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बहुरानी की प्रेम कहानी complete

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नये साल की सबको मुबारकबाद यह नया साल आपको और आपके परिवार को खुशहाली लाये
 
अभी तक इस सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैं अपनी पुत्रवधू यानि बहू के साथ फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में अकेला था. मेरी बहू पूरी नंगी हो चुकी थी.अब आगे:

मैं नीचे फर्श पर ही बैठ गया और मैंने बहूरानी के दोनों पैर उठा कर अपने कन्धों पर रख लिये और उसकी कमर में दोनों हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच लिया जिससे उसकी चूत मेरे मुंह के ठीक सामने आ गयी… बिल्कुल करीब; उसकी एकदम सफाचट चिकनी क्लीन शेव्ड चूत मेरे सामने थी. उसकी गुलाबी जांघें V शेप में मेरे सामने खुलीं थीं और जांघों के जोड़ पर वो खूब उभराहुआ गद्देदार तिकोना चबूतरा देख कर मेरे खून में उबाल आने लगा. बहूरानी की चूत की लम्बी सी दरार उस टाइम बंद थी.

मैंने उसकी चूत की दरार के निचले हिस्से पर अपनी जीभ रखी और ऊपर तक चाट लिया और इसी तरह फिर से किया. इस बार उसकी चूत के होंठ स्वतः ही खुल गये और मैंने उसकी भगनासा को जीभ से हौले से छुआ. चूत के दाने पर मेरी जीभ लगते ही बहूरानी के मुंह से एक आनन्ददायक सिसकारी निकल गयी और वो बर्थ पर अधलेटी सी हो गयी और अपनी पीठ पीछे टिका ली, फिर उसने अपनी टाँगें मेरी गर्दन में लिपटा कर मेरा मुंह अपनी चूत पर दबा दिया और मेरे बाल सहलाने लगी.

बहूरानी की चूत से वही चिरपरिचित गंध आ रही थी जैसे दालचीनी, गरम मसाला और कपूर सब इकट्ठे एक कंटेनर में रखने से आती है. अब मेरी जीभ उसकी चूत को लपलप करके चाटने लगी और जितनी गहराई तक भीतर जा सकती थी जाकर चूत में तहलका मचाने लगी. उसकी चूत का नमकीन रस मेरे मुंह में घुलने लगा.

मुझे पता था कि बहूरानी जी को मम्में दबवाते हुये अपनी चूत चटवाना बेहद पसन्द है तो मैंने उसके दोनों स्तन मुट्ठियों में भर लिए और उन्हें मसलते हुए उसकी जांघें चाटने लगा. कुछ देर उसकी केले के तने जैसी चिकनी जांघें चाटने काटने के बाद मैंने उसकी चूत के चबूतरे पर अपनी जीभ से हमला बोल दिया और हौले हौले दांतों से कुतर कुतर के चूत के ऊपर चाटने लगा.

जल्दी ही बहूरानी अच्छे से मस्ता गयीं और अपनी चूत उठा उठा के मेरे मुंह में देने लगीं.

“आह… पापा जी… यू लिक सो नाईस. आई एम फुल्ली वेट नाउ… लिक मी डाउन एंड डीप!” बहूरानी अत्यंत कामुक स्वर में बोली और मेरे बाल पकड़ कर मेरा चेहरा अपनी चूत पर जोर से दबा लिया और मेरे सिर के ऊपर से एक पैर लपेट कर मेरे मुंह को अपनी चूत पर लॉक कर दिया.

“या बेबी… योर साल्टी पुसी टेस्ट्स सो लवली!” मैंने कहा और बहूरानी की समूची बुर को अपने मुंह में भर लिया और इसे झिंझोड़ने लगा

“हाय राम, कितना मज़ा दे रहे हो आज तो आप पापा जी!” बहूरानी बोलीं और उसने अपने पैरों को मेरे सिर के ऊपर से हटा लिया और उन्हें दायें बायें फैला दिया जिससे उसकी चूत मेरे सामने ज़ूम हो कर और विशाल रूप में आ गई और जैसे ही मैंने उसे फिर से चाटना शुरू किया बहूरानी जी की कमर अनियंत्रित होकर उछलने लगी जैसे कोई खिलौने वाली गुड़िया हो.

“फक मी हार्ड नाउ पापा!”“या अदिति बेटा, ऍम गोइंग टू ड्रिल योर चूत नाउ!” मैंने बोला और फर्श पर से उठ कर बहूरानी पर झुक गया और अपने लंड से उसकी रिसती हुई चूत को रगड़ने लगा.“ओफ्फो… पापा जी; अब घुसा भी दो ना!” बहूरानी जी सिसिया कर बोलीं और अपनी कमर उठा उठा कर चूत को मेरे लंड से लड़ाने लगी.

लेकिन मैं उसे अभी और गर्म करना चाहता था इसलिए मैंने अपनी कमर पीछे की तरफ कर ली और उसके मम्में दबोच के चूसने लगा. मेरे ऐसे करते ही बहूरानी अपनी चूत और ताकत से ऊपर तक उठा उठा के मेरे लंड से भिड़ाने की कोशिश करने लगी. लेकिन मैं उसे ऐसा करने दूं तब ना; और मैं और ऊपर को हो गया. मेरे यूं उससे दूर हटते ही बहूरानी जी को जैसे हिस्टीरिया कर दौरा पड़ा हो, उसका सिर बर्थ पर दायें बायें होने लगा… उसके मम्में सख्त हो गये और निप्पल फूल कर भूरे अंगूर की तरह नज़र आने लगे.

 
“मुझे आपका लंड अपनी चूत में चाहिये पापा …जल्दी से पेल दो मेरी चूत में!” बहूरानी जी अब भयंकर चुदासी होकर निर्लज्ज होने लगी थी और यही मैं चाहता था.संग सहवास करने वाली स्त्री चाहे वो कोई भी हो, चुदाई के टाइम उसकी निर्लज्जता उसका बिंदासपन एक अनमोल गुण होता है जो कुछ ही कामिनियों को प्राप्त है; यूं तो नारी का शर्मीला, लज्जालु, शीलवान स्वाभाव ही उसका नैसर्गिक गहना है लेकिन सम्भोग काल में जब वह लाज शर्म तज कर बिंदास उन्मुक्त कामिनी का रूप धर चुदाई में लीन हो कर अपने साथी को पूरा आनन्द उसकी इच्छानुसार देती है और खुद भी तृप्त होती है तब ही उसका नारीत्व पूर्णता को प्राप्त करता है.

यहां एक बात और कहना चाहूंगा कि शुरुआत में जब हमारे बीच यौन सम्बन्ध स्थापित हुए तो बहूरानी चूत, लंड, चुदाई जैसे अश्लील शब्द बोलना तो क्या सुनना भी पसन्द नहीं करती थी. मैं बोलता तो वो अपने कान हथेलियों से ढक लेती; लेकिन धीरे धीरे मैं उसे अपनी मर्जी के अनुसार ढालता गया और वो ढलती गयी. अब उसे चूत लंड जैसे शब्द मुंह से निकालने में कोई हिचक नहीं होती.

“पापा जी ई ई… मुझे अपने लंड से चोदिये ना प्लीज!” बहूरानी अपनी आँखें मूँद कर अपनी कमर उठा कर बोली.वक़्त की नजाकत को समझते हुए मैंने अपना लंड बहूरानी की चूत की देहरी पर रख दिया और उसके दोनों दूध कसकर दबोचे और… इससे पहले कि मैं धक्का मारता, बहूरानी ने अपनी कमर पूरे दम से ऊपर उछाली और मेरा लंड लील लिया अपनी चूत में.

