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मधुरानी –कम्प्लीट हिन्दी नॉवल

साला देहातमें ये इलेक्ट्रीकका झमेला है ही ...

भले डीम क्यों ना हो ... इलेक्ट्रीक तो है ना ...

वही बहुत होगया....

सरपंचके नौकरने गद्दी डालकर उपर चद्दर वैगेरे डालकर पुरी तरह से तैयार की हुई देखकर उसे अच्छा लगा. कमरेमें आते हूए सामने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखना उसने जानबुझकर टाला था. अंदर आतेही उसने सामनेका दरवाजा अंदरसे कुंडी लगाकर बंद कर दिया और खुदको सोनेके लिए बिस्तर के हवाले कर दिया. वह बिस्तरपर अचलसा पडा रहा. वह बिस्तरपर देखनेकोतो अचल सा पडा था लेकिन उसके विचार रुकनेको तैयार नही थे. तन थक गया था लेकिन दिमाग थकनेके लिए तैयार नही था. वह सोचने लगा....

आज पुरा दिन सरपंचजीके साथ घुमनेमे और आफिसका काम करनेमें और खराडे साहबकी बकबक सुननेमें चला गया था. लेकिन ऐसा एकभी पल नही था की जब मधुराणी उसके मष्तीश्क के पटल से हट गई हो. पुरे वक्त वह उसके साथ उसके दिमागमें थी. उसकी वह उत्कट आंखे, उसकी वह शरारती हंसी, रह रहकर उसकी आंखोके सामने आती रही थी. और अबभी उसका वही हाल था. उसने उसे अपने दिमाग से झंझोरकर निकालनेके प्रयासमें करवट बदली. लेकिन उसके विचार थे की थमनेका नाम नही ले रहे थे. उसने सोचा की एखाद सिगरेट पी जाए ... तो शायद सुकुन मिले... उसे दिनमें कमसे कम एक या दो सिगरेट पिनेकी आदत थी. और आज उसने एकभी नही पी थी. लेकिन सिगरेट पिना मतलब साथमें दुकानपर जाना आही गया. लेकिन बादमें उसे क्या लगा क्या जाने, वह झटसे उठ गया.

मै उससे ऐसे कितने दिन बचने वाला हूं.....

किसी समस्यासे बचनेके लिए उससे दुर भागनेसे उसका सामना करना कभीभी उचीत होता है...

वह उठकर खडा हो गया, बाथरुममें गया. मटकेसे ठंडा-ठंडा पाणी लेकर हथेलीसे मुंह पर छिडका. बगलमें पितलका लोटा रखा था. उससे मटकेमेंसे पाणी लेकर उसने अपने हाथ पैर पर डाला. फिर वैसेही वापस आकर अपने बॅगके पास चला गया. बॅग खोली. बॅगमध्ये उपरही साफ सुथरे तरीकेसे रखा हुवा तौलीया था. उसने वह निकाला. मुंह पोंछ लिया. मुंह पौछते हूए टावेसे आ रही वाशींग पावडर की सौंधी सौंधी खुशबुसे उसके दिलको ठंडकसी महसूस हूई. कुछ क्षण के लिए क्यों ना हो उसे अपने बिवीकी याद आगई. उसने बॅगसे सारे कपडे उठाकर बॅगकी तहमें सबसे निचे देखा. वहां उसका बिवी और लडकेके साथ खिंचा फॅमीली फोटो रखा हुवा था.

दूर जानेके बादही अपने लोगोंका महत्व महसुस होता है...

उसने सोचा और फिरसे सारा सामान बॅगमें ठिकसे रख दिया. अब वह खडा होकर हाथपैर पोछने लगा. हाथपैर पोछनेके बाद उस गिले तौलीएको कहां सुखनेके लिए टंगाया जाए इसके लिए जगह ढूंढने लगा. दिवार पर उसे एक जगह एक अंकुडा दिखा. उसने वह तौलीया वहां सुखनेके लिए टंगा दिया. तौलीया लटकाते हूए उसका ध्यान खुली खिडकीसे बाहर दुकानकी तरफ गया. दुकानपर अब काफी भिड इकठ्ठा हो गई थी. शाम का वक्त होनेसे शायद. चबुतरेपरभी लोग समुह बनाकर बाते कर रहे थे. उन समुहमें कोई बिडी फुंक रहा था तो कोई चिलम भर रहा था तो कोई तंबाकू मसल रहा था. दरवाजेके पास जाकर उसने चप्पल पहन ली और दरवाजा खोलकर , दरवाजेको ताला लगाकर, वह बाहर निकल गया. बाहर चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंकी चिकित्सक नजरोने उसे घेर लिया. फिरसे लोग अपने अपने कामोंमें मशगुल होनेके बाद वह एक समुहके करीब चबुतरेपर अकेलाही बैठ गया. वह समुह शादीको आए जवान लडकोंका था. लडके छुपछुपकर दुकानके गल्ले की तरफ देखनेमें मशगुल थे. गणेश, उसका उस लडकोंकी तरफ बिलकुल खयाल नही ऐसे जताते हूए वहां बैठा रहा.

" इसेतो खेतमाँ ले जाकर मसलना चाहिए .. " उस समुहसे एक मधुरानी की तरफ देखते हूए बोला.

" देखियो जादा मसलेगा तो घुटने फुट जावेंगे " दुसरेने कहा.

फिर सारा समुह जोरसे हंसने लगा.

' शीशी .... ए लडके तो बहुतही घटीया किस्म के लगते है... ' गणेशने मनही मन सोचा.

और वह वहांसे उठकर मधुराणीके दुकानके सामने जाकर कब खडा हुवा उसेभी पता नही चला. मधुराणी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्काई. दिनभर दुकानपर बैठनेके बादभी ना उसकी हरकतोंमें ना उसकी हावभावोंमे कुछ थकावट दिख रही थी. अबभी वह किसी खिले हूए फुलकी तरह तरुण ताजा लग रही थी.

" बोलो साबजी क्या दूं " उसने कहा.

" थोडी एक वील्स चाहिए थी... "

" थोडी क्यूं... पुरीही ले लियो जी " उसने मजाकिया अंदाजमें कहा और खिलखिलाकर हंसने लगी.

गणेशभी उसके साथ हंसने लगा.

" ए एक व्हील देइयो बाबूजी को " उसने अपने नौकरको फर्माया.

वह नौकर लडका एक एक ग्राहक को सामान देनेमें व्यस्त था.

मतलब उसे और थोडा समय लगने वाला था.....

गणेशने अपने आसपास - इर्दगीर्द एक नजर दौडाई. वहां औरभी कुछ ग्राहक खडे थे. उनमेंसे एक 7-8 सालकी सुती मटमैला, जगह जगह फटा और मरम्मत किया हुवा फ्रॉक पहने हूए एक प्यारीसी लडकी खडी थी. उसने सरको काफी मात्रामें तेल लगाया हुवा था और उसकी छोटी छोटी दो चोटीयां मैले रिबनसे बंधी हुई थी. उसके हाथके उंगलीमें रस्सीसे बंधी हूई एक कांच की शीशी लटकी हूई थी.

" ताई... एक छताक गोडतेल " वह लडकी मधुराणीकी तरफ देखकर बोली.

मधुराणीभी उसकी तरफ बडे लाड प्यारसे देखते हूए बोली.

" देती हूं ... गुडीया थोडा रुकियो तो ... " मधुराणी उसका गाल पकडते हूए बोली.

" बर्फहुर्फुतर्फ दिर्फीनोर्फो बार्फादर्फ दिर्फीखीर्फी " मधुराणी इतने जल्दीमें उसे कुछ बोली.

" मार्फामार्फाकेर्फे गार्फावर्फ गर्फईर्फी थीर्फी ' उस लडकीनेभी कुछ जवाब दिया.

गणेश मंद मंद मुसकाते हूए सब देख सुन रहा था. लेकिन उन्होने क्या कहा गणेश के कुछभी समझमें नही आया था.

" क्या?... क्या बोले आप लोग ...? " गणेशने उत्सुकतावश पुछा.

" कुछ नाही ... वह हमरी खास बोली है जी ... " मधुराणी नटखटसी हसती हुई उस लडकीका फिरसे गाल पकडती हुई बोली.

शायद वह उनकी कोई सांकेतीक बोली थी. गणेशको याद आया... उसके बचपनमेंभी उसकी बहने ऐसीही कुछ अजीब भाषामें उसके सामने बोलती थी. और उसने पुछा तो उसे कुछ एक नही बताती थी. उसने बहुत कोशीश की थी, लेकिन उसकी बहनोंने आखरी तक उसे उस भाषा का राज नही बताया था.

उस छोटे लडकीके बगलमें एक धोती पहनी हूई बुढी महिला खडी थी. और उसे लगकर एक साडीसी धोती पहनी हुई और एक, शायद मुलाजीम महिला खडी थी. आसपास देखते हुए अनायासही गणेश का खयाल उपर आसमानकी तरफ गया. काफी अंधेरा छा गया था. तभी रास्तेपर सिमेंटके पोलपर टंगे इलेक्ट्रीक दिए जल गए. गणेशने गौर किया की चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंने एक हाथसे क्यो ना हो उन दियोंका अभिवादन किया था.

गणेश फिरसे अंतर्मुख अपनी सोच शृंखलामें लिन हो गया. उसने महसुस किया की अब जब वह मधुराणीके सामने खडा था और उसकी तरफ देख नही रहा था तब उसके दिलकी बेचैनी थोडी कम सी हुई थी.

" ये लो साबजी "

उसकी मधूर स्वरसे वह फिरसे अपनी सोच से बाहर आ गया.
 
मधुराणीने उसके सामने लकडीके बक्सेपर रखे व्हील साबुनकी तरफ देखकर गणेश जोर से हंस पडा.

" क्या हुवाजी ? " उसनेभी हंसकर पुछा.

" व्हील साबन नही... वील्स सिगारेट मांगी थी मैने. "

" अच्छा अच्छा ... साबजी ... ई हां ब्रिस्टॉल और चारमीनारही मिलती है ... व्हील ... या क्या कहते है उसको ... व्हील्स ई हां कोई नाही इस्तेमाल करत " उसने कहा.

" अच्छा तो एक ब्रिस्टॉल दो ... और एक माचीसभी देना "

" ए साबजी को ब्रिस्टाल और एक माचिस देइयो " उसने अपने नौकरसे कहा.

वह एक एक सामान के बारेमें बोलती और वह नौकर सिर्फ सुन लेता था. ना 'हा' कहता ना 'ना'. लेकिन उसका बराबर ध्यान रहता था. नौकरने ब्रिस्टॉल और माचिसके बारेमें सुना लेकिन अब उसने उस छोटे बच्चीसे वह कांच की शीशी ली - तेल देने के लिए.

" अरे इनको पहले देइयो ... कितनी देर से खडे है बेचारे... " उसने उसे टोका.

उस नौकरने सिर्फ उसकी तरफ देखा और वह शीशी वैसेही अपने हाथ मे रखकर एक ब्रिस्टॉलका पाकीट और एक माचिस लेकर गणेशके हाथमें थमा दी.

