S
StoryPublisher
Guest
अगले दिन भगवान कालेज में दाखिला लेने गुरनैब को साथ ले चल पड़ा। वे गाँव से ग्यारह बजे की बस पकड़ कर बारह बजे तक बुढलाडे जा पहुंचे। अड्डे पर उतर कर उन्होंने आस -पास निगाह फेरी , शायद कोई जान पहचान वाला मिल जाये पर सभी नये -नये चेहरे चीनी की बोरी के आस -पास चक्कर लगाती चींटियों की तरह भागते फिर रहे थे। जैसे सारा मुल्क ही किसी गुमशुदा की तलाश में चल पड़ा हो। बसों के हार्नों ने शोर मचा रखा था। कंडक्टर गला फाड़-फाड़ कर अलग -अलग शहर, गाँव जाने की आवाजें लगा रहे थे। रंग -बिरंगी बसें , सँपनियों की तरह अड्डे में आ जा रही थीं.. भगवान और गुरनैब एक हॉकर से अखवार लेकर बस अड्डे से बाहर आ गए .
'' किधर है तेरा कालेज ?'' गुरनैब ने कुछ सोच रहे भगवान को पूछा।
'' मुझे तो खुद नहीं पता , मैं सोच रहा था कि अगर रिक्शा कर लें तो खुद ही छोड़ देगा। ''
'' ऐसे भी ठीक है। '' गुरनैब ने सहमति जताई।
'' दोनों ने दस रूपए में रिक्शा कर लिया। रिक्शा चालक ने दोनों को रिक्शे में बैठा कर पहले थोड़ी दूरी तक पैदल भाग कर रिक्शे को धकेला जब रिक्शे ने तेजी पकड़ ली तब दाहिना पैर दाहिने पैडल पर रखकर बांया, बांये पैडल पर टिका लिया। फिर ऊपर के पैडल पर शरीर का सारा भार देकर रिक्शे की रफ़्तार तेज कर ली। रिक्शा अड्डे से अब चौड़े बाज़ार की ओर बढ़ चला था। बाज़ार के दोनों ओर दुकानों की लम्बी कतार थी जिनपर अलग -अलग बोर्ड लटक रहे थे , 'कपडे दा सस्ता डिपू' , 'पप्पू दी हट्टी' ,'इंजन दा समान एत्थे मिलदा है' ,चूड़ियाँ ही चूड़ियाँ और बुक स्टॉल। बुक स्टॉल पर नज़र पड़ते ही भगवान ने रिक्शा रुकवा लिया।
'' क्यों क्या हो गया ?'' भगवान के अचानक रिक्शा रुकवाने पर गुरनैब हैरान हो गया।
'' कोई किताब देख लें। '' भगवान ने कहा।
दोनों दुकान में चले गए। दुकानदार ने गाहक को आता देखकर बनावटी सी हँसी हँसते हुए ' आओ जी ' कहा। भगवान ने दुकान पर सजाई किताबों पर जल्दी -जल्दी नज़र डाली और फिर एक शीशे के अंदर सजाये दो नॉवेल नानक सिंह का ' चिट्टा लहू ' और जसवंत सिंह कंवल का ' पूरनमासी ' निकाल लिए। किताबें खरीद कर वे दोबारा रिक्शे में आ बैठे। रिक्शा चालक ने रिक्शा फिर उसी रफ़्तार में ले लिया। वह दुकानों को ' हट्ट पीछे ' कहता अपनी मंज़िल की ओर सरपट दौड़ा जा रहा था। रिक्शे के तीनों टायर तेज रफ़्तार होने के कारण तारों रहित दिखाई दे रहे थे। रिक्शा चालक के सर से पसीने की धारें नीचे की ओर बह चलीं थीं । पीठ के पीछे से उसका कुरता पसीने से चिपक गया था । सर की सेध पर पड़ रहे सूरज की किरणें गर्म तकले की तरह बदन में चुभ रही थीं। आगे एक ऊँची बिल्डिंग ने सड़क को दो हिस्सों में बाँट दिया था। रिक्शा दाहिनी ओर जाती सड़क पर मुड़ गया । थोड़ी दूर जाकर रिक्शा एक चौड़े गेट के पास जा रुका। कालेज आ गया था।
'' कहीं यूँ ही मत ऊट -पटांग बक देना कुछ यहाँ । '' भगवान ने कालेज में आते -जाते लड़के -लड़कियों की ओर देख कर कहा।
'' भागू तुम क्यों डरते हो ?'' गुरनैब ने भगवान के कंधे पर धीरे से थपकी दी।
दोनों गेट के अंदर आ गए। सामने से दो सुनहरी सूटों में सजी लड़कियां मटक -मटक चली आ रही थीं। गुरनैब से देख कर रहा न गया। उसने लड़कियों के बराबर आने पर चुटकी छोड़ दी , '' आय -हाय पर्सिनिये , मर जां पूछ तड़ा के। ''
'' ओये मरवाएगा साले। '' भगवान ने उसकी कमर में चिकुटी काटी।
'' तुझे क्या होता है यार , पड़ेगी तो मुझे पड़ेगी। ''
'' न मैं क्या उनकी बूआ का बेटा लगता हूँ , मुझे भी वो साथ ही रगड़ेंगे। ''
'' अच्छा अब नहीं छेड़ता बस। '' गुरनैब ने उसे तसल्ली देते हुए कहा।
'' भाई जी प्रॉस्पेक्ट कहाँ मिलता है …?''भगवान ने सामने पार्क में खड़े दो लड़कों से पूछा।
भाई वो जो सामने शटर दिख रहा है न , वहीँ खिड़की में कलर्क बैठा है , वहीँ मिलते हैं। '' उनमें से पगड़ी वाले लड़के ने एक कमरे के आगे लगे लोहे के शटर की ओर इशारा किया , जहाँ एक दो लड़के प्रोस्पेक्ट लेने के लिए खड़े थे।
'' तू यहाँ बैठ मैं लेकर आता हूँ। '' भगवान ने पार्क में बनी सीमेंट की कंधोली की ओर इशारा कर दिया और खुद प्रोस्पेक्ट लेने चला गया। गुरनैब उसके ऊपर बैठने के बजाये उसके ऊपर दाहिना पैर रख कर खड़ा हो गया। पार्क में कटा अंग्रेजी घास किसी की ताज़ी कटी घनी दाढ़ी की तरह आपस में फँसा खड़ा था। पार्क के आस -पास बनी पतली -पतली क्यारियों में खिले रंग -बिरंगे कोमल फूल , कालेज में रंग -बिरंगे सूटों में सजी कोमल शरीरों वाली लड़कियों की तरह हँस रहे थे। पतली क्यारी बीच के फूलों को माली खुरपी से गुड़ाई करते हुए उसके अंदर की झाड़ - झंखाड़ को बाहर फेंक रहा था। बाहर फुदकती चिर -चिर करती गुटारें उस घास -फूस से भोजन ढूंढने की कोशिश में जुटी हुई थीं। गुरनैब ने पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर चेहरे पर आई पसीने की बूँदें पोंछ लीं। फिर अपनी कमीज का ऊपर का बटन खोल कर रुमाल से हवा करने लगा। पार्क के सामने की पगडण्डी के ऊपर बाजरे के सिट्टे की तरह इकहरी सी लड़की को आते देख कर गुरनैब की आँखों में एक चमक सी आ गई। वह अपने आप को कुछ कहने के लिए तैयार करने लगा।
'' ओये होए रब्बा ! फुर्सत में बैठकर बनाया है लगता है '' गुरनैब ने लड़की के पास आते ही हिम्मत करके कह ही दिया पर लड़की बिना कुछ बोले ऊँची हिल की सैंडिल से टक -टक करती पास से गुजरने लगी।
'' नहीं कुछ बोलना तो गाली ही निकाल दो . ये तो मान लूँगा कि बोल पड़ी .''