ठीक इसी टाइम कोई ट्रेन विपरीत दिशा से आती हुई मेरी राजधानी को क्रॉस करती हुई धड़धड़ाती, हॉर्न देती हुई बगल से निकल गयी. कुछ देर का शोर उठा और फिर पहले की तरह शान्ति छा गयी.

अब तक बहूरानी ने अपने पैर मेरी कमर में बांध दिये थे और मुझे बेतहाशा चूमे जा रही थी. मैंने धक्का लगाने को कमर उठाई तो बहूरानी जी चिपकी हुई मेरे साथ ऊपर को उठ गयी.

“अदिति बेटा, अपने पैर खोल दे और ऊपर कर ले!” मैंने धक्के लगाने का प्रयास करते हुए कहा.“ऊं हूं… आप लंड बाहर निकाल लोगे!” वो बोली जैसे उसने इसी बात के डर से मुझे अपने से बांध लिया था.

बहूरानी के इस भोलेपन पर मुझे हंसी आ गई- अरे नहीं निकालूंगा बेटा, अब तो तेरी चूत मारनी है न!मैंने उसे चूमते हुए कहा.“पहले प्रॉमिस करो?”“ओके बिटिया रानी… आई प्रॉमिस!”

मेरे कहने से बहूरानी ने अपने पैरों के बंधन से मुझे आजाद कर दिया और अपने घुटने मोड़ कर ऊपर की ओर कर लिए. अब उसकी चूत अपना मुंह बाये हुये मेरे सामने थी और चूत का दाना फूल कर बाहर की ओर निकल आया था. मैं बहूरानी के ऊपर झुक गया और उसकी प्यासी चूत का दाना अपनी छोटी छोटी नुकीली झांटों से घिसने लगा. बहूरानी ने भी मिसमिसाकर अपनी चूत और ऊपर उठा दी और अपने नाखून मेरी पीठ में गड़ा दिए. मैं भी उसके निप्पल चुटकियों में भर के बड़े आराम से मसलने लगा और साथ में उसका निचला होंठ अपने होंठों से चूसने लगा.

बहूरानी जी मुझसे किसी लता की तरह लिपट गयीं जैसे सशरीर ही मुझमें समा जाना चाहती हो.“लव यू पापा…” वो नशीली आवाज में बोली.“बेटा, आई लव यू टू…” मैंने कहा और उसका बायाँ दूध चूसने लगा.

बहूरानी की चूत से जैसे रस का झरना बह रहा था, मैंने लंड को अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया. पहले धीरे धीरे फिर रफ़्तार बढ़ा दी. बहूरानी भी मेरे धक्कों का जवाब अपनी चूत से देने लगी. फिर मैं किसी वहशी की तरह उसकी चूत मारने लगा. लंड को पूरा बाहर तक खींच कर फिर पूरी ताकत से उसकी चूत में पेलने लगा.मेरे हर धक्के का जवाब वो पूरे लय ताल से अपनी कमर उचका उचका के देने लगी.

चुदाई की फच फच की मधुर आवाजें और बहूरानी के मुंह से निकलती संतुष्टिपूर्ण किलकारियाँ और अपनी पूरी रफ़्तार से दिल्ली की ओर दौड़ती राजधानी एक्सप्रेस…“पापा जी… अच्छे से कुचल डालो इस चूत को आज!”“हां बेटा, ये लो… और लो… अदिति मेरी जाऽऽऽन!” मैं भी यूं बोलते हुए अपने हाथों और पैरों के बल उस पर झुक गया. अब मेरे शरीर का कोई अंग बहूरानी को छू नहीं रहा था; सिर्फ मेरा लंड उसकी चूत में घुसा था… मैंने इसी पोज में उसे चोदना शुरू कर दिया.

“आःह पापा जी…मस्त हो आप. फाड़ डालो मेरी चूत को… ये मुझे बहुत सताती है बहुत ही परेशान करती रहती है. आज इसकी अच्छे से खबर लो आप!” बहूरानी जी अपनी चूत मेरे लंड पर उछालते हुए बोली.

हम ससुर-बहू ऐसे ही कुछ देर और ट्रेन में चुदाई का कभी न भूलने वाला अलौकिक आनन्द लूटते रहे. फिर हम दोनों एक संग स्खलित होने लगे. मेरे लंड से रस की फुहारें मेरी इकलौती बहूरानी की चूत में समाने लगी और वो भी मुझसे पूरी ताकत सी लिपट गयी.

लाइट का स्विच पास में ही था, मैंने बहूरानी को लिपटाए हुए ही बत्ती बंद कर दी और अंधेरे कूपे में फिर से उसके होंठ चूसने लगा; रास्ते में कोई छोटा स्टेशन आता तो वहां की रोशनी एकाध मिनट के लिए भीतर आती और फिर घुप्प अँधेरा हो जाता.सच कहूं तो ऐसा सम्भोग सुख मैं पहली बार भोग रहा था.

फिर पता नहीं कब नींद ने हमें घेर लिया.

अगले दिन सुबह देर से आँख खुली. बहूरानी अभी भी मुझसे नंगी ही लिपटी हुई बेसुध सो रही थी पर उसके होंठो पर मधुर मुस्कान खेल रही थी, शायद कोई हसीन सपना देख रहीं हो.मैं बड़े आहिस्ता से उसके पहलु से निकला और अपनी टी शर्ट और लोअर पहन लिया. सुबह के साढ़े सात बज चुके थे चारों ओर उजाला फ़ैल चुका था ट्रेन अभी भी पूरे रफ़्तार से अपना सफ़र तय कर रही थी.

कुछ ही देर बाद ट्रेन सिकंदराबाद स्टेशन पर आ कर ठहर गयी. मैंने बहूरानी के नंगे जिस्म पर कम्बल ओढ़ा दिया; तभी उसकी नींद खुल गयी और उसे अपनी नग्नता का अहसास होते ही उसने कम्बल को अपने कन्धों के ऊपर तक ओढ़ लिया और मुस्कुरा के मेरी तरफ देखा.

“अदिति बेटा, नींद तो अच्छी आई ना?” मैंने अपना टूथपेस्ट ब्रश पर लगाते हुए पूछा.“हां पापा जी… अब मैं खुद को बहुत ही हल्का फुल्का फील कर रही हूं. थैंक्स फॉर आल दैट!” वो शर्माते हुए बोली.“ओके बेटा जी, मैं फ्रेश होकर आता हूँ.” मैंने कहा और अपना टूथब्रश मुंह में चलाते हुए कूपे से निकल गया.

मैं वापिस लौटा तो बहूरानी ने सलवार कुर्ता पहन लिया था और मेरे आते ही वो बाहर निकल गयी. मैं खिड़की से बाहर के नज़ारे देखने लगा. मेरे लिये ये एकदम अनजाना रूट था मैं इस रास्ते पर पहले कभी नहीं आया था लेकिन ये बदला बदला माहौल सुखद लग रहा था.

बहूरानी वापिस आ गयी और अपने बाल संवारने लगी.

कहानी जारी रहेगी

 
अभी तक इस फ्री सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैंने रात को अपनी पुत्रवधू को फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में पूरा मजा लेकर और देकर चोदा. पूरे डेढ़ साल बाद मैंने अपनी कामुकता से भरपूर बहू की चूत की चुदाई की थी.

अब आगे क्या हुआ, कहानी का मजा लें:तभी पेंट्री कार का स्टाफ चाय नाश्ता लेकर आ गया, साथ में ताजा न्यूज़पेपर भी था.