एक कोनेमें खडे होकर गणेश सिगारेट के दिर्घ कश मारने लगा. तब कहा उसके जी को सुकुन महसुस हो रहा था. उसके बगलमेंही एक जवान लडकोंका समुह सिगारेट पीनेमें लगा हुवा था. अंधेरेका फायदा उठाकर वे किसी भूखे भेडीएकी तरह मधुराणीके दुकानकी तरफ देख रहे थे. लेकिन गणेश उनके बगलमेंही कोनेमें खडा होनेसे उसे सब दिखाई दे रहा था.

" ए राम्या जरा कनेक्सन देरे..." उनमेंसे एक अपने मुंहमें सिगारेट पकडकर उसे जलानेके लिए दुसरेसे बोला.

दुसरेने अपने मुंहमेंसे जलती सिगारेट उसके हाथमें थमा दी. उसने वह जलती हुई सिगारेट अपने मुंहमें पकडे सिगारेटके सिरेसे लगाकर दो चार जोरसे कश लगाकर सुलगाई और अपने दोस्त की जलती सिगारेट उसे वापस कर दी.' कनेक्सन' का मतलब समझकर गणेश मन ही मन मुस्कुराया. लंबे लंबे गहरे कश मारनेसे गणेशकी सिगारेट जल्दीही खतम हूई. उसने जेबसे दुसरी सिगारेट निकालकर उसे पहली की सहाय्यतासे सुलगाया -- मतलब उन देहाती लडकोंके अनुसार 'कनेक्शन' दिया. फिरसे वह मुस्कुराया. तभी गणेशको किसीका जोरजोरसे चिल्लानेका या फिर झगडने का आवाज आया.

" उस ग्रामसेवक के माका ---- ... "

" मादर...द साला "

गणेशके नामका कोईतो उध्दार कर रहा था. उसकीतो दिलकी धडकनही तेज हो गई. पहले दिनही उसे कोई गालीयां दे रहा है यह सुनकर वह विचलीत हो गया. शायद पहले वाले ग्रामसेवकको कोई गालीयां दे रहा होगा. उसने सोचा और जिस दिशासें वह आवाजे आ रही थी उस दिशामें देखने लगा.

पहलेके ग्रामसेवककोही जो भी है वह गालीयां दे रहा होगा...

वैसेभी पहलेके ग्रामसेवकाका और गांव के लोगोकां कुछ खास नही जमता था - जो उसे आजही पहलेके ग्रामसेवकसे पता चला था. ...

उधर सामने गहरा अंधेरा था. शायद सामने उस गलीके आगे, सरपंचके घरके पास कोई तो झगड रहा होगा.

" सालेका हुयी गवा शुरु ... रामायण... " बगलमें खडे लडकोंके समुहसे कोई बोला.

मतलब पहलेके ग्रामसेवक के बारेमें अबभी भला बुरा कहा जा रहा था... गणेशने सोचा.

चलो .... वहां जाकरतो देखते है... क्या झमेला है? ....

वह जिधरसे गालीयोंका आवाज आ रहा था उस दिशामें चलने लगा. गणेशने देखा की एक आदमी अंधेरेमें खडे होकर ग्रामसेवकको गालीयां दे रहा है. उसने जरा नजदिक जाकर देखा तो वह तो हक्का बक्का और दंग रह गया. क्यों की. वह सदा था. सुबह उसका सामान उठाकर उसे सरपंचके घर ले जानेवाला सदा! उसे तो अबभी अपने आखोंपर विश्वासही नही हो रहा था. उसके बोलनेके ढंगसे और हावभावसे यह स्पष्ट था की वह पीकर टून्न हो गया था. गणेश उसे दिखते ही उसने अपना रुख गणेशकी तरफ मोड लिया.

" ई देखो... ई ग्रामसेवक ... खुदको कोई लाटसहाब समझता है.... ... इसकी तो मांका --- .... एस्टी स्टँडसे मुझसे सामान उठवाया ... मादर ..द साला. "

सिधे सिधे गणेशपरही गालीयोंकी बरसात होते देखकर पहलेतो वह उलझन में पड गडबडा गया. उसे इस स्थितीसे कैसे निपटा जाए कुछ समझ नही आ रहा था. सदाका उसपर गालीयोंका हमला जारी था.

नही अब बहुत हो चुका....

गणेश का गुस्सा अब सातवे आसमानपर चढने लगा था. सदाके गालीयोंकी तीव्रताही इतनी थी की कोईभी भडक जाए. गुस्सेसे बेकाबु होकर गणेश अब सदाकी तरफ चलने लगा. अब उसे उसके कानके निचे लगानेकी जल्दी हो गई थी. चलते हुए गुस्सेसे उसका पुरा बदन गरम होगया था. उसका चेहरा लाल लाल होगया था. होठ थरथरा रहे थे. हाथ पैर भी कांप रहे थे. अब वह सदाके एकदम सामने जाकर खडा हो गया था. फिरभी सदाके बर्तावमे कुछ तबदीली नही आई. उसका जोर जोरसे गालीयां देना जारी ही था. गणेशने अब अपने मन को कठोर कर ठान लिया की, जो होगा देखा जाएगा, लेकिन इस आदमीको मै अब बहुत धोऊंगा. उसने अपना दाया हाथ उठा लिया और वह अब जोरसे सदाके गालपर तमाचा दे इसके पहलेही पिछेसे उसके कंधेपर किसीने हाथ रख दिया. उसने पलटकर देखा. वह सरपंचजी थे.

" गणेशराव ... थोडा इधर बगल में आइयो "

सरपंचजी गणेशके कंधेपर हाथ रखकर उसे एक तरफ ले गए.

" अरे गणेशराव... सुबे इसने आपको मेरे घर लाया ... तभी मुझे वह बात खटक गई रही ... "

" क्यों क्या हुवा ? " गणेशने असमंजसमें पुछा.

" ये सद्या एकबार इसने पी ली तो इका अपने उपर कोई काबु ना रहे है ... फिर उसे कुछ समझता नाही ... फिर दिनमें जिसे जिसे मिला उन सबको यह रंडवा गालीयां बके है... "

" बडी अजिब केस दिखती है ... " गणेश अपने माथेपर आया पसिना पोछते हूए बोला. " इसका कुछ बंदोबस्त क्यो नही लगाते हो आप लोग ... " वह आगे गुस्सेसे बोला.

" ई क्या कहते हो गणेशराव... सुबे तो बोल रहे थे बहुत सज्जन आदमी है " सरपंच उसे छेडते हुए बोले.

" हां कहा तो था... लेकिन इतनाभी सज्जन होगा ऐसा कभी सोचा नही था. " गणेश जबरदस्ती हंसनेकी चेष्टा करते हूए बोला.

सुबह काफी देरसे गणेश निंदसे जागा. आज गणेशको यहां आकर पुरे दो दिन हो गए थे. उसने आंखे मिचकाकर देखा तो सुरज की किरणे खिडकीसे कमरेके अंदर झांक रही थी. बाहरभी लोगोंकी आवाजें आ रही थी. देर राततक गणेश सो नही पाया था. कल रातभी यही हाल था. रातमें रह रहकर मधूराणीकी उसके दिलको आरपार करने वाली नजरें उसे सो नही दे रही थी. वह एकदमसे उठ खडा हुवा और जल्दी जल्दी खिडकीके पास चला गया. खिडकीसे दुकानपर बैठे मधुराणीकी एक झलक दिखनेके बाद कहा उसके दिलने सुकुन महसुस किया. उसका इधर ध्यान नही था. वह अपने काममें मग्न थी .
 
ये मुझे क्या हो रहा है ?.... गणेश सोचने लगा.

पहले कभी मुझे ऐसा नही हुवा था ....

किसी स्त्री का इतना आकर्षन !...

ये कुछ ठिक नही ...

शायद अपनी बिवीके विरहके कारण यह होता होगा ....

लेकिन क्या इसे विरह कहा जा सकता है ?...

मुझे यहां आकर मुश्कीलसे दो या तिन दिन तो हूए है ....

हो सकता है.... अपनोकी कमी उनसे जुदा होनेपरही महसूस होती है....

वह धीरे धीरे कदम बढाते हूए हूए अपने बॅगके पास जाने लगा. लेकिन उसका मन खिडकीसे हटनेको तैयार नही था. भारी कदमोंसे वह बडी मुष्कीलसे अपने बॅगके पास चला गया. बॅग खोली. बॅगसे उपरका सामान उठाकर बॅगके सबसे निचे हाथ डालकर उसने अपना, बिवीका और उसके लडकेका फॅमीली फोटो बाहर निकाला. फिर न जाने कितनी देर तक वह उस फोटोको बडी प्यारसे निहारता रहा .

इतनी प्यारीसी बिवी होनेके बाद मेरा मन ऐसे विचलित क्यो होता है ?...

नही. मुझे मेरे मनपर काबू रखना जरुरी है ....

उसने अपना इरादा पक्का किया.

गणेश नहा रहा था. अपने मन का इरादा और निर्धार पक्का करनेके बाद उसे अब अच्छा लगने लगा था. लेकिन यह इरादा टिकना चाहिए. नहाते वक्त उसके दिमागमें एक तरकिब आ गई .

ये सारा जादू मधुराणीके आखोंका और उसकी दिलको भेदनेवाली नजरोंका है ....

अगर मैने उसकी नजरोसे नजर मिलाना टाला तो कैसा रहेगा?...

तो शायद मेरा इरादा टिकना मुमकिन है ...

मुमकिन नही ... मुझे मेरा इरादा टिकानाही पडेगा...

इतनी देर तक हौले हौले नहा रहे गणेशको अब जल्दी हो गई थी. अभी नहाना धोना निपटाकर मै उसकी दुकानमें जाता हूं. यूंभी उसे घरमे लगनेवाली कुछ महत्वपुर्ण चिजे खरीदनी थी. उसने तय किया की अब उसके दुकानमें जाना है. कुछ सामान खरेदी करेंगे. वह अगर बोली तो --- उसे बात भी करुंगा. लेकिन कुछ भी हो उसकी आखोंसे आंखे नही मिलाऊंगा.

तो होगया तय ....

नहाना धोना निपटाकर गणेशने झटसे कपडे पहन लिए. दिवारपर टंगा थैला निकाला और जल्दी जल्दी निकल गया - मधुराणीके दुकानपर. जाते हूए उसके मन में एक विचार आया.

यह कैसी जल्दी ...

यह कैसी तडप !...

उसकी तरफ देखनेकी भी तडप और अब उसके नजरोंको टालनेकीभी तडप ....

सबकुछ कैसे अजिब ही लग रहा था.

खाली थैला एक हाथमें लेकर गणेश उसकी नजरोंकों प्रयत्नपुर्वक टालते हूए उसके गल्लेके सामने खडा हो गया. उसने उसके हाथमें थमा थैला नौकरके हवाले कर दीया.

" बोलो साबजी ... क्या मांगता है " मधुराणी गणेशके आंखोमें आखे डालकर बोली.

