S
StoryPublisher
Guest
बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़
लेखक;ओमप्रकाश कश्यप
आज से ठीक चौदह साल पहले टोपीलाल का जन्मी हुआ. माता-पिता थे बेहद ग़रीब. अनपढ़, ईमानदार और भले. मेहनती और सूझबूझ वाले, मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते. भला सोचते, भला ही करते. रोजगार की तलाश में गांव से शहर तक आए थे. शहर की सीमा पर एक होटल बन रहा था. हाथ का हुनर काम आया. दोनों को वहीं काम मिल ग़या. अपने श्रम-कौशल से उन्हेंट मान मिला; और सम्माभन भी. दिन बीतने लगे. एक दिन वे काम पर जुटे थे. होटल के कंगूरे की चिनाई का काम चल रहा था. तभी औरत के पेट में दर्द उठने लगा. पति ने सहारा दिया. वह उसको इमारत के एकांत स्थ्ल पर ले ग़या. थोड़ी देर बाद ही बच्चे की किलकारी हवा से लोरी गाने का आग्रह करने लगी. बेटे को ठीक-ठाक जन्मह देने के बाद मां ने उसके पिता से पूछा- ‘नाम क्याा रखोगे?'
उस समय पति के हाथ में एक टोपी थी. उससे वह माथे पर आए पसीना सुखाने के लिए हवा झल रहे थे. पत्नी् के एकाएक सवाल करने पर वे जवाब न दे सके. भीतर से छलकती खुशी को होंठों से दबाते हुए प्रश्नह-भरी निगाहों से टोपी हिलाने लगे.
‘समझ ग़ई, दूसरों से हटकर है, अच्छाल है.'
‘क्याह?'
‘टोपीलाल, है ना?'
‘हैं!' पुरुष चौंक पड़ा, बोला-‘तुम्हेंह पसंद है?'
‘तुम्हालरा दिया हुआ नाम भला नापसंद क्योंत हो.' अबोध शिशु को प्या'र से निहारते हुए मां मुस्कसरा दी.
इस प्रकार बातों-बातों में बच्चेय का नामकरण संस्का्र भी संपन्न हो ग़या. उसके जन्मप के समय एक और खास बात हुई. वह थी उसके मां को बहुत कम प्रसव पीड़ा. घर से बाहर प्रसव का सकुशल निपट जाना किसी चमत्कामर जैसा ही था. यही नहीं प्रसव का काम निपटाकर उसकी मां ने पिता को वापस काम पर भेज दिया था. उसके बाद तो वे पूरा काम समेटकर ही घर लौटे थे. इस बात की चर्चा टोले के लोग़ महीनों तक करते रहे.
टोपीलाल के पिता राजमिस्त्री थे. पति-पत्नीच दोनों साथ-साथ काम करने जाते. टोपीलाल के पिता नहीं चाहते थे कि उसकी मां काम करे. वह भी मजदूरी. इससे बाकी मजदूरों के आगे उनकी हेठी होगी, ऐसा उनको लग़ता था. इसलिए जब पहली बार उसकी मां ने काम पर साथ चलने कोे कहा तो उन्हों ने साफ मना कर दिया था.
‘इसमें शर्म कैसी?'
‘मेरी घरवाली होकर मजदूरों के साथ काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.'
‘और जो पति-पत्नीा दोनों तुम्हाेरे लिए मजदूरी करते हैं, उनपर क्याो गुजरती होगी, कभी सोचा है? मुझसे पूरे दिन घर में बिना काम के नहीं बैठा जाता. तुम यदि अपने साथ काम पर नहीं रखना चाहते तो मैं दूसरी जग़ह काम की तलाश करूं.'
‘यह क्या बात हुई?'
उस दिन टोपीलाल की मां की ही चली. वह काम पर जाने लगी. उसके पिता नहीं चाहते थे कि वह ज्यासदा मेहनत करे. मिस्त्री होने के कारण वह चाहते थे कि कोई हल्काद-फुल्का काम दे दिया जाए. लेकिन टोपीलाल की मां बिना मान-गुमान के सबके बराबर मेहनत करती. मजदूर औरतों के साथ प्याथर से बोलती-बतियाती. जरूरत हो तो उनकी मदद भी करती.
बेटे के जन्मक के बाद टोपीलाल के पिता ने सोचा था कि चलो इसी बहाने वह कुछ दिन आराम कर लेगी. इसलिए बोले-
‘इस हालत में तुम्हाकरा कड़ी मेहनत करना क्याथ ठीक होगा?'
‘क्योंल जब मैं पहले जैसी स्वहस्था हूं तो पहले जैसा काम क्यों नहीं कर सकती?'
‘फिर भी लोग़ तो यही कहेंगे कि मैं बहुत कठोर हूं. बच्चेम के जन्मी के तीसरे ही दिन तुम्हें काम पर जोत दिया.'
‘मैं उन्हेंं बता दूंगी कि मैं अपनी मर्जी से काम करने आई हूं.'
‘ऐसी जिद किसलिए? फिर हमारे सामने कोई मजबूरी भी नहीं हैे. घर का खर्च तो मेरी कमाई से चल ही जाता है.'
‘इसलिए कि मैं मानती हूं कि जो कर सकता है उसको काम करना ही चाहिए. बिना मेहनत के खाने का किसी को अधिकार नहीं है.'
‘मुझे नहीं लग़ता कि इस हालत में तुम ईंट और गारे से भरी परात सिर पर उठा सकती हो?'
‘हां, यह तो मैं भी सोचती हूं; और तुम कहोगे तो उठाऊंगी भी नहीं.'
‘फिर वहां जाकर क्या करोगी?' टोपीलाल के पिता अचरज में थे.
‘मिस्त्रीगिरी! तुम्हागरे साथ इतने दिनों तक काम करते हुए मैं भी काफी कुछ सीख चुकी हूं. फिर एक बच्चे की मां हूं, अब तो मुझे भी तरक्की पाने का अधिकार है, क्यों ?'
