• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

बेगुनाह ( एक थ्रिलर उपन्यास )

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
"दोनों दरवाजे बन्द थे?" - मैंने पूछा।

"हां । खिड़कियां और रोशनदान भी ।"

"चाबी कहां थी ? मरने वाली की जेब में ?"

"नहीं । भीतरी दरवाजे के भीतर से बन्द ताले में । अभी भी वहीं है।"

"मुझे दिखाई दे रही है। मैंने सोचा, शायद चाबी बाद में पुलिस ने वहां लगाई हो ।”

"हमने नहीं लगाई । चाबी शुरू से वहीं थी। दोनों दरवाजे भीतर से बन्द थे । बरामदे वाला दरवाजा तोड़कर हम भीतर घुस पाये थे।"

"टूटे दरवाजे की चाबी कहां है?"

"उसकी कोई चाबी नहीं । वो एक ही चाबी दोनों दरवाजों में लगती है। मैंने चैक किया है।"

"लाश कहां थी ?"

"फर्श पर गैस के सिलेण्डर के पहलू में ।"

"लाश पर किसी प्रकार की चोट या जोर-जबरदस्ती का निशान नहीं ?"

"नहीं ।”

"कोई सुसाइड नोट ?"

,,,

"नहीं मिला।"

"यादव साहब, जो बात मैं कहने जा रहा हूं, वो कहनी तो नहीं चाहिए क्योंकि वो मेरे बाकी बचे क्लायंट के कमला चावला के खिलाफ जाती है लेकिन फिर भी कह रहा हूं। यहां स्टेज जरूर बड़ी नफासत से आत्महत्या की सेट की गई है लेकिन यह आत्महत्या का केस नहीं हो सकता ।"

"क्यों ?"

"पहली बात तो यह कि केस को आत्महत्या बताने लायक यहां है क्या ? यही न कि किचन के दोनों दरवाजे बन्द थे। 8 और आप लोगों को एक दरवाजा तोड़कर भीतर दाखिल होना पड़ा था ?"

"हां ।”

"लेकिन ये दोनों ताले बिल्ट-इन-लॉक हैं यानी कि पल्ले की लकड़ी के भीतर फिट हैं और चाबी के छेद आर-पार इस प्रकार बने हुए हैं कि अन्दर या बाहर दोनों ही तरफ से चाबी तालों में डाली जा सकती है और ताला खोला और बन्द किया जा सकता है ।"

"लेकिन चाबी भीतर की तरफ मिली थी ।"

एक चाबी भीतर की तरफ मिली थी । ऐसे दो तालों की तो चार चाबियां होंगी । बाकी तीन कहां हैं ?"

"क्या पता कहां हैं ?"

"मेरा मतलब है कोई और चाबी किसी और के पास भी हो सकती है। मसलन हत्यारे के पास । वह जूही को अचेत करके गैस के पास छोड़ सकता है और एक चाबी भीतर ताले में छोड़कर दूसरे दरवाजे का ताला बाहर से लगाकर खिसक सकता है।"

"दूसरे, अपनी जान के लिए फिक्रमंद होकर अपनी जान की रक्षा के लिए बॉडीगार्ड का इन्तजाम कर चुकने के बाद उसके आनन-फानन ही आत्महत्या कर लेने की कोई तुक नहीं बैठती । चावला की मौत से अगर वह इतनी गमजदा थी कि उसकी जीने की चाह खत्म हो गई थी तो उसने अपने लिए बॉडीगार्ड की जरूरत क्यों महसूस की ? और फिर बॉडीगार्ड की जरूरत बताते वक्त उसने साफ-साफ यह अन्देशा जाहिर किया था कि उसे डर था कि उसका भी कत्ल हो सकता था।"

"अच्छा !"

"हां । मुझे लगा था कि शायद वह चावला साहब के कातिल को जानती थी । और कातिल भी यह जानता था कि जूही उसकी हकीकत से वाकिफ थी । इसीलिए जूही को खतरा था कि उसका मुंह बन्द करने के लिए उसका कत्ल हो सकता था।"

"ऐसा लड़की ने कहा था ?"

कहा नहीं था लेकिन मुझे उसकी बातों से लगा था।"

"तुम्हें उसको पुलिस के पास जाने की राय देनी चाहिए थी।"

"मैंने दी थी । लेकिन वह इस बात के लिए तैयार नहीं हुई थी।"

"क्यों ?"

"क्योंकि वो हद से ज्यादा डरी हुई थी। जरूर वो समझती थी कि अगर वो ऐसा कोई कदम उठायेगी तो हत्यारा न करता भी उसका कत्ल करेगा।"

"और ऐसा करने के लिए तुम्हारे सामने ही हत्यारा यहां पहुंच गया था।"

"तुम्हारा इशारा मिसेज चावला की तरफ है ?"

"और किसकी तरफ होगा ?

" मैं खामोश रहा। कमला चावला की निर्दोषता के मामले में पूरी तरह से आश्वस्त तो मैं कभी भी नहीं था लेकिन अब तो रहा-सहा आश्वासन भी हवा होता जा रहा था।

"तुम यहां से साढ़े छ: बजे गए थे?" - वह बोला ।

"हां । बताया तो था ।"

"यहां से कहां गए थे?"

"करोल बाग । पाण्डे को यहां भिजवाने के लिए।”

"फिर ?"

"ये सवालत तुम मेरे पिटे हुए थोबड़े की दास्तान जानने के लिए कर रहे हो ?"

