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बाबा का कमाल
मैने अपना हर तरह से इलाज करवा लिया लेकिन कहीं से भी कोई फ़ायदा नही हो रहा था। मेरा घर बिखर सा गया था। मै हर वक्त बीमार होने लगी, मेरे पती को शराब की लत लग गई, मेरा एकलौता बेटा सात महीने पहले घर से भाग गया जिसका अभी तक कोई अता पता नहीं चला। एक बार किसी बाबा ने बताया था कि मेरा पैर किसी चौराहे पर उस जगह पडा है जहांपर किसी ने कुछ किया हुआ था, उसने जो उपाय बताया था वो करके भी कोई आराम नहीं मिला। मै इन सब के बारे मे सोच ही रही थी कि दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। मैने दरवाजा खोला तो सामने मेरे मोहल्ले की (पाच घर छोड कर) बन्दना खडी थी जो मूलतह रोहतक हरियाणा की रहने वाली थी। उसका पती सी. आर. पी एफ. मे नौकरी करते थे जिनकी पोस्टिन्ग अक्सर दूसरे प्रदेशों मे ही रहती थी। फिलहाल वो अपने आठ साल के बेटे के साथ अकेले ही रहती थी।
अन्दर आने पर उसने मेरे उदास चेहरे को देखकर कहा ---जीजी मेरी एक बात मान.....तू किसी सयाणे को क्यूं नि दिखाती..?
मेरे पूछने पर उसने बताया - कि सयाणा सब कुछ बता देता है कि किसी ने तेरे परिवार या तुझ पर जादू टोना किया है या किसी की नज़र लगी है या किसी ने कुछ खिलाया है या तेरे घर के देवी देवता रूठ गये है आदि आदि।
सच कहूं सू जीजी भोत मशूर सयाणा है...किते लोगों का भला किया है उसने। जीजी एक भी पीसा नी लेमता वो...जो सामान आवेगा वो तो तने खरच करणा पडेगा...जे फ़ायदा होग्या तो उसी मस्जिद मे जाके अगरवत्ती जलाके एक चादर, एक पाकेट सिगरेट होर माडी सी लौन्ग चढा देना। देख जीजी तने सारा इलाज तो करवा लिया और बाबा से भी कुछ ना होया....इब तू एक बेर सयाणे ते भी बूझ के देख...मेरी आत्मा कहे से थारे को फ़ायादा जरूर होगा जीजी।
समय निकालकर मै बन्दना के साथ सयाणे के पास गई, वहां गेट से अन्दर घुसते ही दो मज़ार थी, कुछ मीटर के बाद एक हालनुमा कमरे मे पहले से ही बीस पच्चीस लोग बैठे थे और कुछ लोग हमारे बाद भी आ रहे थे। लोग बारी बारी से हाल के बाद बने अन्दर वाले कमरे मे जा रहे थे और कोई दस तो कोई आधे घन्टे मे बाहर आ रहे थे। मेरी बारी आने पर बन्दना के साथ मै अन्दर गई, बन्दना ने पहले सयाणे के बगल मे बनी चौकी पर माथा टेका और फिर मैने। सयाणे ने मोर पंख से बारी-बारी से हमदोनों के सिर पर कुछ किया। फिर सयाणे ने बन्दना से पूछा--बेटी वो तेरे गांव वाली अब ठीक है ना... दुबारा आई नहीं।
बन्दना ने कहा-- बाबा वा तो ठीक सै.. इब या भोत परेशानी मे सै बेचारी....सारे जुगत कर लिये, फायदा कोई नी होता....
सयाणा बीच मे मेरी तरफ देखकर बोला-- कोई बात नहीं बेटा.. जरा आगे आ।
मै थोडा खिसककर उसके आगे गई....उसने मेरे सिर पर हाथ रखा... थोडी देर मे मेरा बदन कांपने लगा। वो जोर-जोर से मेरे चेहरे पर फूंक मारने लगा। मेरे सिर से हाथ हटाकर उसने मुझे वापस पीछे खिसकने का इशारा किया और बोला---चार साल से भुगत रही है... तेरी गिरस्थी भी ठीक नहीं है।
(उसकी बातें सुनकर अन्दर से मेरा दिल धडकने लगा) अपनी आंखें बन्दकर जोर की सांस लेकर फिर बोला--तेरा पती........कुछ देर रुककर बोला--बेटी, बुरा मत मानना, मेरे सवाल का सच-सच जवाब देगी..?
