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मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

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मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजी राव (प्रथम) और नर्तकी मस्तानी

की प्रेमगाथा पर केन्द्रित एक ऐतिहासिक उपन्यास


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बुंदेलखंड मध्य भारत में कमल के फूलों से लबालब भरी और कोसों दूर तक फैली बेलाताल झील के किनारे स्थिति राजपूतों का रियासती गढ़ है, जैतपुर (वर्तमान समय में ज़िला लक्ष्शीसराय, बिहार) ऋषि जयंत के नाम पर बसे जैतपुर के ऐन बीच पहाड़ी पर बना शाही किला दूर से ही नज़र आ जाता है। यह किला बुंदेल राजपूतों की आन, आबरू, बहादुरी, शक्ति और बलिदान का गवाह है। इस ऐतिहासिक किले ने बहुत सारा इतिहास अपनी कोख में संभालकर रखा हुआ है।

जैतपुर के इस शाही किले पर खड़े वृद्ध राजपूत महाराजा छत्रसाल ने दूरबीन आँखों पर लगाकर सुदूर क्षितिज तक देखा।

दूर से हवा में उड़ती धूल, भारी गिनती में घुड़सवार और पल पल करीब आ रहे मछली की पूंछ के आकार वाले केसरी रंग के लहराते मराठा परचम को देखते ही प्रसन्नता से उसकी बांछें खिल उठीं।

खुशी में झूमते चम्पत राय और लाल कंवर के पुत्र यानि बुंदेलखंड नरेश, महाराजा छत्रसाल ने दायें हाथ में पकड़ी गज़भर लम्बी दूरबीन को बायें हाथ की हथेली पर मारकर इकट्ठा कर दिया, “अब आएगा मज़ा ! इलाहाबाद के सूबेदार नवाब गज़नफर जंग अली मुहम्मद खान बंगस और उसके प्यादे दलेल खान की अटल मौत को उनका खुदा भी नहीं रोक सकता।... 1714 ई. को मध्य दोआब में फर्रूखाबाद नगर (अब कानपुर के समीप पड़ता उŸार प्रदेश का ज़िला), दिल्ली के बादशाह फरुखसियार के नाम पर बसाकर चापलूस मुहम्मतद खान ने एक वर्ष बाद नवाबी हासिल की और मुगल सेना का ‘बावन हज़ारी’ (Commander of 52,000 Soldiers) सेनापति बना था। बंगश कबीले की खागयई शाखा के ये शिया मुसलमान खुद को कौम-ए-बंगश कहलवाते हैं और रौहीला पठानों से अपने आप को उŸाम गिनते हैं। खुर्रम घाटी के बाशिंदे इस्माइल बंकेश के वंशज, ये बंगश अफ़गानी पठान सोचते हैं कि दुनिया पर इन्हीं का राज चलेगा और बाकी सबका ये नामोनिशान मिटा देंगे।... बंगश का पश्तो में अर्थ होता है - जड़ खोदने वाला। ये हमारी जड़ खोदने को घूमते हैं। शायद यह नहीं जानते, हम बुंदेली तो इनका बीज नष्ट कर देंगे। और फिर, दिल्ली के शहनशाह नसीर-उद-दीन मुहम्मद शाह (रौशन अख्तर) को भी सबक मिल जाएगा और दुबारा वह बुंदेलखंड पर हमला करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचेगा।... हम बुंदेलों ने तो औरंगजे़ेब आलमगीर और बादशाह बहादुर शाह जफ़र की ईन नहीं मानी... हुँह...।“

सेनापति बख़्शी हंसराज ने महाराजा छत्रसाल को बीच में टोका, “ओ हो, महाराज। ऐसा कौन-सा चमत्कार आपने देख लिया है जो आप फूले नहीं समा रहे। अब तक तो युद्ध में हम हार रहे हैं और हरामी बंगश हमारी फौजों पर भारी पड़े हुए हैं। किसी समय भी वह हमारे किले पर कब्ज़ा कर सकते हैं...। शहजादा जगतराज को तो उन्होंने बंदी बना लिया है।“

महाराजा छत्रसाल ने दूरबीन सेनापति हंसराज की ओर बढ़ाते हुए कहा, “सेनापति जी, आप खुद ही अपनी आँखों से देख लो। पेशवा बाजी राव हमारी जंगी इमदाद के लिए अपने लश्कर के साथ तूफान मचाता आ रहा है।“

सेनापति हंसराज ने महाराजा छत्रसाल से दूरबीन लेकर खोली और अपनी बायीं आँख मूंदकर दायीं आँख से दूरबीन में से देखता हुआ बोला, “वह तो ठीक है राजन। पर आप यह दावे से कैसे कह सकते हैं कि पेशवा जी की मदद से हमारी हार जीत में बदल जाएगी।“

“हंसराज, विजय हमारे कदम ही चूमेगी। युद्ध का निर्णयाक फैसला अवश्य हमारे पक्ष में होगा। मराठा बाजी राव एक ऐसा योद्धा है जो आज तक एक भी जंग नहीं हारा। चाहे वह 1723 ई. में मालवा की जंग थी, चाहे 1724 ई. में धार पर कब्ज़ा या औरंगाबाद पर विजय प्राप्त करना। ये अभी हाल में हुए पालखेड़ के युद्ध में बाजी राव के वीरतापूर्वक गाड़े झंडों को कौन भूल सकता है ? पेशवा बालाजी विश्वनाथ का यह सुपुत्र जन्मा ही चितपवन ब्राह्मण घराने में है। लेकिन कर्म से वह क्षत्रिय है और अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उसने युद्धक्षेत्र में ही व्यतीत किया है।“

महाराजा छत्रसाल अभी सेनापति को बाजी राव के विषय में बता ही रहा होता है कि पाँच रानियों में से उसकी पटरानी देव कंवर वहाँ किले की छत पर अपने पति महाराजा छत्रसाल से आ सम्बोधित होती है, “महाराज, योजनाएँ ही बनाते रहेगो या कुछ हाथ पैर भी मारोगे ? पता नहीं, क्या किया होगा उन्होंने हमारे पुत्र के साथ ? बहूसा पदमावती (छोटी रानी और शहजादा जगतराज की असली माँ) भी काफ़ी चिंतित है और रो रोकर उसने अपना बुरा हाल कर लिया है। जैत कुंवर (शहजादा जगतराज की पत्नी) का मन भी अस्थिर है। राम जाने, जगतराज ज़िन्दा भी है या...।“

महाराजा छत्रसाल तिलमिला उठता है, “शुभ शुभ बोलो...राणीसा। आप क्या समझती हैं, मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा हूँ ? मुझे कोई चिंता नहीं है ? आखि़रकार मेरा खून है वह। मैंने उसकी खोज खबर के लिए सिपाही और गुप्तचर भेजे हुए हैं...। वे आते ही होंगे। हुँह... कहती हैं, जैत कुंवर का दिल डूबता जाता है। मुझे चिन्ता है, कुछ ऐसा वैसा न हो जाए। चलो, चलकर देखते हैं। राणीसा, आप भी उसको हौसला देना। बुलाकर लाओ जैत कुंवर को मेरे पास।“

महाराजा छत्रसाल, सेनापति हंसराज और पटरानी देव कंवर किले के बुर्ज़ पर से उतरकर दरबार की ओर चले जाते हैं। जैत कंवर दरबार में आ उपस्थिति होती है।

“सादर प्रणाम काका जू।“

“कुंवर ! जैसे मुगल अपनी रखैलों और रानियों के लिए महिल शब्द का प्रयोग किया करते हैं, उसी प्रकार हम राजपूत कंवर शब्द का प्रयोग राजकुमारों, राजकुमारियों और रानियों के लिए किया करते हैं। संस्कृत के इस शब्द का अर्थ शाही होता है और हम इसे कुंवर पुकारते हैं। कुंवर में आम इन्सानों से कोई भिन्नता तो होनी चाहिए कि नहीं ? ऊँठों वालों से दोस्ती करके दरवाज़े बन्द करके नहीं रखते।“

जैत कंवर घबरा जाती है, “जी, मैं कुछ समझी नहीं ?“

महाराजा छत्रसाल अपनी पुत्रवधु की ओर रौब से देखता है, “मेरे कहने का तात्पर्य है कि तुम शाही परिवार की बहू हो। बुंदेलों की स्त्रियों के दिल बहुत कड़े होते हैं। तुम जगतराज की व्यर्थ चिन्ता न कर। कुंवर को आम स्त्री की अपेक्षा बहादुर, बलवान और अधिक सहन-शक्ति की मालकिन होना चाहिए।“

“जी महाराज, मैं समझ गई। चाहे जितनी बड़ी समस्या आ जाए, आज के बाद आप मुझे कभी घबराई हुई और चिन्ताजनक स्थिति में नहीं देखेंगे।“

“हम तुम्हारे मुखारबिंद से यही सुनने के इच्छुक थे। जाओ, आयुष्मती भवः(लम्बी आयु हो)।“

दरबार में सब दरबारियों सहित महाराजा और रानियाँ गुप्तचरों के आने की प्रतीक्षा करने लग जाते हैं। सिवाय प्रतीक्षा के वे कुछ और कर भी नहीं सकते। पलक का झपकना एकबार एक क्षण बन जाता है। पंद्रह क्षणों का एक विस्सा। पंद्रह विस्सों का एक चासा और तीस चासों का एक पल।... साठ पलों की एक घड़ी।... इसी तरह आठ घड़ियों का एक एक पहर करके चार पहर यानि पूरा दिन बीत जाता है। प्रतीक्षा में बेज़ार होतीं सोचों के सागर में डुबकियाँ लगाने के बाद महाराजा छत्रसाल अपना मौन तोड़ता है, “हे मेरे ईश्वर ! ये भी दिन देखने थे। वह भी समय था जब 1671 ईसवी में मैं केवल बाइस वर्ष की युवावस्था में पाँच घुड़सवार और पच्चीस तलवारबाजों की छोटी-सी फौज लेकर मुगलों से लोहा लेता घूमता था। पर अब यह बुढ़ापा और शारीरिक दुर्बलता मेरा वश नहीं चलने देती। बीमारी के कारण मैं बेबस और लाचार-सा अनुभव करने लग जाता हूँ।“

“काका जू (बहुत सम्मानित बुजु़र्ग अथवा बाबा जी) यह समय आपकी जीवनी या आपकी बहादुरी के किस्से सुनने का नहीं है। तुरन्त कोई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।“ सिसक रही छोटी रानी पदमावती कंवर हस्तक्षेप करती है।

“मेरी प्रिय ! क्या मैं अब बूढ़ा ठाड़ा अपनी जान दे दूँ ? बहुत सोच-समझकर मैं पहले ही योग्य कदम उठा चुका हूँ। इसीलिए तो मैंने पेशवा बाजी राव से सहायता की भीख मांगी है। बेशक पदमावती राणीसा, इसकी मुझे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।... चलो, जो ईश्वर को मंजूर है, हो जाएगा।“ महाराजा छत्रसाल की दूरअंदेशी बोलती है।

देव कंवर अपने कान खड़े करके माथे पर बल डालती है, “ऐसा क्या लिखा था आपने पेशवा को अपने पत्र में ?“

“दो सप्ताह पहले (1 मार्च 1730 ई.) सेनापति कविराज बख़्शी हंसराज से लिखवाकर भेजे अपने छंदबद्ध रुक्के में मैंने लिखा था कि ‘जो गत ग्राह गजेन्द्र की, सो गत भाई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजा लाज।’ मैंने इसके बदले में भारी धन मराठा सरदारांे को देने का भी वायदा किया है।“

तभी एक गुप्तचर दरबार में आ उपस्थिति होता है, “महाराज छत्रसाल की जय हो !“

सभा में उपस्थिति सभी व्यक्ति उत्सुकता से एकदम उठकर खड़े हो जाते हैं। महाराजा छत्रसाल तो समाचार जानने के लिए उतावला ही हो जाता है, “हाँ, क्या समाचार लाए हो ?“

“महाराज, बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि शहजादा जगतराज का कोई सुराग नहीं मिला है। पर अनुमान है कि उसको जैतपुर के बाहर घने जंगन में अन्य सैनिकों के साथ मुहम्मद शाह ने कैद कर रखा होगा।“

यह समाचार सुनते ही महाराजा छत्रसाल की टांगें उसके अपने ही शरीर का बोझ झेलने में असमर्थ हो जाती हैं और वह अपने सिंहासन पर गिर पड़ता है, “हे भगवान, मैं क्या उपाय करूँ इस अलगर्ज़, नादान और फुकरे लड़के का ? मैं इस जल्दबाज को कितनी बार समझा चुका था कि अपने भाइयों, पदम सिंह और हृदय शाह की तरह मन लगाकर युद्धविद्या सीख ले, काम आएगी। लेकिन इस नाफरामान और बदसाहसी लड़के ने कभी मेरी एक नहीं सुनी।... मुगल और निज़ाम तो हमारे दुश्मन थे ही। बल्कि हमारे अपने राजपूत बुंदेल भी शत्रु हैं और खार खाते हैं। कभी भी किसी समय भी कोई दुर्घटना घटित हो सकती थी। लो, आज वह घड़ी आ ही गई। जो कयास मैंने लगाया था, वह गलत नहीं था। कितनी बड़ी समस्या में डाल दिया है, इस मुँहज़ोर और बददिमाग लड़के ने ! क्या ज़रूरत थी आग में कूदने की ?... मैं तो बड़े हृदय से ही दुखी था। हृदय शाह है कि उसको दुनियावी कामों से मोह ही नहीं है। हृदय ने तो अपने लिए रीवा (मौजूदा मध्य प्रदेश में राजपूतों का एक शहर जिसका नाम नर्बदा नदी के नाम पर पड़ा है) से आया डोला भी अपने भाई को दे दिया था। शस्त्र विद्या हृदय शाह ने सीखी तो सही, पर उसको अमल में नहीं लाता है। कहता है, मैं हिंसा और युद्ध के सख्त़ खिलाफ़ हूँ। बना है बड़ा अहिंसावादी ! अब कौन छुड़ाकर लाएगा जगतराज को बंगशों की हिरासत से ?“

बख़्शी हंसराज तुरंत बोल पड़ता है, “महाराज, निश्चिंत रहो। मैं अभी कुछ सैनिक लेकर जाता हूँ और शहजादा की रिहाई का कोई यत्न करता हूँ।“

रानी देव कंवर आगे बढ़ती है, “नहीं सेनापति जी, आपका जाना ठीक नहीं। आपका यहाँ रहकर किले की रक्षा करना अत्यधिक आवश्यक है। मैं नारी सेना लेकर जाती हूँ और जगतराज की तलाश करती हूँ। महाराज क्या आज्ञा है ?“

महाराजा छत्रसाल अपनी झुर्राई वृद्ध आँखों को सिकोड़ता है, “मैं क्या कहूँ ? आप खुद समझदार हो। पर आपकी टुकड़ी में कौन कौन जाएँगी ?“

“मैं और जैत कुंवर अगुवाई करेंगी और चुनकर सभी श्रेष्ठ श्रेणी की जंगबाज सैनिकाओं को ही संग ले जाएँगी। आप चिन्ता न करें।“ देव कंवर रौब और आत्मविश्वास के साथ बोलती है।

“ठीक है, पर मेरी बेटी मस्तानी कुंवरसा को ले जाना न भूलना। मुझे अपने शिष्यों में से सबसे अधिक गर्व उसको युद्ध कला सिखाने पर है। मस्तानी जैसी भालेबाजी दूसरी कोई नहीं कर सकती। तीरअंदाजी तो वह आँखें बन्द करके भी कर सकती है। रास्ते खोजने में माहिर है और ग़ज़ब की स्मरण शक्ति है उसकी। एकबार जहाँ से रात के अँधेरे में से गुज़र जाए तो दिन में चाहे उसकी आँखों पर पट्टी बांध के उसको वहाँ से निकलवा दो, सारे रास्ते सही सही बता देगी। मस्तानी जब म्यान में से बिजली की भाँति चमचमाती तलवार खींचती है तो उसके दुश्मन का सिर उसके पैरों में बेरों की तरह लुढ़कता दिखाई देता है। घुड़सवारी में भी मस्तानी लाजवाब है।... जाओ मेरा आशीर्वाद आपके साथ है। विजयी भवो ! (तुम्हारी जीत हो।)

“जो आज्ञा ! प्राणनाथ, मस्तानी को मैं कैसे भूल सकती हूँ ? वह तो अवश्य हमारे संग जाएगी।“ कहकर राणी देव कंवर नारीगृह की ओर जाती है और सब जंगजू स्त्रियों को एकत्र करके अपने मंसूबे और युद्ध नीति के बारे में रातभर में समझा देती है।

अगली सवेर होते ही किले का मुख्य द्वार खुलता है और चालीस-पचास घुड़सवार, नकाबपोश स्त्री सैनिक बाहर रणभूमि की ओर निकल जाते हैं। उनके जाने के बाद किले के द्वार पुनः बन्द कर दिए जाते हैं।

इन घुड़सवारों में सबसे आगे रानी देव कंवर है। उसके पीछे शहजादा जगतराज की सौतेली बहन, मस्तानी कंवर और उसकी पत्नी जैत कंवर है। शेष राजपूत और क्ष़त्रीय स्त्रियाँ हाथों में तलवारें, ढालें, धनुष, फरसा, गदा़, त्रिशूल, लोह-चक्र और भाले आदि शस्त्र उठाये उनके पीछे पीछे अपने अपने घोड़़े पूर्ण जोश के साथ दौड़ा रही हैं।

कई वर्षों से बुंदेलखंड की राजसी हालत ठीक न होने के कारण और सेना के अभाव को पूरा करने के लिए बुंदेल राजपूत स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ युद्ध में अपना योगदान दे रही हैं। रानी देव कंवर की सौतेली सास सारंधा भी अपने पति के साथ युद्धों में कंधे से कंधा भिड़ाकर लड़ती रही थी।

यह कोई नई या अलौलिक बात नहीं है। बहुत वर्षों से यह प्रथा चलती आई है। भगवान राम चन्द्र के समय त्रेता युग से ही महिलायें युद्धों में हिस्सा लेती आई हैं। राजा दशरथ की रानी कैकेयी सारी उम्र अपने पति के संग जाकर युद्ध लड़ती रही थी। समस्त बुंदेल महिलायें बचपन से ही युद्ध विद्या का अभ्यास करने लग जाती हैं। इन हिंदू राजपूतानियों के जत्थे में बहुत सारी क्षत्रीय स्त्रियों के अलावा अन्य निम्न वर्ग की स्त्रियाँ भी शामिल हैं। जंग में जातेे समय इन स्त्रियों के जंगजू टोलों ने काले रंग के कपड़े पहने होते हैं। चूड़ीदार पाजामी, घुटनों तक लम्बा चोला। सिर पर पीतल की टोपी लेकर घुमावदार काली पगड़ी बांधी होती है। पगड़ी का एक सिरा नाक पर से होता हुआ दूसरी तरफ के कान के ऊपर पगड़ी में टंगा होता है। केवल आँखें ही नंगी रखी जाती हैं। ये काले वस्त्र ही इनकी वेशभूषा है और इनके महिला होने की पहचान भी होते हैं।