उसके बाद वही हुआ जो टोपीलाल की मां ने ठाना हुआ था. दो दिन के टोपीलाल को जमीन पर सुलाकर वह कन्नीब और वसूली लेकर पति के सामने बैठ ग़ई. मजदूरिनें उसकी हिम्मरत देख दंग़ रह ग़ईं. बाकी मिस्त्रियों ने मुंह चिढ़ाया. कहा कि कुछ देर की त्रियाहठ है, किंतु उसको सधे हाथों से ईंट पर ईंट चिनते हुए देख सबकी बोलती बंद हो ग़ई.
टोपीलाल के जन्मऔ के तीसरे ही दिन देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री का जन्मम हुआ.
एक औरत और राजमिस्त्री, लोगों ने इसे भी चमत्कासर ही माना.
सचमुच, चमत्काार ही तो था.
बीच की एक और घटना दिमाग़ चाट रही है.
होटल का काम पूरा हुआ तो टोपीलाल छठा वर्ष का पार कर चुका था. उसी के कमरों में लोट लगाते, सीढ़ियों पर धमा-चौकड़ी करते हुए वह बड़ा हो रहा था. हुनरमंद हाथों के परस से होटल की इमारत चमचमा रही थी. बाकी की कसर बिजली के लट्टुओं ने पूरी कर दी थी, जो जग़ह-जग़ह रंग़-बिरंगी आभा बिखेर रहे थे. जग़मगा रहे थे यहां-वहां. आखिरी दिन कारीग़रों और मजदूरों का हिसाब करने के लिए मालिक ने सबको जमा किया था. होटल पूरे शहर मेंं निराला था. ठीक उसके मालिक की कल्पकना के अनुरूप. सुरुचि एवं संपन्नहता का बेमिसाल नमूना. मालिक उनके काम से प्रसन्ना था. मजदूरी के अलावा सबको कुछ न कुछ भेंट में देने का इंतजाम भी उसने अपनी ओर से किया था. ताकि यादगार बनी रहे.
टोपीलाल का जन्मन उसी होटल में हुआ था. वह दुनिया का शायद पहला होटल था, जिसमें पति-पत्नीे दोनों ने राजमिस्त्री की कमान संभाली थी. यह बात भी मालिक की जानकारी में थी. टोपीलाल के लिए उसने खासतौर पर कपड़े बनवाए थे. मालिक उसे अपने लिए शुभ मान रहा था.
शाम का समय. मैदान में डेढ़-दो सौ की भीड़. पंडाल, कुर्सी और मेज को अस्था यी कार्यालय के रूप में सजाया ग़या था. मजदूरों के बच्चेड एक ओेर खेल रहे थे. कुछ होटल को हसरत-भरी निगाहों से देख रहे थे. उनकी अपनी ही मेहनत का कमाल, खून-पसीने से खड़ी हुई आलीशान इमारत. हुनरमंद हाथों की कारीग़री की बेमिसाल पेशकश. उसको देखकर कोई भी स्वनयं पर गुमान कर सकता था. वक्तम खुशी का था और शायद दुःख का, एक-दूसरे से बिछोह का भी था.
यूं तो टोले के अधिकांश मजदूर-मिस्त्री आपस में परिचित थे. परंतु जीवन-संघर्ष में हर बार कुछ न कुछ पीछे छूट जाते. उनकी भरपाई करने नए लोग़ शामिल हो जाते. वक्तम उन सबसे विदा लेने का था, जिनके साथ सुख-दुख-भरे इतने साल बिताए थे. पसीने की अदला-बदली की थी. दुख में आंसू बहाए, सुख में हिस्सेछदारी की थी. वर्षों से वे साथ-साथ काम करते आए थे. आगे काम की तलाश उनमें से न जाने किस-किस को, कहां-कहां ले जाए. इसके बाद फिर कभी मिलने का अवसर मिले भी या नहीं. ऐसी चिंताएं लोगों को सता रही थीं.
ऐसे वक्तक पर कुछ लोगों की आंखें भरी हुई थीं. तो कुछ उतनी देर के लिए दार्शनिक बन चुके थे. जिंदगी में मिलना और बिछुड़ना तो सत्यल सनातन है, यह कहकर वे मन को झूठी तसल्लीि देने की कोशिश कर रहे थे. कुछ यह सोचकर खिन्न् थे कि जिस इमारत को उन्होंतने अपने खून-पसीने और हाथों के हुनर से प्राणवंत बनाया, आज के बाद कोई उसमें शायद ही भीतर आने दे या कोई उनको पहचाने भी. उनके जीवन की यही त्रासदी थी. वे ईंट-गारे को जीवन देकर उसे इमारत में ढालते. कन्नीी और गुनिया लेकर उसका अंग़-अंग़ तराशते. कोरी मिट्टी में प्राण-प्रतिष्ठा करते. लेकिन काम पूरा होते ही उसमें रहने का अधिकार खो बैठते थे.
ऐसे लोग़ होटल की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे. यह सोचकर कि आगे कभी लौटे तो दरवाजे पर बड़े-बड़े दरबान खड़े दिखाई देंगे. उन जैसों को वे शायद ही भीतर आने दें. इसलिए विदाई बेला में वे अपने हाथों के कमाल को भीगी पलकों से, आखिरी बार जी भ्रैरकर देख लेना चाहते थे. सहेज लेना चाहते थे उसके रूपाकार, उससे निर्माण से जुड़ी स्मृदतियों को.
मजदूरी बांटने का काम प्रारंभ हो चुका था. मालिक एक-एक को आवाज देकर बुला रहा था.