गणेश उसकी गहरी नजरोंसे बचते हूए उसकी सरसे उपर पिछे देखते हूए बोला, " यह लीस्ट है "

उसने चिजोंकी लीस्ट मधुराणीके हाथमें दी.

" साबजी .. हमरे दुकानमा लिस्टवा लेकर आनेवाले आप पहलेही गिराइक होंगे जी " उसने लिस्ट हाथमें लेकर उलट पुलटकर देखते हूए कहा.

फिर लिस्ट उसे वापस करते उसने कहा, '' तो फिर आपही पढोनाजी जोरसे... मैने पढा क्या या आपने पढा एकही बात हुई गवा "

वह कागज वापस लेकर पढने लगा .

" लक्स एक .. रिन एक... चहापत्ती सव्वाशे ग्रॅमका एक पॅक .. शक्कर एक किलो ...अगरबत्ती एक पॅक ... अच्छा दो जरा ... सुगंधीत ... "

नौकर जल्दी जल्दी सामान निकालने लगा.

" थोडा धीमे जी .... उसे सामान तो निकालवा देइयो .. नाही तो गडबड हो जावेगी … उस दिन की तरहा .."

मधुराणी मधूर सी हंसते हूए बोली. उसके मोतीजैसे सफेद दांतकी तरफ देखकर वहभी हंस दिया. लेकिन वह उसकी नजरोंसे प्रयत्नपुर्वक बचता रहा.

नौकरने सारा सामान थैलेमें भरकर थैला गणेशके हाथमें थमा दीया. तभी वहा सदा आगया. गणेशने सदाकी तरफ देखकर देखा अनदेखा कर दिया. परसोंकी गालीयां वह अबभी भूला नही पाया था. सदा खुद होकर गणेशके पास गया.

" नमस्कार साबजी " सदाने उसे अदबके साथ अभिनंदन किया. गणेशने सदाकी तरफ ध्यान नही दिया. सदाका उस रातका रुप और अभिका रुप इसमें जमिन अस्मानका अंतर था. इसलिए सदाके साथ किस तरहसे पेश आया जाए गणेशको कुछ समझ नही रहा था.

गणेश अपना सामानका थैला लेकर जाने लगा.

" लावोजी इधर देइयो ... मै लेता हूं थैला '' सदा गणेशके हाथसे थैला लेते हूए बोला.

'' नही ... रहने दो'' लगभग उसके हाथसे थैला छिनकर लेते हूए गणेश बोला.

मधुराणी खिलखिलाकर हंस पडी. गणेश जैसे अपने कमरेकी तरफ जाने लगा वैसे मधुराणी बोली -

" फिर्फीरर्फ कर्फबर्फ आर्फावोर्फोगेर्फ़े "

" क्या ... क्या कहा ?" गणेश पलटकर लेकिन उसके नजरोंको टालते हूए बोला.

" कुछ नाही .... लगता है हमरी बोली आपकोभी पढवानी पडेगी ... " मधुराणी मटककर बोली.

गणेशको उसके इस मटकनेसे उसकी आखोंमे देखनेका पलभरके लिए क्यों ना हो प्रलोभन हुवा.

पर नही ...
 
नजरोंके तिर निष्प्रभ हूए देखकर शत्रूपक्षने यह दुसरा हथियार इस्तमाल करनेकी सोची है ... शायद...

गणेश बडी मुश्कीलसे अपने आपपर काबू पाकर, सदाको टालते हूए अपने कमरेकी तरफ चल दिया.

रसद से भरा हूवा थैला लेकर कमरेमें प्रवेश करनेके बाद प्रथम गणेशने सामनेका दरवाजा बंद कर दिया. खिडकीसे उसने झांककर बाहर देखा. सदा चला गया था. उसने राहत की सांस ली. फिर उसका ध्यान मधुराणीकी तरफ गया. मधुराणी अपने काममें व्यस्त दुकानके गल्लेपर बैठी थी. गणेशने खिडकीसे हटकर थैला एक कोनेमें रख दिया; शर्टके उपरी जेबसे सिगारेटका पाकिट निकाला. उसमेंसे एक सिगारेट निकालकर उसने वह माचिससे सुलगाई. वह अब सिगारेटके लंबे लंबे कश भरने लगा. वह इस बातसे खुश था की उसने दुकानमें मधुराणीकी आंखोमें आखे डालकर एक बारभी नही देखा था. उसके दिलमें उठी कसकभी अब उसे थमी थमीसी और ठंडी पडी महसुस हो रही थी. उसे उसकी नजरोंके सारे तिर निष्प्रभ करनेका विजयी आनंद हो रहा था.

आज शुक्रवार. गणेशको यहां आकर पांच दिन हूए थे. सुबह नहा धोकर वह जल्दी जल्दी अपना सामान समेटने लगा. उसकी हर हरकतमें एक उत्साह झलक रहा था. क्योंकी वह आज तालूकेकी जगह अपने घर वापस जा रहा था. अपने घर वापस जाकर अपने बिवी बच्चोंको मिलनेके मात्र कल्पना भरसे उसका सारा बदन रोमांचीत हो रहा था. और दुसरी खुशीकी वजह यह थी की पिछले तिन दिनसे मधुराणीके बारेंमे अपने बहक रहे मनपर अंकुश लगानेमें वह पुरी तरह कामयाब हुवा था. पिछले तिन दिनोंमे मधुराणीसे रुबरु होनेके काफी मौके आए थे. लेकिन एकबारभी, गल्तीसेभी उसने मधुराणीके आंखोमें आखें डालकर नही देखा था. अपने इस उपलब्धीके लिए उसे अपने बारेमें बडा गर्व महसुस हो रहा था. उसे इस बातका भी अहसास हुवा था की पिछले कुछ दिनोंसे उसके मचल रहे जीने भी अब मानो सुकुनकी सांस ली थी.

गणेश कपडे पहनकर लगभग तैयार हुवा था. तभी सामनेका दरवाजा बजा. उसने सामने जाकर दरवाजा खोला. सामने सरपर पगडीजैसा कपडा बंधा हुवा देहाती खडा था. उसने निचे धोती और उपर कपडेसे बना हुवा बनियन पहना था. गणेशने उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" मालिक सामान उठाने के लिए भेज रहत " गणेशकी मुद्रा देखकर उस देहातीने कहा.

" किसने ?... सरपंचजीने ? "

'' जी.." उसने कहा.

गणेश दरवाजेसे हटतेही वह देहाती अंदर घुस गया. गणेशने कोनेमें रखे अपने बॅगकी तरफ निर्देश करते हूए कहा -

'' वह उतनी एकही बॅग है .... वह लेकर तुम आगे निकलो... मै बस पिछेसे आया "

" जी "

उसने सरको बंधा हुवा कपडा छोडा. वह कपडा लपेटकर उसका गोलाकर बनाया और अपने सरपर रख दिया. फिर बॅग उठाकर उसने अपने सरके उपर उस गोलाकर बने लपेटे हूए कपडेपर रख दी. वह बॅग लेकर दरवाजेसे बाहर जाने लगा तब गणेश ने कहा, '' अरे... जरा संभालकर भाई ... नही तो उपर लगेगा "

वह नौकर दरवाजेसे जाते हूए थोडा झुका और बॅग लेकर बाहर चला गया. उसके जातेही गणेशने दरवाजा बंद कर दिया.

गणेशने कमरेसे बाहर आकर दरवाजेको ताला लगाया. उसके चेहरेसे और उसके हर एक हरकतसे उत्साह उमड रहा था.

चलो अब एक बार बस स्टॉपपर जानेसे पहले एक सिगारेट पिते है...

उसने सोचा. दरवाजेको ताला लगाकर वह मधुराणीके दुकानमें चला गया. अबतो उसे मधुराणीकी नजरोसे बचनेकी मानो आदतसी हो गई थी.

" एक ब्रिस्टॉल " उसने एक रुपए का सिक्का मधुराणीके सामने रखे गल्लेपर रखते हूए कहा.

आज मधुराणी कुछभी नही बोली . नहीतो हरबार गणेशसे वह कुछ ना कुछ बोलती थी. गणेशको पता नही क्यो अपराधी जैसे लगने लगा.

मैने कुछ गल्ती तो नही कर दी...

या फिर उसका दिल तो दुखाया नही?...

फिर वह आज क्यो नही बोली?...

कही मुझपर गुस्सा तो नही होगई... ?...

या फिर मै घर जा रहा हूं इसकी वजहसे वह दु:खी तो नही महसुस कर रही है? ....

नही ... नही... ऐसे कुछ नही होगा...

मै फालतूही जरा जादाही सोच रहा हूं...

और उसने बोलनाही चाहिए ऐसा थोडी है ?....

आज नही होगा बेचारीका मूड....

यह तो मेरी जबरदस्तीही होगई ...

उसने एकसाथ अपने मनमें भिड करते विचारोंको झटकनेकी कोशीश की. मधुराणीने चुपचाप अपने पिछे रॅकमें रखा ब्रिस्टॉलका पाकिट निकाला और उसे खोलकर उसमेंसे एक सिगारेट निकालते हूए गणेशके हाथमें थमा दी. अचानक गणेशने चौंककर उसकी तरफ देखा. सिगारेटके अलावा औरभी किसी चिजका अहसास गणेशके हाथको हुवा था. जब वह संभला तब उसे अहसास हुवा की मधुराणीने गणेशके हाथपर सिगारेट थमाते हूए जानबुझकर हल्केसे उसका हाथ दबाया था. या फिर गल्तीसे दब गया था. ? यह जाननेके लिएही उसने उसकी तरफ देखा था. उसकी चेहरेपर एक मादक, घायल करनेवाली, रहस्यमय और उतनीही अर्थपूर्ण हंसी फैली हुई थी. गणेश उसकी उत्कट नजरोंमें उलझ गया था. उसका उसकी आखोमें आखें ना डालनेका दृढ संकल्प किसी अत्तर की तरह हवामें उड गया था. उसका दिल जोर जोरसे धडकने लगा. एकही पलमें सारा बदन पसिनेसे लथपथ हो गया. हडबडाकर उसने सिगारेट ली और वह बस स्टॉपकी दिशामें चलने लगा. उसको चलते हुए एक एक कदम आगे डालनाभी बडा भारी महसुस हो रहा था. उसका एक मन कर रहा था की घर जाना रद्द कर दूं. लेकिन नही ... सरपंचके नौकरने अपना सामान आगे ले जाकर बस स्टॉपपर रखा था. अब अगर मै जाना रद्द करता हूं तो न जाने किसीको कुछ शक होगा... वह वैसेही भारी पैरसे चलते हूए नुक्कड तक चलता रहा. नुक्कडसे मुडते हूए कितनाभी अपने मनको नियंत्रीत करनेके कोशीशके बावजुद उसने मुडकर एक बार मधुराणीकी तरफ देखा. वह भी आमंत्रित करती हुई निगाहोंसे उसे देख रही थी. उसके नजरोंमें जुदाईका गम, और एक अदृष्य आकर्षित करनेवाली शक्ती थी. भारी मनसे वह बस स्टॉपकी तरफ निकल पडा. अब मुडकर देखाभी तो वह दिखने वाली नही थी, फिरभी उसने मुडकर देखा. वह उसको नही दिखाई दे रही थी. लेकिन उसने महसुस किया की वह उसके साथ साथ आ रही थी - दिल के किसी कोनेमें घर बनाती हूई !