लड़की कुछ पल के लिए रुक गई। गुरनैब के दिल की धड़कन इंजन की तरह 'ठक -ठक -ठक ' बजने लगी। शरीर काँप गया। माथे पर पसीना उभर आया। आँखें ऊपर उठ गईं '' मितरा चड़िआ रगड़ा '' गुरनैब ने झट सोच लिया। लड़की ने पीछे मुड़ कर देखा। उसके मुस्कान से पतले गुलाबी होंठ चौड़े हो गए और उन होठों से सफेद मोतियों से चमकते दांत गुरनैब के दिल में आ घुसे। लड़की महकती सी हँसी देकर आगे बढ़ गई पर गुरनैब के होश ठिकाने से हिल गए। उसने लोर में आकर दोनों हाथों की ऊँगलियाँ आपस में फँसा कर दबा लीं।
'' हटा नहीं कारस्तानी करने से । '' भगवान ने आते -आते लड़की को हँसते देख लिया था।
'' भाई जान निकालकर ले गई कंजर की , मैं तो कहता हूँ मुझे यहीं दाखिला दिला दे । '' गुरनैब के अंदर प्यार की तरंगों का भूचाल आया पड़ा था।
'' दसवीं में तो चार बार फेल हो गए , दाखिला किसमें दिलाऊं तुम्हें। ''
'' और कुछ नहीं तो माली ही रखवा दे , बस दर्शन करके ही निहाल हो जाया करूंगा । ''
'' तुझे तो बस यही सपने आते रहते हैं , चल छोड़ , आ फार्म भरें। '' भगवान छोटी टाहली के दरख़्त की छाया तले अंग्रेजी घास पर पालथी मार बैठ कर फार्म भरने लगा। गुरनैब की नज़रें प्यासे मृग की तरह लड़कियों को ढूंढती चारो ओर चक्कर खाती रही। उसकी नज़रें उतनी देर किसी लड़की के पीछे से न हटती जब तक कि वो नज़र से ओझल न हो जाती .
भगवान अपना फार्म भरने में मगन था ताकि काम जल्दी निपटा कर समय रहते घर पहुँच जाये। इनके पीछे दो लडकियां और फार्म लेकर बैठ गईं। थोड़े समय बाद उनमें से एक लड़की ने फार्म के एक कोने पर पैन की नोक रखकर गुरनैब के आगे कर दिया।
'' यह जी , जरा सा बताइयेगा यहाँ क्या भरना है ?'' किसी लड़की के अचानक बोल सुनकर भगवान का ध्यान फार्म से हट गया। उसने उसी तरह बैठे -बैठे आगे निगाह मारी . मक्खन के पेड़ों की तरह गोरे दो मुलायम पैर उसके सामने काले सैंडिलों में सजे थे। '' इतने सुंदर पैर ! हाय ओये रब्बा ! धन्य है तू बनाने वाला। ' भगवान के तार -तार हुए दिल से निकले शब्द दिल के अंदर ही समा गए। उसने गर्दन ऊपर उठाई , एक खूबसूरत सी लड़की , फूलों के भार से झुकी टहनी की तरह गुरनैब के ऊपर झुकी हुई थी। उसके बालों की दो लटें झुकी होने के कारण उसके चेहरे पर लटक रही थीं। इन जुल्फों के बीच उसका चेहरा अँधेरी रात में चमकते पूरे चाँद की तरह लिशकारे मार रहा था। लम्बी चोटि उसकी पतली कमर पर सोये काले नाग की तरह अडोल पड़ी थी। रेशम जैसी पतली ऊँगलियाँ में पैन गर्व से फुला न समा रहा था। भगवान को यकीन नहीं आ रहा था कि कोई इतना भी सुंदर हो सकता है। उसे याद आया , कभी उसकी दादी , छोटे होते उसे परियों की कहानी सुनाती थी पर आज तो उसने प्रत्यक्ष परी को देख लिया था।
भागू ओये भागू । '' गुरनैब ने भगवान की जाँघ पर धीरे से थपथपाया , ''यार ये भरना जरा सा..'' उसने लड़की से फार्म लेकर भागू को पकड़ा दिया . भगवान ने फार्म पकड़ लिया। उसने ऊपर एक खाने में देखा बड़े ही सुंदर शब्दों में लिखा था ' गुरमीत कौर ' । फार्म पूरी तरह मुकम्मल था। बस कुछ खाली स्थान भरने बाकी थे। भगवान ने वे रिक्त स्थान भी पूरे करवा दिए।
'' बहुत बहुत मेहरबानी जी। '' लड़की ने शुक्रिया अदा किया।
'' नहीं जी , यह तो हमारा फ़र्ज़ बनता था । '' भगवान पेंडू भाषा का 'ती ' छोड़कर 'सी ' पर आ गया था। उसे लड़की का पंजाबी में धन्यवाद करने का ढंग बड़ा अच्छा लगा।
गुरमीत फार्म लेकर अपनी सहेली के पास चली गई। भगवान अपना बाकी का फार्म मुकम्मल करने लगा। लड़की ने पास बैठे भगवान की ओर अपनेपन से भरी नज़रों से दो-तीन बार देखा, ' कितना सीधा , शरीफ और अपना सा है ' लड़की के ज़िस्म के किसी चोर दरवाजे से यह शब्द उसके दिल में बिना कदम -चाल किये जा उतरे पर भगवान अभी भी अपना फार्म भरने में मग्न था। उसे पता नहीं था कि वह कुछ पल के लिए किसी के दिल से हो आया है।
------------------------17 -------------------------
बुढलाडे से चढ़ती ओर एक काले नाग जैसी पतली सड़क कीकरों की खुड्ड में जा घुसती है। उसके आस -पास बड़ी -बड़ी कीकरें वक़्त के मारे मनुष्य की तरह झुकी खड़ी हैं। इनसे हटकर दूर कहीं- कहीं टिब्बे दिखाई देते हैं , जिन पर दूब उगी है और कुछ के ऊपर कोई -कोई नरमे का बूटा कुंभलाया सा खड़ा ,खुश्क मौसम को गालियां देता जान पड़ता है। कभी किसी टिब्बे पर बेरियों के नीचे बैठीं नील गायें खेतों के मालिक बनी बैठी हैं । इन टिब्बियों को चीरती सड़क शेखगढ़ फाटक पर आ जाती है। फाटक फांद कर फाटक की कोठी है। उसके साथ एक ऊँचा दैत्य जैसा वटवृक्ष खड़ा है। जिसके चारो ओर ईटों का चबुतरा बनाकर अड्डे का काम लिया जाता है। इससे दाहिनी ओर झील जैसा पोखर है और बायीं ओर गाँव बसा हुआ है। रेल की पटरी से थोड़ा हटकर एक चौड़ा पहा गाँव के ऊपर से चक्कर काटकर दोबारा फिर इस अड्डे पर आ जाता है। अड्डे से करीब दस घर छोड़कर एक लोहे के गेटों वाली शानदार कोठी है। गेट के एक तरफ पत्थर का सलैब लगा है जिस पर सुनहरे अक्षरों से लिखा है ,'सूबेदार हरबख्श सिंह शेखगढ़। 'कोठी के अंदर जाते ही एक कोने में चरनी पर भैंसे बँधी हुई हैं। आँगन में एक चारपाई बिछी है, जिस पर गुरमीत लेटी हुई है। उसकी नज़रें चौबारे के बनेरे पर बैठे पेडुकी के जोड़े पर टिकी हुई थीं। इनमें से एक नर था और एक मादा। कभी यह जोड़ा प्यार की लोर में अपनी चोंचें टकराने लग पड़ता तो कभी एक आगे-आगे चल पड़ता तो दुसरा उसके पीछे - पीछे। फिर यह दोनों बस स्टैंड के बड़े वटवृक्ष की ओर उडारी मार गए। पर गुरमीत की नज़र अभी भी बनेरे पर टिकी हुई थी। शायद उसे आज भी पहले की तरह किसी का धुंधला सा चेहरा नज़र आने लगा था , जो धीरे-धीरे किसी जाने पहचाने चेहरे में बदल जाता। गुरमीत को खुद को नहीं पता था कि यह चेहरा उसकी आँखों के आगे क्यों आ जाता है। शायद कोई उसकी इज़ाज़त लिए बिना ही चोर रस्ते से उसके दिल में उतर रहा था। वह अपने दिल के उलट इस चेहरे को पहचानने से इंकार करती किसी और काम में तल्लीन हो जाती। इसी तरह आज भी गुरमीत अपनी दिल की निचली परतों में उतर गए इस चेहरे को अनदेखा करती कालेज जाने के लिए बिस्तर से उठकर नहाने चली गई।
गुरमीत का कालेज में आज दसवां दिन था। इन दस दिनों में वह थोड़ी -थोड़ी किसी की सुंदरता की ओर , सीधेपन की ओर खींची चली जा रही थी। उसकी नज़रें छुप -छुप कर रोज किसी के आने का इन्तजार करतीं। उसके आने पर खुश होती और न आने पर मुरझा जाती। आज कितनी ही देर वह चोरी -चोरी अपने महरम को उडीकती रही। . उसकी मायूस नज़रों ने सारा कालेज छान मारा पर उसकी झलक सारे कालेज में कहीं न मिली। वह उदासी के दलदल से पैर घसीटती कैंटीन की और चल पड़ी। कैंटीन के अंदर जाते ही उसने सभी लड़के -लड़कियों पर सरसरी सी निगाह मारी पर उसकी नज़रें यहाँ भी उदासी में गोता खा गईं। वह एक कप चाय का आर्डर करके कोने में खाली पड़े डेस्क पर जा बैठी और लाइब्रेरी से निकाली किताब के पन्ने बिना पढ़े ही पलट -पलट कर देखने लगी।
'' गुरमीत साइड दोगे थोड़ा सा ?'' किसी ने बेध्यान पन्ने पलट रही गुरमीत से कहा।
'' ओह आप ? आओ बैठो। '' गुरमीत भगवान को देखकर खिल उठी। '' आप मेरा नाम कैसे जानते हो ?'' उसने एक ओर हटते हुए भगवान को बैठने के लिए स्थान दे दिया।
'' जिस दिन हम फार्म भरने आये थे , उस दिन देखा था तुम्हारे फार्म पर। '' भगवान गुरमीत संग बैठ गया।
'' अच्छा ! याद है तब का ?'' गुरमीत को ख़ुशी और हैरानी हुई कि इतने समय से वह मेरा नाम नहीं भूला ,'' आपने अपना नाम तो बताया ही नहीं ?''
