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बाबा का कमाल

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Guest
बाबा का कमाल

मैने अपना हर तरह से इलाज करवा लिया लेकिन कहीं से भी कोई फ़ायदा नही हो रहा था। मेरा घर बिखर सा गया था। मै हर वक्त बीमार होने लगी, मेरे पती को शराब की लत लग गई, मेरा एकलौता बेटा सात महीने पहले घर से भाग गया जिसका अभी तक कोई अता पता नहीं चला। एक बार किसी बाबा ने बताया था कि मेरा पैर किसी चौराहे पर उस जगह पडा है जहांपर किसी ने कुछ किया हुआ था, उसने जो उपाय बताया था वो करके भी कोई आराम नहीं मिला। मै इन सब के बारे मे सोच ही रही थी कि दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। मैने दरवाजा खोला तो सामने मेरे मोहल्ले की (पाच घर छोड कर) बन्दना खडी थी जो मूलतह रोहतक हरियाणा की रहने वाली थी। उसका पती सी. आर. पी एफ. मे नौकरी करते थे जिनकी पोस्टिन्ग अक्सर दूसरे प्रदेशों मे ही रहती थी। फिलहाल वो अपने आठ साल के बेटे के साथ अकेले ही रहती थी।

अन्दर आने पर उसने मेरे उदास चेहरे को देखकर कहा ---जीजी मेरी एक बात मान.....तू किसी सयाणे को क्यूं नि दिखाती..?

मेरे पूछने पर उसने बताया - कि सयाणा सब कुछ बता देता है कि किसी ने तेरे परिवार या तुझ पर जादू टोना किया है या किसी की नज़र लगी है या किसी ने कुछ खिलाया है या तेरे घर के देवी देवता रूठ गये है आदि आदि।

सच कहूं सू जीजी भोत मशूर सयाणा है...किते लोगों का भला किया है उसने। जीजी एक भी पीसा नी लेमता वो...जो सामान आवेगा वो तो तने खरच करणा पडेगा...जे फ़ायदा होग्या तो उसी मस्जिद मे जाके अगरवत्ती जलाके एक चादर, एक पाकेट सिगरेट होर माडी सी लौन्ग चढा देना। देख जीजी तने सारा इलाज तो करवा लिया और बाबा से भी कुछ ना होया....इब तू एक बेर सयाणे ते भी बूझ के देख...मेरी आत्मा कहे से थारे को फ़ायादा जरूर होगा जीजी।

समय निकालकर मै बन्दना के साथ सयाणे के पास गई, वहां गेट से अन्दर घुसते ही दो मज़ार थी, कुछ मीटर के बाद एक हालनुमा कमरे मे पहले से ही बीस पच्चीस लोग बैठे थे और कुछ लोग हमारे बाद भी आ रहे थे। लोग बारी बारी से हाल के बाद बने अन्दर वाले कमरे मे जा रहे थे और कोई दस तो कोई आधे घन्टे मे बाहर आ रहे थे। मेरी बारी आने पर बन्दना के साथ मै अन्दर गई, बन्दना ने पहले सयाणे के बगल मे बनी चौकी पर माथा टेका और फिर मैने। सयाणे ने मोर पंख से बारी-बारी से हमदोनों के सिर पर कुछ किया। फिर सयाणे ने बन्दना से पूछा--बेटी वो तेरे गांव वाली अब ठीक है ना... दुबारा आई नहीं।

बन्दना ने कहा-- बाबा वा तो ठीक सै.. इब या भोत परेशानी मे सै बेचारी....सारे जुगत कर लिये, फायदा कोई नी होता....

सयाणा बीच मे मेरी तरफ देखकर बोला-- कोई बात नहीं बेटा.. जरा आगे आ।

मै थोडा खिसककर उसके आगे गई....उसने मेरे सिर पर हाथ रखा... थोडी देर मे मेरा बदन कांपने लगा। वो जोर-जोर से मेरे चेहरे पर फूंक मारने लगा। मेरे सिर से हाथ हटाकर उसने मुझे वापस पीछे खिसकने का इशारा किया और बोला---चार साल से भुगत रही है... तेरी गिरस्थी भी ठीक नहीं है।

(उसकी बातें सुनकर अन्दर से मेरा दिल धडकने लगा) अपनी आंखें बन्दकर जोर की सांस लेकर फिर बोला--तेरा पती........कुछ देर रुककर बोला--बेटी, बुरा मत मानना, मेरे सवाल का सच-सच जवाब देगी..?

मैने धडकते दिल से काम्पते हुए जवाब दिया---जी बाबा।

बाबा--देख मैने पहले ही कहा कि बुरा मत मानना...क्योंकि हमसे कुछ भी छुपा नहीं रह सकता...तो बता तेरी टांगों के बीच मे तिल है....?? सच-सच बताना.........

मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं.... उसकी आंखें बन्द थी...मैने बन्दना की तरफ देखा तो उसने फुसफुसाकर कहा---बतादेना है या नहीं....मैने कांपते हुये जवाब दिया--नहीं।

बाबा उर्दू मे कुछ बडबडाने लगा और बोला-- गलत...गलत....गलत जवाब.....बेटा इसको लेजा.....मुझे झूटा बनारही है......ले जा इसको.....या तो ये मेरी बात समझ नहीं पारही है या ये किसी वजह से झूठ बोल रही है।

बन्दना ने मुझे समझाया कि जीजी सच बता दे ना...बाबा की गणत गल्त नी हो सकती....मै जाणूं सूं।

मैने फिर से कहा कि मुझे पता है, कोई तिल है ही नहीं.

बाबा अपने आसन से उठ खडा हुआ और, इसको लेजा बेटी.....कहकर कमरे से बाहर निकल गया। पीछे -पीछे हम दोनों भी बाहर निकल गये। बाहर हाल मे छै-सात लोग अभी इन्तजार मे बैठे थे। बाबा मज़ार के पास जाकर सिगरेट पीने लगा। बन्दना उसके पास गई और कुछ बातकर उसके पैर छुए और हम दोनो वहां से निकल गये।

रास्ते मे बन्दना और मेरे मे काफी बहस हुई, वो बोली कि मेरे घ्यान से इब तक सयाणे की कोई बात गल्त ना हुई जीजी....। मै भी अपनी बात पर एक दम अडिग थी कि मेरी टांगों के बीच मे कोई तिल है ही नही। बन्दना ने मुझे टांगों के बीच का मतलब समझाने की कोशिस की बाबा साफ-साफ कैसे कहते.. उनका मतलब शायद मेरी चूत पर तिल से था...। मैने बन्दना से कहा कि मै बाबा की बाद समझ गई थी...लेकिन मेरे वहां भी तिल नहीं है.. लेकिन बाबा की तरह बन्दना भी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रही थी।

घर पहुंचने के बाद मैने साडी-पेटीकोट ऊपर उठाकर बन्दना को कहा कि ----देख, तू ही देखले कहां है तिल...?