बसमें धुल आ रही थी तो कभी बस उबड खाबड रस्ते के वजहसे हिल रही थी. बसमें काफी भीड थी और वह लोगोंकी फालतू बकबक. बस घाटीसे चल रही थी और उसकी वजहसे किसीकाभी जी मचलना लाजमी था. लेकिन आज गणेशको कुछभी महसूस नही हो रहा था.

उसके हाथके स्पर्शसे ही यह हाल है तो ...

तो आगे क्या होनेवाला है भगवान जाने ?...

स्पष्ट है की वह मुझे उकसा रही है ...

मतलब सिर्फ मुझेही उसके बारेंमे कुछ लगता नही तो...

उसेभी मेरे बारेमें कुछ लगता है ...

आग दोनो तरफ बराबर लगी हूई है...

खट् खट् ... गणेशको कुछ बजे जैसा अहसास हुवा. लेकिन उसने उधर ध्यान नही दिया. क्योंकी उसे अपने सपनेसे जगना नही था. फिरसे खट् खट् आवाज आ गया. इसबार उसे किसीने हिलाया भी. तब कहा उसने होशमें आकर देखा. वह कंडक्टर था.

" टिकट ..." वह फिरसे खट् खट् बजाता हुवा बोला.

" जी... हां... हां ... " गणेशने हडबडाकर जेबमें हाथ डाला.

एक पांचकी नोट निकालकर कंडक्टरके हाथमें थमाते हूए बोला, " एक उजनी दो "

" भाई साब गाडी उजनीसेही निकली है ... " कंडक्टर हंसता हुवा बोला.

" नही मतलब ... एक तालूकेके लिए टिकट दो " गणेश अपनी झेंप छिपाते हूए बोला.

काफी बार इस गाडीपर यही कंडक्टर रहता था. गणेशको किसीने बताया था की उसका गांव इसी बसके रस्तेमेंही कही था और इसलिए वह यही गाडीपर हमेशा ड्यूटी लेता था. अपने गांवमें सुबह या शाम अक्सर गाडी रोककर वह अपना टिफीन कलेक्ट करता था. वह अपने गांव गाडी जरा जादा ही समयके लिए रोकता था. टिफीन लेनेके बहाने दो चार इधर उधरकी बाते भी होती थी. खट् खट् बजाते हूए उसने टिकट काटा और गणेशके हाथमें थमाकर वह फिरसे खट् खट् बजाते हूए आगे निकल गया. गणेशने वह टिकट अपने शर्टके उपरी जेबमें रख दिया और फिरसे वह खिडकीसे बाहर देखते हूए अपने सपनोमें लीन हो गया.

"साहब उठो ... सो तो नही गए ?" किसीके आवाजसे गणेश हडबडाकर उठ गया.

उसके कंधेको पकडकर उसे कोई झंझोर रहा था. गणेशने संभ्रमसे इधर उधर देखा तो गाडीमें बैठे सारे लोग उतर गए थे. गाडी बस अड्डेमें प्रवेश कर चुकी थी और वह अकेला अबभी गाडीमें बैठा हुवा था. उसे बस कंडक्टरने जगाया था. कंडक्टर तुच्छतासे उसकी तरफ देख रहा था. गणेशको अब शर्मींदगी महसुस होने लगी थी. अपने चेहरेके भाव छीपाकर उसने उपरसे अपनी बॅग निकाली और बससे निचे उतरने लगा. जबसे मधुराणीका मादक स्पर्श उसे हुवा था... नही जरुर उसने वह जानबुझकर किया होगा ... नही तो वह मधुरसी मुस्कुराती नही थी ...

तबसे गणेश लगभग हवामें उड रहा था. उसके दुकानसे कब वह भारी पैरसे बस स्टॉप आया ... कब बस आई ... कब वह बसमें चढ गया और कब तालूकेके बस अड्डेमें पहुंच गई ... उसे कुछभी याद नही आ रहा था. उसकी मधूर हंसी, उसके कोमल स्पर्ष की कसक और उसकी पी लेने वाली नजर ... सबकुछ जैसे अभी अभी घटीत हो गया हो ऐसा उसे लग रहा था. और वह सब उसकी नजरोंके सामनेसे हटते नही हट रहा था.
 
गणेश बस से निचे उतर गया. उसके पिछे कंडक्टरभी उतर गया. बसचा ड्रायव्हर उतरकर कंडक्टरकी राह देखते हूए पिछले दरवाजेके पास खडा था. कंडक्टरने उतरने बाद गणेशको थोडा और आगे जाने दिया और दबे स्वरमें गणेशकी तरफ इशारा कर चिढकर ड्रायव्हरसे कहा -

" येडांही है ... सारी बस खाली हो गई ... और देखता हूं तो ये जनाब खिडकीके बाहर देखते हूए बैठे हूए थे. .."

ड्रायव्हर गणेशकी तरफ देखकर व्यंगपुर्वक हंस दिया. गणेशको उनका संवाद सब सुनाई दे रहा था लेकिन उनकी तरफ ध्यान ना देते हूए वह अपनी बॅग लेकर वहांसे चलता बना.

गणेश तालूकेके जगह अपने घर आया. घरमें बीवी थी और एक सलोना लडका था. लेकिन उसका मन उधरही गांवमें अटका हुवा था - मधुराणीके पास. कब एक बार वापस जाकर मधूराणीके पास जाता हूं ऐसा उसे हो गया था. बिचमें छुटीयां थी इसलिए ... नही तो कबका वह उजनीको जाकर पहूंचा होता. और छुटीयोंके दिन जावो तो किसीको शकभी हो सकता है... छुटीयोंके दो दिन उसे दो महिने जैसे लंबे महसूस हो रहे थे. उसने अपना सामान पहलेसेही बांधकर रख दिया था - उतनाही समय बित जाएगा .. यह सोचकर.

जितना अधीर होकर मै उजनीको जानेकी राह देख रहा हूं...

उतनीही अधीरतासे... शायद उससेभी जादा अधीरतासे मधुराणीभी मेरी राह देख रही होगी... उसने सोचा...

आखिर अपने मनमें जो उथल पुथल चल रही होती है... आदमीको वह भावनाएं जाहिर किए बिना चैन नही आता है...

और इसलिएही मधुराणीने इशारेसे क्यों ना हो अपनी भावनाएं जाहिर की थी...

शायद जबसे मेरा और उसका सामना हुवा तबसेही उसने मुझे अपने मनमें जगह दी थी...

नही तो ... तबसेही उसकी नजरोमें इतनी उत्कटता मुझे महसुस नही होती...

की जिसकी वजहसे मै भी उसकी तरफ खिंचता चला गया...

उसका इस तरह मुझ पर मरना ...

और इतने लोग छोडकर उसका मेराही चुनाव करना...

इसका मतलब मुझमेंभी कुछ तो खासीयत होगी...

उसे अपने खुदके बारेमें गर्व महसुस हो रहा था...

वह कुछभी हो उसनेभी अपना हृदय मेरे सामने खोल दिया... यह सबसे महत्वपुर्ण... नही तो मै ही उसके पिछे किसी लंपटकी तरह घुम रहा हूं ... यह कुछ अच्छा नही दिखता था....

आखिर वह दिन आ गया. सोमवार. जिस दिनकी गणेश बडे बेसब्रीसे राह देख रहा था. आजभी गणेशको उजनी तक का सफर बिलकुल महसुस नही हुवा. पुरे सफर के दौरान उसे अपनी दोनो बाहें फैलाई हुई और उसका बेसब्रीसे इंतजार कर रही मधुराणीही आंखोके सामने बार बार दिख रही थी. बसमें उसके बगलमें कौन बैठा हुवा है... बसमें बैठे बाकी मुसाफीर क्या कर रहे है... खिडकीके बाहर क्या नजारा दिख रहा है... उसे किसी बात का होश नही था.

ब्रेक लगनेसे बस झटका देकर रुक गई. उजनी आ गई थी. गणेशके चेहरेपर मुस्कुराहट झलकने लगी. आज बॅग लेकर भीडमें सबसे पहले उतरनेकी जल्दी गणेशकोही हुई थी और उसके लिए वह जी जान से प्रयास कर रहा था. किसी तरह वह बस से उतर गया. या यूं कहा जाए की भिडनेही उसे बाहरका रास्ता दिखाया था. बाहर आए बराबर उसने चारो तरफ अपनी नजरे दौडाई.

हो सकता है... मधुराणीभी बस स्टॉपवर बेसब्रीसे मेरा रास्ता तकते हूए खडी हो...

देखो मै भी कितना पागल हूं?...

भला वह कैसे आएगी यहां?...

मेरा आनेका दिन उसे कैसे मालूम होगा?....

उसको ना पाकर उसने अपने आपको समझाया. तभी उसे सदा उसकी तरफ बढता हुवा दिखाई दिया. गणेशने झटसे उसे देखा - अनदेखा कर दिया.

'' अरे गणेशरावजी ... ... मैने तो पहचानाही नाही ही'' सदा उसके सामने आकर बोला.

गणेश उसे टालनेकी कोशीश करते हुए आगे बढने लगा.

'' ये क्या साब... किसी... ग... कचरेके ढेरसे सोकर उठे जैसे लगाई देवत है '' सदा गणेशके पिछे पिछे चलते हूए बोला.

उसके बोलनेसे गणेशके खयालमें आया था की ' किसी गधेकी तरह'' कचरेके ढेरसे सोकर उठे जैसे लग रहे है आप' पहले वह ऐसे बोलने वाला था. लेकिन उसने 'गधेकी तरह' यह शब्द जुबापर लानेसे पहलेही झटसे निगल लिया था. गणेश ने रुककर अपने कपडेकी तरफ देखा. भिडसे सबसे पहले बाहर आनेकी चेष्टामें उसके सारे कपडे मसलसे गए थे. और खिडकीसे आने वाले धुलसे वह मलिन हो गए थे. इस बार धुलसे बचनेका होश कहां था उसे?. उसने अपने बालोंसे हाथ फेरते हुए .. अपने उलझे हूए बाल ठिक करनेकी कोशीश की. अब ऐसे हालमें मधुराणीके सामने जाना. उसे अपने आपकीही शर्म महसुस हो रही थी.

'' इधर लाईयो साबजी ... बहुत थक गए रहत ... ई का मै हुं ना ... सामान उठाइके वास्ते " सदाने कहा.

" नही ... रहने दो " बोलते हूए गणेश जल्दी जल्दी अपने कदम बढाते हूए निकल पडा - मधुराणीकी दुकानकी तरफ.

उसे कब एक बार मै मधुराणीको अपनी नजरोंसे पी लेता हूं ऐसा हो गया था.

