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Guest
साला देहातमें ये इलेक्ट्रीकका झमेला है ही ...
भले डीम क्यों ना हो ... इलेक्ट्रीक तो है ना ...
वही बहुत होगया....
सरपंचके नौकरने गद्दी डालकर उपर चद्दर वैगेरे डालकर पुरी तरह से तैयार की हुई देखकर उसे अच्छा लगा. कमरेमें आते हूए सामने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखना उसने जानबुझकर टाला था. अंदर आतेही उसने सामनेका दरवाजा अंदरसे कुंडी लगाकर बंद कर दिया और खुदको सोनेके लिए बिस्तर के हवाले कर दिया. वह बिस्तरपर अचलसा पडा रहा. वह बिस्तरपर देखनेकोतो अचल सा पडा था लेकिन उसके विचार रुकनेको तैयार नही थे. तन थक गया था लेकिन दिमाग थकनेके लिए तैयार नही था. वह सोचने लगा....
आज पुरा दिन सरपंचजीके साथ घुमनेमे और आफिसका काम करनेमें और खराडे साहबकी बकबक सुननेमें चला गया था. लेकिन ऐसा एकभी पल नही था की जब मधुराणी उसके मष्तीश्क के पटल से हट गई हो. पुरे वक्त वह उसके साथ उसके दिमागमें थी. उसकी वह उत्कट आंखे, उसकी वह शरारती हंसी, रह रहकर उसकी आंखोके सामने आती रही थी. और अबभी उसका वही हाल था. उसने उसे अपने दिमाग से झंझोरकर निकालनेके प्रयासमें करवट बदली. लेकिन उसके विचार थे की थमनेका नाम नही ले रहे थे. उसने सोचा की एखाद सिगरेट पी जाए ... तो शायद सुकुन मिले... उसे दिनमें कमसे कम एक या दो सिगरेट पिनेकी आदत थी. और आज उसने एकभी नही पी थी. लेकिन सिगरेट पिना मतलब साथमें दुकानपर जाना आही गया. लेकिन बादमें उसे क्या लगा क्या जाने, वह झटसे उठ गया.
मै उससे ऐसे कितने दिन बचने वाला हूं.....
किसी समस्यासे बचनेके लिए उससे दुर भागनेसे उसका सामना करना कभीभी उचीत होता है...
वह उठकर खडा हो गया, बाथरुममें गया. मटकेसे ठंडा-ठंडा पाणी लेकर हथेलीसे मुंह पर छिडका. बगलमें पितलका लोटा रखा था. उससे मटकेमेंसे पाणी लेकर उसने अपने हाथ पैर पर डाला. फिर वैसेही वापस आकर अपने बॅगके पास चला गया. बॅग खोली. बॅगमध्ये उपरही साफ सुथरे तरीकेसे रखा हुवा तौलीया था. उसने वह निकाला. मुंह पोंछ लिया. मुंह पौछते हूए टावेसे आ रही वाशींग पावडर की सौंधी सौंधी खुशबुसे उसके दिलको ठंडकसी महसूस हूई. कुछ क्षण के लिए क्यों ना हो उसे अपने बिवीकी याद आगई. उसने बॅगसे सारे कपडे उठाकर बॅगकी तहमें सबसे निचे देखा. वहां उसका बिवी और लडकेके साथ खिंचा फॅमीली फोटो रखा हुवा था.
दूर जानेके बादही अपने लोगोंका महत्व महसुस होता है...
