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उपन्यास --- साथ चलते हुए...
लेखक--जयश्री रॉय
बाहर फीके नीले आकाश में एक टुकड़ा चाँद उदास टँका था। पानी की महीन धार की तरह दूर चीरों की कतार पर चाँदनी उतर रही थी। चाँदी की पन्नियों की तरह ऊँचे पेड़ों के पत्ते चमक रहे थे। सोसायटी के स्वीमिंग पुल के पानी की सतह हल्के-हल्के लहराते हुए पंक्तिबद्ध जुगनुओं की तरह लगातार जल-बुझ रही थी। दूर बिल्डिंगों के माथे पर चमकते इश्तहार, उनकी सतरंगी रोशनियाँ - काँच की खिड़कियों, ऊँची इमारतों की सपाट दीवारों पर चमकती हुई, हजार रंगों में प्रतिबिंबित होती हुई... सब कुछ कितना मोहमय, स्वप्निल... जैसे सच न हो, इस दुनिया का न हो...
हाँ, यह सब सच नहीं, वह कोई सपना देख रही है जो थोड़ी ही देर में टूट जाएगा। इस कदर सपने से बाहर उसकी दुनिया बिल्कुल सुरक्षित है - वह, उसकी काजोल, उसकी तमाम खुशियों और खेल-खिलौनों के साथ। अभी, बस, थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा... वह सोचती है और रोती है। खुद को छला भी तो एक हद तक ही जाता है... थोड़ी ही देर में वह बेतरह थक आई थी। उसे वास्तविकता की तरफ लौटना पड़ेगा... अपने पाँवों से चलकर... इस विवशता की कोई कल्पना भी क्या कर सके...
हवा में बर्फ घुला था... अपने चेहरे पर चाकू की धार-सी फिरती हल्की हवा को महसूसते हुए उसने पूछा था, न जाने किससे - क्यों, मेरी काजोल ही क्यों...? न जाने कितनी बार... कोई जबाव नहीं मिला था, जैसा की हमेशा से होता है। आकाश, धरती - सब सपाट हो गया है, किसी अलंघ्य प्राचीर की तरह... कितनी ऊँची, कितनी कठोर, कितनी हृदयहीन... वह अदृश्य पाषाणों से टकराती फिरती है, शायद कोई दरवाजा कहीं खुला मिल जाय, कोई आस्ताना... छाति भर नालिश लिए, दुहाई लिए वह हर बंद दरवाजा खटखटाती है, साँकल खड़काती है - सुनो, कोई तो सुनो...
परदेश की जमीन पर बहुत पीछे छूट गए अपने भगवान की याद भी यकायक हो आई थी - कितने ही सारे नाम एक साथ! प्रार्थना करते हुए मन में कही गहरा अपराधबोध था। बचपन में हर बात के लिए कितनी आसानी से अपनी दादी के भगवान्जी के पास पहुँच जाती थी... परीक्षा में अच्छे अंक के लिए तो कभी हाऊसफुल चल रहे सिनेमा के टिकट के लिए... अब वह सरल विश्वास कहाँ रहा! संशय की चपेट में आकर जीवन का सब कुछ कितना कठिन और असाध्य हो गया है।
कभी-कभी ईर्ष्या होती है उन लोगों से जो अपनी सहज, सरल आस्था में निश्चिंत होकर जीते हैं। उनकी कोई समस्या नहीं। सारे प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं उनके पास। उनके सारे सुख-दुखों के जिम्मेदार उनके भगवान हैं और जो भी घटता है उनके साथ वह पहले से तय है जो उनके पिछले कर्मों का फल है...