किले से कुछ दूर बुंदेली स्त्रियों की मुठभेड़ दलेल खान की फौजों से होती है और वे पहले हल्ले में ही विरोधी निज़ाम मुहम्मद बंगश की सेना को पीछे हटने के लिए विवश कर देती हैं। तभी पेशवा बाजी राव की फौज भी आकर पीछे से आक्रमण कर देती है। दो फौजी दलों के बीच में घिरा दलेल खान बुरी तरह बौखला जाता है। छोटे से युद्ध के बाद बाजी राव से शिकस्त खाकर मुख्य निज़ाम मुहम्मद खान भाग जाता है और उसकी बहुत सारी बंगशी सेना को मराठा सैनिकों द्वारा बंदी बना लिया जाता है। इस युद्ध में मुहम्मद बंगश का पुत्र कयूम खान मारा जाता है। (कयूम खान की कब्र महोबा में बनी हुई है)।

जैतपुर की यह जंग जीतने के बाद मस्तानी कुंवर और जैत कुंवर शहजादे जगतराज की तलाश में सारा जंगल छान मारती है और उन्हें एक तालाब के निकट घायलावस्था में जगतराज मिल जाता है। रानी देव कुंवर, मूर्छित पड़े जगतराज को लेकर अपने सारे टोले के साथ बुंदेलखंड के दिल में बने जैतपुर के किले में लौट जाती है।

 
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जंग जीतने के उपरांत पेशवा बाजी राव, महाराजा छत्रशाल की सेना के साथ जैतपुर के किले में प्रवेश करता है। महाराज छत्रसाल आरती उतारने के पश्चात बाजी राव का केसर, चंदन और चावलों के साथ विजय तिलक लगाकर स्वागत करता है, “पेशवा जी, विजय मुबारक हो।...मैं किस मुँह से आपका धन्यवाद करूँ। मेरे पास तो आपका आभार प्रकट करने के लिए भी शब्द नहीं हैं।... यदि आप सही समय पर न पहुँचते तो हम सब मारे जाते या कै़द कर लिए जाते। मैं आपका यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।“

“क्यों लज्जित करते हो महाराज। अन्याय होता तो बाजी राव की आँखों से भी नहीं देखा जाता। यह तो हमारा कर्तव्य था। बाकी निज़ामों के साथ तो हमारा पुराना हिसाब-किताब था जो हमने आज बराबर किया है। हमारा तो मुगलों और निज़ामों के साथ शुरू से ही वैर और नित्य का लड़ाई-झगड़ा रहा है।“ पेशवा बाजी राव अपनी फ़राखदिली दिखलाता है।

महाराजा छत्रसाल, बाजी राव को किले के अंदर ले जाता है, “आओ, अतिथि देवो भवः। आपका जैतपुर के किले में स्वागत है। आप भी थक गए होंगे। यहाँ ठहरकर कुछ दिन आराम करें। आपकी सुख-सुविधा का हर प्रकार से ध्यान रखा जाएगा। जब तक हम शहीद हुए सिपाहियों का अन्तिम संस्कार कर लें और घायलों का इलाज भी होता रहेगा।“

“जैसी आपकी इच्छा।“ 12 मार्च 1730 ईसवी के शुभ दिन बाजी राव अपने दल के साथ किले में प्रवेश कर जाता है।

पेशवा बाजी राव और उसके चुने हुए सरदारों, पिलाजी यादव, नारो शंकर, तुकोजी पवार, आनन्द राव मकाजी, उदाजी रवार, मलहार राव, दावालजी सोमवंशी और राणोजी गायकवड़ आदि के ठहरने का प्रबंध किले के अतिथिगृह में कर दिया जाता है और शेष सेना किले के बाहर तम्बू गाड़कर पड़ाव डाल लेती है।

महाराजा छत्रसाल के साथ भोजनालय में बैठकर बातें करता बाजी राव पूछ लेता है, “महाराज अपनी रियासत के विषय में कुछ बतायें ? हमारे लिए यह नया इलाका है।“

महाराजा छत्रसाल गर्व से बताना प्रारंभ करता है, “हाँ-हाँ। क्यों नहीं। हम सब बताते हैं। मध्य भारत में बसे इस विशाल बुंदेलखंड (अब उतर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों के बीच विभाजित है) के प्रमुख नगर बांदा, चित्रकूट, दतिया, टीकमगढ, राठ, ललितपुर, इलाहाबाद, कौशांबी, सागर, धमोह, ओरी, पन्ना, हमीरपुर, माहोबा, नरसिंहपुर, सतना, रीवा, सिद्धी, सिंहरौली और छतरपुर (1707 ई. में छत्रसाल ने छतर पुर अपने नाम पर बसाया था) हैं। हमारी तो मंशा थी कि झांसी, जलौन, बीजावर, चरखड़ी, समंथर, सरीला आदि भिन्न भिन्न् रियासतों को बुंदेलखंड में मिलाकर अजैगढ़ (बाद 1765 ई. में इसको बुंदेलखंड की राजधानी बनाया गया था) या छतरपुर को राजधानी बनाने की थी। पर लगता है, अब यह केवल एक स्वप्न ही रह जाएगा और हमें पन्ना को ही अपनी राजधानी बनाना पड़ेगा।“

“उम्मीद पर दुनिया कायम है। अभी भी सपने सच करने के लिए आपके पास बहुत समय है। महाराज, निराश क्यों हो रहे हो ?“ बाजी राव हाथ में पकड़ी बुरकी मुँह में डालता है।

महाराजा छत्रसाल भोजन चबाता हुआ बोलता है, “हाँ, समय पर ही सब कुछ निर्भर करता है। पर हमारी दूरअंदेशी बताती है कि ऐसा अब संभव नहीं हो सकेगा। कभी चंदेलों के समय खज़राहो, बुंदेलखंड की राजधानी हुआ करती थी। सोलहवीं सदी (1501 ई.) में बुंदेलों ने ओरशा को राजधानी बनाया। फिर हमारे पिता ने दातिया को राजधानी बना लिया। अब हम दातिया के राजपूतों के कलह-क्लेश में से निकलकर पन्ना को करीब दो सालों तक राजधानी बनाने की सोच रहे हैं।“

“आपने जो सोचा होगा, अवश्य अच्छा ही सोचा होगा। वैसे आपके बुंदेलखंड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है ? महाराज, कुछ उस पर भी प्रकाश डालें।“

बाजी राव का प्रश्न सुनकर महाराजा छत्रसाल कुछ पल मूक रहने के पश्चात कहना प्रारंभ करता है, “पुरातन ग्रंथों में जिस छेदी रियासत का उल्लेख आता है, वह यह बुंदेलखंड ही था। महाभारत के दुर्योधन और उनकी संतान यहाँ राज करती रही है। दसवीं शताब्दी के शुरू में (912-914) कालिंजर से शासन करते कन्नौज के प्रातीहरसां से चंदेलों ने इसी धरती पर आज़ादी ली थी। दसवीं सदी के मध्य (950) में चंदेल राजपूतों ने ग्वालियर के ऐतिहासिक किले को कब्जे़ में लिया। चंदेल राजा धंगा के पौत्र विद्याधारा ने 917-29 ई. तक चंदेलों की रियासत की सीमाओं को चंबल और नर्बदा नदी तक विस्तार देते हुए दूर तक बढ़ा लिया था। महमूद गज़नवी ने विद्याधारा के राज्यकाल के समय में आक्रमण किया था, पर वह सफल न हो सका। दसवीं से पंद्रहवीं सदी तक चंदेलों का बुंदेलखंड पर राज रहा। चंदेल राजा धंगाा ने 950-1008 ई. के दौरान अनेक बोध मठ, हिंदू और जैन मंदिर बनवाये। दसवीं सदी के मध्य से ग्यारहवीं के अध तक निर्मित हुए विलक्षण और प्रसिद्ध खजराहो के मंदिर भी चंदेलों ने ही बनवाये थे। बारहवीं सदी में अजमेर के शासक पृथ्वीराज चैहान ने भी चंदेलों के साथ टक्कर ली थी। तेरहवीं सदी में मुगलों की चढ़त से चंदेलों की रियासत सिकुड़ने लग पड़ी। पर जैसे तैसे वे सोलहवीं सदी तक अपने आप को कायम रखे रहे। फिर सोलहवीं सदी (1501 ई.) से बुंदेलों ने यह देश अपने अधीन कर लिया। बुंदेलों के आगमन से सोलहवीं सदी में बुंदेलखंड के पहले बुंदेल शासक रुद्र प्रताप जी ने राजधानी बनाने के लिए ओरशा की नींव रखी थी। सोलहवीं सदी (1545 ई.) मंे दिल्ली के सिंहासन पर बिराजमान शेरशाह सूरी की मौत कालिंजर को हड़पने के समय हुई। फिर दिल्ली के सुल्तान बुंदेलों पर हावी होते गए। सोलहवीं से अट्ठारहवीं सदी तक बुंदेलखंड, मुगलों के प्रबंध के अधीन रहा है और बुंदेल राजपूत बगावत करते हुए अपनी आज़ादी के लिए युद्ध लड़ते रहे हैं। अकबर ने विशेष मंत्री कल्पी से बुंदेलखंड का शासन चलाने के लिए नियुक्त किए थे। हमारे पिता ने अपना राज्य स्थापित किया। फिर हमने मुगलों की कै़द से आज़ाद होकर (1761 ई. में) विद्रोह का झंडा लहराकर यमुना नदी के दक्खिनी हिस्से को अपने अधीन कर लिया। उसके उपरांत (1761 ई. के बाद) हमने माऊ को अपने अधीन कर लिया। फिर अपने पिता की मृत्यु के लिए जिम्मेदार धंदरां से बदला लेने की ठानकर अनेक युद्ध किए। कार्य कठिन था, पर मैं भी हठी था। आखि़र, उन्हें भयभीत होकर साहरा के किले में छिपना पड़ गया। मैंने भी घेरा डाले रखा। जब उन्हें विश्वास हो गया कि छत्रसाल हार मानने वाला नहीं है तो उन्होंने मेरे समक्ष घुटने टेक दिए। फिर सुलहनामा करने के लिए मुझसे अपनी बेटी का रिश्ता भी किया।“

बाजी राव भोजन करता करता रुक जाता है, “बुंदेलों की बहादुरी के बहुत किस्से सुने हैं।“

“हाँ, कोई झूठ नहीं है पेशवा जी। बुंदेलखंड में सिंध, बेतवा (वरावती), शहिज़ाद, कैन, बागीहन, तोनस, पाउज, दशन और चंबल नदियाँ बहती हैं। काली सिंध मालवा से निकलकर बुंदेलखंड के पश्चिमी घाट को छूती है। इसके समानान्तर पूर्व की ओर बेतवा बहती है। कैन आगे चलकर बागीहन और तोनस का पीछा करती है। वैसे यमुना और कैन ही दो मातृ नदियाँ है जिनके जल को वर प्राप्त हैं, जिसे पीकर हमारे योद्धा निडर और बहादुर बनते और इतिहास लिखते हैं।“

“हाँ, बुंदेलखंड की नदियों के नीर को वरदान मिले होने की बात तो हम भी मानते हैं और इन नदियों के जल में स्नान करके बुंदेली स्त्रियाँ अपने हुस्न को सान पर लगाकर निखरती हैं। राजपूतों की बहादुरी का लोहा और राजपूतानियों के हुस्न की चकाचैंध को पूरा भारतवर्ष मानता है।“ बाजी राव बोलता बोलता अपने ही विचारों की दुनिया में गुम हो जाता है।

“आप कहते हैं तो सही ही कहते होंगे, श्रीमंत। हसीना को अपने हुस्न की तारीफ़ सुनना और बहादुर को अपनी बहादुरी बयान करना सदैव आनंदमयी लगा करता है। यदि मैं आपको बेज़ार न कर रहा होऊँ तो कुछ निजी जीवन के बारे में भी बताऊँ ?“ महाराजा छत्रसाल झिझकते हुए कह देता है।

बाजी राव डकार लेता है, “हमें तो बल्कि सुनकर खुशी होगी और आपके अनुभवों से कुछ सीखने को मिलेगा।“

“असल में जवान होते ही मैं सबसे पहले आपके क्षत्रपति शिवाजी भौंसले से मिला था। तब मैं मुगलों का दक्खिन में मनसबदार होता था। शिवाजी द्वारा मुगलों के विरुद्ध छेड़ी जंग के कारण मैं उनका प्रशंसक था। 1670 ई. (दिसम्बर माह) में दक्खिन आने पर मैं उनसे विशेष रूप में जाकर मिला। मैंने उनकी सेना में सेनापति के तौर पर भर्ती होने की विनती की ताकि मैं उनके साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध लड़ सकूँ। लेकिन आप तो जानते ही हैं कि छत्रपति थोड़े सनकी-से स्वभाव के थे। शिवाजी केवल दक्खिनी भारतीयों पर विश्वास करते थे। उतरी भारतीयों पर उन्हें इतना अवश्विास था कि कभी भी वह कोई पद या ओहदा उतारी हिंदुस्तानी को नहीं देते थे। शिवाजी मुझसे कहने लगे कि नहीं, आप अपने क्षेत्र में जा कर अपना राज्य स्थापित करो। आप अपने लोगों की सहायता से अपनी भूमि मुगलों से आज़ाद करवाओ। आवश्यकता पड़ने पर हम मुगलों के विरुद्ध आपके युद्ध में आपका साथ देंगे। मैं निराश होकर लौट आया। परंतु मैंने उनकी बात पर अमल किया। बुंदेलखंड में अपना राज्य स्थापित करके मैंने मालवा के सिरोजन इलाके की ओर रुख किया। वहाँ के फौजदार मुहम्मद हाशम और चैधरी आनंद राय बांका को मेरी शक्ति का अंदाज़ा होने के कारण उन्होंने पूरी तैयार कर रखी थी। मैं चढ़ाई करने चल पड़ा। रास्ते में केसरी सिंह धंदर भी मेरे साथ कुंदागिरी में आकर मिल गया। हमने अचानक हल्ला बोलकर शत्रुओं के पचास-साठ योद्धे मार गिराये। उन्हें विवश होकर सिरोजन के किले में शरण लेनी पड़ी। मैंने उन्हें घेरे में रखकर आसपास के इलाकों को अपने कब्ज़े में ले लिया। उसके बाद मैंने सिरोजन से उतर-पूर्व दिशा की ओर जाकर जैत पटेल राम के शाहूकार को अगवा करके उसका धन लूटा। वापसी में पिपरात को कुचलते हुए मेरी सेना ने धोरा सागर पहुँचकर डेरा डाला। वहाँ धमाजी राय और बहुत सारे गौंड आकर मेरे साथ मिल गए। हम बांदा से दक्षिण-पूर्व की ओर पड़ने वाले पवित्र शहर चित्रकूट थकान मिटाने और नए युद्ध के वसीले पैदा करने के लिए चले गए। धमोनी के फौजदार खलिक के साथ हमारी पत्थरी, सागर और सिद्धगौन में कई मुठभेड़ें हुईं। उसकी फौज अधिक थी और शक्तिशाली भी। इसलिए हमें माऊ की ओर लौटना पड़ा।“

बाजी राव बीच में टोक देता है, “पर मैंने तो सुना था कि आपने खलिक को हरा दिया था ?“

“सुनिये न, वही बता रहा हूँ। हमने मेवाड़ के इलाके बगेलां से जीते। उसके पश्चात खलिक के साथ हमारा दुबारा रानीगीर के मैदान में 1672 ई. में सामना हुआ। यहाँ खलिक की शिकस्त हुई और वह खुद तो भाग गया, पर उसकी सम्पत और हथियार हमने संभाल लिए। मैं काफ़ी ज़ख़्मी हो गया था इस युद्ध में और इलाज के लिए माऊ आकर ही ठहरा। धमोनी विजय करके अभी हटे ही थे कि बंसा के जागीरदार केशवरी डांगी ने हमारे संग पंगा ले लिया। मेरी सेना ने दो महीने बंसा में उसकी हालत खराब किए रखी। केशवरी हार गया और उसका बेटा विक्रम सिंह डांगी हमारी शरण में आ गया। हम जागीर और पचास हज़ारी की उपाधि के साथ उसको सम्मानित करके लौट आए।“

“आपकी बातें बहुत दिलचस्प हैं। सुनकर बहुत मज़ा आ रहा है। आपने भी मेरी तरह बहुत समय रणभूमि में ही बिताया है।... कोई और किस्सा सुनाओ।“ बाजी राव छत्रसाल को फूंक देता है।

“हाँ, योद्धा का जन्म ही लड़ने के लिए होता है, पेशवा जी। हम एकबार पतरी, बाकी खान की जागीर की ओर पाँच-छह घुड़सवारों के साथ शिकार खेलने गए हुए थे। वहाँ के गुप्तचरों ने हमारी मुख़बरी करके सैयद बहादुर को बता दिया। सैयद बहादुर की फौजों ने हमें घेर लिया। संयोग से बाकी की हमारी सेना भी निकट ही थी। हमारा घमासान युद्ध हुआ और हम सागर उनसे जीतकर माऊ लौट आए। इस प्रकार बहुत से किस्से हैं। पन्ना को जीतना... रौहीला खान को हराना... और बहुत कुछ। हमारे बारे में तो कवियों ने कविता भी लिखे हुए हैं, ‘इत यमुना, उत नरबदा, इत चंबल, उत तोंस/छतारसाल सो लड़न की, रही ना काहू होंस।’ अर्थात यमुना से नर्बदा तक और चंबल से तोंस दरिया तक किसी की हिम्मत नहीं है जो छत्रसाल से पंगा ले। पर जवानी और सेहत से ही आदमी इतिहास लिख सकता है। खैर, रात खत्म हो जाएगी, पर बात खत्म नहीं होगी। फुर्सत में आपको सब सुनाएँगे। अब आप आराम करिये।“

“जी हाँ, अब तो नींद भी आ रही है। आपका भोजन बहुत स्वादिष्ट था।“ बुंदेल दास, बाजी राव के हाथ धुला देते हैं।

लम्बे सफ़र और जंग के कारण थका होने के कारण बाजी राव उस दिन भोजन करने के बाद बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में सो जाता है।

