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बहुरानी की प्रेम कहानी complete

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अब शादी ब्याह में तो सब तरह के रिश्तेदार आते ही हैं. अमीर गरीब, शहरी ग्रामीण, अलग अलग मिजाज वाले. तो वो छोरी भी उन लड़कियों के झुण्ड में चुपचाप सी शामिल थी. बोल भी न के बराबर रही थी. मैं उसकी मनःस्थिति को चुपचाप ताड़ रहा था; जरूर वो बेचारी हिंगलिश … आधी अंग्रेजी आधी हिंदी … में गिटपिट करती उन मॉडर्न तितलियों से तालमेल नहीं बैठा पा रही थी और शायद इसी कारण हीन भावना या इन्फीरियरटी काम्प्लेक्स से भी ग्रस्त दिखती थी. पर हां … उत्सुकतापूर्वक उन मॉडर्न छोरियों के हाव भाव उनके स्टाइल्स आत्मसात या सीखने की कोशिश में जरूर लगती थी.

एक बात और मैंने नोट की कि वो गाँव की बाला जवान लड़कों को मुस्करा मुस्करा के गहरी, अर्थपूर्ण नज़रों से देखती थी शायद किसी को खुद पर आशिक करवाने की फिराक में थी और अपना सबकुछ लुटा देने, किसी के साथ ‘सेट’ हो जाने की सोच कर ही शादी में आयी थी; पर उसे कोई भाव देता नज़र नहीं आ रहा था.गांव देहात की ऐसी बालाएं खूब मेहनत करती हैं; खेतों में, घर के कामकाज में … जिससे उनका बदन खूब कस जाता है; इनके ठोस मम्में और बेहद कसी हुई चूत लंड को निहाल कर देती है. मगर ये नयी उमर के छोरे तो उन रंगीन तितलियों को इम्प्रेस करने के फेर में थे. वे बेचारे क्या जानें कि जो मज़ा ये देहाती हुस्न देगा उसका मज़ा, उसकी लज्जत उसका जायका ही अलग होगा.

अब शादी ब्याह में तो ये सब चलता ही है और किसी की चुदाई भी हो जाय तो कोई बड़ी बात नहीं. कोई भी लडकी घर से निकल कर ज्यादा उन्मुक्त महसूस करती है और अपनी दबी छुपी तमन्नाओं इच्छाओं को पूरा कर गुजरना चाहती है.ज्यादातर लड़कियां अपनी चुदने की इच्छा यूं ही अपने गाँव शहर से बाहर शादी ब्याह में, छुट्टियों में नानी के यहां, किसी अन्य रिश्तेदारी में या किसी ऐसे ही सुरक्षित माहौल में पूरी कर लेती हैं. क्योंकि वे ऐसे में ज्यादा सिक्योर फील करती हैं; चुदवाने के लिए सुरक्षित स्थान और माहौल इनकी पहली प्राथमिकता होती है; किससे चुदना है वो बात सेकेंडरी हो जाती है. चूत को तो लंड मिलना चाहिये और किसी को कानों कान खबर भी न हो बस.

अचानक किसी के फोन की घंटी बजने की तेज आवाज हॉल में गूँज उठी. नोकिया फोन की तीखी टिपिकल रिंगटोन थी वो. घंटी बजते ही वो ग्रामीण बाला झट से उठी और हॉल के मेरी तरफ वाले कोने की ओर बढ़ने लगी; जरूर ये उसी का फोन बजा था. मेरी निगाहें अभी भी उसी पर जमीं थीं. मेरी तरफ चल के आने से उसके उन्नत उरोज और कदली गुदाज जंघाओं के उभार उसके सलवार कुर्ते से स्पष्ट झांक रहे थे और छिपाए नहीं छिप रहे थे.

फिर उसने अपने कुर्ते में सामने से हाथ घुसा के फोन निकाला और किसी से बतियाने लगी. मैंने स्पष्ट देखा उसका फोन बाबा आदम के जमाने का नोकिया कम्पनी का घिसा पिटा सा एक इंच स्क्रीन वाला फोन था और वो फोन को अपनी हथेली में छिपाए बात कर रही थी.

बात ख़त्म करके उसने फोन को वापिस अपने कुर्ते में धकेल दिया और वापिस उन्ही लड़कियों की तरफ जाने लगी. मैंने पीछे से देखा तो उसके कुर्ते से झांकती उसकी ब्रा के स्ट्रेप्स और उसके ऊपर पहनी हुई शमीज का आकर साफ़ नज़र आ रहा था; कुर्ता नीचे की तरफ उसके गोल मटोल पुष्ट नितम्बों की दरार में फंसा हुआ था जिससे उसकी मादक चाल और भी मदमाती लगने लगी थी. उसके लम्बे बालों वाली चोटी क्रम से इस नितम्ब से उस नितम्ब पर उछल उछल कर दस्तक देती हुई लहरा रही थी.

ये सब देख कर न जाने क्यों मेरे जिस्म ने एक झुरझुरी से ली और मन में इस कामिनी की उफनती जवानी को रौंदने की, उसके जिस्म को भोगने की, उसे चोदने की चाह जग गयी.

वो कामिनी ऐसी ही मदमाती चाल से चलती हुई वापिस अपनी जगह पर बैठ गयी. इधर मैं उसकी रूपराशि निहारता हुआ, उससे अपनी आँखे सेंकता हुआ उसे ताकता रहा.अचानक उसकी नज़र मेरी तरफ उठी और मैंने भी उसे नज़र गड़ा कर, उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखा तो उसने फौरन सकपका कर अपना मुंह फौरन दूसरी ओर घुमा लिया.

ये लड़कियां या स्त्रियां मर्दों की वैसी चाहत वाली वाली नज़रों को खूब पहचानती हैं, क्षणभर में आदमी की चाहत और नीयत भांप लेती हैं. यह गुण इन्हें ईश्वरीय देन है जो इन्हें छोटी उमर से ही ज्ञान करा देता है. इस तरह हमारी नज़रें यूं ही दो चार बार टकरायीं, अंतिम बार उसने कोई पांच सात सेकेण्ड के लिए मेरी ओर एकटक देखा, शायद वो मेरे मन उमड़ रही चाहत को फिर से पढ़ना और कन्फर्म करना चाहती हो और फिर वो अपनी कुर्सी घुमा कर मेरी तरफ पीठ करके बैठ गयी.

इस लड़की में अब मेरी उत्सुकता न जाने क्यों बढ़ने लगी थी. अब शादी में आई थी तो रिश्तेदारी का लिंक मुझसे भी कहीं न कहीं से तो जुड़ेगा ही, मैंने सोचा. मेरी सोच इस देसी बाला की ओर गहराती गयी … गाँव से शादी में आई है; पुराने ढंग का पहनावा, बालों में कंघी करके कसी हुई चोटी, गुजरे जमाने का फोन लिए… बात करने का देहातीलहजा और वैसे ही हावभाव ये सब चिह्न उसके फॅमिली बैकग्राउंड को बखूबी दर्शा रहे थे. नौजवानों को रिझाने या सिड्यूस करने के उपक्रम करती ये बाला लगता था कि किसी से चुदने की ठान के ही घर से निकली थी.

“आह कितना मज़ा आयेगा इसे भोगने में… देखने से कम उमर की और कुंवारी सी दिखती है … हो सकता है अभी तक सील पैक हो इसकी चूत … या चुद चुकी होगी गाँव में … हावभाव से तो प्यासी सी लगती है, चुद भी चुकी होगी तो ज्यादा से ज्यादा पच्चीस तीस बार चुद ली होगी … इतने से चूत का कुछ बिगड़ता थोड़े ही है. बहुत हॉर्नी फील कर रही होगी तभी तो लड़कों को आंख में आंख डाल के मुस्कुरा के देखती है … इसे पूरी नंगी करके भोगने में कैसा सुख मिलेगा … ये कैसी कैसी कलाबाजियां खाते हुए ये लंड लीलेगी …” ऐसे ऐसे न जाने कितने विचार मुझे मथने लगे.

“संभल जा सतीश …” अपनी बहूरानी के साथ शादी में आये हो; अगर कोई ऊँच नीच हो गयी, तूने कुछ गलत किया और लड़की ने शिकायत कर दी तो पूरी बिरादरी में थू थू हो जायेगी, तेरा सोशल स्टेटस खत्म हो जाएगा और अदिति बहू भी नफरत करने लगेगी तुझ से … मेरे भीतर से चेतावनी सी उठी तो मुझे आत्मग्लानि सी हुई और मैं वहां से उठ कर चल दिया.

दोपहर का एक बज चुका था. भूख भी लग आयी थी, बाहर पंडाल में जाकर देखा तो मेजों पर खाना सजा दिया गया था. खाना खाते ही आलस्य आने लगा.