उस रात उसने न जाने कितने दिनों के बाद उस तरह से डूबकर प्रार्थना की थी। जाने अपने किन पापों के लिए माफी माँगती रही थी - ईश्वर से, सबसे... अब कोई अहम नहीं, अभिमान नहीं, यहाँ प्रश्न काजोल का है, सिर्फ काजोल का...! कितनी मन्नतें, मिन्नतें, व्रत, उपवास, तीर्थ... काजोल ठीक हो गई तो वह यहाँ इतने का प्रसाद चढ़ाएगी, वहाँ अमुक देवी की थान में मत्था टेकेगी, यह करेगी, वह करेगी... कितनी भलनरेवल हो गई है वह, कितनी कमजोर... किसी डूबते हुए की तरह हर तिनके को पकड़ती हुई। कहीं से भी, कोई भी उसे थोड़ा आश्वासन दे दे, कह दे कि उसकी काजोल को कुछ नहीं होगा।
एक गहरी प्रार्थना के बाद जब वह सोने गई थी, मन बहुत हल्का हो आया था। लगा था, नहीं, सब ठीक हो जाएगा। पूरब में फैलती हल्की लाली में उसने काजोल का चेहरा एक बार फिर देखा था। वह किसी फरिश्ते की तरह मासूम और सुंदर लग रही थी। उसके छोटे-से बिस्तर में ही वह सिमट-सिकुड़कर सो गई थी - उसके नन्हें शरीर को अपनी बाँहों में लेकर... वह हल्के से कुनमुनाई थी और फिर नींद में डूब गई थी। उसे लगा था, वह कह रही है 'माई बार्वी, रोज...'
उसे उसके गुड्डे-गुड़ियों की दुनिया में रहने दो भगवान... इतनी बड़ी दुनिया है तुम्हारी, बस, एक छोटा-सा कोना, थोड़ी-सी हवा और जिंदगी... प्लीज भगवान... रोते हुए न जाने वह कब सो गई थी...
सुबह काजोल ने ही उसे उठाया था - माँ, उठोगी नहीं, मुझे स्कूल के लिए तैयार होना है... उसने उसकी दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने गालों से सटा ली थी - नम और ठंडे... उसे उस वक्त बुखार नहीं था।
- आज स्कूल नहीं, हमें हस्पताल जाना है, तुम्हारे कुछ टेस्ट करवाने...
उसने उसकी घुँघराली लटों को चूमते हुए कहा था, अपनी आवाज को सहज रखने की कोशिश करते हुए।
- प्लीज माँ, मुझे वहाँ नहीं जाना!
उसने रोनी-सी सूरत बनाई थी -
मुझे सुई से बहुत दुखता है...
- नहीं, कुछ नहीं होगा, मैं रहूँगी तुम्हारे साथ...
कहते हुए उसकी आँखें यकायक पिघल आई थीं। कहाँ बचा पाई थी वह अपनी बच्ची को उन कष्टकर सुइयों, दवाइयों से। केमो के पहले चक्र के कुछ ही दिनों बाद काजोल के सारे बाल झड़ गए थे। ओह, सोचकर वह आज भी गहरे आतंक और यातना में हो आती है... काजोल के रेशमी, घुँघराले बाल... कितने खूबसूरत थे! काजोल को दूध पीना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। मगर यह सुनकर कि दूध पीने से बाल जल्दी बड़े होते हैं, वह रोज नाक बंद करके एक गिलास दूध पी जाती थी, फिर आईने के सामने खड़ी होकर देखती थी, उसके बाल सचमुच बड़े हुए कि नहीं। रेपेंजल की तरह बाल होंगे मेरे, राजकुमार मेरे बाल पकड़कर बॉल्कनी तक आ जाएगा... काजोल अपने लंबे होते बालों को देखकर खुशी से किलकने लगती... वही बाल जब इस तरह से झड़ गए... उसे याद है, काजोल को गोद में लेकर उस दिन वह भी बहुत रोई थी।
...सुबह काजोल की चीख सुनकर उसकी नींद खुल गई थी। उसके कमरे में जाकर देखा था, काजोल बिस्तर में दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए चिल्लाए जा रही थी। उसके चारों तरफ बाल ही बाल बिखरे पड़े थे, बड़े-बड़े लच्छों में। उसका माथा सामने से बिल्कुल गंजा हो गया था। यह दृश्य देखकर वह एक पल के लिए सन्न होकर रह गई थी। हालाँकि डॉक्टर ने केमो के साथ बाल गिर जाने की बात पहले ही उसे बता दी थी, फिर भी अचानक वह दृश्य देखकर वह बेतरह घबरा उठी थी। दौड़कर काजोल को अपनी गोद में समेट लिया था। उसके बाद माँ-बेटी देर तक एक-दूसरे से लिपटकर रोती रही थी।
बाद में उसे इस बात पर बहुत ग्लानि हुई थी। अपनी बच्ची को सँभालने के बजाय वह खुद किस तरह से उसके सामने ऐसे कमजोर पड़ गई? इससे काजोल और भी असुरक्षित हो गई होगी, उसका डर बढ़ गया होगा।
मगर काजोल को अपनी माँ पर बहुत यकीन था - माँ की गोद में वह हमेशा सुरक्षित है। ठगी गई वह, अपने मासूम यकीन के हाथों मारी गई... माँ की गोद भी निरापद नहीं होती, वह अंत तक जान नहीं पाई...!