उसने सोचा और फिरसे सारा सामान बॅगमें ठिकसे रख दिया. अब वह खडा होकर हाथपैर पोछने लगा. हाथपैर पोछनेके बाद उस गिले तौलीएको कहां सुखनेके लिए टंगाया जाए इसके लिए जगह ढूंढने लगा. दिवार पर उसे एक जगह एक अंकुडा दिखा. उसने वह तौलीया वहां सुखनेके लिए टंगा दिया. तौलीया लटकाते हूए उसका ध्यान खुली खिडकीसे बाहर दुकानकी तरफ गया. दुकानपर अब काफी भिड इकठ्ठा हो गई थी. शाम का वक्त होनेसे शायद. चबुतरेपरभी लोग समुह बनाकर बाते कर रहे थे. उन समुहमें कोई बिडी फुंक रहा था तो कोई चिलम भर रहा था तो कोई तंबाकू मसल रहा था. दरवाजेके पास जाकर उसने चप्पल पहन ली और दरवाजा खोलकर , दरवाजेको ताला लगाकर, वह बाहर निकल गया. बाहर चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंकी चिकित्सक नजरोने उसे घेर लिया. फिरसे लोग अपने अपने कामोंमें मशगुल होनेके बाद वह एक समुहके करीब चबुतरेपर अकेलाही बैठ गया. वह समुह शादीको आए जवान लडकोंका था. लडके छुपछुपकर दुकानके गल्ले की तरफ देखनेमें मशगुल थे. गणेश, उसका उस लडकोंकी तरफ बिलकुल खयाल नही ऐसे जताते हूए वहां बैठा रहा.
" इसेतो खेतमाँ ले जाकर मसलना चाहिए .. " उस समुहसे एक मधुरानी की तरफ देखते हूए बोला.
" देखियो जादा मसलेगा तो घुटने फुट जावेंगे " दुसरेने कहा.
फिर सारा समुह जोरसे हंसने लगा.
' शीशी .... ए लडके तो बहुतही घटीया किस्म के लगते है... ' गणेशने मनही मन सोचा.
और वह वहांसे उठकर मधुराणीके दुकानके सामने जाकर कब खडा हुवा उसेभी पता नही चला. मधुराणी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्काई. दिनभर दुकानपर बैठनेके बादभी ना उसकी हरकतोंमें ना उसकी हावभावोंमे कुछ थकावट दिख रही थी. अबभी वह किसी खिले हूए फुलकी तरह तरुण ताजा लग रही थी.
" बोलो साबजी क्या दूं " उसने कहा.
" थोडी एक वील्स चाहिए थी... "
" थोडी क्यूं... पुरीही ले लियो जी " उसने मजाकिया अंदाजमें कहा और खिलखिलाकर हंसने लगी.
गणेशभी उसके साथ हंसने लगा.
" ए एक व्हील देइयो बाबूजी को " उसने अपने नौकरको फर्माया.
वह नौकर लडका एक एक ग्राहक को सामान देनेमें व्यस्त था.
मतलब उसे और थोडा समय लगने वाला था.....
गणेशने अपने आसपास - इर्दगीर्द एक नजर दौडाई. वहां औरभी कुछ ग्राहक खडे थे. उनमेंसे एक 7-8 सालकी सुती मटमैला, जगह जगह फटा और मरम्मत किया हुवा फ्रॉक पहने हूए एक प्यारीसी लडकी खडी थी. उसने सरको काफी मात्रामें तेल लगाया हुवा था और उसकी छोटी छोटी दो चोटीयां मैले रिबनसे बंधी हुई थी. उसके हाथके उंगलीमें रस्सीसे बंधी हूई एक कांच की शीशी लटकी हूई थी.
" ताई... एक छताक गोडतेल " वह लडकी मधुराणीकी तरफ देखकर बोली.
मधुराणीभी उसकी तरफ बडे लाड प्यारसे देखते हूए बोली.
" देती हूं ... गुडीया थोडा रुकियो तो ... " मधुराणी उसका गाल पकडते हूए बोली.
" बर्फहुर्फुतर्फ दिर्फीनोर्फो बार्फादर्फ दिर्फीखीर्फी " मधुराणी इतने जल्दीमें उसे कुछ बोली.