साढ़े चार बजे बहू ने मुझे चाय के लिए जगा दिया- उठ जाइए पापा जी, टी टाइम!बहूरानी मुझे हिला कर जगा रहीं थीं. मैंने अलसाई आँखों से देखा तो वो मेरे ऊपर झुकी हुईं मेरा कन्धा हिला हिला के मुझे जगा रही थी. वही बंजारिन की वेशभूषा में थीं; मेरे ऊपर झुके होने के कारण उनके मम्मों की गहरी घाटी मेरे मुंह से कुछ ही इंच के फासले पर थी. मैंने शैतानी की और झट से मुंह ऊपर कर के दोनों मम्मों को चोली के ऊपर से ही बारी बारी से चूम लिया.

“आपके तो पास आना ही अपनी आफत बुलाना है. कोई शर्म लिहाज तो है नहीं … इतने लोगों के बीच भी सब्र नहीं है आपको?” बहूरानी मुझे झिड़कती हुई बोली.“क्या करूं बेटा, बंजारिन के कपड़ों में तू इतनी हॉट लग रही है कि बस. मेरा बस चले तो …”“रहने दो पापा जी, यहां कोई बस वस नहीं चलने वाला आपका … बस तो बस स्टैंड से चलती है वहीं चले जाओ.” बहूरानी खनकती हुई हंसी हंस दीं.

वासना में लिपटी यह सेक्स कहानी जारी रहेगी.

 
साढ़े चार बजे बहू ने मुझे चाय के लिए जगा दिया- उठ जाइए पापा जी, टी टाइम!बहूरानी मुझे हिला कर जगा रहीं थीं. मैंने अलसाई आँखों से देखा तो वो मेरे ऊपर झुकी हुईं मेरा कन्धा हिला हिला के मुझे जगा रही थी. वही बंजारिन की वेशभूषा में थीं; मेरे ऊपर झुके होने के कारण उनके मम्मों की गहरी घाटी मेरे मुंह से कुछ ही इंच के फासले पर थी. मैंने शैतानी की और झट से मुंह ऊपर कर के दोनों मम्मों को चोली के ऊपर से ही बारी बारी से चूम लिया.

“आपके तो पास आना ही अपनी आफत बुलाना है. कोई शर्म लिहाज तो है नहीं … इतने लोगों के बीच भी सब्र नहीं है आपको?” बहूरानी मुझे झिड़कती हुई बोली.“क्या करूं बेटा, बंजारिन के कपड़ों में तू इतनी हॉट लग रही है कि बस. मेरा बस चले तो …”“रहने दो पापा जी, यहां कोई बस वस नहीं चलने वाला आपका … बस तो बस स्टैंड से चलती है वहीं चले जाओ.” बहूरानी खनकती हुई हंसी हंस दी.

“अच्छा उठो तो सही वर्ना चाय ठंडी हो जायेगी; कहो तो यहीं ला दूं?” वो बोलीं.“चल, चाय यहीं ले आ साथ में एक गिलास पानी भी लेटी आइयो!” मैं अलसाए स्वर से बोला.

कुछ ही देर में बहूरानी दो पेपर कप्स में चाय ले के आ गयी और कुर्सी डाल के मेरे पास ही बैठ के चाय सिप करने लगीं. चाय पीते हुए हमलोग शादी के सम्बन्ध में ही बातें करने लगे जैसे कि जनरल, घरेलू बातचीत होती ही है.

कुछ ही देर में अदिति बहू के अंकल जिनके बेटे की शादी थी आकर मेरे ही नजदीक बैठ गये. थोड़ी औपचारिक बातों के बाद वे अदिति से बोले- अदिति, जरा चल के एक बार शादी के गहने, कपड़े और बाकी सामान चेक कर लो कहीं कोई कमी न रह जाय. कुछ और लाना हो तो बताओ देख के; पूरा सामान उधर कोने वाले कमरे में रखा है. ये लो चाबियां और हां किसी को भी कमरे में मत आने देना, तू तो जानती है सब तरह के लोग आते हैं शादी में किसी का कोई भरोसा नहीं. इसलिए तुम कमरा भीतर से बंद कर लेना. और हां मैं और तुम्हारी आंटी बाजार जा रहें हैं शाम को आठ साढ़े आठ तक लौटेंगे. तुम सब चेक कर करा के कोई कमी हो तो बताना कल पूरी कर लेंगे. ध्यान रखना कोई भी कमरे में न आने पाये, बहू के चढ़ावे के गहने भी वहीं संदूक में रखे हैं.

“और हां भाई साब, आप भी कष्ट कर लेना एक नज़र सब देख लेना अदिति के साथ जा के!” अदिति के अंकल ऐसे मुझसे कहते हुए चाबियों का एक गुच्छा अदिति के हाथ में थमा कर चले गये.

अदिति ने चाबियां लेकर दो तीन बार उछाल उछाल कर मेरी ओर मुस्कुरा के अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा. इधर मेरे दिमाग की बत्ती भी भक्क से जल उठी; सामान वाले बंद कमरे में मैं और अदिति बहूरानी … मतलब बंजारिन को चोदने का पूरा इंतजाम खुद ब खुद हो गया था.“पापा जी, लाटरी निकल गयी आपकी तो, ये बंजारिन मिलने वाली है आपको. अब तो खुश हो न?” अदिति मेरी आँखों में आँखें डाल के बोली.

“अदिति बेटा, जब तेरे अंकल खुद तेरी चुदाई का इंतजाम कर के गये हैं तो उनका मान तो रखना ही पड़ेगा … आखिर सगे चाचा जी है तेरे!”“अब रहने भी दो पापा, सोचो कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया वर्ना इस बंजारिन को छूने के ही ख्वाब देखते रह जाते!” बहू थोड़ा इठला के बोली“हां हां चल ठीक है …चलो चलें सामान वाले रूम में. शुभ काम में देरी नहीं करते!” मैं खुश हो के बोला.

“अभी से? अभी तो पांच ही बजे हैं. सात बजे तक चलेंगे रूम में.” बहूरानी बोलीं और निकल ली.तो बहूरानी को चोदने का मौका मिलने ही वाला था. मैंने खुश होते हुए चाय ख़तम की और टहलने के लिए बाहर निकल गया.

मैं धर्मशाला से निकल यूं ही आसपास दिल्ली की सड़कों पर टहलता रहा. उफ्फ, बेशुमार ट्रैफिक और भीड़ जहां सांस लेना भी मुश्किल. बाजारों में काफी रौनक लग रही थी.यूं ही टाइम पास करते करते सात बजने को हो गये तो वापिस लौटा.

धर्मशाला में काफी कम लोग नज़र आ रहे थे. शादी तो अगले दिन थी और शाम का टाइम सो लोग घूमने फिरने निकल गये थे पर मेरी नज़रें तो बहूरानी को ढूँढ रहीं थीं. सब जगह देखने के बाद वो फर्स्ट फ्लोर पर एक रूम में किसी लड़की से बतिया रहीं थीं. नजदीक जाकर देखा तो वो उसी गाँव वाली छोरी से बातें कर रहीं थीं जिसे मैं दोपहर में ताड़ रहा था.

“अरे अदिति, तू यहां बैठी है? मैं तुझे सब जगह ढूंढता फिर रहा हूं. चल वो शादी का सब सामान चेक करना है न, जो तेरे अंकल कह कर गये थे.”

“पापा जी, बैठो तो सही अभी चलती हूं. मुझे पता है कि आपको बहुत चिंता हो रही है ‘वो वाला’ सामान चेक करने की!” बहूरानी द्वीअर्थी बात मुस्कुरा कर बोली.बहू ‘वो वाला सामान’ शब्द जोर देकर बोली और एक कुर्सी मेरे लिए खिसका दी.

“पापा जी, इनसे मिलो. ये मेरी भतीजी लगती हैं. मेरठ के पास के गाँव से आई हैं. कमलेश नाम है इनका वैसे सब इन्हें कम्मो नाम से बुलाते हैं. पापा जी, रिश्ते से तो कम्मो मेरी भतीजी हैं पर हम सहेलियां ज्यादा हैं.” बहूरानी ने उस गाँव की गोरी से मेरा परिचय कराया.

“कम्मो, ये मेरे ससुर जी हैं इन्हें पापा कहती हूं मैं. इन्हीं के संग बैंगलोर से आई थी मैं; तुझे बताया था न अभी!” बहूरानी कम्मो से बोलीं.यह सुनकर कम्मो उठी और मेरे पांव छूते हुए नमस्ते कहने लगी.“आशीर्वाद है कमलेश बिटिया. खुश रहो!” मैंने उसे आशीर्वाद दिया; वो मेरे सामने झुकी थी वो मेरा हाथ खुद ब खुद उसकी पीठ पर जा पहुंचा. उसकी नर्म गुदाज गर्म सी पीठ का मुझे स्पर्श हुआ और मेरी उंगलियाँ उसकी ब्रा के हुक पर जा कर अटक सीं गयीं. यौवनमयी जवान देह का स्पर्श पाते ही मेरे लंड ने जैसे ठुमका लगाया और एक मीठी सी तरंग मेरे पूरे बदन में तैर गयी. फिर वो सीधी हुई तो उसके खूब गहरे क्लीवेज की झलक मेरी आँखों में कौंधी और वो अपनी कुर्सी पर जा बैठी.