देखने के बाद वो बोली--यार जीजी, मेरे संघ्य़ान मे बाबा की बात पैली बार गल्त होगी। आज तांई हर बात सच निकली, नूकर कैसे होग्या।

दूसरे दिन नहाते वक्त अचानक मेरे मन मे कुछ खयाल आया, नहाने के बाद केवल मैक्सी पहनकर बेडरूम मे आई, वाल मिरर को बेड के पास दीवार के साथ टेढा रख, अपनी टांगें चौडी कर अपनी चूत के लिप्स को फैलाकर देखा तो मै हैरान रह गई....। लिप्स की अन्दर की तरफ बडा सा तिल था।

मुझे हैरानी जादा उस बाबा के कान्फिडेन्स पर हुई जो अपनी बात पर अडा हुआ था कि मेरी टांगों के बीच मे तिल है और मै..तिल होते हुए भी आज तक अनजान थी। कुछ अजीब सा भी लगा कि क्या ये बाबा या सयाणे लोग सब कुछ देख सकते हैं वो भी अन्दर तक.....।
 
दोपहर को मै बन्दना के घर गई और उसको हैरानी से बताया कि सचमुच मे मेरे गुप्तांग के अन्दर तिल है जिसका मुझे पता ही नहीं था। वो बिल्कुल भी हैरान नहीं हुई बल्कि कौतुहलवस बोली--देखा, मै बोली थी ना कि ये कोई ईशा-वीशा सयाणा नी है, भोत पहुंचा हुया सै। अरे जीजी वो तो तेरे आगे पीछे की सारी बातां ने जाणग्या होगा। ऊसके सामणे जाणे के बाद कोई बात ऊसते छिप ना सकती। जीजी मेरी बात माण ले, जे एक बार उसने थारी सई बात पकडली, थारे सारे कष्ट मिट जांगें, थारा परिवार कती सुखी हो जाग्या जीजी। मै सोचने लगी कि जो मेरे बारे मे इतनी जानकारी रखता है जिसकी मुझे भी नही है, उसके पास कुछ तो शक्ती होगी और जरूर वो मेरी मदद कर सकता है। मेरे पती की तबीयत ठीक हो जायेगी या मेरा बेटा लौट सकता है। बन्दना ने बताया कि कल बुधवार है और बुधवार को सयाणे का दरबार नहीं लगता। कुछ गिने चुने लोग ही आते हैं। हमारे लिये कल जाना सही रहेगा भीड ना होने के कारण ढंग से समझ सकते हैं।

अगले दिन ग्यारह बजे के लगभग बन्दना और मैं सयाणे के पास गये, वो मज़ार के पास फूलों की क्यारी मे बनियान और लुंगी पहनकर खुरपी से निराई का काम कर रहा था। हम दोनो ने झुककर उसको नमस्कार किया और नमस्कार का जवाब देने के बाद वो बोला-- भई, जब तुम्हें मुझ पर विस्वास ही नही है तो फिर क्यों आई हो... मै कुछ नहीं कर सकता। और बहुत से लोग है बताने वाले उनके पास चले जाओ..।

बन्दना ने बाबा से कहा-- बाबा, जो बात आपने बूझी थी, ऊसका ग्य़ान तो इस बेचारी को भी कोई नी था, ईसने तो घर जाके बेरा पाट्या ( घर जाकर पता चला)। बाबा इब तो थारी सरण मे आई है, भोत दुखी है, के पता इसका भाग्य इसे लौटाकर आपके पास लाया है।

बाबा ने हमें वहीं रुकने को कहा और कमरे मे जाकर अगरबत्ती का पैकेट लाया, मेरे हाथ मे देकर बोला- जलाकर सामने (मज़ार के एक कोने मे) रखकर अन्दर आना और वो लौटकर कमरे मे चला गया। अगरवत्ती जलाकर मै और बन्दना कमरे मे गये। बाबा अपनी गद्दी पर बैठा, आखें बन्दकर मन ही मन कुछ बडबडा रहा था। बन्दना ने बैठते हुये मुझे भी बैठने का इशारा किया। थोडी देर के बाद बाबा ने हाथ मे मोरपंख लिया और बारी बारी से हम दोनों के सिर पर रगडने लगा। फिर वो मेरी तरफ देखकर बोला-- तेरा पैर अनजाने मे गलत जगह पडा है...., किसी ने टोना किया था....उसके औलाद नहीं हो रही थी......। .......पर तूने बहुत देर करदी......मुश्किल है.......। बाबा लम्बी लम्बी सांसे लेने लगा... फिर जोर-जोर से अपनी छाती को इतना पीटा कि उसकी बनियान शायद खून से लाल होने लगी.....। अचानक उसने दीवार से अपनी पीठ को सटाया और शांत हो गया।

पांच मिनट के बाद बाबा ने साइड मे रखे रैक से एक काला धागा निकालकर नापा और चाकू से काटकर उसपर सात जगह पर एक-एक लौंग बान्धकर मेरे गले मे बान्धा। एक पुडिया मे कुछ भभूती (राख जैसा कुछ) लपेटकर मुझे दी और कहा कि उसे अपने पती के सिरहाने के नीचे छुपाकर रखूं....उनको पता नहीं चलना चाहिये। एक सप्ताह के अन्दर अगर कुछ फर्क पडे तो मेरे पास आना वरना मत आना। अपना और मेरा वक्त बरबाद मत करना... जाओ..और कमरे से निकलने के बाद मुझसे कहा कि अपने घर के अन्दर घुसने तक पीछे मुडकर बिल्कुल मत देखना...चाहे कोई तुमारा कोई खास जानने वाला ही क्यों ना हो.....वरना कुछ हो गया तो मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी और जाते ही भभूती को अपने पती के सिरहाने इस तरह से रखना कि उसको बिल्कुल भी पता ना चले ।

अपने घर के अन्दर पहुंचने तक मै बहुत घवराई हुई थी। बन्दना के समझाने पर मैंनें तकिये का ऊपर का कवर निकालकर तकिये के अन्दर के कपडे की सिलाई उधेडकर रुई के बीच में भभूती की पुडिया को छुपाकर रखा और पहले की तरह कवर चढाकर रख दिया। चाय पीते पीते बन्दना ने कहा कि... जीजी इब तेरे भाग खुल जांगें....भाई साब (मेरे पती) कती ठीक हो जांगें होर तेरा छोरा भी लौट जागा....मने तो सयाणे पर भगवान के बरोबर बिस्वास सै ।