'' आपने कौन सा पूछा। ''
'' अब पूछ लेते हैं जी। '' गुरमीत के कहने पर दोनों हल्का सा मुस्कुरा पड़े। कैंटीन वाला दोनों की चाय रख गया।
'' मेरा नाम है भगवान। वैसे भागू कहते हैं और पिंड है शांतपुर। गुरमीत आपका कौन सा पिंड है ?'' भगवान को अपना पिंड बताने पर गुरमीत के पिंड का भी ध्यान आ गया।
'' मेरा पिंड है शेखगढ़ '' गुरमीत ने कहा।
'' शेखगढ़ !'' ख़ुशी और हैरानी से भगवान ने कहा , वहाँ तो मेरे दोस्त की बुआ है। मैं भी जाकर आया हूँ एक दो- बार। ''
'' अब आना। ''
'' अगर बुलाओगी तो जरुर आएंगे। ''
'' हमने बुलाया और आप न आये फिर ?'' गुरमीत भगवान को बर्तन की तरह ठोक -ठोक कर देख रही थी , कहीं कच्चा ही न हो।
'' अभी ले चल बेशक। '' भगवान अपनी कहनी और करनी का सबूत दे गया।
'' चलो मान लिया तुझे , जिस दिन मौक़ा आया देखेंगे। '' गुरमीत को भगवान पर सचमुच ही यकीन आ गया था . दोनों ने चाय पी ली। भगवान ने घड़ी पर नज़र मारी। '' अच्छा आ चलें , पंजाबी के पीरियड का समय हो गया है। '' गुरमीत ने जबर्दस्ती चाय के पैसे खुद दे दिए। दोनों पीरियड लगाने चले गए।
------------------0 ----------------
आज कालेज में काफी रौनक थी। आडोटोरियम को दुल्हन की तरह सजाया गया था। नीचे दरियाँ बिछाई गईं थीं। आस -पास कुर्सियां सजा दी गई और कुछ कुर्सियां ख़ास मेहमानों के लिए स्टेज के ऊपर रख दी गई। जजों की कुर्सियाँ स्टेज के सामने एक ओर करके लगा दी गईं। जहां से वे भाग लेने वालों की पेशकारी भी देख सकें और दर्शकों को देखने में भी कोई अड़चन न आये। सारे आडोटोरियम की अंदर की दीवारों के आस -पास भी अच्छी सजावट की गई। कालेज में पढ़ने वाले लड़के -लडकियां बगीचे में खिले रंग - बिरंगे फूलों के से कपड़े पहने तितलियों की तरह घूम रहे थे। कविता पाठ का समय दस बजे रखा गया था पर जज साढ़े दस के करीब आये। उनके आते ही लड़के -लडकियां बिछी दरियों पर आकर बैठने लगे।
आडोटोरियम के गेट के आगे भगवान को गुरमीत मिल गई।
'' आप लोगे भाग मुकाबले में ?'' गुरमीत ने भगवान के पास जाकर पूछा।
'' ले लूँ ?''
''जरुर लो। ''
'' अगर आप कहते हो तो जरुर भाग लेंगे। ''
'' हमारे कहने से कौन लेता है , नाम तो आपने सबसे पहले लिखा रखा है। ''
'' आपको कैसे पता ?'' भगवान को ख़ुशी भरी हैरानी हुई कि उसके भाग लेने के बारे में गुरमीत को पता है।
'' मैंने मेरी सहेली अमन को पूछे थे सभी भाग लेने वालों के नाम .''
'' वह भी लेगी भाग ?''
'' हाँ। ''
'' चलो देखते हैं फिर क्या बनता है। '' भगवान और गुरमीत अंदर दरियों के ऊपर जा बैठे।
स्टेज संचालक ने स्टेज संभाला और बोलना शुरू किया , '' सबसे पहले मैं अपने कीमती समय से समय निकाल कर यहाँ पहुंचे जज साहेबानों , प्रिंसिपल डॉ हरनाम सिंह , समूह स्टाफ और बहुत ही प्यारे विद्द्यार्थियों का धन्यवाद करता हूँ। हम जो हर साल कविता पाठ मुकाबला करवाते हैं वह शुभ दिन आज फिर आया है। इस बार इस मुकाबले में बीस विद्द्यार्थी भाग ले रहे हैं। विद्द्यार्थियों को बता दें कि जो विद्द्यार्थी अपनी मौलिक कविता बोलेगा , उसके अलग नम्बर दिए जायेंगे। समय बहुत हो गया है इसलिए मैं और समय न लेता हुआ सब से पहले बुला रहा हूँ बी ए. भाग दो की छात्रा अमनदीप कौर को कि वह अपनी रचना लेकर स्टेज पर आये। ''
अमनदीप ने पहले कविता की अच्छी भूमिका बाँधी और फिर बड़ी ही सुरीली आवाज़ में कविता बोली। कविता खत्म होते ही सारा हाल तालियों से गूंज उठा। उसके बाद सुखजीत की बारी आई। फिर डिम्पल , महिंदर , रेनू , करमजीत और बलजीत। बलजीत के बाद फिर संचालक ने स्टेज सम्भाली , '' दोस्तों सबको अपना साजन अर्श से उतरा जान पड़ता है। कोई अपने साजन की फूलों से तुलना करता है तो कोई चाँद तारों से, तो किसी को वह सूरज का जाया महसूस होता है। किसी का साजन चाहे कैसा भी हो पर उसे वह सारे जग से न्यारा ही लगेगा। कहते हैं कि एक बार मजनू को किसी ने कह दिया कि तेरी लैला सुंदर नहीं तो उसने जवाब दिया कि आप मेरी आँखों से देख कर देखो , सारे जहां से सुंदर लगेगी। सो दोस्तों , अपने साजन के हुस्न , सादगी की महिमा गाती अपनी मौलिक रचना लेकर आ रहे हैं भगवान सिंह। '' जब भगवान स्टेज पर चढ़ा तो गुरमीत ने जोर -जोर से तालियाँ बजाईं। भगवान ने स्टेज पर जाकर सबसे पहले सारे मेहमानों और दर्शकों का धन्यवाद किया और फिर पूरी लय-ताल से अपनी कविता गानी शुरू की …
' सज्जण साडे हुस्न पिटारी
परियां दी ओह जाई
तक्क हुस्न नूं चन्न -चानणी
हेठी विच शरमाई ....