"यही समझ लो ।"

"करोलबाग से मैं सीधा अपनी एक फ्रेंड के घर गया था। मेरी उस फ्रेंड का हसबैंड रात को घर नहीं आने वाला था। लेकिन साला न सिर्फ आ गया, बड़ी नाजुक घड़ी में आ गया। कमीने ने मार-मारकर भुस भर दिया मेरे में । अब आगे से सबक ले लिया है मैंने की शादीशुदा औरत से यारी नहीं करूंगा, खास तौर से ऐसी औरत से जिसका हसबैंड इतना वादाशिकन हो कि रात को घर नहीं आऊंगा कहकर भी घर लौट जाता हो।"

"बक चुके ?"

"हां।"

“पूरी तरह से बक चुके ?"

"हां ।”

"तो अब संजीदगी से हकीकत बताओ।

" मैंने असहाय भाव से कंधे झटकाये । "तुम बहुत उपद्रवी आदमी हो । कल दिन में पहले तुमने चावला के आदमियों से हाथापाई की..."

"तुम्हें कैसे मालूम ?"
 
"फिर" - मेरी बात की ओर ध्यान दिये बिना वह कहता रहा - "कल रात को तुमने चावला के घर में चौधरी को पीटा इस लिहाज से तुम्हारी भी बारी आनी ही थी जो कि आज आ गई । तुम्हारी यह गत एलैग्जैण्डर के हाथों बनी है। और यह बात मैं तुमसे पूछ नहीं रहा हूं, तुम्हें बता रहा हूं।"

“तुम समझते हो एलैग्जैण्डर ने मुझे इसलिए पिटवाया है क्योंकि मैंने उसके आदमी को पीटा था ?"

"क्योंकि तुम्हारे पास ऐसी कोई चीज है जिसे हासिल करने के लिए एलैग्जैण्डर मरा जा रहा है।"

"कैसे जाना ?"

,,, "चौधरी की वजह से जाना । उसकी चावला की स्टडी में मौजूदगी की वजह से जाना । एलैग्जैण्डर के उसको

आनन-फानन छुड़ा ले जाने की वजह से जाना। तुम्हारे उधड़े हुए थोबड़े पर लटके साइन बोर्ड से पढ़कर जाना । और एलेग्जेण्डर की कार की तुम्हारे पास मौजूदगी से जाना । थोड़े हैं जानकारी के इतने जरिये ?"

"नहीं । काफी हैं । काफी से ज्यादा हैं।"

"अब मेरे सब्र का और इम्तहान लिए बिना बताओ कि हकीकत क्या है?"

"सुनो । एलेग्जेण्डर को यह वहम हो गया लगता है कि जिस चीज की उसे तलाश है, वो मेरे पास है। पर वह चीज क्या है, यह न मुझे मालूम है, न वो बताता है । वह बस यही रट लगाये रहा था कि उसकी जो चीज मेरे पास है वह मैं उसे वापिस करू । उसने उस चीज के बदले में मुझे दस हजार रुपए भी ऑफर किये थे लेकिन जिस चीज के अस्तित्व तक की मुझे खबर नहीं, वो मैं उसे कहां से पैदा करके देता ? यही बात बड़ी संजीदगी से उसे समझाने के लिए आज मैं उससे मिला था लेकिन उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ।

पहले जो चीज वो मुझसे दरख्वास्त करके मांग रहा था, फिर जिसकी वो मुझे कीमत अदा करने को तैयार था, उसी को तब उसने जबरन हासिल करने की कोशिश की । उसी जबरदस्ती का नतीजा वो मार-पीट निकला जिसने कि मेरा थोबड़ा सुजा दिया।"

"हकीकतन ऐसी कोई चीज तुम्हारे पास नहीं है?" - वह संदिग्ध स्वर में बोला ।

"आनेस्ट, नहीं है ! होती तो मैं क्या पागल हूं कि उसके बदले में हासिल होने वाले दस हजार रुपये भी छोड़ता और। उसकी वजह से इतनी मार भी खाता?"

"शायद वह ज्यादा कीमती चीज है और तुम उसकी दस हजार से ज्यादा कीमत चाहते हो !"

"इतनी मार खाने के बाद भी ?"

"मार तुमने कोई खास नहीं खाई है। तुम्हारी कोई हड्डी नहीं टूटी है, कोई पसली नहीं चटकी है, कोई गहरा जख्म नहीं लगा है। मोटे माल के लालच में इतनी मार तुम खा सकते हो । अब अपनी अपेक्षित मोटी कीमत में जरूर तुम इस मार की कीमत भी जोड़ लोगे।"

"तुम तो यार...."

"मैं तुम्हारी जात पहचानता हूं, प्राइवेट डिटेक्टिव साहब ! पैसे की खातिर तुम बहुत कुछ कर सकते हो ।”

"तौबा !"

"अब बताओ वो चीज क्या है ?"

"मुझे नहीं पता।"

"तुम्हारे पास एलैग्जैण्डर की कोई चीज नहीं ?"

"न।"

"जिस चीज की तलाश में कल चौधरी चावला की स्टडी में घुसा था, वह तुम्हारे हाथ नहीं लग गई हुई ?"

"नहीं ।”

"ऐसा अगर हुआ होगा तो बात चौधरी को भी मालूम होगी और मिसेज चावला को भी ।"

"तुम ऐसा सोचते हो फिर भी तुमने चौधरी को अपने चंगुल से निकल जाने दिया ।"

"लेकिन मिसेज चावला अभी मेरी पहुंच से परे नहीं है।"

,,, मैंने सशंक भाव से उसकी तरफ देखा । किस फिराक में था वह पुलिसिया ?

"चलो।" - वह बोला ।

"कहां ?" - मैं हड़बड़ाया।

"गोल्फ लिंक । चावला की कोठी पर । मिसेज चावला से बात करने ।"

"इस वक्त ?"

