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बेगुनाह ( एक थ्रिलर उपन्यास )

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बनाए गया के ?"

"हां । बनाए गया । आपने उसके वकील से बात की थी। उसने कुछ नहीं बताया आपको ?"

"नां, जी ।"

"मालूम हो जाएगा" - मैं उठ खड़ा हुआ ।

"बैठो, जी । कॉफी मंगावें ?"

"नहीं, शुक्रिया । अब मैं रुखसत चाहता हूं । जाती बार आपको एक बात बता जाना चाहता हूं।"

"वा का ?"

"मैं पुलिस नहीं हूं। मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूं।

" पिराइवेट डिटेक्टिव ?" - वह बोला - "फिर तो हम थमें जान गए होड़ ।"

"अच्छा !"

"हां ! थम राज हो ?"

"कैसे जाना ?"

"चावला की मौत की खबर के साथ थमारा नाम छापे में छपा होड़ ।"

"ओह !"

"वैसे जो बातां मैंने थमारे सां की, वा म्हारे को पिराइवेट डिटेक्टिव से भी करने से गुरेज न होवे था । म्हारा दिल साफ

"जानकार खुशी हुई।” मैं फिर से उसका शुक्रिया अदा करके वहां से विदा हो गया।

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टेलीफोन डायरेक्ट्री के मुताबिक शैली भटनागर की मैट्रो एडवरटाइजिंग एजेंसी एंड साउंड स्टूडियो जनपथ पर शॉपिंग सेंटर की भीड़-भाड़ से परे उसके कनाट प्लेस से लगभग दूसरे सिरे पर क्लेरिसीज होटल के करीब था। शैली भटनागर का व्यवसाय-स्थल मैंने अंग्रेजों के जमाने की बनी एक एकमंजिला कोठी में पाया । कोठी के गिर्द विशाल लान था और उसके लकड़ी के फाटक पर एक चौकीदार बैठा था। टैक्सी को भीतर दाखिल होने की ख्वाहिशमंद पाकर उसने बिना हुज्जत किए फाटक खोल दिया । कोठी की पोर्टिको में मैं टैक्सी से उतरा । मैंने टैक्सी का भाड़ा चुकाकर उसे विदा किया। भीतर मेरे कदम एक सजे रिसेप्शन पर पड़े। "मैं डिटेक्टिव हूं।" - मैं जानबूझकर रूखे स्वर में वहां बैठी सुंदरी बाला से बोला - "मैं अमर चावला के कत्ल की बाबत शैली भटनागर से मिलना चाहता हूं।"

डिटेक्टिव शब्द का अनोखा रोब था। उसने फौरन शैली भटनागर को फोन किया। फिर उसने मुझे एक चपरासी के सुपुर्द कर दिया। जिस ऑफिस में चपरासी मुझे छोडकर गया, वह एडवरटाइजिंग के ग्लैमरस धंधे जैसा ही ग्लैमरस था । वहां की हर बात में रईसी की बू बसी थी । शैली भटनागर निश्चय ही बहुत पैसे कमाता था। वह एक अधेड़ावस्था का लेकिन फिल्म अभिनेताओं जैसा खूबसूरत व्यक्ति था । उसके बाल तकरीबन सफेद थे लेकिन वह उनमें भी जंच रहा था । वह एक शानदार सूट पहने था। "हैलो !" - उसने उठकर मुझसे हाथ मिलाया - "मुझे शैली भटनागर कहते हैं।"

"और बंदे को राज ।" - मैं बोला।

"तशरीफ रखिए ।"

मैं एक निहायत आरामदेह कुर्सी में ढेर हो गया।

"तो आप डिटेक्टिव हैं ?" - वह बोला ।

"प्राइवेट ।" - मैंने बताया।

"मुझे मालूम है।"

"कैसे मालूम है ?"

"अभी-अभी मालूम हुआ है, जनाब ! आपके नाम से । पेपर में मैंने चावला के कत्ल के संदर्भ में राज

नामक एक प्राइवेट डिटेक्टिव का जिक्र पढ़ा था।"

"आई सी !"

एक चपरासी नि:शब्द भीतर आया और कॉफी सर्व कर गया। मैंने अपना रेड एंड वाइट का पैकेट निकाला और उसे सिगरेट ऑफर किया।

"शुक्रिया" - वह बोला - "मैं सिगरेट नहीं पीता।"

"अच्छा ! विज्ञापन के धंधे से ताल्लुक रखते आप पहले आदमी होंगे जो सिगरेट नहीं पीते ।"

वह हंसा ।। "लेकिन आप शौक से पीजिए ।" - वह बोला।
 
मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया। "ताबूत की कील कहिए इसे" - मैं ढेर सारा धुआं उगलता हुआ बोला - "लेकिन क्या करें, साहब ! छूटती नहीं है। जालिम मुंह की लगी हुई ।" वह बड़े शिष्ट भाव से हंसा । मैंने कॉफी की एक चुस्की ली । "तो" - मैं बोला - "चावला साहब से वाकिफ थे आप ?"

"हां ।" ।

"अच्छी, गहरी वाकफियत थी ?"

"हां, थी ही । मैं उनकी पार्टियों में जाया करता था । वे हमारी पार्टियों में आया करते थे। यही होती है अच्छी वाकफियत की पहचान ।”

"उनके कत्ल से आपको हैरानी नहीं हुई ?"

"हुई । सख्त हैरानी हुई । ऐसी तो कोई बात नहीं थी चावला साहब में जिसकी वजह से कोई उनका कत्ल कर डालता ।"

"क्या वो अपनी जान का खतरा महसूस करते थे ?"

"क्या पता, वो क्या महसूस करते थे ! ऐसे कोई नोट्स उन्होंने कभी मेरे से तो एक्सचेंज किए नहीं थे।"

"आखिरी बार आप कब मिले थे चावला साहब से ?" ,

"कुछ ही दिन पहले ।"

"कहां ?"

"यहीं । मेरे ऑफिस में ।"

"कैसे आना हुआ था उनका ?"

"यूं ही कर्टसी कॉल ।”

"यानी कि" - मैं उसे अपलक देखता हुआ बोला - "जान पी एलैग्जैण्डर का जिक्र तक नहीं आया था ?"

"कौन जान पी एलैग्जैण्डर ?"

"आप इस नाम के किसी शख्स को नहीं जानते ?"

"न ।"

"हैरानी है।"

"किस बात की ?"