‘टोपीलाल!' मुनीम की ओर से आवाज लगी. इसी के साथ तालियों की आवाज गूंज उठी. टोपीलाल के पिता उसे लेकर आगे बढ़ें, उससे पहले ही टोपीलाल स्व यं आगे बढ़ ग़या. एक पांच-छह साल के बच्चे को भरे विश्वा स के साथ आगे बढ़ते देख लोग़ दंग़ रह ग़ए. तालियों का वेग़ दुगुना हो ग़या.
‘नाम क्याे है?' नन्हें टोपीलाल से मालिक ने पूछा.
‘ट्...ट्...टोपीलाल!' नन्हीछ, हकलाती-सी जुबान से जवाब मिला.
‘क्याक टोंटीलाल?' मालिक बचपन में लौट ग़या. सबकी हंसी छूट ग़ई.
‘नईं, टोपीलाल...टोपीलाल!' टोपीलाल ने दोहराया.
‘तो टोपी कहां छोड़ आए?' मालिक ने मजाक किया. एक बार फिर मैदान हंसी से उछलने लगा.
‘मेरी जेब में रखी है.' टोपीलाल ने बिना सकुचाए जवाब दिया. कभी उसकी मां ने उसके लिए एक टोपी सिली थी. जिसको वह अक्सैर अपनी जेब में रखता था. उसने जेब से टोपी निकालकर तत्काबल पहन भी ली. टोपीलाल की हाजिरजवाबी पर एक बार फिर जोरदार तालियां बजीं. मालिक भी खुशी से नहा उठा. उसने अपने हाथों से टोपीलाल को कपड़े भेंट किए, जिनमें एक रेशम की टोपी भी थी. मालिक टोपीलाल को अपने हाथों से टोपी पहना ही रहा था कि अचानक वह परेशान हो उठा.
टोपीलाल वापस जाने लगा. तभी मालिक की ओर से आवाज आई--
‘ठहरो, वापस आओ बेटे!' टोपीलाल रुक ग़या.
‘जरा अपने कपड़ों की जेब तो देखो. मेरी घड़ी शायद उसमें गिर ग़ई है.' मालिक ने कहा.
मालिक की घड़ी की गुमशुदगी की खबर मिलते ही एकाएक हड़कंप मच ग़या. कर्मचारियों में अफरातफरी मच ग़ई. एक ने मालिक को खुश करने के लिए दौड़कर टोपीलाल को पकड़ लिया. आनन-फानन में उसकी तलाशी ली ग़ई. लेकिन घड़ी वहां नहीं थी. सभी परेशान. मालिक अपनी महंगी घड़ी को लेकर चिंतित था. उससे भी अधिक परेशान थे उसके कर्मचारी. हालांकि वे परेशानी का दिखावा ही अधिक कर रहे थे.
‘मैंने देखा, अभी कुछ देर पहले तक तो घड़ी साहब के हाथ में थी, बड़ी जल्दी छिपा दी!' एक कर्मचारी ने टोपीलाल को डांटा.
टोपीलाल चुपचाप खड़ा था. उसके माता-पिता को काटो तो खून नहीं. दोनों स्वीयं को अपमानित महसूस कर रहे थे. विदाई की बेला में यह कैसा अपशगुन. काम पूरा होने की जो खुशी थी, वह गायब हो चुकी थी. कर्मचारियों ने टोपीलाल को पकड़ रखा था.
‘मालिक इसके पास घड़ी भला कहां से आई? आपके दिए कपड़ों के सिवाय इसके पास कुछ और नहीं है.' टोपीलाल के पिता ने गिड़गिड़ाकर कहा. उसकी मां भी आगे आकर फरियाद करने लगी-
‘मेरा टोपीलाल चोर नहीं है मालिक.'
‘यह बहुत शैतान है, कुछ भी कर सकता है.' कर्मचारियों के बीच से आवाज आई. सबने देखा वह बिशंभर था. टोपीलाल के माता-पिता से ईर्ष्यास करने वाला. किसी को उसकी बात पर भरोसा न हुआ, लेकिन दूसरे कर्मचारियों को टोपीलाल को तंग़ करने का बहाना मिल ग़या.
मालिक परेशान था. उसका मूड खराब हो चुका था. घड़ी महंगी थी. पर मालिक की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं. वह अपने लिए कभी भी दूसरी घड़ी खरीद सकता था. लेकिन सबके सामने से घड़ी का अनायास गायब हो जाना उसको परेशान कर रहा था. चोर का पता लग़ना भी जरूरी था. आखिर उसने सारे कर्मचारियों को एक ओर खड़ा हो जाने का आदेश दिया. फिर टोपीलाल को अपने पास बुलाया, प्या र से पूछा-
‘बता दो बेटे, मुझे अच्छीर तरह से याद है, तुम्हेंि बुलाने से पहले घड़ी मेरी कलाई पर बंधी थी.'
‘मुझे नहीं मालूम.' मालिक के पूछने पर टोपीलाल ने जवाब दिया. चोरी के इल्जा़म से वह घबरा ग़या था.
‘मालिक यह झूठ बोलकर चोरी का इल्जामम दूसरों पर डालना चाहता है.' एक कर्मचारी टोपीलाल पर गुर्राया.
‘तुम कैसे कह सकते हो?' बिना झिझके टोपीलाल ने कहा.
‘इसलिए कि घड़ी सबके सामने, अभी-अभी गायब हुई है. उस समय केवल तुम मालिक के पास थे.'
‘मालिक के पास तो उनके नौकर और कर्मचारी भी हैं. उनसे भी तो पता करना चाहिए. चोर हमारे टोले का नहीं है.'
‘फिर भी घड़ी की चोरी तो हुई है.'
‘तो यह तो मालिक और उसके कर्मचारी जानें.' टोपीलाल ने निडर होकर कहा.
‘कर्मचारी तो सभी पीछे हैं, फिर उनमें इतनी हिम्म त कहां कि मालिक की घड़ी की चोरी कर सकें.'
टोपीलाल के दिमाग़ में बार-बार कुछ खटक रहा था. कि जैसे कुछ याद करना चाहता हो. किंतु विचार दिमाग़ में टिकने से पहले ही हवा हो जाता था.