"हां । इस वक्त ।"

"वह सो चुकी होगी ।"

"जाग जाएगी ।"

"सुबह चलें तो..."

"नहीं । अभी चलो। सुबह तक तो तुम उसे हजार तरह की पट्टी पढ़ा लोगे।"

"अच्छी बात है।"

हथियार डाल देने के अलावा और कोई चारा था जो नहीं ।

*

**

,,, हम गोल्फ लिंक पहुंचे। कमला चावला से हमारी मुलाकात हुई । वह हमें ड्राइंग रूम में ले आई। मैंने देखा कि उसकी सूरत से ऐसा नहीं लगता था जैसे वह सोते से उठी हो ।

मैं आपसे चन्द सवाल पूछना चाहता हूं।" - यादव बोला।

इस वक्त ?" - कमला बोली ।। ।

“हां । कोई ऐतराज ?"

"नहीं । कोई ऐतराज नहीं । पूछिये क्या पूछना चाहते हैं आप ?"
 
जो पहला सवाल यादव ने कमला से किया, वह उसने कमला की नहीं, मेरी सूरत पर निगाह जमाये हुए किया । "कल रात जब चौधरी नाम का चोर यहां पकड़ा गया था, तब राज ने आपके पति की स्टडी की तलाशी ली थी ?"

"जी हां, ली थी।" - कमला बोली।

"क्यों ली थी ?"

"यह अंदाजा लगाने के लिए कि चोर यहां से क्या चुराने आया हो सकता था।"

"कोई अंदाजा लगा ?"

"नहीं । यहां का कीमती समान तो सही-सलामत मौजूद था।"

"उसे गैरकीमती समान की तलाश भी हो सकती थी !"

"यहां से कोई चीज गायब नहीं थी।"

"होती तो चौधरी के पास से बरामद होती ।" - मैं बोला।

"शटअप !" - वह बड़े हिंसक भाव से गुर्राया। मैंने फौरन होंठ बंद कर लिए ।

"यहां से राज ने कोई चीज उठाई हो !" - अपलक मेरी तरफ देखते हुये यादव ने सवाल किया।

"कौन सी चीज ?" - कमला बोली।

"कोई भी चीज । कीमती या मामूली ।"

"इसने तो कुछ नहीं उठाया था स्टडी में से ।"

"शायद आपकी जानकारी के बिना इसने वहां से कोई चीज पार कर दी हो ?"

"नहीं । स्टडी में हर वक्त मैं इसके साथ थी।"

"पक्की बात ?"

"हां ।”

तब कहीं जाकर यादव ने मुझ पर से निगाह हटाई और में भी जान में जान आई।

,,, "आपको" - यादव ने नया सवाल किया "वसीयत कि खबर तो लग चुकी होगी ?"

"जी हां।" - कमला गंभीरता से बोली - "लग चुकी है।"

"छक्के तो लूट गये होंगे आपके यह जानकार कि आपके पति ने अपनी जायदाद के आपसे कहीं ज्यादा बड़े हिस्से

का वारिस एक गैर औरत को - जूही चावला को - बना दिया था।"

"छक्के छूटने वाली बात ही थी यह । छक्के क्या छूट गए थे, मेरा तो भेजा हिल गया था। लेकिन अब इस बात से > कोई फर्क नहीं पड़ता।"

"क्यों फर्क नहीं पड़ता ?"

"क्योंकि वसीयत की जो गड़बड़ मेरे पति कर गए हैं, वो अब ठीक हो जाएगी ।"

"कैसे ठीक हो जाएगी ?"

"मेरी जूही चावला से बात हुई है। उसकी मेरे पति की वसीयत में कोई दिलचस्पी नहीं । उसने स्वेच्छा से ऐसा इंतजाम कर देने का वादा किया है कि सारी जायदाद मुझे ही मिले।"

"अच्छा ! ऐसा उसने खुद कहा है ?"

"जी हां ।"

"वह आपके पति कि करोड़ों कि संपत्ति कि वारिस बनने कि ख्वाहिशमंद नहीं ?"

"नहीं।"

"कमाल है !"

"हैरान होने कि जगह अगर आपने यहां आने की असली वजह बतायें तो इससे हम सबको सुविधा होगी ।"

"असली वजह ?"

"जी हां । इतनी अक्ल तो मुझमें भी है कि ये जो नन्ही-मुन्नी बातें आप पूछ रहे हैं, यही तो आपके यहां आगमन की असली वजह हो नहीं सकतीं ।"

"बहुत समझदार हैं आप । वाकई असली वजह यह नहीं ।"

"तो फिर असली वजह क्या है ?"
 
"जूही चावला मर गई है।"

"मर गयी है ?" - उसके नेत्र फैल गए - "कैसे मर गयी है ?"

"उसने आत्महत्या कर ली है।"

"जूही ने ?"

"जी हां ।"

"मैं नहीं मानती।"

"क्यों ? क्यों नहीं मानतीं आप ?"

"क्योंकि यह नामुमकिन है । एक तो वह आत्महत्या करने वाली किस्म की लड़की ही नहीं थी । बहुत प्यार था उसे

,,, जिंदगी से । दूसरे, अभी शाम ही को तो उसने राज के माध्यम से अपने लिए एक बॉडीगार्ड का इंतजाम किया था। ऐसे में यूं आनन-फानन वो अत्महत्या कैसे कर सकती थी ?"

मुमकिन है, वो आपके पति की मौत से आपकी उम्मीद से ज्यादा गमजदा रही ही !"

"गमजदा वो थी लेकिन इतनी गमजदा नहीं थी कि अत्महत्या कर लेती ।”

"अगर ऐसी बात है तो आपके ख्याल से कत्ल किसने किया होगा उसका ?"