 
स्त्रियां या लड़कियां स्पर्श के मामले में ज्यादा सचेत होती हैं सो जो जैसा मुझे महसूस हुआ जरूर वैसा ही उसे जरूर हुआ होगा तभी उसका मुंह आरक्त हो गया, उसके चेहरे पर गहरी लाली छा गई और उसकी आँखें नशीलीं हो उठीं. वैसे भी जब मैं उसे दोपहर में ताड़ रहा था और उसे चोदने के ख़याल मात्र से आनंदित हो रहा था वो मेरी ओर अपनी पीठ करके बैठ ही गयी थी मतलब उसने मेरे मनोभावों को पढ़ लिया था. मैंने पहले कहा था कि स्त्रियों में यह गुण जन्मजात होता है कि वो पुरुष के मनोभाव क्षणमात्र में ही पढ़ लेती हैं.

“चलो अच्छा ही हुआ इस कम्मो से भी परिचय हो ही गया. आखिर जान पहिचान से ही बात आगे बढ़ती है.” मैंने खुश होते हुए सोचा. लेकिन मैं मन ही मन शर्मिंदा या गिल्टी कांशस भी फील कर रहा था कि वो बेचारी मेरे बारे में न जाने क्या क्या धारणा बना रही होगी.

कम्मो मेरे सामने ही बैठी थी. अबकी बार मैंने उसे नजर भर के निहारा. सुन्दर गोल सा चेहरा, उमड़ते यौवन से भरपूर मजबूत सुगठित बदन जो कि सिर्फ मेहनत करने वाली कामिनियों का ही होता है. खूब लम्बे काले घने केश जिनकी चोटी उसकी कमर तक आती थी और वो अपनी चोटी गोद में लिये यूं ही उँगलियों में लपेट रही थी. उमर के हिसाब से भी लगता था कि यही कोई उन्नीस साल के क़रीब होगी.

“कमलेश जी, आप की शिक्षा पूरी हो गयी या अभी भी जारी है?” मैंने ऐसे ही बात शुरू करने की नीयत से उससे सवाल किया.“आप मुझे जी कह कर क्यों बुलाते हैं. सबकी तरह कम्मो ही कहिये न!”“ओके कम्मो, चलो बताओ जो मैंने पूछा?”

“पहले आप ये बताओ कि मैं आपको क्या कहूं? आप अदिति आंटी के फादर इन ला हो तो मेरे दादा जी जैसे हुए रिश्ते के हिसाब से तो!”“कम्मो, जो तेरा जी चाहे कह ले मुझे!” मैंने मुस्कुरा के कहा.

“रिश्ते का क्या … ये मेरी अदिति आंटी हैं लेकिन फ्रेंड जैसी हैं. आप रिश्ते से दादा जी हो लेकिन देखने से वैसे दादाजी टाइप के लगते नहीं. मैं तो आपको अंकल जी कहूंगी, ठीक है न?” कम्मो भी मुस्करा के बोली.“ओके कम्मो … अब बताओ अपने बारे में?” मैंने फिर पूछा.

तो जो उस कम्मो ने मुझे बताया उसकी बातों का सारांश ये है कि वो हाई स्कूल पास कर चुकी है फर्स्ट डिविजन में पर घर वालों ने उसे आगे नहीं पढ़ने दिया और उसकी उमर अभी साढ़े उन्नीस की है, घर में और खेतों में काम करना पड़ता है और उसकी शादी भी तय है, गेहूं की फसल के बाद इसी मई जून में उसकी शादी हो जायेगी.

गांव देहात में लड़कियों को कम ही शिक्षा दिलवाते हैं और शादी भी बहुत जल्दी कर देते हैं. कम्मो भी उसी तरह से थी.

“पापा जी, कम्मो मुझसे नया मोबाइल खरीदवाने का कह रही थी. इसका पुराना नोकिया का मोबाइल तो बेकार हो गया अब. पैसे तो हैं इसके पास. अब मैं तो बाज़ार जाऊँगी नहीं. आप ही इसे कल मार्केट ले जाना और कोई अच्छा, सिम्पल सा स्मार्ट फोन इसे दिलवा देना जिसे ये अच्छे समझ सके!” अदिति बहूरानी मुझसे बोली.

“हां हां क्यों नहीं … कल दिलवा देंगे इसे जैसा ये चाहेगी. वैसे भी मुझे यहां कल कोई काम धाम तो है नहीं; चलो इसी के साथ टाइम पास हो जाएगा और इसी बहाने दिल्ली के बाज़ार की सैर भी हो जायेगी. ठीक हैं न कम्मो; चलेगी न मेरे साथ?” मैंने खुश होकर उससे पूछा.“हां क्यों नहीं. जरूर चलूंगी अंकल जी!” वो थोड़ा शर्माते हुए बोली. उसने पलकें उठा के मुझसे कहा फिर नज़रें झुका दीं.

मैंने घड़ी देखी तो साढ़े सात बजने ही वाले थे.“अदिति बेटा चलें फिर? वो सामान चेक करना है नहीं तो देर हो जायेगी फिर. तेरे अंकल आंटी आने वाले होंगे!” मैंने अधीरता से कहा.“चलो पापा जी!” बहूरानी बोली और खड़ी हो गयी.

“सुन कम्मो, हम लोग शादी का सामान चेक करके आते हैं अभी!” अदिति ने कम्मो से कहा.“ठीक है आंटी जी. मैं नीचे जा रही हूं. आप लोग भी वहीं आ जाना. डिनर साथ ही करेंगे.” वो बोली.

इस तरह कम्मो को समझा कर बहूरानी जी मेरे आगे आगे तेज कदमों से सामान वाले रूम की तरफ चल दीं. उनके पीछे पीछे मैं उनके थिरकते नितम्बों को निहारता हुआ चल पड़ा. बंजारिन के वेश में उनका मादक हुस्न, घुटनों तक के घाघरे में से झांकती उनकी सुडौल पिंडलियां, लगभग नंगी पीठ पर बंधी चोली की डोरियां और घाघरे के बीच से अनावृत उनकी कमर, पीठ और नाभि क्षेत्र … सब कुछ कहर ढा रहा था.

मित्रो, आप सब तो जानते ही हैं कि मैं अपनी इन बहूरानी के साथ कई कई बार संभोग कर चुका हूं; अभी तीन दिन पहले ही हम दोनों बैंगलोर से ऐ सी फर्स्ट क्लास के प्राइवेट कूपे में बैंगलोर से दिल्ली आते आते उन छत्तीस घंटों में मैंने अपनी कुलवधू को हर तरह से, हर एंगल से … न जाने कितने आसनों में अपनी शक्ति शेष रहते चोदा था; परन्तु अदिति बहूरानी मुझे कभी भी बासी या फीकी, उबाऊ नहीं लगीं. हर बार वे एक नये ताजे खिले पुष्प की भाँति ही मुझे समर्पित हुयीं.

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पर आज उनका बंजारिन वाला रूप तो कहर ढा रहा था … उनकी अल्हड़, बेपरवाह जवानी देख के मुझे अपनी जवानी के दिन स्मरण हो रहे थे जब मैं उस जमाने की फिल्म्स की हेरोइनों को बंजारिन के वेश में देख कर मुठ मारा करता था … नीतू सिंह, आशा पारेख, वहीदा रहमान, रेखा, वैजयन्ती माला मुमताज, राखी, योगिता बाली, सायरा बानो … न जाने कितनी और को मैंने अपने ख्यालों में ला ला के अपने लंड से सताया था और आज बंजारिन का वही साकार रूप लिए मेरी एकलौती बहूरानी मुझसे चुदने की खातिर मेरे आगे आगे चल रही थी; घुटनों तक के घाघरे में से उनकी गोरी गुलाबी पिंडलियां बहुत सुन्दर लग रहीं थीं.‘अभी इन्हें कंधों पर रख कर …’ मैंने सोचा.

बहूरानी ने सामान वाले कमरे का ताला खोला और हम दोनों झट से कमरे में घुस गये और दरवाजा भीतर से लॉक कर लिया. सबसे पहले मैंने बहूरानी को पीछे से अपने बाहुपाश में जकड़ लिया और उनके दोनों मम्में पकड़ के उनकी गर्दन और कान के नीचे चूमने लगा.“आह…पापा जी, थोड़ा सब्र तो करिये. फिर कर लेना जो जो करना हो. पहले ज्यादा जरूरी काम तो निपटा लें!” बहूरानी कसमसाती हुई बोली.“बेटा, तू इस घाघरे चोली में एकदम हॉट लग रही है; तुझ बंजारिन को चोदने को कब से मचल रहा हूं; पहले यही काम निपटा लें न!” मैंने उनकी चोली में हाथ घुसा के उसके अंगूर मसलते हुए कहा.

“नहीं पापा जी, पहले शादी का सामान देख लेते हैं. आप तो बहुत देर तक पेलोगे मुझे अगर चाचा जी आ गये तो सब गड़बड़ हो जायेगी.” अदिति मुझसे छूटती हुई बोली.

