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भागू (उपन्यास )
लेखक - परगट सिंह सतौज ( अनुवाद - हरकीरत हीर )
(1)
चाहे बरसात हो चुकी थी , फिर भी गर्मी से बुरा हाल था। हवा जैसे रूठ गई थी। दरख़्तों का पत्ता तक नहीं हिल रहा था। आज सारा दिन बाड़े में खड़े पशु हाथ -हाथ भर लम्बी जीभ निकाले हाँफते रहे थे। बूढ़े -ठेरे गर्मी से डरते सथ्थ (वह स्थान जहां लोग अक्सर एकजुट होकर बैठते हैं ) के बीच फैले बरगद के नीचे जा बैठे। कुछ ताश के शौकीन घेरे बना पत्ते फेंकने लग पड़े और कुछ रात भर मच्छर के सताये उनकी ओर करवट बदल कर कंधे पर रखे गमछों का तकिया बना गहरी नींद सो गए। भैसों को सन्नी (चारा) कर भगवान भी इस मण्डली के बीच जा शामिल हुआ। अब लगभग पांच बजे भैसों को चारा डालने के ख़्याल से मुड़ परत आया था। आते ही उसने मशीन के आगे से मकई का कतरा हुआ चारा टोकरी में भर लिया। दोनों बाहों से उसे उठाकर कमर पर टिका लिया और फिर भैंसों के चारागाह में जा फेंका । दोनों भैंसें एक दुसरे से बढ़कर जल्दी - जल्दी कच्ची मकई को मुंह मारने लगीं। भगवान ने '' ऐ मेरियो सालियों '' कहकर दोनों के थोबड़े पर एक -एक मुक्का जड़ दिया . भैंसों ने चारे से मुंह हटा लिया , उसने जल्दी से चारागाह के बीच की सन्नी में हाथ मार दिया। माँ से आँख बचा कर बरामदे में खड़ा अध पुराना साइकिल उठाया , हाथ से दबाकर दोनों टायरों की हवा जाँची और पैडल मार चिमियाँ की ओर जाती सड़क पकड़ ली …………………………………… . ।
गुरुद्वारा पार होते ही टोभा आ गया। टोभे के ठीक सामने श्मशान में स्थित बड़ा बुजुर्ग पीपल का पेड़ दिखाई देने लग पड़ा। पीपल से कुछ हट कर एक पुराना जंड का पेड़ भी था। यह जंड तो पता नहीं कितनी पीढ़ियों का इतिहास अपनी टहनियों में छुपाए इसी तरह खड़ा था। कोई गिनती नहीं कितने ही सूरज इसने चढ़ते- छिपते देखे। कितने ही मचते श्मशानों की लाटें आसमान में चढती देखीं और अभी पता नहीं कितनी और चिताओं की आग सेकनी बाकी थी। भगवान ने साईकिल सड़क से उतार कर नई पिंडी (छोटा गाँव ) की ओर मुड़ते कच्चे पाहे पर डाल ली। सड़क से पाहे पर उतरते ही सामने नए पिंड के घर नज़र आते हैं। इस पिंड में बसने वाले कोई अजनबी नहीं , बल्कि सांतपुर से आकर यहाँ बसे थे क्योंकि पिंड के दक्षिण में बहता नाला बरसातों के मौसम में कई बार उछल कर पिंड में आ जाता। निचले घर ज्यादा पानी की मार झेल नहीं पाते और ढह जाते। कईयों ने पानी के क्रोध से डरकर पिंड की चढती तरफ ऊंची जगह पर घर डाल लिए. यह जगह टिब्बे की जमीन होने के कारण सस्ती मिल गई थी और कुछ बेकार पड़ी सरकारी जमीन पर कब्जा कर गोबर - उपले की जगह बना ली. इस तरह पानी की मार ने एक नए गाँव का निर्माण कर दिया था।
पाहे में साइकिल रुक -रुक जा रही थी। भगवान सीट से उठकर रिक्शे की तरह झूल - झूल कर पैडल मारने लगा। उसकी चढ़ी हुई साँस धौकनी की तरह चलने लगी। जब साइकिल रेत पार कर पक्की सड़क जा चढ़ा , वह उलटी हथेली से पड़पडियों से पसीना पोंछता सीट पर जा बैठा। सामने ही करमी का घर दिखा। किसी प्यार भरे डर से उसके दिल की धडकन तेज हो गई। पगली मुझे देख कर ऐसे मुंहफुला लेगी ! बोलेगी , '' इतने दिन बाद आया ओये !'' मैं भी कई दिनों से नहीं गया था. भला मैं क्या बहाना बनाऊंगा? चलो कोई न कोई तो बहाना ढूंढना ही पड़ेगा। वह करमी के सात आसमानी पहुंचे गुस्से को ठंडा करने की मन ही मन किसी बहाने को तरतीब देता बाहर से पार हो अंदर आ गया।
सामने ओटे के पास बैठी करमी बर्तन माँज रही थी. उसके पास ही बैठी कोई और लड़की माँजे बर्तनों को बट्टठल में धो -धोकर टोकरे में रख रही थी. एक बार तो देख कर भगवान अन्दर तक हिल गया. उसने होश गुम करती खूबसूरती पहली बार देखी थी. जैसे उसकी आँखों को यकीन न आ रहा हो , '' उफ्फ ! इतनी सुंदर लड़की पहले तो कभी नहीं देखी। किसी रिश्तेदारी में से न हो …!'' वह इसी उलझन में अनुमान लगाता करमी के पास जा खड़ा हुआ .