"फिर भी आपका नाम उसकी लैजर बुक में दर्ज था । बीस हजार रुपए की रकम के साथ । हैरानी है कि बना एक । ऐसे शख्स को बीस हजार रुपए दिये जिसके नाम से तो आप वाकिफ नहीं लेकिन जो आपके नाम से बाखूबी वाकिफ

वह खामोश रहा। वह कितनी ही देर खामोश रहा। मैं बड़े धैर्यपूर्ण ढंग से सिगरेट के कश लगता उसके दोबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा। "कैसे जाना ?" - अंत में वह धीरे से बोला ।

"एलैग्जैण्डर की लैजर बुक से जाना जो कि इस वक्त" - मैं तनिक ठिठका - "मेरे पास है।"

"यह कैसे हो सकता है ?"

हो ही गया है किसी न किसी तरह ।"

"फिर भी पता तो लगे कि एलैग्जैण्डर की लैजर बुक तुम्हारे पास कैसे पहुंच गई ?"

"बताता हूं। पहले आप कबूल कीजिये कि आप एलैग्जैण्डर को जानते हैं।"

"किया कबूल ।"

"मुझे वह लेजर बुक चावला साहब की कोठी पर उनकी स्टडी में उसकी मेज के दराज में पड़ी मिली थी । उसमें

आपके नाम वाली एंट्री के गिर्द लाल दायरा खिंचा हुआ था । ऐसा एलैग्जैण्डर ने तो किया नहीं होगा क्योंकि उसके लिए तो लैजर की सब एंटियां एक जैसी थी । ऐसा अगर चावला साहब ने किया था तो वे निश्चय ही आपके और एलैग्जैण्डर के किसी रिश्ते के बारे में कुछ जानते थे ।”

"चावला का कत्ल उस लैजर-बुक की वजह से हुआ हो सकता है ?" |

"हो सकता है। उस लैजर बुक के तलबगार आप भी हो सकते हैं, इसलिये..."

, मैंने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

"कातिल मैं भी हो सकता हूं।" - उसने फिकरा मुकम्मल किया।

"ए वर्ड टु दि वाइज ।"

"मैंने कत्ल नहीं किया ।"

"दैट्स वैरी गुड ।"

"पहाड़गंज में मेरा एक सिनेमा है। वहां तोड़-फोड़ और गुण्डागर्दी की वारदात अकसर हुआ करती थी। फिल्म देखने आने वालों के मन में दहशत बैठती जा रही थी कि वह सिनेमा उनके लिये सेफ नहीं था । जब से मैंने एलैग्जैण्डर को बीस हजार रुपये दिये हैं तब से उस सिनेमा पर कभी कोई गड़बड़ नहीं हुई है।"
 
"ब्लैकमेल ?"

"एलैग्जैण्डर ने इसे प्रोटेक्शन मनी कहा था।"

"यह पेमंट फाइनल तो नहीं होगी ?"

"वह तो इसे फाइनल ही बताता था।"

"लेकिन अगर यह फाइनल नहीं थी तो एलैग्जैण्डर की दुक्की पिट जाने से आपको फायदा पहुंच सकता था।"

"मतलब ?"

"अगर चावला के कत्ल में एलैग्जैण्डर फंस जाये और जेल की हवा खा जाये तो आपके लिये तो यह भारी राहत की बात होगी।"

"तुम जासूस हो । ऐसा कुछ करके दिखाओ तो मैं तुम्हें मुंहमांगी फीस दूंगा।"

"इस बारे में अभी सोचेंगे । फिलहाल आप यह बताइये कि कत्ल के वक्त आप कहां थे?"

"यहीं था ।"

"आपका दफ्तर रात तक खुलता है ?"

"नहीं । पांच बजे बन्द हो जाता है।"

"फिर आप यहां क्या कर रहे थे ?"

"कुछ काम कर रहा था जो बहुत जरूरी था।"

"और कौन था यहां ?"

"कोई भी नहीं । छ: बजे तक सब लोग चले गये थे।"

"चपरासी भी ?"

"हां । सिर्फ गेट का चौकीदार यहां रह गया था। वह रात को भी यहीं होता है।"

"आप कब तक यहां ठहरे थे ?"

"नौ बजे तक ।”

,,,

"तीन घंटे आप यहां अकेले बैठे काम करते रहे ?"

"हां ।"

"उस दौरान चौकीदार भी यहां नहीं आया ?"

"नहीं । मेरे बुलाए बिना उसके यहां आने का कोई मतलब नहीं था और मैंने उसे यहां बुलाया नहीं था।" =

"आप चौकीदार की जानकारी में आये बिना यहां से जा सकते हैं ?"

"नहीं । यहां से निकलने का एक ही दरवाजा है और उस पर वो बैठा होता है।"

"फिर तो चौकीदार आपकी बेगुनाही का गवाह हुआ ।"

"हुआ।"

"पिछवाड़े का क्या हाल है ?"

"पिछवाड़े में हमारा साउंड स्टूडियो है" - उसने खुली खिड़की से बाहर इशारा किया - "वह जो बहुत ऊंची छतवाली इमारत तुम्हें दिखाई दे रही है, वह साउंड स्टूडियो है। उससे आगे ऊंची बाउंड्री वाल है और उससे आगे एक पतली गली है।"

"साउंड स्टूडियो से गली में कोई रास्ता है ?"

"नहीं । उसके पिछवाड़े में एक दरवाजा है लेकिन वह चारदीवारी के भीतर कम्पाउंड में ही है।"

“पिछवाड़े की दीवार फांदी जा सकती है?"

"मैं नहीं फांद सकता ।" ।

"लेकिन फांदी जा सकती है?" .

जवाब देने की जगह उसने बेचैनी से पहलू बदला।

"आप पिछवाड़े के रास्ते चुपचाप यहां से खिसककर कत्ल करके लौट आये हो सकते हैं। कार पर छतरपुर यहां से

आधे घण्टे से ज्यादा का रास्ता नहीं है।"

"मैं यहीं था।"

"लेकिन आप यह बात साबित नहीं कर सकते ।”

वह कुछ क्षण खामोश रहा। "मैंने बम्बई ट्रंक कॉल की थी ।" - एकाएक वह बोला ।
 
"किसे ?"

"अपने वहां के प्रतिनिधि को । आठ बजे के आसपास ही मेरी कॉल लगी थी और मैंने उससे बात की थी।"

"आपने कॉल बुक कराई थी । सीधा डायल नहीं किया था बम्बई का नम्बर ?"