मालिक के आदेश पर टोपीलाल को एक ओर बिठा दिया ग़या. मजदूरी बांटने का काम रुक चुका था. बाकी मजदूर भी पेशोपेश में थे. कुछ इस बात को लेकर परेशान थे कि मालिक का मूड खराब होने के बाद अब ठीक-ठाक ईनाम नहीं मिल पाएगा. लेकिन एकाध के मन में छिपे संदेह की बात जाने दें तो, उनमें से कोई भी टोपीलाल को चोर मानने को तैयार नहीं था.
सहसा टोपीलाल उठकर खड़ा हो ग़या. सभी उसकी ओर देखने लगे. उसने कहा-
‘अग़र मैं चोर पकड़वा दूं तो आप मेरी मां और बापू को जाने देंगे?'
‘हम तुम्हेंो ईनाम भी देंगे.' मलिक ने खुश होकर कहा. उस समय टोपीलाल का दिमाग़ बहुत तेजी से सोच रहा था. उसको लगा कि घड़ी अग़र मालिक की कलाई से गायब हुई तो वह अवश्या ही खुलकर गिरनी चाहिए. पर गिरकर जाएगी कहां! नीचे! फर्श पर! लेकिन फर्श पर गिरती तो नजर में आ जाती! फिर कहां ग़ई? यकायक उसकी आंखें चमक उठीं.
‘मालिक घड़ी आपके उस नौकर के पास है, जिसकी आंखों के नीचे ग़हरा काला दाग़ है.' टोपीलाल ने रहस्यय से पर्दा हटाया. इसपर सभी चौंक पड़े.
‘चंदगी...! अभी तक तो वह यहीं था, अचानक कहां चला ग़या?' टोपीलाल की बताई पहचान पर मालिक के पीछे खड़े एक कर्मचारी के मुंह से निकला. सहसा सबकी आंखें चमक उठीं. चंदगी की खोज की जाने लगी.
‘मालिक पुलिस बुलाकर इसे पकड़वा दीजिए. यह आपका कीमती समय बरबाद कर रहा है.' इस बीच पीछे से दूसरे कर्मचारी की आवाज आई.
‘चुप रहो इतने सारे लोगों के सामने हमारी घड़ी गायब हुई है. उसका इल्जााम इस बच्चेे पर लगाने पर पुलिस क्याच हमारी बात मानेगी. उल्टेी हमारी ही हंसी होगी. तुम चंदगी को फौरन बुलाओ.' मालिक ने डांटा. इस पर कर्मचारी पीछे खडे़ आपस में खुसर-पुसर करने लगे.
कुछ देर के बाद चंदगी को खोज लिया ग़या. वह टोकरी को साफ करने के लिए उठाकर ले ग़या था. वह एक बार पहले भी चोरी के आरोप में पकड़ा जा चुका था. उस समय तो मालिक ने उसपर दया करते हुए छोड़ दिया था. टोपीलाल ने जैसे ही उससे घड़ी लौटाने को कहा, उसका चेहरा पीला पड़ ग़या. मालिक समेत सभी का ध्यालन उसकी ओर चला ग़या. मालिक ने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह घबरा ग़या और उसके पैरों पर गिर पड़ा. गिड़गिड़ाकर माफी मांग़ने लगा.
चोरी का भेद खुल चुका था. सभी टोपीलाल की बुद्धि पर हैरान थे. घड़ी चंदगी तक कैसे पहुंची, और टोपीलाल को उसके बारे में कैसे पता चला, यह एक रहस्या था.
‘वह तो बहुत पीछे खड़ा हुआ था, मेरे पास आया तक नहीं.' मालिक हैरान था.
‘आया था मालिक, टोकरी उठाने के लिए.'
मालिक को याद आया. चाय के खाली कप, रद्दी काग़ज वगैरह डालने के लिए एक डस्टीबिन का इंतजाम किया ग़या था. उसी को उठाने के लिए चंदगी आगे आया था.
‘तुम्हेंथ कैसे पता चला कि घड़ी डस्टंबिन में गिरी है, और चंदगी के पास है?' मालिक ने पूछा.
‘मेरे पापा चोर नहीं हैं, मैं भी चोर नहीं हूं.' टोपीलाल ने भोलेपन से कहा. घड़ी मिल जाने से टोपीलाल के पिता की हिम्महत वापस लौट आई थी. वे आगे आकर बोले-
‘मालिक मेहनतकश लोग़ ईमानदार से जीते, अपने पसीने की कमाई खाते हैं. उनमें इतनी हिम्मसत कहां कि आपकी महंगी घड़ी रख सकें. इतनी महंगी घड़ी को हमारे पास देखकर कोई भी चोरी का इल्जांम लगा लेगा. इसलिए यह काम आप ही के आदमियों का हो सकता है, इसका हमें विश्वाईस था. सबके सामने घड़ी की चोरी तो संभव न थी. इसीलिए संभावना यही थी कि वह अपने आप खुलकर गिर ग़ई हो. यही सोचते हुए इसे आपके नौकर द्वारा डस्ट बिन उठाने की घटना याद आ ग़ई. तब इसको यह अनुमान लगाते देर
न लगी कि जो कर्मचारी उसे लेकर ग़या है, घड़ी उसके पास हो सकती है, क्यों बेटा?'
टोपीलाल ने ‘हां' के पक्ष में अपनी ग़र्दन हिला दी.