"मैंने कब कहा कि उसका कत्ल हुआ होगा ?"

"आपने नहीं कहा । लेकिन अगर आप कहतीं तो आप किसे कातिल करार देतीं ?"

"मैं इस बारे में क्या कह सकती हूँ?"

"कोशिश तो कीजिये ।"

"नहीं। यूं अटकलें लगाना नाजायज बात होगी ।"

"आज शाम आप जूही के बंगले पर गई थीं ?"

"हां ।”

"वहां राज भी था ? पहले से मौजूद था वो वहां ?"

"हां ।”

"यह आपके सामने वहां से रुखसत हुआ था ?"

"हां ।”

"कितने बजे ?" "फिर आपने पीछे क्या किया?"

"मैं जूही से बातें करती रही ।"

"किस बाबत ?"

"वसीयत की ही बाबत । तभी तो उसने कहा था कि उसकी वसीयत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पहले हम दोनों में माहौल बड़ा तल्ख था । लेकिन वसीयत नाम की कबाब की हड्डी जब यूं बीच में से निकल गई तो हम दोनों में बहुत शांति और मित्रता के संबंध स्थापित हो गए थे।"

"आप वहां कब तक ठहरी थीं ?"

"राज के जाने के कोई पंद्रह-बीस मिनट बाद तक ठहरी थी मैं वहां ।”

"यानी कि सात से पहले आप वहां से विदा हो चुकी थीं ?"

"काफी पहले । शायद पौने सात ही ।"

"फिर कहां गई आप ?"

"कहीं भी नहीं । वापिस घर लौट आई । यहां ।"

,,, "इस बात का क्या सबूत है कि जूही ने ऐसा कहा था कि उसकी आपक्से पति की दौलत में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

"ऐसा तो उसने मेरे सामने भी कहा था ।" - मैं बोला।

"राज ठीक कह रहा है ? - उसने पूछा।

"हां ।" - कमला बोली ।। । फिर उसने बड़े कर्तज्ञ भाव से मेरी तरफ देखा।

"ऐसा जुबानी जमा-खर्च कोर्ट-कचहरी में तो काम नहीं आता ।"

"कोर्ट-कचहरी में इस जुबानी जमा-खर्च की अब जरूरत नहीं है, जनाब" - मैं बोला - "वसीयत में तो यह साफ लिखा है कि अगर जूही चावला की मौत हो जाये तो सारी जायदाद की मालिक वैसे ही हतप्राण की विधवा बन जाएगी।" |

"मुझे मालूम है" - वह शुष्क स्वर में बोला - "वसीयत में क्या लिखा है !"

"मैं खामोश हो गया।

यादव कुछ क्षण सोचता रहा और फिर एकाएक उठ खड़ा हुआ। "मैं जा रहा हूं" - वह बोला - "लेकिन जाने से पहले आपको एक आप ही के फायदे की बात कहकर जाना चाहता हूं

।"

"क्या ?"

"आप अभी शक से बरी नहीं है और अभी इस आदमी की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ नहीं है। आपके किसी काम आने की जगह, हो सकता है, यह शख्स अपने साथ आपको भी चौड़े में ले डूबे । दूसरे, यह खयाल भी अपने जेहन से निकाल दीजिये कि इसके पास कोई जादू का डंडा है जो हर किसी को हर दुश्वारी से निजात दिला सकता है। | यह बहुत खुराफाती आदमी है । यह अपने क्लायंट को भी धोखा दे सकता है।"

,,, "तुम" - मैं आवेशपूर्ण स्वर में बोला - "मेरी तौहीन कर रहे हो ।"

"हंह !"

"तुम मेरा धंधा बिगाड़ रहे हो ।”

उसने मेरी तरफ पीठ फेर ली और आगे बढ़ा ।

"तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो ?" - मैं बोला । *

यादव ठिठका, घूमा, उसने प्रश्नसूचक भाव से मेरी तरफ देखा।

"यह शराफत है तुम पुलिस वालों की ?" - मैं बोला - "मुझे घर से लाये थे, घर छोड़कर जाओ।

" पहले मुझे लगा कि वह कोई सख्त बात कहने जा रहा था लेकिन वह फिर धीरे से बोला - "चलो।" उसने फिर मेरी तरफ से पीठ फेर ली।

कमला ऐन मेरे कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाई - "वापिस आना । अभी ।

" मैंने सहमति में सिर हिलाया। मैं यादव के साथ हो लिया। हम दोनों जीप में सवार हुए।
 
कार ग्रेटर कैलाश से विपरीत दिशा की ओर चल निकली। "मेरा घर इधर थोड़े ही है !" - मैंने विरोध किया।

चुप बैठो।" - यादव घुड़ककर बोला ।

"लेकिन..."

"सुना नहीं ?"

मैं खामोश हो गया।

उसने एंबेसडर होटल के टैक्सी स्टैंड पर ले जाकर जीप रोकी । "उतरो ।" - वह बोला।

"यहां ? - मैं हड़बड़ाया ।।

हां । यहां से घर के लिए टैक्सी कर लो।"

"भाड़ा कौन देगा?"

"पेसेंजर देगा और कौन देगा !"

“यह धांधली है।"

"हैं।" - वह दर्शनिकतापूर्ण स्वर में बोला - "है।"

मैं जीप से उतर गया।

यादत कयों ढील दे रहा था, यह बात मेरी समझ से बाहर थी । वह मूर्ख नहीं था जो इतना भी न समझता होता कि वचन का दरवाजा बाहर से भी बंद किस जा सकता था, बार-बार आत्महत्या का राग तो वह मुझे परखने के लिए जा रही थी। और घटनास्थल पर घटना के समय के आसपास कमला की मौजूदगी साबित हो चुकी थी। - इसी का अपने पति के कत्ल के लिए भी साधन, अवसर और उद्देश्य तीनों कमला को उपलब्ध थे । यह बात - दिलचस्पी और रहस्से से खाली नहीं थी कि यादव फिर भी उसे गिरफ्तार नहीं कर रहा था।

कमला मुहको डोर पर मिली।

"क्या बात धी?" - मैने उत्सुक भाव से पूछा - "वापिस क्यों बुलाया ?"