अगले दिन देर से जब पेशवा बाजी राव की आँख खुलती है तो उसके कानों में बहुत ही सुरीले स्त्री स्वर में भजन गायन के शब्द पड़ते हैं। बाजी राव वो मिठासभरी, रसभीनी-सी आवाज़ सुनकर एकदम अपने पलंग पर से उठकर बैठ जाता है।

बाजी राव को मधुर भजन गायन सुनकर अजीब प्रकार की शांति का अनुभव होता है। वह खड़ा होकर खिड़की में से बाहर देखता है। उसके कमरे के सामने ही किले के अंदर बने मंदिर में कोई लड़की भगवे वस्त्र पहने तानपुरा बजाती हुई बंदगी कर रही होती है।

बाजी राव अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह मंदिर में बैठी लड़की की ओर खिंचा चला जाता है। बागीचे में से होता हुआ पेशवा मंदिर के समीप पहुँच, मंत्रमुग्ध होकर खड़े खड़े ही भजन सुनता रहता है। भजन की समाप्ति पर जैसे ही पेशवा मंदिर के अंदर प्रवेश करता है तो बाजी राव को देखकर ठिठकी हुई वह लड़की फुर्ती से तानपुरा नीचे रख देती है।

बाजी राव आगे बढ़कर उस लड़की को बुलाने का यत्न करता है। पर वह ‘खम्मागणी’(आदरसहित नमस्कार) पेशवा सरकार।“ कहकर अपने पल्लू से अपना मुँह ढक लेती है।

पेशवा उसको कुछ कहने के विषय में सोच ही रहा होता है कि वह कोई अन्य शब्द साझा किए बिना ही पंजों के बल हिरनी की भाँति उछलती-कूदती वहाँ से भाग खड़ी होती है।

बाजी राव उस गोरवर्ण नवयुवती की शक्ल तो अच्छी प्रकार से देख नहीं पाता, परंतु उसकी कशिश भरपूर बिल्लौरी आँखें बाजी राव के सीने में बरछे की भाँति धंस जाती हैं। ठीक ऐसी ही बिल्लौरी आँखों का दीदार बाजी राव ने एक दिन पहले युद्ध के मैदान में भी किया था। काले वस्त्रों में बुंदेलों की एक सैनिका की पगड़ी का एक सिरा तलवारबाजी करते हुए खुल गया था। उस वक्त बाजी राव बिल्कुल उस महिला सैनिक के सामने बंगशों के छक्के छुड़ा रहा था। जैसे ही, उस नारी की बिल्लौरी आँखों में आँखें डालकर बाजी राव ने देखा था तो एक पल के लिए तो उस स्त्री का हुस्न देखकर बाजी राव के होश उड़ गए थे और वह तलवार चलानी भूल गया था। बाजी राव ने इतनी हसीन सूरत कम से कम अपनी ज़िन्दगी में तो पहले कभी नहीं देखी थी।

बाजी राव को टकटकी लगाये देखते उस सैनिका ने फुर्ती से अपना चेहरा पगड़ी का सिरा खोंसकर फिर से छिपा लिया था। वहाँ से अपना घोड़ा भगाकर दूर जाती हुई वह बहुत देर तक बाजी राव की ओर पीछे मुड़ मुड़कर देखती रही थी। बाजी राव की नज़रें उसका तब तक पीछा करती रही थीं, जब तक वह युद्ध में लड़ते सिपाहियों के बीच गुम नहीं हो गई थी।

इस पहली नज़र के साथ ही वे बिल्लौरी आँखें, बाजी राव के साथ कोई अमर रिश्ता बना गई थीं। एक गहरा निमंत्रण छुपा हुआ था उन नज़रो में... मुहब्बत के लिए विशेष निमंत्रण पत्र दे रही थीं वे आँखें... और जन्म-जन्मांतरों का साथ निभाने की प्रतिज्ञा उस दृष्टि मंे से झलकती थी। बाजी राव बुरी तरह सम्मोहित हो गया था। बड़ी कठिनाई से बाजी राव ने अपने आप को संभाला था लड़ने के लिए। उसके बाद तमाम युद्ध के दौरान वही बिल्लौरी आँखें बाजी राव की नज़रों के आगे टिमटिमाते तारों की तरह मंडराती रही थीं। बिल्लौरी आँखों वाली यह भजन गायिका रणभूमि में दिखी वही सैनिका थी।

बाजी राव बागीचे में बहुत देर तक टहलता रहता है। बाजी राव की निगाहें नारी गृह की तरफ ही केन्द्रित हुई रहती हैं। वह उस बिल्लौरी आँखों की तलाश में बहाने, बेहाने से पूरे किले में भंवरे की भाँति भिनभिनाता हुआ मंडराता रहता है। परंतु उस बिल्लौरी आँखों वाली के बाजी राव को दुबारा दर्शन नहीं होते।
 
संध्या समय पेशवा बाजी राव और उसके सरदारों के लिए महाराजा छत्रसाल द्वारा भोजन की विशेष दावत दी जाती है। भोजन के पूर्व मनोरंजन के लिए नृत्य-गान होता है। शराब और अनेक प्रकार के शर्बत वितरित किए जाते हैं। दारू पीता हुआ बाजी राव काफ़ी मदहोश हो जाता है। महाराजा छत्रसाल बाजी राव की खूब खातिरदारी करता है। पेशवा बाजी राव के लिए विशेष रूप से विभिन्न प्रकार के पकवान बनवाये जाते हैं।

महाराजा छत्रसाल खुद यद्यपि शाकाहारी है, पर वह बाजी राव के लिए मांसाहारी आहार खास तौर पर बनवाता है। आवभगत करता हुआ स्वयं महाराजा छत्रसाल, बाजी राव के पास जाकर पूछता है, “श्रीमंत, कैसी है हमारी दावत ? आशा करता हूँ कि आपको आनन्द आ रहा होगा ? यदि किसी प्रकार की कोई कमी या किसी वस्तु की ज़रूरत हो तो निःसंकोच बता दें, यह दास उसे तुरंत पूरा करने का यत्न करेगा।“

“शेष तो सब बहुत उतम है।... दारू तो आपकी लाजवाब है। अति उतम ! और मंगा लो।... याद रखो, मराठा बाजी राव पेशवा पी रहा है...!“ पेशवा बाजी राव के अंदर से सुच्चे मोतियों की भस्म वाली इलायचीदार शराब बोलती है।

महाराजा छत्रसाल यह देखकर खुशी से फूला नहीं समाता है, “हम तो श्रीमंत इसका सेवन नहीं करते। हमारे प्राणामी धर्म में यह वर्जित है। बस आपके जैसे विशेष अतिथियों की सेवा के लिए यह आब-ए-जन्नत रखा हुआ है।“

“आब-ए-हयात तो सुना था, पर आब-ए-ज़न्नत ?“ बाजी राव जाम में पड़ी शराब में अपना चेहरा देखता है।

“हाँ, जनाब-ए-आली ! इसको पीते ही व्यक्ति खुद को जन्नत में पहुँचा हुआ अनुभव करने लगता है और उसको इंद्र के अखाड़े की अप्सराएँ नृत्य करती दिखाई देने लग जाती हैं।“ महाराजा छत्रसाल शेखी बघारता है।

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“इसमें कोई शक नहीं। हम स्वर्ग लोग का नज़ारा देख रहे हैं, आपका आब-ए-जन्नत पीकर... पर अप्सराओं और परियों का नृत्य हमें दिखलाई नहीं देता। शायद हमारी दृष्टि कमजोर है ! बुंदेल सम्राट, मुझे बेहद अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि संगीत का प्रबंध आपका बहुत अच्छा नहीं। यह ठंडी-सी ठुमरी... आपकी नृत्यांगनाओं को ठीक से ढाई मात्रे भी नहीं आते... मुर्दा से साज बजाने वाले और शोक-सा गीत-संगीत। शहनाइयों के मातमी राग सुनकर ऐसा लगता है जैसे मैयत पर आए हुए हैं।... शायद हमारी नाट्यशाला ही सबसे उतम है कि हमें दूसरों किसी महफ़िल में कुछ अच्छा ही नहीं लगता।... आपके दरबारी कवि लाल और भूषण में भी कोई अधिक दम दिखाई नहीं देता।... क्या आपके पास कोई जबरदस्त मुजरे वाली नहीं है जो एक ऐड़ी मारकर सारी पृथ्वी हिलाकर रख दे ?... जिसके पैरों में बंधे घुंघरुओं की छनकार दशम द्वार खोल दे और ऐड़ी की धमक धरती धंसाते हुए सीधी कलेजे में बजे।... या कोई ऐसी गायिका नहीं है जिसका गीत सुनकर सागर की लहरें भी रुककर सुनने लगे ? ... कोई चंचल-सी कंचनी या गायिका जो बस समां बांधकर रख दें ?“ नशे में डूबा बाजी राव दरअसल अप्रत्यक्ष रूप से उस बिल्लौरी आँखों वाली के बारे में पड़ताल करना चाहता है।

महाराजा छत्रसाल कुछ पलों के लिए सोच में पड़ जाता है और फिर दाढ़ी खुजलाता हुआ बोलता है, “अच्छा ! यह बात है तो पेशवा जी अपने दिल पर हाथ धर लो। आपको दिखलाते हैं जलवा…।“

महाराजा छत्रसाल अपने दास को बुलाकर उसके कान में फुसफुसाकर कोई आदेश देता है।

अगले ही क्षण सभी साज़िंदे बदल जाते हैं। नृत्यमंच का पर्दा धीमे धीमे पीछे हटता है। नए साज़ छिड़ जाते हैं। लाल और सुनहरी रंग के लहंगे वाली एक लम्बा घूंघट किए बैठी नवयौवना ग़ज़ल गाना आरंभ करती है। उसकी पहली टेर पर ही बाजी राव आवाज़ पहचान लेता है और चुस्त होकर बैठ जाता है। ज्यूँ ही वह ग़ज़ल का मतला गाती हुई अपने गोरे दिलकश और नूरानी मुखड़े पर से घूंघट उठाती है तो बाजी राव की आँखों से उसकी चिंगारियाँ छोड़ती बिल्लौरी आँखों का सीधा सामना हो जाता है। बाजी राव को अपने दिल की धड़कन वहीं की वहीं रुक गई महसूस होती है। वह एकाग्रचित होकर बिल्लौरी आँखों वाली अट्ठारह उन्नीस वर्ष की नवयौवना नर्तकी का नृत्य बग़ैर पलके झपकाये देखता रहता है। सुनहरी और चाँदी के गोटे की कढ़ाई वाले हीरे मोती से जड़ा लहंगा, तंग चोली और जबरदस्त हार-शृंगार तथा कमर तक चमकते सुनहरी रंगत देते केश उस हुस्नपरी को और अधिक खूबसूरत बनाकर पेश कर रहे होते हैं।

उसकी सुंदरता देखकर बाजी राव के होशोहवास गुम हो जाते हैं और उसको खाने या पीने की कोई होश नहीं रहती। दीवानगी के आलम में मदहोश हुआ बाजी राव किसी अन्य ही दुनिया में विचरने लग जाता है। उसको सब कुछ स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। नर्तकी के नाज-नख़रों और ज़ालिम अदाओं पर बाजी राव बुरी फिदा हो जाता है। नृत्य की ताल और ठेके, बाजी राव के दिमाग में गूंजने और हलचल मचाने लग जाते हैं।

“धा धिन धिन धा, धा धिन धिन धा, धा तिन तिन ता, ता धिन धिन धिन। (तीन ताल सोलह मात्रा। विभाग चार, तीन ताली, एक खाली)। धा धी ना, शा ती ना(दादरा, छह मात्रा, दो विभाग, एक ताली, एक खाली)।... धिना धिधा तिरकिट धिना धिधा तिरकिट धाधा तिरकिट धाधा तिरकिट धिना धिधा तिरकिट तूना किड़नग तागे ता तिरकिट (ताल लक्ष्मी, अट्ठारह मात्रा, विभाग पंद्रह, पंद्रह ताली, कोई न खाली)... ता... था... थइया...थइया...थम्म !!!“ नर्तकी नाच नाचकर आँधी ला देती है।

बाजी राव को उस कंचनी पर नृत्यदेव नटराज की कृपा और कंठ में सरस्वती का वास प्रत्यक्ष दिखलाई देता है। बाजी राव प्रसन्न होकर वाह-वाह कर उठता है।

नृत्य समाप्त होने पर बाजी राव शराब वितरित कर रहे एक बुंदेल दास से पूछता है, “यह कौन है जिसके जादुमयी हुस्न और दिलकश आवाज़ ने सारे आलम को मस्ताना बना दिया है ?“

“पेशवा सरकार, यह मस्तानी है !“ कहकर दास आगे बढ़ जाता है।

“मस्...ता...नी ! वाह ! मस्तानी ! कितना उपयुक्त नाम है इस सुंदर बाला का। जितनी हसीन खुद है, उतना ही दिलचस्प और खूबसूरत इसका नाम है। मस्...ता...नी...। हाय, मैं मर जाऊँ मस्तानी...मस्तानी...मस्तानी...।“ बाजी राव खुद अपने आप से स्वकथन करता हुआ मस्तानी के ख़यालों में गुम रहता है। उसके बाद वह महफिल में उपस्थित होता हुआ भी अनुपस्थित हो जाता है।

रात मंे बिस्तर पर लेटकर बाजी राव अपने सिरहाने को मस्तानी की कल्पना कर कस कसकर बांहों में भरता रहता है। उसकी सारी शराब उतर चुकी होती है। बल्कि यह कह लो कि मस्तानी का नृत्य देखते हुए उसको शराब तो चढ़ी ही नहीं थी। यदि कोई नशा बाजी राव के दिल-दिमाग पर हावी होता है तो वह मस्तानी की तिलस्मी सुंदरता की मदहोशी होती है।

रातभर मस्तानी को याद करते हुए बाजी राव करवटें बदल बदलकर रात बिताता है। कभी युद्ध में देखी बिल्लौरी आँखें बाजी राव को दिखाई देने लग जाती है जो क्रोध की चिंगारियाँ छोड़ती बाजी राव को देखकर एकदम शांत और निर्मल हो गई थीं।... कभी मंदिर में देखीं भक्ति में लीन-विलीन निश्छल और मासूम बिल्लौरी लोचनों का दृश्य उसके सामने आ जाता है।... और कभी नृत्य के समय सन्मुख हुए कामोतŸोजक बिल्लौरी नयन उसके आगे विद्यमान हो जाते हैं जो प्रेम और भक्ति की अमृत धारा बरसा रहे होते हैं।... कभी उसको मुजरा करती नर्तकी के नशीले बिल्लौरी नेत्र के साथ हुई मुठभेड़ सामने आ जाती है जो सौ सांपों के डंकों से भी अधिक असरदार और लूट लेने की सामथ्र्य रखती है।

रात के अँधेरे में बाजी राव अतिथिगृह की छत को निहारता उन बिन काजल कजलाये मशालों की तरह दिपदिपाते नयनों की कल्पना करता रहता है। खुली आँखों से ख्वाब देख रहे बाजी राव को मस्तानी कभी चंडी, कभी मीरा और कभी मेनका बनकर दिखाई देने लग जाती है। जंगजू, भक्तिनी और अप्सरा वाले मस्तानी के तीनों रूपों के साथ बाजी राव को इश्क हो जाता है। मस्तानी के विषय में सोचते ही बाजी राव का दिल धड़कने की बजाय फड़कने लग जाता है। बाजी राव, सारी रात मस्तानी की याद में नीर बिन हाँफती मीन की भाँति तड़पकर बिना सोये ही बिताता है। नींद उसकी आँखों से बगावत करके रूहपोश हो जाती है।

 
बारिश हो, आँधी हो, बाजी राव सदैव शुरू से ही तड़के जल्दी उठकर बिना नागा कसरत और युद्ध अभ्यास करने का अभ्यस्त रहा है। लेकिन मुजरे से अगली सवेर उसका कुछ भी करने को मन नहीं करता। न उसको भूख लगती है और न ही प्यास। स्नान करने के बाद तैयार होते हुए उससे तो अपने गले में मराठों के प्रतीक चिह्न वाली मोतियों की मालायें भी ठीक से सब की सब पहनी नहीं जातीं। यहाँ तक कि बाजी राव को पूरे वस्त्र पहनने की भी होश नहीं रहती। वह केवल कमर पर लांगड़वाली लुंगी बांधकर मुँह फाड़े एकटक देखता हुआ मस्तानी के बारे में सोचता गुमसुम, चुप्पा बनकर स्थिर बैठा रहता है। मस्तानी के ख़यालों में खोये हुए को न अपने आसपास की होश होती है और न ही वह किसी के साथ कोई बातचीत करता है।

पेशवा बाजी राव की झल्लों जैसी स्थिति देखकर उसका एक सिपहसालार तुकोजी पवार, बाजी राव का ध्यान भंग करता है, “श्रीमंत सरकार, गुस्ताखी माफ़ हो तो कुछ अर्ज़ करूँ ?“

बाजी राव बिना देखे हुंकारा भरता है, “हूँ !“

“पेशवा जी ?“

“हूँ…?“

“पेशवा सरकार !“

“हूँ ? बक... क्या बकवास करनी है मूर्ख ?“

“श्रीमंत...। सर...का...र.. हैं कि ना...।“

“हूँ... हाँ।“

“हाँ... क्या जी ?“

“वही जो तू कहता है।“

“पर मैंने तो अभी कुछ कहा ही नहीं जी।“

बाजी राव सिर झटककर तुकोजी पवार की ओर देखता है, “इतनी देर से यूँ ही मगज़ खाये जा रहा है ? शीघ्र भौंक जो भौंकना है ? मेरा मस्तानी में ध्यान लगा हुआ है।“

“पेशवा जी, कल रात से देख रहा हूँ। आपने जब से मस्तानी का नृत्य देखा है, कुछ मुरझाये से लग रहे हो। कुशल तो है ?“

