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बहुरानी की प्रेम कहानी complete

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ऐसा कम्मो ने जानबूझ कर किया था या यूं ही उसका हाथ मेरे लंड पर पड़ गया था, मैं कुछ समझ नहीं पाया. पर मेरे मन में खलबली जरूर मच गयी थी. मैं कम्मो को कल से वाच कर रहा था जब वो उन लड़के लड़कियों के साथ मस्ती कर रही थी और ऐसा लगता था कि उसकी उमड़ती भरपूर जवानी उसे चैन नहीं लेने दे रही है और उसकी चूत चीख चीख कर लंड मांग रही है. छोरियों की ये कमसिन उमर होती ही ऐसी है न इन्हें उठते चैन न बैठते चैन और इनके बूब्स में हल्का हल्का मीठा मीठा दर्द हमेशा बना रहता है जिसे किसी मर्द के हाथ ही दूर कर सकते हैं और इनकी चूत का दाना पैंटी से रगड़ रगड़ कर चूत में खुजली किये रहता है और इन्हें चैन नहीं लेने देता.

इस बार मैंने थोड़ी हिम्मत करने की सोची और …

“अच्छा कम्मो चलो अब जरूरी काम की बात करते हैं; ये बताओ तुम्हें फोन कौन सा चाहिये?” मैंने पूछा और उसकी पीठ पर हाथ रख कर अपना मुंह उसके मुंह के पास ले जा कर मध्यम स्वर में पूछा.

“अंकल, अच्छा वाला लूंगी मैं तो!” वो थोड़ा इठला कर बोली.

“अरे अच्छे से अच्छा ही दिलवाएंगे तुझे, मेरे कहने का मतलब तेरे फोन में तुझे क्या क्या देखना है?” ऐसा कहते हुए मैंने अपने हाथ की उँगलियों से उसकी पीठ पर हारमोनियम सी बजाई. बदले में वो स्ट्रेट हो कर बैठ गयी और मेरा हाथ अपनी पीठ से हटा दिया.

“अंकल जी ऐसे गुदगुदी मत करो मुझे बस!” वो थोड़ा रोष से बोली.

“अरे तो क्या हो गया, तू मेरी प्यारी प्यारी छोटी नन्ही मुन्नी सी गुड़िया है न. मेरा हक़ है तुझपे, अरे जब तू इत्ती सी थी न, तब तू पूरी नंगी मेरी गोद में खेला करती थी. याद है न?” मैंने सरासर झूठ बोलते हुए इत्ती सी कह के अपने हाथों से इशारा करके उसे बताया.

“मुझे कुछ याद नहीं अंकल जी … आप मुझे बना तो नहीं रहे न?” कम्मो ने असमंजस से मेरी तरह देखा. वो खुद श्योर नहीं थी कि मैं सच कह रहा था या झूठ.

“अरे बेटा, मैं काहे को झूठ बोलूंगा. तुझे न मानना हो तो मत मान!” मैंने थोड़ी रोनी सी सूरत बना के कहा.

“अच्छा अच्छा ठीक है अंकल जी. मुझे विश्वास है आपकी बात पर!” वो जल्दी से बोली. जाहिर था मेरी रोनी सी सूरत देख के वो मुझपर भरोसा कर गई थी.

“तो फिर तू पहले की तरह बैठ न मेरे बिल्कुल पास, इतने सालों बाद मिली है आज!” मैंने कहा और उसकी कमर में हाथ लपेट कर उसे अपने से चिपका लिया. उसका मेरी तरफ वाला मम्मा मुझसे आ लगा. नर्म गर्म मुलायम बूब के स्पर्श से मुझे रोमांच सा हो आया. जवान लड़की के नाजुक अंगों का किसी मर्द से स्पर्श लड़की को भी बेचैन कर ही डालता है सो वही अनुभूति कम्मो को भी जरूर हुई होगी तभी वो मुझसे एक मिनट बाद ही दूर खिसक गयी.

“अंकल जी, ये सब बाते लालकिले में करेंगे. अभी तो आप फोन की बात कर रहे थे न वही बताओ?”

“हां, अच्छा ये बता कि तुझे अपने फोन में क्या क्या चाहिये?” मैंने पूछा.

“अंकल, गाने बजना चाहिये और वो फेसबुक और भाटइसएप भी चाहिये मुझे. गाँव में मेरी कई सहेलियों के फोन में भाटइसएप है और वो सब अपनी फोटू खींच खींच कर सबको भेजती हैं.” वो बड़ी मासूमियत से बोली.

“अरे भाटइसएप नहीं पगली, वहाट्सएप्प कहते हैं उसे!” मैंने उसे समझाया.

“हां हां मतलब वही. वो तो जरूर चाहिये मुझे!”

“हां हां व्हाट्सएप्प भी होगा तेरे फोन में. तुझे चलाना तो आता है न?”

“हां आता है न अंकल जी. गांव में मेरी सहेलियों के फोन से मैंने भाटइसएप खूब चलाया है. आपके फोन में भी होगा न आप दिखाओ मुझे अच्छा?” कम्मो बोली.

मैंने अपना फोन निकाला और उसे अनलॉक करके कम्मो को दे दिया. कम्मो फोन की स्क्रीन देखने लगी. व्हाट्सएप्प का आइकॉन सामने ही था.

“देखो अंकल जी ये हरा वाला गोला जिसमें फोन का निशान है यही है न भाटइसएप?” वो खुश होकर बोली.

“हां कम्मो यही है, तू तो बड़ी होशियार है री!” मैंने हंस कर कहा.

“और ये रहा फेसबुक!” उसने मुझे दिखाया.

“अरे तू तो सब जानती है. चल तुझे इससे भी बढ़िया फोन दिला देता हूं.” मैंने कहा.

“ठीक है अंकल जी. मैं आपका फोन देखूं थोड़ी देर?” उसने पूछा.

“हां हां देख ले. इसमें पूछना क्या?” मैंने उसे कहा.

“ठीक है अंकल जी मैं तो भाटइसएप चला कर देखूंगी अभी!” वो बोली और उसने व्हाट्सएप्प पर टच करके उसे ओपन कर दिया और मेरे कॉन्टेक्ट्स के कन्टेन्ट्स देखने लगी.

मैं टैक्सी की खिड़की की तरफ खिसक गया और बाहर देखने लगा पर मेरा ध्यान फोन पर भी था क्योंकि मैं अपने कुछ दोस्तों से एडल्ट कंटेंट्स भी शेयर करता था. लड़कियों के नंगे फोटो, वीडियो, अश्लील जोक्स वगैरह. मैं यही चाह रहा था कि कम्मो वो सब देख ले तो मेरा मिशन और आसान हो जाएगा.

और कम्मो ने वही किया. उसने मेरे एक ऐसे ही दोस्त का मैसेज खोल दिया. फोन की स्क्रीन पर देसी नंगी जवान लड़की अपने पैर खोले एक हाथ में फुट भर लम्बा काला मोटा डिल्डो लिए चूस रही थी और दूसरे हाथ की उँगलियों से उसने अपनी चिकनी चूत खोल रखी थी.

वो फोटो खुलते ही कम्मो थोड़ी घबरा सी गयी और उसने फोन की स्क्रीन को अपने हाथ से छुपा लिया. इधर मैंने जानबूझ कर बाहर देखना चालू रखा, जैसे मुझे पता ही न हो कि कम्मो क्या देख रही है.

कम्मो भी टैक्सी की दूसरी ओर की खिड़की के पास खिसक गयी और मजे से वो सब क्सक्सक्स नंगे फोटो और चुदाई के वीडियो देखती रही. कोई तीन चार मिनट बाद ही कम्मो ने अपनी पैर अच्छी तरह से खोल दिये जिससे उसकी जांघें खूब चौड़ी हो गयीं फिर उसने मेरी तरफ कनखियों से देखा कि कहीं मैं उसे वाच तो नहीं कर रहा. फिर उसने मेरे मोबाइल में देखते हुए अपनी टांगों के बीच हाथ ले जाकर जल्दी जल्दी कहीं खुजाया और कुछ देर अपना हाथ वहीं रखे रही; मैं समझ गया कि वो अपनी चूत का दाना मसल रही थी या चूत से खेल रही थी.

मैं टैक्सी के बाहर देख जरूर रहा था पर मेरा ध्यान कम्मो पर ही था कि वो क्या क्या कर रही है.