"तुमसे बात करनी है ।" - वह बोली - "आयो ।”

"बात सुबह नहीं हो सकती थी ?” - मैं उसके साथ भीतर दाखिल होता हुआ बोला ।

"आओ तो।"

हम ड्राइंगरूम में पदंचे। लेकिन वह वहां रुकने के स्थान पर भीतर स्टडी की तरफ बढ़ी । मैंने प्रतिवाद करना चाहा लेकिन उसे रुकती न पाकर खामोशी से उसके पीछे चलता रहा। स्टडी में दाखिल होते ही मैं ठिठका । भीतर वकील बलराज सोनी बैठा था।

उसके सामने जानीवाकर ब्लैक लेबल की एक खुली बोतल थी जिसमें से लगता था कि वह कई पैग पी चुका था। ताजा जाम उसके हाथ में था।

"आओ।" - वह बोला - "आओ ।”

"आप यहां !" - मैं बोला - "इस वक्त !”

"हां । कोई ऐतराज ?"

"ऐतराज मुझे क्यों होने लगा ? ऐतराज होगा तो घर की मालकिन को होगा ।"

"वकील साहब" - कमला जल्दी से बोली • *यह मेरे से बिजनेस की बात करने आए हैं ।"

"बिजनेस की बात करें, सोशल बात करें, कुछ भी बात करें, मुझे क्या ?"

"आओ, बैठो।" - वकील बोला।

मैं उसके सामने बैठ गया ।। कमला ने मेरे लिए जाम तैयार किया। उसने अपने लिए भी जाम तैयार किया ।

"आप" - मैं ओला - "पहले से ही यहां मौजूद थे या मेरे लौटकर आने के दौरान पधारे हैं ?"

उसने उत्तर न दिया । उसने अपना गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ ।

"एंजॉय यूअरसैल्फ, माई फ्रैंड !" - वह बोला - आई एम लीविंग ।” तुरंत वह बाहर की तरफ बढ़ा ।
 
,,, "मैं अभी आई" - कमला बोली और उसके साथ हो ली । में पीछे अकेला रह गया। मैंने अपने ताबूत की एक कील को आग लगाई और अपना गिलास खाली करके नया पैग तैयार कर लिया।

पांच मिनट बाद कमला; वापिस लौटी ।

मैंने देखा कि उसने अपने बाल खोल लिए थे और साड़ी कि जगह एक बड़ी झीनी, बड़ी सैक्सी, ताजी विधवा के लिए बहुत अशोभनीय, नाइटी पहन ली थी । उसकी पारखी निगाहों ने मुझे कुर्सी पर बैठे देखा, जिस पर कि एक ही शख्स बैठ सकता था। मेरे करीब आकार दूसरी कुर्सी पर बैठने कि जगह वह थोड़ा परे दीवार के साथ लगे दीवान पर जा बेठी ।

( "इधर आओ ।" - वह बोली ।

गिलास उठाये में उसके करीब पहुंचा। मैं दीवान पर बैठ गया। वह मुझसे सटकर बैठ गयी । उसके नौजवान जिस्म

से उठती सोंधी-सौंधी खुशबू से मुझ पर मदहोशी तारी होने लगी।

"इससे पहले कि मुझे नशा हो जाये" - मैं बोला - "और मेरी अक्ल की दुक्की पीट जाये, मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहता हूं।"

"क्या ?" - वह मादक स्वर में बोली।

"सवाल आसान है लेकिन जवाब शायद मुश्किल हो और तुम्हें देना पसंद न हो ।”

"मुझे देना पसंद है।"

"सवाल जाने बिना ही ?"

"सवाल जानती हूं मैं ।

" मैं हड़बड़ाया।

"वो जुदा सवाल है ।" - मैं बोला - "जो सवाल इस वक्त मेरे जेहन में है, वो जुदा है।"

"वो क्या सवाल है?"

"सच-सच जवाब देने का वादा करती हो ?"

"हां ।"

"मेरे से सच बोलने से तुम्हारे पर कोई आंच नहीं आएगी। मैं हर हालत में तुम्हारा तरफदार हूं।"

"दैट्स गुड । आई एम ग्लैड । अब सवाल बोलो।"

"तुमने अपने पति का कत्ल किया है ?"

"नहीं ।" - वो निस्संकोच बोली ।।

"और जूही का ?"

"उसका भी नहीं ।"

"तुम उसे जीवित उसके बंगले पर छोड़कर आई थीं ?"

"हां । जीवित और सही-सलामत । एकदम चौकस ।"

मैं खामोश रहा।
 
"और क्या पूछना चाहते हो ?" - वह बोली ।

"कुछ नहीं ।”

"तुम्हें मुझ पर विश्वास है ?"

"हां ।"

"तुम मानते हो मैं बेगुनाह हूं?" )

"तुम कहती हो तो मानता हूं।"

"ओह, राज, तुम कितने अच्छे हो !" वह मेरे से लिपट गई। उसने मेरे गले में बांहें डालकर मुझे अपनी तरफ घसीटा । उसने मेरे होठों पर अपने गुलाबी होंठ रख दिये। विस्की का गिलास अभी भी मेरे हाथ में था।

उसने मेरा निचला होंठ इतनी जोर से काटा कि उसमें से खून छलक आया । मैंने जोर से सिसकारी भरी।।

"यह तुम्हारी सजा है।" - वह इठलाई ।

"किस बात की ?"