“कुशल ही तो नहीं है तुकोजी पवार जी। आप मुरझाये होने की बात छोड़ो। मैं तो बिल्कुल ही जड़ से उखड़ा पड़ा हूँ तब से। धर्म से कलेजा खींचकर निकाल लिया है जादूगरनी ने। किसी घायल परिन्दे जैसी अवस्था है मेरी। न ठीक से सांस आता है और न ही जान निकलती है। असीम सौंदर्य दिया है ईश्वर ने उसको। इंद्र के अखाड़े की रंभा, मेनका और उर्वसी जैसी अप्सराओं को मात देती थी रात को नृत्य करते हुए। मेरे तो कानों में अभी भी उसके घागरे के घुमाव और उसके घुंघरूओं की छनकार गूंज रही है। रात में जब वह गोल गोल फूल-से बनाती हुई नाच रही थी, मुझे तो यूँ प्रतीत होता था जैसे मैं शिवजी होऊँ और वह पार्वती बनकर मुझे प्रसन्न करने के लिए ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हो। आफ़रीन गायकी और मधुर आवाज़...लाजवाब नृत्य और कमाल की भावों की अभिव्यक्ति... गजब की सुंदरता और गोरा गठा हुआ शरीर... क्या खाकर जन्मा होगा इसकी माँ ने इस लम्बी छरहरी सी आग जैसी को ! जा कंजर, मालूम कर कि यह मस्तानी कौन है ? मेरा तो उसके मखमली बदन पर लेटने को दिल कर रहा है। मन करता है, उठाकर ले जाऊँ। क्यों न इसे पुणे में सारी जि़न्दगी अपने दरबार में रखें। कमबख्त, मैं तो मर जाऊँगा मस्तानी के बग़ैर...।“ बाजी राव तड़के ही खाली पेट हाथ में पकड़ा जाम मुँह को लगा लेता है।

तुकोजी पवार भी रालें टपकाने लग जाता है, “हाँ श्रीमंत, यह औरत सुंदर तो मुझे भी बहुत लगी थी। मैं तो रात से अपने आप ही अपने अंगों को दबा दबाकर तसल्ली दिए जाता हूँ। इस शराब की सुराही जैसी को उठाने के लिए मैं भी मुजरा देखने के समय से हाथों पर थूकता फिरता हूँ, सरकार।“

“क्या कहा ? मस्तानी सिर्फ़ मेरी है। समझे ? यूँ न लांगड़ उठाये घूम। साला बैडि़यों का न हो तो... गांव बसा नहीं, मंगते पहले ही आ गए। बड़ा आया उठाने वाला... साले, पृथ्वी राज चैहान है तू ? ख़बरदार दुबारा मस्तानी के बारे में भूलकर भी ऐसा नहीं सोचना।“ बाजी राव आँखें निकालकर गुस्से में देखता है।

तुकोजी पवार काँप उठता है, “हुजूर, मेरे कहने का तात्पर्य था कि सुंदर तो खूब है। यदि यह नर्तकी अपने पूना दरबार की शोभा बन जाए तो अपनी नाट्यशाला को चार चाँद लग जाएँगे। मैं तो खुद रात से ही सोचे जा रहा हूँ कि ब्रह्मा ने पहले कागज पर नक्शा बनाकर पूरी तरह नापतौल कर बनाई होगी। इसको बनाते हुए कई बार गिराया होगा और फिर जाकर यह सर्वश्रेष्ठ देह तैयार हुई होगी। पहली बार में तैयार होने वाली कलाकृति तो नहीं लगती है जी। बिल्कुल ही चलता-फिरता ताज है हुजूर। धर्म से अग्निबाण जैसी आँखें हैं मस्तानी की पेशवा जी।“

बाजी राव खीझ पड़ता है, “अरे मूर्ख, आँखों की याद न दिला। मेरा तो रात से बुरा हाल हुआ पड़ा है। बातें ही बनाये जाएगा या इसके बारे में कुछ जानकारी भी लाएगा ? मैं बताऊँ, मुझसे तो सब्र नहीं होता...। आज रात को... अव्वल तो अभी उसको मेरी सेज का शृंगार बनाने का प्रबंध करो। नहीं तो मैं बुंदेलखंड की ईंट से ईंट बजा दूँगा। मराठा हूँ मैं, मराठा। अपना तो गुज़ारा नहीं होता मस्तानी के बग़ैर।“

बाजी राव का चहेता सरदार पिलाजी यादव कमरे के अंदर प्रवेश करता हुआ कहता है, “इसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी, श्रीमंत। मैंने सब खोज कर ली है। यह मस्तानी कुंवर महाराज छत्रसाल की एक मुस्लिम रानी (वास्तव में रखैल, रानी नहीं) की बेटी है।“

“अच्छा ? मैं भी सोचता था कि यह हिंदू तो हो नहीं सकती। ऐसा नायाब हीरा अपने ब्राह्मण नहीं तराश सकते। यह करिश्मा तो राजपूत और एक मुगलानी के मिलन से ही हो सकता है भाऊ (मराठी में ‘भाऊ’ बड़े भाई को कहते हैं)। हुस्न से झोलियाँ तो ईश्वर मुस्लिम स्त्रियों की ही भरता है। ये मुसलमान तो अपने हिंदुओं की मिन्नते करते हैं कि ज़रा इस्लाम कुबूल करो, जन्नत में तुम्हें हूरें देंगे। खूबसूरत स्त्रियों को हरमों में रखने के शौक ने इन साले मुगलों की नसल सुधार दी है। सुंदर स्त्रियों की कोख से आगे और अधिक सुंदर लड़कियाँ पैदा होती जाती हैं। इसलिए मुगलानियाँ बेहद हसीन और आकर्षक हुआ करती है। हाय ! गऊ माता की सौगंध ! बेशक आधी मुसलमानी है, पर फिर भी मुझे इस मुसलमानी के साथ इश्क करने की सोचकर ही दुगना नशा चढ़े जाता है, पिलाजी।“ बाजी राव अपने समीप पड़ी सुराही में से और शराब डालकर पीने लग जाता है।

पिलाजी यादव अपने चतुर दिमाग को खुरचता है, “और क्या श्रीमंत, इश्क करना और आदमी को सेज सुख देना तो ये मुस्लिम स्त्रियाँ ही जानती हैं जी। अपनी ब्राह्मण स्त्रियाँ तो चुम्मी देते हुए भी राम राम जपे जाती हैं। दूर मत जाइये। आपको मैं अपनी पंडिताइन की बात सुनाता हूँ जी... एक बार खासी रात हो गई। वो तो मेरे पास आने का नाम ही न ले। मैंने तो प्रतीक्षा में करवटें बदल बदलकर बिस्तर का कचूमर निकाल दिया। इस तरह बल डाल दिए जैसे चादर घड़े में से निकाली हो। खीझकर मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई - भागवान मेरा पेटा (मराठा पगड़ी) ला जल्दी से। वह रसोई में से ही बोली - मैं कहूँ, आधी रात को पेटा बांधकर कहाँ जाना है ? मैंने कहा, मुझे चैथ पर दक्खिन की सरदेशमुखी लेने जाना है। औरत के टखनों में अक्ल होती है। वह फिर भी कुछ न समझी। बना संवारकर बोली - दिन तो चढ़ जाए। तड़के चले जाना। मैंने तो जी खीझकर रसोई में जाकर पकड़ ली। मैंने कहा, तू क्या समझती है, अगर हमें सरदेशमुखी घर में न मिलेगी तो कहीं बाहर भी नहीं मिलेगी। नाट्यशाला वाली तो नित्य हांकें लगाती हैं... तब कहीं जाकर वो समझी जी। फिर आकर मेरे संग लेट गई। लाश सी बनकर साड़ी उतारते हुए भी ‘हरे कृष्ण...हरे कृष्ण’ करती रही। मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ उसके मुँह पर दे मारा। मै बोला - साली, बड़ी द्रौपदी न बन। तेरा खसम हूँ, दुर्योधन नहीं कि तेरा चीर हरण करने लगा हूँ और तू भगवान कृष्ण को इज्ज़त की रक्षा के लिए बुला रही है।“

बाजी राव खिलखिलाकर हँसने लग जाता है, “यादव, अजीब है तुम्हारा परिवार भी... कंजर के, मुझे कब मस्तानी के सुंदर शरीर की सरदेशमुखी मिलेगी ? मुझे प्रेम हो गया है मस्तानी से, प्रेम रे ! मर जाऊँगा अगर मस्तानी न मिली तो।“

पिलाजी यादव मचलकर कहता है, “पेशवा जी, महाराजा छत्रसाल हमारा कर्जाई है। हमने उसकी जान, माल और रियासत की रक्षा की है। इसके एवज में मिलने वाली ‘चैथ’ (रक्षा करने के बदले मेहताने के रूप में रियासत की आमदनी का चैथा हिस्सा जो टैक्स के रूप में मराठों द्वारा वसूला जाता था।) के साथ यदि आप कंचनी मस्तानी को भी मांग लो तो मजाल है कि वह इन्कार कर जाएँ।“

“एक बात समझ में नहीं आती, महाराज छत्रसाल ने अपनी बेटी को कंचनी बनाकर हमारे सामने मुजरा क्यों करवाया है ?“ वहमी राणो गायकवाड़ भी बातचीत में सम्मिलित होते हुए कहता है।

“आप नहीं जानते गायकवाड़ जी। महाराज छत्रसाल की उन्नीस रानियाँ और अनेक दासियाँ हैं। राजा-महाराजा असल संतान और अपने उŸाराधिकारी तो पटरानियों और कुछ चुनी हुई रानियों से पैदा हुई औलाद को ही मानते हैं। बाकी को तो अपनी गलतियाँ समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं। हो सकता है, यह मस्तानी भी किसी दासी की ही पैदाइश हो ?“ बाजी राव अपना अनुमान प्रकट करता हुआ मस्तानी को प्राप्त करने की तरकीबें बुनने लग जाता है।

आनन्द राव मकाजी कमरे में पसरती जा रही खामोशी को तोड़ने का यत्न करता है। वह अपनी बात एक गाली से शुरू करते हुए कहता है, “उन्नीस रानियाँ और पैंतीस चालीस दासियाँ, रखैलें हैं छत्रसाल के हरम में ? धन्य है भाई। मैं तो सोचता हूँ, इतनी औरतों को महाराजा छत्रसाल खिलाता क्या होगा ?“

“यह न पूछो उन्हें क्या खिलाता होगा, यह पूछो इतनों के लिए महाराजा खुद क्या खाता होगा ?“ ख़यालों के चक्रवातों में से निकलकर बाजी राव तुरंत जवाब देता है।

कमरे के वातावरण में सभी का ठहाका गूंज उठता है।

राणो गायकवाड़ से भी कहे बिना नहीं रहा जाता, “यह राजे-महाराजे भी औरतों के साथ भोजन वाला व्यवहार करते हैं। जब छ्त्तीस प्रकार के पकवान सामने परोसे गए हों तो व्यक्ति सब कुछ नहीं खा सकता। बस, बुरकी बुरकी सभी व्यंजनों में से लगाकर ये रजवाड़े पेट भर लेते हैं।“

आनन्द राव मकाजी दिलचस्पी दिखाता हुआ आनन्द लेता है, “और बाकी बचा भोजन ?“

“बाकी बचा दासों के पेट भरने के काम आता है, भाऊ। संभव है, मस्तानी भी महाराजा की छोड़ी जूठ में से किसी दास के छके हुए भोजन का नतीजा हो ?“ सदैव गंभीर रहने वाला मल्हार राव मुँह खोलता है।

बाजी राव सभी को झिड़कता है, “चुप रहो ! हरामियो। तुम भी दूसरे की गोद में बैठकर दाढ़ी बनाने लग जाते हो। याद रखो, हम इस समय महाराजा छत्रसाल के अतिथि हैं। चलो, काम करो अपना और मुझे एकांत बख़्शो।“

सभी वहाँ से अपने अपने ठिकानों की ओर चले जाते हैं। बाजी राव अपने कक्ष में दारू पीता हुआ फिर से मस्तानी के कामुक सपनों और विलासी सोचों में डूब जाता है। जैसे जैसे वह मस्तानी के विषय में सोचता जाता है, वैसे वैसे उसके हृदय के अंदर मस्तानी के प्रति मुहब्बत बढ़ती जाती है। वह मन ही मन मस्तानी को इश्क करने लग जाता है। दूसरी ओर हवस भी उसके अंदर हिलोरे लेने लगती है। बाजी राव के जे़हन में पैदा हुई कामेच्छा भी दुगनी होकर बढ़ने लगती है और वह अधीर होकर बिस्तर पर लेटते ही तड़पने लग जाता है।
 


तीसरे दिन दोपहर को महाराजा छत्रसाल से बाजी राव के लिए बुलावा आ जाता है। संयोगवश उस दिन गणेश चतुर्थी होती है। महराजा छत्रसाल ने अपने दरबार में एक विशेष समारोह का आयोजन कर रखा होता है। पेशवा बाजी राव के खादिम, उसके सिर पर शाही कलगी जड़ा सुनहरी और सफ़ेद फेटा (मराठों की पेशवाई पगड़ी) सजा देते हैं। हीरे-मातियों की मालायें और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहनकर बाजी राव अपने सरदारों और अहलकारों के साथ महाराजा छत्रसाल के दरबार में चला जाता है।

दरबार में महाराजा छत्रसाल के मंत्रिमंडल, अमले और अहलकारों के अलावा छत्रसाल की उन्नीस रानियाँ, चैंतीस रखैलें और अनेक पुत्र, पुत्रियाँ (लगभग पचास-साठ) भी उपस्थिति होती हैं। साधारणतया, महिलायें परंपरा के अनुसार पर्दे के पीछे रहकर ही दरबार की कार्रवाई में भागीदारी निभाती हैं। लेकिन बाजी राव को देखकर हैरानी होती हैं कि महाराजा छत्रसाल के दरबार में महिलायें पर्दा किए बग़ैर मर्दों के बराबर स्थान ग्रहण करती हैं। पेशवा बाजी राव, मस्तानी कुंवर को टकटकी लगाकर बिना पलकें झपकाये देखता रहता है और पलभर के लिए भी उसके चेहरे से नज़रें दूर नहीं हटाता।

मस्तानी कुंवर को उसकी युद्ध में दिखाई बहादुरी के लिए सम्मानित किया जाने की रस्म शुरू होती है तो मस्तानी शहजादा जगतराज की पत्नी जैत कंवर को बांह से पकड़कर कर सामने कर देती है, “काकाजू, मान-सम्मान प्राप्त करने का तो भाबीसा का असल हक है। इन्होंने ही भाईसा को जंगल में से खोज था।“

महाराजा छत्रसाल मुस्कराता हुआ अपने सिंहासन से उठता है और एक अनमोल हार अपनी बहू जैत कंवर के गले में डालकर घोषणा करता है, “बेटी जैत कुंवर, समूचा बुंदेलखंड सदैव तेरा ऋणी रहेगा और आज से छह लाख की जलालपुर (Jalalpur is a city and a municipal board in Ambedkar Nagar district in the Indian State of Uttar Pradesh) और दरसोधा की जागीर तुझे इनाम के तौर पर प्रदान की जाती है।“

समूचे दरबार में उल्लास की एक लहर दौड़ जाती है। बहूसा पदमावती कुंवर (छोटी रानी और जैत कुंवर की सगी सास) की आँखें खुशी से नम हो जाती हैं। मस्तानी को भी एक बेहतरीन शमशीर और गहनों से सम्मानित किया जाता है।

आवश्यक कार्रवाइयों को समाप्त करने के पश्चात महाराजा छत्रसाल बाजी राव से सम्बोधित होता है, “पेशवा जी, आओ अब हम बुंदेल-मराठा संधि के अहदनामे का मामला भी निपटा लें।“

बाजी राव, महाराजा छत्रसाल के साथ बात करते हुए मस्तानी कुंवर की ओर देखकर मुस्कराता है, “बहुत अच्छे, हम तैयार हैं।“

महाराजा छत्रसाल सारी सभा की ओर देखते हुए बोलना प्रारंभ करता है, “पेशवा जी, मराठा हुक्मरान छत्रपति शिवाजी द्वारा पराई रियासतों को सैनिक सेवाएँ प्रदान करने तथा उनकी रक्षा करने के लिए कर के रूप में आमदनी का चैथा हिस्सा अर्थात चैथ लेने की प्रथा से हम परिचित हैं। 1665 ई. में बीजापुर (वर्तमान में कर्नाटक का जि़ला) और गोलकुंडा (हैदराबाद के समीप एक शहर) के दक्षिणी (DECCAN) सुल्तान छत्रपति शिवाजी महाराज को एक लाख चैथ देते रहे थे। 1719 ई. में मुगल बादशह ने छत्रपति शाहूजी को चैथ के साथ पंद्रह हज़ार नगद राशि अर्थात सैनिकों की सेवा के लिए छह दक्खिनी रियासतों की सुरदेशमुखी (आमदनी का दसवां हिस्सा, जो रियासतें चैथ की रकम के साथ छत्रपति को दिया करती थीं।) दिए जाने की भी हमें जानकारी है। हमें अपनी रियासतों को दातिया और ओरशा के राजपूतों से सुरक्षित रखने के लिए आपके सहयोग की निरंतर आवश्यकता पडे़गी। हम मराठा बहादुरों को उनकी वफ़ादारी के लिए चैथ देने के लिए तैयार हैं। पर मैंने सुना है कि चैथ का चैथा हिस्सा जिसको आप ‘बाबती’ कहते हैं, सीधा छत्रपति शाहूजी को चला जाता है। कुछ हिस्सा नादगौंडा (आवश्यक खर्च) और पांचसचिव(दान) में निकल जाता है। जंगी सामान, सैनिकों का मेहनताना और कार्यकारी अधिकारियों के खर्च ‘साहोतरा’ को निकालकर पीछे, दो चैथाई हिस्सा अर्थात ‘मोक्षा’ ही मराठा सरदारों के लिए बचता है।... पेशवा सरकार, आपने हमारी एक पुकार पर पैरों में जूती भी नहीं पहनी, और हमारी रक्षा के लिए आप तत्पर हुए। आज हम इस सिंहासन पर बिराजमान हैं तो सिर्फ़ आपके कारण हैं। आपने हमें उम्रभर के लिए अपना गुलाम बना लिया है। मांगो क्या चाहिए ?“

बाजी राव मंद मंद हँसता है, “महाराज, एकबार एक राजा जंग लड़ने जाता है और एक फकीर से विजय प्राप्ति का आशीर्वाद मांगता है। फकीर ‘तथास्तु’ और ‘विजयी भवो’ कहकर आशीर्वाद दे देता है। राजा जंग जीत जाता है। फिर वह राजा शुक्राना करने के लिए उसी फकीर की दहलीज पर आता है और फकीर से कहता है, मांगो, मैं आपको क्या दान-दक्षिणा दूँ ? फकीर कुछ नहीं बोलता, बस सिर्फ़ राजा की दयनीय हालत पर हँस देता है। जिसने जीत भी फकीर से मांगकर ली होती है, वह फकीर को क्या दे सकता है ?“

महाराज छत्रसाल, बाजी राव की रम्ज़ समझ जाता है, “आप मेरी बात का गलत आशय ले गए। पेशवा जी, मेरे कहने अर्थ था कि आपके हम पर अहसान हैं। हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे। आपने हमारी सहायता करके हम पर उपकार किया है। अगर कभी आप हमारी जान भी मांगेंगे तो हम बिना सोचे हँसते-हँसते आपको दे देंगे।“