कोई पंद्रह बीस मिनट तक हो यूं ही मेरा फोन खंगालती रही. फिर उसने फोन वहीं सीट पर रख दिया और सामने वाली सीट से सिर टिका कर आँखें मूंद कर गहरी गहरी सांसें लेने लगी. सांस के उतार चढ़ाव के साथ उसके बूब्स भी जैसे उठ बैठ रहे थे. उसकी चूत भी जरूर पक्का गीली हो चुकी होगी.

मैंने जानबूझ कर उससे कोई बात नहीं की. मैं चाहता था कि वो सामान्य महसूस करने लगे तब उससे कुछ कहूं.

फिर थोड़ी देर बाद …

जवान लड़की की चाहत की कहानी जारी रहेगी.

 
देसी गर्ल कम्मो मजे से वो सब नंगे फोटो और चुदाई के वीडियो देखती रही. फिर उसने मेरे मोबाइल में देखते हुए अपनी टांगों के बीच हाथ ले जाकर जल्दी जल्दी कहीं खुजाया और कुछ देर अपना हाथ वहीं रखे रही; मैं समझ गया कि वो अपनी चूत का दाना मसल रही थी.

कोई पंद्रह मिनट तक हो यूं ही मेरा फोन खंगालती रही. फिर उसने फोन वहीं सीट पर रख दिया और सामने वाली सीट से सिर टिका कर आँखें मूंद कर गहरी गहरी सांसें लेने लगी. सांस के उतार चढ़ाव के साथ उसके बूब्स भी जैसे उठ बैठ रहे थे. उसकी चूत भी जरूर पक्का गीली हो चुकी होगी.

फिर थोड़ी देर बाद …

“क्या हुआ कम्मो नींद आ रही है तुझे?” मैंने उसे कहा.

“नहीं तो. मैं बस ऐसे ही ऊंघ रही थी.” वो बोली और सीधी बैठ गयी.

मैंने देखा उसका गुलाबी चेहरा और भी गहरा गुलाबी हो उठा था. उसकी आँखों में लाली तैर रही थी जैसे नशे में हो और चेहरे पर जैसे हवाइयां सीं उड़ रहीं थीं. ये सब लक्षण इस बात के परिचायक थे कि उसकी गीली चूत बुरी तरह फड़क रही थी, वो वासना की आग में झुलस रही थी. चुदवाने की लालसा उसके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी. मैं जैसा चाहता था ठीक वैसा ही असर हुआ था उस पर. मैं जिस मुकाम पर उसे लाना चाहता था वो आ चुकी थी. आग लग चुकी थी उसकी टांगों के बीच में. अब आगे के हालात मुझे बड़े चातुर्य से सम्भालने थे. अनजान शहर में किसी भी परिचित जवान लड़की या महिला की पैंटी उतरवा कर उसकी टाँगें उठवा देना इतना आसान भी नहीं होता चाहे वो कितनी भी चुदासी लंड की प्यासी और चुदने को पूरी तरह तैयार ही क्यों न हो.

हर लड़की या औरत पहले सुरक्षित माहौल चाहती है. अतः मैंने सोच लिया कि मुझे बहुत ही सावधानी से आगे बढ़ना है. एक तो दिल्ली जैसा अनजाना शहर, राजधानी है देश की; जहां कदम कदम पर सी सी टीवी कैमरे लगे हैं. कोई लफड़ा हो गया तो कौन संभालेगा. और मान लो अगर कम्मो चुदने को राजी है भी तो मैं उसे चोदूंगा कहां?

किसी होटल में जाना भी खतरे से खाली नहीं है. एक तो देसी गर्ल कम्मो की वेश भूषा उसका बोल चाल, उसकी बॉडी लैंग्वेज … बात करने का तरीका एकदम देहाती स्टाइल वाला है तो ऐसी लड़की का मेरे साथ होटल में जाना लोगों को अटपटा लगेगा और खटकेगा ही, फिर सबसे बड़ी बात हमारे पास कोई सूटकेस या अन्य कोई सामान भी नहीं है. यूं खाली हाथ मुंह उठाये किसी होटल में चेक इन करना अपनी मुसीबत बुलाने जैसा ही है, अगर बात बिगड़ गयी तो मैं तो कुछ कर नहीं पाऊंगा और कई लोग मिल कर कम्मो को जरूर नोंच डालेंगे. हो सकता है पुलिस केस भी बन जाए और शाम की ब्रेकिंग न्यूज़ में मैं सुर्ख़ियों में आ जाऊं; दिल्ली तो वैसे ही देह शोषणकर्ताओं से भरी पड़ी है.

नहीं नहीं … मैं कम्मो पर कोई आंच आने नहीं दे सकता. लड़की जात है, सफ़ेद बेदाग़ कोरी चादर जैसी होती है जरा सा दाग लग जाए तो फिर जिंदगी भर पीछा नहीं छोड़ता.

ऐसे सोचते सोचते मुझे उस निर्भया का केस याद हो आया और मुझे पसीना आ गया. फिर सोचा कि दिल्ली में ऐसे होटल भी जरूर होंगे जहां लोग लड़की लेके जाते होंगे घंटे दो घंटे के लिए पर मुझे वो सब नहीं पता था. मतलब होटल में जाने का ऑप्शन किसी काम का नहीं.

तो फिर ऐसे में और क्या ऑप्शन हो सकता है? सबसे बड़ी बात कि मेरे पास और रुकने का टाइम भी नहीं है, आज रात में शादी है और कल शाम को मेरा वापिस घर अकेले जाने का तय था, ट्रेन की कन्फर्म टिकट जो थी. मेरी बहूरानी अदिति को तो अभी कुछ दिन रुक कर अपनी नयी भाभी के साथ कुछ दिन बिता कर बाद में फ्लाइट से वापिस बंगलौर जाना था.

तो क्या मैं अपना जाना कैंसिल करके अदिति बहूरानी की हेल्प लूं कम्मो को चोदने में? वही कोई जुगाड़ फिट कर सकती थी धर्मशाला में … पर क्या बहूरानी तैयार होगी इसके लिए?

नहीं, वो कभी नहीं राजी होगी ऐसा काम करवाने के लिए. मैं खूब समझता हूं अपनी बहू के नेचर को. हमारे बीच जो अनैतिक सम्बन्ध परिस्थितिवश बने वो अलग बात है पर मैं अच्छे से जानता हूं मेरी बहू कोई बिगड़ी या बदचलन नहीं है जो मुझे कोई लड़की पटा के सौंप दे और चुदाई की व्यवस्था भी बना दे.

और मैं किस मुंह से बहू से कहूंगा कि मुझे उसकी भतीजी कम्मो की चूत मारनी है तू जगह का इंतजाम कर दे? नहीं … मैं ऐसी ओछी और घटिया बात अपने मुंह से कभी नहीं निकाल सकता; अगर कह भी दिया तो एक तो बहू कभी मानने वाली नहीं है दूसरे मैं उसकी नज़रों से और हमेशा के लिए गिर जाऊंगा और जो उसकी चूत का सहारा अभी है वो भी छिन जाएगा मुझसे.

अब या तो जो कुछ करना है अपने बलबूते पर करना है या नहीं … और फिर अभी कम्मो ही कौन से तैयार हो गयी है चुदने के लिए!

ऐसी ऐसी बातें सोचते सोचते मेरा दिमाग भन्ना गया. अन्त में तय किया कि कम्मो की चुदाई कैंसिल. मैं कोई रिस्क नहीं ले सकता. हां इतना जरूर करूंगा कि कहीं कोई मौका देख कर चूमा चाटी हो जाय और कम्मोके मम्में दबाने सहलाने को मिल जायें बस. वो कहते हैं न कि भागते भूत की लंगोटी भी बहुत होती है.

देसी गर्ल के साथ सेक्स की कहानी जारी रहेगी.

 
“अंकल जी, कहां खोये हुए हो इतनी देर से?” कम्मो ने बोलते हुए मुझे कंधे से हिलाया.

“हें … अरे कुछ नहीं. ऐसे ही घर के बारे में सोच रहा था. तेरी दादी वहां अकेली है न!” मैंने कहा.

“क्या अंकल जी आप भी … उन्हें दादी मत कहिये. रिश्ते से दादी होंगी पर अभी ऐसी उमर नहीं आप लोगों की. मैं तो आंटी कह के बुलाऊंगी उन्हें!” वो चहक कर बोली.

“अच्छा जैसी तेरी मर्जी. तू तो प्यारी प्यारी गुड़िया है न मेरी!” मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और वो मेरे कंधे से आ लगी और अपने हाथ से मेरी छाती सहलाने लगी. प्रत्युत्तर में मैं उसकी पीठ सहलाने लगा और उसकी ब्रा के स्ट्रेप्स से खेलने लगा. उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया.