" मार्फामार्फाकेर्फे गार्फावर्फ गर्फईर्फी थीर्फी ' उस लडकीनेभी कुछ जवाब दिया.
गणेश मंद मंद मुसकाते हूए सब देख सुन रहा था. लेकिन उन्होने क्या कहा गणेश के कुछभी समझमें नही आया था.
" क्या?... क्या बोले आप लोग ...? " गणेशने उत्सुकतावश पुछा.
" कुछ नाही ... वह हमरी खास बोली है जी ... " मधुराणी नटखटसी हसती हुई उस लडकीका फिरसे गाल पकडती हुई बोली.
शायद वह उनकी कोई सांकेतीक बोली थी. गणेशको याद आया... उसके बचपनमेंभी उसकी बहने ऐसीही कुछ अजीब भाषामें उसके सामने बोलती थी. और उसने पुछा तो उसे कुछ एक नही बताती थी. उसने बहुत कोशीश की थी, लेकिन उसकी बहनोंने आखरी तक उसे उस भाषा का राज नही बताया था.
उस छोटे लडकीके बगलमें एक धोती पहनी हूई बुढी महिला खडी थी. और उसे लगकर एक साडीसी धोती पहनी हुई और एक, शायद मुलाजीम महिला खडी थी. आसपास देखते हुए अनायासही गणेश का खयाल उपर आसमानकी तरफ गया. काफी अंधेरा छा गया था. तभी रास्तेपर सिमेंटके पोलपर टंगे इलेक्ट्रीक दिए जल गए. गणेशने गौर किया की चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंने एक हाथसे क्यो ना हो उन दियोंका अभिवादन किया था.
गणेश फिरसे अंतर्मुख अपनी सोच शृंखलामें लिन हो गया. उसने महसुस किया की अब जब वह मधुराणीके सामने खडा था और उसकी तरफ देख नही रहा था तब उसके दिलकी बेचैनी थोडी कम सी हुई थी.
" ये लो साबजी "
उसकी मधूर स्वरसे वह फिरसे अपनी सोच से बाहर आ गया.
भले डीम क्यों ना हो ... इलेक्ट्रीक तो है ना ...
वही बहुत होगया....
सरपंचके नौकरने गद्दी डालकर उपर चद्दर वैगेरे डालकर पुरी तरह से तैयार की हुई देखकर उसे अच्छा लगा. कमरेमें आते हूए सामने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखना उसने जानबुझकर टाला था. अंदर आतेही उसने सामनेका दरवाजा अंदरसे कुंडी लगाकर बंद कर दिया और खुदको सोनेके लिए बिस्तर के हवाले कर दिया. वह बिस्तरपर अचलसा पडा रहा. वह बिस्तरपर देखनेकोतो अचल सा पडा था लेकिन उसके विचार रुकनेको तैयार नही थे. तन थक गया था लेकिन दिमाग थकनेके लिए तैयार नही था. वह सोचने लगा....
आज पुरा दिन सरपंचजीके साथ घुमनेमे और आफिसका काम करनेमें और खराडे साहबकी बकबक सुननेमें चला गया था. लेकिन ऐसा एकभी पल नही था की जब मधुराणी उसके मष्तीश्क के पटल से हट गई हो. पुरे वक्त वह उसके साथ उसके दिमागमें थी. उसकी वह उत्कट आंखे, उसकी वह शरारती हंसी, रह रहकर उसकी आंखोके सामने आती रही थी. और अबभी उसका वही हाल था. उसने उसे अपने दिमाग से झंझोरकर निकालनेके प्रयासमें करवट बदली. लेकिन उसके विचार थे की थमनेका नाम नही ले रहे थे. उसने सोचा की एखाद सिगरेट पी जाए ... तो शायद सुकुन मिले... उसे दिनमें कमसे कम एक या दो सिगरेट पिनेकी आदत थी. और आज उसने एकभी नही पी थी. लेकिन सिगरेट पिना मतलब साथमें दुकानपर जाना आही गया. लेकिन बादमें उसे क्या लगा क्या जाने, वह झटसे उठ गया.