बहूरानी की बात भी ठीक थी तो मैंने उसे जाने दिया. फिर कमरे का जायजा लिया. पूरा कमरा शादी के सामान से भरा पड़ा था. होने वाली बहू के चढ़ावे के कपड़े जेवर एक अलग बॉक्स में रखे थे. कमरे में एक डबल बेड बिछा था जिस पर गिफ्ट में देने के कपड़े, पैंट शर्ट के पीस, साडियां, मिठाई के डिब्बे रखे थे. पलंग पर बैठने लायक भी जगह नहीं थी और सारा कमरा मिठाइयों की महक से महक रहा था.

बहूरानी ने सबसे पहले गहनों वाले बॉक्स का ताला खोल कर चेक किया. होने वाली बहू के सारे जेवर बहुत ही सुन्दर सुन्दर डिजाईन के थे और चढ़ावे के कपड़े, शादी का जोड़ा सब कुछ फर्स्ट क्लास लगा. बस हमें पायल पसंद नहीं आयी, तो अदिति ने अपने चाचाजी को फोन करके बता दिया- चाची जी, मैं भाभी का सामान देख रही हूँ, इसमें जो पायल है, वो बहुत हल्की है, पतली है, थोड़ी भारी वाली अच्छी लगेगी.

इतना करने के बाद मैंने पलंग पर पड़े कपड़े, मिठाई के डिब्बे एक के ऊपर एक रख के ढेर लगा दिया और अदिति के लेटने लायक जगह बनाई और उसे पलंग पर गिरा कर मैं उसके ऊपर सवार हो गया.बहूरानी भी बेकरार थी तो उसने भी अपनी बांहें मुझे पहना कर अपने ऊपर झुका लिया. मैं चुपचाप सा उनके भुजबंधन में बंधा हुआ उनके दिल की धकधक महसूस करता रहा. उसके जिस्म की तपन और वो नेह का आलिंगन मुझे आत्मिक सुख प्रदान कर रहा था.

बहूरानी के साथ मैंने बीसों बार संभोग किया था और हर बार हमें एक आत्मिक संतुष्टि और चरम सुख की अनुभूति ही हुई; कभी भी आत्मग्लानि या अपराधबोध से मन ग्रस्त नहीं हुआ. उनके नर्म गुदगुदे स्तन चोली में से उभरी हुई चोटियों की तरह मुझे आमंत्रित से कर रहे थे. मैंने उनके बीच अपना मुंह छुपा दिया और क्लीवेज को चूम चूम कर चाटने लगा.

बहूरानी के मुंह एक मादक आह निकल गई और उनका चेहरा ऊपर को उठ गया. मैंने चोली में नीचे से हाथ घुसा कर चोली को ऊपर खिसका दिया, ब्रा तो उसने पहनी ही नहीं थी, उसके नग्न उरोज बाहर निकल आये; मैंने दोनों मम्मों को दबोच लिया और हौले हौले उन्हें गूंथने लगा और उसकी गर्दन चूम कर कान की लौ को जीभ से छेड़ने लगा.

बस इतने से ही उसके निप्पल कड़क हो गये; जो किशमिश के जैसे थे फूल कर अंगूर से हो गये. मैं दायें वाले अंगूर को अपने मुंह में भर के चूसने लगा और बाएं वाले को चुटकी में भर के प्यार से धीरे धीरे निचोड़ने लगा जैसे नींबू निचोड़ते हैं.

“पापाऽऽ स्सस्सस्सस…आः ह…” बहूरानी के मुंह से धीमी सी कराह निकली और उसने मेरा चेहरा पकड़ कर अपने होंठ मेरे होंठों से जोड़ दिए और पूरी तन्मयता के साथ चूसने लगी. इधर मेरे बदन में खून की रफ़्तार तेज हो गयी मेरी कनपटियां तपने लगीं और लंड धीरे धीरे अकड़ने लगा. बहूरानी का निचला होंठ संतरे की छोटी फांक की तरह मोटाई लिए रसीला है जिसे चूसने में गजब का मज़ा आता है. तो मैं उसके दोनों मम्में पकड़ के होंठ चूसने लगा और बीच बीच में उनके गाल भी काटने लगा.अदिति बहू के गाल काटने में भी मस्त मज़ा आता है.

इसी बीच बहूरानी ने अपनी जीभ मेरे मुंह में घुसा दी और मैं उसे चूसने लगा; फिर मैंने अपनी जीभ बहू के मुंह में घुसा दी और वो भी मेरी जीभ अच्छे से चूसने लगी. हमारे होंठ और जीभ यूं ही काफी देर तक आपस में लड़ते रहे फिर बहूरानी नीचे हाथ लेजाकर जैसे कुछ टटोल के ढूँढने लगी.“पापा जी, कहां गया आपका वो?” वो अपना हाथ नीचे लेजाकर टटोलते हुए पूछने लगी.“वो क्या बेटा जी?” मैंने समझते हुए भी नासमझी का दिखावा किया और अपनी कमर ऊपर उठा दी ताकि वो उसकी पकड़ में न आये.“वो आपका छोटू!” वो धीमे से बोली.“छोटू?”“हां छोटू … लम्बू कह लो चाहे मोटू कह लो … वही!” बोल के बहूरानी ने मुझे चिकोटी काटी.

“पता नहीं मुझे … मेरे पास तो ऐसी कोई चीज नहीं!” मैंने कहा और उसके पेट को चूमते हुए नाभि में जीभ घुसा के गोल गोल घुमाने लगा. उसके दोनों मम्में अभी भी मेरे हाथों की गिरफ्त में थे.

“उफ्फ्फ़ पापा जी … आप भी न अब झूठ भी बोलने लग गये मुझसे. देखो ये तो रहा!” बहूरानी बोली और अपना पैर उठा कर मेरे लंड को छेड़ा, हिलाया.“अरे, तो ये कोई छोटू मोटू थोड़े ही है …ये तो मेरा लंड है लंड!” मैंने कहा और लंड को उसकी जांघों पर टकराने लगा.

“हां हां वही पापा … नाम कोई भी ले लो इसका. अब जल्दी से मिलवा दो इसे मेरी पिंकी से … टाइम कम है!”“अदिति मेरी जान, लंड को लंड ही कहो न और तुम्हारी पिंकी नहीं चूत कहते हैं इसे!”“धत्त, मैं नहीं कहती ऐसे गंदे शब्द!” बहू ने नखरे दिखाए.“प्लीज मान जा न मेरी गुड़िया रानी!” मैंने बहू के होंठ चूमते हुए कहा.“ऊं हूं” वो मुस्कुराते हुए गुनगुनाई.

“अच्छा ठीक है मत बोलो. मैं भी देखता हूं कैसी नहीं बोलती. अब तुम्हें ये लंड तभी मिलेगा जब तुम लंड लंड चिल्लाओगी और कहोगी कि पापा जी मेरी चूत मारो अपने लंड से!” मैंने बहू को चैलेन्ज दिया.“हां हां ठीक है देख लेंगे हम भी. मैं तो कभी न बोलूं ऐसी बात!” बहू भी पूरे आत्मविश्वास से बोली.

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कहानी जारी रहेगी

 
“हां हां वही पापा … नाम कोई भी ले लो इसका. अब जल्दी से मिलवा दो इसे मेरी पिंकी से … टाइम कम है!”“अदिति मेरी जान, लंड को लंड ही कहो न और तुम्हारी पिंकी नहीं चूत कहते हैं इसे!”“धत्त, मैं नहीं कहती ऐसे गंदे शब्द!” बहू ने नखरे दिखाए.“प्लीज मान जा न मेरी गुड़िया रानी!” मैंने बहू के होंठ चूमते हुए कहा.“ऊं हूं” वो मुस्कुराते हुए गुनगुनाई.

“अच्छा ठीक है मत बोलो. मैं भी देखता हूं कैसी नहीं बोलती. अब तुम्हें ये लंड तभी मिलेगा जब तुम लंड लंड चिल्लाओगी और कहोगी कि पापा जी मेरी चूत मारो अपने लंड से!” मैंने बहू को चैलेन्ज दिया.“हां हां ठीक है देख लेंगे हम भी. मैं तो कभी न बोलूं ऐसी बात!” बहू भी पूरे आत्मविश्वास से बोली.

तो मैंने बहू के मम्में फिर से पकड़ के उन्हें कस के दबाना शुरू किया और उनका पेट चूमता हुआ नाभि में जीभ घुमाने लगा. फिर मैं बैठ गया और बहू के तलवे चाटने लगा और पांव की उंगलियाँ अंगूठा सब चूसने लगा.बहू बेचैनी से अपना सिर दायें बाएं घुमाने लगी. कुछ देर यूं ही पांव चूमने के बाद मैंने उसकी पिंडलियां चूम डालीं और घाघरे को थोड़ा सा घुटनों के ऊपर कर, उनके दोनों चूचुक चिकोटी में भर कर उनकी चिकनी जांघें चाटने लगा.