इन सबसे निपट कर हम दोनों यूं ही बातें करते रहे कि शादी में क्या क्या होना है.ये… वो…मैं बीच बीच में बहू का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाता रहा, बहू के बदन को भी बिना किसी हिचक के यहाँ वहां छूकर बातें कर रहा था. बहू भी मुझसे पूर्ण रूपेण स्वछंद उन्मुक्त मित्रवत व्यवहार कर रही थी.ऐसे ही बातें करते करते दोपहर के एक बजे से ऊपर ही टाइम हो गया. लंच भी सर्व हो गया. हम लोग लंच करके दो बजे तक फ्री हो गये.ट्रेन की लम्बी जर्नी में कुछ करने को तो होता नहीं, बस खाओ, पियो और सोओ. लेकिन मेरे साथ तो बहूरानी थी और हम लोगों का ट्रेन से दिल्ली जाने का एक ही उद्देश्य था – चुदाई चुदाई और चुदाई!

“अदिति बेटा, अब आजा फिर से!”“क्यों आऊँ पापा जी… मैं तो यहीं ठीक हूं!”“अरे आ ना टाइम पास करते हैं दोनों मिल के!”“टाइम तो अच्छे से पास हो रहा है मेरा यहीं बैठे बैठे!”“बेटा जी, इस कूपे का हजारों रुपये किराया दिया है हमने. अभी दिल्ली पहुँचने में 18 घंटे बाकी हैं. चल आ जा अपने पैसे वसूल करें!”

“वो कैसे करोगे पापा जी?”“जैसे कल रात किये थे.”“रहने दो पापा… मेरी नीचे वाली अभी तक दुःख रही है. आपने तो कल बिल्कुल बेरहम, निर्दयी बन के कुचल दिया मुझे. जरा भी रहम नहीं आया आपको अपनी बहूरानी पर?”“अच्छा, अब तू मुझे ही दोष दे रही है? रात को तू ही तो ‘लव यू… लव यू…’ बोल कर कह रही थी- कुचल डालो इसे… फाड़ के रख दो मेरी चूत आज… बहुत सताती है ये!“इसका मतलब यह थोड़ी न के आप सच में ही रौंद डालो मेरी कोमल जगह को बेरहमी से; चाहे कोई जिये या मरे; आपकी बला से!”बहूरानी थोड़ा तुनक कर बोलीं लेकिन उनकी आँखें से शरारत झलक रही थी.

“और जो अभी सुबह सुबह तू मुझे थैंक्स बोल रही थी वो किसी ख़ुशी में था?”“वो तो ऐसे ही आपका दिल रखने के लिये; रात में आपने इतनी कठोर मेहनत जो की थी न मेरे ऊपर चढ़ के!”“और अब क्या इरादा है मेरी प्यारी प्यारी बहूरानी का?”“पापा जी, जो आप चाहो… आखिर हमने हजारों रुपये रेलवे को पे किये हैं, उसमें से जितने वसूल हो जायें उतना अच्छा!”“यह हुई न बात!” मैं बोला और बहूरानी को अपनी गोद में घसीट लिया.

“अदिति बेटा, तेरी ये नीचे वाली सच में दुख रही है?” मैंने उनकी चूत सलवार के ऊपर से ही सहलाते हुए पूछा.“हा हा हा, अरे नहीं पापा जी. मैं तो बस ऐसे ही हंसी ठट्ठा कर रही थी. ये ससुरी ना दुखती… इसे तो लंड से जितना मारो पीटो… उतनी ही ज्यादा खुश होती है बेशरम!” बहूरानी जी खनकती हुई हंसी हंसी.बहू रानी आगे बोली- यह आपकी चहेती हो गई है, बिगड़ गई है, पूरी की पूरी ढीठ हो गई है, हद कर दी इसने तो बेशर्मी की!

“तो फिर आ जा मेरी रानी… कुछ नया करते हैं अब इसके साथ!” मैंने कहा- बोलो बहूरानी… क्या ख्याल है?“अब और क्या नया होना बाकी रह गया पापा जी… सब कुछ हर तरीके से तो कर चुके आप मेरे साथ. वो घुसेगा तो मेरी ही में है न?”“अरे वो नहीं घुसेगा तेरी में; अभी तो सिर्फ एन्जॉय करेंगे अलग तरीके से!”“अच्छा ठीक है, बताओ क्या करना है?” बहूरानी बोली.

“पहले तू पूरी न्यूड हो के बैठ जा मेरे सामने मुंह करके!”“धत्त, दिन में ही?” बहू रानी बोली.“अरे बेटा दिन रात से क्या फर्क पड़ता है, चल आ जा!”

बहू रानी ने पहले कूपे को चेक किया कि वो अन्दर से ठीक से बंद है या नहीं… फिर पहले अपनी बाहें ऊपर उठा कर अपना कुर्ता और सलवार का नाड़ा खोला और सलवार भी उतार डाली.आह… क्या गजब का हुस्न दिया है ऊपर वाले ने मेरी बेटी सी बहू अदिति को. सिर्फ ब्रा और पैंटी में मेरी बहूरानी की जवानी क़यामत ढा रहीं थी. डिजाइनर ब्रा में बहू के मम्में और भी दिलकश लग रहे थे और उसकी पैंटी में वो उभरी हुई चूत… चूत का त्रिभुज और लम्बी सी दरार बिल्कुल साफ़ साफ़ दिख रही थी पैंटी के ऊपर से! पैंटी के ऊपर चूत की दरार इस तरह से दिखे तो पोर्न की दुनिया में इसे कैमल टो Camel toe कहते हैं.

ससुर और बहू की कामवासना और चुदाईमुझे अपनी बहू की कैमल टो बहुत सेक्सी लगी तो मैंने अपना स्मार्ट फोन निकाल कर उसकी पैंटी की एक फोटो खींच ली.

मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ के अपने पास खींचा और पहले तो पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत की जो दरार दिख रही थी, उसमें उंगली फिराई, फिर बहू की पैंटी थोड़ी सी साइड में सरका कर उसकी नंगी चूत की दरार में उंगली फिराई और फिर चूत को चूम लिया.

 
फिर मैं उठ कर खड़ा हो गया और अपने कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगा हो गया. मेरा मुरझाया लंड झूल रहा था जो धीरे धीरे जान पकड़ रहा था.

अब मैंने अपनी बहू की की ब्रा का हुक खोल दिया; हुक खुलते ही ब्रा के स्ट्रेप्स स्प्रिंग की तरह उछल गये और मैंने ब्रा को उतार कर बर्थ पर डाल दिया और बहूरानी को अपने सीने से लगा लिया. उनके मम्में मेरे सीने में समा गये. मैंने उसके कान की लौ को अपने होंठों और जीभ से चुभलाया और फिर कान के नीचे और गर्दन चूम डाली. फिर उसे बर्थ पर एक कोने में बैठा दिया.

बर्थ के दूसरे कोने पर मैं बैठ गया और बहूरानी के पांव पकड़ कर अपनी गोद में रख लिए.

“पापा जी… मेरे पांव छोड़िये… मुझे अच्छा नहीं लगता!” मेरी संस्कारशील बहू रानी बोली और अपने पैर पीछे खींचने लगी. मेरी बहू को उसके ससुर द्वारा उसके पाँव छूना अच्छा नहीं लगा.“अरे बेटा, तू टेंशन मत ले… बस एन्जॉय कर मेरे साथ!” मैंने उनके पांवों के दोनों तलुए चूम डाले और अपना लंड उनके तलुओं के बीच फंसा लिया.