सज्जण साडे फुल्ल सुगन्धिआं
सब कूटीं महकाई
भोरे आये झलकी देखण
बागी पई दुहाई ....
भगवान आँखें बंद किये दिल से गाता रहा। सारा हॉल सन्नाटे में डूबा उसके बोलों के साथ ही बह चला था। जब कविता खत्म हुई तो सभी भोंचक्के से जैसे सपने से जाग पड़े हों। सारा हाल तालियों से गूंज उठा।
बारी -बारी सभी विद्द्यार्थी अपनी -अपनी कवितायें सुनाकर चले गए। स्टेज संचालक जजों से नतीजा ले आया , '' दोस्तों , जिसका आप सब अब तक बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं , वह नतीजा आपके सामने लेकर आएंगे हमारे जज साहेबान गुरकीरत सिंह खहरा जी। ''
खहरा ने आकर स्टेज सम्भाली ,'' विद्द्यार्थियो मुझे बड़ी खुशी हो रही है कि आप सब कविता पाठ मुकाबला करवाने की परम्परा हर साल निभाते आ रहे हो। जो आज यहाँ कवितायेँ बोली गईं , वे आपका एक अच्छे लेखक बनने का संदेशा देती हैं। प्यारे विद्द्यार्थियो ! असल में तो सबसे बड़े जज दर्शक होते हैं , जो अपनी तालियों से फैसला कर देते हैं पर फिर भी कविता के कुछ नियम हैं , जिन्हें सामने रख नतीजा तैयार करना पड़ता है। हमें यहाँ नतीजा तैयार करने में बड़ी मुश्किलें आईं क्योंकि यहाँ सभी ने बहुत ही अच्छी कवितायेँ पढ़ी और गाई हैं पर फिर भी कुछ अंतर निकाल कर नतीजा तैयार किया गया है। तीसरे स्थान पर हमें तीन विद्द्यार्थी रखने पड़े , जिनके नाम हैं , रेनू , करमा और बलविंदर .''
सारे हाल में जोर की तालियां बजीं। तीनों विद्द्यार्थी अपना इनाम लेकर बैठ गए।
'' दूसरे नम्बर पर रहा है तरसेम सिंह और अब पहले नम्बर की बारी है। पहले नम्बर पर भी हमें दो विद्द्यार्थी चुनने पड़े हैं। पहला नाम है अमनदीप कौर और दुसरा नाम है भगवान सिंह। '' तालियों के शोर में दोनों ने अपने -अपने इनाम प्राप्त किये। गुरमीत ने तालियां मार -मार कर अपने हाथ लाल कर लिए। सारे विद्द्यार्थी अपने जीते हुए मित्रों को बधाई देने लगे। तीन बजे तक प्रोग्राम खत्म हो गया . भगवान अपना इनाम लेकर आडोटोरियम से बाहर आ गया।
'' बधाई भागू। '' गुरमीत और अमन ने दो लड़कों के साथ जा रहे भागू को पीछे से आकर कहा।
'' आपको भी बहुत -बहुत बधाई , कमाल कर दिया अमन जी आपने। '' भगवान ने सत्कार के तौर पर अमनदीप की तारीफ की।
'' हम कौन सा किसी से कम हैं। '' अमन ने ख़ुशी में छाती तान ली और शरारती आँखें भगवान के चेहरे पर गड़ा दीं ।
' भागू जी आज मैंने आपको एक और तोहफा देना है। '' गुरमीत काँपते हुए दिल से कह गई। उसे यकीन था कि भगवान उसका तोहफा कबूल कर लेगा।
'' लाओ जल्दी दो जी फिर। '' भगवान ने अपना एक हाथ गुरमीत के आगे बढ़ा दिया।
'' यहाँ नहीं मिलेगा तोहफा , क्या पता सबके सामने लेने से इंकार कर दो। '' गुरमीत भगवान और अमन को दरख्तों के बीच बनी चौकड़ी की ओर ले गई।
'' ऐसा कौन सा तोहफा है जो यहाँ दिया जायेगा ?'' भगवान हैरान था।
'' मैं .... मैं .... मैं … आपको प्यार करती हूँ। '' गुरमीत ने बिना किसी भूमिका के जल्दी से कह डाला ।
'' क्या ?'' भगवान की हैरानी में प्रश्न चिन्ह बनी आँखें गुरमीत के चेहरे से सच्चाई जानने में जुट गईं।
'' हाँ भागू, मैं आपको बहुत चाहती हूँ। मार दो चाहे छोड़ दो। '' गुरमीत ने चेहरा दरवेशों की तरह बना लिया।
'' पर मैंने तो आपको अपना दोस्त समझा था। ''
'' मैंने आपको अपना रब्ब माना है। '' गुरमीत ने भगवान का हाथ पकड़ लिया।
'' मेरे साथ पहले धोखा हो चुका है। मैं नहीं चाहता बार -बार मेरे साथ वही हो। '' भगवान की आँखों के आगे किरना का बेवफा चेहरा घूम गया।
'' यकीन नहीं तो अभी ले चलो साथ। मैं तो तुम्हारे बिना मर जाऊँगी भागू . भ .... भागू अगर प्यार नहीं देना तो अपने सीने से भींच कर मार डाल मुझे। '' गुरमीत पल में ही भावुक हो गई। उसकी झील सी आँखें भर आईं। उनमें से दो गर्म बूंदें उसके गुलाबी गालों से होते हुए नीचे की ओर बह चलीं ।
'' अरे पगली ! मैं तो मज़ाक कर रहा था , मैं भी चाहता हूँ तुम्हें। '' भगवान गुरमीत के आगे पिघल कर मोम हो गया। भगवान की 'हाँ ' सुनकर गुरमीत की गुलाबी गालें मुस्कान से और गाढ़ी हो गईं।
'' अब तो भई पार्टी बनती है गुरमीत '.' अमन ने शरारत से गुरमीत की कमर में चिकुटी काटी।
'' चल चले फिर। '' भगवान के कहने पर तीनों वहाँ से उठकर चल पड़े। गुरमीत आज बहुत खुश थी। उसका ख़ुशी से अंतर् भरा पड़ा था। सारा कालेज ही उसे अब अपना -अपना सा लगने लगा था। वह ख़ुशी में हिलोरे लेती भगवान के साथ सीना तानकर बराबर चल रही थी। वह सबको बताना चाहती थी कि भगवान अब उसका हो गया है। वह आगे से हर टकराने को छुपी नज़रों से देखती। वह चाहती थी कि हर पार होने वाला उसके साथ चल रहे नौजवान की ओर जरुर देखे और उनकी जोड़ी की तारीफ़ करे। गुरमीत कभी -कभी जानकार साथ चल रहे भागू से सट कर आनंद लेती। चौक में आकर तीनों ' संगम स्वीट हॉउस ' में जा घुसे। गुरमीत ने उन्हें ना -ना करते जबरदस्ती चाय के साथ बर्फी खिलाई। फिर वहाँ से ये बस स्टैंड आ गए। भगवान की बस चलने वाली थी। उसने जल्दी -जल्दी दोनों से जाने की इज़ाज़त माँगी। गुरमीत का दिल किया कि वह जाते समय भगवान को बाहों में भींच ले पर वह भरी भीड़ में ऐसा कैसे कर सकती थी ? उसने अपने दिल में उठे उस बलबले को वहीं दबा लिया। बस में चढ़े भगवान ने खिड़की की ओर खड़े होकर दोनों की ओर देखा। दोनों ख़ुशी से मुस्कुरा पड़ीं . बस चल पड़ी। गुरमीत को जाती हुई बस पर गुस्सा आया पर दूसरे ही पल उसे यह बस बड़ी प्यारी लगी कि यह बस ही कल उसके भगवान को दुबारा लेकर आएगी। उसका दिल किया कि वह चली जा रही बस को चूम ले पर बस 'ड .... र .... र ' करती बस अड्डे से निकल कर सड़क पर आ गई। पीछे की धूल ने बस को ढक लिया और वह धूल में गुम होती -होती आलोप हो गई।