"नहीं किया था। यहां के किसी फोन में एस टी डी की सुविधा नहीं है। मिस्टर राज, टेलीफोन कम्पनी के रिकार्ड से यह जाना जा सकता है मेरे बम्बई प्रतिनिधि के बयान से यह साबित हो सकता है कि मेरा कत्ल से कोई वास्ता नहीं

,,, "ऊपर से आप चौकीदार को समझा सकते हैं कि पूछने पर वह यह कहे कि आठ बजे उसने आपको यहां बैठे देखा

था।"

"यह भी हकीकत है । मुझे अब याद आया है कि आठ बजे मैंने उससे क्लेरिसिज से खाना मंगवाया था।"

"इतनी अहम बात आपको अब याद आई है ?"

"हां ।"

"मैं चौकीदार को बुलाकर इस बात की तसदीक कर सकता हूं?"

"जो चौकीदार फाटक पर बैठा है, वह वो चौकीदार नहीं है । रात वाला चौकीदार शाम के छ: बजे आता है।"

"और शाम होने में अभी बहुत वक्त है । तब तक आप उसे जो चाहे सिखा-पढ़ा लेंगे, आखिर वह आपका मुलाजिम है।

उसने आहत भाव से मेरी तरफ देखा। "एनी वे" - मैं उठ खड़ा हुआ - "जानकर खुशी हुई कि आप अपने दोस्त के कत्ल के लिए जिम्मेदार नहीं । इस केस में दरअसल मर्डर सस्पैक्ट्स की कोई कमी नहीं है। अच्छा है कि उनमें से एक तो कम हुआ ।” उसने उठकर मुझसे हाथ मिलाया। "मैं कभी फिर हाजिर होऊं तो आपको कोई असुविधा तो नहीं होगी ?"

"नो । नैवर । ड्रॉप इन ऐनी टाइम ।"

"बैंक्यू ।"

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ठीक पांच बजे मैं नारायण विहार में जूही चावला के बंगले में था । उसके मां-बाप जरूर अंतर्यामी थे जो उन्होंने

अपनी बेटी का नाम फूल के नाम पर रखा था। वह वाकई फूल जैसी ही सुन्दर, कोमल और नाजुक थी । उम्र में वह बाइस-तेईस साल से ज्यादा हरगिज नहीं थी। कद उसका खूब लम्बा-ऊंचा था और उसकी चाल-ढाल से अन्धा भी पहचान सकता था कि वह तजुर्बेकार फैशन मॉडल थी । वह चलती थी तो उसकी केवल टांगें हरकत में आती थीं। उसके जिस्म का ऊपर का भाग एकदम स्थिर रहता था और ठोढ़ी हवा में तनी रहती थी । उसका रंग गोरा था और नयन-नक्श बहुत साफ-सुथरे थे । उस वक्त वह चूड़ीदार पाजामा और कुर्ता पहने थी जो कि उसके कमसिन जिस्म पर गजब ढा रहा था। अलबत्ता सूरत से वह परेशानहाल लग रही थी। मेरी तो उस पर एक निगाह पड़ते ही लार टपकने लगी थी।

मालूम हुआ कि वइ वहां अकेली रहती थी। उसने मुझे एक छोटे से लेकिन खूबसूरत ड्राइंगरूम में बिठाया । वहां की हर चीज मॉडल थी और किसी फैशन मॉडल के ही व्यक्तित्व के अनुरूप थी। एक पूरी दीवार पर उसका 6x8 फुट का निहायत जानदार ब्लोअप लगा हुआ था। "वक्त के बहुत पाबन्द हैं आप शर्मा साहब !" - वह बोली ।

“ऐसी कोई बीमारी मुझे नहीं है" - मैं बोला - "यहां मैं पूरे पांच बजे पहुंचा हूं यह महज इत्तफाक है।"

"कुछ पियेंगे आप ?"

"कुछ नहीं पियूँगा । कोई खास चीज पिलाएं तो मना भी नहीं करूंगा।"

,,, "खास चीज, जैसे ड्रिक ?"

"आप शौक रखती हैं ?"

"शौक नहीं रखती लेकिन ड्रिक रखती हूं । चावला साहब को शौक था उनके लिए..."

वह खामोश हो गई। उसने असहाय भाव से कन्धे झटकाए और एक बड़ी सर्द आह भरी।

"अभी मैं ड्रिंक का खाहिशमन्द नहीं" - मैं जल्दी से बोला, अकेले पीने का क्या फायदा था ? मैं तो दरअसल शराब में घोलकर शबाब पीने की फिराक में था - "आप तकल्लुफ न करें । मैं जरूरत महसूस करूगा तो कह दूंगा।"

"श्योर ?"

"श्योर।"

"ओके दैन ।”

"चावला साहब आपसे मुहब्बत करते थे ?"

"हां ।"

"आप भी उनसे ?"

"हां । बहुत ।”

"बहुत खुशकिस्मत थे चावला साहब जो उन्हें आप जैसी स्वर्ग की अप्सरा की मुहब्बत हासिल थी।"

"मैं एक मामूली लड़की हूं। यह उनकी मेहरबानी थी कि मैं उन्हें पसन्द थी।"

"आप दोनों में उम्र के लिहाज से कुछ ज्यादा ही फर्क नहीं था ?"

"सच्ची मुहब्बत ऐसा कोई फर्क नहीं मानती । यह दिल का सौदा है जो दिल से होता है।"

"आपको तो फिल्म अभिनेत्री होना चाहिये था।"
 
"वो कैसे ?"

"अभी इतना शानदार फिल्मी डायलॉग, इतने शानदार फिल्मी तरीके से जो बोला ।"

"मैं फिल्मों में आ रही हूं । यश चोपड़ा ने मुझे साइन कर भी लिया है।"

"आप जरूर कामयाब होंगी । मुझे घर के भाग ड्योढी में ही दिखाई दे रहे हैं।"

"शुक्रिया ।"

"अब यह बताइये कि आपने मुझे क्यों याद फरमाया ?"

“मुझे एक बॉडीगार्ड की जरूरत है।"

"वो तो होनी ही चाहिये । इतनी खूबसूरत बॉडी को गार्ड की जरूरत नहीं होगी तो और किसे होगी ?"

“ मिस्टर राज, फॉर गॉड सेक मजाक न कीजिये ।”

"क्यों बॉडीगार्ड की जरूरत महसूस कर रही हैं आप ?"

,,,

"मुझे डर है कि मेरा कत्ल हो सकता है।"

अब वह साफ-साफ डरी हुई लग रही थी। "इस डर की कोई वजह ? कोई बुनियाद ?"

"मैं ऐसा कुछ जानती हूं जो कि कोई नहीं चाहता कि जिन्दगी में कभी मेरी जुबान पर आये ।"

"क्या जानती हैं आप ?" ।

"वह मैं आपको नहीं बता सकती।"

"कैसे जानती हैं ?" "

यह भी मैं आपको नहीं बता सकती ।"

"फिर कैसे वात बनेगी ?"