मै उससे ऐसे कितने दिन बचने वाला हूं.....
किसी समस्यासे बचनेके लिए उससे दुर भागनेसे उसका सामना करना कभीभी उचीत होता है...
वह उठकर खडा हो गया, बाथरुममें गया. मटकेसे ठंडा-ठंडा पाणी लेकर हथेलीसे मुंह पर छिडका. बगलमें पितलका लोटा रखा था. उससे मटकेमेंसे पाणी लेकर उसने अपने हाथ पैर पर डाला. फिर वैसेही वापस आकर अपने बॅगके पास चला गया. बॅग खोली. बॅगमध्ये उपरही साफ सुथरे तरीकेसे रखा हुवा तौलीया था. उसने वह निकाला. मुंह पोंछ लिया. मुंह पौछते हूए टावेसे आ रही वाशींग पावडर की सौंधी सौंधी खुशबुसे उसके दिलको ठंडकसी महसूस हूई. कुछ क्षण के लिए क्यों ना हो उसे अपने बिवीकी याद आगई. उसने बॅगसे सारे कपडे उठाकर बॅगकी तहमें सबसे निचे देखा. वहां उसका बिवी और लडकेके साथ खिंचा फॅमीली फोटो रखा हुवा था.
दूर जानेके बादही अपने लोगोंका महत्व महसुस होता है...
उसने सोचा और फिरसे सारा सामान बॅगमें ठिकसे रख दिया. अब वह खडा होकर हाथपैर पोछने लगा. हाथपैर पोछनेके बाद उस गिले तौलीएको कहां सुखनेके लिए टंगाया जाए इसके लिए जगह ढूंढने लगा. दिवार पर उसे एक जगह एक अंकुडा दिखा. उसने वह तौलीया वहां सुखनेके लिए टंगा दिया. तौलीया लटकाते हूए उसका ध्यान खुली खिडकीसे बाहर दुकानकी तरफ गया. दुकानपर अब काफी भिड इकठ्ठा हो गई थी. शाम का वक्त होनेसे शायद. चबुतरेपरभी लोग समुह बनाकर बाते कर रहे थे. उन समुहमें कोई बिडी फुंक रहा था तो कोई चिलम भर रहा था तो कोई तंबाकू मसल रहा था. दरवाजेके पास जाकर उसने चप्पल पहन ली और दरवाजा खोलकर , दरवाजेको ताला लगाकर, वह बाहर निकल गया. बाहर चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंकी चिकित्सक नजरोने उसे घेर लिया. फिरसे लोग अपने अपने कामोंमें मशगुल होनेके बाद वह एक समुहके करीब चबुतरेपर अकेलाही बैठ गया. वह समुह शादीको आए जवान लडकोंका था. लडके छुपछुपकर दुकानके गल्ले की तरफ देखनेमें मशगुल थे. गणेश, उसका उस लडकोंकी तरफ बिलकुल खयाल नही ऐसे जताते हूए वहां बैठा रहा.
" इसेतो खेतमाँ ले जाकर मसलना चाहिए .. " उस समुहसे एक मधुरानी की तरफ देखते हूए बोला.
" देखियो जादा मसलेगा तो घुटने फुट जावेंगे " दुसरेने कहा.
फिर सारा समुह जोरसे हंसने लगा.
' शीशी .... ए लडके तो बहुतही घटीया किस्म के लगते है... ' गणेशने मनही मन सोचा.
और वह वहांसे उठकर मधुराणीके दुकानके सामने जाकर कब खडा हुवा उसेभी पता नही चला. मधुराणी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्काई. दिनभर दुकानपर बैठनेके बादभी ना उसकी हरकतोंमें ना उसकी हावभावोंमे कुछ थकावट दिख रही थी. अबभी वह किसी खिले हूए फुलकी तरह तरुण ताजा लग रही थी.