‘शाबास!' मालिक के मुंह से अनायास निकला. छह साल की आयु में टोपीलाल को मिली यह पहली कामयाबी थी. इस घटना के बाद उसके चाहने वाले उसको जासूस टोपीलाल के नाम से पुकारने लगे. लोगों ने मान लिया कि बड़े सोच के लिए उम्र में बड़ा होना जरूरी नहीं है. असाधारण व्येक्तिेत्व साधारण वेश में भी सामने आ सकता है. -
लेखक;ओमप्रकाश कश्यप
आज से ठीक चौदह साल पहले टोपीलाल का जन्मी हुआ. माता-पिता थे बेहद ग़रीब. अनपढ़, ईमानदार और भले. मेहनती और सूझबूझ वाले, मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते. भला सोचते, भला ही करते. रोजगार की तलाश में गांव से शहर तक आए थे. शहर की सीमा पर एक होटल बन रहा था. हाथ का हुनर काम आया. दोनों को वहीं काम मिल ग़या. अपने श्रम-कौशल से उन्हेंट मान मिला; और सम्माभन भी. दिन बीतने लगे. एक दिन वे काम पर जुटे थे. होटल के कंगूरे की चिनाई का काम चल रहा था. तभी औरत के पेट में दर्द उठने लगा. पति ने सहारा दिया. वह उसको इमारत के एकांत स्थ्ल पर ले ग़या. थोड़ी देर बाद ही बच्चे की किलकारी हवा से लोरी गाने का आग्रह करने लगी. बेटे को ठीक-ठाक जन्मह देने के बाद मां ने उसके पिता से पूछा- ‘नाम क्याा रखोगे?'
उस समय पति के हाथ में एक टोपी थी. उससे वह माथे पर आए पसीना सुखाने के लिए हवा झल रहे थे. पत्नी् के एकाएक सवाल करने पर वे जवाब न दे सके. भीतर से छलकती खुशी को होंठों से दबाते हुए प्रश्नह-भरी निगाहों से टोपी हिलाने लगे.
‘समझ ग़ई, दूसरों से हटकर है, अच्छाल है.'
‘क्याह?'
‘टोपीलाल, है ना?'
‘हैं!' पुरुष चौंक पड़ा, बोला-‘तुम्हेंह पसंद है?'
‘तुम्हालरा दिया हुआ नाम भला नापसंद क्योंत हो.' अबोध शिशु को प्या'र से निहारते हुए मां मुस्कसरा दी.
इस प्रकार बातों-बातों में बच्चेय का नामकरण संस्का्र भी संपन्न हो ग़या. उसके जन्मप के समय एक और खास बात हुई. वह थी उसके मां को बहुत कम प्रसव पीड़ा. घर से बाहर प्रसव का सकुशल निपट जाना किसी चमत्कामर जैसा ही था. यही नहीं प्रसव का काम निपटाकर उसकी मां ने पिता को वापस काम पर भेज दिया था. उसके बाद तो वे पूरा काम समेटकर ही घर लौटे थे. इस बात की चर्चा टोले के लोग़ महीनों तक करते रहे.
टोपीलाल के पिता राजमिस्त्री थे. पति-पत्नीच दोनों साथ-साथ काम करने जाते. टोपीलाल के पिता नहीं चाहते थे कि उसकी मां काम करे. वह भी मजदूरी. इससे बाकी मजदूरों के आगे उनकी हेठी होगी, ऐसा उनको लग़ता था. इसलिए जब पहली बार उसकी मां ने काम पर साथ चलने कोे कहा तो उन्हों ने साफ मना कर दिया था.
‘इसमें शर्म कैसी?'
‘मेरी घरवाली होकर मजदूरों के साथ काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.'
‘और जो पति-पत्नीा दोनों तुम्हाेरे लिए मजदूरी करते हैं, उनपर क्याो गुजरती होगी, कभी सोचा है? मुझसे पूरे दिन घर में बिना काम के नहीं बैठा जाता. तुम यदि अपने साथ काम पर नहीं रखना चाहते तो मैं दूसरी जग़ह काम की तलाश करूं.'
‘यह क्या बात हुई?'
उस दिन टोपीलाल की मां की ही चली. वह काम पर जाने लगी. उसके पिता नहीं चाहते थे कि वह ज्यासदा मेहनत करे. मिस्त्री होने के कारण वह चाहते थे कि कोई हल्काद-फुल्का काम दे दिया जाए. लेकिन टोपीलाल की मां बिना मान-गुमान के सबके बराबर मेहनत करती. मजदूर औरतों के साथ प्याथर से बोलती-बतियाती. जरूरत हो तो उनकी मदद भी करती.
बेटे के जन्मक के बाद टोपीलाल के पिता ने सोचा था कि चलो इसी बहाने वह कुछ दिन आराम कर लेगी. इसलिए बोले-
‘इस हालत में तुम्हाकरा कड़ी मेहनत करना क्याथ ठीक होगा?'
‘क्योंल जब मैं पहले जैसी स्वहस्था हूं तो पहले जैसा काम क्यों नहीं कर सकती?'
‘फिर भी लोग़ तो यही कहेंगे कि मैं बहुत कठोर हूं. बच्चेम के जन्मी के तीसरे ही दिन तुम्हें काम पर जोत दिया.'
‘मैं उन्हेंं बता दूंगी कि मैं अपनी मर्जी से काम करने आई हूं.'
‘ऐसी जिद किसलिए? फिर हमारे सामने कोई मजबूरी भी नहीं हैे. घर का खर्च तो मेरी कमाई से चल ही जाता है.'
‘इसलिए कि मैं मानती हूं कि जो कर सकता है उसको काम करना ही चाहिए. बिना मेहनत के खाने का किसी को अधिकार नहीं है.'
‘मुझे नहीं लग़ता कि इस हालत में तुम ईंट और गारे से भरी परात सिर पर उठा सकती हो?'
‘हां, यह तो मैं भी सोचती हूं; और तुम कहोगे तो उठाऊंगी भी नहीं.'
‘फिर वहां जाकर क्या करोगी?' टोपीलाल के पिता अचरज में थे.
‘मिस्त्रीगिरी! तुम्हागरे साथ इतने दिनों तक काम करते हुए मैं भी काफी कुछ सीख चुकी हूं. फिर एक बच्चे की मां हूं, अब तो मुझे भी तरक्की पाने का अधिकार है, क्यों ?'