"मुझे थामने की जगह अभी भी विस्की का गिलास थामे रहने की ।" मैंने गिलास करीब पड़ी मेज पर रख दिया।

फिर मैं बाज की तरह उस पर झपटा।। उसने एतराज न किया। पुरुष के साथ सहवास में जोर-जबर्दस्ती और धींगामुश्ती शायद वो पसंद करती थी । मेरे हाथ उसके जिस्म की विभिन्न गोलाइयों पर फिरने लगे। हम दोनों की ही सांसे भरी होने लगीं। जब मैंने उसकी नाइटी खोलने की कोशिश की तो वह एतराज करने लगी।

"क्या हुआ ?" - मैं हैरानी से बोला।

"यहां नहीं ।" वह मेरे एक कान की लौ अपने तीखे दांतों से चुभलाती हुई बोली।

"तो कहां ?" - मैं तनिक हांफता हुआ बोला ।

"बैडरूम में ।"

"वो कहां है?"

"ऊपर।"

"चलो।"

"लेकर चलो।"

"उसके साथ लिपटे-लिपटे ही पहले मैंने हाथ बढ़ाकर अपना विस्की का गिलास उठाया और उसे खाली किया, फिर मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और उसके निर्देश पर चलता हुआ उसे पहली मंजिल पर स्थित एक बैडरूम में ले आया। । वह गुलाबी दीवारों वाला, साटन की गुलाबी चादरों से और सिल्क के गुलाबी पर्यों से सुसज्जित बैडरूम था। " मैंने उसे पलंग पर डाल दिया।

फिर मैं अपने जूते, कोट और टाई अपने जिस्म से जैसे नोचकर अलग किए । उसी क्षण उसने हाथ बढ़ाकर मुझे पलंग पर घसीट लिया।

मैं उसके पहलू में जाकर गिरा।

फिर एकाएक कमरा जैसे लट्ट बन गया जो पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से घूमने लगा। मुझे एक की दो कमला दिखाई देने लगीं।

फिर चार ।

फिर आठ।

फिर मेरी आंखों के सामने दीवाली के अनार फूटने लगे। सितारे ही सितारे । लाल, नीले पीले और हरे ।। फिर एकाएक लटू घूमना बंद हो गया और घुप्प अंधेरा छा गया ।

जब मुझे होश आया तो मैंने उगते सूरज की रोशनी खिड़की के पर्दे में से छन-छानकर भीतर आती पाई। मैं हड़बड़ाकर उठा। मैंने अपनी कलाई-घड़ी पर दृष्टिपात किया । साढ़े छ बज चुके थे। मेरा सिर मुझे मन भर के पत्थर की तरह भारी लगा। मैंने अपने इर्द-गिर्द निगाह डाली। कमला दीन-दुनिया से बेखबर मेरे पहलू में सोई पड़ी थी। मैं हैरान होने लगा।

रात से दिन कैसे हो गया ?

जितनी विस्की मैंने कल पी थी, उससे तिगुनी-चौगुनी विस्की तो मैंने हजारों बार पी थी यानी कि नशे की वजह से तो ऐसा हुआ हो नहीं सकता था । ऊपर से मेरा सिर भी अजीब तरह से था। वह भारीपन हैंगओवर वाला तो नहीं था। तो फिर ?

मेरी अक्ल ने यही गवाही दी कि मैं पिछली रात किसी षड्यंत्र का शिकार हुआ था । जरूर मेरी विस्की में बेहोशी की दवा मिलाई गई थी।

किसने किया होगा ऐसा ? मेरी निगाह अपने-आप ही सोई पड़ी कमला की तरफ उठ गई । इसने ऐसा क्यों किया ? जवाब मेरे पास नहीं था।

उन हालात में उसे उठाकर जवाब हासिल करने का मैं ख्वाहिशमंद नहीं था। मैंने फर्श पर गिरे पड़े अपने कपड़े समेटे और उनके साथ टॉयलेट में दाखिल हो गया। खान मार्केट में एक टी-स्टाल था जो कि खुला था। मैं उसमें जा बैठा । अब मेरी तबीयत पहले से बेहतर थी लेकिन सिर का भारीपन अभी भी बरकरार था। उसी की वजह से मुझे चाय की भारी तलब लग रही थी। टी-स्टाल में आठ-दस आदमी मौजूद थे। छोकरा मुझे चाय दे गया । मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और चाय की चुस्कीयां लेने लगा। सिगरेट मुझे इतना कसैला लगा कि मैंने उसे एक ही कश लगाकर फेंक दिया । अलबत्ता चाय मुझे राहत पहुंचा रही थी।

तभी एक वर्दीधारी हवलदार ने स्टील में कदम रखा।

वह मालिक के काउंटर के पास ही एक कुर्सी घसीटकर बैठ गया । जिस रफ्तार से उसके हाथ में चाय का गिलास पहुंचा, उससे मुझे लगा कि वह मालिक का परिचित था।

"दारोगा साहब ।" - एकाएक मालिक बोला - "यह क्या हो रहा है दिल्ली शहर में तुम्हारे राज में ?"

"अब क्या हुआ ?" - हवलदार हड्बड़ाया।

"अखबार नहीं देखा आपने आज का ?"

"नहीं । क्या है उसमें ?
 
" "वही है जो रोज होता है। साल में तीन सौ पैंसठ दिन होता है। फिर एक कत्ल की खबर छपी है।"

"अब कौन मर गया ?"