हमारी टैक्सी लाल किले के निकट पहुंच रही थी; किले की गुम्बदें साफ़ दिखाई देने लगीं थीं इधर कम्मो की जांघों के बीच छुपा लालकिला भी मुझे ही पुकार रहा था जिस पर मुझे चढ़ाई करके जीतना था पर सुरक्षित जगह की वजह से पता नहीं जीत भी पाऊंगा या नहीं.

टैक्सी से उतर कर हम लाल किले के सामने जा खड़े हुए. कम्मो तो अवाक् सी उसे देखती रह गयी.

“हाय दैय्या … अंकल जी ये तो बहुत बड़ा है.” कम्मो बालसुलभ आश्चर्य से बोली.

“हां कम्मो बेटा … चलो देखते हैं भीतर से!” मैंने कहा.

लाल किले पहुंच कर हमने पूरा किला घूम डाला. घूमते घूमते थकावट भी होने लगी थी. वहां एक बड़े से हाल में, जिसे शायद दीवाने आम या दीवाने ख़ास कहते होंगे, एक बड़ा से तख़्त जिस पर पीतल की नक्काशी थी उसे देख कर कम्मो उसी पर जा बैठी.

“अंकल जी, थक गयी मैं तो. दो मिनट बैठ लूं फिर चलते हैं.” कम्मो बोली और अपनी चप्पल उतार कर पांव ऊपर कर के पालथी मार के बैठ गयी.

“अरे, ये शाहजहाँ का तख़्त है. उस पर बैठना मना है; अरे मत बैठो अभी कोई टोक देगा आकर!” मैंने कम्मो को मना किया.

“अंकल जी तखत खाली ही तो पड़ा है, जब शाहजहाँ जी आयेंगे तो मैं उठ जाऊँगी पक्का, चलते चलते पांव दुःख गये मेरे तो अभी दो मिनट आराम कर लूं बस!” वो बड़ी मासूमियत से बोली.

उसकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गयी. सोचा कि ये कौन सी किसी शहजादी से कम है.

लाकिला देखने वालों की काफी भीड़ थी उस दिन. देसी विदेशी सब तरह के लोगों के झुंड के झुंड इस प्राचीन धरोहर को निहार रहे थे. तभी एक विदेशी लड़की हमारी ओर आती दिखी. देखने में 25-26 की लगती थी, उसका टॉप इतना ढीला था की उसकी पूरी छातियां दिख रहीं थीं; उसके मम्मों के चूचुक जैसे तैसे छुपे हुए थे बस और उसका स्किन कलर का लोअर बेहद पतले कपड़े का था जो उसके जिस्म से चिपका हुआ था और उसमें से उसकी जांघों के बीच फूला फूला सा वो त्रिभुज और बीच की लकीर जिसे पोर्न की भाषा में कैमल-टो कहते हैं, कहर ढाने वाले अंदाज़ में दिख रही थी. अगर गौर से देखो तो उसकी चूत का दाना भी उसकी खुली दरार से नज़र आ ही जाता. इन पश्चिमी देशों के ठन्डे देशों की औरतों की चूत वैसे भी काफी लम्बी, मोटी और खूब गहरी होती है जैसा हमने पोर्न फिल्मों में देखा ही है. पर वो इन सबसे बेखबर अपनी ही धुन में मगन चलती हुई निकल गयी.

मैंने देखा कम्मो की नज़र भी उसकी विदेशी बाला की चूत पर ही जमीं थी. मैंने उसकी ओर देखा तो उसने हंस कर अपना मुंह उस तरफ फेर लिया.

“क्या हुआ री कम्मो, तू हंस क्यों रही है उस बेचारी को देख के?”

“अच्छा बड़ी बेचारी लग रही है वो आपको; मैं तो न देख रही थी उसे. मैं तो जे देख री थी की आप कैसे लट्टू हुए जा रहे हो उसे देख देख के!” कम्मो ने मुझे उलाहना सा दिया.

“अरे मैं क्यों लट्टू होऊंगा उसे देख के. तू जो है मेरे साथ!” मैंने हिम्मत करके कह दिया. मेरी बात का अर्थ समझ के कम्मो का मुंह शर्म से लाल पड़ गया उसने अपना निचला होंठ दांतों से दबा कर हंसती हुई आँखों से मुझे देखा पर कहा कुछ नहीं.

मेरे लिए यह अच्छा संकेत था कि मैं सही जा रहा था.

वहां से निकल कर हम लोग मीना बाज़ार की रौनक देखने लगे. मीना बाज़ार तो एक तरह से इन छोरियों के मतलब का ही है, इन्हीं के साज सिंगार का सामान बिकता है वहां.

कम्मो का वहां खूब मन लगा. उसने कुछ खरीदारी भी की और खुश हो गयी.

लालकिले से बाहर आये तो एक बज चुका था और हमें हल्की हल्की भूख भी लग आई थी.

“चलो कम्मो अब खाना खा लेते हैं, बताओ क्या खाओगी?”

“अंकल जी, मैंने कहा था न अभी आपसे कि मुझे तो डोसा इडली खाने का मन है. यहां कहीं मिले तो वही खाना है मुझे!”

“ठीक है गुड़िया, चलो चांदनी चौक चलते हैं वहीं खायेंगे” मैंने कहा और हम लोग चल पड़े.

 


डोसा इडली वगैरह साउथ इंडियन फ़ूड खाने की मेरी पसंदीदा जगह तो वैसे इंडियन कॉफ़ी हाउस है; क्योंकि वहां जैसा स्वाद कहीं और मिलता ही नहीं है. कारण है कि जिसके देस का खाना हो उसी के हाथ का बना अच्छा लगता है. यूं तो उत्तर भारत में साउथ इंडियन खाने के तमाम रेस्टोरेंट्स हैं पर वो स्वाद आ ही नहीं पाता. लगभग हर बड़े शहर में इंडियन कॉफ़ी हाउस की शाखाएं हैं. यहां दिल्ली में भी कई ब्रांचेज होंगी पर वो सब देखने ढूँढने का समय नहीं था हमारे पास.

“अंकल जी, एक बात कहूं?” कम्मो चलते चलते बोली.

“हां हां कहो बेटा क्या बात है?”

“अंकल जी, पहले हम लोग फोन खरीद लेते हैं. खाना उसके बाद खा लेंगे” कम्मो थोड़ी व्यग्रता से बोली. मैं कम्मो के मन की व्यग्रता और चाह समझ रहा था. उसका मन तो फोन में ही अटका था. सही भी था वो अपने फोन लेने, देखने, छूने, महसूस करने की जल्दबाजी स्वाभाविक भी थी.

“ठीक है कम्मो. चलो पहले फोन ही लेते हैं” मैंने कहा.

मैंने वहीं पास की दूकान से फोन की दुकानों की जानकारी ले ली; पास में ही कई दुकानें थीं.

वहीं एक मोबाइल स्टोर में हमलोग जा पहुंचे. उनके शो केस में तमाम फोन लगे थे.

मैंने कम्मो से कह दिया कि कोई भी फोन पसंद कर ले.

“अंकल जी, फोन बाहर से देखने से क्या; इनके अन्दर क्या अच्छा है क्या बुरा है, कौन सा लेना ठीक रहेगा ये तो आप ही समझ सकते हो.” वो बोली.

बात तो सही थी कम्मो की. फोन्स की टेक्निकल बातें वो क्या जाने. मैंने इस बारे में दुकानदार से बात की तो उसने लेटेस्ट फोन्स के रिव्यू मुझे नेट पर पढ़ने की सलाह दी. तो मैंने वहीं बैठ कर अपने फोन से तमाम फोन्स के रिव्यू चेक किये. मैंने दो तीन फोन सिलेक्ट करके उन्हें नेट पर कम्पेयर करके देखा. कम्मो के हिसाब से मुझे रेडमी का नोट 5 प्रो ज्यादा अच्छा लगा, तेरह हजार के क़रीब कीमत थी. मैंने दुकानदार से वही दिखाने को कहा. दुकानदार ने रेडमी नोट 5 प्रो का सेट शो केस से निकाल कर हमें दे दिया.

“देख कम्मो ये वाला ले ले अच्छा रहेगा तेरे लिए!” मैंने कहा. तो कम्मो ने मेरे हाथ से फोन ले लिया और उस पर हाथ फिरा कर उलट पलट कर देखा.

“अंकल जी कितने का है ये?” कम्मो ने पूछा.