जानती वह भी कहाँ थी तब, सोचा था अपनी अथक सेवा, प्रार्थना और परिश्रम से काजोल को बचा लेगी... मगर कुछ भी काम न आ सका। आखिर काजोल चली गई, उसकी तरफ उम्मीद से निहारती हुई, बार-बार मदद के लिए पुकारती हुई - माँ... मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है, मैं जीना चाहती हूँ...
काजोल के जाने के साथ ही तब तक का सारा पाया, सहेजा हुआ जैसे एकदम से निरर्थक हो गया था। अंततः मौन से जीवन हार ही गया था और उसके साथ वह भी... उस क्षण वह जोर से चीखना चाहती थी, पूरी दुनिया को तहस-नहस कर देना चाहती थी, मगर चुप खड़ी रह गई थी - हस्पताल के बिस्तर पर अपनी बेटी का प्राणहीन चेहरा देखते हुए! उस समय सफेद चादर पर उसके लंबे घुँघराले बाल, घनी काली भौंहें और बंद आँखों पर झँपी सघन बरौनिया कितनी स्पष्ट और विलक्षण दिख रही थीं...! केमो खत्म होने के बाद फिर से कितने खूबसूरत बाल निकले थे उसके...
एक गहरी साँस लेकर उसने अपने अंदर टटोला था, नहीं! कहीं आँसू की एक बूँद नहीं बची है! शायद वह पहले ही अपने सारे आँसू खर्च कर चुकी है। कभी-कभी रोने के लिए भी वह तरस जाती है। देर तक ऐंठती रहती है। इस रोने का एक अकेला सुख भी गया... इस परती जमीन में अब कोई नमी नहीं, कुछ सजल नहीं। सूखा और बस सूखा- मीलों तक, युगों तक...
आज भी रह-रहकर काजोल का प्रश्न उसे समय-असमय घेर लेता है - माँ, मैं ठीक हो जाऊँगी न? मैं नहीं मरूँगी न? वह अपनी मूक विवशता में खड़ी-खड़ी उसे देखती रही थी और अंदर की चीख बाहर के कभी न टूटनेवाले सन्नाटे में बदल कर रह गई थी। एक माँ के वश में अपने बच्चे की सुरक्षा न रह जाय... इस विवशता का कोई नजीर नहीं। उन क्षणों के निःशब्द कोलाहल में डूबकर वह आज एक प्रस्तर प्रतिमा में तब्दील होकर जी रही थी - सारी संवेदनाओं से खाली होकर एकदम सपाट और निर्विकार...
फ्युनरल के बाद घर लौटकर उसने आशुतोष को अपने भारी-भरकम बैगों के साथ तैयार पाया था। नीचे कार में तापसी बैठी थी। ऊपर फ्लैट से कार की खिड़की से झाँकता हुआ उसका डार्क ग्लासेस पहना हुआ आधा चेहरा ही दिख रहा था। शायद वह सिगरेट पी रही थी। अधीर होकर उसने इस बीच कई बार कार का हार्न बजाया था।
हाथ में आशुतोष का दिया चेक थामे वह देर तक कोई प्रतिकिया व्यक्त किए बगैर खड़ी रह गई थी। जिंदगी की सारी संवेदनाओं का मूल्य चुका दिया गया था - उसके समर्पण, प्रतिबद्धता का मूल्य! अंकों में समेट लिया गया था जीवन की गहनतम अनुभूतियों को - यही हासिल था उसके जीवन के पंद्रह वर्षों की शर्त रहित संबद्धता का। एक कागज के टुकड़े में उसके धड़कते हुए जीवनानुभूतियों की कीमत लिखी हुई थी। उसे उसका प्राप्य मिल गया था। उसने न देखती हुई-सी दृष्टि से उस चेक पर लिखे अंक को देखा था - ...नहीं, आशुतोष ने अपनी तरफ से कुछ कम नहीं आँकी थी उसकी कीमत!