'' किधर है तेरा कालेज ?'' गुरनैब ने कुछ सोच रहे भगवान को पूछा।
'' मुझे तो खुद नहीं पता , मैं सोच रहा था कि अगर रिक्शा कर लें तो खुद ही छोड़ देगा। ''
'' ऐसे भी ठीक है। '' गुरनैब ने सहमति जताई।
'' दोनों ने दस रूपए में रिक्शा कर लिया। रिक्शा चालक ने दोनों को रिक्शे में बैठा कर पहले थोड़ी दूरी तक पैदल भाग कर रिक्शे को धकेला जब रिक्शे ने तेजी पकड़ ली तब दाहिना पैर दाहिने पैडल पर रखकर बांया, बांये पैडल पर टिका लिया। फिर ऊपर के पैडल पर शरीर का सारा भार देकर रिक्शे की रफ़्तार तेज कर ली। रिक्शा अड्डे से अब चौड़े बाज़ार की ओर बढ़ चला था। बाज़ार के दोनों ओर दुकानों की लम्बी कतार थी जिनपर अलग -अलग बोर्ड लटक रहे थे , 'कपडे दा सस्ता डिपू' , 'पप्पू दी हट्टी' ,'इंजन दा समान एत्थे मिलदा है' ,चूड़ियाँ ही चूड़ियाँ और बुक स्टॉल। बुक स्टॉल पर नज़र पड़ते ही भगवान ने रिक्शा रुकवा लिया।
'' क्यों क्या हो गया ?'' भगवान के अचानक रिक्शा रुकवाने पर गुरनैब हैरान हो गया।
'' कोई किताब देख लें। '' भगवान ने कहा।
दोनों दुकान में चले गए। दुकानदार ने गाहक को आता देखकर बनावटी सी हँसी हँसते हुए ' आओ जी ' कहा। भगवान ने दुकान पर सजाई किताबों पर जल्दी -जल्दी नज़र डाली और फिर एक शीशे के अंदर सजाये दो नॉवेल नानक सिंह का ' चिट्टा लहू ' और जसवंत सिंह कंवल का ' पूरनमासी ' निकाल लिए। किताबें खरीद कर वे दोबारा रिक्शे में आ बैठे। रिक्शा चालक ने रिक्शा फिर उसी रफ़्तार में ले लिया। वह दुकानों को ' हट्ट पीछे ' कहता अपनी मंज़िल की ओर सरपट दौड़ा जा रहा था। रिक्शे के तीनों टायर तेज रफ़्तार होने के कारण तारों रहित दिखाई दे रहे थे। रिक्शा चालक के सर से पसीने की धारें नीचे की ओर बह चलीं थीं । पीठ के पीछे से उसका कुरता पसीने से चिपक गया था । सर की सेध पर पड़ रहे सूरज की किरणें गर्म तकले की तरह बदन में चुभ रही थीं। आगे एक ऊँची बिल्डिंग ने सड़क को दो हिस्सों में बाँट दिया था। रिक्शा दाहिनी ओर जाती सड़क पर मुड़ गया । थोड़ी दूर जाकर रिक्शा एक चौड़े गेट के पास जा रुका। कालेज आ गया था।
'' कहीं यूँ ही मत ऊट -पटांग बक देना कुछ यहाँ । '' भगवान ने कालेज में आते -जाते लड़के -लड़कियों की ओर देख कर कहा।
'' भागू तुम क्यों डरते हो ?'' गुरनैब ने भगवान के कंधे पर धीरे से थपकी दी।
दोनों गेट के अंदर आ गए। सामने से दो सुनहरी सूटों में सजी लड़कियां मटक -मटक चली आ रही थीं। गुरनैब से देख कर रहा न गया। उसने लड़कियों के बराबर आने पर चुटकी छोड़ दी , '' आय -हाय पर्सिनिये , मर जां पूछ तड़ा के। ''
'' ओये मरवाएगा साले। '' भगवान ने उसकी कमर में चिकुटी काटी।
'' तुझे क्या होता है यार , पड़ेगी तो मुझे पड़ेगी। ''
'' न मैं क्या उनकी बूआ का बेटा लगता हूँ , मुझे भी वो साथ ही रगड़ेंगे। ''
'' अच्छा अब नहीं छेड़ता बस। '' गुरनैब ने उसे तसल्ली देते हुए कहा।
'' भाई जी प्रॉस्पेक्ट कहाँ मिलता है …?''भगवान ने सामने पार्क में खड़े दो लड़कों से पूछा।
भाई वो जो सामने शटर दिख रहा है न , वहीँ खिड़की में कलर्क बैठा है , वहीँ मिलते हैं। '' उनमें से पगड़ी वाले लड़के ने एक कमरे के आगे लगे लोहे के शटर की ओर इशारा किया , जहाँ एक दो लड़के प्रोस्पेक्ट लेने के लिए खड़े थे।
'' तू यहाँ बैठ मैं लेकर आता हूँ। '' भगवान ने पार्क में बनी सीमेंट की कंधोली की ओर इशारा कर दिया और खुद प्रोस्पेक्ट लेने चला गया। गुरनैब उसके ऊपर बैठने के बजाये उसके ऊपर दाहिना पैर रख कर खड़ा हो गया। पार्क में कटा अंग्रेजी घास किसी की ताज़ी कटी घनी दाढ़ी की तरह आपस में फँसा खड़ा था। पार्क के आस -पास बनी पतली -पतली क्यारियों में खिले रंग -बिरंगे कोमल फूल , कालेज में रंग -बिरंगे सूटों में सजी कोमल शरीरों वाली लड़कियों की तरह हँस रहे थे। पतली क्यारी बीच के फूलों को माली खुरपी से गुड़ाई करते हुए उसके अंदर की झाड़ - झंखाड़ को बाहर फेंक रहा था। बाहर फुदकती चिर -चिर करती गुटारें उस घास -फूस से भोजन ढूंढने की कोशिश में जुटी हुई थीं। गुरनैब ने पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर चेहरे पर आई पसीने की बूँदें पोंछ लीं। फिर अपनी कमीज का ऊपर का बटन खोल कर रुमाल से हवा करने लगा। पार्क के सामने की पगडण्डी के ऊपर बाजरे के सिट्टे की तरह इकहरी सी लड़की को आते देख कर गुरनैब की आँखों में एक चमक सी आ गई। वह अपने आप को कुछ कहने के लिए तैयार करने लगा।
'' ओये होए रब्बा ! फुर्सत में बैठकर बनाया है लगता है '' गुरनैब ने लड़की के पास आते ही हिम्मत करके कह ही दिया पर लड़की बिना कुछ बोले ऊँची हिल की सैंडिल से टक -टक करती पास से गुजरने लगी।
'' नहीं कुछ बोलना तो गाली ही निकाल दो . ये तो मान लूँगा कि बोल पड़ी .''