" मिस्टर राज, मेरी हिफाजत का इन्तजाम करने के लिए आपका यह सब जानना जरूरी नहीं । आप बिना यह सब जाने भी मेरे बॉडीगार्ड बन सकते हैं। मैं आपकी कोई भी मुनासिब फीस भरने को तैयार हूं।"

"अगर आपको उस शख्स से अपनी जान का खतरा है जिसने कि चावला साहब की हत्या की है तो बॉडीगार्ड एंगेज करने से बेहतर कदम यह होगा कि आप उसकी बाबत पुलिस को बताएं । वह जेल में पहुंच जाएगा तो वह किसी की जान के लिए खतरा बनने के काबिल नहीं रह जायेगा।"

"नहीं । मुझे यह तरीका पसंद नहीं । कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी वजह से ऐसा कोई कदम फिलहाल मैं नहीं उठाना चाहती ।"

"आप मुझे अंधेरे में रखेंगी तो मैं आपकी क्या खिदमत कर सकेंगा ?" ।

"मेरे बॉडीगार्ड का काम आप अंधेरे में रहकर भी कर सकते हैं ।"

"अंधेरे में रहकर तो मैं और भी बहुत कुछ कर सकता हूं । खूबसूरत बॉडी को गार्ड करने का काम तो अंधेरे में और भी बढ़िया होता है।"

वह खामोश रही ।

"आप जानती हैं, कत्ल के केस में पुलिस से कोई जानकारी छुपाकर रखना अपराध होता है । सामाजिक भी और नैतिक भी।"

"जो जानकारी मुझे है उसकी पुलिस को भनक नहीं लगने वाली ।"

“आप तो पहेलियां बुझा रही हैं।"

"आप इस बात का पीछा छोड़िए और यह वताइये कि आप मेरे बॉडीगार्ड बनने को तैयार हैं या नहीं ?"

"आपको ऐसी सेवा की जरूरत कब तक होगी ?"

"जब तक मेरा खौफ न मिट जाए।"

"और ऐसा कब तक होगा ?"

"पता नहीं ।”

"यानी कि आपको अनिश्चित काल के लिए बॉडीगार्ड की जरूरत है ?"

,,, "हां ।”

"हर वक्त के लिए ?"

"हां । फीस क्या है आपकी ?"

"तीन सौ रुपये रोज जमा खर्चे । कम-से-कम दो हजार रुपये एडवांस ।"

= "कम-से-कम का क्या मतलब ?" "मतलब कि अगर आपको एक ही दिन के बाद भी बॉडीगार्ड गैरजरूरी लगने लगा तो भी दो हजार रुपये लगेंगे।"

"ओह ! आप फौरन काम शुरू कर सकते हैं ?"

"मैं फौरन आपके लिए बॉडीगार्ड भिजवा सकता हूं।"

"यानी कि यह काम आप खुद नहीं करेंगे ?"

"कर सकने लायक वक्त मेरे पास होता तो मेरी खुशकिस्मती होती । ऐसी बॉडी, और वह भी दिन-रात गार्ड करने का

काम....

,,, "यह आदमी" - वह मेरी बात काटकर बोली - "होशियार होगा ? काबिल होगा ? हथियारबन्द होगा ?"

"होगा।"

"आप गारण्टी करते हैं ?"

"हां ।"

"कितनी देर में वह यहां पहुंच सकता है?"

"एक-डेढ़ घण्टा तो लग ही जायेगा ।"

"फीस एडवांस देना जरूरी है ?"

"हां ।"

"क्यों ?"

"क्योंकि आपकी जान को खतरा है, आप फीस अदा किये बिना ऊपर वाले को प्यारी हो सकती हैं।"

"जब आपका बॉडीगार्ड मेरे साथ होगा तो ऐसा कैसे होगा ?"

"वो जब होगा तब होगा । आपकी बातों से तो लगता है जैसे उसके यहां पहुंचने से पहले ही आपकी दुक्की पिट सकती है।"

"दिस इज वैरी इनडींसेण्ट एण्ड अनचैरिटेबल ऑफ यू, मिस्टर राज !"

"दिस इज बिजनेस, मैडम ! जब क्लायंट का मुकम्मल सहयोग हासिल न हो तो ऐसी सावधानी बरतनी पड़ती है।

आप यह तक तो बताना नहीं चाहती कि आपको कैसा खतरा है किससे खतरा है, कितना बड़ा खतरा है ! और आप इस बात को भी खातिर में नहीं ला रही हैं कि आपके साथ आपके बॉडीगार्ड का भी काम तमाम हो सकता है।"

वह खामोश रही ।

"आप अभी भी मुझे सारी बात साफ-साफ बताएं तो हो सकता है, मैं एडवांस जरूरी न समझें ।"
 
"नहीं" - वह उठती हुई बोली - "आप एडवांस जरूरी समझिए । मैं लाती हूं एडवांस ।" वह वहां से विदा हो गई। मैंने ताबूत की एक कील सुलगाई और खुद अपनी पीठ थपथपाई - राज, दि लक्की बास्टर्ड। चौबीस घंटे से भी कम समय में मैंने बाईस हजार रुपए कमा लिए थे। अब जो फीस मुझे हासिल होने जा रही थी, असल काम करने वाले को उसमें से मैंने सिर्फ सौ रुपए रोज देने थे । इतने पैसे पैसे पीट लिए थे मैंने और वह मेरी कमबख्त सैक्रेट्री मुझे उसकी तनखाह कमाने के काबिल नहीं समझती थी। मेज पर एक फिल्मी पत्रिका पड़ी थी। मैं उठाकर उसके पन्ने पलटने लगा । एक पन्ने पर मुझे जूही चावला की एक बड़ी दिलकश रंगीन तस्वीर छपी दिखाई दी जो की किसी साड़ियों के विज्ञापन के साथ छपी थी। मैंने वह तस्वीर पत्रिका में से फाड़ ली और उसे तह करके अपनी जेब में रख लिया । वह वापिस लौटी। चैक की जगह उसने मुझे सौ-सौ के बीस नोट नकद दिये तो मेरी तबीयत और भी प्रसन्न हो गयी ।

"चावला साहब के कत्ल की बाबत" - मैंने पूछा - "पुलिस ने आपसे कोई पूछताछ नहीं की ?"