“अदिति बेटा, अब तू अपने पैरों से मेरे लंड से खेल; अपने पंजों में इसे दबा कर इसकी मूठ मार और इसे रगड़!”

मेरे कहने से बहूरानी ने मेरा लंड अपने पैरों के पंजों में अच्छे से दबा लिया और इसे हल्के हल्के रगड़ने लगी जैसे हम कोई चीज अपनी हथेलियों से मलते या रगड़ते हैं. उसके ऐसे करते ही मेरे लंड में जोश भरने लगा.

इस तरह का ‘फुट जॉब’ मैंने कभी किसी पोर्न क्लिप में देखा था, तभी से मेरी तमन्ना थी कि कभी मौका मिला तो ये खेल मैं भी खेल के देखूंगा.

आह… कितना प्यारा नजारा था वो… बहूरानी के गोरे गुलाबी मुलायम पैर जिनमें शादी में जाने हेतु मेहंदी रचाई हुई थी और उनके बीच मेरा काला मोटा लंड. बेहद उत्तेजक दृश्य लग रहा था ऊपर से बहूरानी की सोने की पायलें और बिछिया… इन सबका कलर कम्बिनेशन लाजवाब था. भारत में काफी परिवारों में सोने के जेवर पैरों में नहीं पहनते लेकिन हमारे घर में ऎसी कोई रोक नहीं है.

बहूरानी के कोमल पैरों का स्पर्श मेरे लंड को और कठोर बनाता जा रहा था और अब वह पूरा अकड़ चुका था.

इसी समय ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी शायद कोई स्टेशन होगा. मैंने टाइम देखा तो दोपहर के साढ़े तीन होने वाले थे. यह टाइम तो नागपुर पहुँचने का था और जल्दी ही ट्रेन स्लो होती चली गई फिर रुक गई.हां नागपुर ही तो था. पर मुझे क्या. मुझे कौन से नागपुरी संतरे खरीदने थे.

ट्रेन रुकते ही मैंने बहूरानी को थोड़ा सा अपने पास खिसका लिया जिससे मेरे लंड पर उसके पंजों की ग्रिप और मजबूत हो गयी. मेरे पास खिसक आने से बहूरानी की जांघें खुल गयीं थीं और उसकी पैंटी में से चूत की झलक दिखने लगी थी. मैंने अपना एक पैर आगे बढ़ाया और अंगूठे से उसकी पैंटी अलग करके चूत को कुरेदने लगा.

बहूरानी को भी इस खेल में मजा आने लगा तो उसने अपनी पैंटी खुद ही उतार फेंकी और मेरे और नजदीक पैर खोल के बैठ गयी. मैंने अपना लंड फिर से उसके पांवों के तलुओं में दबा लिया और अपने पैर का अंगूठा उसकी चूत में घुसेड़ दिया.

हम दोनों अब पूरी मस्ती में आ चुके थे. बहूरानी अपने पैरों से मेरे लंड की मुठ मार रही थी, बीच बीच में वो मेरे लंड को मथानी की तरह मथने लगती और मैं उसकी चूत में पैर के अंगूठे से कुरेद रहा था. मैं अपने पैर का अंगूठा कभी गोल गोल घुमाता चूत में कभी अप एंड डाउन कभी दायें बायें… उसकी चूत अब खूब रसीली हो उठी थी; मेरा अंगूठा पूरा गीला हो गया था.

मेरी बहूरानी की आँखें वासना से गुलाबी हो गयीं थीं और वो इस खेल को खूब एन्जॉय करने लगीं थी.

तभी ट्रेन ने हॉर्न दिया और धीमे धीमे चलने लगी.नागपुर पीछे छूट चला था पर हम दोनों ससुर बहू अपने केबिन से बाहर की दीन दुनिया से बेख़बर अपनी ही दूसरी दुनिया में खोये हुए मजा कर रहे थे. हम दोनों में से कोई किसी को हाथों से छू नहीं रहा था; बस अपने पैरों से ही एक दूजे को मजे दे रहे थे.

बहूरानी ने अब अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी थी, मैं समझ गया कि अब उसकी चूत का बांध टूटने ही वाला है. इधर मेरा लंड भी झड़ने के करीब पहुंच रहा था… और मेरे लंड की नसें फूलने लगीं.और तभी बहूरानी ने इसे महसूस करते हुए लंड को पंजों से मथना शुरू कर दिया.

पंद्रह बीस सेकंड बाद ही मेरे लंड से वीर्य की पिचकारी छूटी और ऊपर वाली बर्थ से जा टकराई… फिर छोटी छोटी पिचकारियाँ किसी फव्वारे की तरह निकलने लगीं और बहूरानी के दोनों पांव मेरे वीर्य से सन गये.इसके साथ ही बहूरानी की कमर जोर से तीन चार बार आगे पीछे हुई और वो भी झड़ गयी और निढाल सी होकर उसकी नंगी पीठ पीछे टिक गयी और वो गहरी गहरी साँसें लेने लगीं.

“उफ्फ पापा जी, इस खेल का भी अपना एक अलग ही मजा है; आज पहली बार जाना! अह… मजा आ गया सच में!” बहूरानी थके थके से स्वर में बोली.“हां बेटा जी, जो काम लंड नहीं कर सकता वो काम उंगली या अंगूठा करता है. लंड तो सिर्फ अन्दर बाहर हो सकता है लेकिन अंगूठा तो हर एंगल से मज़ा दे सकता है.”“हां पापा जी, आप शत प्रतिशत सही कह रहे हैं.”

मैंने नेपकिन से अपना लंड और बहूरानी के पांव अच्छे से पौंछ डाले और फिर बहूरानी ने अपना सलवार कुर्ता पहन लिया, मैंने भी कपड़े पहन लिये.

अब मैंने टाइम देखा तो सवा चार बजने वाले थे. ट्रेन लगातार फुल स्पीड से सीटी बजाती हुई दिल्ली की ओर दौड़ी चली जा रही थी.

 
अभी तक की इस कामवासना से भरपूर बहु की चुदाई कहानी में आपने पढ़ा कि हम ससुर बहू अपने केबिन के बाहर की दुनिया से बेपरवाह अपनी ही दुनिया में खोये हुए सेक्स का मजा कर रहे थे.

अब शाम हो चुकी थी, तभी कूपे के दरवाजे पर किसी ने नॉक किया, मैंने खोल कर देखा था पेंट्री कार का स्टाफ चाय नाश्ता लिए खड़ा था.चाय से निबट के बहूरानी बोली- पापा जी, अब मैं कुछ देर सोना चाहती हूँ.और वो ऊपर की बर्थ पर चली गयी.मैं भी अलसाया सा लेट गया.

जब हम लोग जागे तो चारों ओर अँधेरा घिर चुका था. बहूरानी टॉयलेट जाकर फ्रेश हो आयी फिर उसने अपने उलझे बाल सँवारे और हल्का सा मेकअप किया. इसी बीच मैं भी फ्रेश हो आया; अब कुछ ताजगी महसूस होने लगी थी. फिर हम दोनों कूपे से बाहर निकले और कम्पार्टमेंट के तीन चार चक्कर लगा डाले ताकि टहलना हो जाय और हाथ पैर खुल जायें.

ट्रेन साढ़े नौ के करीब भोपाल जा पहुंची. हम लोगों का डिनर हो चुका था और अब हमारी जर्नी लास्ट लैप में थी. सुबह छह बजे हमें निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन (दिल्ली में कई रेलवे स्टेशनों में से एक) पहुंच जाना था. अब कोई सात आठ घंटे ही हमारे पास थे.