लड़की कुछ पल के लिए रुक गई। गुरनैब के दिल की धड़कन इंजन की तरह 'ठक -ठक -ठक ' बजने लगी। शरीर काँप गया। माथे पर पसीना उभर आया। आँखें ऊपर उठ गईं '' मितरा चड़िआ रगड़ा '' गुरनैब ने झट सोच लिया। लड़की ने पीछे मुड़ कर देखा। उसके मुस्कान से पतले गुलाबी होंठ चौड़े हो गए और उन होठों से सफेद मोतियों से चमकते दांत गुरनैब के दिल में आ घुसे। लड़की महकती सी हँसी देकर आगे बढ़ गई पर गुरनैब के होश ठिकाने से हिल गए। उसने लोर में आकर दोनों हाथों की ऊँगलियाँ आपस में फँसा कर दबा लीं।
'' हटा नहीं कारस्तानी करने से । '' भगवान ने आते -आते लड़की को हँसते देख लिया था।
'' भाई जान निकालकर ले गई कंजर की , मैं तो कहता हूँ मुझे यहीं दाखिला दिला दे । '' गुरनैब के अंदर प्यार की तरंगों का भूचाल आया पड़ा था।
'' दसवीं में तो चार बार फेल हो गए , दाखिला किसमें दिलाऊं तुम्हें। ''
'' और कुछ नहीं तो माली ही रखवा दे , बस दर्शन करके ही निहाल हो जाया करूंगा । ''
'' तुझे तो बस यही सपने आते रहते हैं , चल छोड़ , आ फार्म भरें। '' भगवान छोटी टाहली के दरख़्त की छाया तले अंग्रेजी घास पर पालथी मार बैठ कर फार्म भरने लगा। गुरनैब की नज़रें प्यासे मृग की तरह लड़कियों को ढूंढती चारो ओर चक्कर खाती रही। उसकी नज़रें उतनी देर किसी लड़की के पीछे से न हटती जब तक कि वो नज़र से ओझल न हो जाती .
भगवान अपना फार्म भरने में मगन था ताकि काम जल्दी निपटा कर समय रहते घर पहुँच जाये। इनके पीछे दो लडकियां और फार्म लेकर बैठ गईं। थोड़े समय बाद उनमें से एक लड़की ने फार्म के एक कोने पर पैन की नोक रखकर गुरनैब के आगे कर दिया।
'' यह जी , जरा सा बताइयेगा यहाँ क्या भरना है ?'' किसी लड़की के अचानक बोल सुनकर भगवान का ध्यान फार्म से हट गया। उसने उसी तरह बैठे -बैठे आगे निगाह मारी . मक्खन के पेड़ों की तरह गोरे दो मुलायम पैर उसके सामने काले सैंडिलों में सजे थे। '' इतने सुंदर पैर ! हाय ओये रब्बा ! धन्य है तू बनाने वाला। ' भगवान के तार -तार हुए दिल से निकले शब्द दिल के अंदर ही समा गए। उसने गर्दन ऊपर उठाई , एक खूबसूरत सी लड़की , फूलों के भार से झुकी टहनी की तरह गुरनैब के ऊपर झुकी हुई थी। उसके बालों की दो लटें झुकी होने के कारण उसके चेहरे पर लटक रही थीं। इन जुल्फों के बीच उसका चेहरा अँधेरी रात में चमकते पूरे चाँद की तरह लिशकारे मार रहा था। लम्बी चोटि उसकी पतली कमर पर सोये काले नाग की तरह अडोल पड़ी थी। रेशम जैसी पतली ऊँगलियाँ में पैन गर्व से फुला न समा रहा था। भगवान को यकीन नहीं आ रहा था कि कोई इतना भी सुंदर हो सकता है। उसे याद आया , कभी उसकी दादी , छोटे होते उसे परियों की कहानी सुनाती थी पर आज तो उसने प्रत्यक्ष परी को देख लिया था।
भागू ओये भागू । '' गुरनैब ने भगवान की जाँघ पर धीरे से थपथपाया , ''यार ये भरना जरा सा..'' उसने लड़की से फार्म लेकर भागू को पकड़ा दिया . भगवान ने फार्म पकड़ लिया। उसने ऊपर एक खाने में देखा बड़े ही सुंदर शब्दों में लिखा था ' गुरमीत कौर ' । फार्म पूरी तरह मुकम्मल था। बस कुछ खाली स्थान भरने बाकी थे। भगवान ने वे रिक्त स्थान भी पूरे करवा दिए।
'' बहुत बहुत मेहरबानी जी। '' लड़की ने शुक्रिया अदा किया।
'' नहीं जी , यह तो हमारा फ़र्ज़ बनता था । '' भगवान पेंडू भाषा का 'ती ' छोड़कर 'सी ' पर आ गया था। उसे लड़की का पंजाबी में धन्यवाद करने का ढंग बड़ा अच्छा लगा।
गुरमीत फार्म लेकर अपनी सहेली के पास चली गई। भगवान अपना बाकी का फार्म मुकम्मल करने लगा। लड़की ने पास बैठे भगवान की ओर अपनेपन से भरी नज़रों से दो-तीन बार देखा, ' कितना सीधा , शरीफ और अपना सा है ' लड़की के ज़िस्म के किसी चोर दरवाजे से यह शब्द उसके दिल में बिना कदम -चाल किये जा उतरे पर भगवान अभी भी अपना फार्म भरने में मग्न था। उसे पता नहीं था कि वह कुछ पल के लिए किसी के दिल से हो आया है।
------------------------17 -------------------------
बुढलाडे से चढ़ती ओर एक काले नाग जैसी पतली सड़क कीकरों की खुड्ड में जा घुसती है। उसके आस -पास बड़ी -बड़ी कीकरें वक़्त के मारे मनुष्य की तरह झुकी खड़ी हैं। इनसे हटकर दूर कहीं- कहीं टिब्बे दिखाई देते हैं , जिन पर दूब उगी है और कुछ के ऊपर कोई -कोई नरमे का बूटा कुंभलाया सा खड़ा ,खुश्क मौसम को गालियां देता जान पड़ता है। कभी किसी टिब्बे पर बेरियों के नीचे बैठीं नील गायें खेतों के मालिक बनी बैठी हैं । इन टिब्बियों को चीरती सड़क शेखगढ़ फाटक पर आ जाती है। फाटक फांद कर फाटक की कोठी है। उसके साथ एक ऊँचा दैत्य जैसा वटवृक्ष खड़ा है। जिसके चारो ओर ईटों का चबुतरा बनाकर अड्डे का काम लिया जाता है। इससे दाहिनी ओर झील जैसा पोखर है और बायीं ओर गाँव बसा हुआ है। रेल की पटरी से थोड़ा हटकर एक चौड़ा पहा गाँव के ऊपर से चक्कर काटकर दोबारा फिर इस अड्डे पर आ जाता है। अड्डे से करीब दस घर छोड़कर एक लोहे के गेटों वाली शानदार कोठी है। गेट के एक तरफ पत्थर का सलैब लगा है जिस पर सुनहरे अक्षरों से लिखा है ,'सूबेदार हरबख्श सिंह शेखगढ़। 'कोठी के अंदर जाते ही एक कोने में चरनी पर भैंसे बँधी हुई हैं। आँगन में एक चारपाई बिछी है, जिस पर गुरमीत लेटी हुई है। उसकी नज़रें चौबारे के बनेरे पर बैठे पेडुकी के जोड़े पर टिकी हुई थीं। इनमें से एक नर था और एक मादा। कभी यह जोड़ा प्यार की लोर में अपनी चोंचें टकराने लग पड़ता तो कभी एक आगे-आगे चल पड़ता तो दुसरा उसके पीछे - पीछे। फिर यह दोनों बस स्टैंड के बड़े वटवृक्ष की ओर उडारी मार गए। पर गुरमीत की नज़र अभी भी बनेरे पर टिकी हुई थी। शायद उसे आज भी पहले की तरह किसी का धुंधला सा चेहरा नज़र आने लगा था , जो धीरे-धीरे किसी जाने पहचाने चेहरे में बदल जाता। गुरमीत को खुद को नहीं पता था कि यह चेहरा उसकी आँखों के आगे क्यों आ जाता है। शायद कोई उसकी इज़ाज़त लिए बिना ही चोर रस्ते से उसके दिल में उतर रहा था। वह अपने दिल के उलट इस चेहरे को पहचानने से इंकार करती किसी और काम में तल्लीन हो जाती। इसी तरह आज भी गुरमीत अपनी दिल की निचली परतों में उतर गए इस चेहरे को अनदेखा करती कालेज जाने के लिए बिस्तर से उठकर नहाने चली गई।
गुरमीत का कालेज में आज दसवां दिन था। इन दस दिनों में वह थोड़ी -थोड़ी किसी की सुंदरता की ओर , सीधेपन की ओर खींची चली जा रही थी। उसकी नज़रें छुप -छुप कर रोज किसी के आने का इन्तजार करतीं। उसके आने पर खुश होती और न आने पर मुरझा जाती। आज कितनी ही देर वह चोरी -चोरी अपने महरम को उडीकती रही। . उसकी मायूस नज़रों ने सारा कालेज छान मारा पर उसकी झलक सारे कालेज में कहीं न मिली। वह उदासी के दलदल से पैर घसीटती कैंटीन की और चल पड़ी। कैंटीन के अंदर जाते ही उसने सभी लड़के -लड़कियों पर सरसरी सी निगाह मारी पर उसकी नज़रें यहाँ भी उदासी में गोता खा गईं। वह एक कप चाय का आर्डर करके कोने में खाली पड़े डेस्क पर जा बैठी और लाइब्रेरी से निकाली किताब के पन्ने बिना पढ़े ही पलट -पलट कर देखने लगी।
'' गुरमीत साइड दोगे थोड़ा सा ?'' किसी ने बेध्यान पन्ने पलट रही गुरमीत से कहा।
'' ओह आप ? आओ बैठो। '' गुरमीत भगवान को देखकर खिल उठी। '' आप मेरा नाम कैसे जानते हो ?'' उसने एक ओर हटते हुए भगवान को बैठने के लिए स्थान दे दिया।
'' जिस दिन हम फार्म भरने आये थे , उस दिन देखा था तुम्हारे फार्म पर। '' भगवान गुरमीत संग बैठ गया।
'' अच्छा ! याद है तब का ?'' गुरमीत को ख़ुशी और हैरानी हुई कि इतने समय से वह मेरा नाम नहीं भूला ,'' आपने अपना नाम तो बताया ही नहीं ?''