सामने दिवार का कोना जैसे गणेशको दिखने लगा, उसके दिलकी धडकने तेज होने लगी. बस वह कोना पार करनेके बाद मुझे मधुराणी दिखाई देंगी. वह जल्दी जल्दी अपने कदम बढाने लगा. सदा अबभी उसके पिछे पिछे आ रहा था. लेकिन गणेशको ना सदाके अस्तित्वका होश था ना रास्तेमे दिख रहे लोगोंका. गणेश मधुराणीकी बस एक नजरभरके लिए मानो तरस रहा था.

आखिर वह क्षण आ गया. कोना पार करतेही गणेशको गल्लेपर बैठी हुई मधुराणी दिखने लगी. वह अपने काममें व्यस्त थी. कब वह अपनी तरफ नजरभर देखती है, और कब मै उसकी शराबी नजरोंमें डूब जाता हूं ऐसा गणेशको होने लगा था. वह मधुराणीके ठिक सामने जाकर खडा हो गया.

" बोलो गणेशरावजी ... क्या लेवेंगे ? .. सिगारेट?" मधुराणीने एकदम सहजतासे गणेशकी तरफ देखकर पुछा.
 
गणेशको अपने मनही मनमें बन रहा मकान मानो ताशके पत्तोकी तरह ढह गया ऐसा महसुस होने लगा था. वह उससे एकदम किसी अजनबीकी तरह पेश आ गई थी, जिसकी गणेशको बिलकुल आशा नही थी. उस दिन जिस तरहसे उसने उसे जाते हूए रुखसत किया था, कमसे कम उससे तो उसे उसका ऐसा रुखा रुखा व्यवहार अपेक्षीत नही था. गणेश लगभग हक्का बक्कासा रह गया था. जो कुछ भी हो रहा था वह सब उसे अपेक्षीत नही था. उसे शर्म और अपमानके मारे ऐसा लग रहा था की उसके पैरके निचेकी जमीन फटकर उसे अपने मे समा ले. उसका चेहरा अपमानके मारे एकदम उतर गया था. उसे क्या बोला जाए कुछ सुझ नही रहा था.

" नही एक लक्स चाहिए थी " वह कुछ तो बोलना है ऐसे बोला.

उसके कमरेमें दो लक्स साबुन पडे हुए थे. लेकिन अब परिस्थितीयां ऐसी बन गई थी की उसे कुछ तो खरीदनाही था.

" या व्हील दूं " मधुराणी किसी पहले मजेदार अवसरका संदर्भ देते हूए खिलखिलाकर हंस पडी.

गणेशभी किसी तरह जबरदस्ती हंसने लगा.

मेरे उतरे हूए चेहरेको देखकर कही ये मेरी खिल्ली तो नही उडा रही है? .. उसे लगा. मधुराणीने एक लक्स साबुन निकालकर उसके हाथमें थमा दिया. उसके हाथमें सिरहन दौड गई. उसकी अपेक्षा थी की मधुराणी उसके हाथको छुएगी. लेकिन इसबार मानो उसने जानबुझकर हाथका कोई स्पर्श ना हो इसका खयाल रखते हूए साबुन उपरसेही उसके हाथमें रख दी. उसका घोर अपेक्षाभंग हुवा था. उसने जेबसे पैसे निकलकर चुका दिए और निराश चेहरेसे अपने कमरेकी तरफ बढने लगा.

तभी पिछेसे मधुर स्वर गुंजा - '' दोई दिन कहा गांव गए रहत . ? ... बहुत खाली खाली लगाई रहा आपके बैगेर "

गणेशने पलटकर मधुराणीकी तरफ देखा. उसका चेहरा खुशीसे दमकने लगा था. मधुराणीके कटाक्षमें फिरसे वह जानलेवा भाव तैरने लगे थे. उसे लगा फिरसे पलटकर उसकी तरफ जाऊं .

लेकिन नही ...

वह अच्छा नही दिखेगा ...

वह अब नए उत्साहके साथ अपने कमरेकी तरफ बढने लगा. जाते हूए वह सोचने लगा - मै भी कितना पागल हूं .... यहां इतने सारे लोगोंके सामने मधुराणी कैसे अपने मनके भाव व्यक्त करती .... लेकिन उसने कमसे कम हल्कासा क्यों ना हो अपने हाथका स्पर्श मुझे करना चाहिए था. .... लेकिन जाते हूए उसने फिरसे इशारा तो कियाही ना ... उसे दो दिनसे मेरे अनुपस्थितीका अहसास हुवा था ... इसका मतलब उसके मनमें मेरे लिए कुछ तो जरुर है ...

गणेश ऑफीसमें बैठा था. ऑफीसमें गांव के लोगोंकी भीड जमा हो गई थी. ऑफीसमें कामसे आनेवालोंसे बिनाकामकें मस्तमौलाही जादा जमा हो गए थे. कोई ऑफीसके सामने चबुतरेपर बैठकर तंबाखु मसल रहा था तो कोई चिलम फुंक रहा था. ऑफीसमें ग्रामपंचायतके ग्रॅन्डसे एक बडासा रेडिओ खरीदा गया था. और वह रेडीओ शुरु कर लोग बिचबिचमें कभी खबरें सुनते तो कभी गीत संगीत सुनते. बुधवारको रात आठका वक्त गांवके जवान लडकोने बुक करके रखा था. क्योंकी उस वक्त वे बिनाका गितमालाके अलावा किसीको कुछभी सुनने नही देते थे. तो आजभी कुछ लोगोंने खबरें सुननेके लिए चबुतरेपर भिड लगा रखी थी. और गणेशका ऑफीस मतलब वही हॉलके कोनेमें एक को सटकर एक ऐसे लगाए तिन टेबल रखे गए थे. और उन टेबलोंके पिछे दो कुर्सीयां रखी गई थी. उसमें एकदम कोनेवाली कुर्सीपर गणेश बैठा था. गणेशके टेबलके सामने दो लोग खडे थे. उसमें का एक एकदम अनपढ देहाती था. उसने गणेशसे पुछा - " बोलो क्या चाहिए ?"

" सायेब... वह 7-11 या क्या बोलते है उसको वो चाहिए जी ..." वह देहाती बोला.

" 7-12" गणेशने उसकी गलती दुरुस्त की.

" हां जी ... हां जी ... वही ... " वह देहाती अपनी गलती दुरुस्त की गई देखकर खुशीसे बोला.

" पुराना 7-12 या उसकी कापी है क्या ? "

उस देहातीने प्रश्नार्थक मुद्रामें पहले गणेशकी तरफ और फिर उसके बगलमें खडे युवककी तरफ, जिसकी उम्र लगभग 20-21 साल होगी, उसकी तरफ देखा.

" आपका नाम बोलो " गणेशने उससे पुछा .

" गणपत सदोबा खोत " उस देहातीने अपना नाम बताया.

गणेशने टेबलपर उसके सामने रखे एक रजिस्टरपर वह लिख लिया.

" सर्वे नंबर मालूम है क्या ?"

फिरसे उस देहातीने प्रश्नार्थक मुद्रामे पहले गणेशकी तरफ और फिर उसके बगलमें खडे उस युवक की तरफ देखा.

" तुम लोगोंकी यही तो परेशानी है .... पुराना 7-12 नही... सर्वे नंबर .. मालूम नही ... तुम्हारा नाम तुम्हे पता है .... आप लोगोंकी बडी मेहरबानी ... सिर्फ नामसे रेकॉर्ड ढुंढनेको काफी वक्त लगेगा ... अगले सोमवारको आवो ..." गणेश चिढकर बोला.

" अगर जल्दी होवेगा तो देखोना साब ... " वह बडा हीन दीन होकर बिनती करने लगा.

" अच्छा अच्छा ... गुरवारको आकर देखो ... " गणेश उसे टालनेकी कोशीश करते हुए बोला.

वह देहाती हाथ जोडते हूए निकल गया.

" हं तुम्हे क्या चाहिए ? " वहां खडे युवकसे गणेशने पुछा.

" हमरी और हमरे चाचाका बंटवारेका झगडा है ... वो कैसे मिटाना है ये पुछनेके लिए आई गवा "

उस लडकेको गणेशने काफी बार मधुराणीके दुकानमें आते हुए देखा था. गणेश ऑफीसका काम तो कर रहा था लेकिन उसके दिमागमें लगातार मधुराणीके बारेमेंही विचार चलते रहते थे - मानो कानोंके इर्दगीर्द लगातार कोई मधूमख्खी गुनगुनाती रहती.

" बैठो " गणेशने सामने कुर्सीकी ओर इशारा कर उसे बैठनेके लिए कहा.

तभी वह पहले आकर गया देहाती वापस आगया.

" अब क्या है ?" गणेशने बुरासा मुंह बनाकर उसे पुछा.

" नाही वो अपने कामका कितना खर्चा आवेगा ?" उस देहातीने दबे स्वरमें पुछा

" क्यो तुम्हे पता नही ? "

उस देहातीने अपनी अनभिज्ञता जताते हूए सर हिलाया.

" बाहर चबुतरेपर पांडू बैठा है उसे पुछो " गणेश उस देहातीकी तरफ ध्यान ना देते हूए, उसकी तरफ ना देखते हूएही बोला.

" जी " उस देहातीने कहा.

साहबने कुर्सीपर बैठनेके लिए कहा तो है, लेकिन मैने कुछ गलत तो नही सुना. ? ऐसे अविर्भावमें वह लडका कभी कुर्सी की तरफ तो कभी गणेशकी तरफ देखते हूए कुर्सीके पास खडा रहा.

" अरे बैठोतो..." गणेशने उसे फिरसे बैठनेके लिए कहा.

वह शर्माते हूए कुर्सीपर बैठ गया. वह देहाती आश्चर्यसे कभी उस कुर्सीपर बैठे लडकेकी तरफ देखता तो कभी गणेशकी तरफ देखता. गणेशने आखोंके कोनेसे उस देहातीको बाहर जाते हुए देखा और फिर उस लडकेसे असली बात छेड दी.

" तुझे मधुराणीके दुकानमें बहुत बार देखा है मैने "

" हांजी ... वो सामान समान लेनेएके वास्ते जाना पडे है ... दूकान नजदीक रही ना " वह शर्माकर बोला.

" बहुत लडके इख्खटे होते है वहा शामको ... आखिर माजरा क्या है ?" गणेश असली मुद्देके आसपासकी बाते पता करनेकी कोशीश करते हूए बोला. फिरभी उसका असली उद्देश मधूराणीके बारेमें जानना यही था.

" कुछ नाही साब ... बिडी सिगारेट फुंकनेके वास्ते इक्कठ्ठे होवत है .... कुछ काम धाम नाही सालोंके पास ... फिर क्या करेंगे जी " वह बोला.

" झुट मत बोलीयो ... " गणेश मुस्कुराते हूए बोला.

" उई क्या है साबजी ... जीहां मिठाई होवे उहा मख्खीयां तो इकठ्ठा होवेगी ही.." वह एक आंख छोटी करते हुए बोला.

" अच्छा मतलब तुमभी .."

" नाही साबजी ... मै अपना बाकी लडके इकठ्ठा होवे है इसलिए जाता हूं जी उहा "

" अच्छा मै समझ रहा हूं " गणेश मुस्कुराते हूए उसकी तरफ एकटक देखते हूए बोला.
 