रात को मेरे पती हमेशा की तरह पीकर आए और खाना खाकर सो गए। आधी रात को अचानक उनको बिस्तर पर ही उल्टी हो गई। मैने पहले उनको बिस्तर से उतारकर उनके कपडे बदले और फिर बेड शीट। उनके माथे पर पशीना टपक रहा था तो मैने अपनी मैक्सी के कोने से साफ किया। अचानक मेरे पती रोने लगे और बोले.......मैनें तुझे बहुत दुखः दिया फिर भी तू मेरा इतना खयाल रखती है। मैने उनको समझाया कि मै तुम्हारी पत्नी हूं, क्यों ना करूंगीं सेवा। कुछ देर हमारी इसी तरह की बातें चलती रही और हम दोनों सो गए।

सुबह जब मेरी आंख खुली तो मै भौचक्की रह गई। करीब चार साल के बाद आज पहली बार उनका हाथ मेरी मैक्सी के अन्दर मेरे गुप्तांग के ऊपर था। अजीब सा महशूस हो रहा था......आखिर चार साल के बाद पहली बार मेरे अपने हाथ के अलावा दूसरा हाथ मेरे गुप्तांग पर था । चार साल पहले किये गए संभोगों की कडी सी जहन मे उतरने लगी साथ ही साथ बन्दना और बाबा की बतों के बारे मे भी सोचने लगी। मेरा मन आनन्दमय सा होने लगा और मैं आखें खोलकर लेटी रही और तभी उठी जब उन्होंने करवट बदली ।

हमेशा की तरह अपने नित्य कर्म से फारिग हो नहाने के बाद अपने घर के पूजा स्थान पर जोत जलाने के बाद चाय लेकर उनके पास गई और उठाकर उनको चाय पीने को कहा तो वो बोले......अपनी चाय भी यहीं ले आ ना। इतनों वर्षों के बाद हमने एक साथ चाय पी और वो बाथरूम मे चले गए। आज हमने एक साथ नास्ता भी किया ।

शाम को वै सही वक्त पर घर भी लौट गए और वो भी पिना शराब पिये......... मैने मन ही मन बाबा और बन्दना का शुक्रिया अदा किया। आज सब कुछ वैसे ही चल रहा था जैसे चार साल पहले चलता था। रात का खाना खाने के बाद उन्हीं के कहने पर हम दोनों बाहर कलोनी मे घूमने निकल गये। घूमते-घूमते उन्होंने बताया कि वै शराब की दुकान मे गये थे कि आज बाहर से पीकर जाने के बजाय घर लेजाकर पियेंगें लेकिन पता नहीं दिमाग मे क्या आया कि आज नहीं कल पियेंगें और उनके पैर अपने आप घर की तरफ चल पडे। वो अपनी आप बीती सुना रहे थे लेकिन मेरा दिमाग मे बन्दना और बाबा ही घूम रहे थे ।

घर लौटकर मैने जैसे ही दरवाजा अन्दर से बन्द किया उन्होंनें मुझे अपनी बाहों मे लिया और अब तक किये अपनी हरकतों के लिये माफी मांगने लगे और मैने उनको समझाया कि शायद वो हमारा बुरा वक्त था जो अब खत्म होरहा है। घर के बाकी काम निपटाकर जब मै बेड पर पहुंची तो उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचकर मेरा माथा चूमकर बोले.......तू कितनी अच्छी है...इतना बुरा बर्ताव करने पर भी तू हमेशा मेरी सेवा करती रही........कभी भी कोई झगडा नहीं किया....वगैरा.. वगैरा....। मेरे समझाते समझाते पहले तो वै मेरी छातियों को मसलने लगे और फिर मैक्सी के अन्दर हाथ डालने लगे तो मैने जानबूझ कर कहा कि...ये क्या कर रहे हो..........तो वै बोले..........वही जो मुझे करना चाहिये ......पर पता नहीं कब से नहीं किया...और मेरे गुप्तांग पर हाथ रखते ही जोर से भींच लिया। मेरा हाल मैं बयां नहीं कर सकती.....ऐसा लगरहा था जैसे कोई पराया मर्द मुझे छू रहा हो.....ऊपर से कुछ घबराहट जैसा और अन्दर ही अन्दर मेरे गुप्तांग के अन्दर सरसरहाट सी होने लगी। मै नर्वस सी हो गई।

उन्होंने मेरी मैक्सी पूरी तरह ऊपर सरकाई और अपना अन्डरवियर निकालकर मेरे ऊपर लेट गए। उनका मुर्झाया लन्ड मेरे गुप्तांग को स्पर्श कर रहा था। पता नहीं पचासों बार अपने हाथ से पकड पकड कर वो अपने लन्ड को मेरे गुप्तांग पर सटाते और धाकका मारते लेकिन वो अन्दर ही नहीं घुस पा रहा था । मेरी हालत बहुत खाराब हो चली थी.....सच बताऊं गुस्सा आ रहा था.....क्योंकि कई बार मैने भी नीचे से हिलते हुए अपने को एडजस्ट किया कि थोडा सा तो अन्दर घुस जाए......पर.....। मैने बेशर्म होकर उनके मुर्झाये लन्ड को अपने हाथों से पकडा और अपनी योनी मे सटाकर नीचे से उछली.....शायद लन्ड का टोपा अन्दर गया होगा कि मेरी योनी फक...फक....फक...फक कर बैठी और उनका लन्ड फिर से बाहर निकल गया। मेरी योनी अकेले ही अपने आप त्रप्त हो गई। वो बेचारे बहुत देर तक कोशिश करते रहे... ना ही उनके लन्ड मे कोई कडापन आया और ना ही मेरी योनी में घुस पाया। वो जोर से गुस्से मे चिल्लाए .....भैन्चोद इसको क्या हो गया.........। मैं डर गई कि कहीं इनको अपनी नामर्दानगी का एहसास हो गया तो फिर से पीने ना लगे....मैने उनको समझाया कि इतने सालों से तुम दिन रात शाराब पीते रहे हो तो शायद उसका असर हो सकता है......मेरी बात मानों कुछ दिन शराब का सेवन बन्द करदो, सब अपने आप ठीक हो जायेगा। वो बहुत झल्ला गए थे, मैने किसी तरह समझाबुझाकर उनको शान्त किया।