“तेरह हजार के आस पास है. लेकिन तू पैसे की चिंता मत कर!” मैंने कहा

“नहीं अंकल जी. मुझे तो जो फोन मेरे आठ हजार में आ जाए वही दिलवा दो आप तो!” वो जोर देकर बोली.

“अरे बेटा फोन तो दो हजार में भी मिल जाएगा. पर तू पैसों की मत सोच. मैं भी तो तेरा कुछ लगता हूं कि नहीं?” मैंने उसे ऐसे तरह तरह से समझाया.

अन्त में कम्मो झिझकते हुए मान गयी और उसने डार्क ब्राउन कलर का फोन सेलेक्ट कर लिया. मैंने दुकानदार से फोन का सील्ड पैकेट मांगा तो उसने भीतर से लाकर दे दिया. मैंने अपने फोन से पेमेंट कर दिया और बिल कमलेश के नाम से बनवा दिया. इसके बाद वहीं पास के जियो सेंटर से मैंने जियो की नयी सिम भी अपने आधार कार्ड से ले कर एक्टिवेट करवा कर ले ली. उम्मीद थी की थोड़ी देर में सिम चालू हो जायेगी.

“अंकल जी, चलो अब खाना खाते हैं. जोरों की भूख लग गयी अब तो!” कम्मो बोली.

“ओके बेटा चलो!” मैंने कहा.

हम लोग आगे चांदनी चौक में चल रहे थे. रास्ते में किसी से मैंने पूछा तो उन्होंने मुझे साउथ इंडियन फ़ूड के एक अच्छे रेस्तरां का रास्ता समझा दिया.

वहां पहुंच कर हम दोनों एक फॅमिली केबिन में जा बैठे और मीनू कार्ड देखकर, कम्मो से पूछ पूछ कर खाने का आर्डर कर दिया.

“सर बीस पच्चीस मिनट लगेंगे आर्डर लाने में!” वेटर बोला.

“ओके ठीक है!” मैंने कहा.

वेटर के जाते ही मैंने केबिन का मुआयना किया. वहां एक अच्छे किस्म का सोफा डला हुआ था सामने कांच की सुन्दर मेज थी जिस पर प्लास्टिक के फूलों से सजा गुलदस्ता रखा था. रौशनी की लिए अच्छे डेकोरेटिव वाल लैम्प्स लगे थे जो पर्याप्त रोशनी बिखेर रहे थे. मैंने खूब बारीकी से चेक किया केबिन में कोई भी सीसीटीवी कैमरा नहीं था; केबिन का दरवाजा भी ठीक ठाक था; कहने का मतलब वहां पूरी प्राइवेसी थी. एसी की कूलिंग भी बढ़िया थी. हम लोग धूप में चल कर आये थे तो एसी कुछ ज्यादा ही सुखद लग रहा था.

अब मैं और देसी गर्ल कम्मो अगल बगल में सट कर बैठे थे. फोन लेकर कम्मो बहुत खुश नजर आ रही थी.

“अब तो खुश न?” मैंने उससे कहा.

“हां अंकल जी. थैंक यू” वो हंस कर बोली.

“सिर्फ थैंक यू? कंजूस कहीं की!” मैंने कहा.

“फिर?”

“अरे एक चुम्मी ही दे देतीं कम से कम!” मैंने तपाक से कहा.

देसी गर्ल के साथ सेक्स की कहानी जारी रहेगी

 
फोन लेकर कम्मो बहुत खुश नजर आ रही थी. हम रेस्तरां के केबिन में बैठे थे.

“अब तो खुश न?” मैंने उससे कहा.

“हां अंकल जी. थैंक यू” वो हंस कर बोली.

“सिर्फ थैंक यू? कंजूस कहीं की!” मैंने कहा.

“फिर?”

“अरे एक चुम्मी ही दे देतीं कम से कम!” मैंने तपाक से कहा.

“अच्छा लो अंकल जी ले लो!” कम्मो ने कहा और अपना मुंह मेरी तरफ बढ़ा दिया.

मैंने कम्मो की कमर में हाथ डाल कर उसे अपने से चिपका लिया और उसका माथा गाल कई कई बार चूम डाले. फिर तो मुझ पर जैसे दीवानगी सी सवार हो गयी. मैं कम्मो को सब जगह चूमता चला गया उसके गाल, गला गर्दन और फिर हमारे होंठ कब एक दूसरे के होंठों से जुड़ गये पता ही न चला.

‘कुंवारी कन्या के अधरों का प्रथम रसपान का स्वाद कितना अलौकिक कितना मधुर होता है.’ ये मैंने उस दिन जाना.

कम्मो कोई विरोध नहीं कर रही थी वरन वो भी मेरे संग बहती सी चली जा रही थी की जहां नियति ले जाये वहीं चले चलें जैसी मनःस्थिति थी हम दोनों की.

जो कुछ हो रहा था वो जैसे स्वयं ही, बिना हमारे कुछ किये ही हो रहा था. मैंने कब कम्मो के उरोज दबोच लिए और उन्हें कब मसलने लगा मुझे खुद याद नहीं.

“अंकल जी धीरे … इत्त्ति जोर से नहीं; दुखते हैं.” कम्मो कांपती सी आवाज में बोली. मुझे होश सा आया तो मैंने देखा कि मेरा हाथ कम्मो के कुर्ते के अन्दर उसकी ब्रा के भीतर उसके नग्न स्तनों को मसल रहा था … गूंथ रहा था …मसल रहा था. उसके फूल से कोमल स्तन मेरी सख्त मुट्ठी में जैसे कराह से रहे थे. मुझे अपनी स्थिति का भान हुआ तो मैंने अपना हाथ उसकी ब्रा से बाहर निकाल लिया.

मैंने देखा तो कम्मो की नज़रें झुकी हुयीं थीं. मैंने उसे फिर से अपनी बांहों में भर लिया और उसका निचला होंठ चूसने लगा. साथ में मेरा एक हाथ उसकी जांघों को सहलाए जा रहा था.

अब कम्मो भी चुम्बन में मेरा साथ देने लगी थी और उसकी पैर स्वयमेव खुल से गये थे. मेरा हाथ उसकी जांघों के जोड़ पर जा पहुंचा और अपनी मंजिल को सलवार के ऊपर से ही छू लिया और धीरे से मसल दिया.

पुरुष के हाथों की छुअन का असर, उसकी तासीर लड़की के जिस्म पर जादू के जैसा असर दिखाती है. विशेष तौर पर अगर उसके स्तनों या चूत को छेड़ दिया जाए तो.

कम्मो की चूत पर मेरा हाथ लगते ही वो मोम की तरह पिघल गयी और कम्मो ने चुम्बन तोड़ कर अपना सिर मेज पर झुका दिया. मेरी उंगलियाँ सलवार के ऊपर से ही उसकी चूत से खेलती रहीं, मसलती रहीं, चूत की दरार में घुसने का प्रयास करती रहीं पर सलवार के ऊपर से ऐसा हो पाना संभव ही नहीं था. हां कम्मो की झांटों का झुरमुट मुझे अच्छी तरह से महसूस हो रहा था.

लेकिन सिर्फ इतने भर से ही मुझे संतोष होने वाला नहीं था, पता नहीं कम्मो लंड से चोदने को मिले न मिले क्योंकि जगह की समस्या बनी हुई थी; पर मैं उसकी नंगी चूत से तो खेल ही सकता था. इसी धुन में मैंने उसकी कुर्ती पेट के ऊपर से ऊपर की तरफ सरका दी इससे उसका पेट अनावृत हो गया. उफ्फ क्या मखमली जिस्म पाया था कम्मो ने!

मैंने उसके पेट को सहलाया और फिर उसकी नाभि में उंगली रख के हिलाया; इतने से ही कम्मो हिल गयी और उसकी हंसी छूट गयी- अंकल जी गुदगुदी मत करो ऐसे!

वो अपने मुंह पर हाथ रख कर खिलखिलाते हुए बोली.

लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी करते हुए अपना हाथ झटके से उसकी सलवार में घुसा दिया और इससे पहले कि कम्मो कुछ समझ पाती या संभल पाती मैंने उसकी पैंटी की इलास्टिक के नीचे से उंगलियां अन्दर सरका दीं और उसकी नंगी झांटों भरी चूत मेरी मुट्ठी में कैद हो गयी; मुझे लगा जैसी कोई ताजा मुलायम नर्म गर्म पाव मैंने पकड़ रखा हो. मेरी हसरत पूरी हो चुकी थी. कम्मो की इज्जत मेरी मुट्ठी में कैद थी.

