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ऋचा (उपन्यास)
lekhika-पुष्पा सक्सेना
मेरी बात
संविधान में नारी को पुरूषों के समकक्ष अधिकार दिए गए हैं। समाज द्वारा उसे ‘श्रद्धा की पात्री’ या ‘लक्ष्मी देवी’ की संज्ञा दी गई है। दुःख का विषय है, यही देवी कभी दहेज के नाम पर जलाई जाती है, कभी घरेलू हिंसा और बलात्कार की पीड़ा झेलती है। निर्दोष होने के बावजूद उसे अपराधिनी बनाकर, प्रश्नों और लांछनों के कठघरे में कैद कर दिया जाता है। समाज के हर वर्ग में स्त्री को स़्त्री होने की सज़ा दी जाती है। मारिया, सुनीता, सुधा, ऋचा सबकी एक-सी कहानी है।
अपने अधिकार और अपना सम्मानपूर्ण स्थान पाने के लिए औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी, संघर्ष करना होगा। उसे दूर्वा की तरह जीना है। बार-बार रौंदे जाने के बावजूद जिस तरह दूर्वा फिर सिर उठाकर खड़ी हो जाती है, औरत को भी उसी तरह चुनौतियों पर विजय पानी है, सिर उठाकर खड़ा होना है। माधवी की तरह एयरफ़ोर्स ज्वाइन करके आकाशीय ऊंचाइयां छूनी हैं ।
घरेलू हिंसा के प्रभाव से कामकाजी स्त्रियाँ भी अछूती नहीं हैं। पति द्वारा जलाकर खत्म करने के प्रयास के बावजूद नर्स सुनीता, भयवश सही बयान देने से डरती है। इंसपेक्टर अतुल का कहना है, अक्सर महिलाएँ ऐसे ससुरालवालों के सम्मान की रक्षा में झूठा बयान देती हैं, जिन्होंने उन्हें जलाकर खत्म करने की कोशिश की हो, बदनाम हम पुलिसवाले होते हैं। स्त्री का यही भय, उसका शत्रु है। आज तो सुनीता बच गई, पर कल किसी और तरीके से उसे ख़त्म किया जा सकता है। आँसू बहाकर जीते रहने की जगह साहस के साथ, उस नरक से बाहर आ जाने में ही उसकी समझदारी है।
सुधा ने अपने साथ अश्लील व्यवहार करने वाले युवकों को थप्पड़ मार, अपने साहस का परिचय दिया। प्रभावशाली पिता के बल पर युवकों का छूटना और सुधा को नौकरी से निकाल दिया जाना, अन्याय होते हुुए भी कटु सत्य है। सुखद पक्ष यह है कि समाज में आज भी परेश और विशाल जैसे साहसी युवक हैं, जो स्वर्णिम भविष्य की आस जगाते हैं। पुरूषों की मानसिकता में बदलाव आने से निश्चय ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव है। ऋचा की तेजस्विता स्मिता, सुनीता, सुधा जैसी भीरू लड़कियों को साहस प्रदान कर, सही राह पर चलने को प्रेरित करती है। वे चुनौतियों से पराजित नहीं होती, हिम्मत के साथ उनका सामना करती हैं और गर्वित, विजयश्री पाती हैं।
उपन्यास की नायिका ऋचा, एक जुझारू पत्रकार है। अपने बलात्कार की रिपार्ट वह स्वंय थाने में जाकर दर्ज कराती है। कहीं कोई साक्ष्य छूटने न पाए, इस बात का पूरा ध्यान रखती है, निर्भीक घोषणा करती है- ‘वह पत्रकार है, कई पुुरूषांे के साथ उसकी मित्रता है, पर भेड़ियों से पाला पड़ने का यह उसका पहला मौका है। अगर भेड़ियों को खुला छोड़ दिया जाए तो वे फिर शिकार करेंगे, इसीलिए उन्हें खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।
ऋचा ने दिखा दिया, बलात्कार की शिकार लड़की सम्मान की पात्री हो सकती है, बशर्ते वह स्वंय को अपराधिनी मानकर हिम्मत न हार जाए। वस्तुतः उसे तो सिर उठाकर चलना है, क्योंकि अपराधिनी वह नहीं, वरन् वे बलात्कारी हैं, जो एक कोमल लड़की पर अपनी ताकत आज़मा, अपने को विजयी समझते हैं। ऐसे कायरों को तो समाज की ऐसी अवमानना मिलनी चाहिए कि वे कभी सिर उठाकर न चल सकें।
उपन्यास की नायिका ने यह सिद्ध कर दिया, नारी स्वंयमेव शक्तिपुंज है। वह ऐसी दीपशिखा है, जो स्वंय जलकर, दूसरों का पथ आलोकित करती है। यह उपन्यास यदि किसी को प्रेरणा दे सके, तो मेरा लेखन सार्थक है।