अगले दिन वो आफिस नहीं गए, शाम के वक्त हम दोनों पलिका बाजार घूमने गए, वहीं से खाना खाकर रात दस बजे घर पहुचे। घर के सारे काम निपटाकर बिस्तर पर पहुचकर मैने ही पहलकर उनके लन्ड से खेलना आरम्भ किया, खेलते खेलते मेरी योनी अन्दर से कुलबुलाने लगी थी। बहुत वक्त बीत जाने के बाद भी उनके लन्ड मे तनाव पैदा नहीं हुआ तो वो बडे मायूस होकर बोले-- छोड यार अब मै बेकार हो गया हूं......इस दारू ने तो मुझे नामर्द ही बना दिया। मैने तपाक से जवाब दिया--ऐसा कुछ भी नही है, ये बात अपने दिल से निकाल दो।

अगले तीन - चार रातों को हमारा यही सिलसिला चलता रहा, कभी वो तो कभी मै उनके लन्ड मे तनाव लाने की कोशिश करते रहे पर कामयाब नहीं हुए।
 
अचानक मुझे बाबा (सयाणे) की याद आई, जिनको मैं एक दम ही भूल गई थी, उन्हीं की भभूती और काले धागे की वजह से मेरे पती में इतनी तब्दीली आई थी । अगले दिन पती के आफिस जाने के बाद मैं बन्दना के घर गई और थोडी देर इधर उधर की बातें करने के बाद मैनें बाबा (सयाणे) का जिक्र किया तो वो झट से बोली---कुछ पड्या के ..? मैनें उससे बताया कि शायद उन्होंने पीना छोड दिया है और वक्त पर घर भी आ जाते हैं । उस दिन बन्दना को दिन मे किसी के घर जाना था इसलिए अगले दिन हम दोनों बाबा के पास गए, उस दिन वहां बहुत भीड थी जिसकारण चार बजे शाम को हमारा नम्बर आया। जैसे ही हम दोनों बाबा के सामने बैठे, उसने हम दोनों को मोरपंख से सहलाना शुरू किया और बोला -- बोल बेटा.....कुछ फर्क समझा..... या फिर से मुझे अजमाने आई है.....?

मैनें डरते हुए बताया कि काफी फर्क पडा है..........

वो बीच मे ही बोल पडा---लेकिन संबन्ध नहीं बन पा रहा है ना..........

मैं फटी आखों से उसको देखने लगी.......क्या कमाल का बाबा है......इसको इस बात का भी पता है..........

वो फिर बोला --- मैने कहा था ना कि हम से कुछ भी छुपा नहीं रह सकता.....देख बेटा...मै सीधे-सीधे और साफ-साफ बोलता हूं.....फिर चाहे कोई आगे इलाज करवाए या ना करवाए उसकी मर्जी...... तेरा केस बहुत टेढा है......थोडा वक्त लगेगा....कुछ सामान लाना पडेगा और तुझे कुछ चुकाना भी पडेगा........बोल क्या बोलती है.......? अच्छा चल पहले बता....मुझ पर विस्वास हुआ कि नहीं... तभी आगे की बात करूंगा...........बता...... ?

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घबराते हुए मैने कहा कि मुझे पूरा विस्वास हो गया है पर मैं चुकाने वाली बात नहीं समझ पाई बाबा......।

वो भी समझा दूंगा समय आने पर.... पहले तो तू परसों वीरवार को सवा गज काला कपडा, 50 ग्राम राई, 50 ग्राम सिन्दूर, 7 लौंग, सवा मीटर काला धागा, 3 नींबू घर से नहा कर मेरे पास लेकर आना... आगे की बात उसके बाद बताऊंगा। उसने चावल के कुछ दाने अपने हाथ मे लेकर सात बार फूंक मारने के बाद मुझे दिये और कहा कि इनको घर जाकर खाने के साथ पकाकर दोनों झने खायेंगे तो कुछ चमत्कार होगा लेकिन पती को इसकी जानकारी नहीं होने देना।

मैने रात को खीर के साथ बाबा के दिए चावलों को पकाया और खाने के बाद हम दोनो घर से बाहर सैर पर निकल गए। वापस लौटते समय उन्होंने कस के मेरा हाथ पकडा और पूछा---तूने आज खीर मे क्या मिलाया था..... ?

मैने सकपकाते हुए कहा---कुछ भी तो नहीं....मैं क्या मिलाऊंगी.......और क्यों मिलाऊंगी....

उन्होंने बीच मे ही रोककर कहा----अरे नहीं...तू कुछ और समझ रही है...मैने इसलिए पूछा कि चलते-चलते मेरा खडा हो गया है यार..... पता होता तो पहले ही खीर ना बना देते......

मैं बता नहीं सकती मेरे मन मे क्या चल रहा था--एक तरफ बाबा के कारनामे के बारे मे सोचती तो दूसरी तरफ ये कि कहीं इनको बाद मे बाबा के बारे मे पता चलेगा तो क्या होगा फिर इनके खडे होने की बात पर सोचते ही अजीब सा रोमांच पैदा होने लगा कि क्या आज कुछ कर पाएगें कि नहीं। घर के अन्दर पहुंचते ही वो मुझे पकडकर कमरे में ले गए और मेरा हाथ पकडकर अपने पजामे के ऊपर रखकर बोले---देख टन्न्न्न्न हो रहा है । घर के खिडकी दरवाजे और लाइटें बन्द कर, मन में मस्ती का आलम लेकर जबतक बेड पर लेटे तब तक मिंयां जी ठंडे हो चुके थे और बोले--यार इसने तो वक्त पर धोका दे दिया ...? मेरे दिमाग मे फिर से बाबा का खयाल आने लगा......क्या ये बाबा की चालाकी तो नहीं.....और उसने क्या चुकाने की बात कही थी.... कहीं वो बाबा मेरे साथ..........नहीं ऐसा नहीं हो सकता..वो तो भक्ती वाले लोग होते हैं...वो इस तरह की हरकत कभी नहीं कर सकते..बस इसी उधेडबुन में कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

वीरवार को मै बाबा द्वारा बताई सामग्री लेकर उनके पास गई, बन्दना बुखार की वजह से मेरे साथ नहीं आ पाई। बाबा के पास मेरा नंबर आने के बाद हमेशा की तरह उन्होंने पहले मोरपंख से मेरे सिर और कंधों को मंत्रों के साथ सहलाया उसके बाद सामग्री को हाथों मे लेकर काफी देर तक मंत्र पढने के बाद मेरे सामने रखा और बोला----------काम नहीं हो पाया ना...?