बस यही मेरी बहूरानी का वीक पॉइंट है.चूचुक दबाते हुए उसकी जांघें चाटते ही बहू की कामाग्नि भड़क उठती है और उनकी चूत में रस की बाढ़ सी आ जाती है; यह राज मैंने उसे कई कई बार चोद कर जाना. अतः मैं उसकी दोनों नंगी जांघें किसी चटोरे की तरह लप लप करते हुए चाटने लगा.

जल्दी ही बहूरानी अधीर हो उठी और अपने पांव एक दूसरे पर लपेटने की कोशिश करने लगी, लेकिन मैं जब उन्हें ऐसा करने दूं तब न!“मत सताइए पापा जी, तरस खाइए मुझ पर!” बहूरानी ने जैसे आर्तनाद किया.“तो फिर बोलो जो मैंने कहा था?”“न नहीं … बिल्कुल नहीं बोल सकती वो शब्द मैं!” वो कमजोर सी आवाज में बोली.

फिर मैंने उसका घाघरा सामने से उठा कर उसके पेट पर पलट दिया.ये क्या … बहू ने पैंटी तो पहनी ही नहीं थी तो उसकी रसीली नंगी चूत मेरे सामने थी. उसकी चूत नंगी करते ही बहूरानी का चेहरा लाज से लाल पड़ गया और उसने अपना मुंह अपनी हथेलियों से छिपा लिया. हां अपनी चूत छिपाने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की.

मैंने बहू की चूत को मुग्ध भाव से निहारा; बहूरानी की चूत के दर्शन मुझे सदा से ही अत्यंत प्रिय रहे हैं. मैंने भाव विभोर होकर उसकी चूत को चूम लिया और धीरे से चूत के पट खोल कर इसकी भगनासा और भगान्कुर को झुक कर चूम लिया और जीभ से छेड़ने लगा. बहूरानी की बुर की वो विशिष्ट गंध मेरे भीतर समा गयी और उनके मुंह से एक गहरी निःश्वास निकल गयी.

तीन चार दिन पहले जब हम लोग बैंगलोर से साथ चले थे तो बहू की चूत एकदम चकाचक सफाचट क्लीन शेव्ड थी पर आज चूत के चहुँ ओर नाखून के बराबर झांटें उग आयीं थीं. हल्की हल्की झांटों वाली चूत का भी एक विशिष्ट सौन्दर्य होता है जैसे हमारे सिर के केश हमारे चेहरे को सुन्दरता प्रदान करते हैं, ठीक वैसे ही छोटी छोटी झांटों वाली चूत भी मुझे अत्यंत मनोरम लगती है देखने और चोदने में.

अब मैंने पूरे जोश के साथ चूत को अच्छे से बाहर से चाटा, फिर इसकी फांकें खोल कर भीतर से चाटना शुरू किया साथ साथ अनारदाने को दांतों से हल्के हल्के चूसने और कुतरने लगा तो बहूरानी के जिस्म में जैसे भूकम्प आ गया, उसका पूरा बदन थरथरा उठा, उसने अपना एक पैर मोड़ कर मेरा सर अपनी चूत में कस के दबा दिया और मेरे सिर के बाल अपनी मुट्ठियों में भर लिए; चूतरस का नमकीन स्वाद मेरे मुंह में घुलने लगा. मैंने ऐसे ही कोई एक मिनट तक उसे चाटा होगा कि उसकी कमर किसी खिलौने की तरह अपने आप उछलने लगी जैसे उसे कोई दौरा पड़ा हो और उसके मुंह से अत्यंत कामुक और उत्तेजना पूर्ण कराहें निकलने लगी- पापाऽऽ जी ईऽऽ जल्दी जल्दी चाटो!

बस तभी मैं उनके ऊपर से हट गया.“नहींऽऽपापा जी …” बहूरानी के मुंह से निकला और वो मुझे फिर से अपने ऊपर लिपटाने लगी.लेकिन मैं उठ कर खड़ा हो गया और अपने सारे कपड़े उतार के फेंक दिये; मेरा लंड आजाद होकर बहू के सामने अपना सिर उठा के तन गया. बहूरानी झट से उठीं और मेरा लंड पकड़ कर अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी, इसकी चमड़ी पीछे कर फूला हुआ सुपारा निकाल कर जीभ से चाटने लगी और फिर उसे गप्प से मुंह में भर लिया और चाकलेट की तरह चूसने लगी.

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“पापा जी… अब जल्दी से कर दो प्लीज!” बहूरानी ने लंड मुंह से बाहर निकाल कर अपनी नजर ऊपर उठा कर कहा.

“क्या कर दूं मेरी गुड़िया रानी … बोलो?” मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा और अपना लंड फिर से उसके मुंह में दे दिया और दो तीन धक्के लगा दिए.“ओफ्फो … पापाजी … आप भी न, चलो मैं हारी और आप जीते. अच्छा अब आपका लंड मेरी चूत में घुसा दो और चोद डालो अपनी बहू रानी को. अब तो खुश न?” बहूरानी लंड मुंह से बाहर निकाल कर अत्यंत कामुक स्वर में बोलीं और पीछे हाथ लेजाकर अपनी चोली की डोरियों की गांठ खोल कर चोली उतार फेंकी और घाघरा भी निकाल दिया और मादरजात नंगी होकर मेरे सामने बिछ गयी, अपने दोनों पैर ऊपर की ओर मोड़ लिए और अपनी चूत की फांकें अपने हाथों से पूरी तरह से खोल दी.

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उहकी चूत के लघु भगोष्ठ अभी भी आपस में चिपके हुए नजर आने लगे थे जैसे नो एन्ट्री का साइन हो.

 
बहू की साढ़े पांच फीट की गदराई नंगी जवानी मेरे सामने बिछी थी; उसने अपनी चूत की फांकें अपने दोनों हाथों की उंगलियों से खूब चौड़ी खोल रखीं थीं; उसके मम्में किसी सपोर्ट के बगैर तन के खड़े थे और निप्पल फूल कर छोटे बेर के जैसे हो रहे थे. उसके बाल खुल के बिखर गये थे और उसका सुन्दर गुलाबी मुख काले बालों के बीच जैसे पूनम का चन्द्रमा हो, उसकी भरी भरी पुष्ट जंघाओं के जोड़ पर मध्य में उसकी फूली हुई चूत जिसे वो दोनों हाथों से खोले हुए मेरी ओर लाज भरी आंखों से मन्द मन्द मुस्कान सहित देख रही थी.

मैं कुछ देर उनके इस अत्यंत कामुक रति-रूप का रसास्वादन करता रहा. मेरी आंखें बहूरानी की ऐसी रूपराशि के दर्शन कर शीतल हो गयीं, तृप्त हो गयीं. स्वर्ग में भी क्या ऐसा ही सुख और आनन्द मेनका, रम्भा, उर्वशी जैसी अप्सराएं रतिकाल में देती होंगी?

“क्या देख रहे हो पापा जी, पचासों बार तो देख चुके हो मुझे और इस चूत को पहले भी. आपकी इकलौती बहू आपके सामने पूरी नंगी होकर, अपनी चूत अपने हाथों से पसार कर बेशर्मी से लेटी है; अब आ भी जाओ और चोद और डालो अपनी अदिति डार्लिंग को … प्यास बुझा दो मेरी मेरे राजा!” बहूरानी तड़पती सी बोली. उसकी आंखें वासना और चुदास से सुर्ख गुलाबी हो चलीं थीं.

मैंने लंड को बहूरानी की चूत के मुहाने पर टिकाया और उनकी आंखों में झाँकने लगा.“अब और मत देर लगाओ पापा. मैंने आपकी बात मान ली न … देखो आठ बजने वाले हैं. कोई भी कभी भी आ सकता है!”बहूरानी जल्दबाजी से बोली.उसकी बात भी ठीक थी.

“अभी लो मेरी जान … मेरी प्यारी प्यारी गुड़िया. तेरे ही लिए तो खड़ा है ये!” मैं बोला और अपना फनफनाता लंड अपनी कुलवधू की चूत के मुहाने पर रख कर घिसने लगा. जिससे उनके लघु भगोष्ट स्वतः ही खुल गये और स्वर्ग का द्वार दिखने लगा.“पापा जीऽऽस्स्स्स स्स्स्स बस अब घुसेड़ भी दो ना, चोदो जल्दी ई …ऽऽ से मुझे!”“हां … ये लो बहू अपने ससुर का लंड अपनी चूत में … संभालो इसे!” मैंने कहा और अपने दांत भींच कर, पूरी ताकत से लंड को उनकी बुर में धकेल दिया. मेरा लंड उसकी चूत की मांसपेशियों के बंधन ढीले करता हुआ पूरी गहराई तक घुस गया और मेरी झांटें बहूरानी की झांटों से जा मिलीं.

“हाय रामजी, मर गयी रे … पापा… धीरे … आराम से क्यों नहीं घुसाते आप … आह… मम्मीं … ओ माँ ऽऽ.. मर गयी … बचा लो आज तो!” बहूरानी तड़प कर बोली और मुझे परे धकेलने लगी. पर मैंने उनकी दोनों कलाइयां कस के पकड़ीं और अपने लंड को जरा सा पीछे खींच के फिर से पूरे दम से बहू की चूत में पहना दिया.