“अदिति बेटा!”“हां जी पापा जी?”“दस बजने वाले हैं सवेरे छह बजे हम दिल्ली पहुंच जायेंगे. बस यही रात है हमारे पास!” मैंने कुछ दुखी होकर कहा.“हां पापा जी, फिर न जाने कब ऐसा मौका मिले!” बहूरानी जी भी कुछ मायूस होकर बोली.“चलो बेटा, बत्ती बुझा दो, फिर सोते हैं!” मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और लेटते हुए कहा.“ओ के पापा जी!” बहूरानी बोली और फिर लाइट्स ऑफ हो गयीं, कूपे में घुप्प अँधेरा छा गया.

मुझे बहूरानी के कपड़े उतरने की सरसराहट सुनाई दी और फिर उसका नंगा जिस्म मुझसे लिपट गया और उसका एक हाथ मेरे बालों में कंघी करने लगा. मैंने भी उसे अपने से चिपटा लिया और उसके स्तनों से खेलने लगा.बहूरानी मेरी छाती को सहलाने लगी, उसका हाथ मेरे सीने पर पेट पर सब जगह फिरने लगा, फिर उसने मेरी छाती चूमना शुरू कर दी. बार बार लगातार… ऐसा वो पहली बार कर रही थी.

“क्या बात है बहूरानी, आज यूं मेरी छाती ही चूमे जा रही हो; चूमना ही है तो लंड है नीचे की तरफ!” मैंने मजाक किया.“पापा जी, जो बात इस सीने में है वो लंड में कहां!” वो मेरे बायें निप्पल को मसलते हुए बोली.“क्या मतलब? मेरी छाती में कौन से मम्में लगे हैं… हहहहा” मैंने हँसते हुए कहा.“पापा जी, ये राज की बातें हैं. हम लेडीज को पुरुष की चौड़ी छाती ही सबसे ज्यादा अटरेक्ट करती है, आदमी की चौड़ी छाती हमें एक सिक्योर फीलिंग देती है फिर आपके इस चौड़े चकले सीने के तले पिसते हुए आपके लम्बे मोटे लंड की ठोकरें चूत को वो मजा देती हैं कि आत्मा तक तृप्त हो जाती है.”

“अच्छा? अगर चौड़े सीने वाले आदमी का लंड छोटा सा पतला सा हुआ तो?” मैंने हँसते हुए कहा.“पापा जी, वो बाद की बात है. मैंने तो ये कहा कि पहला इम्प्रेशन इस सीने का ही होता है हम लड़कियों पर; मर्द का चौड़ा मजबूत सीना हम फीमेलज़ को सेक्सुअली अपील करता है.” बहूरानी बोली और मेरे ऊपर मेरे सीने पर लेट गयी; उसके मम्में मेरी छाती में पिसने लगे.उधर मेरा लंड चूत में घुसने की आशा में झट से खड़ा हो गया.

फिर बहूरानी ने मुझ पर बैठ के मेरा सुपारा अपनी चूत के छेद पर सेट किया और लंड को दबाने लगी. उसकी गीली रसीली चूत मेरे लंड को कुछ ही पलों में समूचा लील गयी. फिर बहूरानी जी मेरा लंड यूं अपनी चूत में घुसाये हुए मेरे ऊपर शांत लेट गयी. मेरे हाथ उसके नितम्बों पर जा पहुंचे, उसके गोल गोल गुदाज नितम्बों को मुट्ठी में भर भर के मसलने दबाने का मजा ही अलग आया.फिर मेरी कमर धक्के लगाने को उछलने लगी.

“पापा जी, धक्के नहीं लगाओ… बस चुपचाप यूं ही लेटे रहो रात भर!” बहूरानी बोली और मेरा निचला होंठ चूसने लगी.“ठीक है अदिति बेटा… एज यू लाइक!” मैंने कहा और अपना जिस्म ढीला छोड़ दिया.

रात के सन्नाटे को चीरती हुई बंगलौर दिल्ली राजधानी अपने पूरे वेग से आंधी तूफ़ान की तरह अपने गंतव्य की ओर भागी दौड़ी चली जा रही थी. मेरे ऊपर जैसे कोई सुगन्धित रेशम का ढेर हो वैसी ही फीलिंग देता बहूरानी का नंगा जिस्म मुझसे लिपटा हुआ था. उसकी चूत से कल कल बहता रस मेरी जांघों को भिगोने लगा था.

“पापा जी…” बहूरानी मेरे कान में फुसफुसायी.“हां बेटा?”“जब ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर पटरियाँ चेंज करती है तो कितनी मस्त आवाजें आती हैं न…” बहूरानी जी अपनी चूत मेरे लंड पर धीरे से घिसते हुए बोली.“अबकी छोटा स्टेशन आये, तो आप ध्यान से सुनना!” वो फिर बोली.“हां बेटा, इन पटरियों का भी अपना संगीत है.” मैं बोला.

“आधी रात बीतने को थी; कभी कभी विपरीत दिशा से आती कोई ट्रेन हमें क्रॉस करती हुई निकल जाती. बहूरानी से मिलन का ये अलौकिक आनन्द अलग ही अनुभूति दे रहा था. चुदाई और सम्भोग का फर्क अब महसूस होने लगा था. नीरव अन्धकार में संभोगरत दो जिस्म आपस में कम्युनिकेट कर रहे थे जहां शब्दों की आवश्यकता ही नहीं थी. न कुछ देखने की जरूरत थी न कुछ सुनने की… योनि और लिंग के मिलन की वो अलौकिक अनुभूति जिसे शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं. चूत में घुस के आनन्द लूटता और लुटाता लंड का आनन्द देखने की चीज नहीं महसूस करने वाली बात है.

तभी किसी छोटे स्टेशन से ट्रेन गुजरने लगी. मेन लाइन से लूप लाइन पर जाती ट्रेन फिर वापिस मेन लाइन पर आती हुई… पटरियों की खटर पटर सच में एक मीठा उन्माद भरा संगीत सुनाने लगी.

“पापा जी… अब आप ऊपर आ जाओ, थक गई मैं तो!” बहूरानी बोली और मेरे ऊपर से हट गयी.मैं भी उठ के अलग हो गया.फिर वो बर्थ पर लेट गयीं.

“बहूरानी बेटा… अपनी चूत खोल न!” मैं उस पर झुकते हुए बोला.“वो तो मैंने पहले ही अपने हाथों से खोल रखी है पूरी… आ जाओ आप जल्दी से!” वो बेचैन स्वर में बोली.

मैं उसके ऊपर झुका और उसने खुद ही मेरा लंड पकड़ कर सही जगह पर रख कर उसे ज़न्नत का रास्ता दिखा दिया. मैंने भी देर न करते हुए लंड से एक करारा शॉट लगा दिया; लंड फचाक से बहूरानी की चूत में जड़ तक समा गया.

बहूरानी ने मुझे अपने आलिंगन में भर कर प्यार से चूमा और अपनी कमर ऊपर तक उठा के मेरे लंड का सत्कार किया- बस पापाजी, ऐसे ही लेटे रहिये मेरे ऊपर चुपचाप!वो बोली और अपने घुटने मोड़ के ऊपर उठा लिए; अब उसकी चूत का खांचा अपने पूरे आकार में आ चुका था; मैंने अपने लंड को और दबाया तो लगभग एक अंगुल के करीब लंड और सरक गया चूत में.यूं लंड घुसाये हुए चुपचाप शांत पड़े रहने का भी एक अलग ही मजा है; जी तो कर रहा था कि ताबड़तोड़ धक्के लगाऊं उसकी चूत में; बहूरानी का दिल भी पक्का कर रहा होगा लंड उसकी चूत में सटासट अन्दर बाहर होने लगे तो उसे चैन आये.