पुष्पा सक्सेना
lekhika-पुष्पा सक्सेना
मेरी बात
संविधान में नारी को पुरूषों के समकक्ष अधिकार दिए गए हैं। समाज द्वारा उसे ‘श्रद्धा की पात्री’ या ‘लक्ष्मी देवी’ की संज्ञा दी गई है। दुःख का विषय है, यही देवी कभी दहेज के नाम पर जलाई जाती है, कभी घरेलू हिंसा और बलात्कार की पीड़ा झेलती है। निर्दोष होने के बावजूद उसे अपराधिनी बनाकर, प्रश्नों और लांछनों के कठघरे में कैद कर दिया जाता है। समाज के हर वर्ग में स्त्री को स़्त्री होने की सज़ा दी जाती है। मारिया, सुनीता, सुधा, ऋचा सबकी एक-सी कहानी है।
अपने अधिकार और अपना सम्मानपूर्ण स्थान पाने के लिए औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी, संघर्ष करना होगा। उसे दूर्वा की तरह जीना है। बार-बार रौंदे जाने के बावजूद जिस तरह दूर्वा फिर सिर उठाकर खड़ी हो जाती है, औरत को भी उसी तरह चुनौतियों पर विजय पानी है, सिर उठाकर खड़ा होना है। माधवी की तरह एयरफ़ोर्स ज्वाइन करके आकाशीय ऊंचाइयां छूनी हैं ।
घरेलू हिंसा के प्रभाव से कामकाजी स्त्रियाँ भी अछूती नहीं हैं। पति द्वारा जलाकर खत्म करने के प्रयास के बावजूद नर्स सुनीता, भयवश सही बयान देने से डरती है। इंसपेक्टर अतुल का कहना है, अक्सर महिलाएँ ऐसे ससुरालवालों के सम्मान की रक्षा में झूठा बयान देती हैं, जिन्होंने उन्हें जलाकर खत्म करने की कोशिश की हो, बदनाम हम पुलिसवाले होते हैं। स्त्री का यही भय, उसका शत्रु है। आज तो सुनीता बच गई, पर कल किसी और तरीके से उसे ख़त्म किया जा सकता है। आँसू बहाकर जीते रहने की जगह साहस के साथ, उस नरक से बाहर आ जाने में ही उसकी समझदारी है।
सुधा ने अपने साथ अश्लील व्यवहार करने वाले युवकों को थप्पड़ मार, अपने साहस का परिचय दिया। प्रभावशाली पिता के बल पर युवकों का छूटना और सुधा को नौकरी से निकाल दिया जाना, अन्याय होते हुुए भी कटु सत्य है। सुखद पक्ष यह है कि समाज में आज भी परेश और विशाल जैसे साहसी युवक हैं, जो स्वर्णिम भविष्य की आस जगाते हैं। पुरूषों की मानसिकता में बदलाव आने से निश्चय ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव है। ऋचा की तेजस्विता स्मिता, सुनीता, सुधा जैसी भीरू लड़कियों को साहस प्रदान कर, सही राह पर चलने को प्रेरित करती है। वे चुनौतियों से पराजित नहीं होती, हिम्मत के साथ उनका सामना करती हैं और गर्वित, विजयश्री पाती हैं।
उपन्यास की नायिका ऋचा, एक जुझारू पत्रकार है। अपने बलात्कार की रिपार्ट वह स्वंय थाने में जाकर दर्ज कराती है। कहीं कोई साक्ष्य छूटने न पाए, इस बात का पूरा ध्यान रखती है, निर्भीक घोषणा करती है- ‘वह पत्रकार है, कई पुुरूषांे के साथ उसकी मित्रता है, पर भेड़ियों से पाला पड़ने का यह उसका पहला मौका है। अगर भेड़ियों को खुला छोड़ दिया जाए तो वे फिर शिकार करेंगे, इसीलिए उन्हें खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।
ऋचा ने दिखा दिया, बलात्कार की शिकार लड़की सम्मान की पात्री हो सकती है, बशर्ते वह स्वंय को अपराधिनी मानकर हिम्मत न हार जाए। वस्तुतः उसे तो सिर उठाकर चलना है, क्योंकि अपराधिनी वह नहीं, वरन् वे बलात्कारी हैं, जो एक कोमल लड़की पर अपनी ताकत आज़मा, अपने को विजयी समझते हैं। ऐसे कायरों को तो समाज की ऐसी अवमानना मिलनी चाहिए कि वे कभी सिर उठाकर न चल सकें।
उपन्यास की नायिका ने यह सिद्ध कर दिया, नारी स्वंयमेव शक्तिपुंज है। वह ऐसी दीपशिखा है, जो स्वंय जलकर, दूसरों का पथ आलोकित करती है। यह उपन्यास यदि किसी को प्रेरणा दे सके, तो मेरा लेखन सार्थक है।
पुष्पा सक्सेना