इस बार उन्होंने अपना मंगलसूत्र अपने दांतों के बीच दबा लिया और बेड की चादर अपनी मुट्ठियों में कस के पकड़ ली और दांत भींच लिए. इस तरह बहू की चूत में अपने लंड को अच्छे से फिट करके मैं उसी के ऊपर लेट के सुस्ताने लगा.“अब कैसा लग रहा है बहू?” मैंने कुछ देर बाद बहूरानी के बालों में प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा.

“मार डालो आप तो मुझे ऐसे ही पेल के आज … न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. सारी जान एक बार में ही निकाल लो आप तो!” वो रुआंसे स्वर में बोली.“अदिति बेटा, मेरा बांस तुम्हारी बांसुरी में हमेशा बजेगा जब तक दम में दम है; तू ऐसे क्यों बोलती है?” मैं उसे चूमते हुए पुचकारा.“रहने दो पापा, धीरे से नहीं घुसा सकते क्या? बस आपको तो जरूरी है एकदम से आक्रमण कर देना. चाहे कोई मरे या जिये आपकी बला से!”“ऐसे नहीं न कहते मेरी जान … अच्छा चलो मेरी सॉरी; आगे से बड़े प्यार से एंटर करूंगा. बस?” मैंने बहू को सांत्वना दी.“हम्म्म्म … ठीक है पापा जी. बट आगे से याद रखना अपनी ये वाली प्रॉमिस?”“ओके बेटा जी … पक्का याद रखूंगा” मैंने कहा.

आरएसएस के मेरे प्रिय पाठको और प्रशंसको, अभी देखा आपने कि मैंने अपनी बहूरानी की गीली रसीली चूत में अपना लंड एकदम से पेल दिया था तो बहूरानी जी कैसे कैसे एट्टीट्यूड दिखा रही थी, कितनी हाय तौबा मचा रही थी? जैसे आसमान टूट पड़ा हो उसपे; मुझे कसाई सिद्ध करने पर तुली थी. पर आप लोग अभी देखना बहू कैसे हंस हंस कर मजे मजे ले ले कर चुदतीहै इसी लंड से.

इन हसीनाओं की ये भोली अदाएं ही तो चुदाई का आनन्द दोगुना कर देतीं हैं; इनका ये रोना धोना, नखरे कर कर के चुदना, एक प्रकार का कॉम्प्लीमेंट, उत्साहवर्धक ही है हम चोदने वालों के लिये. सभी हसीनाओं की ये सांझी आदत होती है कि लंड को उनकी चूत के छेद से छुला भर दो और ये ‘धीरे से करना जी, ऊई माँ … हाय राम हाय राम … मार डाला … फट गयी …’ जपना शुरू कर देंगी… नहीं तो इनकी चूतों की कैपेसिटी कितनी और कैसी होती है वो तो हम सब जानते ही हैं. आप सबने ऐसी स्थिति को अनुभव तो किया ही होगा. मेरे अजीज पाठको और मेरी प्यारी पाठिकाओ मैंने सच कहा न?

चलिए अब स्टोरी आगे बढ़ाते हैं; आप सब भी अपने अपने हाथों से मेरे साथ साथ मजे लेना शुरू करो.

“ओके माय डार्लिंग बेबी … प्रॉमिस बाई यू!” मैंने बहू का गाल चूमते हुए उसे आश्वासन दिया और अपने लंड को अन्दर बाहर करने का हल्का सा प्रयास किया. उसकी चूत अब तक खूब रसीली हो उठी थी और लंड अब सटासट, निर्विघ्न चूत में अन्दर बाहर होने लगा था. फिर तो मैंने रेल चला दी. उधर बहू को भी चुदाई का जोश चढ़ने लगा और वो मुझसे लिपट लिपट के चूत देने लगी.

“पापा जी… नाउ ड्रिल मी डीप एंड फास्ट विद आल योर माईट!” बहूरानी भयंकर चुदासी होकर बोली और अपने नाखून मेरी पीठ में जोर से गड़ा दिए.

“या बेबी, हेअर आई कम मोर डीप इनटू यू!” मैंने कहा और उसके दोनों पैर और ऊपर उठा कर उसी के हाथों में पकड़ा दिए जिससे उसकी चूत खूब अच्छे से ऊँची होकर लंड के निशाने पर आ गयी. फिर मैंने पूरे दम से और बेरहमी से बहूरानी की चूत की चटनी बनाना शुरू की.

 
बहू की चूत से फचाफच फच्च फच्च फचाक जैसी आवाजें आने लगीं और ऐसी चुदाई से बहू पूरी तरह से मस्ता गयी.“आई लव यू पापा … मेरी जान … मेरे राजा … फाड़ के रख दो मेरी चूत अपने लंड से. बहुत ही ज्यादा तंग करती है मुझे ये!” बहूरानी मिसमिसा कर बोली.

“हां बेटा जी, अभी लो!” मैंने कहा और लंड को उनकी चूत से बाहर निकाल कर पास पड़े घाघरे से अच्छे से पौंछा और फिर उनकी चूत को भी बाहर भीतर से अच्छे से पौंछ दिया और फिर से उनकी दहकती बुर में धकेल दिया. चिकनाहट थोड़ी कम हो जाने से लंड अब टाइट जा रहा था चूत में.

बहूरानी ने अपने पैर सीधे कर लिए थे और अब एड़ियों पर से उचक उचक कर मेरा लंड अपने चूत में दम से लील रही थी और मेरे धक्कों के साथ ताल में ताल मिलाती हुई अपनी जवानी मुझ पर लुटा रही थी.

ऐसे कोई तीन चार मिनट तक मेरी बहू अपने ससुर से चुदाई का मज़ा लेती रही, फिर …“पापा जी, अब मैं आपके ऊपर आऊँगी. अपना मज़ा मैं अपने हिसाब से लूंगी और चुदाई का कंट्रोल मैं अपने पास रखूंगी आप तो चुपचाप लेटे रहना!” बहूरानी मुझे चूम कर बोली.“ठीक है मेरी गुड़िया बेटा … आजा अब मेरी सवारी कर तू!” मैंने कहा और बहू के ऊपर से उतर कर लेट गया और मिठाई का एक डिब्बा अपने सिर के नीचे तकिये की तरह लगा लिया.

बहूरानी मेरे ऊपर झट से सवार हो गयी और मेरे लंड को मेरे पेट पर लिटा कर अपनी चूत से दबा लिया और आगे पीछे होकर इस पर अपनी चूत घिसने लगी या यूं कह लो कि वो अपनी चूत से मेरे लंड की मालिश करने लगी; उसकी चूत से लगातार रस की नदिया बहे जा रही थी और मेरा लंड, झांटें, जांघें सब भीग रहे थे.

दो तीन मिनट ऐसे ही मजे लेने के बाद बहूरानी ने थोड़ा सा ऊपर उठ कर लंड को अपनी चूत के छेद पर सेट किया और उसे भीतर लेते हुए मेरे ऊपर बैठ गयीं और उनकी चूत सट्ट से मेरा लंड निगल गयी.

फिर बहूरानी मेरे ऊपर झुक गयी; उसके खुले बाल मेरे मुंह पर आ गिरे जिसे उसने मेरे सिर के पीछे करके मेरे मुंह पर एक घरोंदा सा बना दिया और अपनी कमर चलाते हुए मुझसे आंख मिलाते हुए मुझे चोदने लगी. उसके मम्में मेरी छाती पर झूल रहे थे जिन्हें मैंने पकड़ कर झूलने से रोक दिया और उन्हें दबाते हुए बहू के धक्कों का आनन्द लेने लगा.

मेरे ऊपर चढ़ कर गजब की चुदाई की मेरी बहू ने … अपनी चूत से उसने आड़े तिरछे खड़े लम्बवत शॉट्स लगा लगा कर मेरे लंड को निहाल कर दिया.

ऐसे करते करते वे कुछ ही देर में थक गयी- पापाजी बस … अब नांय है मेरे बस का. मुझे अपने नीचे लिटा लो!वो उखड़ी सांसों से बोली.“आजा बेटा, बहुत मेहनत कर ली मेरी प्यारी बहू ने!” मैंने अदिति को चूमते हुए कहा और उसे अपने नीचे लिटा कर उस पर छा गया.

बहूरानी ने झट से अपने पैर ऊपर उठा लिये और अपनी चूत हवा में उठा दी. मैंने देखा कि उसकी चूत का छेद पांच रुपये के सिक्के के बराबर खुला हुआ दिख रहा था और उसके आगे अंधेरी गुफा की सुरंग सी दिख रही थी.मेरे ऐसे देखने से बहूरानी थोड़ा लजा गयी और उसने मेरा सिर अपने मम्मों पर दबा दिया और लंड पकड़ कर उसे ज़न्नत का रास्ता दिखा दिया.