उसका लालकिला मेरे अधिकार में आ चुका था बस अब उसमें प्रवेश करके उसे भोगना, उस पर राज करना, उसकी प्राचीर की सवारी करना भर शेष रह गया था.

मैंने अपनी मुट्ठी खोल के हथेली उसकी चूत से चिपका दी और झांटों को सहलाता, खींचता हुआ उसकी चूत से खेलने लगा; बीच बीच में मैं उसकी झांटें हौले से खींच लेता तो वो चिहुंक पड़ती. उसकी गद्देदार नंगी चूत को यूं सहलाने का आनन्द ही अलग आ रहा था. चूत की फांकें आपस में चिपकी हुईं थीं मैंने दरार में उंगली ऊपर से नीचे तक और नीचे से ऊपर तक फिरा दी.

कम्मो ने मेरा कन्धा पकड़ कर जोर से अपने नाखून मेरे कंधे में गड़ा दिए, शायद उत्तेजना वश उसने ऐसा किया होगा.

अब मैं उसकी चूत को मुट्ठी में भर कर दबाने, मसलने के साथ साथ दरार में कुरेदने लगा; उसकी चूत के रस से मेरा हाथ चिपचिपा हो गया. फिर मैंने अपने अंगूठे को चूतरस से गीला करके उसकी चूत का दाना टटोलने लगा, अंगूठे से अनारदाने को छेड़ने लगा.

लड़की की क्लिट को छेड़ो और वो चुदने को न मचल जाए ऐसा तो हो ही नहीं सकता. कम्मो ने भी अपना जिस्म ढीला छोड़ दिया और आनन्द से आंखें मूंद लीं और और अपने पैर और चौड़े कर दिए इससे उसकी चूत और खुल गयी और मुझे उससे खेलने के लिए ज्यादा स्थान मिलने लगा.

जवानी की प्यास की कहानी जारी रहेगी.

रहेगी

 
लड़की की क्लिट को छेड़ो और वो चुदने को न मचल जाए ऐसा तो हो ही नहीं सकता. कम्मो ने भी अपना जिस्म ढीला छोड़ दिया और आनन्द से आंखें मूंद लीं और और अपने पैर और चौड़े कर दिए इससे उसकी चूत और खुल गयी और मुझे उससे खेलने के लिए ज्यादा स्थान मिलने लगा.

ऐसा कोई एक डेढ़ मिनट ही चला होगा कि वो मेरा हाथ अपनी चूत पर से हटाने का प्रयास करने लगी. वो मेरा हाथ अपनी चूत से हटाने का भरपूर प्रयास करती लग रही थी. लेकिन उसके हाथ में शक्ति नहीं बस एक तरह की रस्म अदायगी सी लगी मुझे. कि कहीं मैं उसे इतना बेशर्म, इतनी चीप न समझ लूं कि मैं उसकी चूत को छेड़ रहा था और वो चुपचाप बिना कोई प्रतिवाद किये अपनी चूत में उंगली करवाते हुए चुपचाप मजा लेती रही थी.

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“बस भी करो अंकल जी, कोई देख लेगा. वो नौकर खाना लेकर भी आता होगा!” कम्मो ने मुझे अपने से दूर हटाया और खुद दूर खिसक कर बैठ गयी.

मैं भी जैसे होश में आ गया; कुछ समय के लिए मैं भूल ही बैठा था कि हम लोग किसी होटल के फॅमिली केबिन में बैठे हैं. मैंने कम्मो की ओर देखा तो ऐसा लगा जैसे वो मीलों दौड़ के आई हो. मेरा भी यही हाल था.

मैंने जो कभी बिल्कुल भी नहीं सोचा था, न प्लान किया था कम्मो के संग वही कर बैठा था मैं. मेरी कनपटियां तप रहीं थीं और लंड भी तनाव में आ चुका था; पैंट के नीचे दबे होने से लंड बुरी तरह अकड़ गया था और उसमें हल्का हल्का दर्द सा भी होने लगा था.

मैंने कम्मो का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो उसने इन्कार में सिर हिलाया फिर मैंने जोर से खींचा तो वो मुझसे आ लगी और मैंने उसे फिर से चूम लिया.

“कम्मो, मेरी बात का बुरा तो नहीं लगा न?” पता नहीं अचानक मुझे वो क्या हो गया था. मैंने उसकी बगल में हाथ ले जा कर उसका दायां वाला स्तन सहलाते हुए पूछा.

वो चुप रही, कुछ नहीं बोली और न ही कोई प्रतिवाद किया.

“बता न कम्मो” मैंने थोड़ा जोर देकर पूछा और उसका बूब कस के मसल दिया.

“अंकल जी, यहां कुछ मत करो कोई देख लेगा तो गड़बड़ हो जायेगी.” वो धीमे से बोली.

उसके कहने का मतलब साफ़ था कि उसे इस छेड़छाड़ से कोई आपत्ति नहीं थी. बस किसी के देखे जाने का डर था. मतलब मेरे लिए ग्रीन सिग्नल था कि कम्मो चुदने के लिए पूरी तरह से तैयार थी.

“हाथ हटा लो अपना प्लीज!” वो बोली.

मैंने उसका बूब छोड़ दिया. वो भी थोड़ा हट के बैठ गयी. इतने में वेटर भी खाना ले आया और उसने मेज पर सजा दिया.

इडली, मसाला डोसा, सांभर, नारियल की चटनी, वड़ा सब कुछ सामने मेज पर सजा था और साथ में छुरी और कांटे भी. कम्मो ने छुरी कांटो को असमंजस से देखा तो मैं उसका मतलब समझ गया.

“कम्मो, चल हाथ से खाते हैं. ये कांटे वांटे हटा दे एक तरफ!” मैंने कहा और खाना शुरू किया.

“अंकल जी, हाथ तो धो लेते कम से कम!” कम्मो ने मुझे टोका.

“क्यों हाथ में क्या हुआ?” मैंने पूछा.

“अच्छा! अभी मेरे वहां हाथ नहीं लगाया आपने उस गन्दी जगह में!” वो सिर झुका कर बोली.

“अरे जाने दे यार. वो कोई गन्दी नहीं होती. चूत का रस तो बहुत हेल्दी होता है, अभी तो तेरी चूत चाटनी भी है मुझे!” मैंने खाते खाते कहा.

“छीः कितने गंदे हो न अंकल आप!” वो मुझे झिड़कते हुए बोली.

मैं हंस के रह गया और खाने पर ध्यान लगाया. वो भी कुछ नहीं बोली और मजे से खाना खाती रही. खाने के बाद मैंने रसगुल्ले और आइसक्रीम भी आर्डर कर दिया.

इस तरह खा पी कर हम लोग तृप्त हो गये. कम्मो भी खूब खुश लग रही थी.

रेस्टोरेंट से निकल कर हम लोग चांदनी चौक का बाज़ार घूमने लगे. अब मैं और कम्मो एक दूसरे का हाथ पकड़े चल रहे थे; किसी भी तरह की शर्म झिझक हमारे बीच नहीं रह गयी थी. वो रिश्तेदारी वाला रिश्ता हम भूल चुके थे और स्त्री पुरुष वाले रिश्ते में हम बंध चुके थे. सो कम्मो भी अब किसी बिंदास प्रेमिका की तरह मेरे साथ निभा रही थी.

इस मस्त छोरी की अल्हड़ जवानी और जिस्म का मालिक बन मैं भी ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था. बस बेचैनी और इन्तजार इस बात का था कि कैसे भी जगह का जुगाड़ हो जाये तो मेरा लंड भी इस कामिनी की कुंवारी चूत का भोग लगा के तृप्त हो ले और मैं भी इसकी चूत के रस का पान करके धन्य हो जाऊं. पर ऐसा हो पाने की कोई संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आती थी.

यूं ही घूमते घूमते एक मॉल दिखा तो हम लोग उसमें चले गये. ऐसे सजे धजे बाजार देख कर कम्मो तो देखती ही रह गयी. क़रीब एक सवा घंटा हमलोग मॉल में घूमते रहे.

वहीं से मैंने कम्मो को दो सलवार सूट भी दिलवा दिए. उसने थोड़ी ना नुकुर तो की पर ले लिए.

वैसे भी मुझे अपनी बहूरानी को दिखाने के लिए कम्मो को कपड़े दिलवाने ही थे नहीं तो वो जरूर टोकती कि अपनी नातिन को फोन दिलाने ले गये थे तो उसे अपने पैसे से कपड़े तो दिला ही देते कम से कम. रिश्तेदारी के इस तरह के फर्ज निभाना भी जरूरी था मैंने वो भी पूरा कर दिया था.