मेरी समझ मे कुछ नहीं आया तो मैं उसके चेहरे पर देखने लगी.......

बेटा तू बहुत भोली है जबतक तुझे साफ-साफ न बताओ तेरी समझ मे कुछ आता ही नहीं। मेरा मतलब था कि तेरा अपने पती से शारीरिक संबंध अभी तक नहीं बन पाया....अब समझी.............।

सुनकर मेरा दिल धक-धक करने लगा.......ये बाबा कितना पहुंचा हुआ है इसको इस बात का भी पता है......मैं कुछ सकुचा सी गई...कहीं ये अपनी किसी विद्ध्या से मुझे कपडों के अन्दर तो नहीं देख रहा.......तभी उसकी आवाज से मैं और चौंक गई, वो बोला---जैसा तू सोच रही है वैसा नहीं हैं....तू आराम से बैठ.....कोई भी आर-पार नहीं देख सकता.......मैं और भी चौंक गई... इसने तो मेरे मन की बात भी जान ली...तब तो पक्का ये मुझे कपडों के अन्दर भी देख रहा है.......मैंने अपनी साडी का पल्लू खींचकर अपनी छाती को ढकने की कोशिस की। मेरी इस हरकत पर वो थोडा मुस्कुराया और बोला---देख मेरे पास कितनी भीड लगी रहती है...मैं किसी से एक पैसा भी नहीं लेता और ना ही किसी से कोई जबरदस्ती करता हूं, एक बार अपने मन की बात सामने वाले को बता देता हूं फिर उसकी मर्जी वो माने या ना माने..और जो मान जाता है उसका बेडा पार हो जाता है.....तेरी मर्जी है तू अपनी सामग्री उठाकर अभी जा सकती है........ये काम इतना आसान नहीं है जितना लगता है....हमारी विध्या ही ऐसी है कि दूसरे का कष्ट मिटाने के लिए हमें अपने शरीर पर कष्ट झेलना पडता है...कठिन तपस्या करनी पडती है....अपना परिवार और ग्रहस्थ का त्याग देना पडता है तब जाकर कुछ हासिल होता है। उसने मेरी सामग्री का थैला मेरी गोद मे डाला और बोला--जा मुझे और लोगों को भी देखना है...जा।

पहले तो मै हक्की बक्की रह गई, फिर मैनें मन ही मन में सोचा कि इसकी भभूती, काले धागे और चावलों से जब इतना फर्क पडा है तो ये मेरे पती को ठीक भी कर सकता है और मेरे खोए बेटे को भी लौटा सकता है तो मैने बिना वक्त गवांये हाथ जोडकर माफी मांगते हुए कहा कि बाबा जी मैं बहुत परेशान हूं, मेरे पती की तबीयत ठीक नहीं रहती और बेटा भी घर से गायब है, मेरा तो दिमाग काम नहीं करता........
 
बाबा ने बीच में टोक कर कहा--सुन...जितना तेरा खर्च होना था वो तेरी इस सामग्री पर हो गया है इससे जादा अब नहीं होगा.... हां आगे तेरे ऊपर है अगर तू मेरी बात मानेंगी तो तेरा पती भी ठीक हो जाएगा और ऊपर वाले ने चाहा तो तेरा बेटा भी लौटेगा।

मैने दोनों हाथ जोडे और अपना सिर उसके कदमों मे रखकर बोली--आपका बडा उपकार होगा बाबा जी।

बाबा ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-- इसके लिए तेरी रजामन्दी भी चाहिए, बिना इसके तेरा पहला काम यानी तेरे पती का ठीक होना असंभव है ।

किस बात की रजामन्दी बाबा---मैनें पूछा

बाबा बोला--तेरे पती को ठीक करने के लिए उसके (मेरे पती) गुप्तांग (लण्ड) पर तेरे और मेरे पानी को लगाना पडेगा।

मैं समझ नहीं पाई और उसके चेहरे को ताकने लगी

मेरी आंखों मे ताकते हुए बाबा बोला--अरररे मैं भूल ही गया कि तुझे इस तरह से समझ मे नहीं आता, साफ-साफ ही कहना होगा तो सुन--मुझे तेरे साथ संभोग करना पडेगा, उसके बाद हम दोनों का जो पानी (वीर्य) निकलेगा उस पानी को तेरे पती के गुप्तांग (लण्ड) के अगले भाग पर लगाना पडेगा फिर देखना कैसे तेरी ग्रहस्थी सुधरेगी......अब समझ मे आया।

मेरी हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई। दिल धक-धक कर मुंह की ओर आने लगा। दिमाग फटने लगा।

बाबा ने मेरे चिन्तन को तोडते हुए कहा--- अभी तू अपनी इस सामग्री लेकर घर जा.....अच्छी तरह सोच लेना.....अगर राजी हो तो आने वाले सोमवार को नहाकर, काले कपडे पहनना और ये सामग्री लेकर दिन के 12 बजे इसके पिछले दरवाजे से अन्दर आना मैं दरवाजा खुला रखूंगा और ना राजी हो तो इस सामग्री को जमीन मे खड्ढा खोदकर कहीं दबा देना....अब तू जा। मैने सामग्री का थैला उठाया और उसको हाथ जोडकर अपने घर आ गई। उस वक्त से लेकर रविवार तक कोई निर्णय नहीं ले पाई। मेरी परेशानी शायद मेरे चेहरे पर उजागर होने के कारण मेरे पती ने कई बार मुझे पूछा भी कि क्या बात है तबियत तो ठीक है, कोई परेशानी तो नहीं है...? ये भी सच था कि बाबा के संपर्क में आने के बाद से मेरे पती के वर्ताव मे बहुत अंतर आया है.....उन्होंने शराब पीनी एक दम बन्द कर दी, वक्त पर आफिस से घर आने लगे....मेरे साथ मधुर संबंध बनाने लगे...मेरी चिन्ता करेने लगे......। अब क्या करूं, बाबा की बात नहीं मानती तो शायद हालात पहले से भी बदतर हो सकते है और मानती हूं तो अपनी इज्जत बाबा को................ और मैनें फैसला किया कि इस सोमवार को तो नहीं जाऊंगी, कुछ गडबड हुई तो अगले सोमवार को जाऊंगी।