मैंने भी लंड को धकेल दिया अन्दर की तरफ और ताबड़तोड़ शॉट्स लगाने लगा; बहूरानी भी किलकारियां निकालती हुयी चुदने लगी और जल्दी ही वो मेरी पीठ ऊपर से नीचे तक सहलाते हुए, मुझे अपने से लिपटाते हुए अपनी चूत मेरे लंड पर जोर जोर से मारने लगी; उसके इन संकेतों से मैं भलीभांति परिचित था; वो झड़ने की कगार पर आ चुकी थी.

“पापा, संभालो मुझे, कस के पकड़ लो मुझे. मैं तो आ गयी!” वो बोली और मुझसे जोंक की तरह लिपट गयी और अपने पैर मेरी कमर में लॉक कर दिए और उसकी चूत में बाढ़ जैसे हालात हो गये चूत से जैसे झरना बह निकला.इधर मैं भी चुक गया और मेरे लंड ने भी रस की पिचकारियां छोड़नी शुरू कर दीं.

 
हम ससुर बहू यूं ही झड़ते हुए एक दूजे की बांहों में कुछ देर समाये रहे. उसकी चूत संकुचन कर कर के मेरे लंड से वीर्य निचोड़ने लगी. कितना सुखद अनुभव होता है ये जब चूत की मांसपेशियां लंड को जकड़ती और रिलीज करती हैं. ऐसा लगता है जैसे चूत लंड को दुह रही हो.

दीन दुनिया से बेखबर हम दोनों यूं ही कुछ देर और पड़े रहे.

फिर बहूरानी अचानक मुझसे खुद को छुडाने लगी- पापाजी … देखो आठ चालीस हो गये, चाचा जी आने वाले ही होंगे. हटो जल्दी से कपड़े पहनो!

बहूरानी बेसब्री से बोलीं और बेड से उतर कर खड़ी हो गयी, उसकी चूत से मेरे वीर्य और उनके रज का मिश्रण उनकी जांघों पर से बह निकला जिसे उसने जल्दी से अपने घाघरे से पौंछ डाला और अपना घाघरा चोली पहनने लगी. ब्रा पैंटी तो उसने पहले भी नहीं पहन रखी थी, एक मिनट से भी कम टाइम में उसने वही बंजारिन वाली ड्रेस पहन ली.

मैंने टाइम देखा सच में आठ चालीस ही हो रहे थे. मतलब हमें इस कमरे में एक सवा घंटा हो गया था. मैंने फटाफट अपने कपड़े पहने. फिर हमने पलंग का सारा सामान … कपड़े, मिठाई के डिब्बे जैसे रखे थे वैसे ही रख दिए. गहनों वाले संदूक में ताला बंद किया और बाहर आकर रूम को भी लॉक कर दिया.

मैं खुश था कि शादी के इस भीडभाड़ वाले माहौल में भी मुझे अपनी बंजारिन बहू को चोदने का परम सुख मिल गया था.चुदने के बाद बहूरानी पता नहीं कहां गायब हो गयी और मैं वापिस हाल में जाकर बैठ गया.

कोई नौ बजे के क़रीब अदिति बहू के चाचा और चाची मार्केट से आते दिखे. आते ही मेरे पास बैठ गये और शादी, चढ़ावे के सामन वगैरह की बातें करने लगे. अदिति ने उन्हें फोन कर दिया था तो वे होने वाली बहू की पायल दूसरी खरीद लाये थे.

कुछ ही देर बाद अदिति और कम्मो भी आकर वहीं बैठ गयी. मैंने देखा बहूरानी खिली खिली सी प्रसन्न लग रही थी, यह तो होना ही था. औरत जब चुदाई से पूर्णतः तृप्त हो जाती है तो उसका बदन उसे फूल की तरह हल्का फुल्का और चित्त प्रसन्न लगने लगता है.

“चलो सब लोग अब डिनर कर लेते हैं. सवा नौ हो गये. मुझे तो जोर से भूख लगी है अब!” अदिति बोली.“हां हां अदिति क्यों नहीं. चलिए आप सब भी!” अदिति के चाचा जी बोले.

फिर हम लोग बाहर पंडाल में डिनर करने लगे. मैं थोड़ा सा खाना लेकर भीड़ से हट के कुर्सी पर बैठ कर खाने लगा.“अंकल जी दही बड़े लाऊं आपके लिए?” मैंने देखा कम्मो मेरे पास खड़ी मुझसे पूछ रही थी.“हां हां ले आ कम्मो!” मैं बोला.

इसके बाद कम्मो ने मुझे रसगुल्ले भी लाकर दिए. मैंने देखा कि कम्मो अब मुझमें विशेष रूचि ले रही थी. उसकी आंखों में कोई चाहत झिलमिला रही थी. कल उसे मार्केट ले जाकर नया मोबाइल जो दिलवाना था, शायद इसलिए…

तो आरएसएस के मेरी प्रिय पाठिकाओ और पाठको. यह कहानी बस यहीं तक.

आप सबसे विनम्र निवेदन है कि इस कहानी के बारे में अपने विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएं. आपके सुझाव और कमेंट्स मुझे व सभी रचनाकारों को और अच्छा लिखने को प्रेरित करते हैं. आपके विचारों को जानने की प्रतीक्षा रहेगी.

अरे हां … एक बात और. आप सबको लग रहा होगा कि कम्मो का क्या हुआ उसे मोबाइल दिलवाया कि नहीं. तो मित्रो कम्मो की कथा भी आपको पढ़ने को मिलेगी.जल्दी से जल्दी; बस थोड़े से इन्तजार के बाद.

तो दोस्तो ससुर बहु की कहानी यही ख़तम होती है पर कम्मो की कहानी शुरू होती है तो दोस्तो मजा लीजिये धन्यवाद…..सतीश

 
मैंने बताया था कि मैं और बहूरानी उनके चचेरे भाई की शादी में दिल्ली पहुंचे हुए थे जहां मैं अपनी अदिति बहूरानी को बंजारन के वेश में देखकर उस पर मोहित हो गया था और येन केन प्रकारेण उसकी मचलती नंगी जवानी को भोगने में कामयाब भी हो गया था.

उसी शादी में मुझे कमलेश नाम की ग्रामीण बाला भी मिली थी जो कि रिश्ते में मेरी बहूरानी की भतीजी लगती थी यानि मैं एक तरह से उसका दादाजी लगता था. कमलेश के बारे में मैंने पिछली कहानी में बड़े विस्तार से लिखा था जिसमें मैंने उसके व्यवहार और रूप रंग और उसकी कामुक चेष्टाओं का विशद वर्णन किया था. कमलेश को सब लोग कम्मो नाम से ही बुलाते हैं तो अब मैं भी उसे इस कहानी में कम्मो नाम से ही संबोधित करूंगा.

तो पिछली कथा में बात यहां तक पहुंची थी कि बहूरानी ने मुझे कहा था कि मैं कम्मो को मार्केट ले जाऊं और उसे नया स्मार्टफोन दिलवा दूं; पैसे तो कम्मो के पास हैं.

तो मित्रो, पिछली कहानी से आपको याद होगा कि पिछली रात हम सब लोग साथ में डिनर कर रहे थे और कम्मो मुझे बड़े प्यार और अनुराग से सर्व कर रही थी … कभी दही बड़े, कभी रसगुल्ला कभी कुछ कभी कुछ. कहने का मतलब यह कि मुझे अपनी जगह पर से उठाना नहीं पड़ा और कम्मो ने काउन्टर से खाना ला ला कर भरपेट से कुछ ज्यादा ही खिला दिया था. उसके इस चाहत भरे खुशामदी व्यवहार को मैं समझ रहा था कि उसे कल मेरे साथ मार्केट जा के नया फोन जो लेना था.

अब नया फोन लेने की उमंग तरंग क्या कैसी होती है उसका तो हम सबको अनुभव है ही … पर गाँव की कोई लड़की जो अभी तक नोकिया का बाबा आदम के जमाने का टू जी फोन इस्तेमाल कर रही थी, उसका मन कैसे ललचाता होगा स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उंगली फेरने को या व्हाट्सएप, फेसबुक पर अपना खुद का अकाउंट खोलने को और सबसे चैट करने को; क्योंकि अब तो ये सब एप्प्स गांव गांव में मशहूर हैं और जब वो दिन आ ही जाए कि बस अपना नया फोन मिलने ही वाला है तब दिल कैसे खुश और बेकरार रहता है, इस अनुभव से हम सब गुजरे हैं कभी न कभी; वही हाल कम्मो का भी था.

तो अगले दिन सवेरे क़रीब नौ बजे मैं और कम्मो मार्केट जाने के लिए तैयार थे. कम्मो सजधज ली थी अपने हिसाब से; वो जितना खुद को सजा सकती थी, उसने सजा लिया था. अच्छे से बाल संवार कर चोटी गूंथ ली, आँखों में काजल डाल लिया और नया सलवार कुर्ता और दुपट्टा, मेहंदी तो उसके हाथों में पहले ही लगी थी; कहने का लब्बो लुआब यह कि वो खुद को जितना टिपटॉप कर सकती थी, उसने कर लिया था. वैसे खूब सुन्दर लग रही थी वो.