,,,

"अभी नहीं की।"

"पुलिस देर-सबेर पहुंचेगी जरूर आपके पास । उनसे आपकी रिश्तेदारी की बात पुलिस से छुपी नहीं रहने वाली ।

और किसी खामख्याली में न रहिएगा । पुलिस आप पर भी कत्ल का शक कर सकती है।"

“मुझ पर ?" - वह अचकचाकर बोली। |

"हां ।”

"मैंने उनका कत्ल नहीं किया।"

आपसे और किसी जवाब की उम्मीद भी नहीं की जा सकती ।"

"मैं उनसे मुहब्बत करती थी ।"

"उनसे ज्यादा मुहब्बत शायद आप उनकी दौलत से करती हों ?"

"मतलब ?"

"अब यह न कहिएगा की आपको यह खबर नहीं कि चावला साहब की वसीयत के मुताबिक उनकी तीन-चौथाई संपत्ति की मालकिन आप हैं।"

"नहीं कहूंगी लेकिन, मिस्टर राज, उस वसीयत की खबर मुझे आज ही लगी है। आज ही सुबह चावला साहब के वकील ने मुझे वसीयत की बाबत बताया था।"

“पहले से आपको वसीयत के बारे में नहीं मालूम था ?"

"नहीं मालूम था ।"

"यह कैसे हो सकता है ?

चावला साहब ने वसीयत करते ही आपको इस बाबत बताया होगा। आखिर आपकी खातिर वे अपनी ब्याहता बीवी को अपनी जायदाद से लगभग बेदखल कर रहे थे।"

"मुझे नहीं बताया था।"

"अब तो आप यही कहेंगी।"

"मैं सच कह रही हूं" - एकाएक उसका स्वर भर्रा गया - "मैं चावला साहब से मुहब्बत करती थी । कत्ल तो दूर की बात है, मैं तो उनका बुरा भी नहीं चाह सकती थी ।"

आंसुओं की शक्ल में छलछलाती संजीदगी मुझे उसकी आंखों में दिखाई दी। लेकिन फिर मुझे याद आया कि वह औरत थी । किसी औरत के लिए बावक्तेजरूरत आंसू बहाने लगना क्या बड़ी बात थी।

मैं अपने स्थान पर से उठकर उसके सोफे पर उसके पहलू में पहुंचा । मैंने एक बांह उसके कंधों के गिर्द लपेटी और दूसरे हाथ से बड़े प्यार से उसके गुलाबी कपोलों पर ढुलक आई आंसुओं की बूंदें पोंछी । करना तो मैं ऐसा अपने होंठों से चाहता था लेकिन उस वक्त मेरी अक्ल - नीयत नहीं, अक्ल - उतनी ही लिबर्टी की गवाही दे रही थी। बहरहाल उतने में ही जन्नत का मजा आ गया। मेरा जी चाहने लगा की वह रोती रहे और मैं उसके आंसू पोंछता रहूं। "छि: !" - मैं अपने स्वर में मिश्री घोलता हुआ बोला - "अच्छे, बच्चे कहीं रोते हैं !" उसने सुबकना बंद किया और फिर मेरे से थोड़ा परे सरक गयी ।

मुझे लगा, जैसे मेरी बांहों से जन्नत निकल गई।

,,, - "मुझे चावला साहब की मौत का बड़ा दुख है।" - वह गमगीन स्वर में बोली ।

"वो तो मैं देख ही रहा हूं। विस्की कौन-सी पीते थे चावला साहब ?"

"डिम्पल !"

"जरा देखें तो कैसी होती है डिम्पल ?"

ऐसा मैंने विस्की पीने की नीयत से नहीं कहा था । मैं सिर्फ उसका ध्यान बंटाना चाहता था, उसे उसके गमजदा मूड से उबारना चाहता था ताकि मैं उससे कुछ जरूरी सवालात पूछ सकता ।

वह उठकर बाहर गई ।

मैंने नया सिगरेट सुलगा लिया। वह लौटी तो उसके साथ ट्रे उठाए उसकी नौकरानी थी । ट्रे में डिम्पल की बोतल, सोडा साइफन, काइमपा कोला और दो गिलास थे। नौकरानी ट्रे को सैंटर टेबल पर रखकर विदा हो गई तो जूही ने बड़ी दक्षता से मेरे लिए जाम तैयार किया। साफ जाहिर हो रहा था की चावला की जिंदगी में उसकी वह सेवा वहां हमेशा वही किया करती थी। अपने लिए उसने गिलास में कैम्पा कोला डाला। मैंने चीयर्स बोला, शानदार स्कॉच विस्की का रसास्वादन किया और बोला - "अब मैं चंद सवाल पूछे ?"

पूछो।" - वह सुसंयत स्वर में बोली।

"चावला साहब कल यहां किसलिए आए थे?"

"कौन कहता है, वे कल शाम को यहां आए थे ?"

"मैं कहता हूं। कल शाम को वे यहां आए थे।"

"तुम्हें कैसे मालूम ?"

"मैं जासूस हूं । रिमैम्बर ?"

वह खामोश रही ।

"आपकी चावला साहब से आशनाई थी । आते तो वे यहां अक्सर होंगे। मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि कल भी वे तफरीहन ही आए थे या कोई और वजह भी थी ?"

"कल दरअसल वो बड़े फिक्रमंद मूड में थे और एक बड़े गंभीर मसले पर मुझसे बात करने आए थे।" "क्या था वह गंभीर मसला ?" "हमारी शादी ।"

"इसमें मसले वाली क्या बात थी ?" "एक तो ये बात थी की वे पहले से ही शादीशुदा थे। दूसरे वे चाहते थे कि उनसे शादी के बाद मैं मॉडलिंग छोड़ दें और एक्ट्रेस बनने का ख्याल तो कतई छोड़ दें ।"

"आपको इससे ऐतराज था ?"

था ?"

"ऐतराज तो नहीं था लेकिन अपने कैरियर से फौरन किनारा कर लेना भी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था। मैंने उन्हें यही कहा था कि पहले शादी तो हो, फिर अगर मेरा कैरियर हमारे विवाहित जीवन में अड़्गा बनता दिखाई देगा तो मैं छोड़ दूंगी उसे ।"

"कबूल की थी उन्होंने यह बात ?"

"हां । बड़ी मुश्किल से की थी लेकिन की थी।" =

"इसके बाद और क्या बातें हुई उनसे ?" –

"और कुछ नहीं । इतने में सात बज गए थे और उन्होंने किसी से मिलने जाना था।"

"किससे ?"

"मालूम नहीं ।"

"उन्होंने कोई नाम नहीं लिया था ?"

"नहीं ।"

"आपने पूछा भी नहीं था ?"

"नहीं ।"

"क्यों ?"