 
मैंने तो कम्मो से ये भी कहा था कि अपनी पसंद की ब्रा पैंटी भी ले ले पर उसने हंस के मना कर दिया था कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा कि अंकल जी के साथ ये कैसे खरीदीं? लेकिन मैंने जबरदस्ती करके उसे उसके साइज़ 34B की डिजाइनर ब्रा और पैंटी के दो सेट दिलवा ही दिए और उसे समझा दिया कि ये ब्रा पैंटी मैं अपनी जेब में रखे रहूँगा और बाद में उसे सबसे छुपा के चुपके से दे दूंगा और वो चुपचाप इसे अपने कपड़ों के साथ बैग में रख लेगी.

मेरी यह बात कम्मो ने भी मान ली थी.

फिर हम लोग मॉल से निकल कर बाहर आये तो मुझे याद आया कि अभी कम्मो को गोलगप्पे खिलवाना तो रह ही गया. गोलगप्पे वाला तलाश करके मैंने कम्मो की ये फरमाइश भी पूरी कर दी. कम्मो ने पूरे मजे ले ले कर गोलगप्पे खाए; उसका मुंह पूरा खुलता और गोलगप्पा गप्प से खा जाती इधर मेरे मन में ये ख़याल आता की काश मेरा वाला गोलगप्पा भी ये मुंह में ले लेती, चूस डालती, चाट देती अच्छे से. पर ये सब दिवा स्वप्न ही तो थे.

इतना सब निपटने के बाद पांच बजने को थे अब हमें वापिस धर्मशाला जाने का था. आज रात में ही शादी थी, बरात के लिए तैयार भी होना था सो मैंने ओला की कैब बुक कर ली और चल दिए.

फोन का कैरी बैग और सामान के बैग कम्मो ने पिछली सीट पर रख दिए और मुझसे सट कर बैठ गयी और मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया. कुछ ही घंटों में कम्मो के व्यवहार में कितना परिवर्तन आ चुका था उसकी शर्म हया लाज सब गायब हो चुके थे और उसकी जगह अपनत्व और अधिकार ने ले ली थी. हमारे यहां की लड़कियों की ये विशेषता है कि उनके साथ इस तरह के इंटिमेट सम्बन्ध बनते ही इनके व्यव्हार, बोलचाल में अधिकार झलकने लगता है. अपने पुरुष साथी पर अपना हक़, अपना एकाधिकार, ‘सिर्फ मेरा’ वाली भावनाएं स्वतः ही आ जाती हैं; दरअसल यह भी उनके प्रेम का अन्य रूप ही होता है.

“क्या सोचने लगे अंकल जी?” वो मुझे चिकोटी काट कर बोली

“कम्मो मैं सोच रहा था कि अब आगे हमारा रिश्ता और मजबूत कैसे होगा?” मैंने चुदाई की बात स्पष्ट न कह कर यूं दूसरे ढंग से कहीं.

“अंकल जी, अब मैं क्या बता सकती हूं इस बारे में. मैं तो आपके साथ ही हूं. मेरी तो हर बात में हां है; अब जो सोचना जो करना है वो आप जानो; मैं तो हर जगह आपके संग हूं.” वो मेरे कंधे पर अपना सिर रख कर समर्पित भाव से बोली और मेरी छाती सहलाने लगी.

“कम्मो, देखो जो मैं चाहता हूं, वही तुम भी चाहती हो अब. लेकिन हमारे मिलन के लिए कोई सुरक्षित जगह हो चाहिये ही न; मैं तुम्हे किसी ऐसी वैसी जगह लेके तो नहीं जा सकता न. इसलिए मुझे लगता है कि हम वो सब कर नहीं पायेंगे, हमारे सारे अरमान यूं ही धरे के धरे रह जायेंगे. देखो अभी हम लोग धर्मशाला पहुंच जायेंगे, फिर बारात की तैयारी; रात भर शादी में रुकना पड़ेगा. फिर कल मुझे वापिस जाना है. हम लोग मिल के भी नहीं मिल सके इसका अफ़सोस तो हमेशा रहेगा मुझे!” मैंने अत्यंत भावुक होकर कहा.

कम्मो चुप रही. वो बेचारी कहती भी क्या. वो तो मुझ पर अपना सब कुछ लुटाने, सबकुछ न्यौछावर करने को प्रस्तुत ही थी; कमी तो मेरी तरफ से थी कि मैं इतनी बड़ी दिल्ली में कोई एकांत कोना नहीं तलाश पा रहा था. ऐसी बेबसी का सामना मुझे पहले कभी नहीं करना पड़ा था. कम्मो मुझसे चिपकी हुई चुपचाप थी, वो बेचारी कहती भी तो क्या.

“अंकल जी, आप एक दिन और रुक नहीं सकते क्या?” वो जैसे तैसे बोली.

“कम्मो, चलो मैं एक दिन और रुक भी जाऊं तो उससे क्या होगा, जगह की समस्या तो हल होगी नहीं. हमलोग शादी में आये हैं. कल सुबह तक आधे लोग रह जायेंगे; शाम तक धर्मशाला खाली करनी पड़ेगी. फिर तुझे भी तो जाना होगा न!”

“हां अंकल जी, मुझे भी कल ही वापिस घर जाना है. मुझे तो मजबूरी में आना पड़ा अकेले. पिताजी की तबियत ठीक नहीं थी न और न ही मेरी मम्मी आने को तैयार थी. मैं भी कल दोपहर में किसी ट्रेन से मेरठ चली जाऊँगी वहां से एक घंटे का बस का सफ़र है शाम होने से पहले ही पहुंच जाउंगी अपने घर, रुक तो मैं भी नहीं सकती.” वो भी हताश स्वर में बोली.

मैं चुप रहा और उसे अपने से चिपटाए हुए उसके धक धक करते करते दिल की धड़कन महसूस करता रहा.

“अंकल जी, क्या आप यहां से मेरे साथ मेरे घर नहीं चल सकते? मम्मी पापा तो खेतों में निकल जाते हैं सुबह ही; मैं सारे दिन घर में अकेली ही रहती हूं.”

उसने मुझे अपना प्रस्ताव दिया.

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कम्मो तो मुझ पर अपना सब कुछ लुटाने, सबकुछ न्यौछावर करने को प्रस्तुत ही थी; कमी तो मेरी तरफ से थी कि मैं इतनी बड़ी दिल्ली में कोई एकांत कोना नहीं तलाश पा रहा था. ऐसी बेबसी का सामना मुझे पहले कभी नहीं करना पड़ा था. कम्मो मुझसे चिपकी हुई चुपचाप थी, वो बेचारी कहती भी तो क्या.

मैं उसे अपने से चिपटाए हुए उसके धक धक करते करते दिल की धड़कन महसूस करता रहा.

“अंकल जी, क्या आप यहां से मेरे साथ मेरे घर नहीं चल सकते? मम्मी पापा तो खेतों में निकल जाते हैं सुबह ही; मैं सारे दिन घर में अकेली ही रहती हूं.”

उसने मुझे अपना प्रस्ताव दिया.

“देख कम्मो, मुझे तुम्हारे घर चलने में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन तुम्हारी आंटी, मेरी बहूरानी अदिति को ये बात अजीब लगेगी कि मैं तुम्हारे गांव क्यों जा रहा हूं. वो जरूर मेरा तुम्हारा साथ जाना इस बात से जोड़ कर देखेगी कि तुम आज दिन भर मेरे साथ अकेली थीं. कम्मो, उसका दिमाग बहुत तेज है वो बात समझ जायेगी.” मैंने उसका दूध मसलते हुए कहा.

“हां अंकल, आपकी ये बात तो सही है आपकी” वो धीमे से बोली.

“तू दिल छोटा मत कर ,मैं बाद में आऊंगा तेरे घर. अब हम लोग व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर तो जुड़े ही रहेंगे न!” मैंने उसे दिलासा दी.

“अंकल जी, आओ तो जल्दी ही आना; क्योंकि डेढ़ दो महीने बाद मेरी शादी होने वाली है; उसके बाद कोई पक्का नहीं कि मैं मिल भी सकूंगी या नहीं; लड़की जात की मजबूरियां तो आप समझते ही होगे” वो अपनी एक अंगुली से मेरे सीने पर कुछ लिखती हुई सी बोली. मैंने देखा उसकी आंखें नम थी.

“हां कम्मो, मैं समझता हूं सब. मैं जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करूंगा.” मैंने कहा.