“यह बात है तो समझो हमने आपकी जान मांग ली है।“ बाजी राव बिना देर करे तुरंत बोल पड़ता है।

महाराजा छत्रसाल अचंभित हो जाता है, “मैं कुछ समझा नहीं। कृपा करके साफ़ और स्पष्ट बताएँ।“

“कुछ क्या, आप तो कुछ भी नहीं समझे। आपने ठीक फरमाया है कि चैथ तो छत्रपति श्री शाहूजी को चली जाएगी। पीछे बाजी राव के पल्ले तो नाममात्र सी रकम ही बचेगी। हमें भी तो कुछ मिलना चाहिए।“

“हाँ-हाँ, हुक्म करें, आपको हीरों की खानों वाली अपनी नई राजधानी पन्ना रियासत (मध्य प्रदेश) की जागीर दे देते हैं।“

बाजी राव की आँखें हँसती है, “चाहिए तो हमें हीरों की खान वाली जागीर ही है। लेकिन पन्ना नाम की धरती का टुकड़ा हमें क्या करना है ? हमारे पास जागीरों का कौन का घाटा है ! हमें तो आपके खजाने का सबसे कीमती हीरा... हमारी मुराद है, हमें स्वय कों मस्तानी चाहिए।“

बाजी राव के मुख से यह सुनकर महाराजा छत्रसाल को एक झटका-सा लगता है और वह अवाक् होकर कभी धरती की ओर देखने लग जाता है और कभी पेशवा बाजी राव की ओर। जब महाराजा छत्रसाल कुछ देर तक कोई उत्तर नहीं देता तो बाजी राव स्वयं उसको छेड़ता है, “किस हिसाब किताब में उलझ गए, बुंदेलपति ?“

“नहीं...नहीं... कुछ नहीं। पेशवा जी, शायद आप नहीं जानते कि मस्तानी कुंवरसा हमारी बेटी है और हमने उसको बेटों से अधिक लाड़ में पाला है। हमारे जिगर का टुकड़ा है वो। यह संभव नहीं है।“ महाराजा अपनी विवशता प्रकट करता है।

बाजी राव, महाराजा छत्रसाल के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है, “पर बेटियाँ भी कभी किसी ने घर में रखी हैं ? आपके राजपूतों में तो विजयी राजा के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित करने और रिश्तेदारी बनाने के लिए ‘डोला’ लेने और देने की प्रथा है। अनेक राजपूतों ने अकबर और अन्य हुक्मरानों को अपनी बेटियों के डोले दिए हैं। क्या नहीं ?“

महाराजा छत्रसाल, बाजी राव को गचका देने का प्रयास करता है, “वह तो ठीक है, पर हर राजपूत महाराजा छत्रसाल नहीं होता और डोले में जाने वाली हर लड़की मस्तानी नहीं होती। मेरी जान है वो। मस्तानी की जगह हम आपको मन बहलाने के लिए अन्य दस लड़कियाँ दे देते हैं। आप जिस पर भी उंगली रखेंगे, हम हँसकर उसको आपके सुपुर्द कर देंगे।“

“दस नहीं, बस, हमको केवल मस्तानी ही चाहिए। आप चिंतित न हों, हम भी मस्तानी को पलकों पर बिठाकर रखेंगे। गरम हवा नहीं लगने देंगे। काँच के सामान की भाँति संभाल संभालकर रखेंगे। जान से प्यारी बनाकर।“ बाजी राव गुस्से में आकर अपने हाथों में पकड़ी अपनी तलवार की मूठ को और ज्यादा कसकर पकड़ लेता है।

“यदि यह बात है तो मैं डोला तो नहीं दे सकता। हाँ, अगर आपकी इच्छा है तो मैं मस्तानी के साथ आपका विवाह अवश्य कर सकता हूँ। पर मैंने तो सुना था कि आप पहले ही विवाहित है।...“ बात करते करते महाराजा छत्रसाल चुप हो जाता है।

“इससे क्या अंतर पड़ता है ? आपकी भी तो अनेक शादियाँ हुई हैं और मेरे पिता जी पेशवा बाला जी विश्वनाथ जी ने भी दो विवाह करवाये और अनेक रखैलें रखी थीं। छत्रपति शिवाजी के आठ विवाह थे। शिवाजी के पोते और संभा जी के पुत्र हमारे छत्रपति महाराज शाहू संभाजी राजा भौंसले जी की चार बेगमें हैं। बड़े लोग बहु-विवाह करवाया ही करते हैं। महाराज, आपने अपनी तमाम जि़न्दगी में रोहीला खान, खालिक, मुनवर खान, सदर-सुद्दीन, शेख अनवर, सैयद लतीफ़, बहिलोल खान और अब्दुस अहमद जैसे जरनैलों को हराया है और 1680 ई. में महोबा पर बहादुरी के साथ कब्ज़ा किया। आपने अपने राज्य की सीमा को पूर्व में चित्रकूट और पन्ना, पश्चिम में ग्वालियर तक, उŸार दिशा में सागर से लेकर कल्पी तक और गराह कोटा तक, उधर धामोह दक्खिन तक फैलाया है। और फिर आप तो जानते ही हो कि आपके राज को संभालने के लिए आपका कोई पुत्र भी सुयोग्य नहीं है। आपकी रियासत को सुरक्षित रखने के लिए हमेशा आपको हमारी कृपा चाहिए होगी। मैं आपका दामाद नहीं, बेटा बनना चाहता हूँ। मैं मस्तानी को उपस्त्री (रखैल) नहीं, बल्कि अपनी पत्नी का दर्जा दूँगा।“ भावुकता और वेग में आया बाजी राव अपनी नीयत और नीती को स्पष्ट उजागर करता है।

कुछ रुककर सोचता हुआ महाराज छत्रसाल अपनी संदेह समाशोधन के लिए पूछता है, “पर बुरा न माने तो बताने की कृपा करेंगे कि इस में आपका क्या लाभ होगा ?“

“सच बात तो यह है महाराज, हमारा मस्तानी पर दिल आ गया है। इश्क हो गया है मुझे आपकी बेटी मस्तानी से। इस रिश्तेदारी के हम दोनों पक्षों को एक-सा ही लाभ होगा। खानाजंगी कर रहे बुंदेलों के दल ओरशा और दातिया के अलावा मुगल आपके शत्रु हैं। हमें राजपूतों और निजामों के साथ नित्य टक्कर लेनी पडती है। यदि हम एकजुट हो जाएँ तो दुश्मन के आसानी से दाँत खट्टे कर सकते हैं। कोई हमारी ओर आँख उठाने का साहस नहीं कर सकेगा। मैं वचन देता हूँ कि मराठे आपके पुत्रों और रियासत की हवा की ओर किसी को झांकने भी नहीं देंगे। सबसे बड़ी बात मैं छत्रपति शिवाजी के इच्छित स्वराज को स्थापित करने का संकल्प पूरा करना चाहता हूँ। हमारा लक्ष्य दिल्ली के किले पर केसरी मराठा ध्वज लहराना है। आपकी रियासत हमारे दिल्ली की ओर जाने वाले रास्ते के मध्य में पड़ती है। आपके सहयोग से दिल्ली को जीतने से हमें कोई नहीं रोक सकता।“ बाजी राव राजनैतिक पेंच डालता है।

महाराजा छत्रसाल को यह प्रस्ताव लाभकारी प्रतीत होने लगता है और वह थोड़ी हिचकिचाहट के बाद स्वीकार कर लेता है, “ठीक है, हमें यह रिश्ता स्वीकार है। मैं श्रीमंत पेशवा बाजी राव के साथ मस्तानी कुंवर के रिश्ते की घोषणा करता हूँ। मैं श्रीमंत को अपना दामाद नहीं, पुत्र मानते हुए अपने उतराधिकारी हृदेय शाह और जगतराज के बराबर अपनी सम्पति में से तीसरा हिस्सा देने की वसीयत भी करता हूँ।“

“मुबारक हो !... बधाई हो !“ सभा में उपस्थित व्यक्तियों की आवाज़ें आने लगती हैं।

महाराजा छत्रसाल उठकर बाजी राव को अपने गले से लगा लेता है। शहजादा जगतराज और शहजादा पदम सिंह भी आगे बढ़कर बाजी राव के साथ आलिंगनबद्ध होते हैं। लेकिन पवार वंश की रानी हीरा कुंवर के पेट से जन्मा बड़ा शहजादा हृदेय शाह अपने संकोची स्वभाव के कारण दूर खड़ा रहता है। बाजी राव खुद उसके समीप चला जाता है, “क्यों राजकुंवर जी, आपको इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है न ?“

“आपत्ति ? नहीं, कतई नहीं श्रीमंत। यह आपने कैसी बात कर दी ? मस्तानी कुंवरसा के लिए आपसे अधिक योग्य वर और कौन हो सकता है ?“ हृदेय शाह भी बाजी राव को आलिंगन में ले लेता है।

“मैं आपका मेहुणा(बहनोई) नहीं, बल्कि भाई बनकर रहूँगा। मुझे आप आजी (जीजा) श्रीमंत नहीं, बल्कि थोरले (बड़ा) बाजी राव पुकारना।“ बाजी राव हृदेय शाह के साथ अपनी पगड़ी बाँट लेता है।

महाराजा छत्रसाल प्रसन्न होकर घोषणा करता है, “आज ही शादी का प्रबंध कर देते हैं।“

“क्षमा करें महाराज। हमारी मराठांे की भी कुछ परम्पराएँ हैं, जिनकी मान-मर्यादा रखना हमारा कर्तव्य है। आप मस्मानी कुंवर को हमारे साथ विदा कर दें और हम विवाह की रस्म पूना में जाकर ही सम्पन्न करेंगे। और फिर छत्रपति महाराज स्वामी शाहू जी के आशीर्वाद के बिना हम ऐसा अहम कदम कैसे उठा सकते हैं ?“

बाजी राव की योजना सुनकर महाराजा छत्रसाल दुविधा में पड़ जाता है, “बिना शादी किए हम मस्तानी कुंवर को कैसे भेज सकते हैं ? हमारे बुंदेलों के भी कुछ रस्मोरिवाज हैं जिनकी पालना करना हमारा धर्म है। (थोड़ा सोचकर) पर इस संकटमयी स्थिति में से निकलने का कोई तो हल होगा ? आप ही बताओ, हम क्या करें ?“

चतुर आनंद राव मकाजी मामला लपक लेता है, “महाराज, मराठों की शमशीर ही हमारी आन, प्रतिष्ठा और वचनबद्धता की प्रतीक है। सारा जग जानता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज 1659 ई. में कुंदाल से तीन सौ होन की खरीदी इंगलिस्तान(Europe) की बनी अपनी तलवार भवानी को हर समय अपने साथ रखते थे। आप मस्तानी की शादी पेशवा जी की तलवार के साथ करवा दो। इससे आपकी इज्ज़त भी रह जाएगी और हमारा सम्मान भी कायम रहेगा।“

“हाँ, यह ठीक रहेगा।“ महाराजा छत्रसाल आनंद राव मकाजी की बात सुनकर खिल उठता है।

दरबार को समाप्त करने के उपरांत महाराजा छत्रसाल अपनी बेटी मस्तानी के पास उसको मनाने और उसकी इच्छा जानने के लिए जाता है, “देखो मस्तानी, तुम तो जानती ही हो कि मैंने अपनी सल्तनत को कैसे अपने लहू से सींचा है। तुम्हारे भाई तो निकम्मे हैं। मुझे अपनी रियासत की रक्षा के लिए मराठों से सहायता मांगनी पड़ी है। मेरी पुत्री, उसके एवज़ में पेशवा बाजी राव ने मुझसे तुम्हारा हाथ मांगा है। बाजी राव बहुत अच्छा इन्सान और निपुण योद्धा है। मुझे उम्मीद है कि वह सारी जि़न्दगी तुम्हें खुश रखेगा। मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरे इस निर्णय पर बगै़र कोई विरोध किए, उसे स्वीकार करोगी।“

“काकाजू, आपका आदेश सिर माथे। पहले कभी आपकी बात का विरोध किया है जो इस बार करूँगी।“ मस्तानी खिले माथे सहमति प्रकट कर देती है।

मस्तानी की सहमति सुनकर महाराजा छत्रसाल उसका सिर सहलाता है, “जीती रह मेरी बच्ची। मुझे तुमसे यही आशा थी। लेकिन मेरी एक बात अपने पल्ले के साथ कसकर गांठ बांध ले। अब तक तो तुम हमारे पास थी। हम सब तुम्हारा अच्छा-बुरा सोचते थे। तुम्हारा दुख-दर्द सुनते थे। लेकिन अपने ससुराल वाले घर में तुम्हें हमसे दूर अकेली ही अपना भला-बुरा विचारना होगा। तुम अपने ससुराल की पसन्द को मुख्य रखकर पहनना-खाना। जो उन्हें अच्छा न लगे, ऐसा कोई काम न करना। हमने तुम्हें अच्छे संस्कार दिए हैं और अपनी ओर से उत्तम शिक्षा और व्यवहार से तुझे नवाजा है। बुंदेलों की अपेक्षा मराठों का रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग बिल्कुल भिन्न है। ससुराल वालों के परिवार में शीघ्र रचने-बसने का प्रयास करना। मुझे तुम्हारी बहुत चिंता रहेगी।“

“काकाजू, आप चिंतित न हों। मैं अपना पूरा ध्यान रखूँगी और आपको कोई उलाहना नहीं आने दूँगी। यदि मंै किसी संकट में हुई तो आपको तुरंत सूचित कर दूँगी।“ मस्तानी सिर झुका लेती है।

महाराजा छत्रसाल मस्तानी के मुँह पर हाथ रख देता है, “नहीं !... ऐसा कतई न करना। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। सुन... एक राजा का पुत्र बहुत नालायक होता है। उसको यही भ्रम होता है कि वह राजकुमार तो हैं पर उसे कुछ करने की कोई ज़रूरत नहीं। उसके बाप का राजपाट उसको मिल जाएगा। वह आलसी, अय्यास और निकम्मा बन जाता है। राजा को बहुत चिंता होती है पुत्र की। राजा सोचता है कि जब वह आँखें मूंद लेगा तो उसके निकम्मे पुत्र का क्या होगा ? राजा को पुत्र के भविष्य की चिंता में ग्रस्त देखकर उसका वज़ीर एक सलाह देता है। राजा वज़ीर की सलाह पर अमल करके अपने राजकुमार पुत्र के सम्मुख एक शर्त रख देता है कि वह रियासत से दूर टापू पर जाकर मेहनत करके अपना गुज़ारा करे और सिद्ध करे कि वह शासन करने के योग्य है। नहीं तो वह सारी रियासत और धन दौलत दान कर देगा। राजकुमार नाव में बैठकर चला जाता है और कुछ दिन बाद खाली हाथ लौट आता है। राजा उसको दुबारा भेजता है। राजकुमार भूख न सहते हुए फिर वापस आ जाता है। राजा उन्हीं पैरों राजकुमार को लौटा देता है। राजकुमार टापू पर कुछ दिन भटककर लौट आता है। राजकुमार को महलों वाला सुख-आराम टापू पर कहाँ मिलता है ? काफी देर तक यही सिलसिला चलता रहा। राजा भेजता रहा और राजकुमार काम से जी चुराता हुआ और समय नष्ट करके वापस लौटता रहा। राजा ने वज़ीर की फिर सलाह ली। वज़ीर समझदार था। वह राजा से बोला, “इस बार मैं साथ जाऊँगा।“ राजा ने वज़ीर को राजकुमार के साथ एक अन्य किश्ती देकर रवाना कर दिया। वज़ीर ने टापू पर पहुँचकर राजकुमार की किश्ती को आग लगा दी और अपनी किश्ती में वापस लौट आया। राजकुमार कई वर्ष न लौटा और फिर जब लौटा तो वह उस टापू का राजा बनकर लौटा था। राजा ने वज़ीर से पूछा कि यह चमत्कार कैसे हो गया? इस पर वज़ीर ने कहा, “राजन, आप किश्ती नहीं फूंकते थे इसलिए राजकुमार को पीछे लौट आने की इच्छा बनी रहती थी। मैंने किश्ती फूंकी तो उसको इधर का खयाल नहीं रहा और वह मेहनत करने के लिए उत्साहित हुआ। राजकुमार को पता लग गया कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए उसको वहाँ टिककर काम करना होगा।... इस कथा को सुनाने का मेरा तात्पर्य यह है कि तेरे विदा हो जाने के बाद हम तेरी किश्ती जला देंगे। तू इधर के बारे में न सोचना और जितना शीघ्र संभव हो सका, अपने आप को वहाँ की जीवनशैली में ढाल लेना। जो स्त्री अपने पीहर से नहीं टूटती, वह ससुराल के साथ नहीं जुड़ सकती। माँ-बाप की ओर देखने वाली लड़की ससुराल में नहीं बसा करती।“

मैं सब समझ गई काकाजू। मैं आपको वहाँ बसकर ही नहीं, राज करके भी दिखाऊँगी।“ मस्तानी अपने पिता के गले लग जाती है।

“हाँ, एक महत्वपूर्ण बात तो मैं बताना ही भूल गया कि पेशवा का खानदान चितपवन ब्राह्मण है। ब्राह्मण अपने आप को दूसरी जातियों से श्रेष्ठ समझते हैं। स्कंद पुराण के सागीन्द्री कांड में उल्लेख आता है कि गोरे खूबसूरत नीली आँखों वाले यात्रियों का बेड़ा समुद्री तूफान में कोकण के तट से टकरा जाता है और उसमें सवार चैदह यात्री मर जाते हैं। स्थानीय लोगों द्वारा उसका संस्कार करने की तैयारी की जा रही होती है, पर परशुराम उनमें जान फंूककर उनकी चिताओं को पावन कर देता है और वे चितापवन कहलाते हैं। उन्हीं चैदह मन-चिता पावन पवित्र आत्माओं यानि चितपवनों से ब्राह्मणों के चैदह गौत्र चलते हैं। जैसे अत्री, भावबरव्या, भारद्वाज, गर्ग, जमादागनी, कपी, कश्यप, कुनदीनाया, कौशिक, नित्युंदन, शांडिल्य, वशिष्ठ, वत्स और विष्णुवरुध। इन चैदह की आगे चलकर अन्य शाखायें बन गईं जिन्हें गण-गौत्र कहते हैं। पेशवा बाजी राव का गोत्र भट्ट भी इन्हीं में से एक गण-गौत्र है। परशुराम द्वारा समुद्र में तीर मारकर पैदा की गई धरती चितापोलना या चिपलन (वर्तमान गोआ) चितपवनों का देश है। चितपवन ब्राह्मण तन और मन के पवित्र माने जाते हैं। ब्राह्मण परिवारों में काफी राजनीतियाँ चला करती हैं। तुम्हें अनेक राजनीतिक चालों का सामना करना पड़ेगा और पग पग पर षड्यंत्रों से जूझना पड़ सकता है। हर कदम फूंक फंूक कर रखना। यदि कभी बुंदेलखंड को मराठों से खतरा हो तो सही समय पर हमें चैकन्ना कर देना।“

मस्तानी मशालों की मानिंद अपनी आँखें मूंदकर हामी भर देती है।

अगले दिन ड्यौढ़ी महल के मंडल में मस्तानी, बाजी राव की तलवार से अग्नि के ईदगिर्द फेरे लेकर विवाह की रस्में पूरी कर लेती है। पेशवा बाजी राव मस्तानी की डोली लेकर अपनी फौजों के साथ जैतपुर से पूणे की ओर रवाना हो जाता है।
 
बुंदेलखंड से कूच करके सबसे आगे बाजी राव अपने घोड़े पर जा रहा होता है और उसके पीछे हाथी पर पालकी में मस्तानी जा रही होती है। मस्तानी को जब भी अवसर मिलता है, वह पर्दा हटाकर बाजी राव को देखती हुई अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने लग जाती है। मस्तानी की अल्हड़ अवस्था से ही यह इच्छा रही थी कि उसका जीवनसाथी कोई महान योद्धा हो। पर बाजी राव जैसे चोटी के सूरमे के जीवन में प्रवेश करने के बारे में तो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। बाजी राव को देखकर मस्तानी की भूख उतर जाती है। पालकी में सवार मस्तानी के रोम रोम में शरारती गुदगुदी होने लगती है। वह पर्दे की जाली में से बाजी राव को टकटकी लगाकर निहारती हुई मुस्कारने लग पड़ती है।

सफ़र लम्बा होने के कारण बाजी राव उसे शीघ्र समाप्त करने के लिए अपने दस्ते को अधिक स्थानों पर अधिक देर के लिए रुकने नहीं देता। बारी बारी से सभी सैनिक अपनी सवारियों अर्थात हाथी-घोड़ों पर ही आराम कर लेते हैं। यदि थोड़ी-सा वे कहीं विश्राम करते भी हैं तो महज वे अपने जानवरों को आराम देने और थकान उतारने के लिए ही रुकते हैं। कुछ देर दम लेने और थकान उतारने के बाद वे चारा-दाना, पट्ठे आदि से उनका पेट भरकर और घोड़ों की अपनी सेना टुकड़ी को फिर से चलाकर रास्ता कम करने में लग जाते हैं। जैतपुर से पूणे तक का रास्ता भी कौन सा कम है ?