वह शर्माकर इधर उधर देखनेकी कोशीश करने लगा. तभी एक गवार लडका अंदर आगया. गणेशने उसकी तरफ बुरासा मुंह करके देखा. क्योंकी उसे सामने कुर्सीपर बैठे लडकेसे और सवाल करने थे और तबतक उसे वहां कोई और नही चाहिए था. लेकिन वह गवार लडका बेशर्मीसे वही खडा की खडा ही रहा.

" लेकिन उसके घर और कोई नही है ? ... हमेशा मुझे तो वही गल्ले पर बैठी हूई दिखती है "

गणेशको लगा की नाम ना लेते हूए मधुराणीके बारेमें पुछा तो उस गवारके क्या खयालमें आनेवाला है ? .

" ससूर होवे है ना जी ... लेकिन वो तो दारु पिकर इधर उधर पडा रहत है " वह गवार लडका बोला.

" और उसका पती ? " गणेशने अपनी तरफसे बहुत महत्वपुर्ण सवाल पुछा.

" उसका आदमी मर गया साबजी ... . शादी होनेके एक सालके अंदरही मर गवा बेचारा "

" कौन कहता है मर गवा ... मारा है उसे पाटीलने " वह गवार लडका गणेशके टेबलके और पास आते हूए बोला.

" ए ढेकळ्या... कोर्टमा साबित किया रहत पाटीलने ..." कुर्सीपर बैठा लडका आवेशमे आकर खडा होते हूए बोला.

" कोर्टमाँ बहुत पहचान है पाटीलकी ... उहां तो पैसे देकर किसी मरे हूए को जिंदा कर सकता है उ ... "

" ए फुकणीके ... मुंहमें आया सो मत बकीयो "

दोनोमें अब काफी तू - तू मै - मै होने को थी. गणेश बिचमें पड गया.

" ए तूम पहले बाहर निकलो... इसका काम होने दे ... फिर तूम अंदर आना ... "

गणेशने उस गवार लडके को बाहर निकाल दिया. वह गंदी गंदी गालीयां देते हूए, बिच बिच मे मुडकर पिछे देखते हूए बाहर चला गया. फिर गणेशने उस लडकेसे मधुराणीकी जितनी मुमकीन थी उतनी जानकारी निकाल ली.

बेचारी मधुराणी ...

पती शादी होनेके बाद एक सालके अंदरही गुजर गया...

बेचारीका नसीब और क्या ?....

उसपर क्या बितती होगी ....

गणेशको उसके बारेमें अब सहानुभूती होने लगी थी.

जैसे जैसे दिन बित रहे थे गणेशका अपनी खिडकीसे मधुराणीकी तरफ देखना दिन ब दिन बढ रहा था. मधुराणीभी इधर गणेश खिडकीमें आनेपर उधरसे उसकी तरफ देखकर मुस्कुराती. उसका उसके दुकानमेभी आना जाना बढ गया था. पहले पहले कुछ लेनेका बहाना बनाकर वह उसके दुकानमें जाता था. लेकिन अबतो उसको जानेके लिए किसी बहानेकीभी जरुरत महसुस नही होती थी. सुपारी तोडना, सुतली, सुई धागा जैसी छोटी छोटी चिजोंके लिए भी वह बेझिझक दुकानपर जाता था. मधूराणीभी खुशीसे उसे जोभी चाहिए वह देनेके लिए तत्परही रहती. चिजे देते लेते वक्त वह अपने कोमल हाथोकां हल्कासाभी क्यो ना हो स्पर्ष करनेसे नही चूकती थी. धीर धीरे गणेशकाभी ढाढस बढ रहा था. वह भी उसका स्पर्ष पानेके फ़िराकमेंही रहता था. आजकल तो मधूराणीका कोमल स्पर्ष हूए बिना और उसकी गहरी नजरोंमे डूबकर मदहोशीका आनंद लेनेके बिना उसके दिन का प्रारंभ नही होता था. उसनेभी अब सोच लिया था की इतने दूर इतने दुर्गम देहाती इलाकेमें उतनाही उसका दिल लगा रहेगा. और वह बेचारीभी भला क्या करती. उसकी उम्रही ऐसी थी और उपरसे वह बेईमान जवानी और तो और उसका अकेला सहारा उसका पती भी गुजर गया था.

एक दिन उसने उसे अपने गुप्त बोलीका रहस्यभी बता दिया.

" मैर्फे तुर्फुमर्फपर्फरर्फ प्रेर्फेमर्फ कर्फरर्फतीर्फी हुर्फु .... देखियो तो समझता है क्या ." उसने कहा.

" नही तो ... कुछ भी नही समझ रहा है... कोई तेलगु बोली जैसी बोली लगती है .." वह अपने दिमागपर जोर देकर समझने की कोशीश करता हुवा बोला.

" ... बहुत सादा जी है ... उसमेंसे सिर्फ र्फ, र्फु, र्फा, र्फे निकाल दो ... बस होई गया ."

" बस इतना सरल है ... " उसने कहा.

" अब फिरसे तो बोलो एक बार तुमने क्या कहा था " गणेशने फिरसे पुछा.

" मैर्फे तुर्फुमर्फसेर्फे प्रेर्फेमर्फ कर्फरर्फतीर्फी हुर्फु .... " उसने फिरसे दोहराया.

" मै... तुमसे .. आगे क्या बोला था ... एक बार बोलो तो... और थोडा धीरे बोलो ..." गणेश वाक्यकी जोडतोड करनेकी कोशीश करते हूए बोला.

" मैर्फे तुर्फुमर्फसेर्फे प्रेर्फेमर्फ कर्फरर्फतीर्फी हुर्फु "

" मै... तुमसे ... प्रेम... करती ... हूं ... मतलब ... मै तुमसे प्रेम करती हूं ... बराबर है ना "

" हा जी एकदम सही ... "
 
उसने क्या कहा यह गणेशको समझा था ... लेकिन उसका मतलब समझनेको थोडा समय लगा. मतलब समझतेही उसका चेहरा शर्मके मारे लाल लाल हो गया था.

" देखोजी ... देखो ... कैसे शर्मा रहत है... ... ऐसे क्या शर्माते हो जी ... मैने तो बस मिसाल दी थी.' मधुराणीने कहा.

" इतना आसान... लेकिन इतनी आसान होकरभी यह बोली बाकी लोगोंको क्यो नही समझती है...' गणेश अपने चेहरेसे शर्मके और झेंपके भाव छिपानेकी कोशीश करता हुवा बोला.

" क्योंकी उका और एक राज है... यह बोली बहुत फास्ट बोलनी पडती है... ताकी सुननेवाला समझ ना पावे . '

" हां ... तुम ठिक कहती हो " उसने कहा.

एक दिन शामको गणेश काफी थका हुवा था और बेडपर लेटकर आराम कर रहा था. आज उसे पासही एक देहातमें जाना पडा था. वहा जानेके लिए बस नही थी. इसलिए सरपंचजीने उसे जानेके लिए बैलगाडीका इंतजाम किया था. गणेशको बैलगाडीसे सफर करनेकी आदत नही थी. रास्ता उबड खाबड होनेसे उसके बदन का एक एक पुर्जा दर्द कर रहा था. सफरमें उसके साथ दो हमसफर होनेसे उसे सफरमें उतनी दिक्कत नही हुई. एक था आसपासके गावोंमे घुमकर मोटर पंप पंखे इनकी मरम्मत करनेवाला मेकॅनिकका काम करनेवाला बबन और दुसरा था येडा. उसका नाम क्या था पता नही लेकिन लोग उसे उसके सनकी बरतावसे 'येडा; ही कहते थे. सफरके दौरान बबनके साथ गप्पे मारते हुए वक्त अच्छा बिता था. येडेसे तो बाते करनेकी कोई अपेक्षाही नही थी. बिचबिचमें वे उसकी मजाकभी उडाते थे. बेडपर लेटे लेटे गणेशको बैलगाडीमेंका एक किस्सा याद आगया और उसके चेहरेपर हंसी आ गई. बैलगाडीमें पिछे तिन लोग बैठे थे और गाडीवान गाडी हाक रहा था. गाडीके धक्कोसे बचनेके लिए पिछे बैठनेके लिए सुखी घास फैलाई थी. उसका दुसरा उद्देश ये भी थाकी रास्तेमें बैलोको खानेके लिएभी वह घासभी काममें आ सकती थी.

" इस गाडीके धक्कोसे तो आदमीके सारे नट बोल्ट ढिले हो जावेंगे " बबन गाडीका पहिया एक बडे पत्थरपरसे गुजरनेके बाद पडे धक्केसे संवरते हूए बोला.

अपने मेकॅनिकके पेशेके अनुसार उसने एकदम बराबर मिसाल दी थी.

गणेश येडेकी तरफ इशारा करते हूए मजाकमें बोला, " वैसे इस येडेके नट बोल्ट हो होकर कितने ढिले होनेवाले है ... क्योंकी उसके नट बोल्ट तो पहलेसेही ढिले है ."

बबन गणेशको ताली देकर जोर जोरसे हंसने लगा था. और फिर उसकी हंसी रोके नही रुक रही थी. काफी देर तक वह पेट पकड पकड लोट पोट होकर हंसता रहा.

बेडपर लेटे लेटे गणेश अपनी विचारोंकी श्रुंखलासे बाहर आ गया. बाहर कोई अजीबसी आवाजें आ रही थी. उसने लेटे लेटे ही करवट बदलकर खिडकीसे बाहर झांककर देखा. बाहर काफी अंधेरा हो गया था. साडेसात आठ बजे होंगे. वह बाहर क्या माजरा चल रहा है ध्यान देकर सुननेकी कोशीश करने लगा.

" बो बो ... बॅ बॅ ..." एक आदमीका कर्कश्य आवाज आ गया.

" ओ.. ऍ ... ना .. ना ... ना" उसके पिछेही तुरंत एक स्त्रीका कर्कश्य आवाज आ गया.

गणेश करवट बदलकर फिरसे सोनेकी कोशीश करने लगा. लेकिन वे अजिबसी आवाजे बार बार आने लगी थी. मानो कोई झगड रहा हो. बिचमेंही मधुराणीका जोरसे ठहाका लगाकर हंसनेका आवाज आ गया. अब गणेश अपने आपको रोक नही सका. वह उठकर बैठ गया. बाहर क्या चल रहा है यह पता करनेकी उसे उत्कंठा होने लगी थी. तुरंत उठकर, कपडे बदलकर वह कमरेसे बाहर निकल गया.

बाहर गणेशने देखा की एक 21-22 सालका जवान लडका और 18-19 सालकी जवान लडकी एकदुसरेसे झगड रहे थे. जिस तरह से वे झगड रहे थे, उससे ऎसा लग रहा था की वे दोनोभी गुंगे हो. उनका झगडा देखकर पलभरके लिए गणेशभी मनही मन मुस्कुराया. उसने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखा. वह अभीभी वह झगडा देखकर हंस रही थी. वह देखकर गणेश भी अपने आपको उसकी दुकानकी तरफ़ जानेसे नही रोक सका.