अलग तो वह भी हो जाना चाहती थी उससे। एक लंबी कानूनी लड़ाई उसने भी लडी है इसके लिए। मगर अभी, इस समय... कोई शत्रु भी शायद ऐसा न करे!
काजोल के मृत चेहरे की स्मृति अभी भी उसके मानस में ताजा थी। अभी भी उसकी देह की मीठी गंध, साँसों का मद्धिम स्वर उसके आसपास था, उसे पूरी तरह घेरे हुए। अभी उसके लिए उसका रोना शेष था, अभी तो उसकी स्मृति में उसका पूरा जीवन ही जीना शेष था।
अपनी बेटी के ब्लड कैंसर के साथ पाँच वर्ष की अथक लड़ाई ने उसे हर तरह से निचोड़ लिया था। वह अंदर से एकदम असक्त, अवश हो आई थी। इसी लड़ाई ने उसे आज हर तरह से हरा दिया था। बेटी ने साथ छोड़ा तो आज पति भी हाथ में बैग लिए जाने के लिए तैयार खड़ा है! क्या वह उसे थोड़ा, बस थोड़ा समय नहीं दे सकता था? ...इतना कि वह अपनी - उन दोनों की - बेटी का मातम मना सके!
उसकी अबूझ चावनी और ठगी-सी चुप्पी ने आशुतोष को एकदम से अधैर्य कर दिया था। नीचे तापसी रह-रहकर हार्न बजाए जा रही थी। खिड़की की तरफ मुँह करके 'आई एम कमिंग डैमिट!' कहकर वह उसकी ओर मुखातिब हुआ था -
'क्या हुआ? कुछ और चहिए तुम्हें? कुछ कहती क्यों नहीं?'
उसकी झुँझलाई हुई आवाज से चौंककर वह स्वयं में लौटी थी -
'नहीं, कुछ भी तो नहीं! मगर आशुतोष, तुम क्यों घर छोड़कर जाने लगे! घर तुम्हारा है, तुम लोग रहो। मैं वापस देश लौट रही हूँ।'
लेखक--जयश्री रॉय
बाहर फीके नीले आकाश में एक टुकड़ा चाँद उदास टँका था। पानी की महीन धार की तरह दूर चीरों की कतार पर चाँदनी उतर रही थी। चाँदी की पन्नियों की तरह ऊँचे पेड़ों के पत्ते चमक रहे थे। सोसायटी के स्वीमिंग पुल के पानी की सतह हल्के-हल्के लहराते हुए पंक्तिबद्ध जुगनुओं की तरह लगातार जल-बुझ रही थी। दूर बिल्डिंगों के माथे पर चमकते इश्तहार, उनकी सतरंगी रोशनियाँ - काँच की खिड़कियों, ऊँची इमारतों की सपाट दीवारों पर चमकती हुई, हजार रंगों में प्रतिबिंबित होती हुई... सब कुछ कितना मोहमय, स्वप्निल... जैसे सच न हो, इस दुनिया का न हो...
हाँ, यह सब सच नहीं, वह कोई सपना देख रही है जो थोड़ी ही देर में टूट जाएगा। इस कदर सपने से बाहर उसकी दुनिया बिल्कुल सुरक्षित है - वह, उसकी काजोल, उसकी तमाम खुशियों और खेल-खिलौनों के साथ। अभी, बस, थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा... वह सोचती है और रोती है। खुद को छला भी तो एक हद तक ही जाता है... थोड़ी ही देर में वह बेतरह थक आई थी। उसे वास्तविकता की तरफ लौटना पड़ेगा... अपने पाँवों से चलकर... इस विवशता की कोई कल्पना भी क्या कर सके...
हवा में बर्फ घुला था... अपने चेहरे पर चाकू की धार-सी फिरती हल्की हवा को महसूसते हुए उसने पूछा था, न जाने किससे - क्यों, मेरी काजोल ही क्यों...? न जाने कितनी बार... कोई जबाव नहीं मिला था, जैसा की हमेशा से होता है। आकाश, धरती - सब सपाट हो गया है, किसी अलंघ्य प्राचीर की तरह... कितनी ऊँची, कितनी कठोर, कितनी हृदयहीन... वह अदृश्य पाषाणों से टकराती फिरती है, शायद कोई दरवाजा कहीं खुला मिल जाय, कोई आस्ताना... छाति भर नालिश लिए, दुहाई लिए वह हर बंद दरवाजा खटखटाती है, साँकल खड़काती है - सुनो, कोई तो सुनो...