" बोलो साबजी क्या दूं " उसने कहा.
" थोडी एक वील्स चाहिए थी... "
" थोडी क्यूं... पुरीही ले लियो जी " उसने मजाकिया अंदाजमें कहा और खिलखिलाकर हंसने लगी.
गणेशभी उसके साथ हंसने लगा.
" ए एक व्हील देइयो बाबूजी को " उसने अपने नौकरको फर्माया.
वह नौकर लडका एक एक ग्राहक को सामान देनेमें व्यस्त था.
मतलब उसे और थोडा समय लगने वाला था.....
गणेशने अपने आसपास - इर्दगीर्द एक नजर दौडाई. वहां औरभी कुछ ग्राहक खडे थे. उनमेंसे एक 7-8 सालकी सुती मटमैला, जगह जगह फटा और मरम्मत किया हुवा फ्रॉक पहने हूए एक प्यारीसी लडकी खडी थी. उसने सरको काफी मात्रामें तेल लगाया हुवा था और उसकी छोटी छोटी दो चोटीयां मैले रिबनसे बंधी हुई थी. उसके हाथके उंगलीमें रस्सीसे बंधी हूई एक कांच की शीशी लटकी हूई थी.
" ताई... एक छताक गोडतेल " वह लडकी मधुराणीकी तरफ देखकर बोली.
मधुराणीभी उसकी तरफ बडे लाड प्यारसे देखते हूए बोली.
" देती हूं ... गुडीया थोडा रुकियो तो ... " मधुराणी उसका गाल पकडते हूए बोली.
" बर्फहुर्फुतर्फ दिर्फीनोर्फो बार्फादर्फ दिर्फीखीर्फी " मधुराणी इतने जल्दीमें उसे कुछ बोली.
" मार्फामार्फाकेर्फे गार्फावर्फ गर्फईर्फी थीर्फी ' उस लडकीनेभी कुछ जवाब दिया.
गणेश मंद मंद मुसकाते हूए सब देख सुन रहा था. लेकिन उन्होने क्या कहा गणेश के कुछभी समझमें नही आया था.
" क्या?... क्या बोले आप लोग ...? " गणेशने उत्सुकतावश पुछा.
" कुछ नाही ... वह हमरी खास बोली है जी ... " मधुराणी नटखटसी हसती हुई उस लडकीका फिरसे गाल पकडती हुई बोली.
शायद वह उनकी कोई सांकेतीक बोली थी. गणेशको याद आया... उसके बचपनमेंभी उसकी बहने ऐसीही कुछ अजीब भाषामें उसके सामने बोलती थी. और उसने पुछा तो उसे कुछ एक नही बताती थी. उसने बहुत कोशीश की थी, लेकिन उसकी बहनोंने आखरी तक उसे उस भाषा का राज नही बताया था.
उस छोटे लडकीके बगलमें एक धोती पहनी हूई बुढी महिला खडी थी. और उसे लगकर एक साडीसी धोती पहनी हुई और एक, शायद मुलाजीम महिला खडी थी. आसपास देखते हुए अनायासही गणेश का खयाल उपर आसमानकी तरफ गया. काफी अंधेरा छा गया था. तभी रास्तेपर सिमेंटके पोलपर टंगे इलेक्ट्रीक दिए जल गए. गणेशने गौर किया की चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंने एक हाथसे क्यो ना हो उन दियोंका अभिवादन किया था.
गणेश फिरसे अंतर्मुख अपनी सोच शृंखलामें लिन हो गया. उसने महसुस किया की अब जब वह मधुराणीके सामने खडा था और उसकी तरफ देख नही रहा था तब उसके दिलकी बेचैनी थोडी कम सी हुई थी.
" ये लो साबजी "
उसकी मधूर स्वरसे वह फिरसे अपनी सोच से बाहर आ गया.