कामूक गतिविधियां करते समय बढ़ जाता है। सरयू सिंह और सुगना का प्यार परवान चढ़ने लगता है और वह दोनों जीवन के सारे काम सुख लेते हैं और अंततः सुगना सूरज को जन्म देती है।

सूरज एक विलक्षण बालक है उसके एक अंगूठे में नाखून नहीं है उस विशेष अंगूठे को किसी नजदीकी रिस्ते की स्त्री या लड़की द्वारा सहलाने पर सूरज की नुंनी (गुप्तांग) अपना आकार बढ़ाने लगती है और उसका आकार तभी कम होता है जब वह स्त्री या लड़की अपने होठों से उस नुन्नी को छूती है अन्यथा उसे शांत होने में काफी समय लगता है। यह अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक है। इस बात का पता तब चलता है जब सुगना की छोटी जुड़वा बहने सोनी और मोनी सूरज के अंगूठे को सहलाती कौतूहल बस सहला देती हैं।

सुगना के पति रतन की मुम्बई वाली बबीता से दो पुत्रियां हैं बड़ी पुत्री मिंकी रतन की पुत्री है परंतु छोटी पुत्री चिंकी बबीता के विवाहेत्तर संबंधों की देन है।

सुगना की एक पक्की सहेली लाली है जो सुगना की ससुराल में सुगना के पड़ोसी हरिया की पुत्री है। लाली का पति राजेश सुगना को बेहद पसंद करता है और उससे संबंध बनाने को आतुर है। सुगना का छोटा भाई सोनू युवा हो चुका है। सोनू भी लाली के प्रति आसक्त है और लाली के बेहद नजदीक आ चुका है। लाली और सोनू को करीब लाने में लाली के प्रति राजेश की अहम भूमिका है।

इसी दौरान बनारस में एक विशेष महोत्सव आयोजित किया जा रहा है जिसमें सरयू सिंह का भाई बिरजू जो शुरुआत में ही भाग गया था ख्याति प्राप्त विद्यानंद स्वामी बनकर वापस बनारस महोत्सव में आया हुआ है।

सरयू सिंह वर्तमान में पटवारी के पद पर कार्यरत हैं और उनकी एसडीएम मनोरमा भी इस बनारस महोत्सव में शरीक हो रही है। नियति कथा के सारे पात्रों को बनारस महोत्सव में या तो पहुंचा चुकी है या पहुंचाने वाली है कथा का अगला भाग इसी बनारस महोत्सव से आगे बढ़ेगा।

नए पाठक इस कथा सारांश के साथ आगे की कहानी को पढ़ सकते हैं और उसका आनंद भी ले सकते हैं अपने खाली समय में पूर्ववर्ती कथा को पढ़कर आप पात्रों से अपने जुड़ाव को महसूस कर सकते हैं। कहानी में कई जगह सेक्स को विस्तार से दर्शाया गया है मेरी राय में इतना आवश्यक नहीं था फिर भी कई पाठकों के अनुरोध पर मैंने उसे शामिल किया है जिसे पाठक अपनी इच्छा अनुसार या तो पढ़ सकते हैं या नजरअंदाज कर सकते हैं।

आपके सुझाव और प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा मुझे हमेशा रहेगी...
 
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