'' आपने कौन सा पूछा। ''
'' अब पूछ लेते हैं जी। '' गुरमीत के कहने पर दोनों हल्का सा मुस्कुरा पड़े। कैंटीन वाला दोनों की चाय रख गया।
'' मेरा नाम है भगवान। वैसे भागू कहते हैं और पिंड है शांतपुर। गुरमीत आपका कौन सा पिंड है ?'' भगवान को अपना पिंड बताने पर गुरमीत के पिंड का भी ध्यान आ गया।
'' मेरा पिंड है शेखगढ़ '' गुरमीत ने कहा।
'' शेखगढ़ !'' ख़ुशी और हैरानी से भगवान ने कहा , वहाँ तो मेरे दोस्त की बुआ है। मैं भी जाकर आया हूँ एक दो- बार। ''
'' अब आना। ''
'' अगर बुलाओगी तो जरुर आएंगे। ''
'' हमने बुलाया और आप न आये फिर ?'' गुरमीत भगवान को बर्तन की तरह ठोक -ठोक कर देख रही थी , कहीं कच्चा ही न हो।
'' अभी ले चल बेशक। '' भगवान अपनी कहनी और करनी का सबूत दे गया।
'' चलो मान लिया तुझे , जिस दिन मौक़ा आया देखेंगे। '' गुरमीत को भगवान पर सचमुच ही यकीन आ गया था . दोनों ने चाय पी ली। भगवान ने घड़ी पर नज़र मारी। '' अच्छा आ चलें , पंजाबी के पीरियड का समय हो गया है। '' गुरमीत ने जबर्दस्ती चाय के पैसे खुद दे दिए। दोनों पीरियड लगाने चले गए।
------------------0 ----------------
आज कालेज में काफी रौनक थी। आडोटोरियम को दुल्हन की तरह सजाया गया था। नीचे दरियाँ बिछाई गईं थीं। आस -पास कुर्सियां सजा दी गई और कुछ कुर्सियां ख़ास मेहमानों के लिए स्टेज के ऊपर रख दी गई। जजों की कुर्सियाँ स्टेज के सामने एक ओर करके लगा दी गईं। जहां से वे भाग लेने वालों की पेशकारी भी देख सकें और दर्शकों को देखने में भी कोई अड़चन न आये। सारे आडोटोरियम की अंदर की दीवारों के आस -पास भी अच्छी सजावट की गई। कालेज में पढ़ने वाले लड़के -लडकियां बगीचे में खिले रंग - बिरंगे फूलों के से कपड़े पहने तितलियों की तरह घूम रहे थे। कविता पाठ का समय दस बजे रखा गया था पर जज साढ़े दस के करीब आये। उनके आते ही लड़के -लडकियां बिछी दरियों पर आकर बैठने लगे।
आडोटोरियम के गेट के आगे भगवान को गुरमीत मिल गई।
'' आप लोगे भाग मुकाबले में ?'' गुरमीत ने भगवान के पास जाकर पूछा।
'' ले लूँ ?''
''जरुर लो। ''
'' अगर आप कहते हो तो जरुर भाग लेंगे। ''
'' हमारे कहने से कौन लेता है , नाम तो आपने सबसे पहले लिखा रखा है। ''
'' आपको कैसे पता ?'' भगवान को ख़ुशी भरी हैरानी हुई कि उसके भाग लेने के बारे में गुरमीत को पता है।
'' मैंने मेरी सहेली अमन को पूछे थे सभी भाग लेने वालों के नाम .''
'' वह भी लेगी भाग ?''
'' हाँ। ''
'' चलो देखते हैं फिर क्या बनता है। '' भगवान और गुरमीत अंदर दरियों के ऊपर जा बैठे।
स्टेज संचालक ने स्टेज संभाला और बोलना शुरू किया , '' सबसे पहले मैं अपने कीमती समय से समय निकाल कर यहाँ पहुंचे जज साहेबानों , प्रिंसिपल डॉ हरनाम सिंह , समूह स्टाफ और बहुत ही प्यारे विद्द्यार्थियों का धन्यवाद करता हूँ। हम जो हर साल कविता पाठ मुकाबला करवाते हैं वह शुभ दिन आज फिर आया है। इस बार इस मुकाबले में बीस विद्द्यार्थी भाग ले रहे हैं। विद्द्यार्थियों को बता दें कि जो विद्द्यार्थी अपनी मौलिक कविता बोलेगा , उसके अलग नम्बर दिए जायेंगे। समय बहुत हो गया है इसलिए मैं और समय न लेता हुआ सब से पहले बुला रहा हूँ बी ए. भाग दो की छात्रा अमनदीप कौर को कि वह अपनी रचना लेकर स्टेज पर आये। ''
अमनदीप ने पहले कविता की अच्छी भूमिका बाँधी और फिर बड़ी ही सुरीली आवाज़ में कविता बोली। कविता खत्म होते ही सारा हाल तालियों से गूंज उठा। उसके बाद सुखजीत की बारी आई। फिर डिम्पल , महिंदर , रेनू , करमजीत और बलजीत। बलजीत के बाद फिर संचालक ने स्टेज सम्भाली , '' दोस्तों सबको अपना साजन अर्श से उतरा जान पड़ता है। कोई अपने साजन की फूलों से तुलना करता है तो कोई चाँद तारों से, तो किसी को वह सूरज का जाया महसूस होता है। किसी का साजन चाहे कैसा भी हो पर उसे वह सारे जग से न्यारा ही लगेगा। कहते हैं कि एक बार मजनू को किसी ने कह दिया कि तेरी लैला सुंदर नहीं तो उसने जवाब दिया कि आप मेरी आँखों से देख कर देखो , सारे जहां से सुंदर लगेगी। सो दोस्तों , अपने साजन के हुस्न , सादगी की महिमा गाती अपनी मौलिक रचना लेकर आ रहे हैं भगवान सिंह। '' जब भगवान स्टेज पर चढ़ा तो गुरमीत ने जोर -जोर से तालियाँ बजाईं। भगवान ने स्टेज पर जाकर सबसे पहले सारे मेहमानों और दर्शकों का धन्यवाद किया और फिर पूरी लय-ताल से अपनी कविता गानी शुरू की …
' सज्जण साडे हुस्न पिटारी
परियां दी ओह जाई
तक्क हुस्न नूं चन्न -चानणी
हेठी विच शरमाई ....