कई दिन आठों पहर निरंतर चलता कारवां पूणे की मंजि़ल के मध्य में पहुँच जाता है। आधे से अधिक रास्ता वह पूरा कर चुके होते हैं। नर्बदा नदी के निकट पहुँचने तक बाजी राव का सारा लश्कर बुरी तरह से थककर शक्तिहीन हो चुका होता है। रात भी सिर पर चढ़ी खड़ी होती है। समझदारी से काम लेते हुए बाजी राव वहीं उसी पड़ाव पर ही विश्राम करने के लिए आदेश दे देता है।

सेना द्वारा नर्बदा नदी के इर्दगिर्द तम्बू तान लिए जाते हैं। करीब के जंगल में से शिकार मारकर उसको भूनने का काम शुरू हो जाता है। शराब का दौर प्रारंभ हो जाता है। बाजी राव मस्तानी के ख़यालों में खोया हुआ नर्बदा नदी में स्नान करने चला जाता है।

स्नान करते हुए बाजी राव मंत्रों को जाप कर रहा होता है। किन्तु पूजा में उसका मन नहीं लगता। उसका ध्यान बार बार न चाहते हुए भी मस्तानी की ओर दौड़ दौड़ जाता है। जल से बाहर निकलने तक बाजी राव मस्तानी को फौरन अंग लगाने के बारे में दृढ निश्चय कर चुका होता है।

मस्तानी अपनी दासियों के साथ पृथक स्त्री शिविर में होती है। खेमे में प्रवेश करते ही बाजी राव, दास को बुलाकर मस्तानी को संदेश भेज देता है।

मस्तानी की प्रतीक्षा में बाजी राव बूँद बूँद करके शराब पीने लग जाता है। बाजी राव की कल्पना में मस्तानी नृत्य करने लगती है। दारू पीते हुए वह मस्तानी के संदर्भ में सोचता हुआ विचारों के चक्रव्यूह में ही घिरा रहता है। वह मस्तानी को भोगने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कामक्रीड़ा के आसनों की रूप रेखा अपने जे़हन में बना लेता है। कभी वह गज आसन, कभी अश्वमेध आसन, कमान आसन और कभी ताली क्रीड़ा विधि से मस्तानी को भोगने का विचार बनाता है। फिर वह अपनी कल्पना के माध्यम से इन आसनों में अपने आपको मस्तानी के साथ आलिंगनबद्ध हुआ देखता है और आनन्द अनुभव करने लग जाता है। बाजी राव ज्यूँ ज्यूँ मस्तानी को प्रेम करने की विधियों और तरकीबों के बारे में सोचता है, त्यूँ त्यूँ उसकी बेचैनी और कामचेष्टा बढ़ती जाती है। वह उत्तेजित होता जाता है और संभोग करने के लिए उसका मन उतावला पड़ने लगता है।

प्याला-पर-प्याला पीता हुआ वह एक सुराही खाली करके दूसरी मंगवा लेता है। परंतु मस्तानी नहीं आती। बाजी राव व्याकुल हो उठता है। वह दुबारा मस्तानी को बुलाने का संदेश भेजता है। बाजी राव को अत्यंत कामोत्तेजना के कारण अधीरता हो रही होती है। वह काम लालसाओं का सताया विचलित होकर तड़प रहा होता है। व्याकुलता के कारण उसकी जान मुट्ठी में आई पड़ी होती है।

काफ़ी समय की प्रतीक्षा के बाद मस्तानी बाजी राव के खेमे में आकर ‘आदाब’ अजऱ् करती है तो बाजी राव की जान में जान आती है। बाजी राव, तोप की नली में से निकले बारूद के गोले की भाँति उछलकर अपने आसन पर से उठता है और मस्तानी को अपनी बांहों के घेरे में कस लेता है, “आ आ मेरी जान ! तेरे प्रतीक्षा में मेरी तो जान ही लबों पर आई पड़ी थी। आने में इतना विलम्ब क्यों कर दिया ?“

मस्तानी घबरा जाती है, “वो.... वह जी, बस कुछ नहीं, यूँ ही कपड़े पहनते हुए कुछ अधिक समय लग गया। गुस्ताखी के लिए माफ़ी चाहती हूँ। वो मज़ा विसाले यार में कहाँ, जो इंतज़ार में है।“

“वस्त्र पहनने के लिए इतना समय क्यों नष्ट कर दिया ? तुम्हें पता नहीं था कि इन्हें तो मैं तुम्हारे आते ही उतार देने वाला था ?“ बाजी राव मस्तानी की चुन्नी उसके सिर पर से खींचकर उतार देता है।

बाजी राव का मंतव्य भाँपकर मस्तानी नखरा दिखाती है, “वस्त्र उतारने से पहले पहनने भी आवश्यक हैं। रूह से कपड़े उतारने का आनन्द लेने के लिए इन्हें पहनना भी मिज़ाज के साथ होता है, मेरे हुजूर ! और फिर, आपको पहली बार एकांत में मिलना था। इसलिए विशेष रूप से सजना-संवरना तो था ही।“

बाजी राव मस्तानी को बांहों में ऊपर उठाकर नीचे बिछे बिस्तर पर लिटाते हुए उसके साथ ही लेट जाता है, “भगवत गीता की सौगंध, तेरे हार-शिंगार के चक्कर में मेरा तो डाट निकला पड़ा है। पागल हुआ पड़ा हूँ मैं... बहुत वीरानगी है मेरे दिल में जिसको तेरे प्यार से भरना है। जब से तुझे देखा है, मैं तो शारीरिक संगम के लिए तड़प रहा हूँ। कमबख्त धैर्य ही नहीं होता मुझसे। भविष्य में एक बात का ध्यान रखना...।“

“किस बात का ?“ मस्तानी बीच में टोकती हुई माथे पर बल डाल लेती है।

“तुम मेरे से मिलने आते समय यह हार-शिंगार को तो रहने ही दिया करना। मैं नहंीं चाहता कि तुम्हारे और मेरे बीच गहना-जेवर, कपड़ा-लता या कुछ और हो। बस, तुम्हारा निर्वस्त्र बदन, मेरे नंगे जिस्म से यूँ लिपट जाए जैसे ठंड लगने पर दोनों हाथों की हथेलियाँ एक-दूजे से अपने आप चिपटकर आपस में रगड़ा करती हंै या जैसे रणभूमि में तलवारें आपस में भिड़ा करती हैं।“ बाजी राव एक तरफ करवट लेकर पड़ी मस्तानी की पीठ को सहलाने के लिए अपने हाथ की हथेलियाँ झसने लग जाता है।

बाजी राव के स्पर्श से मस्तानी की देह में प्रेम तरंगें छिड़़ जाती हैं। मस्तानी आँखों में शरारत झलकाती हुई मुस्कराती है, “जो हुक्म मेरे आका ! भविष्य में ऐसा ही होगा। और कोई हुक्म ?“

“चल फिर, अपने नाजुक हाथों से दो जाम बना।... एक हमारे लिए और एक अपने लिए।“

“छी...छी... न बाबा न ! मैं नहीं शराब को हाथ लगाती। मुझे अपना धर्म भ्रष्ट करना है ?... यह क्या ? आप उच्च कुल के ब्राह्मण होकर मांस-मछली खाते और शराब पीते हैं ?“ मस्तानी लाड़ और नखरे दिखाती है।

“क्यों ब्राह्मणों को क्या दारू दांत काटती है ? जब सारी दुनिया पीती है, हमने पी ली तो कौन सा क़हर ढह गया ? निरी भांग जैसी है यह तो। मैं तो इसको भगवान भोले शंकर का प्रसाद समझकर पी लेता हूँ। बाकी ऐ सुंदरी कि मैं हर समय मंत्र पढ़ते रहने और मंदिरों की घंटियाँ बजाने वाले ब्राह्मणों में से नहीं हूँ। रणभूमि में तलवारें खनखनाना मेरी फितरत है। शराब और कबाब से जंगबाज़ों को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। मैंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जंगों-युद्धों में व्यतीत किया है। वहाँ रणभूमि में कौन सी माँ बैठी होती है जो चावल उबालकर बिरयानी और पुलाव बनाकर खिलाये ? रणक्षेत्र में तो शिकार मारकर गुज़ारा करना पड़ता है और थकान मिटाने के लिए दारू भी पी जाती है। शराब, मछली और मांस को हजम करने में सहायक सिद्ध होती है। कबाबों के संग शराबों का बहुत गहरा रिश्ता है। शराब के बग़ैर रूखा गोश्त कहीं हलक से नीचे उतरता है ?“

मस्तानी बाजी राव के गले में पहनी बहुमूल्य मालाओं को छेड़ती है, “नहीं, मेरा अर्थ था, आप मदिरापान न किया करें। यह बहुत बुरी चीज़ होती है।“

“तुमने कभी पी है ?“

“नहीं।“

“फिर कैसे कह सकती हो कि शराब बुरी शै है ?“

“लोगों से सुनती हूँ कि इसको पीने से आदमी होश में नहीं रहता और उसकी अक्ल मारी जाती है। एक पीर ने कहा है, ‘जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ।। आपणा पराया न पछाणई खसमहु धके खाइ।। जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ।। झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ।।(गुरू ग्रंथ साहिब, सलोक मः 3, सफ़ा 554) अर्थात जिसके पीने से बुद्धि दूर हो जाती है और पागलपन आ चढ़ता है, अपने पराये की पहचान नहीं रहती, ईश्वर की ओर से धक्के पड़ते हैं। जिसके पीने से खसम बिसरता है और रब की दरगाह में सज़ा मिलती है। ऐसी झूठी शराब कभी नहीं पीनी चाहिए। जहाँ तक वश चले इसको पीने से बचना चाहिए।... आपने देखा नहीं, जंग में शराब में मस्त हुए हाथी बाज़ दफ़ा अपने ही लश्कर को रौंद डालते हैं।“ मस्तानी बाजी राव की आँखों में आँखें डाल लेती है।

“वो हाथी तो शराबी हो जाते हैं क्योंकि उनके सामने हथनियाँ होती हैं, मस्तानी नहीं होती ! तेरे हुस्न के सामने तो शराब कुछ नहीं। तुम्हें देख देने के बाद मुझे तो यह शराब ससुरी चढ़ती ही नहीं। मैं तो तुम्हारी मस्तानी आँखों में एक नज़र देखते ही टल्ली हो जाता हूँ। हमारे लिए तो जि़न्दगी है, दूसरों के लिए खराब बन जाती है। लाख आँसू निचोड़ता है जब आशिक तो एक कतरा शराब बनती है।“ बाजी राव शायराना अंदाज़ में फरमाता है।

मस्तानी प्रत्युतार में बहस करती है, “यह दारू निरी ज़हर है। इससे तो शरबत पी लिया करें। मैं अपने हाथों से बनाया करूँगी आपके लिए मेवे डालकर केसर और कुमकुम वाला शरबत। देखना, मेरा शरबत पीने के बाद आपको कुछ और स्वाद ही नहीं लगेगा।“

“शराब स्वाद के लिए नहीं, सरूर के लिए पी जाती है। शराबी इल्ज़ाम शराब को देते हैं। आशिक तोहमत शराब को देते हैं। कोई अपनी भूल कुबूल नहीं करता, कांटे भी ताने गुलाब को ही देते हैं।... तुम भी क्या याद करोगी, किसी चितपवनी ब्राह्मण मराठों के पेशवा से वास्ता पड़ा था। ले, मेरे कहने पर एकबार घूँटभर देख...आसमान में न उड़ती फिरी तो मेरा नाम बदल देना।“ बाजी राव एक तरफ पड़ा मदिरा वाला प्याला उठाकर मस्तानी को उठाते हुए जबरन मस्तानी के अधरों के साथ लगा देता है।

उठकर बैठती हुई मस्तानी एक सांस में सारा प्याला पीकर हिचकी लेती है और अपने आप झट से दूसरा प्याला भर लेती है, “हाँ...उतनी बुरी भी नहीं, जितनी लोग इसकी निंदा करते हैं।“

“लोग तो कुत्ते हैं और कुत्ते तो भौंका ही करते हैं, जान। किसी की परवाह नहीं करनी चाहिए। जि़न्दगी का लुत्फ़ लो जी भरकर। यूँ ही शराब को बदनाम किया बीसियों लोगों ने।“ बाजी राव मस्तानी की आँखों में झांकता है। वह भी नज़रें मिलाती है। मस्तानी की आँखों में से काम छलक रहा होता है। बाजी राव, मस्तानी को कलाई से पकड़कर अपनी ओर खींचकर दुबारा लिटाते हुए उसके ऊपर झुककर उसकी गर्दन को वेग से चूमना प्रारंभ कर देता है।

नीचे लेटी मस्तानी बाजी राव के गले में बांहें डालकर अपने होंठ हरकत में लाते हुए जवाबी कार्रवाई कर देती है।

बाजी राव का हाथ मस्तानी की जांघों को सहलाने लग जाता है।... मस्तानी सरूर में आकर एकदम उठकर बाजी राव के ऊपर लेटती हुई अचानक किए आक्रमण की तरह ताबड़तोड़ चूमने लग जाती है।... उन दोनों का वेग कुछ ही पलों में तीव्र और प्रचंड हो उठता है। मस्तानी अपने नाड़े का एक सिरा खींचकर अपना लहंगा उतार देती है, “आज मैं आपको ऐसा नशा चढ़ाऊँगी कि आपको सारी दुनिया के नशे भूल जाएँगे।“

“हाँ, पगली, मैं तो खुद तेरे नयनों में से जाम भर भरकर पीने के लिए तरसा पड़ा हूँ।“ बाजी राव अपने अंगवस्त्र को उतारकर मस्तानी की चोली की तनियों की गांठें खोलता है और मस्तानी के नाजुक गोरे बदन को वस्त्रों की हिरासत से मुक्त कर देता है। जैसे कोई मदमस्त हाथी माथे की टक्कर मारकर दुश्मन के किले के दरवाजे़ को तोड़ने के लिए धक्का मारता है, वैसे ही एक झटके के साथ बाजी राव मस्तानी के शीशमहल जैसे गुलबदन में सेंध लगाकर प्रवेश हो जाता है।

बाजी राव और मस्तानी हाँफे हुए ऊँठ की तरह एक दूसरे के साथ लिपट पड़ते हैं। बाजी राव बांहों में कसता हुआ मस्तानी को अपने पेट पर लिटा लेते है, “मस्तानी तेरा असली और पूरा नाम क्या है ?“

मस्तानी धीमे स्वर में बोलने लगती है, “माऊ के लोग मुझे मस्तानी माऊ सहानियाँ के नाम से पुकारते हैं। वैसे असली नाम तो मेरा माहनूर था। पर कभी किसी ने इस नाम से पुकारा ही नहीं। इसलिए यह नाम कोई नहीं जानता। बचपन से ही मुझे नाच गाने का शौक था। बचपन में मेरे संगीत के प्रति शौक को देखते हुए काकाजू महाराजा छत्रसाल जी ने संगीत और नृत्य की शिक्षा दीक्षा के लिए उस्ताद मस्तान जी के पास भेजा तो मैं नाचते-गाते इतनी मस्त हो जाती थी कि मुझे अपने इर्द गिर्द की भी होश नहीं रहती थी। उस्ताद मस्तान जी ने मुझे अपना नाम बख़्शकर मस्तानी कहना प्रारंभ कर दिया। मैं उनकी सबसे चहेती शिष्या थी। मैं नृत्य सीखकर जवान होने लगी तो मेरा नृत्य देखने वाले अपने होश को काबू में न रख पाते और मेरे सौन्दर्य और नृत्य को देख मस्ताने हो जाते। सब मस्तानी मस्तानी पुकारते रहते और इस प्रकार मेरा नाम मस्तानी ही पड़ गया। अब तो मुझे खुद भी भूल चुका है कि मेरा असली नाम क्या था ? आपको नहीं अच्छा लगता तो सरताज आप बदलकर मेरा दूसरा कोई भी मनपसंद नाम रख सकते हैं।“