मैने धडकते दिल से काम्पते हुए जवाब दिया---जी बाबा।
बाबा--देख मैने पहले ही कहा कि बुरा मत मानना...क्योंकि हमसे कुछ भी छुपा नहीं रह सकता...तो बता तेरी टांगों के बीच मे तिल है....?? सच-सच बताना.........
मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं.... उसकी आंखें बन्द थी...मैने बन्दना की तरफ देखा तो उसने फुसफुसाकर कहा---बतादेना है या नहीं....मैने कांपते हुये जवाब दिया--नहीं।
बाबा उर्दू मे कुछ बडबडाने लगा और बोला-- गलत...गलत....गलत जवाब.....बेटा इसको लेजा.....मुझे झूटा बनारही है......ले जा इसको.....या तो ये मेरी बात समझ नहीं पारही है या ये किसी वजह से झूठ बोल रही है।
बन्दना ने मुझे समझाया कि जीजी सच बता दे ना...बाबा की गणत गल्त नी हो सकती....मै जाणूं सूं।
मैने फिर से कहा कि मुझे पता है, कोई तिल है ही नहीं.
बाबा अपने आसन से उठ खडा हुआ और, इसको लेजा बेटी.....कहकर कमरे से बाहर निकल गया। पीछे -पीछे हम दोनों भी बाहर निकल गये। बाहर हाल मे छै-सात लोग अभी इन्तजार मे बैठे थे। बाबा मज़ार के पास जाकर सिगरेट पीने लगा। बन्दना उसके पास गई और कुछ बातकर उसके पैर छुए और हम दोनो वहां से निकल गये।
रास्ते मे बन्दना और मेरे मे काफी बहस हुई, वो बोली कि मेरे घ्यान से इब तक सयाणे की कोई बात गल्त ना हुई जीजी....। मै भी अपनी बात पर एक दम अडिग थी कि मेरी टांगों के बीच मे कोई तिल है ही नही। बन्दना ने मुझे टांगों के बीच का मतलब समझाने की कोशिस की बाबा साफ-साफ कैसे कहते.. उनका मतलब शायद मेरी चूत पर तिल से था...। मैने बन्दना से कहा कि मै बाबा की बाद समझ गई थी...लेकिन मेरे वहां भी तिल नहीं है.. लेकिन बाबा की तरह बन्दना भी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रही थी।
घर पहुंचने के बाद मैने साडी-पेटीकोट ऊपर उठाकर बन्दना को कहा कि ----देख, तू ही देखले कहां है तिल...?