"आपने जान पी एलैगजैण्डर का नाम सुना है?"

"उसका नाम किसने नहीं सुना ?"

“उसी का कोई आदमी बताया जाता है मरने वाला ।"

"कौन सा आदमी ?" - मैं बोले बिना न रह सका – "नाम नहीं छपा ?

" दोनों ने घूरकर मेरी तरफ देखा।

छपा है ।" - मालिक बोला - "रामप्रताप चौधरी नाम का आदमी है कोई ।"

"अखबार है तुम्हारे पास ?"

इस वक्त नहीं है । कोई ले गया है । मंगाऊं?"

"नहीं । जरूरत नहीं ।”

फिर वह खुद ही बताने लगा कि चौधरी के कत्ल की बाबत अखबार में क्या छपा था।

"किसी ने चाकू उतार दिया पट्टे के दिल में ।" - मालिक बोला - "ग्रेटर कैलाश के एक फ्लैट में उसकी लाश पाई गई है। कहते हैं वह फ्लैट राज नाम के जिस आदमी का है, वह कोई प्राइवेट डिटेक्टिव है और उसका परसों । रात छतरपुर में हुए अमर चावला के कत्ल से भी कोई रिश्ता है। ऊपर से मजे की बात यह है कि जूही चावला नाम की एक लड़की का वो बॉडीगार्ड बना हुआ था लेकिन काम उसका भी हो गया । दारोगा साहब, कहते हैं यह लड़की चावला की माशूका थी ।

" "होगी ।" - हवलदार लापरवाही से बोला।

"पेपर के मुताबिक अब पुलिस राज को तलाश कर रही है और वो पट्टा कहीं नहीं मिल रहा। जरूर सारे कत्ल उसी ने किए होंगे और अब चौधरी के इस तीसरे कत्ल के बाद अपने-आपको फंसता पाकर फूट गया होगा कहीं

"कानून से भला कोई बच सकता है ।" - हवलदार दार्शनिकतापूर्ण स्वर में बोला - "कानून के हाथ लंबे होते हैं।

आज नहीं तो कल पकड़ा जाएगा वह राज का बच्चा ।"

मैं कुछ न बोला । मैं सिर झुकाये चाय की चुस्कियां लेता रहा। मैंने चाय खत्म की और उठकर बाहर की तरफ बढ़ा । तभी एक छोकरा मालिक का अखबार लेकर वापिस लौटा।

"यह देखो, दारोगा साहब ।" - मालिक अखबार खोलकर हवलदार को दिखाने लगा – "यह रही खबर ।”

मैंने काउंटर पर चाय की अठन्नी रखी। मैंने स्टाल से बाहर एक ही कदम निकाला था कि एकाएक एक मजबूत हाथ मेरे कंधे पर पड़ा।

मैं घूमा। हवलदार मुझे थामे था और हैरानी भरी निगाहों से मुझे देख रहा था। “खबरदार !" - वह चेतावनी भरे स्वर में बोला।

"किस बात से ?"

"भागने की कोशिश न करना । तुम गिरफ्तार हो ।”

"वो किसलिए?"

"तुम राज हो ।”

"कैसे जाना ?"

उसने काउंटर पर खुले पड़े अखबार की तरफ इशारा किया । अखबार के मुखपृष्ठ पर मेरी तस्वीर छपी हुई थी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
बेगुनाह चॅप्टर 4

आपका खादिम हवालात में । कहां कमला जैसी कड़क सुंदरी का रंगीन, रोमांटिक, गुलाबी बैडरूम और कहां वह नीम अंधेरी, पथरीली, तारीक हवालात की कोठरी ।

एक तो मैं गिरफ्तार, ऊपर से यह सस्पैंस कि चौधरी मेरे फ्लैट में कैसे पहुंच गया और उसे चाकू मार के उसका खून किसने किया ?

क्या एलेग्जैण्डर ने उसे वहां प्लांट किया हो सकता था ? किसलिए?

मुझे कत्ल के इल्जाम में फंसाकर, मुझे मेरे खतरनाक अंजाम से डराकर मुझसे लैजर हासिल करने के लिए? मुझे वह बात न जंची । चौधरी एलैग्जैण्डर का आदमी था। मुझे फंसाने के लिए उसे अपने आदमी का कत्ल करवाने की क्या जरूरत थी ? मैं हवालात में जरूर था लेकिन अपने किसी बुरे अंजाम से त्रस्त मैं नहीं था। मैं चौधरी के कत्ल के केस में नहीं फंस सकता था। मेरे पास बड़ी मजबूत एलिबाई थी। उसके कत्ल के वक्त तो मैं ग्रेटर कैलाश से बहुत दूर कमला नाम की हूर के पहलू में था।

और वह मेरे पहलू में थी। यानि कि अगर वह मेरी बेगुनाही की गवाह थी तो मैं उसकी बेगुनाही का गवाह था । कत्ल अगर मैंने नहीं किया था तो उसने भी नहीं किया था। एक बजे के करीब मुझे सब-इंस्पेक्टर यादव के सामने पेश किया गया। "क्या कहते हो ?" - वह बोला ।

“यही" - मैं बोला - "कि मैं बेगुनाह हूं।"

"वो तो तुम हो । और क्या कहते हो?"

"वो तो मैं हूं ?" - मैं हैरानी से बोला ।

"हां ।”

"यानी कि मानते हो कि चौधरी का कत्ल मैंने नहीं किया ?"

"मानता हूं और जानता हूं।"

"फिर मैं गिरफ्तार क्यों हूं ?"

"तुम गिरफ्तार नहीं, हिरासत में हो ।”

"हिरासत में भी क्यों हूं?"

"क्योंकि पहले हमें असली कातिल की खबर नहीं थी।"

"अब है?"