 
मैं आप सब दोस्तो का बहुत आभारी हूं दोस्तो अगर आपको मेरी कोई स्टोरी बोर कर रही हो या पसंद ना आ रही हो तो कृपया बताये ता की मैं वह स्टोरी बंद कर सकू और कोई नई स्टोरी शुरू कर सकू...सतीश
 


हम दोनों को ही मिसमिसी छूट रही थी लेकिन खुद पे काबू किये हुए जैसे तैसे एक दूसरे की हथेलियों में हथेली फंसाए होंठों को चूस रहे थे.ये सब कोई आधा घंटा चलता रहा.

“पापा जी… अब नहीं रहा जाता, नहीं सहा जाता मुझसे… मेरी चूत में चीटियाँ सी रेंग रहीं है बहुत देर से!”“तो क्या करूं बता?” मैंने उसका गाल काटते हुए कहा.“अब तो आप मुझे जल्दी से चोद डालो पापा!”“अभी तो तू कह रही थी कि चुपचाप पड़े रहना है… अब क्या हुआ?”“पापा, मेरी चूत में बहुत तेज खुजली मच रही है… ये आपके लंड से ही मिट सकती है… फक मी हार्ड पापा डार्लिंग!” बहूरानी अधीरता से अपनी चूत ऊपर उचकाते हुए बोली.

लंड तो मेरा भी कब से तड़प रहा था उसकी चूत में उछलने के लिए तो मैंने पहले बहूरानी के निप्पल जो सख्त हो चुके थे, उन्हें मसल कर बारी बारी से चूसा, साथ में अपनी कमर को उसकी चूत के दाने पर घिसा.“हाय राजा… मार ही डालो आज तो!” बहू रानी के मुंह से आनन्द भरी किलकारी सी निकली.“ये लो मेरी रानी…” मैंने भी कहा और लंड को बाहर तक निकाल कर पूरी दम से पेल दिया चूत में!“हाय राजा जी… ऐसे ही चोदो अपनी बहूरानी को!” बहूरानी कामुक स्वर में बोली और मेरे धक्के का जवाब उसने अपनी चूत को उछाल कर दिया.

“हाय… कितनी मस्त कसी हुई टाइट चूत है मेरी अदिति बिटिया की!” मैंने जोश में बोला और फुल स्पीड से अपनी बहू को चोदने लगा.“हां पापा.‍ऽऽऽ… ऐसे ही… अपनी अदिति बिटिया की चूत बेदर्दी से चोदो, इस राजधानी से भी तेज तेज चोदिये… आःह! कितना मस्त लंड है आपका… पापा खोद डालो मेरी चूत… अब आप ही मालिक हो इस चूत के!” बहूरानी जी ऐसे ही वासना के नशे में बोलती चली जा रही थी.

मैं भी अपने पूरे दम से लंड चला रहा था बहूरानी की चूत में; उसकी चूत से आती चुदाई की आवाजें पूरे कूपे में गूँज रहीं थीं. चूत की फचफच और ट्रेन चलने की आवाज एक दूसरे में मिल कर मस्त समां बांध रहीं थीं.

“पापा जी अब डॉगी पोज में चोद दो मुझे अच्छे से!” बहूरानी ने फरमाइश की.“ओके बेटा जी… चल डॉगी बन जा जल्दी से!” मैं बोला और उसके ऊपर से हट गया.

बहूरानी ने बर्थ से उतर कर कूपे की लाइट जला दी; रोशनी में उसका किसी चुदासी औरत जैसा रूप लिए उसका हुस्न दमक उठा… कन्धों पर बिखरे बाल… गुलाबी प्यासी आँखें… तनी हुई चूचियाँ… चूचियों की घुन्डियाँ फूल कर अंगूर जैसी हो रहीं थीं और उसकी चूत से बहता रस जांघों को भिगोता हुआ घुटनों तक बह रहा था.

फिर बहूरानी शीशे के सामने जा खड़ी हुयी, कुछ पलों के लिये उसने खुद को शीशे में निहारा, फिर झुक गयीं और सामान रखने वाले काउंटर का सहारा लेकर डॉगी बन गयी. उसके गीले चमकते हुए गोल गुलाबी नितम्बों का जोड़ा मेरे सामने था जिनके बीच बसी चूत का छेद किसी अंधेरी गुफा के प्रवेश द्वार की तरह लग रहा था.

मैंने नेपकिन से अपने लंड को पौंछा, फिर उसकी चूत और जांघें पौंछ डाली और लंड को चूत के छेद पर टिका के सुपारा भीतर धकेल दिया. उसकी चूत अभी भी भीतर से बहुत गीली थी जिससे समूचा लंड एक ही बार में सरसराता हुआ घुस गया और मैंने नीचे हाथ ले जाकर दोनों मम्में पकड़ लिए और चूत में धक्के मारने लगा.

“लव यू पापा… यू फक सो वेल!” बहूरानी चुदाई से आनन्दित होती हुई चहकी.

“या अदिति बेटा… यू आर आल्सो ए रियल जेम… सच ए नाईस टाइट कंट यू हैव इन बिटवीन योर थाइस!” मैं भी मस्ती में था.“सब कुछ आपके लिए ही है पापा… आप जैसे चाहो वैसे भोगो मेरे जवान जिस्म को!” बहूरानी समर्पित भाव से बोली.

अब मैंने उसके सिर के बाल पकड़ कर अपने हाथों में लपेट कर खींच लिए जिससे उसका चेहरा ऊपर उठ गया और मैं इसी तरह उसकी चूत मारने लगा; बीच बीच में मैं उसके नितम्बों पर चांटे मारता हुआ उसे बेरहमी से चोदने लगा. बहूरानी भी पूरे आनन्द से अपनी चूत आगे पीछे करते हुए लंड का मजा लूटने लगी. हमारी जांघें आपस में टकरा टकरा के पट पट आवाजें करने लगी.

और चुदाई का यह सनातन खेल कोई दस बारह मिनट और चला और फिर मेरा लंड फूलने लगा झड़ने के करीब हो गया.“बहूरानी, अब मैं झड़ने वाला हूं तुम्हारी चूत में!”“झड़ जाइए पापा जी; मेरा तो दो बार हो भी चुका और तीसरी बार भी बस होने ही वाला है…”

फिर मैंने आखिरी पंद्रह बीस धक्के और मारे, फिर बहू की पीठ पर झुक गया और मम्मे थाम लिये. मेरे लंड से रस की फुहारें छूट छूट कर बहूरानी की चूत को तृप्त करने लगीं. उसकी चूत भी संकुचित हो हो कर मेरे लंड से वीर्य निचोड़ने लगी.अंत में मेरा लंड वीरगति को प्राप्त होता हुआ चूत से बाहर निकल आया और उसकी चूत से मेरे वीर्य और उसके रज का मिश्रण बह बह कर टपकने लगा.

जब हम अलग हुए हुए तो सवा बारह बजने ही वाले थे.“चल बेटा अब सोते हैं, छह बजे ट्रेन निजामुद्दीन पहुंच जायेगी. हमें पांच सवा पांच तक उठना पड़ेगा.”