" गणेशराव ... देखोयो तो गुंगे कैसे झगडत रहे ... दुइ गुंगे झगडते पहले कभी देखा है जी ?" गणेशको देखकर वह बोली.

" नही ... ... पहली बार देख रहा हूं " गणेशने उसके हंसीमें अपनी हंसी मिलाते हूए जवाब दिया.

"पता है क्यों झगड रहत ?"

गणेशने उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" वुई क्या हूई गवा की ... ई गुंगा जा रहा था लोटा लेकर .. उधर आदमीयोंके शौच की खुली जगा की तरफ़...और गुंगी जा रही उधर औरतोकी शौच की खुली जगा की तरफ़ ... अंधेरेमें दोनोकी टक्कर हुई गवा ,,, और दोनोके पानीके लोटे उंडेल गए रहत ... " मधुराणी गणेशकी ताली लेकर फ़िरसे जोरसे हंसने लगी.

गणेशभी जोरसे हंसने लगा.

आज काफ़ी देर तक गणेश और मधुराणी गप्पे मारते हूए बैठे थे. तभी एक आदमी जल्दी जल्दी मधुराणीके पास आगया. उसकी सांस फ़ुली हूई थी. और वह बोलने लगा.

" जरा हौले ... पहले अपना फ़ुली हूई सांस तो ठिक कराइ लियो और फ़िर बोलीयो... मै यही हूं... मै कही भाग जानेवाली नाही ? " मधुराणी उस आदमीसे मजाकमें बोली.

उसने रुककर गणेशकी तरफ़ देखकर अपना फ़ुली हूई सांस ठिक की और जेबसे चाबी निकालकर मधुराणीको देते हूए वह बोला, " ई लो ... पंधरा गोनी होई गवा .. और तुमरे गोडाऊनमें रखवा दिए रहत "

वह चाबी मधुराणीके हाथमें थमाते हूए बोला. मधुराणी ने कुछ काम का बहाना बनाते हूए दुसरी तरफ़ मुडकर कुछ ढुंढने लगी. और उधरही मुंह रखते हूए उसे बोली, " रखियो ऊंहा गल्लेपर "

उस आदमीने मुरझे हूए चेहरेसे वह चाबी सामने गल्लेपर रख दी. मधुराणीने उसके पिछेसे बही खाता और पेन ढुंढकर निकाला. फ़िर सामने उस आदमीकी तरफ़ मुडते हूए बोली.

" सिरफ पंधरा गोनी ... पिछले बखत तो जादा हुई गवा "

" क्या बात करती रही ? ... पिछले बखत तो सिरफ बारा गोनी हुई गवा ..."

" पिछले बखत बोयाभी कम था ना "

" हां उ सब ठिक है ... लेकिन औसत तो उतनीही आनी चाहिए ना "

मधुराणी बही और पेन गणेशके पास देते हूए बोली ,

" गणेशराव जरा निकाईलो तो औसत ... हां तुम जरा बताईयो तो "

तो आदमी बोला, " पिछले बखत ... ढाई एकडमे बारा गोनी हुई गवा ... और इस बखत तिन एकडमें पंधरा गोनी ..."

गणेश बहीपर गिनती और हिसाब करने लगा.

" नही मधुराणी इसबार औसत अच्छा आया है ... इसबार पांचका तो पिछले बार चार दशमलौ आठ का "

" अरे मुझे तो ये मालूम रहा ... संभाजीरावपर पुरा भरोसा है हमरा ... हम तो ऐसेही उनका मजाक कर रहत ... ... क्यो संभाजीराव? " मधुराणी संभाजीरावकी तरफ मुस्कुराकर देखते हूए बोली.
 
संभाजीरावभी शरमाकर हंस दिए.

" ठिक है जाता हूं फिर ... " वह बोला.

मधुराणी उसकी तरफ देखकर फिरसे मुस्कुरा दी... मानो हंसनेके बोलीमें कह रही हो... ' ठिक है ...अब तशरफ ले जा सकते है "

वह चला गया.

वह नजरोंसे ओझल होतेही मधुराणी बोली " बदतमीज कलमुहा ... काम तो अच्छा करत है ... कडी मेहनत भी करत है ... लेकिन .नजदीकी बढानेकी कोशीश करत है... अभी देखाना कैसन चाबी मेरे हाथमे थमानेकी कोशीश कर रहा था... हाथको छुनेकी कोशीश करेगा .... अपने घरमें मां बहन नाही ... "

यह बोला हुवा गणेशकोभी लागू होता था इसलिए गणेशकोभी शर्मींदगी महसुस हो रही थी.

छटसे मधुराणी गणेशके जांघपर थपथपाते हूए बोली , " मतलब उकी औकातभी तो उतनी होनी चाहिए जी जी "

गणेशका चेहरा फिरसे खिल गया. उसने सोचा -

अच्छा तो कमसे कम मुझे तो नही बोला मधुराणीने ...

मै उसके लिए अपवाद जो हूं ...

लेकिन यह किसी मजबुर बेवा औरतकी मजबुरीका लाभ उठाना बराबर नही लोगोंका...

" गणेशराव आपका हिसाब तो एकदम भारी दिखता है जी ... बहुत जल्दी किया ... नाही मालूम था की गणितमेभी आप इतने निपूण रहत ... "

" मधुराणी आप तो तारिफोंके पुल बांध कर अब तो मुझे शर्मींदा कर रही हो .." गणेश शर्माकर बोला.

वहां दूकानमें या आसपास कोई नही था. उसका फायदा उठाते हूए मधूराणी इतराते हूए बोली,

" गणेशराव मुझे ... ऐस आप वैगेरे मत कहियो ... "

गणेशने चमककर उसकी आंखोमें देखा. उसकी आंखोमें उसे मदभरे भांव उभरते हूए नजर आ रहे थे. गणेशको उसके कान गरम होनेजैसा अहसास होने लगा था.

" सिरफ मधू कहा तो चलेगाजी ... या फिर राणी चलेगा ... हां राणीही ठिक रहेगा "

गणेशका गला सुखने लगा था. उसके हाथपैरमें कंपन महसूस होने लगी थी. उसने झेंपकर अपनी नजर मधूराणीके चेहरेसे हटाकर निचे झुकाई . फिरभी उसे अहसास हो रहा थाकी अबभी मधूराणी लगातार एकटक उसके चेहरेकी तरफ ही देख रही है. मानो आज वह उसे अपनी आंखोसे पी लेना चाहती हो.

" आपके दुकानका हिसाब किताब कौन रखता है " वह कुछ तो बात बनानेकी कोशीश करते हूए बोला.

" मै ही रखती हूं जी ... क्यो ? ... मुझे अनपढ तो नाही समझ रही ... ?" मधुराणी जोरसे हंसते हूए बोली.

" नही वैसे नही ... " वह हडबडाकर संभलते हूए बोला.

" उ पडोसका विलास करता है हमरी सहायता कभी कभी ..."

" नही .. मैने सोचा कभी कभी मैभी सहायता करता जाऊंगा आपकी ."

" आपकी ..." उसने टोका.

" नही मतलब ... तुम्हारी ' ऐसा कहते हूए गणेशका चेहरा शरमके मारे लाल लाल हुवा था.

"वैसे सहायता की कोनी जरुरत तो नाही... पर सहायता करनेका कोई दुसरा कोई मक्सद रहा तो चलेगा ' फिरसे मधूराणी उसकी आंखोमें आखें डालकर बोली.

उसने फिरसे शर्माकर अपनी नजर झुकाई. वह अब उसके सामने रखे लकडीके संदूक की तरफ देखने लगा. संदूकपर रखा मधूराणीका हाथ ऐसेही संदूकसे खेल रहा था. उसकी हाथके हर हरकतसे उसके मनकी चंचलता स्पष्ट झलक रही थी. गणेश अब अपना ढाढस बांधनेकी कोशीश करने लगा. उसकी आंखोमें देखनेकीतो हिम्मत नही बन रही थी उसकी.

लेकिन नही वह मुझे सिग्नलपर सिग्नल दे रही है ...

उसके सिग्नलका जवाब देना अब जरुरी है ...

नही तो मुझे वह क्या समझेगी ... नंपूसक ...

नही ... कुछ तो जवाब देनाही चाहिए ....

उसके दिमागमें सोच का चक्र जोर जोरसे घुम रहा था. वह अब अपने हर हरकतके परिणामके बारेमें सोचने लगा.

साली अपने गले पडी तो ? ...

बडी मुश्कील हो जाएगी ...

सिर्फ मजा मारने तक तो बात ठिक है ...

जाने दो ... बाद का बादमें देखा जाएगा ...

पहले ... उसके सिग्नकलका जवाब तो देते है ...

उसने उसकी चेहरेकी तरफ देखा. उसकी नशिली नजर अभीभी उसे पी रही थी. फिरसे झेंपकर उसकी नजर झुक गई. अब तो उसे अपने आपपर गुस्सा आने लगा था.

मुरख वह इतनी तुझे सिग्नल पर सिग्नल दे रही है ..

और तुम किसी निर्जीव वस्तूकी तरह उसके सामने सिर्फ बैठे हो ...

अपने हाथपैर फुलाकर ...

नही ... कुछतो करनाही चाहिए ...

अब लोहा गरम होकर लाल लाल हो चुका है ...

यही सही वक्त है ... घाव करनेके लिए ...

आखिर उसने तय किया... .

उसकी तरफ देखना तो मुमकिन नही है... .

उसकी आंखोमें देखनेपर ... न जाने क्यो सौ तपते सुरज की तरफ देखे जैसा होकर आखे चौध जाती है...

कमसे कम ... निची गर्दन रखकर भी मै बहुत कुछ कर सकता हुं...

मै उसका हाथ तो अपने हाथमें ले सकता हूं...

वह धीरे धीरे अपनी हिम्मत बटोरकर अपना हाथ उसके संदूकपर रखे हाथकी तरफ खिसकाने लगा. उसके हाथमें कंपन होने लगी थी. पैरभी अब कांपने लगे थे. वह अपने कांपते हाथको किसी तरह काबुमें करनेकी कोशीश करते हूए उसकी तरफ खिसकाने लगा. बाहर इतनी ठंडी हवा बह रही थी फिरभी वह पसिना पसिना हो गया था. आखिर उसने बडी हिम्मत कर अपने कंपकपाते हाथका हमला उसके हाथपर बोल दिया. लेकिन ये क्या?... उसके पहलेही उसने अपना हाथ वहांसे झटसे उठा लिया था. वह एकदम मुरझा सा गया. उसे अपमानीत महसूस होने लगा था. तभी मधुराणीका आवाज आया,

" बापू ... तनिक संभालके... थोडी कम लियो ... नाही तो कल जैसे गटरसे उठाकर लाना पडेगा... "

गणेशने अपनी शर्मींदगीसे निची झुकी गर्दन उपर उठाकर देखा. मधुराणीके सामने दो - तिन दिनकी दाढी बढा हुवा एक वयस्क देहाती खडा था. उसने मधुराणीके सामने अपना हाथ फैलाया था. और मधुराणीने एक एकके दो सिक्के उसके हाथपर रख दिए थे. उस आदमीने वे सिक्के ले लिए और कुछ ना बोलते हूए वहांसे चल दिया.