"उनकी ऐसी बातों में दखलंदाजी मुझे पसंद नहीं थी।"

"आप जानती नहीं उन्होंने किससे मिलने जाना था या बताना नहीं चाहती ?"

"जानती नहीं ।”

"यह मालूम हो कि उस मुलाकात के लिए उन्होंने कहां जाना था ?"

"हां । यह मालूम है।"

"कहां जाना था ?" "छतरपुर । अपने फार्म हाउस में ।"

"आप समझती हैं न कि उसी आदमी ने उनका वहां कत्ल किया हो सकता है जिससे कि वो मिलने गए थे?"

"समझती हूं।"

फिर भी उसका नाम नहीं बताना चाहतीं ?"

“जो बात मुझे मालूम ही नहीं, वो कैसे बता सकती हूं भला ?"

"नैवर माइंड । तो चावला साहब कल शाम सात बजे तक यहां थे?"

"हां ।”

"गए कैसे थे वे यहां से ? अपनी कार पर ?" ‘

"नहीं टैक्सी पर ।"

,,,

"अपनी कार पर वयों नहीं ?"

"अपनी कार उन्होंने वापिस भेज दी थी।"

"क्यों ?"

"वजह मुझे नहीं मालूम।"

"आदमी कारों का व्यापारी हो और टैक्सी पर सफर करे, यह बात अजीब नहीं लगती ?"

"लगती है।"
 
"फिर भी इस बाबत आपने उनसे कोई सवाल नहीं किया ?"

"कल आधी रात के बाद" - "मैंने बम सा छोड़ा - "आपने चावला साहब की कोठी पर फोन क्यों किया था ?"

उस सवाल पर उसने हैरानी तो बहुत जाहिर की लेकिन जवाब देने में कोई हुज्जत न की।

"मैं उनके लिए फिक्रमंद थी" - वह बोली - "और तसल्ली करना चाहती थी कि वे खैरियत से थे।"

"क्यों चाहती थीं आप ऐसा ? और वह भी इतनी रात गए ?"

"मुझे बहुत बुरा सपना आया था। मेरा मन उनके किसी अनिष्ट की आशंका से कांप गया था।"

"कमाल है !"

वह खामोश रही।

"आप शैली भटनागर को जानती हैं ?"

तभी कॉल बैल बज उठी।

"जानती हूं" - अकस्मात बजी घंटी की आवाज पर वह तनिक हड़बड़ाई - "बतौर फैशन मॉडल मैं शैली भटनागर से अनुबंधित हूं। उसी ने मुझे इतनी फेमस फैशन मॉडल बनाया है।" बाहर नौकरानी किसी से बात कर रही थी । जवाब में कोई जोर-जोर से बोल रहा था, उसकी आवाज मैंने फौरन पहचानी । मुझे वहां कोई हंगामा खड़ा होने का अंदेशा लगने लगा। जूही जरूर वह आवाज नहीं पहचान पाई थी इसीलिए वह अभी शांत बैठी थी । तभी नौकरानी वहां पहुंची।

मिसेज कमला चावला आई हैं।" - उसने घोषणा की।

जूही यूं हड़बड़ाकर उठकर खड़ी हुई, जैसे उसे कांटा चुभा हो । उसके चेहरे से रंग निचुड़ गया । उसने व्याकुल भाव से मेरी तरफ देखा।

"तुम्हें उससे डर लगता है ?" - मैंने पूछा।

उसने जल्दी-जल्दी सहमति में सिर हिलाया।

"वो पहले कभी यहां आई है?"

,,, | "नहीं, कभी नहीं ।"

"घबराओ नहीं और शान्ति से बैठो । उसे मैं संभाल लूंगा । मेरे होते वह कोई तमाशा नहीं खड़ा करेगी। करेगी तो मैं नहीं करने दूंगा।

" बुलाओ" - जूही खोखले स्वर में नौकरानी से बोली। वह वापिस सोफे पर ढेर हो गई। - कुछ क्षण बाद बगोले की तरह कमला वहां दाखिल हुई । मुझे देखकर वह ठिठकी। उसके चेहरे पर आश्चर्य और | तिरस्कार के मिले-जुले भाव प्रकट हुए ।

"तुम !" - वह बोली - "तुम यहां क्या कर रहे हो ?"

"बैठा हूं।" - मैं सहज भाव से बोला - "और क्या कर रहा हूं !"

"क्यों बैठे हो ?" - फिर उसका ध्यान ड्रिंक्स की ट्रे की तरफ गया - "ओह, तो यह बात है !"

"क्या बात है ?"

"बड़े कमीने आदमी हो राज !"

"वो तो मैं हूं लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ ?"

"मैं पूछती हूं तुम किसकी तरफ हो ?"

"क्या मतलब ?" ।

"मैं तुम्हारी क्लायन्ट हूं या यह चुडैल?"
 
"तुम दोनों मेरी क्लायंट हो।"

"ऐसा कैसे हो सकता है ?"

"हो सकता है। जूही को मेरी सेवायें जिस काम के लिए चाहिए वह तुम्हारे रास्ते में नहीं आता।"

"इसका क्या काम है?"

"इसे बॉडीगार्ड को जरूरत है।"

"जो कि तुम हो ?"

"मैं नहीं । मेरा एक आदमी करेगा यह काम ।"

"इसके पीछे कौन से डाकू पड़ रहे हैं जो इसे बॉडीगार्ड की जरूरत है ?"

"इसे खतरा है कि कोई इसकी हत्या कर सकता है।"

"चोर को चोर से कहीं खतरा होता है ! यह तो खुद हत्यारी है। इसकी कौन..."

"आंटी ।" - जूही रुआंसे स्वर में बोली - "मैं तो...."

“खबरदार, जो मुझे आंटी कहा" - कमला कड़ककर बोली - "आई बड़ी आण्टी की बच्ची ।"

"तुम वसीयत की वजह से यहां आई मालूम होती हो ।" - मैं बोला।

,,, "हां" - कमला बोली - "पूछो तो इस कमीनी कुतिया को, कैसे फंसाया इसने मेरे पति को वह वसीयत लिखवाने के लिये ! और कैसे फंसाया होगा ? एक ही तो तरीका है इसके पास । एक ही तो हथियार है इसके पास" - वह जूही की तरफ घूमी । उसकी आंखों से भाले बर्छियां बरस रहे थे - "लेकिन बावजूद वसीयत के तेरी चलने मैं भी नहीं देंगी, छिनाल । मैं साबित करके दिखाऊंगी कि मरे पति का कत्ल तूने किया है। यह काम यह वनस्पति जासूस नहीं करेगा। तो कोई और करेगा । फिर चढ़ना फांसी पर मेरे पति की दौलत के सपने देखते हुए ।"

"आण्टी , मैंने...."