“ओके पापा जी!” बहूरानी बोली और उसने अपनी ब्रा पैंटी पहन ली और बर्थ पर जा लेटी. मैं भी अपने पूरे कपड़े पहन कर बत्ती बुझा कर उसके बगल में जा पहुंचा.“गुड नाईट पापा जी!” बहूरानी मेरी तरफ करवट लेकर बोली और अपना एक पैर मेरे ऊपर रख लिया.“गुड नाईट बेटा जी!” मैंने भी कहा और उसका सिर अपने सीने से सटा लिया और उसे थपकी देने लगा जैसे किसी छोटे बच्चे को सुलाते हैं.

सुबह पांच बजकर दस मिनट पर हम उठ गये. तैयार होकर बहूरानी ने वही साड़ी पहन ली जो वो बंगलौर से पहन कर निकली थी और एक संस्कारवान बहू की तरह अपना सिर ढक आंचल से ढक लिया.

ट्रेन हजरत निजामुद्दीन समय से पहुंच गयी. बहूरानी के मायके वाले हमें रिसीव करने आये थे, सब लोगों से बड़ी आत्मीयता से हाय हेलो हुई और हम लोग अपने ठहरने की जगह की ओर निकल लिए.

 
मेरी पिछली कहानी में मैंने बताया था कि मैं और बहूरानी अदिति उसके चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंच चुके थे; निजामुद्दीन स्टेशन पर ही अदिति के मायके वाले हमें रिसीव करने आ पहुंचे थे. हम मेहमानों के रुकने का इंतजाम एक धर्मशाला में किया गया था जो अच्छी, आधुनिक किस्म की सर्व सुविधाओं से युक्त होटल टाइप की धर्मशाला थी.

हम लोग धर्मशाला में पहुंचे तो अदिति को तो पहुँचते ही रिश्तेदारों ने घेर लिया और उनके हंसी ठहाके लगने लगे. शादी ब्याह में इन्ही छोरियों और नवयौवनाओं से ही तो रौनक होती है. वहां मुझे अन्य सीनियर लोगों के साथ एक बड़े से हाल में एडजस्ट होना पड़ा.जिस दिन हम लोग दिल्ली पहुंचे शादी उसके अगले दिन थी.

लड़की वालों ने अपना मैरिज गार्डन बुक किया हुआ था जो हमारी धर्मशाला से को डेढ़ दो किलोमीटर के फासले पर था.

धर्मशाला के सामने बगीचे में एक बड़ा सा पंडाल लगाया हुआ था जिसमें कुक, शेफ यानि हलवाई द्वारा चाय, काफी, नाश्ता, लंच, डिनर इत्यादि सब बनवाने की व्यवस्था थी. जिसे जो खाना हो उनसे बनवा लो और एन्जॉय करो. कुल मिलाकर बढ़िया व्यवस्था की गई थी.

मैंने पहुंच कर इन्हीं सब बातों का जायजा लिया और तैयार होकर बड़े हाल में जा बैठा. अब करने को तो कुछ था नहीं. सबसे मिलना जुलना और चाय नाश्ता चल रहा था, साथ में नयी उमर की लड़कियों, विवाहिताओं और नवयौवनाओं को देख देख के अपनी आंखें सेंकता जा रहा था, साथ में चक्षु चोदन भी चल रहा था.

सजी धजी परियां अपना अपना मोबाइल पकड़े हंसी मजाक कर रहीं थीं. मोबाइल से फोटो शूट और सेल्फी लेने की जैसे होड़ मची थी. कुछ लड़कियों के ग्रुप दूर कहीं कोने में किसी मोबाइल पर नजरें गड़ाये मजे ले रहे थे; हंसना मुस्कुराना, कोहनी मार के हंस देना … यह सब देख कर सहज ही अंदाज लगाया जा सकता था कि उनके मोबाइल में क्या चल रहा होगा. अब इन खिलती कलियों और बबुओं के फोन में पोर्न वीडियो होना तो एक साधारण सी बात रह गयी है.

चूत लंड, मम्में, लंड चूसना, चूत चाटना, चुदाई … ये सब पोर्न फ़िल्में अब तो सहज ही सबको उपलब्ध हैं. आजकल की नयी पीढ़ी इन मामलों में बड़ी खुशकिस्मत है. इन्हें सेक्स मटीरियल भरपूर बेरोकटोक उपलब्ध है और आज वे बड़े आराम से आपसी सहमति से सेक्स सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं. लड़कियां शादी होने तक अपना कौमार्य बचाये रखना पुरानी और दकियानूसी सोच समझने लगीं हैं. यह सच भी है आज के युग के हिसाब से.आजकल लड़कियां ग्रेजुएशन के बाद कोई और प्रोफेशनल कोर्स जरूर करती हैं फिर जॉब और फिर इन सबके बाद शादी. इतना होते होते लड़की की उम्र सत्ताईस अट्ठाईस हो जाना मामूली से बात है और उतनी उम्र तक बिना चुदे रहना किसी तपस्या से कम नहीं. अब ऐसी तपस्या करना सबके बस का तो है नहीं तो बिंदास लाइफ आजकल का ट्रेंड बन चुकी है.

यूं तो आमतौर पर लड़की की पंद्रह वर्ष की उमर के बाद सोलहवां साल लगते ही उसकी चूत भीगने लगती है, उसमें सुरसुरी उठने लगती है और उसे सेक्स की चाह या चुदने की इच्छा सताने लगती है, उनकी चूत का दाना रह रह के करेन्ट मारने लगता है. यह तो प्राकृतिक नियम है जो सब पे समान रूप से लागू होता है. पहले के जमाने में लड़की रजस्वला या पीरियड्स के शुरू होने के बाद जल्द से जल्द उसकी शादी कर दी जाती थी और उसे लीगल चुदाई का सुख नियमित रूप से मिलने लगता था.

आज के जमाने में लड़की को प्राकृतिक रूप से वयस्क हो जाने के बाद और दस बारह वर्ष तक जब तक शादी न हो जाय अपनी चूत की खुजली पर कंट्रोल रखना पड़ता है. अब ऐसे में जिस्म की इस नैतिक डिमांड को दबाये रखना अपने ऊपर जुल्म करने जैसा ही तो है. अतः लड़कियां जैसे बने तैसे अपनी जवानी के मजे लूटने लगती हैं, इसमें कोई बुराई भी नहीं. जब शादी ब्याह जैसा उन्मुक्त माहौल मिले तो तमन्नाएं कुछ ज्यादा ही मचलने लगतीं हैं. तो ऐसे ही उन्मुक्त माहौल का मज़ा वो छोरे छोरियां उठा रहे थे.

एक हमारा ज़माना था अपनी वाली की सूरत देखने तक को तरस जाते थे. दिन में कई कई चक्कर महबूबा की गली के लगाने पड़ते थे तब कहीं जाकर उनकी एक झलक मिलती थी देखने को. तब न तो मोबाइल फोन थे न इन्टरनेट और न ही लड़कियां यूं कोचिंग जाती थीं. किसी लड़की को पटा लेना या दिल की बातें कर लेना आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा मुश्किल काम था और उसके साथ चुदाई कर लेना तो एवरेस्ट फतह से भी बढ़ कर कठिन हुआ करता था.

हमारे उन दिनों सेक्स मेटीरियल के नाम पर कोकशास्त्र ग्रन्थ हुआ करता था या वात्स्यायन का कामसूत्र था, इनके अलावा कुछ पत्रिकाएं जैसे आज़ाद लोक, अंगड़ाई और मस्तराम लिखित चुदाई की कहानियों की छोटी सी बुकलेट बाज़ार में मिलती थी जिसे दुकानदार बड़ी मिन्नतें करवा कर, मनमाने पैसे लेकर बेचता था और जिसे हम बड़े शान से दोस्तों के साथ कम्पनी बाग़ के किसी एकांत कोने में छुप कर पढ़ा करते थे और कभीकभी सामूहिक रूप से मुठ भी मार लिया करते थे.