सोमवार को 10 बजे पती के आफिस जाने के बाद सारा काम निपटाने के बाद नहाने गई। उस दिन पता नहीं क्या हुआ कि नहाने जाते वक्त पहनने के लिए सिवाय तौलिए के कोई भी कपडा अपने साथ नहीं ले गई निसका एहसास मुझे नहाने के बाद ही हुआ। तौलिया लपेटकर मै कमरे मे आई, अलमारी से काला सूट (सलवार और कमीज) निकालकर पहना। पूरी तरह तैयार होकर अचानक मुझे एहसास हुआ कि कैसे मैने आज अनजाने में ही काले कपडे पहन लिए। एक दम से दिमाग मे जैसे झटका सा लगा और मैने तय किया कि इज्जत तो क्या चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों ना देनी पडे पर मैं अपने परिवार पर आए कष्ट को जरूर दूर करूंगी और पता नहीं कैसे मै सही वक्त पर बाबा के दरबार के पीछे के दरवाजे से एक कमरे में जाकर चारपाई पर बैठ गई। ऐसा लगरहा था जैसे मैं उडकर यहां पहूंची हूं। कुछ ही देर के बाद बाबा कमरे में आकर मेरे सामने खडे होकर बोले---तो तू राजी हो गई.......फिर भी अभी भी तुझे लगता है कि मैं कोई जबरदस्ती कर रहा हूं तो तू वापस जा सकती है...क्योंकि अगर तूने मन से मेरा साथ नहीं दिया तो कोई फायदा नहीं होगा...तेरी कुरबानी भी बेकार जायेगी। बता तू मन से तैयार है ना....................।

जी बाबा जी मैं काफी सोच समझकर आई हूं-- मैने जवाब दिया।

बाबा ने दरवाजा अन्दर से बन्द करने के बाद जमीन पर एक चटाई बिछाई और मेरे से सामग्री का थैला लेकर एक-एक कर सामग्री जमीन पर सजाने लगा। मुझे ये कहकर कि सारे कपडे उतारकर जमीन पर बैठूं, बाबा दूसरे कमरे मे चला गया। मैने फटाफट अपने कपडे उतारकर चारपाई पर रखे और जमीन पर अपनी इज्जत (चूत) को एडी और हथेली से ढक कर बैठी ही थी कि बाबा हाथ मे एक कटोरे मे दूध और दूसरे हाथ मे एक कागज की पुडिया लेकर कमरे मे आया। मेरे ठीक सामने बैठने के बाद बाबा ने अपनी आंखे बन्द की और कुछ देर तक मंत्र पढने के बाद उठकर फिर से दूसरे कमरे से एक लोहे की कर्छी जैसी चीज लेकर आया जिसमें लकडी का बुरादा जैसा कुछ रखा था। एक नींबू लेकर उसके ऊपर तीन लौंग को गाडा फिर मंत्र पढते-पढते हाथ से मुझे खडा होने का इशारा किया।

बाबा ने अब कर्छी रखे बुरादे पर आग लगाई और मुझे टांगे फैलाने को कहा। जब कर्छी की आग बुझ गई तब बाबा कर्छी ठीक मेरी चूत के नीचे लाया और उसमे एक लौंग और कुछ दाने सरसों के डाले जिससे उसका धुंवां निकलने लगा। इसके बाद बाबा मेरी चूत की तरफ इशारा करके बोला--इसको अपने दोनों हाथों से चौडा करो। मेरा ऐसा करने के बाद बाबा ने कर्छी मे रखी राख पर एक और लौंग, कुछ सरसों के दाने और पुडिया से काले पाउडर की एक चुटकी डालकर चूत के नीचे बहुत नजदीक लेकर आया। इस बार अजीब सी गन्ध निकल रही थी। चूत के अन्दर खुजली सी मचने लगी थी।

ये क्रिया करने के बाद बाबा ने मुझे चटाई के ऊपर पीठ के बल लिटाया, मेरी टांगे चौडी कर मेरी चूत के ऊपर नींबू रखकर उस पर चाकू से चीरे लगाए और निचोडा। नींबू का मेरी चूत मे लगते ही चिरमिराहट मचने लगी। मैने खुजाने के लिए अपना हाथ उठाया ही था कि बाबा ने रोक कर कहा---जब तक मैं ना बोलूं इसपर हाथ मत लगाना। खुजली और चिरमिराहट के कारण मैं जमीन पर अपने चूतड रगडकर शांत करने की कोशिस करने लगी। बाबा ने अब मुझे वहीं चटाई पर बिठाया और अपने शरीर पर लिपटे सफेद लुंगी नुमा कपडे को हटाकर नंगा मेरे सामने बैठा और दूध का कटोरा अपने मुरझाए लण्ड को उसमे एक बार डुबाकर कटोरा नीचे रखकर बोला---मेरे मंत्र पढते समय जब मैं हाथ से इशारा करूं, अपनी उन्गलियों से दूध के छींटे इस पर मारना और आंखें बन्द कर वो मुंह के अन्दर ही मंत्र फुसफुसाने लगा। इधर मैं उसके हर इशारे पर मैं उसके लण्ड पर दूध के छींटे मारती रही दूसरी तरफ मेरी चूत के अन्दर और बाहर बरदास्त के बाहर जबरदस्त खुजली और चिरमराहट मचने लगी।
 
धीरे-धीरे उसके लण्ड मे तनाव आने लगा। करीब आधे घन्टे तक यह क्रम चलता रहा। कटोरे मे थोडा ही दूध बचा था कि बाबा ने आंखे खोली और बोला अब तू खुजाना चाहे तो करले।

मेरा हाथ बिजली की तरह चूत पर गया और खुजाने लगी। बाबा मेरी बगल मे आकर बैठा, मुझे अपनी गोदी मे लिटाकर मुझे चूमने लगा, मेरी छातियों को मसलने लगा। उसकी आंखे लाल हो गई, वो वहसी जैसी हरकतें करने लगा, कभी मुझे जोर से अपनी छाती से चिपकाता, कभी पूरी ताकत से मेरी छाती भींचता, मेरी आंखों मे झांक कर मुस्कुराता और

हूंहूंहूं.......करते हुए मेरे होंठों को चूमता।

एक झटके मे बाबा ने मुझे चटाई के ऊपर चित कर लिटाया, दोनों नींबू उठाकर चूत के छेद पर रखकर मन्त्रों के साथ साथ घुमाता रहा। भैंन चोद....साली रंडी... तेरी मां का भोषड़ा मारूँ...........कहते हुए बाबा ने मेरी जाँघों को अपनी बाहों में फंसाकर अपना तमतमाया लंड मेरी चूत पर रखते ही इतनी जोर का धक्का मारा कि मैं करीब आधा फुट पीछे खिसक गई। उसने मेरी जाँघो को पकड़कर एक बार जोर से अपनी तरफ खींचा और पहले की तरह रखते ही मेरे कंधे पकडकर करारा धक्का मारा।