“नहीं नहीं, मस्तानी से बढि़या नाम क्या हो सकता है ? यह नाम बहुत योग्य है और तुम पर जंचता है। वैसे लाड़ प्यार से मैं कभी कभार तुम्हें नर्बदा पुकार लिया करूँगा। मुझे नर्बदा नदी से बहुत प्रेम है। मस्तानी, मैं तुम्हें इतना प्यार करूँगा कि दुनिया का इतिहास तुम्हें बाजी राव की मस्तानी कहकर याद किया करेगा। जब कभी भी मराठा बाजी राव पेशवा का जिक्र हुआ करेगा या मराठों के इतिहास का कोई पृष्ठ खोला जाएगा तो उस समय भी पेशवा बाजी राव की महबूबा मस्तानी बेगम की बात भी अवश्य हुआ करेगी।“ बाजी राव आवेश में आकर बात करता है।

यह सुनकर मस्तानी स्वप्नमयी संसार में विचरने लग जाती है, “श्रीमंत स्वामी मेरा रोम रोम आपका सदैव ऋणी रहेगा। पर आपके नाम के साथ लगते इस पेशवा उपाधि का क्या अर्थ है ?... शायद सेनापति होता हो ?“

“नहीं, रुको। मैं बताता हूँ।“ बाजी राव उठकर बैठते हुए अपना प्याला उठा लेता है और घूंट भरता हुआ बोलता है, “पेशवा, फारसी का शब्द है। इसका अर्थ होता है - ताबिया में हमेशा पेश रहने वाला महामंत्री। महान मराठा शासक पहले छत्रपति शिवाजी भौंसले महाराज 1674 ईसवी में यह पेशवा पद अस्तित्व में लाए थे। लेकिन छत्रपति ने पेशवा को पंथप्रधान की उपाधि देकर शासन करने की छूट दी थी ताकि मराठा साम्राज्य को अधिक दूर तक फैलाया जा सके। पूरे देश में स्वराज अर्थात स्वतंत्र हिंदू राज्य स्थापित करने का छत्रपति शिवाजी ने बीड़ा उठा रखा था। जिज़ोरी (पूणे) के देशाष्ठा वंशी मोरोपंथ तिंबर्क पिंगले को प्रथम पेशवा बनाया गया था। 1689 ई. में मोरोपंथ की मृत्यु के पश्चात दूसरे छत्रपति संभाजी महाराज ने अस्थायी तौर पर तिंबर्क पिंगल के पुत्र मोरेश्वर पिंगले को कुछ समय के लिए पेशवा नियुक्त किया था। पर असली दूसरा पेशवा रामचंद्र नीलकंड पंथ अमात्या(बवाडेकर) उसी साल 1689 ई. में बना था। अमत्या का संस्कृत में भाव निगरान अथवा रखवाला होता है जो घरेलू और सरकारी मामले देखता है। पेशवा रामचन्द्र नीलकंठ को तीसरे छत्रपति राजाराम ने 1689 ई. में महाराष्ट्र छोड़कर झिंजी जाने से पहले ‘हुकूमत पाना’ (शासन करने का राजा वाला अधिकार) देकर हुक्मरान मुकर्रर किया था। पूरे दस वर्ष उसने यह सेवा निभाई। वह कुलकर्णी वंश के साधारण युवक से शिवाजी की प्रेरणा के कारण अष्टप्रधान बना। 1690 ई. से 1694 ई. के वर्षों के दौरान उसने अपनी विलक्षण युद्धनीतियों के साथ मुगलों को भागने पर विवश किए रखा और उनके दक्खिनी महाराष्ट्र में स्थित बहुत सारे किलों पर कब्ज़ा किया। संताजी गोरपड़े और धन्नाजी यादव जैसे योद्धों ने उसका बहुत साथ निभाया था। छत्रपति राजाराम के स्थान पर शासन करते हुए उसने 1698 ई. में अपना पद त्याग कर हुकूमत की बागडोर अपनी पत्नी तारा बाई को सौंप दी थी। परंतु 1708 ई. तक रानी तारा बाई ने उसको कार्यकारी पेशवा ही रहने दिया था। उसने ‘आज्ञापत्र’ नाम की पुस्तक भी लिखी थी जिसमें नवीन युद्ध विधियाँ, शासन करने का ढंग और किलों की देखभाल के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारी थी। यह किताब मराठा साम्राज्य की नीवें सुदृढ करने में बहुत सहायक सिद्ध हुई थीं। रामचन्द्र पंत का 1716 ई. में पनहाला किले में स्वर्गवास हो गया था। फिर भाईरोज़ी पिंगले 1708 ई. से 1711 ई. तक पेशवा बना रहा था। उसके बाद आनंद राज के जागीरदार परशुराम तिंबर्क कुलकर्णी ने यह पद संभाला। उसने मीराज, रंगाना किला, भुदारगद, चंदनगढ़, पवनगढ, सतारा और बसंतगढ़ आदि इलाकों को जीता था। यह भी तारा बाई का समर्थन करता था। पाँचवें महाराज शाहू जी ने 1710-14 ई. के दौरान इसको दो बार कै़द में भी रखा था। छत्रपति शाहू जी ने अपनी अपेक्षा उसकी सुहृदयता और वफ़ादारी, तारा रानी के साथ देखते हुए उसको एक कोने में लगाकर पेशवाई हमारे भट्ट परिवार को सौंप दी थी। फिर कोकण के श्रीवर्धन यानी मेरे पिता जी बालाजी विश्वनाथ भट्ट (जन्म 1 जनवरी 1662 ई.) को छत्रपति शाहू जी ने मुनीमी की जिम्मेदारियों से हटाकर पेशवा नियुक्त किया था। परंतु वास्तव में ओहदेदारी बाबा ने (17 नवंबर) 1713 ई. को संभाली थी। ससवाद में (12 अपै्रल) 1720 ई0 को बाबा के निधन के बाद विश्वनाथ (विशाजी) भट्ट के पोते ने केवल उन्नीस वर्ष की आयु में पेशवाई हासिल की थी।“

बाजी राव की बातें बड़े ध्यान और दिलचस्पी से सुनती हुई मस्तानी ने उबासी ली, “मैंने तो पेशवा का अर्थ पूछा था, आपने तो मुझे पेशवाओं का सारा इतिहास ही वर्णन कर दिया।“

“तुम्हारे लिए यह जानना आवश्यक था। इसलिए बताया है ताकि तुम जान जाओ कि हम कौन हैं और हमारा क्या रुतबा है।“ बाजी राव गर्व से गर्दन ऊँची कर लेता है।

मस्तानी अपनी जिज्ञासा प्रगट करती है, “मेरे परिवार के बारे में तो आप जानते ही हैं। मेरी अम्मी जागीरदार दिलावर खान की पुत्री और काकाजू के मित्र अनवर खान की बहन है। आपके घर परिवार में कौन कौन हैं ? मुझे कुछ उनके विषय में बताइये।“

“वैसे तो मेरे दादा विश्वनाथ भट्ट जिनको लोग विशाजी कहकर बुलाते थे, के हम तीन पोते हैं। चिमाजी अप्पा, मैं और मेरा सौतेला भाई भिखूजी शिंदे। पर पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट और माता राधा बाई बरवे के जाये, हम चार बहन भाई हैं। सबसे बड़ा मैं हूँ, चिमाजी अप्पा(चिमाजी अप्पा(1707-1741 ई.) और चिमनाजी अप्पा के बीच भ्रम न खाया जाए क्योंकि चिमाजी अप्पा बाजी राव का भाई था और चिमनाजी अप्पा, रघुनाथ राव और आनंदी बाई (काशी बाई) का बेटा था और बाजी राव का पोता था।) मुझसे सात वर्ष छोटा है। फिर हमारी बहन राव गोरपड़े है। शरारती भिहू बाई का ससुराल बारामती है। अनू बाई इशालकरनजी में ब्याही हुई है। (वनकट राव गोरपड़े के वंशज इशालकरनज़ी में 1847 ई. तक शासन करते रहे थे)। परंतु मेरी दोनों बहनें अपनी ससुराल की बजाय मायके पारिवारिक पेड़ी (चैंकी या निवास स्थान) पूणे में ही रहती हैं। मेरी पत्नी काशी बाई, एक आठ साल का मेरा बेटा नाना साहिब और मेरी भाभी रकमा बाई, चिमाजी अप्पा की पत्नी है। बस, यही हैं मेरे घर के सदस्य।“

“आपका विवाह कब हुआ था ?“ मस्तानी थोड़ा चैंकती है।

“आज से उन्नीस-बीस वर्ष पहले। तब मैं अभी केवल आठ वर्ष का था। मैं और काशी एकसाथ खेला करते थे।“

मस्तानी मजाक करती है, “फिर तो यह प्रेम विवाह हुआ। नहीं ?“

“हाँ, जो चाहे समझ लो। काशी बहुत घरेलू किस्म की स्त्री है। हमारे मराठों की, सारे भारतवर्ष में इसी प्रकार बचपन में ही शादियाँ हो जाती हैं।“

“मुझे डर-सा लगता है। क्या आपका परिवार मुझे स्वीकार कर भी लेगा ? विशेषकर आपकी पत्नी ? कहीं वह मेरे साथ सौतनों वाला व्यवहार तो नहीं करेगी ? कहा करते हैं, सौतन तो मिट्टी की भी बुरी होती है।“ मस्तानी अपना संशय प्रकट करती है।

बाजी राव मस्तानी के मन का डर सुनकर चिंतित हो जाता है, “वही चिंता तो मुझे सताये जा रही है। मेरी माँ दशेस्था कुल में से है, पर अब आई(माता) कट्टर चिपपवनी ब्राह्मण बन चुकी है। मेरे पिता, मेरी माँ से अधिक ध्यान अपनी रखैल यानी दूसरी पत्नी का रखा करते थे। मेरी माँ ने सौतन का दर्द झेला है। इसलिए शायद वह काशी का पक्ष ले। बाकी सब से अधिक चिंता मुझे काशी की है। उसने तो सपने में भी मेरे द्वारा दूसरी स्त्री रखने के बारे में नहीं सोचा होगा। उसको तेरे बारे में जानकर एकबार तो झटका लगेगा। बर्तन में पानी भी डालें, एकबार तो पानी के उछलने से बर्तन भी छलकता है। फिर आहिस्ता आहिस्ता पहले बर्तन और बाद में पानी भी स्थिर हो जाता है। नई बूँदें लबालब भरे बर्तन में अपनी जगह बनाकर समा जाती हैं। वैसे काशी बहुत ठंडे दिमाग की है। धीरे धीरे तुम्हें स्वीकार कर लेगी। पर तुम मेरी पत्नी हो। आज नहीं, कल सही। तुम्हारे पिता की भी अनेक रानियाँ हैं। तुम्हें तो पता है, कैसे इस मामले का सामना करना है। छोटे-मोटे तो बर्तन आपस में बजते ही रहते हैं। आहिस्ता आहिस्ता सब ठीक हो जाएगा। महादेव भली करेंगे। मुझे नहीं लगता, इसकी कोई अधिक समस्या आएगी। लेकिन, तुम चिंता न करो, मैं खुद सब संभाल लूँगा। बाकी मैं तुम्हें भरपूर प्यार दूँगा। तुम्हें मेरे परिवार में बिल्कुल भी परायापन अनुभव नहीं होने दूँगा।“

मस्तानी अपनी बिलांद भर लम्बी गर्दन ऊपर उठाकर बाजी राव के चेहरे को देखती है और फिर नयनों के दरवाजे़ बंद करके उसकी छाती पर अपना सिर पर रख लेती है, “बस स्वामी, अब आपके आसरे ही हूँ। दूसरों की मुझे परवाह नहीं है। आप कृपादृष्टि बनाये रखना।“

“मेरी जान ! बिल्कुल न घबरा। फटाफट उठ और अभी तैयारी कर ले। आज ही हमें पूणा के लिए रवाना होना है।“ बाजी राव उठकर बैठ जाता है।

पेशवा बाजी राव अपने लश्कर के साथ पूणे की ओर चल पड़ता है। जैसे ही वह पूणे के समीप पहुँचता है तो उनके जत्थे के ज्योतिषों के अनुसार सितारों की गति बदलने के कारण गृह-प्रवेश के लिए वह शुभ समय नहीं होता। ग्रहों की स्थिति में परिवर्तन आने की प्रतीक्षा में बाजी राव पूणे के बाहर ही रुककर कुछ दिन के लिए पड़ाव डालने का मन बना लेता है।

सारे सैनिक तम्बू गाड़कर आराम से मौज-मस्ती, नाच, गायन और रंग राव में व्यस्त हो जाते हैं। बाजी राव अपने खेमे में मस्तानी की गज गज लम्बी सुनहरी लटों के कुंडलों में उलझकर भोग-विलास में डूब जाता है।
 
अतीत का साया

बाजी राव की तरफ से पूणे के अपने महल में लश्कर के पहुँचने का पैगाम भेज दिया जाता है। इस संदेश में बाजी राव की ओर से गोलमोल ढंग से मस्तानी की मौजूदगी को लेकर इशारा तो किया जाता है, पर खुलकर मस्तानी के साथ हुए उसके विवाह के संदर्भ में कोई खुलासा या वर्णन नहीं किया जाता।

संदेशा मिलते ही चिमाजी अप्पा पूणे के बाहर पड़ाव वाले स्थान पर बाजी राव से मिलने आता है। चिमाजी अप्पा खुशी में उछलकर बाजी राव के गले मिलता है, “शेर-ए-मराठा की जय हो ! दादा (बड़ा भाई), यह जंग भी मराठा जीत ही गए ? वाह मेरे मराठा राणा मर्द ! शत्रु कर दिए खुर्द-बुर्द। जियो ! दादा !“

“कोई शक था, अप्पा ? बाजी राव जब रणभूमि में चला जाए तो विजय स्वयं चलकर हमसे बगलगीर हो जाती है। आज तक कभी हारे हैं जो अब हार जाते। पराजय हमारा खौफ़ खाती है। मैदान-ए-जंग में से मराठा कभी ऐसे नहीं हटा, मरके हटा या मार के हटा !!“

चिमाजी अप्पा के अंदर विजय की खुशी ठाठें मार रही होती है, “इत्मीनान से बैठकर आप से युद्ध का हाल सुनेंगे। हमारे मराठा बहादुरों के वीरतापूर्ण कारनामों की गाथाएँ और जयगान गाकर जश्न मनाएँगे। एकबार पूणे तो पहुँचो।“

“हाँ हाँ, अप्पा। अभी तो थकान उतार रहे हैं। तुम्हें बहुत सारी खुशखबरियाँ सुनानी हैं। यह जंग मराठा इतिहास में एक सुनहरी मोड़ साबित होगी।... आओ तुम्हें किसी से मिलवाऊँ।“ बाजी राव अपने भाई चिमाजी अप्पा को मस्तानी के पास ले जाता है।

“मस्तानी, यह है मेरा छोटा भाई चिमाजी अप्पा और अप्पा, यह है महाराजा छत्रसाल की पुत्री और मेरी महबूबा तुम्हारी नई वाहनी साहिबा, मस्तानी।“

ज्यों ही चिमाजी अप्पा और मस्तानी एक-दूसरे के रू-ब-रू होते हैं तो दोनों आश्चर्यचकित रह जाते हैं। एक-दूसरे को सम्मुख देखकर उन्हें झटका-सा लगता है। उन्हें लगता है मानो अतीत का कोई बिछड़ गया साया आज पुनः उनसे आ जुड़ा हो। दोनों को कुछ वर्ष पहले की एक घटना स्मरण हो आती है। जब एक युद्ध जीतने के बाद चिमाजी अप्पा निजाम शाहजहाँ खान को मारकर उसकी बिल्लौरी आँखों वाली रखैल को उठा लिया था और रास्ते में चालाकी के साथ वह चिमाजी अप्पा की कैद में से भाग गई थी। चिमाजी अप्पा उस हसीन मस्तानी के हुस्न का आनन्द लेने से वंचित रह जाने के कारण कई महीने दुख मनाता रहा था। मस्तानी को अब अचानक अपनी आँखों के आगे देखकर चिमाजी अप्पा को अत्यंत प्रसन्नता और आश्चर्य होता है। मस्तानी भी चिमाजी अप्पा को पहचान लेती है और अपने आने वाले भविष्य को लेकर खामोश और भयभीत हो जाती है।

बाजी राव मस्तानी को आलिंगन में ले लेता है, “क्यों अप्पा, दंग रह गए न मेरी पसंद को देखकर ? मस्तानी को प्राप्त करके मुझे ऐसा लगता है मानो मेरी बरसांे की तलाश और भटकन खत्म हो गई हो।“

चिमाजी अप्पा, मस्तानी को आँख मारता है। मस्तानी भी उसके संकेत को समझ जाती है कि वह बाजी राव को अतीत की घटना के विषय में कुछ नहीं बताएगा। तीनों जन बैठकर बातें करने लग जाते हैं। चिमाजी अप्पा, बाजी राव को कोई बहाना बनाकर बाहर भेज देता है। बाजी राव के बाहर जाने के बाद चिमाजी अप्पा अपने होंठों पर जीभ फेरता हुए लार टपकाता है, “आखि़र, ऊँठ पहाड़ के नीचे आ ही गया ? क्यों मस्तानी जान, देखना भागकर अब भी ? हमें भी पता चले, तू हमसे कहाँ तक, कितनी दूर और कितनी तेज़ भाग सकती है ? अब मराठे करेंगे तेरे दाँत खट्टे।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी की कलाई पकड़ लेता है।

मस्तानी एक झटके से अपनी कलाई छुड़ा लेती है और सीना तानकर कहती है, “इसबार मैं भागूँगी नहीं। भगाने आई हूँ मराठा सरदार।“

“ऋषि को तप और तवायफ़ को रूप का अंहकार हो ही जाता है, मस्तानी बाई। यह तो वक्त ही बताएगा, कौन भागता है और कौन भगाता है। पहले जी भरकर मेरे बड़े भाई बाजी राव का दिल बहला। जब पेशवा का मन तेरे से भर जाएगा, फिर मैं अपने दरबार में तेरे मुज़रे देखा करूँगा। सुना है, धरती पर ऐड़ी मारकर तू भूचाल ही ला देती है।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी की गाल पर चिकौटी काट लेता है।

मस्तानी अपनी बांह से अप्पा का हाथ दूर झटक देती है, “मैं बाजी राव स्वामी को अपना सबकुछ मान चुकी हूँ। अप्पा, तुम अपनी औकात में रहना ! कहीं यह न हो कि मैं तुम्हारी जि़न्दगी में भूचाल ला दूँ। लगता है, पहले कभी बुंदेलों से वास्ता नहीं पड़ा। मैं तुम्हारे भ्राता पेशवा को पति स्वीकार चुकी हूँ। मैं उनकी वफ़ादार और खिदमतगार बनकर रहूँगी। ऐसी कोई हरकत न करना जो हमारे दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हो। बाजुओं तक सोने की चूडि़यों से भरी मेरी ये कलाइयाँ तलवार चलाना भी जानती हैं। बाकी समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है।“