'' करमी ! '' भगवान ने बुलाया …।
करमी ने अपने गोरे माथे पर सिलवटें डालते हुए नीचे का होंठ थोड़ा आगे निकाला और दूसरी ओर मुंह घुमा लिया पर उसका मन अन्दर से भगवान से बातें करने को पल - पल तरस रहा था .
'' करमी पहले सुन तो ले , फिर चाहे जो मर्जी कह लेना .'' कहता हुआ भगवान उसके सामने बारिश में भीगी गाय की तरह इकठ्ठा सा होकर खड़ा हो गया.
'' हाँ , बता फिर !'' करमी के माथे की सिलवटें कुछ कम हुईं।
'' मुझे मेरे घर वालों ने बुआ के पास भेज दिया था जमीन जोतने ! '' भगवान ने रस्ते में बनाया बहाना करमी के आगे परोस दिया। करमी ने इसे सच मान सुलह कर ली.
'' अच्छा फिर सुबह भी जरुर आना . '' उसने चेहरे के हाव- भाव पूरी तरह बदले नहीं थे अभी क्योंकि उसे पता था कि अगर वह इतनी जल्दी उसकी बात से सहमत हो गई , फिर उसने अगले दिन भी ऐसे ही करना है । .
'' अच्छा मेरी माँ आ जाऊंगा। '' भगवान ने दोनों हाथ करमी के आगे जोड़ दिए.
पास बैठी लड़की ने भगवान और करमी की नोक - झोंक सुन होंठों में ही धीमा - धीमा मुस्कुराते हुए नखरे के साथ भगवान की ओर देखा।
लड़की की आसमान से परिंदे उतारती नज़र ने भगवान के धड़कते दिल में प्यार की ज्वाला जला दी. उसके पैर थिरक गए.
'' अरी कोई काम- धंधा भी करोगी या यूँ ही बैठी गप्पें लड़ाती रहोगी !''
करमी की माँ के बोल सुन भगवान को होश आई। उसने मेले में रुलती गाय की तरह डोर - भोर हुए खड़े ने आस - पास नज़र मारी। करमी की माँ बट्टठल बाहर के कोल के पास रख कर , मुंह में दाने से भुनती नलके पर हाथ धोने लग पड़ी।
'' बेबे मुश्किल से तो अपना भागू आया , तूने यूँ ही आकर ' गाजरों में गधा ' ला खड़ा कर दिया '' करमी ने हाथ बट्टठल में धोकर चुन्नी के लड़ से पोंछ लिए।
करमी की माँ सुरजीत को इन बहन- भाइयों के गहरे प्यार का पता था. आज ही नहीं, जब भी भागू आता , करमी सब काम धंधा छोड़ कर उसके साथ जा बैठती । फिर पता नहीं दोनों कौन सी कथाएँ छेड़ बैठते, न वो कभी खत्म होतीं न उनका कोई अंत दिखता। बातें करते- करते कभी वे बारिश में धुले फूल से खिल जाते तो कभी संजीदा हो जाते इसलिए वे और बहस करने की बजाय नलके पर हाथ धो कमरे में जा घुसी।
'' बैठ जा भागू क्यों भागने जैसी मुद्रा में खड़े हो. '' करमी ने चारपाई की ओर इशारा किया।
'' चौड़ी होकर हमें तो रोज़ बुला लेती हो , जिस दिन व्याही गई , हमारे घर एक दिन भी नहीं घुसना तूने '' भगवान चारपाई पर बैठी लड़की की बगल में बैठ गया.
'' तुझे भी देख लूँगी बड़े नाडू खाँ को , जब आ गई न कोई झबरिटी सी फिर पूछूंगी , उसके बिना तो खांसेगा भी नहीं। पीछे - पीछे दुम हिलाता घूमता फिरेगा सारा दिन । '' करमी ने भगवान की बात का वकीलों की तरह तुरंत जवाब दिया।
'' मैं तो आगे लगा कर रखूंगा आगे …. तीर की तरह सीधी करकर रखूंगा '' भगवान ने चारपाई पर बैठे ही सीना उभार कर ऊँगली हवा में तीर की तरह लहराई। साथ बैठी लड़की मुंह पर हाथ रख हँस पड़ी.