उसके बाद वही हुआ जो टोपीलाल की मां ने ठाना हुआ था. दो दिन के टोपीलाल को जमीन पर सुलाकर वह कन्नीब और वसूली लेकर पति के सामने बैठ ग़ई. मजदूरिनें उसकी हिम्मरत देख दंग़ रह ग़ईं. बाकी मिस्त्रियों ने मुंह चिढ़ाया. कहा कि कुछ देर की त्रियाहठ है, किंतु उसको सधे हाथों से ईंट पर ईंट चिनते हुए देख सबकी बोलती बंद हो ग़ई.
टोपीलाल के जन्मऔ के तीसरे ही दिन देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री का जन्मम हुआ.
एक औरत और राजमिस्त्री, लोगों ने इसे भी चमत्कासर ही माना.
सचमुच, चमत्काार ही तो था.
बीच की एक और घटना दिमाग़ चाट रही है.
होटल का काम पूरा हुआ तो टोपीलाल छठा वर्ष का पार कर चुका था. उसी के कमरों में लोट लगाते, सीढ़ियों पर धमा-चौकड़ी करते हुए वह बड़ा हो रहा था. हुनरमंद हाथों के परस से होटल की इमारत चमचमा रही थी. बाकी की कसर बिजली के लट्टुओं ने पूरी कर दी थी, जो जग़ह-जग़ह रंग़-बिरंगी आभा बिखेर रहे थे. जग़मगा रहे थे यहां-वहां. आखिरी दिन कारीग़रों और मजदूरों का हिसाब करने के लिए मालिक ने सबको जमा किया था. होटल पूरे शहर मेंं निराला था. ठीक उसके मालिक की कल्पकना के अनुरूप. सुरुचि एवं संपन्नहता का बेमिसाल नमूना. मालिक उनके काम से प्रसन्ना था. मजदूरी के अलावा सबको कुछ न कुछ भेंट में देने का इंतजाम भी उसने अपनी ओर से किया था. ताकि यादगार बनी रहे.
टोपीलाल का जन्मन उसी होटल में हुआ था. वह दुनिया का शायद पहला होटल था, जिसमें पति-पत्नीे दोनों ने राजमिस्त्री की कमान संभाली थी. यह बात भी मालिक की जानकारी में थी. टोपीलाल के लिए उसने खासतौर पर कपड़े बनवाए थे. मालिक उसे अपने लिए शुभ मान रहा था.
शाम का समय. मैदान में डेढ़-दो सौ की भीड़. पंडाल, कुर्सी और मेज को अस्था यी कार्यालय के रूप में सजाया ग़या था. मजदूरों के बच्चेड एक ओेर खेल रहे थे. कुछ होटल को हसरत-भरी निगाहों से देख रहे थे. उनकी अपनी ही मेहनत का कमाल, खून-पसीने से खड़ी हुई आलीशान इमारत. हुनरमंद हाथों की कारीग़री की बेमिसाल पेशकश. उसको देखकर कोई भी स्वनयं पर गुमान कर सकता था. वक्तम खुशी का था और शायद दुःख का, एक-दूसरे से बिछोह का भी था.
यूं तो टोले के अधिकांश मजदूर-मिस्त्री आपस में परिचित थे. परंतु जीवन-संघर्ष में हर बार कुछ न कुछ पीछे छूट जाते. उनकी भरपाई करने नए लोग़ शामिल हो जाते. वक्तम उन सबसे विदा लेने का था, जिनके साथ सुख-दुख-भरे इतने साल बिताए थे. पसीने की अदला-बदली की थी. दुख में आंसू बहाए, सुख में हिस्सेछदारी की थी. वर्षों से वे साथ-साथ काम करते आए थे. आगे काम की तलाश उनमें से न जाने किस-किस को, कहां-कहां ले जाए. इसके बाद फिर कभी मिलने का अवसर मिले भी या नहीं. ऐसी चिंताएं लोगों को सता रही थीं.
ऐसे वक्तक पर कुछ लोगों की आंखें भरी हुई थीं. तो कुछ उतनी देर के लिए दार्शनिक बन चुके थे. जिंदगी में मिलना और बिछुड़ना तो सत्यल सनातन है, यह कहकर वे मन को झूठी तसल्लीि देने की कोशिश कर रहे थे. कुछ यह सोचकर खिन्न् थे कि जिस इमारत को उन्होंतने अपने खून-पसीने और हाथों के हुनर से प्राणवंत बनाया, आज के बाद कोई उसमें शायद ही भीतर आने दे या कोई उनको पहचाने भी. उनके जीवन की यही त्रासदी थी. वे ईंट-गारे को जीवन देकर उसे इमारत में ढालते. कन्नीी और गुनिया लेकर उसका अंग़-अंग़ तराशते. कोरी मिट्टी में प्राण-प्रतिष्ठा करते. लेकिन काम पूरा होते ही उसमें रहने का अधिकार खो बैठते थे.
ऐसे लोग़ होटल की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे. यह सोचकर कि आगे कभी लौटे तो दरवाजे पर बड़े-बड़े दरबान खड़े दिखाई देंगे. उन जैसों को वे शायद ही भीतर आने दें. इसलिए विदाई बेला में वे अपने हाथों के कमाल को भीगी पलकों से, आखिरी बार जी भ्रैरकर देख लेना चाहते थे. सहेज लेना चाहते थे उसके रूपाकार, उससे निर्माण से जुड़ी स्मृदतियों को.
मजदूरी बांटने का काम प्रारंभ हो चुका था. मालिक एक-एक को आवाज देकर बुला रहा था.
‘टोपीलाल!' मुनीम की ओर से आवाज लगी. इसी के साथ तालियों की आवाज गूंज उठी. टोपीलाल के पिता उसे लेकर आगे बढ़ें, उससे पहले ही टोपीलाल स्व यं आगे बढ़ ग़या. एक पांच-छह साल के बच्चे को भरे विश्वा स के साथ आगे बढ़ते देख लोग़ दंग़ रह ग़ए. तालियों का वेग़ दुगुना हो ग़या.