"फिर आंटी ?"

| "....कभी चावला साहब की दौलत के सपने नहीं देखे । आप कुछ भी सोचिए लेकिन मैं उनकी दौलत से नहीं सिर्फ

उनसे प्यार करती थी और..."

"प्यार करने के लिए तुझे कोई और मर्द नहीं मिला ?"

"....मैंने उनका कत्ल नहीं किया है और...."

"कोई अपना हमउम्र नहीं मिला ?"

"...उनकी वसीयत की तो मुझे आज सुबह से पहल खबर तक नहीं थी ।"

"अब तो तू यही कहेगी ।" कमला के हाथों की मुट्ठियां यूं खुल और बन्द हो रही थीं जैसे वे जूही की गर्दन दबोच लेने के लिए तड़प रही हों।

"कमला !" - एकाएक मैं कर्कश स्वर में बोला - "बैठ जाओ ।"

तुम कौन होते हो मुझ पर यूं हुक्म दनदनाने वाले ?" - वह आंखें निकालती बोली ।

“ठीक है । यूं ही फर्श को रौंदती रहो । जब थक जाओ तो बैठ जाना ।" वह बात सुनकर वह फौरन धम्म से एक सोफे पर ढेर हो गई ।
 
"सुनो" - मैं नम्रता से बोला - "यूं लड़ने और गाली-गलौच करने से कोई फायदा नहीं । तुम्हारा पति शहर का एक मुआजिज आदमी था । इस वक्त तुम्हें उसकी मौत पर शोक प्रकट करने के लिए आने वाले उसके परिचितों की अगवानी के लिए अपनी कोठी पर होना चाहिए था या झांसी की रानी बनकर यहां इस मासूम लड़की पर चढ़ दौड़ना चाहिए था ?"

“यह कितनी मासूम है, यह तुम नहीं, मैं जानती हूं। यह कमीनी..."

"पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर अपनी कहना ।"

वह खामोश हो गयी।

"विश्वास जानो, जूही को वसीयत की खबर नहीं थी। उसके बारे में इसे जो कुछ मालूम हुआ है, आज वकील बलराज सोनी के बताये ही मालूम हुआ है। मैं गवाह हूं इस बात का कि आज ही बलराज सोनी ने इसे फोन करके वसीयत के बारे में बताया था। इससे पहले यह वसीयत के बारे में कुछ नहीं जानती थी। चावला साहब ने अगर इसकी मनुहार पर वह वसीयत लिखी होती तो यह उसके बारे में पहले से जानती होती लेकिन ऐसा नहीं था। मुझे नहीं पता कि यह चावला साहब से सच्चा प्यार करती थी या उनकी दौलत की दीवानी थी लेकिन इसकी बदनीयती कम-से-कम उस वसीयत से साबित नहीं होती जिसकी वजह से तुम इतना तड़प रही हो । दूध में धुली तो अगर यह नहीं है तो तुम भी नही हो । तुम इसे अपने हमउम्र मर्द से प्यार करने की राय दे रही हो जबकि खुद तुमने इस राय पर अमल नहीं किया । तुम्हारा पति क्या तुम्हारा हमउम्र था जब तुमने उससे शादी की थी ?"

"लकिन...

,,, "सुनती रहो । और तसल्ली रखो, यह बात मैं तुम्हारे में कोई नुक्स निकालने के लिए नहीं कह रहा । इस वक्त तुम्हें सिर्फ वस्तुस्थिति समझाने की कोशिश कर रहा हूं। यह वक्त इस बात का फैसला करने का नहीं है कि मरने वाले के लिये तुम अच्छी, तसल्लीबख्श बीवी न थी या यह बहुत अच्छी अदर वूमन थी, तुम अपने पति का घर न बसा सकी

या यह उसे उजाड़ने को आमादा थी । इस वक्त अहम बात यह है कि चावला साहब का कत्ल किसने किया ! अगर तुम दोनों उनकी खैरखाह हो तो पहले तुम्हारे में उस शख्स को सजा दिलवाने की ख्वाहिश होनी चाहिए जिसने तुम दोनों का चहेता मर्द तुमसे छीना, न कि तुम्हें वसीयत को लेकर एक-दूसरे का सिर फोड़ने पर आमादा हो जाना चाहिए।"

"मैं चावला साहब की दौलत की तलबगार नहीं ।" - जूही क्षीण स्वर में बोली।

"इसलिए नहीं है" - कमला बोली - "क्योंकि वह मुझे अपनी तलब जाहिर किये बिना ही हासिल हो रही है। लेकिन वो तुझे हासिल हुई नहीं होने वाली, मेरी बन्नो ।”

जूही के चेहरे पर बड़े दयनीय भाव आये ।

"कमला !" - मैं बोला - "यह मत भूलो कि कत्ल का जितना शक जूही पर किया का सकता है, उतना तुम्हारे पर भी किया जा सकता है । कत्ल के इल्लाम से अभी न तुम बरी हो, न जूही ।"

"मैंने कत्ल नहीं किया ।" - कमला बोली।

"मैंने कत्ल नहीं किया ।" - जूही बोली।

"लेकिन मुझे लगता है कि तुम्हें कातिल की बाबत कोई जानकारी है" - मैं जूही से बोला - "जो कि पता नहीं क्यों तुम जुबान पर नहीं लाना चाहतीं।"

"क्यों जुबान पर नहीं लाना चाहती ?" - कमला ने पूछा ।।

"यह कहती है कि अगर इसने ऐसा किया तो हत्यारा इसकी भी हत्या कर देगा । चावला साहब के हत्यारे से इसे भी अपनी जान का खतरा है। इसलिए बतौर बॉडीगार्ड इसे मेरी खिदमत दरकार है।"

कमला खामोश रही ।

"इसलिए और कुछ नहीं तो उस आदमी की चिता को आग दिये जाने तक तो अमन शान्ति का माहौल रखो जो कि तुम दोनों का अजीज था।"

"मैं कुछ नहीं कह रही ।" - कमला बोली।

"अगर तुम कुछ नहीं कह रही तो यह तो कतई कुछ नहीं कह रही है। ऊपर से इस बात पर भी ध्यान दो कि हवाई घोड़े पर सवार तुम यहां आई हो ।"

कमला खामोश रही। "और तुम" - मैं जूही की तरफ घूमा - कैसी मेजबान हो जो घर आये मेहमान को डिंक तक नहीं पेश कर सकतीं ?" जूही हड़बड़ाई । उसने नौकरानी से एक गिलास और मंगाया और कमला और मेरे लिये ड्रिक्स तैयार किये।

"और तुम ?" - कमला बोली । "
 
यह विस्की नहीं पीती ।" - उत्तर मैंने दिया ।

कमला के चेहरे पर विश्वास के भाव न आये।

"ऑनेस्ट ।" - जूही अपने गले की घण्टी छूती हुई बोला।

,,, फिर भी कमला ने जब तक उसका कैम्पा कोला का गिलास सूंघकर न देख लिया उसने उसकी बात पर विश्वास न किया।

कमाल है !" - वह बोली - "बाकी तो सारे काम करती हो । यह कैसे छूट गया तुमसे ?