'' चल आने दे वक़्त , देख लूँगी तुझे भी. '' करमी भगवान के कंधे पर हाथ मारती उसके बराबर बैठ गई. तीनों के भार से चारपाई की घुन खाई बाही चर … र …. र ' करती टूट गई. करमी और उसकी सहेली बीच में बैठे भगवान के ऊपर जा गिरीं। लड़की का ऊपरी हिस्सा भगवान की चौड़ी छाती को छू गया. यह छुअन दोनों जवान शरीरों में इक कंपकपी सी फैला गई. लड़की बिजली के झटके सी खड़ी हो गई. अनजानी शर्म से उसका चेहरा सुर्ख फूल सा लाल हो गया.
'' अरी चढा दिया चाँद … ? '' बाही टूटने की आवाज़ सुनकर सुरजीत गोली की गति से बाहर आई. भगवान और लड़की ' चाँद चढा देने ' की बात पर एक - दुसरे की ओर देख मुस्कुरा पड़े.
'' इसने तोड़ी बाजे ने '' करमी ने शरारत से भगवान की ओर इशारा किया।
''लो देख लो लोगो , वैसे ही भले आदमियों पर इतने बड़े -बड़े कलंक ! हम तो आराम से बैठे थे ताई , यही बाद में आकर बैठी थी '' फिर भगवान ने धीमे सुर में बोलते हुए करमी की ओर मुक्का ताना , '' खीर में कोकडू।''
किरना आ चलें। '' बाहर साइकिल पर खड़े लगभग चालीस साल के आदमी ने लड़की को आवाज़ मारी।
'' अच्छा करमी। '' किरना लिफाफा लेकर चल पड़ी.
'' अरी बैठ जाती और थोड़ा घर में क्या सूत कातना है. '' करमी अभी उसे जाने नहीं देना चाहती थी पर कुछ बोले बिना ही किरना उस आदमी के साथ बैठकर चली गई.
'' भागू आ जा चूल्हे के पास ही बैठ जा , मैं रोटी उतारती हूँ , तुम रोटी खा लेना और कुछ सुनाना भी नई ताज़ी। '' करमी भगवान की बाँह पकड़ के जोर जबरदस्ती चौके के पास ले गई और पास पडा पीढ़ा अपने गोर पाँव से सरका कर उसके आगे कर दिया। भगवान पीढ़े पर बैठ गया। करमी ओटे पर पड़ी परात उठाकर अन्दर आटा लेने चली गई. ।
किरना चली गई थी पर भगवान की आँखों के सामने वह खूबसूरत चेहरा अभी तक घूम रहा था. .' किरना !' यह शब्द उसके होंठों से अपने आप निकल गया और उसने किसी शर्मीली लड़की की तरह मुस्कुरा कर निगाह नीची कर ली. वह इस सुंदर सूरत के बारे जानने के लिए अपने अन्दर ही अन्दर धागे की तरह उलझा पड़ा था जिसका उसे अभी तक कोई सिरा नहीं मिला था।
'' यह लड़की कौन थी ?'' उसने करमी को आटा लेकर आते देख पूछा।
''कौन ? यह किरना …. ?''
'' हाँ ''
'' यह तो भंगुओं की लड़की है , जो तल्लोवाल गाँव जाते वक़्त रस्ते में घर आता है.'' कहते हुए वह आटा गूंधने लगी।
'' अच्छा ! अच्छा ! भगवान ने पूरी समझ से सर हिलाया। उसने इस लड़की के हुस्न के चर्चे पिंड के हर गली मोड़ पर सुने थे पर उसने उसे देखा आज था पहली बार . पिंड का हर लड़का इस ताजी महक को अपना बनाने के लिए ललायित था। उसका ताजे खिले गुलाब सा गुलाबी चेहरा , हिरनी सीचमकती आँखें , पीठ पर काले नाग सी लहराती लम्बी चोटी हर एक देखने वाले को डस लेती। उसके सुर्ख होंठों से हर जवान दिल प्यार के बोल सुनने को बेताब रहता . जब वह मुर्गाबी की तरह चलती हुई लड़कों की मंडली के पास गुजरती तो लड़के दिल पर हाथ रखकर ठंडी आहें भरते।
''भागू ! ओये भागू !! '' करमी ने पहले धीमे से फिर जोर से आवाज़ मारकर कहा , कौन सी परियों से देश में गुम गए … ?''
'' हूँ … ! नहीं … ! '' भगवान इस तरह तबका , जैसे किसी ने झकझोर कर उठा दिया हो, '' यह पहले तो कभी नहीं देखी , कहाँ रहती थी … ?''