देखने के बाद वो बोली--यार जीजी, मेरे संघ्य़ान मे बाबा की बात पैली बार गल्त होगी। आज तांई हर बात सच निकली, नूकर कैसे होग्या।
दूसरे दिन नहाते वक्त अचानक मेरे मन मे कुछ खयाल आया, नहाने के बाद केवल मैक्सी पहनकर बेडरूम मे आई, वाल मिरर को बेड के पास दीवार के साथ टेढा रख, अपनी टांगें चौडी कर अपनी चूत के लिप्स को फैलाकर देखा तो मै हैरान रह गई....। लिप्स की अन्दर की तरफ बडा सा तिल था।
मुझे हैरानी जादा उस बाबा के कान्फिडेन्स पर हुई जो अपनी बात पर अडा हुआ था कि मेरी टांगों के बीच मे तिल है और मै..तिल होते हुए भी आज तक अनजान थी। कुछ अजीब सा भी लगा कि क्या ये बाबा या सयाणे लोग सब कुछ देख सकते हैं वो भी अन्दर तक.....।
मैने अपना हर तरह से इलाज करवा लिया लेकिन कहीं से भी कोई फ़ायदा नही हो रहा था। मेरा घर बिखर सा गया था। मै हर वक्त बीमार होने लगी, मेरे पती को शराब की लत लग गई, मेरा एकलौता बेटा सात महीने पहले घर से भाग गया जिसका अभी तक कोई अता पता नहीं चला। एक बार किसी बाबा ने बताया था कि मेरा पैर किसी चौराहे पर उस जगह पडा है जहांपर किसी ने कुछ किया हुआ था, उसने जो उपाय बताया था वो करके भी कोई आराम नहीं मिला। मै इन सब के बारे मे सोच ही रही थी कि दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। मैने दरवाजा खोला तो सामने मेरे मोहल्ले की (पाच घर छोड कर) बन्दना खडी थी जो मूलतह रोहतक हरियाणा की रहने वाली थी। उसका पती सी. आर. पी एफ. मे नौकरी करते थे जिनकी पोस्टिन्ग अक्सर दूसरे प्रदेशों मे ही रहती थी। फिलहाल वो अपने आठ साल के बेटे के साथ अकेले ही रहती थी।
अन्दर आने पर उसने मेरे उदास चेहरे को देखकर कहा ---जीजी मेरी एक बात मान.....तू किसी सयाणे को क्यूं नि दिखाती..?
मेरे पूछने पर उसने बताया - कि सयाणा सब कुछ बता देता है कि किसी ने तेरे परिवार या तुझ पर जादू टोना किया है या किसी की नज़र लगी है या किसी ने कुछ खिलाया है या तेरे घर के देवी देवता रूठ गये है आदि आदि।
सच कहूं सू जीजी भोत मशूर सयाणा है...किते लोगों का भला किया है उसने। जीजी एक भी पीसा नी लेमता वो...जो सामान आवेगा वो तो तने खरच करणा पडेगा...जे फ़ायदा होग्या तो उसी मस्जिद मे जाके अगरवत्ती जलाके एक चादर, एक पाकेट सिगरेट होर माडी सी लौन्ग चढा देना। देख जीजी तने सारा इलाज तो करवा लिया और बाबा से भी कुछ ना होया....इब तू एक बेर सयाणे ते भी बूझ के देख...मेरी आत्मा कहे से थारे को फ़ायादा जरूर होगा जीजी।
समय निकालकर मै बन्दना के साथ सयाणे के पास गई, वहां गेट से अन्दर घुसते ही दो मज़ार थी, कुछ मीटर के बाद एक हालनुमा कमरे मे पहले से ही बीस पच्चीस लोग बैठे थे और कुछ लोग हमारे बाद भी आ रहे थे। लोग बारी बारी से हाल के बाद बने अन्दर वाले कमरे मे जा रहे थे और कोई दस तो कोई आधे घन्टे मे बाहर आ रहे थे। मेरी बारी आने पर बन्दना के साथ मै अन्दर गई, बन्दना ने पहले सयाणे के बगल मे बनी चौकी पर माथा टेका और फिर मैने। सयाणे ने मोर पंख से बारी-बारी से हमदोनों के सिर पर कुछ किया। फिर सयाणे ने बन्दना से पूछा--बेटी वो तेरे गांव वाली अब ठीक है ना... दुबारा आई नहीं।
बन्दना ने कहा-- बाबा वा तो ठीक सै.. इब या भोत परेशानी मे सै बेचारी....सारे जुगत कर लिये, फायदा कोई नी होता....
सयाणा बीच मे मेरी तरफ देखकर बोला-- कोई बात नहीं बेटा.. जरा आगे आ।
मै थोडा खिसककर उसके आगे गई....उसने मेरे सिर पर हाथ रखा... थोडी देर मे मेरा बदन कांपने लगा। वो जोर-जोर से मेरे चेहरे पर फूंक मारने लगा। मेरे सिर से हाथ हटाकर उसने मुझे वापस पीछे खिसकने का इशारा किया और बोला---चार साल से भुगत रही है... तेरी गिरस्थी भी ठीक नहीं है।
(उसकी बातें सुनकर अन्दर से मेरा दिल धडकने लगा) अपनी आंखें बन्दकर जोर की सांस लेकर फिर बोला--तेरा पती........कुछ देर रुककर बोला--बेटी, बुरा मत मानना, मेरे सवाल का सच-सच जवाब देगी..?