परदेश की जमीन पर बहुत पीछे छूट गए अपने भगवान की याद भी यकायक हो आई थी - कितने ही सारे नाम एक साथ! प्रार्थना करते हुए मन में कही गहरा अपराधबोध था। बचपन में हर बात के लिए कितनी आसानी से अपनी दादी के भगवान्जी के पास पहुँच जाती थी... परीक्षा में अच्छे अंक के लिए तो कभी हाऊसफुल चल रहे सिनेमा के टिकट के लिए... अब वह सरल विश्वास कहाँ रहा! संशय की चपेट में आकर जीवन का सब कुछ कितना कठिन और असाध्य हो गया है।
कभी-कभी ईर्ष्या होती है उन लोगों से जो अपनी सहज, सरल आस्था में निश्चिंत होकर जीते हैं। उनकी कोई समस्या नहीं। सारे प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं उनके पास। उनके सारे सुख-दुखों के जिम्मेदार उनके भगवान हैं और जो भी घटता है उनके साथ वह पहले से तय है जो उनके पिछले कर्मों का फल है...
उस रात उसने न जाने कितने दिनों के बाद उस तरह से डूबकर प्रार्थना की थी। जाने अपने किन पापों के लिए माफी माँगती रही थी - ईश्वर से, सबसे... अब कोई अहम नहीं, अभिमान नहीं, यहाँ प्रश्न काजोल का है, सिर्फ काजोल का...! कितनी मन्नतें, मिन्नतें, व्रत, उपवास, तीर्थ... काजोल ठीक हो गई तो वह यहाँ इतने का प्रसाद चढ़ाएगी, वहाँ अमुक देवी की थान में मत्था टेकेगी, यह करेगी, वह करेगी... कितनी भलनरेवल हो गई है वह, कितनी कमजोर... किसी डूबते हुए की तरह हर तिनके को पकड़ती हुई। कहीं से भी, कोई भी उसे थोड़ा आश्वासन दे दे, कह दे कि उसकी काजोल को कुछ नहीं होगा।
एक गहरी प्रार्थना के बाद जब वह सोने गई थी, मन बहुत हल्का हो आया था। लगा था, नहीं, सब ठीक हो जाएगा। पूरब में फैलती हल्की लाली में उसने काजोल का चेहरा एक बार फिर देखा था। वह किसी फरिश्ते की तरह मासूम और सुंदर लग रही थी। उसके छोटे-से बिस्तर में ही वह सिमट-सिकुड़कर सो गई थी - उसके नन्हें शरीर को अपनी बाँहों में लेकर... वह हल्के से कुनमुनाई थी और फिर नींद में डूब गई थी। उसे लगा था, वह कह रही है 'माई बार्वी, रोज...'
उसे उसके गुड्डे-गुड़ियों की दुनिया में रहने दो भगवान... इतनी बड़ी दुनिया है तुम्हारी, बस, एक छोटा-सा कोना, थोड़ी-सी हवा और जिंदगी... प्लीज भगवान... रोते हुए न जाने वह कब सो गई थी...
सुबह काजोल ने ही उसे उठाया था - माँ, उठोगी नहीं, मुझे स्कूल के लिए तैयार होना है... उसने उसकी दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने गालों से सटा ली थी - नम और ठंडे... उसे उस वक्त बुखार नहीं था।
- आज स्कूल नहीं, हमें हस्पताल जाना है, तुम्हारे कुछ टेस्ट करवाने...
उसने उसकी घुँघराली लटों को चूमते हुए कहा था, अपनी आवाज को सहज रखने की कोशिश करते हुए।
- प्लीज माँ, मुझे वहाँ नहीं जाना!
उसने रोनी-सी सूरत बनाई थी -
मुझे सुई से बहुत दुखता है...
- नहीं, कुछ नहीं होगा, मैं रहूँगी तुम्हारे साथ...