'' हाँ , अपनी बुआ के पास रहती थी , बीस - पच्चीस दिन हुए आई को । '' करमी ने रोटी बेल कर तवे पर डाल दी ।
'' यह इसका क्या लगता है जो इसे लेकर गया … ? ''
'' तुम नहीं जानते इसको ? '' करमी ने हैरानी भरी सवाली नज़रें उसके चेहरे पर गड़ा दीं ।
'' जानता तो हूँ पर यह नहीं जानता कि यह इसका लगता क्या है । '' भगवान ऊँगली से धरती पर लकीरें खींचने लगा ।
'' यह इसका बाप है बाजे । ख़ास बन्दों का तो पता रखा कर …. । '' करमी की खोजी आँखें भगवान के दिल में किरना प्रति पल रहे प्यार को खुरच - खुरच कर देख रहीं थीं ।
'' करमी बहन एक बात बोलूं , मानेगी ? '' कहते हुए भगवान ने नज़र नीची कर ली । उसका दिल जोर -जोर से धडका ।
'' करमी बहन ! '' करमी ने भगवान का मुंह चिढ़ा दिया , '' जरुर कोई मतलब होगा जो करमी बहन, करमी बहन कर रहे हो … ? '' चाहे करमी को पता था कि वह क्या कहना चाहता है पर वह उसके मुंह से सुन स्वाद लेना चाहती थी ।
' हाँ बता मानूँगी । '' करमी रोटी उतार बैठी थी ।
' करमी!'' उसने खंगुरा मारकर गला तर किया और फिर धड़कते दिल को सँभालते हुए हिम्मत कर बोला , '' यह …क…किरना …. !'' भगवान के आधे शब्द मुंह में ही दब कर रह गए। उसका दिल फिर फड़क -फड़क बजने लगा ।
'' हाँ …. हाँ… मुझे पता है, मैं भी कहूँ आज मुझ से इतने मीठे -प्यारे क्यों हुए जाते हो। मुझे सब पता चल गया तुम दोनों की चोरी का । वह भी कैसे तुम्हारी ओर आँखें फाड़ - फाड़ कर देख रही थी । ''
'' ही … ही …. !'' भगवान ने हँसते हुए निगाह नीची कर ली।
'' अच्छा यूँ करना बाजे , अपना थोबड़ा अच्छी तरह धोकर आ जाना मैं उसे बुला लाऊँगी। '' करमी उसे छेड़कर भागने को तैयार हो गई ।
भगवान ने झपट्टा मार कर करमी की चोटी जा पकड़ी , '' अब बोल क्या बोल रही थी । ''
आ … ई … ई बेबे … ए … . '' करमी ने लम्बी चीख के साथ बेबे को पुकारा ।
'' अरी क्या हो गया तुम लोगों को , क्या झाटम-झट्टे हुए पड़े हो। '' सुरजीत बोलती हुई अन्दर से बाहर आई ।
'' बेबे ये भागू सा नहीं हटता । '' करमी ने नकली गुस्सा दिखलाया ।
'' मुझ से नहीं तुम लोगों से निपटा जाता । तुम लोगों का तो रोज का यही काम है ।'' कहती हुई वह फिर अन्दर चली गई ।
'' छोड़ मेरी चोटी।'' करमी ने भगवान के डौले पे धीमे से मुक्की जमाई।
'' पहले मेरा काम । ''
'' जा बाजे कर दूंगी वह भी । ''
'' अच्छा चल ले , तू भी क्या याद रखेगी । '' भगवान ने करमी की चोटी छोड़ दी , अच्छा करमी मैं जाता हूँ । '' भगवान ने समय का ख्याल करते हुए करमी से इजाज़त मांगी ।
'' भागू बस आधा घंटा और बैठ जा । ''
ना भाई जाकर पशुओं की भी देख -भाल करनी है । अभी दूध भी दोहना है । '' भगवान ने अपना काले रंग का अध पुराना साइकिल उठा लिया ।
'' अच्छा फिर कल जरुर आना । '' करमी ने ' जाते चोर की पगड़ी ही सही ' का दाव खेला ।
'' अच्छा मेरी माँ ।'' भगवान मुस्कुराते हुए साइकिल की काठी पर बैठ गया ।
' ओ भागू और वोटें … !'' करमी ने इशारे के साथ ऊँगली हवा में हिला दी और अगली बात वह समझ गया जानकर बीच में ही छोड़ दी ।
भगवान ने भी आगे से सहमती में हाथ खड़ा कर दिया । वह किसी नई ख़ुशी में आसमां में उड़ान लगा रहा था । उसके होंठों पर थिरकती मुस्कान किसी बेअंत ख़ुशी का इज़हार कर रही थी । गर्मियों का खुश्क वातावरण ख़ुशी में हँसता दिख रहा था। पाहे में बिछी रेत ने उसे पसीना -पसीना कर दिया था पर उसका ख़ुशी भरा मन अब इसकी परवाह कब करता , वह तो किसी अद्भुत शक्ति के बस में कैद साइकिल को सरपट दौडाई जा रहा था। शाम के झुरमुटे में भगवान के पैर पैडल पर मशीन की तरह चल रहे थे।
लेखक - परगट सिंह सतौज ( अनुवाद - हरकीरत हीर )
(1)