“अंकल जी, मेरा पास भाटइसएप और फेसबुक तो है ही नहीं. आप बना के जाना मेरे फोन में!” वो बोली.

“ठीक है कम्मो, मैं अभी चलकर सब बना दूंगा.” मैंने उसे चूमते हुए कहा और और उसका हाथ अपने लंड पर रख कर दबाने लगा. एक बार तो कम्मो ने अपना हाथ हटाने का प्रयास किया भी पर मैंने उसे सख्ती से अपने लंड पर दबा दिया. दिल तो कर रहा था कि मैं अपना लंड बाहर निकाल कर खड़ा लंड पकड़ा दूं कम्मो को; कम से कम यही सुख हासिल हो जाए मेरे लंड को; लेकिन टैक्सी में मैं इतनी हिम्मत नहीं जुटा सका. क्योंकि ड्राईवर मिरर में से कभी कभी हम पर नजर डाल रहा था. पर जितना सावधानी पूर्वक हम लोग मजा ले सकते थे वो तो लेते ही रहे और एक दूसरे के अंगों को छूते मसलते रहे.

साढ़े छः के क़रीब हम लोग वापिस धर्मशाला पहुंच गये. दुकानों की बत्तियां जल उठीं थीं. सर्दियों के मौसम में यूं भी शाम बहुत जल्दी होने लगती है. धर्मशाला पहुंचे तो देखा खूब चहल पहल हो रही थी. बहूरानी के चाचा जिनके लड़के का ब्याह था वो सबको तैयार होने का निर्देश दे रहे थे की जल्दी जल्दी तैयार होजाओ सब लोग कि साढ़े सात बजे बारात चढ़नी है क्योंकि रात दस बजे के बाद डी जे बजना मना था.

लेकिन जैसे कि होता है कोई भी उनकी बात पर ज्यादा ध्यान देता नज़र नहीं आ रहा था.

हमारे पहुँचते ही अदिति बहूरानी हमारे पास आ गयी और कम्मो के हाथ से बैग्स लेकर देखने लगी की क्या क्या लाये थे. कम्मो की वो दोनों ब्रा पैंटी तो मैंने अपने पास पैंट में छुपा रखीं थीं.

फोन और कम्मो के सूट बहूरानी को पसंद आये और उसने मेरी इस बात की तारीफ़ भी की कि मैंने कम्मो को कपड़े दिलवा दिए थे और अपना रिवाज निभा दिया था; अब वो बेचारी क्या जाने कि कम्मो की मचलती उफनती जवानी ने भी अपनी रीति निभा दी थी मेरे संग.

“अंकल जी फोन चला के तो देखो कैसा है?” कम्मो बोली और फोन का डिब्बा मुझे दे दिया.

मैंने फोन को बड़े प्यार से अनबॉक्स किया और बैटरी डाल कर ऑन कर दिया.

फोन अच्छे से चलने लगा तो मैंने फिर उसमें जरूरी सेटिंग्स भी कर दीं. फोन का स्क्रीन लॉक भी कम्मो के फिंगर प्रिंट्स लेकर सेट कर दिया; अब कम्मो का फोन कम्मो के सिवाय और कोई नहीं खोल सकता था.

इस सेटिंग से कम्मो बहुत खुश हुई कि उसकी मर्जी के बिना कोई उसका फोन देख नहीं सकता था; इसके बाद मैंने कम्मो को और जरूरी बातें भी समझा दीं और अपने सामने फोन खोलना बंद करना सब सिखा दिया.

फिर कम्मो का एक फोटो लिया मैंने और कम्मो को सेल्फी लेना भी सिखाया. फिर फोन में सिम कार्ड डाल दिया. सिम चालू हो चुकी थी तो मैंने कम्मो के पुराने फोन से उसके कॉन्टेक्ट्स भी सेव कर दिए और फोन को डायल करना, कॉल रिसीव करना वगैरह सब सिखा दिया. इसके बाद मैंने कम्मो का जीमेल अकाउंट बना कर फेसबुक, व्हाट्सएप्प भी बना दिया और उसे अपनी फ्रेंड बना लिया.

 
इसके साथ साथ मैंने सारे एकाउंट्स के पासवर्ड्स एक कागज़ पर साफ़ साफ़ लिखकर कम्मो को दे दिए कि अगर कभी वो भूल जाय तो कागज़ से देख सकती है.

इतना सब होने के बाद कम्मो छोटे बच्चे की तरह खुश थी.

इतना सब होने के बाद मैंने कम्मो की वो ब्रा पैंटी अकेले में चुपके से उसे दे दी जिसे उसने झट से अपने बैग में छिपा के रख लीं. इसके बाद कम्मो की एक पप्पी लेना तो बनता ही था सो मैंने दायें बाएं देख कर कम्मो को अपने आगोश में ले लिया; उसके पुष्ट स्तन मेरे सीने से पिस गये और झट से चार पांच चुम्में उसके गालों और होठों पर जड़ दिए.

वो कसमसा कर रह गयी.

“अंकल जी आप भी न. अभी किसी की नज़र पड़ जाती तो?” वो बनावटी गुस्से से बोली. फिर मैंने उसके दोनों दुद्दुओं को झट से दबोचा और निकल लिया वो अरे अरे ही करती रह गयी.

सात बजे के क़रीब वो डी जे वाला आ गया और बारात जल्दी निकालने को बोलने लगा; बोला कि दस बजे के बाद डी जे बजाना सख्त मना है आप लोग फिर कुछ मत कहना.

अदिति के अंकल जी भी सबको जल्दी जल्दी रेडी होने को बोल रहे थे; पर कोई सुने तब न. जैसा कि सभी शादी ब्याह में होता ही है. साढ़े सात के बाद ही सबने हिलना डुलना शुरू किया और तैयार होने लगे.

पीने वालों ने अपनी अलग ही महफ़िल जमा रखी थी एक कमरे में. मैं भी नहा कर अपना सूट, टाई डाल के तैयार हो गया और एक पटियाला पैग डाल के कुर्सी पर बैठ के आराम से चुस्कियां लेने लगा.

लेडीज वाले एरिया में सब महिलायें सज संवर रहीं थीं, उनकी बातों से सुना कि सर्दी होने के बावजूद कोई भी लेडी स्वेटर या कोट पहनने को तैयार नहीं थी. मैंने सोचा कि अगर ये कोट, स्वेटर वगैरह गर्म कपड़े पहन लेंगी तो फिर इनके जेवर, इनके कपड़े, इनके बूब्स इनकी जवानी कैसे दिखेगी सबको?

मैंने तमाम सर्दियों के शादियाँ अटेंड की हैं और सभी में देखा है कि कितनी भी तेज सर्दी हो, ठंडी हवाएं चल रहीं हों पर ये महारानियां गर्म कपड़े कभी नहीं पहनेंगी चाहे बीमार पड़ जायें बाद में.

बाहर डी जे बजने लगा था और बारात का माहौल जमने लगा था. बड़ी उम्र की महिलायें, नव यौवनाएं, ताज़ी ताज़ी जवान हुयीं छोरियां, कमसिन कच्ची कलियां सब की सब झिलमिल झिलमिल कर रहीं थीं. मेरी बहूरानी अदिति कुछ ज्यादा ही क़यामत ढा रही थी. उसने महारानियों के जैसी भारी भरकम एंटीक डिजाईन का सोने का जड़ाऊ नेकलेस और मैचिंग कंगन और कान के पहन रखे थे, साड़ी ब्लाउज भी वैसा ही राजकुल की स्त्रियों के जैसा आलीशान था.

बहू को वो रूप देखकर मुझे अपने लंड के मुकद्दर पर फ़ख्र हुआ कि इस शानदार जिस्म की मलिका की चूत को मेरा लंड अनगिनत बार भोग चुका था. पहनने ओढ़ने के हिसाब से सभी लेडीज का लगभग यही हाल था. सब की सब एक से बढ़ कर एक हुस्न की परियां नजर आ रहीं थीं.

अपनी कम्मो भी कोई कम सितम नहीं ढा रही थी. नहाई धोई कम्मो ने पीले कलर का कुर्ता और नीचे ढीली ढाली चूड़ीदार सफ़ेद सलवार पहन रखी थी; ये पीले और सफ़ेद रंग का कॉम्बिनेशन बहुत ही अच्छा फबता है इन कुंवारियों के बदन पर. कम्मो का दुपट्टा उसकी छातियों की बजाय गले में लिपटा था जिससे उसके दिलकश स्तनों का जोड़ा उसके सीने पर बहुत ही मस्त और लुभावना लग रहा था; हो सकता है उसने वही ब्रा और पैंटी पहन ली हो जिसे मैंने आज उसे गिफ्ट में दिया था, पर मैं निश्चित तौर पर कोई अंदाजा नहीं लगा सका.