कहते हुए उसकी आँखें यकायक पिघल आई थीं। कहाँ बचा पाई थी वह अपनी बच्ची को उन कष्टकर सुइयों, दवाइयों से। केमो के पहले चक्र के कुछ ही दिनों बाद काजोल के सारे बाल झड़ गए थे। ओह, सोचकर वह आज भी गहरे आतंक और यातना में हो आती है... काजोल के रेशमी, घुँघराले बाल... कितने खूबसूरत थे! काजोल को दूध पीना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। मगर यह सुनकर कि दूध पीने से बाल जल्दी बड़े होते हैं, वह रोज नाक बंद करके एक गिलास दूध पी जाती थी, फिर आईने के सामने खड़ी होकर देखती थी, उसके बाल सचमुच बड़े हुए कि नहीं। रेपेंजल की तरह बाल होंगे मेरे, राजकुमार मेरे बाल पकड़कर बॉल्कनी तक आ जाएगा... काजोल अपने लंबे होते बालों को देखकर खुशी से किलकने लगती... वही बाल जब इस तरह से झड़ गए... उसे याद है, काजोल को गोद में लेकर उस दिन वह भी बहुत रोई थी।
...सुबह काजोल की चीख सुनकर उसकी नींद खुल गई थी। उसके कमरे में जाकर देखा था, काजोल बिस्तर में दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए चिल्लाए जा रही थी। उसके चारों तरफ बाल ही बाल बिखरे पड़े थे, बड़े-बड़े लच्छों में। उसका माथा सामने से बिल्कुल गंजा हो गया था। यह दृश्य देखकर वह एक पल के लिए सन्न होकर रह गई थी। हालाँकि डॉक्टर ने केमो के साथ बाल गिर जाने की बात पहले ही उसे बता दी थी, फिर भी अचानक वह दृश्य देखकर वह बेतरह घबरा उठी थी। दौड़कर काजोल को अपनी गोद में समेट लिया था। उसके बाद माँ-बेटी देर तक एक-दूसरे से लिपटकर रोती रही थी।
बाद में उसे इस बात पर बहुत ग्लानि हुई थी। अपनी बच्ची को सँभालने के बजाय वह खुद किस तरह से उसके सामने ऐसे कमजोर पड़ गई? इससे काजोल और भी असुरक्षित हो गई होगी, उसका डर बढ़ गया होगा।
मगर काजोल को अपनी माँ पर बहुत यकीन था - माँ की गोद में वह हमेशा सुरक्षित है। ठगी गई वह, अपने मासूम यकीन के हाथों मारी गई... माँ की गोद भी निरापद नहीं होती, वह अंत तक जान नहीं पाई...!
जानती वह भी कहाँ थी तब, सोचा था अपनी अथक सेवा, प्रार्थना और परिश्रम से काजोल को बचा लेगी... मगर कुछ भी काम न आ सका। आखिर काजोल चली गई, उसकी तरफ उम्मीद से निहारती हुई, बार-बार मदद के लिए पुकारती हुई - माँ... मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है, मैं जीना चाहती हूँ...
काजोल के जाने के साथ ही तब तक का सारा पाया, सहेजा हुआ जैसे एकदम से निरर्थक हो गया था। अंततः मौन से जीवन हार ही गया था और उसके साथ वह भी... उस क्षण वह जोर से चीखना चाहती थी, पूरी दुनिया को तहस-नहस कर देना चाहती थी, मगर चुप खड़ी रह गई थी - हस्पताल के बिस्तर पर अपनी बेटी का प्राणहीन चेहरा देखते हुए! उस समय सफेद चादर पर उसके लंबे घुँघराले बाल, घनी काली भौंहें और बंद आँखों पर झँपी सघन बरौनिया कितनी स्पष्ट और विलक्षण दिख रही थीं...! केमो खत्म होने के बाद फिर से कितने खूबसूरत बाल निकले थे उसके...
एक गहरी साँस लेकर उसने अपने अंदर टटोला था, नहीं! कहीं आँसू की एक बूँद नहीं बची है! शायद वह पहले ही अपने सारे आँसू खर्च कर चुकी है। कभी-कभी रोने के लिए भी वह तरस जाती है। देर तक ऐंठती रहती है। इस रोने का एक अकेला सुख भी गया... इस परती जमीन में अब कोई नमी नहीं, कुछ सजल नहीं। सूखा और बस सूखा- मीलों तक, युगों तक...