अच्छा मतलब मधुराणीने वह आदमी आया था इसलिए झटसे अपना हाथ पिछे खिंच लिया था...

नहीतो उसे बडे कठिण समयसे गुजरना पड सकता था ...

मधुराणीने सतर्कतासे वह समय टाला था...

गणेशने सोचा. उसे सचमुछ उसकी तत्परताका बडा आश्चर्य लग रहा था.

सचमुछ अपनी आंखोमे खो जानेके बावजुद उसका सब तरफ खयाल था. ...

और मै ...

सचमुछ उसकी सतर्कताकी जितनी तारिफ की जाए उतनी कम थी...

अब उसके चेहरेसे अपमानके भाव मिटने लगे थे. उसने मधुराणीकी तरफ देखा. वह उसकी तरफ नटखटसी देखते हूए उठ गई.

" कौन था वह ?" वह अपने चेहरेके भाव छिपानेकी चेष्टा करते हूए बोला.

" ससूरा " वह बोली. " चलियो बहुत देरी हुई गवा ... दूकान बंद करना पड़ेगा ... नहीतो लोग ..." वाक्य आधाही छोडते हूए वह दुकान बंद करने की तैयारी करने लगी.

" ठिक है मैभी निकलता हूं ..." वह खडा होते हूए बोला.

वह फिरसे उसकी तरफ देखते हूए नटखटसी हंस दी और अपने काममें फिरसे व्यस्त हो गई. मानो कुछ हुवाही ना हो. सचमुछ उसका एक अवसर से दुसरे अवसरमें चपलतासे प्रवेश करनेका हुनर प्रशंशा करनेलायक था.

वह उसकी बिजलीसी तेज हरकतोंकी तरफ देखते हूए अपने कमरेकी तरफ मुडा. वह भारी कदमोंसे अपने कमरेकी तरफ जा रहा था. दरवाजेकेपास खडे होकर उसने एक बार मुडकर मधुराणीकी तरफ देखा. उसनेभी उसकी तरफ देखा. अबभी वह नटखट मुस्कान उसके चेहरेपर फैली हुई थी.

आज गुरुवार होनेसे साप्ताहीक बाजार था . सुबहसे रास्तेपर भिड और वातावरणमें एक उत्साह भरा हुवा दिख रहा था. उजनीको साप्ताहीक बाजारके बहाने आसपासके गांवके लोग आते थे. गणेश सुबह सुबह नहा धोकर अपने ऑफीसकी तरफ चल पडा. आज साप्ताहीक बाजार होनेसे आसपासके गांवके लोगभी उसकेपास आनेवाले थे. मतलब रोजके मुकाबले आज कामका बोझ जरा जादा ही होनेवाला था. इसलिए वह अपने कमरेसे थोडा जल्दीही बाहर निकल गया. जाते हूए उसने एकबार मधुराणीकी दुकानकी तरफ नजर दौडाई. और मधूराणीनेभी जवाब दिया - एक मिठीसी मुस्कान देकर. ऑफीसकी तरफ जानेवाले उसके कदम अपने आपही उसकी दुकानकी तरफ मुडे. अभी अभी उसने दुकान खोला था. दूकानमें दुसरा कोई ग्राहक नही दिख रहा था. और उसका नौकरभी नही आया था. या फिर उसे कही और भेजा गया होगा.
 
" आवोजी गणेश " 'गणेश' पर कुछ जादाही जोर देते हूए वह बोली.

उसने 'गणेश' थोडा धीरेसे और हिचकिचाते हूए संबोधीत किया था.

उसने पहली बार गणेशको 'गणेश' ऐसा संबोधीत किया था. यूतो वह उसे 'गणेशराव' करके संबोधीत करती थी.

गणेशके दील की धडकन तेज हो गई.

" क्या दूं जी ? ... बोलोयो तो "

' क्या दूं? ' पर जोर देकर एक खास अदासे बोलते हूए मानो वह कुछ और ही जताना चाहती थी.

गणेश गडबडा गया. उसका दिल जोर जोरसे धडकने लगा. चेहरा लाल लाल होने लगा था. उसने इधर उधर देखा. उसे क्या किया जाए कुछ सुझ नही रहा था. भलेही दुकानमें उसके और मधुराणीके अलावा कोई नही था, लेकिन रास्तेपर बाजार जानेवाले लोग दिख रहे थे.

" सिगारेट दिजिए " किसी तरह वह बोला.

" दिजिए ?" उसने प्रश्नार्थक मुद्रामें गणेशकी तरफ देखकर टोका.

उसकी तिरछी नजर उसे उकसा रही थी.

" मतलब दो .." उसने हिम्मत कर उसे संबोधीत किया.

उसने एक सिगारेट निकालकर उसके हाथपर रख दी. गणेशने सिगारेट लेनेके बहाने उसका हाथ अपने हाथमें लिया. मधुराणीने शर्माकर गर्दन झुकाकर अपना हाथ अदबसे उसके हाथसे छुडा लिया. तभी एक ग्राहक वहां आ टपका. अब गणेशके पास उसके जानेकी राह देखनेके अलावा कोई रास्ता नही था. उस ग्राहकने कुछ खरीदा और जाने लगा तो गणेशको सुकुन महसूस होने लगा. लेकिन तुरंत वहा दुसरा एक ग्राहक आगया. और उसके पिछे तिसरा, चौथा ... ऐसे ग्राहकोका तांताही लग गया.

'' अच्छा निकलता हूं'' उसके मुंह मे आया '' राणी'' संबोधन को मुश्कीलसे निगलकर उसने कहा.

मधूराणी सिर्फ उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दी. वह भारी कदमोसे अपनी ऑफीसकी तरफ चल दिया.

गणेश जब ऑफीसमें पहुंचा तब उसके टेबलके सामने काफी लोगोंकी भिड जमा हो गई थी. किसीको प्रमाणपत्र किसीकी सनद तो किसीके लोनके लिए लगनेवाले कागजाद. और किसीको सरकार ने एलान किए अनुदानके लिए कागजाद चाहिए थे. गणेशने आएबराबर तुरंत काम शुरु कर दिया. शायद कामके साथ मिलनेवाले उपरके कमाईके कारण उसे काममें कुछ थकावट महसुस नही होती थी. बाहर चबुतरेपर पांडू पैसे इकठ्ठा करनेके लिए बैठा था. पहलेभी जब खराडे साहब थे तबभी वह वही काम करता था. वह लोगोंको अंदर भेजनेके पहलेही उनसे पैसे ऐठता था और उनके पास एक परची देता था. पांडू जादा कुछ पढा लिखा नही था. भलेही वह सिर्फ दुसरी कक्षा तक ही पढा था, फिरभी परची लिखनेका काम वह बखुबी निभाता था. पांडूको बाहर बिठानेसे गणेश के दो काम आसान होते थे. एक तो पैसे खुद नही लेने पडते थे, जिसके कारण ऍन्टी करप्शनवालोंका कोई डर नही रहता. वैसे ऍन्टी करप्शनवाले इतने बेमालूम तरीकेसे और वह भी इतने दूर देहातमें आनेवाले नही थे , इसका गणेशको अंदाजा था. लेकिन नही कभीभी किसीभी मुसिबतके लिये तैयार रहना सबसे बेहतर होता है. गणेशको पांडूका दुसरा फायदा यह था की लोगोंको क्या चाहिए यह जाननेके लिए गणेशको फालतूकी मगजमारी करनेकी जरुरत नही पडती थी. दिनके आखिरमें गणेशभी पांडूको कुछ इनाम देकर खुश करता था. उस इनाम के लालचमेहीतो वह दिनभर गणेशका काम करता था.

एक एक को निबटने के बाद गणेशके टेबलके सामने अब एकमात्र देहाती बच गया था. उस अकेलेको देखकर गणेशने चैनकी सांस ली. और फिर घडीमें देखा. लगभग एक बजनेको था. सुबहसे उसने पाणी तक पिनेका वक्त नही मिला था. अब उसका पेट भूखसे बेहाल होगया था. प्याससे गला भी सुख गया था. उसने सोचा की बस इस एक देहातीको निबट लूं तो बाहर बाजारमें एक चक्कर मारते है और खानेको कुछ मिलता है क्या यह देखते है. तभी एक लडका अंदर आगया. उसके हाथमे पितलका एक ग्लास था. उसने कुछ ना बोलते हूए वह भरा हुवा ग्लास गणेशके सामने रख दिया और बिना कुछ बोले चल दिया.

'' अरे ... ये क्या है?'' गणेशने उस लडकेको छेडा.

'' मालूम नाही'' उसने कंधे उचकाकर जवाब दिया, '' पांडूदा भेज रहत '' उसने आगे कहा और वह चल दिया.

गणेशने पहले ग्लासके अंदर झांककर देखा और फिर एक घुंट लिया. उसे अच्छा लगा. बाहर बैठे पांडूने कहीसे जुगाड जमाकर इस ठंडे शरबतका इंतजाम किया था. शरबत सौफसे बनाया हुवा था. मटकेके ठंडे पाणी मे शक्कर डालो और फिर उसमें सौफकी पाउडर बनाकर डालो और कपडेमेंसे उसे खंगालो - बस होगया शरबत - सौफका शरबत. गणेशने इस तरीकेका सौफका शरबत पहली बार इस उजनीमेंही पिया था. उसे वह खुब भाता था. बचा हुवा शरबत उसने झटसे चंद घुंटोमेंही गटक लिया. उसे प्यासही वैसी लगी थी. अब गणेशने उस बचे हूए एकमात्र देहातीको बुलाया. वह देहाती एक कदसे काफी उंचा 20-22 सालका लडका होगा.

'' क्या चाहिए ?'' गणेशने पुछा.

'' हमरे बाने भेज रहत '' उसने जवाब दिया.

'' अरे हां ठिक है तेरे बापने भेजा है... लेकिन क्या काम है यहतो बताएगा?'' गणेशने पुछा.

फिर वह दिमागपर जोर देकर याद करनेकी कोशीश करने लगा.

'' बाहर पांडूसे मिला?'' गणेशने पुछा.

'' जी '' उसने जवाब दिया.

'' फिर उसने कुछ परची तो दी होगी'' गणेश.

'' जी दि रहत ...'' उसने उपरके जेबसे एक मसलकर मुरझी हुई एक पर्ची निकाली और गणेशके हाथमें थमा दी.

'' अबे पागल हो क्या ...'' गणेशने चिढकर कहा.

गणेशने एकबार उस मसले हुए पर्चीकी तरफ देखा और फिर आश्चर्यसे उस लडकेकी तरफ देखा. गणेशने वह मसली हूई पर्ची खोलकर देखी और उसपर क्या लिखा है यह पढनेकी कोशीश की. लेकीन वह कागज इतनी बुरी तरह मसला हुवा था की उसपर लिखा हुवा पढना मुश्कील लग रहा था.

'' तुम्हे पढना लिखना आता है?'' गणेशने उस देहाती लडकेसे पुछा.
 
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