वो किसी पागल की तरह जोर जोर से लगातार धक्के मारने लगा।

बाबा ने मुझे पूछा....... कुछ दर्द..... या मज़ा....या कुछ हो रहा है।

मुझे सिर्फ इतना ही महशूस हो रहा था कि मेरी चूत में कुछ अन्दर बाहर आ जा रहा है... ना कोई दर्द और ना ही कोई मज़ा आ रहा था। यही बात मैंने बाबा को बताई।

बाबा ने मेरे ऊपर से उतरकर एक बार फिर से दोनों नींबू उठाकर उनपर एक-एक लौंग और घुसाकर उनको माचीस की तीली से जलाकर मंत्रों के साथ मेरी चूत के ऊपर काफी देर तक घुमाता रहा। फिर काला धागा उठाकर उसपर मंत्र पढते-पढते कुछ गाँठे मारकर मेरी कमर में बाधने के बाद मेरी चूत को मसलते हुए पूछा...अब कुछ फर्क पड़ा....?

हूँऊंऊंऊं......

बाबा--- हूँऊंऊं क्या होता है....? मेरा मतलब दर्द हो रहा है या अच्छा लग रहा है...?

अच्छा......

चल अब आएगा चोदने का मज़ा कगते हुए बाबा मेरे ऊपर आया और पहले की ही तरह टिकाते ही जोर का धक्का मारते ही मै उईईईई मांआआआआआ चिल्ला पड़ी.... इस बार जोर का दर्द हुआ था। बाबा ने मेरी टाँगों को चौड़ा कर धीरे-धीरे चोदते हुए जो स्पीड पकडी, पट्ठा सांस लेना ही भूल गया था। एक बार तो वो आलम आया कि एक साथ नीचे से मैं जोर से उछलती और ऊपर से वो कस के धाक्का मारने लगा और उसी वक्त वो शाबास...ऐसे ही, शाबास ऐसे ही.....बडबडाने लगा। मैं झड चुकी थी....लेकिन वो नानस्टाप लगा रहा। कुछ देर के बाद बाबा अपने दोनों हाथ मेरे चूतड़ों के नीचे ले गया और एक बार फिर से चालू हो गया, ऐसा करने से उसका पूरा का पूरा लण्ड मेरी चूत मे समा रहा था। धीरे-धीरे मुझे फिर से मज़ा आने लगा। किसी किसी धक्के में तो गजब का ही मज़ा आ रहा था। मेरे हाथ स्वतः ही उसकी कमर पर चले गए और जब भी मज़ा आता मेरे हाथ उसकी कमर को जकड़ लेते। बाबा पसीने से तरबतर हो गया था और उसके पसीने से मेरा पेट भी। जैसे जैसे धक्के पड़ते वैसे वैसे अलग अलग आवांजे निकलने लगी। कभी लण्ड के अन्दर बाहर आने जाने की, कभी नाभी के नीचे के भाग के टकराने की तो कभी पसीने से भरी नाभी पर उसके पेट के चिपकने और छूटने की सटाप....फटाक....फच्च्च....खप्प्प्प....फरररर....फुच्च्च्च्च.....घपाक......बीच-बीच मे बाबा की हुउउउ..... और मेरी ssssss.

मैं तो अब भूल ही गई थी कि मैं कहाँ हूँ....और किसके नीचे हूँ......। उसकी कमर को जकड़ते हुए बार-बार sssssईईईई... हाऎऎऎऎऎऎ..............हाऎऎऎऎऎऎऎ........हाआआआआआआ........करते-करेते उसकी को पूरी ताकत से भींचते हुए नीचे से जोर का धक्का मारते हुए........हाआआआआ जोरररर से........ ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ औररररर......ओ माँआआआआआ के साथ शांत हो गई। दस बारह धक्कों के बाद बाबा भी मेरे ऊपर निढाल हो गया।

कुछ सेकेण्ड के बाद बाबा ये बोलकर कि चूतड़ उठाकर रखना...माल बाहर ना निकले ....मेरे ऊपर से उतरा और थोड़ी दूर रखे दूध के कटोरे को खाली कर मेरी गाँड के नीचे रखने के बाद बोला सारा पानी इसमे निकालना। कटोरा पकड़कर मैं धीरे से उठकर पंजों के बल बैठी और जोर लगाकर सारा पानी (अपने और बाबा का वीर्य) कटोरे में निकाला। बाबा इतनी देर मे एक इंजेक्सन की रबड़ के ढक्कन वाली शीसी लेकर आया और मुझे दोनों के वीर्य को शीसी में भरने को कहा।

उसके कहने पर मैं बाथरूम से अपने आप को साफ कर कमरे में आई और अपने कपडे पहनकर तैयार हो गई। बाबा ने भी अपनी सफेद लुंगी पहनी और कहा कि शीसी मे रखे पानी (वीर्य) को किसी भी तरह मैं अपने पती के लण्ड पर लगाऊँ लेकिन उनको पता नहीं चलना चाहिए, ये भी कहा कि मैं आज ही अपने पती के साथ संभोग करने की कोशिस करूं किसी भी हालत में।

मेरे हाथ मे दोनों नींबू रखकर बोला----एक नींबू जाते हुए किसी चौराहे या तिराहे पर चलते-चलते छोड़ देना, उसके बाद पीछे मुड़कर मत देखना और दूसरा नींबू अपने घर के बाहर (आगे या पीछे) अंधेरा होने पर जमीन मे गाड़ देना। एक हफ्ते में तेरा सबकुछ ठीक हो गया तो अपने भागे बेटे का कोई भी एक बार पहना हुआ कपडा लेकर मेरे पास आना अगर बिना धुला हो तो और भी अच्छा रहेगा।

और एक बात, तेरे जैसी कोई और हो जिसको कोई भी समस्या हो तो मेरे पास भेजना लेकिन जो मैनें अभी तेरे साथ किया, इसके बारे में कुछ भी नहीं बताना।

बाबा के आदेशानुसार एक नींबू मैने चलते-चलते रास्ते में चौराहे पर छोडा और दूसरा घर के पिछवाडे गमले में रखा और वीर्य की शीसी बेड पर गददे के नीचे छुपाकर रख दी। मौका देखकर अंधेरे में मैने नींबू गमले से निकालकर क्यारी मे गाड़ दिया।