चाहे बरसात हो चुकी थी , फिर भी गर्मी से बुरा हाल था। हवा जैसे रूठ गई थी। दरख़्तों का पत्ता तक नहीं हिल रहा था। आज सारा दिन बाड़े में खड़े पशु हाथ -हाथ भर लम्बी जीभ निकाले हाँफते रहे थे। बूढ़े -ठेरे गर्मी से डरते सथ्थ (वह स्थान जहां लोग अक्सर एकजुट होकर बैठते हैं ) के बीच फैले बरगद के नीचे जा बैठे। कुछ ताश के शौकीन घेरे बना पत्ते फेंकने लग पड़े और कुछ रात भर मच्छर के सताये उनकी ओर करवट बदल कर कंधे पर रखे गमछों का तकिया बना गहरी नींद सो गए। भैसों को सन्नी (चारा) कर भगवान भी इस मण्डली के बीच जा शामिल हुआ। अब लगभग पांच बजे भैसों को चारा डालने के ख़्याल से मुड़ परत आया था। आते ही उसने मशीन के आगे से मकई का कतरा हुआ चारा टोकरी में भर लिया। दोनों बाहों से उसे उठाकर कमर पर टिका लिया और फिर भैंसों के चारागाह में जा फेंका । दोनों भैंसें एक दुसरे से बढ़कर जल्दी - जल्दी कच्ची मकई को मुंह मारने लगीं। भगवान ने '' ऐ मेरियो सालियों '' कहकर दोनों के थोबड़े पर एक -एक मुक्का जड़ दिया . भैंसों ने चारे से मुंह हटा लिया , उसने जल्दी से चारागाह के बीच की सन्नी में हाथ मार दिया। माँ से आँख बचा कर बरामदे में खड़ा अध पुराना साइकिल उठाया , हाथ से दबाकर दोनों टायरों की हवा जाँची और पैडल मार चिमियाँ की ओर जाती सड़क पकड़ ली …………………………………… . ।
गुरुद्वारा पार होते ही टोभा आ गया। टोभे के ठीक सामने श्मशान में स्थित बड़ा बुजुर्ग पीपल का पेड़ दिखाई देने लग पड़ा। पीपल से कुछ हट कर एक पुराना जंड का पेड़ भी था। यह जंड तो पता नहीं कितनी पीढ़ियों का इतिहास अपनी टहनियों में छुपाए इसी तरह खड़ा था। कोई गिनती नहीं कितने ही सूरज इसने चढ़ते- छिपते देखे। कितने ही मचते श्मशानों की लाटें आसमान में चढती देखीं और अभी पता नहीं कितनी और चिताओं की आग सेकनी बाकी थी। भगवान ने साईकिल सड़क से उतार कर नई पिंडी (छोटा गाँव ) की ओर मुड़ते कच्चे पाहे पर डाल ली। सड़क से पाहे पर उतरते ही सामने नए पिंड के घर नज़र आते हैं। इस पिंड में बसने वाले कोई अजनबी नहीं , बल्कि सांतपुर से आकर यहाँ बसे थे क्योंकि पिंड के दक्षिण में बहता नाला बरसातों के मौसम में कई बार उछल कर पिंड में आ जाता। निचले घर ज्यादा पानी की मार झेल नहीं पाते और ढह जाते। कईयों ने पानी के क्रोध से डरकर पिंड की चढती तरफ ऊंची जगह पर घर डाल लिए. यह जगह टिब्बे की जमीन होने के कारण सस्ती मिल गई थी और कुछ बेकार पड़ी सरकारी जमीन पर कब्जा कर गोबर - उपले की जगह बना ली. इस तरह पानी की मार ने एक नए गाँव का निर्माण कर दिया था।
पाहे में साइकिल रुक -रुक जा रही थी। भगवान सीट से उठकर रिक्शे की तरह झूल - झूल कर पैडल मारने लगा। उसकी चढ़ी हुई साँस धौकनी की तरह चलने लगी। जब साइकिल रेत पार कर पक्की सड़क जा चढ़ा , वह उलटी हथेली से पड़पडियों से पसीना पोंछता सीट पर जा बैठा। सामने ही करमी का घर दिखा। किसी प्यार भरे डर से उसके दिल की धडकन तेज हो गई। पगली मुझे देख कर ऐसे मुंहफुला लेगी ! बोलेगी , '' इतने दिन बाद आया ओये !'' मैं भी कई दिनों से नहीं गया था. भला मैं क्या बहाना बनाऊंगा? चलो कोई न कोई तो बहाना ढूंढना ही पड़ेगा। वह करमी के सात आसमानी पहुंचे गुस्से को ठंडा करने की मन ही मन किसी बहाने को तरतीब देता बाहर से पार हो अंदर आ गया।
सामने ओटे के पास बैठी करमी बर्तन माँज रही थी. उसके पास ही बैठी कोई और लड़की माँजे बर्तनों को बट्टठल में धो -धोकर टोकरे में रख रही थी. एक बार तो देख कर भगवान अन्दर तक हिल गया. उसने होश गुम करती खूबसूरती पहली बार देखी थी. जैसे उसकी आँखों को यकीन न आ रहा हो , '' उफ्फ ! इतनी सुंदर लड़की पहले तो कभी नहीं देखी। किसी रिश्तेदारी में से न हो …!'' वह इसी उलझन में अनुमान लगाता करमी के पास जा खड़ा हुआ .