फिर समय बीतने के साथ विदेशी पत्रिकाएं आने लगीं जिनमें चिकने कागज़ पर चुदाई की रंगीन तस्वीरें हुआ करती थीं. इसी दौर में ऑडियो कैसेट्स भी मिलते थे जिन्हें कैसेट प्लेयर में चला कर लड़की लड़के की चुदाई की आवाजें और बातचीत सुन लेते थे. इसके बाद सेक्स की वीडियो कैसेट का ज़माना आ गया और अब तो जो है सो सबके पास है.

 
चलिए कहानी को आगे बढ़ाते हैं. ज़माना तो हमेशा रंग बदलता ही रहता है.

शादी में आये मेहमानों की भीडभाड़ में टाइट जीन्स और टॉप पहने अपने अपने मम्मों की छटा बिखेरती चहचहातीं ये छोरियां हर किसी को लुभा रहीं थीं. लौंडे भी कम नहीं थे, सब के सब किसी न किसी हसीना को इम्प्रेस करने की फिराक में थे.आजकल की शादियों में ऐसे नज़ारे अब आम हो गये हैं. एक विशेष परिवर्तन जो मैंने नोट किया कि अब कुंवारी, अधपकी नादान लड़कियां भी लिपस्टिक लगाने लगीं हैं. शादीशुदा लेडीज का तो कहना ही क्या; जैसे अपने कपड़े जेवर और बदन दिखाने ही आयीं हों शादी में.बहरहाल कुल मिला कर सब अच्छा लग रहा था.

“पापा जी कुछ चाहिये तो नहीं न आपको?” अदिति बहूरानी की आवाज ने मुझे चौंकाया.वो मेरे बगल में आ खड़ी हुई पूछ रही थी.“नहीं बेटा, सब ठीक है.” मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और फिर बहूरानी की ओर देखा. पहली नज़र में तो वो पहचान में ही नहीं आई; घुमक्कड़ बंजारिनों जैसे कपड़े पहन रखे थे उसने… लहंगा चोली ओढ़नी और मैचिंग चूड़ियां वगैरह और उसके होंठो पर सजती वही मीठी मुस्कान. चोली में से उसके भरपूर, तने हुए मम्में, नीचे की ओर सपाट पेट और गहरा नाभि कूप और लहंगे में से आभास देता उसकी सुडौल जांघों का आकार. उसका लहंगा भी घुटनों से कुछ ही नीचे तक था जिससे उनकी गोरी गुदाज मांसल गुलाबी पिंडलियां जो बेहद सेक्सी लुक दे रहीं थीं और पैरों में बंजारिनों जैसे मोटे मोटे चांदी के कड़े.

मैं कुछ क्षणों तक मुंह बाए उसे देखता ही रह गया. मैंने बहूरानी को हर रूप में देखा था, हर रूप में हर तरह से चोदा था उसे … पर ये वाला रूपरंग पहली बार ही देख रहा था.“क्या हुआ पापा जी; ऐसे क्या देख रहे हो? आपकी अदिति बहू ही हूं मैं!” वो चहक कर बोली.“कुछ नहीं बेटा, तुझे इस रूप में आज पहली बार देखा तो नीयत खराब हो गयी.” मैंने धीमे से कहा.

“अच्छा? पापा जी, पिछले दो तीन दिनों में मुझे आप कई कई बार फक कर चुके हो ट्रेन में … फिर भी …?” वो भी धीमे से बोली.“हां बेटा … फिर भी दिल नहीं भरा. जी करता है तेरा लहंगा ऊपर उठा कर तुझे गोद में बैठा लूं अभी और …”“और क्या पापा?”“और तेरी पैंटी साइड में खिसका कर अपना ये पहना दूं तेरी पिंकी में … पैंटी पहन रखी है या नहीं?” मैंने पैंट के ऊपर से अपना लंड सहलाते हुए कहा.

“धत्त …” बहूरानी बोलीं और अंगूठा दिखा कर निकल लीं. वो तो यूं धत्त कह के निकल लीं, जाने से पहले एक बार मुस्कुरा के कातिल निगाहों से मुझपर एक भरपूर वार किया और कूल्हे मटकाते हुए चलीं गयीं और मैं उनके थिरकते नितम्ब ताकता रह गया. अपनी बहूरानी को राजस्थानी बंजारिन के भेष में देखकर उन्हें इसी रूप में चोदने को मन मचलने लगा.

आखिर ऐसा होता क्यों है? मेरी पिछली कहानियों से आप सब जानते हैं कि बंगलौर से दिल्ली ट्रेन से आते आते उन छत्तीस घंटों में मैंने अदिति बहूरानी को कई कई बार तरह तरह की आसन लगा के चोद चुका था फिर अभी कुछ ही घंटों बाद उन्हें फिर से भोग लेने की ये दीवानगी कैसी?

किसी पहुंचे हुए ने सच ही कहा है कि लड़की की चूत नहीं उसका नाम, उसका हुस्न, उसका रुतबा, उसका व्यक्तित्व, उसकी शख्सियत, उसका रूपरंग, उसमें बसी उस औरत को, उसके मान सम्मान को चोदा जाता है; चूत का तो बस नाम होता है. ये आपकी इच्छा पर निर्भर करता है कि उसकी चूत के नाम पर उसका क्या क्या चोदना चाहते हैं. तो मेरा मन तो बंजारिन को चोदने के लिए मचल उठा था वरना अदिति बहूरानी की चूत की गहराई तो मेरा लंड कई कई बार पहले ही नाप चुका था.

अब इस भीड़ भाड़ वाले माहौल में इस अल्हड़ बंजारिन को कैसे चोदा जा सकता है, मेरे मन में यही प्लानिंग चलने लगी थी.

टाइम देखा तो साढ़े ग्यारह हो रहे थे. नाश्ता वगैरह तो हो चुका था और सब लोग अपने अपने हिसाब से टाइम पास कर रहे थे. बहूरानी के जाने के बाद मेरा ध्यान फिर से उन छोरियों के झुण्ड की ओर चला गया जहां वे सब कुर्सियों का गोलचक्कर बना के बैठी किसी मोबाइल में आँखें गड़ाये चहचहा रहीं थीं.मेरा ध्यान उस थोड़ी सांवली सी लड़की ने खींचा जो सबसे अलग सी पर सबके साथ मिल के बैठी थी. एकदम गोल भोला सा चेहरा, सुन्दर झील सी आँखें जिनकी बनावट बादाम के आकार जैसी थी और उसका निचला होंठ रस से भरा भरा सा लगता था. क़रीब साढ़े पांच फुट का कद और घने काले बाल जिन्हें उसने चोटी से कस के बांध रखा था.

शहरी छोरियों से अलग वो किसी गाँव आयी हुई लगती थी; कपड़े भी उसके हालांकि नये से लगते थे पर आधुनिक फैशन के नहीं थे. सादा सिम्पल सा सलवार कुर्ता पहन रखा था उसने, सीने पर दुपट्टा डाल रखा था. उसका दुपट्टा काफी उभरा उभरा सा दिखता था जिससे अंदाज होता था दुपट्टे के नीचे कुर्ती और ब्रा में कैद उसके मम्में जरूर एक एक किलो के तो होंगे ही. उसकी बॉडी लैंग्वेज से यही लगता था कि वो किसी मध्यम वर्गीय ग्रामीण परिवार से आई है.
 
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