कम्मो के खुले हुए घने काले बाल उसके कंधों पर बिखरे हुए थे और उसने कुछ आर्टिफिशियल ज्वेलरी भी पहन रखी तो जो उसके सौन्दर्य में चार चांद लगा रही थी. आंखों में गहरा काजल डाल रखा था उसने!

अगर शोर्ट में कहूं तो कम्मो हरियाणवी डांसर सपना चौधरी की छोटी बहन जैसी लग रही थी; बिल्कुल वैसी ही कद काठी, वैसा ही जानलेवा जोबन, वैसा ही सलवार कुर्ता, वैसी ही सुन्दर और यौवन के जोश से लबालब.

मैंने कम्मो को इशारे से पास बुलाया तो वो मेरे साथ सकुचाती सी आ खड़ी हुई; मैंने उसके हाथ से उसका नया फोन लेकर अपनी और कम्मो की कई सेल्फी लीं.

“कम्मो तू बहुत ही सुन्दर लग रही है, सब में सुन्दर. सच में!” मैंने कहा

“ह्म्म्म, रहने दो अंकल जी. क्या फायदा अब!” उसने कह कर सूनी सूनी आँखों से मुझे देखा और सिर झुका कर खड़ी रही. उसका ‘क्या फायदा अब’ कहना मुझे भीतर तक चीर गया, जैसे मेरे पुरुषत्व और पुंसत्व पर सवालिया निशान लगा गया. ऐसी बेचारगी का सामना मुझे जीवन में कभी पहले महसूस नहीं करना पड़ा था. मैं समझ रहा था कि वो इमोशनल हो रही थी; चाहत का जो जज्बा, वर्जित फल खा लेने का वो पागलपन हम दोनों पर आज दिन में रेस्टोरेंट में सवार हुआ था वो घोर निराशा में बदला जा रहा था. कम्मो तो मुझे सब तरह से समर्पित हो ही गयी थी कि जो करना है कर लो, जहां ले चलना है ले चलो. कोई लड़की इससे ज्यादा आखिर कह और कर भी क्या सकती है.

मैं कम्मो से कुछ और कहने ही वाला था कि अदिति बहूरानी मेरी ओर आती दिखाई दी साथ में उसके चाचा जी भी थे.

कहानी जारी रहेगी.

 
मेरी पुत्र वधू की भतीजी कम्मो मेरे साथ सेक्स करना चाहती थी लेकिन कोई मौक़ा नहीं मिल रहा था तो वो निराश हो चुकी थी.

मैं कम्मो से कुछ और कहने ही वाला था कि अदिति बहूरानी मेरी ओर आती दिखाई दी साथ में उसके चाचा जी भी थे.

“भाई साब, मैं आपको एक कष्ट देना चाहता हूं, अगर आप अन्यथा न लें तो?” अदिति के चाचा जी बोले.

“अरे कैसी बात करते हैं. आप तो आदेश दें मुझे. बताएं क्या करना है?” मैंने विनम्रता से कहा.

“देखिये बारात तो तैयार ही है और निकलने ही वाली है. आपको सिर्फ एक काम करना है कि बारात निकलने के बाद सारे कमरे आपको लॉक करने हैं बस. यहां चौकीदार रहता है बाकी वो देखता रहेगा, ये लीजिये चाभियां!” अदिति के चाचाजी बोले और चाभियों का गुच्छा मुझे थमा दिया.

“आप बेफिक्र रहें. सबके निकलने के बाद मैं सारे कमरे लॉक करके बारात में शामिल हो जाऊंगा, कोई कीमती सामान तो नहीं रखा है न?” मैंने उन्हें आश्वस्त किया और चाभियां उनसे ले लीं.

“अरे ऐसा कोई कीमती सामान नहीं है, पर सब जगह ताला तो लगाना ही पड़ेगा न!” उन्होंने कहा और अदिति को साथ लिए निकल लिए.

कम्मो मेरे पास ही खड़ी थी. अचानक मेरे दिमाग की ट्यूबलाइट भक्क से जल उठी. अब पूरी धर्मशाला मेरी थी. मैंने कम्मो के सामने चाभियों का गुच्छा लहराया तो उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखा.

“अरे अब जगह ही जगह है अपने पास!” मैंने हंस कर कहा. मेरी सारी दुविधा, सारी भव बाधा किसी ने हर ली थी.

“मतलब?” वो बोली.

“देख कम्मो, अब मना मत करना प्लीज. बारात के यहां से निकलते ही मुझे सारे कमरे लॉक करके चाभियां अपने पास रखनी हैं फिर सारे कमरे हमारे; हम कुछ करें, यहां पर कोई देखने टोकने वाला नहीं रहेगा” मैंने खुश होकर कहा.

“अच्छा, और शादी में नहीं जाना क्या? कोई हमें पूछेगा तो क्या होगा?” वो बात को समझते हुए बोली.

“अरे तू ध्यान से तो सुन पहले. तुझे भी सब लेडीज के साथ बारात के साथ निकल जाना है. सब लोग डी जे पर नाचते हुए जायेंगे. यहां से ताला लगा कर मैं भी बारात में शामिल हो जाऊंगा.” इतना कह कर मैंने उसके ओर देखा.

“फिर?” उसकी संदेह भरीं नज़रें उठीं.

“अरे सुन तो सही, इस तरह हम सब बारात के संग संग चलेंगे. डांस वांस करके फोटो खिंचवा के हम लोग धीरे से बारात के पीछे होते जायेंगे और फिर चुपके से निकलकर यहीं धर्मशाला में आ जायेंगे. चाभियां तो मेरे पास ही हैं अब. धर्मशाला सुनसान रहेगी, हमें कोई देखने टोकने वाला नहीं होगा और हम मजे से दो घंटे तक तूतक तूतक तूतिया … आई लव यू करेंगे.” मैंने प्रसन्न होकर कहा.

“अच्छा, और कोई पूछेगा कि कम्मो कहां गयी तो, किसी ने आपको ही पूछ लिया तो फिर क्या होगा?”

“तू पगली है, अरे बारात में किसी को क्या होश रहता है कि कौन कहां है. आधे से ज्यादा लोग दारु पी कर टुन्न हैं वे तो डांस करेंगे और नोट उड़ायेंगे, लेडीज को भी नाचने और फोटो खिंचाने से ही फुर्सत नहीं होगी. ऐसे में किसी को क्या होश रहता है कि कौन कहां हैं. तू अपना फोन स्विच ऑफ करके रखना मेरा फोन ऑन रहेगा. हम लोग धर्मशाला में आराम से एक डेढ़ घंटे रुकेंगे, इतनी देर में मैं तुझे अच्छे से अपनी बना लूंगा; हम लोग निपट कर फिर वापिस बारात में शामिल हो जायेंगे; अरे किसी को कुछ पता नहीं चलने वाला कि कौन आया कौन गया.” मैंने उसे प्यार से समझाया.

“फिर भी. अंकल जी, मेरी हिम्मत नहीं है इतना करने की. रहने दो आप तो. आपको आना हो तो मेरे गांव ही आ जाना बस और वहीं पर आराम से बिना किसी डर के करना जो करना हो!” उसने अपना फैसला सुनाया.

“अरे तू ठीक से समझ तो सही. लड़की वालों के यहां तक बारात पहुँचते पहुँचते कम से कम दो घंटे तो लगेंगे ही. इतने में हम मिल लेंगे; एक दूसरे में समा जायेंगे और अपनी इच्छा पूरी करके वापिस लौट कर शादी में शामिल हो जायेंगे. अरे किसी को किसी की खबर नहीं रहती ऐसे माहौल में. बस तू थोड़ी सी हिम्मत तो कर!” मैंने उसका डर दूर करने का प्रयास किया.

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“ठीक है अंकल जी. कुछ गड़बड़ हुई तो आप संभालना बस!” वो समर्पित भाव से बोली.

“अरे कम्मो बेटा, तेरी इज्जत की परवाह मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी है, तू बिल्कुल भी फिकर न कर. मैं तुझ पर कोई आंच नहीं आने दूंगा.”

उसने सहमति में सिर हिलाया और दौड़ कर लेडीज के झुंड में शामिल हो गयी. इस तरह कम्मो चुदने को राजी हो गयी.

 
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