'' करमी ! '' भगवान ने बुलाया …।
करमी ने अपने गोरे माथे पर सिलवटें डालते हुए नीचे का होंठ थोड़ा आगे निकाला और दूसरी ओर मुंह घुमा लिया पर उसका मन अन्दर से भगवान से बातें करने को पल - पल तरस रहा था .
'' करमी पहले सुन तो ले , फिर चाहे जो मर्जी कह लेना .'' कहता हुआ भगवान उसके सामने बारिश में भीगी गाय की तरह इकठ्ठा सा होकर खड़ा हो गया.
'' हाँ , बता फिर !'' करमी के माथे की सिलवटें कुछ कम हुईं।
'' मुझे मेरे घर वालों ने बुआ के पास भेज दिया था जमीन जोतने ! '' भगवान ने रस्ते में बनाया बहाना करमी के आगे परोस दिया। करमी ने इसे सच मान सुलह कर ली.
'' अच्छा फिर सुबह भी जरुर आना . '' उसने चेहरे के हाव- भाव पूरी तरह बदले नहीं थे अभी क्योंकि उसे पता था कि अगर वह इतनी जल्दी उसकी बात से सहमत हो गई , फिर उसने अगले दिन भी ऐसे ही करना है । .
'' अच्छा मेरी माँ आ जाऊंगा। '' भगवान ने दोनों हाथ करमी के आगे जोड़ दिए.
पास बैठी लड़की ने भगवान और करमी की नोक - झोंक सुन होंठों में ही धीमा - धीमा मुस्कुराते हुए नखरे के साथ भगवान की ओर देखा।
लड़की की आसमान से परिंदे उतारती नज़र ने भगवान के धड़कते दिल में प्यार की ज्वाला जला दी. उसके पैर थिरक गए.
'' अरी कोई काम- धंधा भी करोगी या यूँ ही बैठी गप्पें लड़ाती रहोगी !''
करमी की माँ के बोल सुन भगवान को होश आई। उसने मेले में रुलती गाय की तरह डोर - भोर हुए खड़े ने आस - पास नज़र मारी। करमी की माँ बट्टठल बाहर के कोल के पास रख कर , मुंह में दाने से भुनती नलके पर हाथ धोने लग पड़ी।
'' बेबे मुश्किल से तो अपना भागू आया , तूने यूँ ही आकर ' गाजरों में गधा ' ला खड़ा कर दिया '' करमी ने हाथ बट्टठल में धोकर चुन्नी के लड़ से पोंछ लिए।
करमी की माँ सुरजीत को इन बहन- भाइयों के गहरे प्यार का पता था. आज ही नहीं, जब भी भागू आता , करमी सब काम धंधा छोड़ कर उसके साथ जा बैठती । फिर पता नहीं दोनों कौन सी कथाएँ छेड़ बैठते, न वो कभी खत्म होतीं न उनका कोई अंत दिखता। बातें करते- करते कभी वे बारिश में धुले फूल से खिल जाते तो कभी संजीदा हो जाते इसलिए वे और बहस करने की बजाय नलके पर हाथ धो कमरे में जा घुसी।
'' बैठ जा भागू क्यों भागने जैसी मुद्रा में खड़े हो. '' करमी ने चारपाई की ओर इशारा किया।
'' चौड़ी होकर हमें तो रोज़ बुला लेती हो , जिस दिन व्याही गई , हमारे घर एक दिन भी नहीं घुसना तूने '' भगवान चारपाई पर बैठी लड़की की बगल में बैठ गया.
'' तुझे भी देख लूँगी बड़े नाडू खाँ को , जब आ गई न कोई झबरिटी सी फिर पूछूंगी , उसके बिना तो खांसेगा भी नहीं। पीछे - पीछे दुम हिलाता घूमता फिरेगा सारा दिन । '' करमी ने भगवान की बात का वकीलों की तरह तुरंत जवाब दिया।
'' मैं तो आगे लगा कर रखूंगा आगे …. तीर की तरह सीधी करकर रखूंगा '' भगवान ने चारपाई पर बैठे ही सीना उभार कर ऊँगली हवा में तीर की तरह लहराई। साथ बैठी लड़की मुंह पर हाथ रख हँस पड़ी.