" जूही ने आहत भाव से कमला की तरफ देखा ।

"कमला !" - मैं बोला - "भगवान के लिए बाज आ जाओ।"

"ओके ! ओके !"

मैंने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली । सवा छ: हो चुके थे। यानी कि अगर मैंने एलैग्जैण्डर से मुलाकात के लिये वक्त पर पहुंचना था तो मुझे वहां से विदा हो जाना चाहिए था।

लेकिन कमला को पीछे जूही के पास छोड़ जाने की कोई सुखद कल्पना कर पाना कठिन काम था। "देखो" - मैं दोनों से सम्बोधित हुआ - "हत्यारे की तलाश की दिशा में अगर मैंने कोई तरक्की करनी है तो मुझे जाकर किसी काम-धाम पर लगना होगा । ठीक ?"

कोई कुछ न बोला।

"तुम मेरे साथ चलती हो ?" - मैं कमला से बोला।

"नहीं" - वह बोली - "मैं अपने आप आई हूं, अपने-आप चली जाऊंगी।"

"तो फिर यह गारंटी करो कि मेरे पीठ फेरते ही यहां तुम दोनों एक-दूसरे का मुंह नहीं नोचने लगोगी। यहां तुम दोनों में से एक की लाश नहीं बिछी होगी।"

मुझे आण्टी से कोई डर नहीं ।" - जूही बोली - "ये जब तक चाहें, यहां ठहरें ।”

मैंने कमला की तरफ देखा। . वह अपने लिए नया जाम तैयार करने लगी। उसके उस एक्शन से ही मुझे लगा कि अब वह अपना रौद्र रूप त्याग चुकी थी। "सी यू कमला !" कमला ने अनमने भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

मैं जूही की तरफ घूमा और बोला - "मेरा आदमी बॉडीगार्ड की जिम्मेदारी निभाने के लिये एक डेढ़ घण्टे में यहां पहुंच जायगा ।" जूही ने भी सहमति में सिर हिलाया ।।

एक-दूसरे की सूरत से बेजार दो स्त्रियों को अगल-बगल बैठा छोड़कर मैं वहां से विदा हो गया। जिस वक्त मैं राजेन्द्र प्लेस के आगे से गुजरा, उस वक्त पौने सात बज रहे थे लेकिन वहां एलैग्जैण्डर के पास हाजिर होने से ज्यादा जरूरी मेरा करोलबाग पहुंचना था जहां कि वह शख्स रहता था जिसे मैं जूही चावला के बॉडीगार्ड की ड्यूटी पर लगाना चाहता था। मेरी तकदीर अच्छी थी, वह मुझे घर पर मिल गया ।

उस शख्स का नाम हरीश पांडे था । वह रिटायर्ड फौजी था और आजकल एक शराब के स्मगलर के पास काम करता था। मेरे फायदे के उसमें दो गुण थे । एक तो उसके पास वक्त बहुत होता था और वक्त को पैसे में तब्दील करने का।

,,, कोई भी मौका छोड़ना वह हराम समझता था। दूसरे उसके पास लाइसेंसशुदा रिवॉल्वर थी । उम्र में वह पचास के पेटे में था और खूब हट्टा-कट्टा और तन्दुरुस्त था। जूही चावला की पत्रिका में से फाड़ी हुई तस्वीर मैंने उसे सौंपी और उसे समझाया कि उसने क्या करना था।

सौ रुपये रोज की बात सुनकर वह जितना खुश हुआ उतना ही चौबीस घण्टे की ड्यूटी की बात सुनकर वह । सकपकाया भी । बहरहाल उसने काम से इनकार न किया। मैंने उसे दो सौ रुपये एडवांस दिये और उसे जूही चावला की पता बताकर वहां से रवाना कर दिया। तब मैंने एलैग्जैण्डर के ऑफिस का रुख किया। वापिस राजेंद्रा प्लेस पहुंचने तक सात दस हो गये। लिफ्ट पर सवार होकर मैं उसके ऑफिस वाली इमारत की पांचवीं मंजिल पर पहुंचा।

वहां फ्लोर केवल एलैग्जैण्डर के ऑफिस में ही रोशनी का आभास मुझे मिला। बाकी-सब ऑफिस बन्द हो चुके थे

और अन्धकार में डूबे थे। मैंने उसे हौले से धक्का दिया तो उसे खुला पाया । बाहर खड़े-खड़े ही मैंने भीतर झांका तो पाया कि रिसैप्शन की कोई बत्ती नहीं जल रही थी। पिछले एक कमरे में रोशनी थी और वहां से वार्तालाप की आवाजें आ रही थीं। मैंने दबे पांव भीतर कदम रखा और पिछले दरवाजे के करीब पहुंचा। अब वार्तालाप मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगा। "बॉस" - कोई कह रहा था - "अब इन्तजार करना बेकार है । सवा सात तो बज गए । अब क्या आयेगा वो ! मैं तो थक गया उसका इन्तजार करता-करता। मेरे ख्याल से तो..." –

"शटअप !" - कोई गुस्से से गुर्राया - "अपुन कब बोला तेरे को अपना ख्याल जाहिर करने के वास्ते ?"

वह एलैग्जैण्डर की आवाज थी ।

"सॉरी, बॉस !"

"बाहर अपनी जगह पहुंच । बुलाये बिना तेरे यहां कदम न पड़े।"

"यस बॉस !"

दरवाजा खुला ।

एक आदमी ने बाहर कदम रखा।

दरवाजा खुलने की वजह से थोड़ी देर के लिये बाहर का कमरा प्रकाशित हुआ लेकिन दरवाजा बंद होते ही वहां

अंधेरा छा गया। उसकी परछाई से मैंने अंदाजा लगाया कि वह चौधरी हो सकता था। वह बाहरी दरवाजा भी खोलकर ऑफिस से बाहर निकल गया । मैं सोचने लगा।
 
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