सज्जण साडे फुल्ल सुगन्धिआं
सब कूटीं महकाई
भोरे आये झलकी देखण
बागी पई दुहाई ....
भगवान आँखें बंद किये दिल से गाता रहा। सारा हॉल सन्नाटे में डूबा उसके बोलों के साथ ही बह चला था। जब कविता खत्म हुई तो सभी भोंचक्के से जैसे सपने से जाग पड़े हों। सारा हाल तालियों से गूंज उठा।
बारी -बारी सभी विद्द्यार्थी अपनी -अपनी कवितायें सुनाकर चले गए। स्टेज संचालक जजों से नतीजा ले आया , '' दोस्तों , जिसका आप सब अब तक बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं , वह नतीजा आपके सामने लेकर आएंगे हमारे जज साहेबान गुरकीरत सिंह खहरा जी। ''
खहरा ने आकर स्टेज सम्भाली ,'' विद्द्यार्थियो मुझे बड़ी खुशी हो रही है कि आप सब कविता पाठ मुकाबला करवाने की परम्परा हर साल निभाते आ रहे हो। जो आज यहाँ कवितायेँ बोली गईं , वे आपका एक अच्छे लेखक बनने का संदेशा देती हैं। प्यारे विद्द्यार्थियो ! असल में तो सबसे बड़े जज दर्शक होते हैं , जो अपनी तालियों से फैसला कर देते हैं पर फिर भी कविता के कुछ नियम हैं , जिन्हें सामने रख नतीजा तैयार करना पड़ता है। हमें यहाँ नतीजा तैयार करने में बड़ी मुश्किलें आईं क्योंकि यहाँ सभी ने बहुत ही अच्छी कवितायेँ पढ़ी और गाई हैं पर फिर भी कुछ अंतर निकाल कर नतीजा तैयार किया गया है। तीसरे स्थान पर हमें तीन विद्द्यार्थी रखने पड़े , जिनके नाम हैं , रेनू , करमा और बलविंदर .''
सारे हाल में जोर की तालियां बजीं। तीनों विद्द्यार्थी अपना इनाम लेकर बैठ गए।
'' दूसरे नम्बर पर रहा है तरसेम सिंह और अब पहले नम्बर की बारी है। पहले नम्बर पर भी हमें दो विद्द्यार्थी चुनने पड़े हैं। पहला नाम है अमनदीप कौर और दुसरा नाम है भगवान सिंह। '' तालियों के शोर में दोनों ने अपने -अपने इनाम प्राप्त किये। गुरमीत ने तालियां मार -मार कर अपने हाथ लाल कर लिए। सारे विद्द्यार्थी अपने जीते हुए मित्रों को बधाई देने लगे। तीन बजे तक प्रोग्राम खत्म हो गया . भगवान अपना इनाम लेकर आडोटोरियम से बाहर आ गया।
'' बधाई भागू। '' गुरमीत और अमन ने दो लड़कों के साथ जा रहे भागू को पीछे से आकर कहा।
'' आपको भी बहुत -बहुत बधाई , कमाल कर दिया अमन जी आपने। '' भगवान ने सत्कार के तौर पर अमनदीप की तारीफ की।
'' हम कौन सा किसी से कम हैं। '' अमन ने ख़ुशी में छाती तान ली और शरारती आँखें भगवान के चेहरे पर गड़ा दीं ।
' भागू जी आज मैंने आपको एक और तोहफा देना है। '' गुरमीत काँपते हुए दिल से कह गई। उसे यकीन था कि भगवान उसका तोहफा कबूल कर लेगा।
'' लाओ जल्दी दो जी फिर। '' भगवान ने अपना एक हाथ गुरमीत के आगे बढ़ा दिया।
'' यहाँ नहीं मिलेगा तोहफा , क्या पता सबके सामने लेने से इंकार कर दो। '' गुरमीत भगवान और अमन को दरख्तों के बीच बनी चौकड़ी की ओर ले गई।
'' ऐसा कौन सा तोहफा है जो यहाँ दिया जायेगा ?'' भगवान हैरान था।
'' मैं .... मैं .... मैं … आपको प्यार करती हूँ। '' गुरमीत ने बिना किसी भूमिका के जल्दी से कह डाला ।
'' क्या ?'' भगवान की हैरानी में प्रश्न चिन्ह बनी आँखें गुरमीत के चेहरे से सच्चाई जानने में जुट गईं।
'' हाँ भागू, मैं आपको बहुत चाहती हूँ। मार दो चाहे छोड़ दो। '' गुरमीत ने चेहरा दरवेशों की तरह बना लिया।
'' पर मैंने तो आपको अपना दोस्त समझा था। ''
'' मैंने आपको अपना रब्ब माना है। '' गुरमीत ने भगवान का हाथ पकड़ लिया।
'' मेरे साथ पहले धोखा हो चुका है। मैं नहीं चाहता बार -बार मेरे साथ वही हो। '' भगवान की आँखों के आगे किरना का बेवफा चेहरा घूम गया।
'' यकीन नहीं तो अभी ले चलो साथ। मैं तो तुम्हारे बिना मर जाऊँगी भागू . भ .... भागू अगर प्यार नहीं देना तो अपने सीने से भींच कर मार डाल मुझे। '' गुरमीत पल में ही भावुक हो गई। उसकी झील सी आँखें भर आईं। उनमें से दो गर्म बूंदें उसके गुलाबी गालों से होते हुए नीचे की ओर बह चलीं ।
'' अरे पगली ! मैं तो मज़ाक कर रहा था , मैं भी चाहता हूँ तुम्हें। '' भगवान गुरमीत के आगे पिघल कर मोम हो गया। भगवान की 'हाँ ' सुनकर गुरमीत की गुलाबी गालें मुस्कान से और गाढ़ी हो गईं।
'' अब तो भई पार्टी बनती है गुरमीत '.' अमन ने शरारत से गुरमीत की कमर में चिकुटी काटी।
'' चल चले फिर। '' भगवान के कहने पर तीनों वहाँ से उठकर चल पड़े। गुरमीत आज बहुत खुश थी। उसका ख़ुशी से अंतर् भरा पड़ा था। सारा कालेज ही उसे अब अपना -अपना सा लगने लगा था। वह ख़ुशी में हिलोरे लेती भगवान के साथ सीना तानकर बराबर चल रही थी। वह सबको बताना चाहती थी कि भगवान अब उसका हो गया है। वह आगे से हर टकराने को छुपी नज़रों से देखती। वह चाहती थी कि हर पार होने वाला उसके साथ चल रहे नौजवान की ओर जरुर देखे और उनकी जोड़ी की तारीफ़ करे। गुरमीत कभी -कभी जानकार साथ चल रहे भागू से सट कर आनंद लेती। चौक में आकर तीनों ' संगम स्वीट हॉउस ' में जा घुसे। गुरमीत ने उन्हें ना -ना करते जबरदस्ती चाय के साथ बर्फी खिलाई। फिर वहाँ से ये बस स्टैंड आ गए। भगवान की बस चलने वाली थी। उसने जल्दी -जल्दी दोनों से जाने की इज़ाज़त माँगी। गुरमीत का दिल किया कि वह जाते समय भगवान को बाहों में भींच ले पर वह भरी भीड़ में ऐसा कैसे कर सकती थी ? उसने अपने दिल में उठे उस बलबले को वहीं दबा लिया। बस में चढ़े भगवान ने खिड़की की ओर खड़े होकर दोनों की ओर देखा। दोनों ख़ुशी से मुस्कुरा पड़ीं . बस चल पड़ी। गुरमीत को जाती हुई बस पर गुस्सा आया पर दूसरे ही पल उसे यह बस बड़ी प्यारी लगी कि यह बस ही कल उसके भगवान को दुबारा लेकर आएगी। उसका दिल किया कि वह चली जा रही बस को चूम ले पर बस 'ड .... र .... र ' करती बस अड्डे से निकल कर सड़क पर आ गई। पीछे की धूल ने बस को ढक लिया और वह धूल में गुम होती -होती आलोप हो गई।