'' चल आने दे वक़्त , देख लूँगी तुझे भी. '' करमी भगवान के कंधे पर हाथ मारती उसके बराबर बैठ गई. तीनों के भार से चारपाई की घुन खाई बाही चर … र …. र ' करती टूट गई. करमी और उसकी सहेली बीच में बैठे भगवान के ऊपर जा गिरीं। लड़की का ऊपरी हिस्सा भगवान की चौड़ी छाती को छू गया. यह छुअन दोनों जवान शरीरों में इक कंपकपी सी फैला गई. लड़की बिजली के झटके सी खड़ी हो गई. अनजानी शर्म से उसका चेहरा सुर्ख फूल सा लाल हो गया.
'' अरी चढा दिया चाँद … ? '' बाही टूटने की आवाज़ सुनकर सुरजीत गोली की गति से बाहर आई. भगवान और लड़की ' चाँद चढा देने ' की बात पर एक - दुसरे की ओर देख मुस्कुरा पड़े.
'' इसने तोड़ी बाजे ने '' करमी ने शरारत से भगवान की ओर इशारा किया।
''लो देख लो लोगो , वैसे ही भले आदमियों पर इतने बड़े -बड़े कलंक ! हम तो आराम से बैठे थे ताई , यही बाद में आकर बैठी थी '' फिर भगवान ने धीमे सुर में बोलते हुए करमी की ओर मुक्का ताना , '' खीर में कोकडू।''
किरना आ चलें। '' बाहर साइकिल पर खड़े लगभग चालीस साल के आदमी ने लड़की को आवाज़ मारी।
'' अच्छा करमी। '' किरना लिफाफा लेकर चल पड़ी.
'' अरी बैठ जाती और थोड़ा घर में क्या सूत कातना है. '' करमी अभी उसे जाने नहीं देना चाहती थी पर कुछ बोले बिना ही किरना उस आदमी के साथ बैठकर चली गई.
'' भागू आ जा चूल्हे के पास ही बैठ जा , मैं रोटी उतारती हूँ , तुम रोटी खा लेना और कुछ सुनाना भी नई ताज़ी। '' करमी भगवान की बाँह पकड़ के जोर जबरदस्ती चौके के पास ले गई और पास पडा पीढ़ा अपने गोर पाँव से सरका कर उसके आगे कर दिया। भगवान पीढ़े पर बैठ गया। करमी ओटे पर पड़ी परात उठाकर अन्दर आटा लेने चली गई. ।
किरना चली गई थी पर भगवान की आँखों के सामने वह खूबसूरत चेहरा अभी तक घूम रहा था. .' किरना !' यह शब्द उसके होंठों से अपने आप निकल गया और उसने किसी शर्मीली लड़की की तरह मुस्कुरा कर निगाह नीची कर ली. वह इस सुंदर सूरत के बारे जानने के लिए अपने अन्दर ही अन्दर धागे की तरह उलझा पड़ा था जिसका उसे अभी तक कोई सिरा नहीं मिला था।
'' यह लड़की कौन थी ?'' उसने करमी को आटा लेकर आते देख पूछा।
''कौन ? यह किरना …. ?''
'' हाँ ''
'' यह तो भंगुओं की लड़की है , जो तल्लोवाल गाँव जाते वक़्त रस्ते में घर आता है.'' कहते हुए वह आटा गूंधने लगी।
'' अच्छा ! अच्छा ! भगवान ने पूरी समझ से सर हिलाया। उसने इस लड़की के हुस्न के चर्चे पिंड के हर गली मोड़ पर सुने थे पर उसने उसे देखा आज था पहली बार . पिंड का हर लड़का इस ताजी महक को अपना बनाने के लिए ललायित था। उसका ताजे खिले गुलाब सा गुलाबी चेहरा , हिरनी सीचमकती आँखें , पीठ पर काले नाग सी लहराती लम्बी चोटी हर एक देखने वाले को डस लेती। उसके सुर्ख होंठों से हर जवान दिल प्यार के बोल सुनने को बेताब रहता . जब वह मुर्गाबी की तरह चलती हुई लड़कों की मंडली के पास गुजरती तो लड़के दिल पर हाथ रखकर ठंडी आहें भरते।
''भागू ! ओये भागू !! '' करमी ने पहले धीमे से फिर जोर से आवाज़ मारकर कहा , कौन सी परियों से देश में गुम गए … ?''
'' हूँ … ! नहीं … ! '' भगवान इस तरह तबका , जैसे किसी ने झकझोर कर उठा दिया हो, '' यह पहले तो कभी नहीं देखी , कहाँ रहती थी … ?''