‘नाम क्याे है?' नन्हें टोपीलाल से मालिक ने पूछा.
‘ट्...ट्...टोपीलाल!' नन्हीछ, हकलाती-सी जुबान से जवाब मिला.
‘क्याक टोंटीलाल?' मालिक बचपन में लौट ग़या. सबकी हंसी छूट ग़ई.
‘नईं, टोपीलाल...टोपीलाल!' टोपीलाल ने दोहराया.
‘तो टोपी कहां छोड़ आए?' मालिक ने मजाक किया. एक बार फिर मैदान हंसी से उछलने लगा.
‘मेरी जेब में रखी है.' टोपीलाल ने बिना सकुचाए जवाब दिया. कभी उसकी मां ने उसके लिए एक टोपी सिली थी. जिसको वह अक्सैर अपनी जेब में रखता था. उसने जेब से टोपी निकालकर तत्काबल पहन भी ली. टोपीलाल की हाजिरजवाबी पर एक बार फिर जोरदार तालियां बजीं. मालिक भी खुशी से नहा उठा. उसने अपने हाथों से टोपीलाल को कपड़े भेंट किए, जिनमें एक रेशम की टोपी भी थी. मालिक टोपीलाल को अपने हाथों से टोपी पहना ही रहा था कि अचानक वह परेशान हो उठा.
टोपीलाल वापस जाने लगा. तभी मालिक की ओर से आवाज आई--
‘ठहरो, वापस आओ बेटे!' टोपीलाल रुक ग़या.
‘जरा अपने कपड़ों की जेब तो देखो. मेरी घड़ी शायद उसमें गिर ग़ई है.' मालिक ने कहा.
मालिक की घड़ी की गुमशुदगी की खबर मिलते ही एकाएक हड़कंप मच ग़या. कर्मचारियों में अफरातफरी मच ग़ई. एक ने मालिक को खुश करने के लिए दौड़कर टोपीलाल को पकड़ लिया. आनन-फानन में उसकी तलाशी ली ग़ई. लेकिन घड़ी वहां नहीं थी. सभी परेशान. मालिक अपनी महंगी घड़ी को लेकर चिंतित था. उससे भी अधिक परेशान थे उसके कर्मचारी. हालांकि वे परेशानी का दिखावा ही अधिक कर रहे थे.
‘मैंने देखा, अभी कुछ देर पहले तक तो घड़ी साहब के हाथ में थी, बड़ी जल्दी छिपा दी!' एक कर्मचारी ने टोपीलाल को डांटा.
टोपीलाल चुपचाप खड़ा था. उसके माता-पिता को काटो तो खून नहीं. दोनों स्वीयं को अपमानित महसूस कर रहे थे. विदाई की बेला में यह कैसा अपशगुन. काम पूरा होने की जो खुशी थी, वह गायब हो चुकी थी. कर्मचारियों ने टोपीलाल को पकड़ रखा था.
‘मालिक इसके पास घड़ी भला कहां से आई? आपके दिए कपड़ों के सिवाय इसके पास कुछ और नहीं है.' टोपीलाल के पिता ने गिड़गिड़ाकर कहा. उसकी मां भी आगे आकर फरियाद करने लगी-
‘मेरा टोपीलाल चोर नहीं है मालिक.'
‘यह बहुत शैतान है, कुछ भी कर सकता है.' कर्मचारियों के बीच से आवाज आई. सबने देखा वह बिशंभर था. टोपीलाल के माता-पिता से ईर्ष्यास करने वाला. किसी को उसकी बात पर भरोसा न हुआ, लेकिन दूसरे कर्मचारियों को टोपीलाल को तंग़ करने का बहाना मिल ग़या.
मालिक परेशान था. उसका मूड खराब हो चुका था. घड़ी महंगी थी. पर मालिक की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं. वह अपने लिए कभी भी दूसरी घड़ी खरीद सकता था. लेकिन सबके सामने से घड़ी का अनायास गायब हो जाना उसको परेशान कर रहा था. चोर का पता लग़ना भी जरूरी था. आखिर उसने सारे कर्मचारियों को एक ओर खड़ा हो जाने का आदेश दिया. फिर टोपीलाल को अपने पास बुलाया, प्या र से पूछा-
‘बता दो बेटे, मुझे अच्छीर तरह से याद है, तुम्हेंि बुलाने से पहले घड़ी मेरी कलाई पर बंधी थी.'
‘मुझे नहीं मालूम.' मालिक के पूछने पर टोपीलाल ने जवाब दिया. चोरी के इल्जा़म से वह घबरा ग़या था.
‘मालिक यह झूठ बोलकर चोरी का इल्जामम दूसरों पर डालना चाहता है.' एक कर्मचारी टोपीलाल पर गुर्राया.
‘तुम कैसे कह सकते हो?' बिना झिझके टोपीलाल ने कहा.
‘इसलिए कि घड़ी सबके सामने, अभी-अभी गायब हुई है. उस समय केवल तुम मालिक के पास थे.'
‘मालिक के पास तो उनके नौकर और कर्मचारी भी हैं. उनसे भी तो पता करना चाहिए. चोर हमारे टोले का नहीं है.'
‘फिर भी घड़ी की चोरी तो हुई है.'
‘तो यह तो मालिक और उसके कर्मचारी जानें.' टोपीलाल ने निडर होकर कहा.
‘कर्मचारी तो सभी पीछे हैं, फिर उनमें इतनी हिम्म त कहां कि मालिक की घड़ी की चोरी कर सकें.'
टोपीलाल के दिमाग़ में बार-बार कुछ खटक रहा था. कि जैसे कुछ याद करना चाहता हो. किंतु विचार दिमाग़ में टिकने से पहले ही हवा हो जाता था.