आज भी रह-रहकर काजोल का प्रश्न उसे समय-असमय घेर लेता है - माँ, मैं ठीक हो जाऊँगी न? मैं नहीं मरूँगी न? वह अपनी मूक विवशता में खड़ी-खड़ी उसे देखती रही थी और अंदर की चीख बाहर के कभी न टूटनेवाले सन्नाटे में बदल कर रह गई थी। एक माँ के वश में अपने बच्चे की सुरक्षा न रह जाय... इस विवशता का कोई नजीर नहीं। उन क्षणों के निःशब्द कोलाहल में डूबकर वह आज एक प्रस्तर प्रतिमा में तब्दील होकर जी रही थी - सारी संवेदनाओं से खाली होकर एकदम सपाट और निर्विकार...
फ्युनरल के बाद घर लौटकर उसने आशुतोष को अपने भारी-भरकम बैगों के साथ तैयार पाया था। नीचे कार में तापसी बैठी थी। ऊपर फ्लैट से कार की खिड़की से झाँकता हुआ उसका डार्क ग्लासेस पहना हुआ आधा चेहरा ही दिख रहा था। शायद वह सिगरेट पी रही थी। अधीर होकर उसने इस बीच कई बार कार का हार्न बजाया था।
हाथ में आशुतोष का दिया चेक थामे वह देर तक कोई प्रतिकिया व्यक्त किए बगैर खड़ी रह गई थी। जिंदगी की सारी संवेदनाओं का मूल्य चुका दिया गया था - उसके समर्पण, प्रतिबद्धता का मूल्य! अंकों में समेट लिया गया था जीवन की गहनतम अनुभूतियों को - यही हासिल था उसके जीवन के पंद्रह वर्षों की शर्त रहित संबद्धता का। एक कागज के टुकड़े में उसके धड़कते हुए जीवनानुभूतियों की कीमत लिखी हुई थी। उसे उसका प्राप्य मिल गया था। उसने न देखती हुई-सी दृष्टि से उस चेक पर लिखे अंक को देखा था - ...नहीं, आशुतोष ने अपनी तरफ से कुछ कम नहीं आँकी थी उसकी कीमत!
अलग तो वह भी हो जाना चाहती थी उससे। एक लंबी कानूनी लड़ाई उसने भी लडी है इसके लिए। मगर अभी, इस समय... कोई शत्रु भी शायद ऐसा न करे!
काजोल के मृत चेहरे की स्मृति अभी भी उसके मानस में ताजा थी। अभी भी उसकी देह की मीठी गंध, साँसों का मद्धिम स्वर उसके आसपास था, उसे पूरी तरह घेरे हुए। अभी उसके लिए उसका रोना शेष था, अभी तो उसकी स्मृति में उसका पूरा जीवन ही जीना शेष था।
अपनी बेटी के ब्लड कैंसर के साथ पाँच वर्ष की अथक लड़ाई ने उसे हर तरह से निचोड़ लिया था। वह अंदर से एकदम असक्त, अवश हो आई थी। इसी लड़ाई ने उसे आज हर तरह से हरा दिया था। बेटी ने साथ छोड़ा तो आज पति भी हाथ में बैग लिए जाने के लिए तैयार खड़ा है! क्या वह उसे थोड़ा, बस थोड़ा समय नहीं दे सकता था? ...इतना कि वह अपनी - उन दोनों की - बेटी का मातम मना सके!
उसकी अबूझ चावनी और ठगी-सी चुप्पी ने आशुतोष को एकदम से अधैर्य कर दिया था। नीचे तापसी रह-रहकर हार्न बजाए जा रही थी। खिड़की की तरफ मुँह करके 'आई एम कमिंग डैमिट!' कहकर वह उसकी ओर मुखातिब हुआ था -
'क्या हुआ? कुछ और चहिए तुम्हें? कुछ कहती क्यों नहीं?'
उसकी झुँझलाई हुई आवाज से चौंककर वह स्वयं में लौटी थी -
'नहीं, कुछ भी तो नहीं! मगर आशुतोष, तुम क्यों घर छोड़कर जाने लगे! घर तुम्हारा है, तुम लोग रहो। मैं वापस देश लौट रही हूँ।'