'' हाँ , अपनी बुआ के पास रहती थी , बीस - पच्चीस दिन हुए आई को । '' करमी ने रोटी बेल कर तवे पर डाल दी ।
'' यह इसका क्या लगता है जो इसे लेकर गया … ? ''
'' तुम नहीं जानते इसको ? '' करमी ने हैरानी भरी सवाली नज़रें उसके चेहरे पर गड़ा दीं ।
'' जानता तो हूँ पर यह नहीं जानता कि यह इसका लगता क्या है । '' भगवान ऊँगली से धरती पर लकीरें खींचने लगा ।
'' यह इसका बाप है बाजे । ख़ास बन्दों का तो पता रखा कर …. । '' करमी की खोजी आँखें भगवान के दिल में किरना प्रति पल रहे प्यार को खुरच - खुरच कर देख रहीं थीं ।
'' करमी बहन एक बात बोलूं , मानेगी ? '' कहते हुए भगवान ने नज़र नीची कर ली । उसका दिल जोर -जोर से धडका ।
'' करमी बहन ! '' करमी ने भगवान का मुंह चिढ़ा दिया , '' जरुर कोई मतलब होगा जो करमी बहन, करमी बहन कर रहे हो … ? '' चाहे करमी को पता था कि वह क्या कहना चाहता है पर वह उसके मुंह से सुन स्वाद लेना चाहती थी ।
' हाँ बता मानूँगी । '' करमी रोटी उतार बैठी थी ।
' करमी!'' उसने खंगुरा मारकर गला तर किया और फिर धड़कते दिल को सँभालते हुए हिम्मत कर बोला , '' यह …क…किरना …. !'' भगवान के आधे शब्द मुंह में ही दब कर रह गए। उसका दिल फिर फड़क -फड़क बजने लगा ।
'' हाँ …. हाँ… मुझे पता है, मैं भी कहूँ आज मुझ से इतने मीठे -प्यारे क्यों हुए जाते हो। मुझे सब पता चल गया तुम दोनों की चोरी का । वह भी कैसे तुम्हारी ओर आँखें फाड़ - फाड़ कर देख रही थी । ''
'' ही … ही …. !'' भगवान ने हँसते हुए निगाह नीची कर ली।
'' अच्छा यूँ करना बाजे , अपना थोबड़ा अच्छी तरह धोकर आ जाना मैं उसे बुला लाऊँगी। '' करमी उसे छेड़कर भागने को तैयार हो गई ।
भगवान ने झपट्टा मार कर करमी की चोटी जा पकड़ी , '' अब बोल क्या बोल रही थी । ''
आ … ई … ई बेबे … ए … . '' करमी ने लम्बी चीख के साथ बेबे को पुकारा ।
'' अरी क्या हो गया तुम लोगों को , क्या झाटम-झट्टे हुए पड़े हो। '' सुरजीत बोलती हुई अन्दर से बाहर आई ।
'' बेबे ये भागू सा नहीं हटता । '' करमी ने नकली गुस्सा दिखलाया ।
'' मुझ से नहीं तुम लोगों से निपटा जाता । तुम लोगों का तो रोज का यही काम है ।'' कहती हुई वह फिर अन्दर चली गई ।
'' छोड़ मेरी चोटी।'' करमी ने भगवान के डौले पे धीमे से मुक्की जमाई।
'' पहले मेरा काम । ''
'' जा बाजे कर दूंगी वह भी । ''
'' अच्छा चल ले , तू भी क्या याद रखेगी । '' भगवान ने करमी की चोटी छोड़ दी , अच्छा करमी मैं जाता हूँ । '' भगवान ने समय का ख्याल करते हुए करमी से इजाज़त मांगी ।
'' भागू बस आधा घंटा और बैठ जा । ''
ना भाई जाकर पशुओं की भी देख -भाल करनी है । अभी दूध भी दोहना है । '' भगवान ने अपना काले रंग का अध पुराना साइकिल उठा लिया ।
'' अच्छा फिर कल जरुर आना । '' करमी ने ' जाते चोर की पगड़ी ही सही ' का दाव खेला ।
'' अच्छा मेरी माँ ।'' भगवान मुस्कुराते हुए साइकिल की काठी पर बैठ गया ।
' ओ भागू और वोटें … !'' करमी ने इशारे के साथ ऊँगली हवा में हिला दी और अगली बात वह समझ गया जानकर बीच में ही छोड़ दी ।
भगवान ने भी आगे से सहमती में हाथ खड़ा कर दिया । वह किसी नई ख़ुशी में आसमां में उड़ान लगा रहा था । उसके होंठों पर थिरकती मुस्कान किसी बेअंत ख़ुशी का इज़हार कर रही थी । गर्मियों का खुश्क वातावरण ख़ुशी में हँसता दिख रहा था। पाहे में बिछी रेत ने उसे पसीना -पसीना कर दिया था पर उसका ख़ुशी भरा मन अब इसकी परवाह कब करता , वह तो किसी अद्भुत शक्ति के बस में कैद साइकिल को सरपट दौडाई जा रहा था। शाम के झुरमुटे में भगवान के पैर पैडल पर मशीन की तरह चल रहे थे।