मालिक के आदेश पर टोपीलाल को एक ओर बिठा दिया ग़या. मजदूरी बांटने का काम रुक चुका था. बाकी मजदूर भी पेशोपेश में थे. कुछ इस बात को लेकर परेशान थे कि मालिक का मूड खराब होने के बाद अब ठीक-ठाक ईनाम नहीं मिल पाएगा. लेकिन एकाध के मन में छिपे संदेह की बात जाने दें तो, उनमें से कोई भी टोपीलाल को चोर मानने को तैयार नहीं था.
सहसा टोपीलाल उठकर खड़ा हो ग़या. सभी उसकी ओर देखने लगे. उसने कहा-
‘अग़र मैं चोर पकड़वा दूं तो आप मेरी मां और बापू को जाने देंगे?'
‘हम तुम्हेंो ईनाम भी देंगे.' मलिक ने खुश होकर कहा. उस समय टोपीलाल का दिमाग़ बहुत तेजी से सोच रहा था. उसको लगा कि घड़ी अग़र मालिक की कलाई से गायब हुई तो वह अवश्या ही खुलकर गिरनी चाहिए. पर गिरकर जाएगी कहां! नीचे! फर्श पर! लेकिन फर्श पर गिरती तो नजर में आ जाती! फिर कहां ग़ई? यकायक उसकी आंखें चमक उठीं.
‘मालिक घड़ी आपके उस नौकर के पास है, जिसकी आंखों के नीचे ग़हरा काला दाग़ है.' टोपीलाल ने रहस्यय से पर्दा हटाया. इसपर सभी चौंक पड़े.
‘चंदगी...! अभी तक तो वह यहीं था, अचानक कहां चला ग़या?' टोपीलाल की बताई पहचान पर मालिक के पीछे खड़े एक कर्मचारी के मुंह से निकला. सहसा सबकी आंखें चमक उठीं. चंदगी की खोज की जाने लगी.
‘मालिक पुलिस बुलाकर इसे पकड़वा दीजिए. यह आपका कीमती समय बरबाद कर रहा है.' इस बीच पीछे से दूसरे कर्मचारी की आवाज आई.
‘चुप रहो इतने सारे लोगों के सामने हमारी घड़ी गायब हुई है. उसका इल्जााम इस बच्चेे पर लगाने पर पुलिस क्याच हमारी बात मानेगी. उल्टेी हमारी ही हंसी होगी. तुम चंदगी को फौरन बुलाओ.' मालिक ने डांटा. इस पर कर्मचारी पीछे खडे़ आपस में खुसर-पुसर करने लगे.
कुछ देर के बाद चंदगी को खोज लिया ग़या. वह टोकरी को साफ करने के लिए उठाकर ले ग़या था. वह एक बार पहले भी चोरी के आरोप में पकड़ा जा चुका था. उस समय तो मालिक ने उसपर दया करते हुए छोड़ दिया था. टोपीलाल ने जैसे ही उससे घड़ी लौटाने को कहा, उसका चेहरा पीला पड़ ग़या. मालिक समेत सभी का ध्यालन उसकी ओर चला ग़या. मालिक ने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह घबरा ग़या और उसके पैरों पर गिर पड़ा. गिड़गिड़ाकर माफी मांग़ने लगा.
चोरी का भेद खुल चुका था. सभी टोपीलाल की बुद्धि पर हैरान थे. घड़ी चंदगी तक कैसे पहुंची, और टोपीलाल को उसके बारे में कैसे पता चला, यह एक रहस्या था.
‘वह तो बहुत पीछे खड़ा हुआ था, मेरे पास आया तक नहीं.' मालिक हैरान था.
‘आया था मालिक, टोकरी उठाने के लिए.'
मालिक को याद आया. चाय के खाली कप, रद्दी काग़ज वगैरह डालने के लिए एक डस्टीबिन का इंतजाम किया ग़या था. उसी को उठाने के लिए चंदगी आगे आया था.
‘तुम्हेंथ कैसे पता चला कि घड़ी डस्टंबिन में गिरी है, और चंदगी के पास है?' मालिक ने पूछा.
‘मेरे पापा चोर नहीं हैं, मैं भी चोर नहीं हूं.' टोपीलाल ने भोलेपन से कहा. घड़ी मिल जाने से टोपीलाल के पिता की हिम्महत वापस लौट आई थी. वे आगे आकर बोले-
‘मालिक मेहनतकश लोग़ ईमानदार से जीते, अपने पसीने की कमाई खाते हैं. उनमें इतनी हिम्मसत कहां कि आपकी महंगी घड़ी रख सकें. इतनी महंगी घड़ी को हमारे पास देखकर कोई भी चोरी का इल्जांम लगा लेगा. इसलिए यह काम आप ही के आदमियों का हो सकता है, इसका हमें विश्वाईस था. सबके सामने घड़ी की चोरी तो संभव न थी. इसीलिए संभावना यही थी कि वह अपने आप खुलकर गिर ग़ई हो. यही सोचते हुए इसे आपके नौकर द्वारा डस्ट बिन उठाने की घटना याद आ ग़ई. तब इसको यह अनुमान लगाते देर
न लगी कि जो कर्मचारी उसे लेकर ग़या है, घड़ी उसके पास हो सकती है, क्यों बेटा?'
टोपीलाल ने ‘हां' के पक्ष में अपनी ग़र्दन हिला दी.
‘शाबास!' मालिक के मुंह से अनायास निकला. छह साल की आयु में टोपीलाल को मिली यह पहली कामयाबी थी. इस घटना के बाद उसके चाहने वाले उसको जासूस टोपीलाल के नाम से पुकारने लगे. लोगों ने मान लिया कि बड़े सोच के लिए उम्र में बड़ा होना जरूरी नहीं है. असाधारण व्येक्तिेत्व साधारण वेश में भी सामने आ सकता है. -