अब मेरे दिमाग मे ये उथल-पुथल चल रही थी कि कैसे अपने पती को संभोग के लिए तैयार करूँ फिर बाबा और मेरे वीर्य को उनके लण्ड पर कैसे लगाऊँ...? खाना खाते-खाते मैने उनको संभोग के लिए उकसाना चालू कर दिया। सारे समय उनके सामने ब्लाउज और पेटिकोट में घूमती रही.....जानबूझकर आते-जाते कभी पेटिकोट घुटनों से ऊपर सरकाकर जाँघों को खुजाती तो कभी पेटिकोट के ऊपर से ही चूत को रगड़ती....।
 
इस तरह आखिरकार मैंने उनकी जिञासा को भडकाने में कामयाब हो ही गई। बातों ही बातों मे मैने उनसे request की कि आज अंधेरे मे करतें हैं (ताकि मैं अपने मकसद में सफल हो सकूं)। और बिस्तर पर लेटने पर मैंने उनको दूसरे कमरे से ड्रेसिंग पर रखी तेल की बोतल लाने के लिए भेजा, मौका लगते ही मैने बाबा और मेरे वीर्य की भरी शीसी का ढक्कन खोलकर आधी शीसी अपनी चूत मे घुसेड़ी, शीसी को उलटाकर सारा वीर्य चूत में खाली कर चूत को भींच लिया और शीसी को वापस उसी जगह छुपा दिया।

उनके बिस्तर पर आने के बाद अंधेरे मे मैने उनसे तेल की बोतल माँगी और थोडा सा तेल निकालकर अपनी चूत पर और कुछ उनके लण्ड पर लगाया ताकी उनको मेरी वीर्य से भरी चूत का पता ना चले। उनके लण्ड को सहलाते-सहलाते मैंने उनसे कहा कि आज मेरा बहुत मन कर रहा हैं......कैसे भी करके करलो ना......। ऊपर आते ही मैंने एक हथ से उनके आधे तने आधे मुरझाए लण्ड को पकड़कर अपनी चूत पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी चूत की दोनों लिप्स को फैलाकर नीचे से उछली .....लण्ड का सिरा ही अन्दर घुसा था कि मैने नाटक करते हुए ऊपर को चिपकते हुए कहा कि मेरा हो गया (मतलब मैं झड़ गई)।

चूत मे भरा वीर्य बाहर निकलने लगा और साथ ही साथ उनका लण्ड भी बाहर फिसल गया। फिर मैने उनको बगल मे लिटाया और चूत मे बचे वीर्य से अपनी उंगलियों को गीला किया और उनके लण्ड पर मलकर उनकी मुट्ठी मारने लगी और इस तरह मै अपने और बाबा के मिक्स वीर्य को अपने पती के लण्ड पर लगाने मे कामयाब हो पाई। काफी मसक्कत करने के बाद उस रात मेरे पती मेरी चूत मे लण्ड डाल ही पाए थे कि झड़ गये लेकिन तीसरे दिन मुझे कुछ हद तक मज़ा दे सके। बाबा के कर्म काण्ड से बहुत फर्क पड़ गया था !

उसके अगले हफ्ते मैं अपने बेटे की एक नेकर (half pant) लेकर बाबा के पास गई, बाबा ने नेकर पर कुछ मंत्र पढे और बोला---- वो (मेरा बेटा) जादा दूर नहीं है... कहीं होटल मे काम कर रहा है।

मेरे आँखों मे आँसू आ गए। बाबा ने मुझे शांत करते हुए कहा कि थोडा समय लगेगा लेकिन वो घर जरूर आ जायेगा लेकिन मेरी वही एक शर्त है एक बार फिर से तुझे मेरे साथ संभोग करना पड़ेगा पर..... इस बार तेरे घर मे.......

मैंने टोकते हुए बताया कि ये नहीं हो सकता, मैं सरकारी मकान मे रहती हूँ वहाँ कोई ना कोई आपको आते जाते देख लेगा तो उसने कहा--ये तेरी (यानी मेरी) सरदर्दी है, कैसे होना है, कब होना है तू जान, उसके बाद ही मैं तेरे बेटे को वापस लाने का काम शुरू करूँगा। मेरे बहुत कहने पर भी वो नहीं माना और मैं उससे कुछ वक्त माँगकर घर आ गई। करीब तीन हफ्ते के बाद मेरे पती को किसी की मृत्यू पर दो दिन के लिए हरिद्वार जाना पड़ गया सो बाबा से मिलकर एक पूरी रात का प्रोग्राम बन गया। जिस शुबह मेरे पती हरिद्वार के लिए निकले उसी रात नौ बजे के आस पास बाबा मेरे घर के पीछे के दरवाजे से अन्दर आया। रात दस बजे से शुबह चार बजे तक बाबा ने तीन बार जमकर चोदा......।

सच में मेरी सारी प्यास बुझ गई थी। उस रात बाबा ने बताया कि उसको याद भी नहीं है कि अबतक वो कितनी औरतों को चोद चुका है लेकिन जिसको भी चोदा उसकी परेशानी को भी हमेशा के लिए दूर भी किया। जाते समय बाबा ये बोलकर गया कि जिस दिन तेरा बेटा घर आएगा एक हफ्ते के अन्दर उसे मेरे दरबार मे जरूर लेकर आना और हाँ इसके बाद तू भूल जाना कि हम दोनों के बीच क्या-क्या हुआ। हम दोनों एक दूसरे को नहीं जानते समझी। कोई और तेरी जैसी सुन्दर मूरत किसी परेशानी में हो तो मेरे पास जरूर भेज देना।

करीब दो या ढाई महीने के बाद एक दिन मेरा बेटा घर लौट आया। पूछने पर उसने बताया कि वो रुड़की मे किसी होटल मे काम कर रहा था। पहले तो मैं उससे चिपककर खूब रोई फिर डाँटा भी। खैर मेरे सारे दुखः सारी परेशानी दूर हो गई, बेटा घर लौट आया, मेरे पती की शाराब छूट गई और गृहस्थी भी संभल गई।

वादे के अनुसार एक दिन मैं अपने बेटे को लेकर बाबा के पास गई। बाबा ने उसको आशीर्वाद दिया और एक ताबीज बानाकर उसके गले मे बाँधा।

उसके बाद मैं उस बाबा के पास कभी नहीं गई लेकिन मैं अभी भी सोचती हूँ कि क्या मैने बाबा को अपनी इज्जत बेचकर अपने परिवार को संभालकर नेक काम किया या अपने पती से धोखा किया, कभी पहली बात सही लगती है लेकिन दूसरे ही पल दूसरी बात सही लगती है।

क्या तन्त्र विध्या में सचमुच इतनी शक्ती होती है..........मेरे तजुरबे से तो हाँ होती है।

THE END .......
 
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