“चलें कम्मो?” मैंने कहा.

“अंकल जी एक मिनट, पैसे लेना तो मैं भूल ही गयी.” वो बोली और भागती हुई किसी कमरे में गयी. वापिस लौटी तो उसके हाथ में रूमाल की पोटली सी थी जिसमें उसके पैसे बंधे हुए थे.

“लो अंकल जी. पैसे आप रख लो. बहुत दिनों से जोड़ रही थी मैं फोन के लिए!” वो बोली और रूमाल मुझे दे दिया.

मैंने रूमाल खोला तो उसमें तरह तरह के नोट बेतरतीब ढंग से उल्टे सीधे मुड़ेतुड़े हुए रखे थे; दस, बीस, पचास, सौ … सब तरह के नोट थे. चार छह नोट पांच पांच सौ के भी थे. अब ये लोग तो ऐसे ही पैसे जोड़ के रखते हैं; जब कभी रुपये हाथ आये तो तह करके रूमाल में बांध लिए. मैंने सारे नोट ठीक ढंग से सेट किये और गिने तो कोई आठ हजार चार सौ कुछ निकले. अब ऐसे चिल्लर नोट ले के फोन खरीदने जाना मुझे बड़ा अटपटा सा लग रहा था तो मैंने अपनी बहूरानी अदिति को बुला कर वो नोट उसे दे दिए और कम्मो को समझा दिया कि ऐसे छोटे छोटे नोट लेकर कुछ खरीदने जाना अच्छा नहीं लगता और उसके फोन का पेमेंट मैं कर दूंगा अपने अकाउंट से.

“पापा जी, कम्मो कह रही थी कि इसे लालकिला भी देखना है. तो इसे आप वहां भी घुमा देना पहले, फिर चांदनी चौक या करोलबाग से फोन खरीद देना.” बहूरानी बोली.

“ठीक है बहू. तो तू पहले कोई टैक्सी बुक कर दे लालकिले के लिये” मैंने बहू से कहा तो उसने अपने फोन से ऊबर की कैब बुक कर दी.

कैब शायद कहीं पास में ही थी, तीन चार मिनट में ही आ गयी. मैंने कैब का दरवाजा खोल कर पहले कम्मो को बैठने दिया फिर खुद जा बैठा और हम चल दिए लाल किले की ओर.

तो दोस्तो, इस तरह मैं और कम्मो तैयार होकर धर्मशाला से निकल लिए.

शादी तो रात में ही होनी थी, लौटने की कोई जल्दी भी नहीं थी. मैंने सब कुछ पहले ही प्लान कर रखा था कि पहले थोड़ा घूम फिर कर किसी रेस्टोरेंट में लंच करेंगे उसके बाद फोन खरीद कर दिल्ली के नज़ारे देखते हुए शाम तक वापिस लौटेंगे.

 
मेरे संग टैक्सी में बैठी हुई कम्मो बहुत उत्साहित थी. वो सबकुछ बड़े अचरज से देख रही थी जो कि स्वाभाविक भी था. गाँव की बाला जिसने अभी तक अपने खेत खलिहान ही देखे थे या आसपास कहीं किसी कस्बे में कभी कभार जाना हुआ होगा. दिल्ली की भीड़, ट्रैफिक, गगनचुम्बी इमारतें और सजे धजे बाज़ार ये सबकुछ अचंभित कर रहा था उसे.

“अंकल जी कितने ऊंचे ऊंचे मकान हैं न यहाँ पर?” वो आश्चर्य से भर कर बोल पड़ी.

“हां कम्मो, दिल्ली में और बड़े शहरों में ऐसे ही ऊंची ऊंची बिल्डिंग्स बनने लगी हैं अब. जगह की कमी है न सो कम जगह में कई मंजिला बिल्डिंग में बहुत से परिवार रह सकते हैं.” मैंने उसे समझाया.

टैक्सी में पिछली सीट पर कम्मो मेरे दायीं तरफ निकट ही बैठी थी, सट के तो नहीं पर हां काफी नजदीक थी कि उसके बदन से उठती हल्की हल्की सी आंच या तपिश मुझे महसूस होने लगी थी. सहारे के लिए कम्मो ने अपना बायां हाथ अगली सीट पर रख रखा था जिससे उसका मेरी साइड वाला स्तन अपने कहर ढाने वाले अंदाज में लुभाने लगा था. उसका उभार उसकी उठान मुझे आमंत्रित सी करती लगती कि दबोच लो, मसल दो या छू ही दो या अपनी कोहनी मार के छेड़ ही दो, हिला दो मुझे.

कम्मो मेरे मन में उठ रहे इन विचारों से अनजान सी बाहर के दृश्य देखने में मगन थी. मैंने जैसे तैसे खुद पर काबू पाया और अपना फोन निकाल कर यूं ही टाइम पास करने लगा. लालकिला तक पहुँचने में कम से कम एक सवा घंटा तो लगना ही था; फिर जैसे ट्रैफिक मिले उस पर भी निर्भर था.

थोड़ी देर यूं ही चलते हुए कैब रेड लाइट पर रुक गयी.

“अंकल जी वो देखो गोलगप्पे वाला, हम यहां रुक कर गोलगप्पे खा सकते हैं न?” कम्मो ने उंगली से इशारा करते हुए मुझसे कहा.

मैंने कम्मो की जांघ पर एक हाथ रखकर आगे झुक कर टैक्सी से बाहर देखने का उपक्रम किया. कुंवारी जवान लड़की की जांघ पर हाथ धरते ही उत्तेजना की लहर मेरे पूरे जिस्म में बिजली की तरह दौड़ गयी; मैंने देखा कि परली तरफ वाली पटरी पर कोई गोलगप्पे का ठेला लगाए था.

“कम्मो ऐसे नहीं रुक सकते यहां, गोलगप्पे भी खा लेंगे अभी बाद में!” मैंने कहा.

“ठीक है अंकल जी!” वो संक्षिप्त स्वर में बोली. मेरा हाथ अभी भी उसकी जांघ पर रखा हुआ था जिसे हटाने का उसने कोई प्रयास नहीं किया.

“कम्मो, और बता तुझे क्या क्या पसंद है खाने में. आज तेरी हर फरमाइश पूरी होगी?” मैंने कहा और उसकी जांघ को हौले से सहलाया. बस इतने से ही मेरे लंड में तनाव भर गया.

“अंकल जी, जो जो आप खिला दोगे, मैं तो सब खा लूंगी आज. बहुत भूखी हूं मैं!” उसने मेरी ओर कनखियों से देखते हुए हंस कर जवाब दिया और अपना सिर सामने वाली सीट से टिका दिया. छोरी कम नहीं थी … इतना समझ आ गया मुझे! और अब मुझे कम्मो को चोद पाने की अपार संभावनाएं नजर आने लगीं थीं.

कम्मो की चूत के बारे में सोचते ही मेरा लंड हिनहिनाया. मैंने देखा कि कम्मो ने अब अपने पैर खोल लिए थे और अगली सीट से सिर टिकाये झुकी हुयी नज़रों से अपने पैरों की तरफ देख रही थी. तो कम्मो का यूं अपनी टाँगें चौड़ी कर देना क्या मेरे लिए आमंत्रण था या वो सिर्फ अपने कम्फर्ट के लिए पैर ऐसे किये बैठी थी?

यह सोचते हुए मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया. मेरी कोई भी हरकत या ओवर एक्टिंग मुझे महंगी भी पड़ सकती थी. यही सोच कर मैंने अपने कदम फूंक फूंक कर रखने का फैसला किया.

“कम्मो बताओ न लंच में क्या क्या खाने का मन है तेरा?” मैंने अपने हाथ का दबाव उसकी जांघ पर बढ़ाते हुए पूछा.

“हम्म्म … अच्छा सोच के बताती हूं.” वो बोली और फिर थोड़ी सीधी होकर सीट से टिक कर बैठ गयी और अपना सिर ऊपर करके सीट की पिछले हिस्से पर टिका लिया और आँखें बंद कर लीं जैसे गहरे सोच में हो.

इधर मेरी उंगलियां फड़क रहीं थीं कि मैं उसकी चूत को सलवार के ऊपर से थोड़ा सा छू कर ही देख लूं. लेकिन मैंने ऐसा करने की हिम्मत या हिमाकत फिलहाल मैंने नहीं की.

“अंकल जी. मैं इडली डोसा वगैरह खाऊंगी. कई साल हो गये एक शादी में खाया था. तब से नहीं मिला खाने को. हमारे गांव में तो कोई बनाता नहीं ऐसी चीजें!” वो सोचकर बोली.

“वैरी गुड. कम्मो … मेरा भी यही सब खाने का मन था.” मैंने उसकी हां में हां मिलाई. कम्मो ने मुझे मुस्कुरा कर देखा और मेरा हाथ अपनी जांघ पर से उठा कर धीरे से मेरी गोद में रख दिया और उसकी उंगलियां मेरे अलसाए से लंड को कुछ पलों तक टच करती रहीं.

 
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