"हो ।”

कौन है असली कातिल ?"

"तुम्हारी क्लायंट ।"

*कमला चावला ?"

“हां ।”

मैं हंसा ।

“क्या हुआ ?" हंसते क्यों हो ?"

"अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो, यादव साहब ।”

"दो कैसे ?"

"कमला कम-से-कम चौधरी की कातिल नहीं हो सकती ।"

"क्यों नहीं हो सकती ?"

“क्योंकि कल सारी रात वो मेरे साथ थी ।"

“तुम्हें कैसे मालूम ?"

“अब मुझे बेहूदा बात कहनी पड़ेगी ।"

"कह डालो।"

"एक शर्त पर कहूंगा ।"

"कौन सी शर्त ?"

"यह कि तुम इसे राज रखोगे ।”

“अच्छा ।"
 
"वो मेरे पहलू में थी ।"

"सारी रात ?"

"हां ।”

"यानी कि तुम्हारे उसकी कोठी से रुखसत होने से लेकर जि दिन का सूरज चढ़ने तक ?"

"हो ।”

"क्या गारंटी है कि वह सारी रात तुम्हारे पहलू में थी ?"

"मतलब ?"

“तुम दावे के साथ कह रातो हो ति ||धी रात से सुबह होने ३३ ३ ३ के लिए भी तुम्हारी पलक नहीं झपकी

थी ?"

में खामोश हो गया।

"यानी कि नहीं कह सकते ?"

"तुम यह कहना चाहते हो कि रात को किसी वक्त कमला मेरे पहलू से उठी और मेरे फ्लैट में जाकर चौधरी का कत्ल कर आई ?"

"हां ।"

"ऐसा सोचने की कोई वजह ?"

"बहुत मजबूत वजह है । तुम्हारी जानकारी के लिए कल तुम्हारी निगरानी के लिए एक आदमी मैंने तुम्हारे पीछे लगाया हुआ था।"

"क्या ?"

"इसी वजह से मुझे मालूम है कि जब मैंने तुम्हें टैक्सी स्टैंड पट छोड़ा था तो वहां से टैक्सी करके तुम अपने घर नहीं गए थे । तुम पैदल वापिस चावला की कोठी पर लौट गए थे । मेरा आदमी रात भर चावला की कोठी के बाहर । तुम्हारी फिराक में धूनी रमाए बैठा रहा था। वह चश्मदीद गवाह है इस बात का कि रात के दो बजे कमला चावला । कोठी से बाहर निकली थी और अपनी कार पर सवार होकर कहीं गई थी। साढ़े तीन बजे वह कोठी में वापिस लौटी थी। यानी कि तुम्हारा वह दावा सौ फीसदी गलत है कि कल रात वह हर क्षण तुम्हारे पहलू में थी । वह डेढ़ घंटा । तुम्हारे पहलू से गायब रही थी और तुम्हें इस बात की भनक भी नहीं लगी थी।"

मैं सन्नाटे में आ गया।

कई क्षण मेरे मुंह से बोल न फूटा।

"तुम्हारे आदमी ने कमला का पीछा किया था ?"- अंत में मैंने दबे स्वर में पूछा।

"नहीं।"

"क्यों ?"

"क्योंकि उसे तुम्हारी निगरानी के लिए तैनात किया गया था, न कि कमला की ।" मैं फिर खामोश हो गया।

अब मुझे पूरी गारंटी हो गई कि पिछली रात मुझे विस्की में बेहोशी की दवा मिलकर पिलाई गई थी । और वह बेहोशी की दवा मुझे किसी मिशन की खातिर पिलाई गई थी। चौधरी का कत्ल करने के मिशन की खातिर ।

"और" - यादव आगे बढ़ा - "पुलिस का डॉक्टर इस बात की तसदीक कर भी चुका है कि हत्या ढाई और तीन के बीच किसी वक्त हुई है।"

"लाश कब बरामद हुई ?"

"साढ़े तीन बजे ।"

"इतनी जल्दी कैसे ?"

"तुम्हारे मकान मालिक ने तुम्हारे फ्लैट से आती कुछ उठापटक की आवाजें सुनी थीं । उसने समझा कि वहां कोई चोर घुस आया था। उसने पुलिस को फोन कर दिया था।"

"उसे मेरी इतनी फिक्र थी ?"

"उसे अपनी फिक्र थी। चोर उसके घर में भी घुस सकता था।"

"तुम्हारे पास मिसेज चावला के खिलाफ सिर्फ यह है कि हत्या के समय वह अपनी कोठी पर नहीं थी ?"

"इतने भोले मत बनो । उसके खिलाफ ढेरों सरकमस्टांशल एविडेंसेज हैं। मसलन अपने पति की कथित आत्महत्या के समय भी वह बड़े संदेहजनक हालात में अकेली उसके पास मौजूद थी - अपना एतराज तुम अपने पास रखो, तुम सिर्फ इसीलिए उसे एलीबाई देने की कोशिश कर रहे हो क्योंकि वह तुम्हारी क्लायंट है और उसके लिए ऐसा कुछ भी करना तुम्हारा फर्ज बनता है - फिर जूही चावला की कथित अत्महत्या के समय भी वह - सिर्फ वह उसके बंगले में मौजूद थी । और अंत में चौधरी की तुम्हारे फ्लैट में हुई हत्या के वक्त भी वह अपनी कोठी में नहीं थी। इसमें से किसी एक बात को मैं इत्तफाक का दर्जा दे सकता था लेकिन तीन-तीन इत्तफाक मुझे हजम नहीं होने वाले ।"

उसको चौधरी की हत्या करने की क्या जरूरत थी ?"
 
Back
Top