मैने धडकते दिल से काम्पते हुए जवाब दिया---जी बाबा।
बाबा--देख मैने पहले ही कहा कि बुरा मत मानना...क्योंकि हमसे कुछ भी छुपा नहीं रह सकता...तो बता तेरी टांगों के बीच मे तिल है....?? सच-सच बताना.........
मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं.... उसकी आंखें बन्द थी...मैने बन्दना की तरफ देखा तो उसने फुसफुसाकर कहा---बतादेना है या नहीं....मैने कांपते हुये जवाब दिया--नहीं।
बाबा उर्दू मे कुछ बडबडाने लगा और बोला-- गलत...गलत....गलत जवाब.....बेटा इसको लेजा.....मुझे झूटा बनारही है......ले जा इसको.....या तो ये मेरी बात समझ नहीं पारही है या ये किसी वजह से झूठ बोल रही है।
बन्दना ने मुझे समझाया कि जीजी सच बता दे ना...बाबा की गणत गल्त नी हो सकती....मै जाणूं सूं।
मैने फिर से कहा कि मुझे पता है, कोई तिल है ही नहीं.
बाबा अपने आसन से उठ खडा हुआ और, इसको लेजा बेटी.....कहकर कमरे से बाहर निकल गया। पीछे -पीछे हम दोनों भी बाहर निकल गये। बाहर हाल मे छै-सात लोग अभी इन्तजार मे बैठे थे। बाबा मज़ार के पास जाकर सिगरेट पीने लगा। बन्दना उसके पास गई और कुछ बातकर उसके पैर छुए और हम दोनो वहां से निकल गये।
रास्ते मे बन्दना और मेरे मे काफी बहस हुई, वो बोली कि मेरे घ्यान से इब तक सयाणे की कोई बात गल्त ना हुई जीजी....। मै भी अपनी बात पर एक दम अडिग थी कि मेरी टांगों के बीच मे कोई तिल है ही नही। बन्दना ने मुझे टांगों के बीच का मतलब समझाने की कोशिस की बाबा साफ-साफ कैसे कहते.. उनका मतलब शायद मेरी चूत पर तिल से था...। मैने बन्दना से कहा कि मै बाबा की बाद समझ गई थी...लेकिन मेरे वहां भी तिल नहीं है.. लेकिन बाबा की तरह बन्दना भी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रही थी।
घर पहुंचने के बाद मैने साडी-पेटीकोट ऊपर उठाकर बन्दना को कहा कि ----देख, तू ही देखले कहां है तिल...?
देखने के बाद वो बोली--यार जीजी, मेरे संघ्य़ान मे बाबा की बात पैली बार गल्त होगी। आज तांई हर बात सच निकली, नूकर कैसे होग्या।
दूसरे दिन नहाते वक्त अचानक मेरे मन मे कुछ खयाल आया, नहाने के बाद केवल मैक्सी पहनकर बेडरूम मे आई, वाल मिरर को बेड के पास दीवार के साथ टेढा रख, अपनी टांगें चौडी कर अपनी चूत के लिप्स को फैलाकर देखा तो मै हैरान रह गई....। लिप्स की अन्दर की तरफ बडा सा तिल था।
मुझे हैरानी जादा उस बाबा के कान्फिडेन्स पर हुई जो अपनी बात पर अडा हुआ था कि मेरी टांगों के बीच मे तिल है और मै..तिल होते हुए भी आज तक अनजान थी। कुछ अजीब सा भी लगा कि क्या ये बाबा या सयाणे लोग सब कुछ देख सकते हैं वो भी अन्दर तक.....।