तभी बाजी राव वापस आ जाता है, “क्या गुफ्तगू हो रही है देवर और भाभी में?“

मस्तानी स्थिति को संभालने के लिए बात बदल जाती है, “बस, कुछ नहीं। अप्पा स्वामी आपकी तारीफों के पुल बांध रहे थे।“

चिमाजी अप्पा, मस्तानी को अधिक संजीदगी से नहीं लेता और यह समझ लेता है कि बाजी राव कुछ देर मस्तानी को रखैल बनाकर रखेगा और फिर मन भर जाने पर छोड़ देगा।

चिमाजी अप्पा के साथ एकांत में बातचीत करने के लिए बाजी राव, मस्तानी को जनाना खेमे में भेज देता है। मस्तानी के बाहर निकलते ही चिमाजी अप्पा बाजी राव को कुरेदता है, “यह मस्तानी वाला क्या किस्सा है ? आपको भेजा किसी और उद्देश के लिए था और आप कर कुछ और ही आए ?“

“अप्पा, क्या बताऊँ। गया तो मैं जंग जीतने था, पर दिल हार गया यार। मस्तानी का नृत्य देखते ही मैं मस्तानी को पाने के लिए पागल हो गया था। मैं बहुत चाहने लग गया हूँ इस स्त्री को। अब एक क्षण भी इसके बग़ैर नहीं रह सकता। इसलिए तुमसे प्रार्थना है कि तुम मेरे साले यानी काशी बाई के भाई कृष्णा राव महादेव जोशी को साथ ले जाकर काशी को मस्तानी के बारे में इस ढंग से बताओ कि वह मस्तानी का ज़रा भी विरोध न करे। काशी अपने भाई की बहुत बात मानती है। कुछ ऐसा कर दो कि बाकी परिवार वाले भी हमारे संबंधों को स्वीकार कर लें। जो होना था, वह तो अब हो गया।“ बाजी राव अपनी जुगत समझाता है।

“भाऊ, वह तो ठीक है। पर आप तो जानते ही हो कि आई (माँ) को भिक्खु भाई और काकी (सौतेली माँ) के साथ अब तक नफ़रत है। बाबा (पिता) आई को छोड़कर ज्यादा तवज्जो काकी को दिया करते थे। याद है, अपनी आई (सगी माँ राधा बाई) कैसे आसमान सिर पर उठाकर बर्तन तोड़ा करती थी। थोड़ा बहुत हंगामा तो होगा ही, पर मैं कोशिश करके देख लेता हूँ यदि मामला कुछ ठंडा हो सके तो...।“

“अप्पा, कोशिश नहीं, तुम पूरी शक्ति लगाओ। इस रिश्ते से सारी कौम को लाभ है। हम पूरे भारत में केसरी मराठा परचम लहराकर स्वराज स्थापित देंगे।“

“वह कैसे ?“

“देखो अब तक हमको राजपूतों की निष्ठा को लेकर चित में एक धुकधुकी ही लगी रहती थी। राजपूत गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। आज वह सिंधिया (हबशिया) के साथ हैं, कल निजामों की ओर, परसों बादशाह कनी और चैथे दिन बागियों का पलड़ा भारी हुआ तो उनके साथ चल पड़े। हवा की तरह अपना रुख बदलते आए हैं ये राजपूत। हमें यह भी पता नहीं होता कि मेवाड़

(Mewar/Mewad, is a region of south-central Rajasthan state in western India. It includes the present-day districts of Bhilwara, Chittorgarh, Rajsamand, Udaipur and some parts of Gujarat and Madhya Pradesh and Haryana) तक हमारी फौज के पहुँचते उनके समर्थन का तराजू किधर झुकेगा। बुंदेलों के साथ यह रिश्ता गांठ कर हम राजपूतों की ओर से निश्ंिचत हो सकते हैं। हम पूर्वी और पश्चिमी घाट के मध्य पड़ते दक्खिनी और मध्य भारत, मावला के सारे इलाकों के हुक्मरानों अर्थात दक्खिन के निजामों का राह काटते हुए दिल्ली आँखें मूंदकर जा सकते हैं। बुंदेलखंड, दिल्ली के बिल्कुल आधे रास्ते में पड़ता है। हमारी वहाँ छावनी बनने से हमारा बहुत लाभ हो सकता है। महाराजा छत्रसाल अपने समय का एक बढि़या योद्धा रहा है। उनके पिता चम्पत राय को आलमगीर औरंगजेब ने अपने दरबार में विशेष स्थान दिया था। पन्ना की हीरों वाली खानों तक हमारी पहुँच होगी। हमारा खजाना खाली है। वह हमें युद्ध लड़ने के लिए मदद और चैथ भी निरंतर देंगे। मस्तानी के साथ उन्होंने मुझे पाँच लाख लूगदा चोली (दहेज), मंहगे उपहार और महाराजा शाहू जी के लिए सवा दो लाख की रकम भी अलग से दी है। हमें पुत्र बनाकर अपनी वसीयत के अनुसार अपने दो पुत्रों के बराबर का तीसरा हिस्सा बुंदेलखंड से दक्खिनी तट तक का क्षेत्र अर्थात नर्बदा की जागीर और पन्ना की हीरों वाली खानों को देने की घोषणा भी की है।“ बाजी राव अपने समस्त देखे हुए सपनों का खुलासा कर देता है।

चिमाजी अप्पा प्रसन्न होकर सिर हिलाता है, “हूँ ! फिर तो हम मराठों के लिए घाटे का सौदा नहीं हंै। अपितु एक राजनीतिक संधि है यह। हमें तो बुंदेलों का धन्यवादी होना चाहिए। राजपूतों पर राज करेंगे ! धन लेंगे!! और उनकी स्त्रियों को दबोचेंगे !!! भाऊ, अपनी तो पौं बारह हो गई। ‘चुपड़ी हुई, उस पर दो दो’ वाली बात है यह तो। लाभ ही लाभ। घाटा किसी तरफ से नहीं दिखाई देता।“

“लाभ हानि तुम विचारते रहो। मेरे लिए तो कुल दुनिया की दौलत और जागीर एक तरफ और मस्तानी दूसरी तरफ। मुझे मस्तानी से प्रेम हो गया है अप्पा, प्यार।“

चिमाजी अप्पा बाजी राव की जांघ पर हाथ मारता है, “दादा, युद्धों में अधिक समय रहने के कारण आप अतृप्त रहते हो। दिमाग खुश्क हो गया लगता है। ठीक है, कुछ देर रंगरास की महफि़लों का आनन्द उठाइये और अपने अंदर भड़कती काम की ज्वाला को शांत करिये। यह जिसे आप प्रेम कह रहे हैं, महज देह आकर्षण और काम लालसा है। ऋषि अगस्त, सोम, इंदर, विश्वामित्र जैसे भी इससे मुक्त नहीं हो सके थे। मैं पूणे जा कर इस मामले से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाता हूँ। चिंता न करें। अपनी तरफ से मैं ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दूँगा। थोड़ी बहुत घरेलू जंग और क्लेश का तो आपको सामना करना ही पड़ेगा। उप-स्त्री का मामला है, कोई छोटी मोटी बात तो नहीं।“

“बाजी राव ने तो जब से होश संभाला है, बस युद्ध ही लड़े हैं। न मैं कभी हारा हूँ और न घबराया हूँ। पर पता नहीं क्यों, इस बार कलेजा-सा कांपता है। खै़र, माँ भवानी की कृपा से मुझे आशा है कि सब ठीक हो जाएगा।“

कुछ अन्य सरदारों के साथ चिमाजी अप्पा वापस घर आकर मस्तानी के विषय में बता देता है और काफ़ी हद तक मस्तानी के लिए अपने परिवार में समाहित होने योग्य जगह भी बना देता है।
 


सुहाग सेज

अगली सुबह बाजी राव नदी में स्नान करके मस्तानी के साथ करीब के मंदिर में जाता है और पूजा करने के पश्चात वहीं मस्तानी की मांग में सिंदूर भर देता है। उसके उपरांत बाजी राव मस्तानी को अपने तम्बू में लौट जाने के लिए कहकर लश्कर का निरीक्षण करने चला जाता है।

फौज का जायज़ा लेकर जब बाजी राव तम्बू में लौटता है तो मस्तानी नमाज़ पढ़ रही होती है। वह मस्तानी के करीब बैठकर नमाज की समाप्ति की प्रतीक्षा करता है। ज्यूँ ही नमाज खत्म होती है तो मस्तानी मुसल्ला इकट्ठा करके बाजी राव को ‘तस्लीमात’ अर्ज़ करती है। बाजी राव को हैरत होती है, “मस्तानी यह क्या ? तुम और नमाज ?“

“हाँ हुजूर ! मैं प्रणानामी हूँ। स्वामी प्राणनाथ का प्रणानाम धर्म, हिंदुत्व और इस्लाम दोनों की अच्छी चीज़ों को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। इसलिए जहाँ मैं मंदिर में भजन, आरती करती हूँ, वहीं पाँच वक्त की नमाज़ भी अदा करती हूँ।“

“हाँ, बादशाह अकबर ने अपना धर्म ‘दीन-ए-इलाही’ हिंदू और मुसलमानों को एक करने के लिए चलाया था, पर अफसोस वह सफल न हो सका।“

“पर मुझे उम्मीद है कि हमारा प्राणामी धर्म असफल नहीं होगा।“

“क्या है तुम्हारा प्राणामी धर्म ? हमें भी उसके बारे में ज्ञान दो।“

“हमारे धर्म की नींव सिंध, उमरकोट में जन्मे महात्मा श्री देवचंदर महाराज (1581-1655 ई.) ने रखी थी। बचपन से ही वह धार्मिक रुचियों के थे। सोलह वर्ष की आयु में वह सब कुछ त्याग कर ब्रह्मज्ञान की खोज में भुज (कच्छ) और यमना नगर गए। उन्होंने निज आनंद संप्रदाय चलाया। वह यमना नगर में वेद, वैदांतिक, भगवानतम और तंत्र शिक्षा प्रदान करते रहे। उनके शिष्य अपने आप को ‘सुंदर सथ’ या ‘प्राणामी’ कहलाने लग पड़े। यमना नगर के दीवान केशव ठाकुर (1618-1694 ई.) का पुत्र महाराज ठाकुर उनका शिष्य बनकर महात्मा प्राणनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महात्मा प्राणनाथ जी ने प्राणमी धर्म को यात्राएँ करके बहुत फैलाया है। उन्होंने भगवत गीता और कुरान शरीफ पर आधारित छह भाषायी ग्रंथ तैयार किए -कुलसम सरूप। जिसमें गुज़राती, सिंधी, अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी रचनायें संकलित की गई हैं। इसके अतिरिक्त मिहर सागर और तंत्र (तरतम या तंत्रम) सागर हमारे दो अन्य धार्मिक ग्रंथ हैं। मेरे काकाजू महाराज छत्रसाल महात्मा प्राणनाथ जी को 1683 ई. में पन्ना के निकट माऊ में मिले थे। मेरा चचेरा भाई देव करनजी, प्राणनाथ जी को रामनगर में बहुत समय पहले मिल चुका था। उन्होंने ही काकाजू को मुगलों के साथ जंग होने से पूर्व प्राणनाथ जी का आशीर्वाद लेने के लिए भेजा था। स्वामी प्राणनाथ जी ने काकाजू को सरोपा और एक शमशीर देकर आशीष देते हुए कहा था कि जा, तेरी विजय होगी और तुझे हीरों की खानें मिलेंगी। तू महान राजा बनेगा। काकाजू ने पन्ना पर विजय प्राप्त की और वहाँ की हीरों की खानों के बारे में तो आप जानते ही हो। इस प्रकार, काकाजू और हम सब प्राणामी बन गए हैं। हमारा धर्म सर्व सम्प्रदाय का संदेश देता है और कहता है कि भगवान एक है और हर प्राणी में बसता है। आशा करती हूँ कि आप मुझे ऐसा करने से रोकेंगे नहीं।... पर यदि आप कहेंगे तो मैं सबकुछ छोड़ दूँगी।“

सादे वस्त्रों में भी मस्तानी के भर यौवना होने के कारण उसका सौंदर्य शिखर पर होता है। बाजी राव उसके भय से कांपते होंठों की संुदरता को बस देखता रह जाता है और वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह दौड़कर मस्तानी को झपटकर लिपट जाता है और उसके थरथराते अधरों को चूसना प्रारंभ कर देता है।

मस्तानी को नीचे लिटाकर बाजी राव उसके चेहरे पर चुम्बनों की आरती करने लग जाता है। सुरूर में आई मस्तानी बाजी राव को बाहों में कसकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए सहलाने लग जाती है। बाजी राव का वेग और अधिक प्रचंड और खूंखार हो जाता है और अगले ही पल दोनों निर्वस्त्र होकर आपस में गुत्थमगुत्था होते हुए संभोग समाधि में एकमेक हो जाते हैं।

कुछ समय के बाद बाजी राव की छाती पर मस्तानी केश बिखेरे गहन सोचों में डूबी पड़ी होती है। चिमाजी अप्पा के साथ सामना होने के बाद वह बहुत डर गई होती है और उसको अपने भविष्य की चिंता सताने लग पड़ती है। इस पल तक बाजी राव के व्यवहार में कोई परिवर्तन न आने के कारण मस्तानी समझ जाती है कि चिमाजी अप्पा ने अभी तक उसके भूतकाल के विषय में बाजी राव को कोई भेद नहीं खोला होगा। लेकिन वह यह भी जानती है कि इस राज को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। उसको अंदेशा पैदा हो जाता है कि कभी न कभी तो बाजी राव को वास्तविकता का पता चल ही जाएगा कि वह निजाम शाह जहान खान की रखैल रह चुकी है। इससे पहले कि चिमाजी अप्पा, बाजी राव को कुछ बताये, वह खुद ही अपने ढंग से सबकुछ साफ़ और स्पष्ट शब्दों में बता देने का निर्णय कर लेती है।

बीती पूरी रात मस्तानी अनेक कहानियाँ बुनती रही थी। पर जब वह बताने लगती तो उसको अपनी घड़ी हुई कहानी की पकड़ ढीली प्रतीत होने लगती और वह खामोश रह जाती। फिर वह नई कहानी अपने जे़हन में बुनती और खुद ही उसको नकार देती। बस, इस उधेड़बुन में ही मस्तानी के कल चिमाजी अप्पा के जाने के बाद से दिन और रात कट रहे थे।

बात तो सीधी सी थी कि दिल्ली के बादशाह ने निजाम-उल-मुल्क और राजपूतों को कुचलने के लिए शाह जहाँ खान को भेजा था। बुंदेलखंड पर होने वाले आक्रमण को रोकने के लिए मस्तानी ने शाह जहाँ की रखैल बनना कुबूल कर लिया था। इससे पहले कुछ समय वह एक दो अन्य निजामों के पास भी रह चुकी थी।

बाजी राव मस्तानी के केशों में हाथ फेरता है, “क्या बात है मस्तानी, आज बहुत चुप चुप सी हो ?“

“कुछ नहीं। असल में मैं आपको कुछ बताना चाहती थी।“

“बता फिर।“

“समझ में नहीं आ रहा कि कैसे बताऊँ।“

“जैसे सारी दुनिया बताया करती है, अपने मुँह से बता।“

“बात दरअसल इस तरह है कि कुछ साल पहले मैं निजामों की नर्तकियों के पास नृत्य सीखने जाया करती थी। वैसे तो मेरे उस्ताद मस्तान जी ने मुझे बहुत बढि़या ढंग से सिखाया था, पर मैं ग़ज़ल गायन और मुजरा लूटना सीखना चाहती थी। शराब का प्याला रखकर जो नाचना सीख गया, समझो वह नृत्यकला में निपुण और उस्ताद बन गया। शराब का भरा जाम नर्तकी से नाचते समय छलकना या बिखरना नृत्य में गंभीर दोष माना जाता है। मैं बस इसी में परिपक्वता हासिल करने गई थी वहाँ। इसलिए मैं कुछ देर एक दो निजामों के दरबारों में रही और कभी फरमाइश करने पर अपने फन का मुज़ाहरा भी कर दिया करती थी। फिर आपको तो पता ही है कि दिल्ली के बादशाह ने शाह जहाँ खान को बुंदेलों को दबाने और निजाम-उल-मुल्क को खत्म करने के लिए भेजा था। एक जंगी झड़प के दौरान शाह जहाँ खान ने मुझे बंदी बना लिया था। वह मुझे अपनी बेगम बनाना चाहता था। पर मैं नहीं मानी। उसने मुझे अनेक लालच दिए। परंतु मैंने अपनी चतुराई से उससे इस पर विचार करने के लिए कुछ मोहलत मांग ली। इस मिले वक्त में मैं उसकी कैद में से भागने की तरकीबें लड़ाने लग पड़ी।“ इसके बाद की कहानी खत्म हो जाने के कारण मस्तानी चुप हो गई और किस्से का अगला भाग सोचने लग पड़ी।

बाजी राव उसकी राम कहानी बहुत ध्यान से सुन रहा होने के कारण अंजाम जानने के लिए उतावला हो उठता है, “फिर कैसे आज़ाद हुई तुम ?“

इस समय तक मस्तानी अपने दिमाग में किस्से की अगली कड़ी जोड़ चुकी होती है, “बस, फिर क्या था। शाह जहाँ की फौज पर आपके मराठों ने आक्रमण कर दिया और वह मारा गया। उसके सैनिकों और कर्मचारियों को बंदी बना लिया गया। बस, उसी भगदड़ का लाभ उठाकर मैं नर्तकियों के टोले से अलग होकर छिपती छिपाती किसी तरह बुंदेलखंड जा पहुँची।“

बाजी राव ने अपने मस्तक में घूमती शंका को बाहर निकाला, “पर मैंने तो सुना है कि शाह जहाँ खान बहुत ज़ालिम था। उसने तेरे पर अत्याचार या जबरदस्ती नहीं की ?“

“नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर वह ज़ोर आजमाई या जबरदस्ती करता तो अपनी इज्ज़त को दाग लगने से पहले ही मैं अपनी अंगूठी का हीरा चाटकर मर जाती। आखिरकार मैं एक बुंदेलन हूँ। आत्म सम्मान हमारे लिए सबसे बड़ी चीज़ है। काकाजू ने जवान होते ही यह अँगूठी मुझे देकर कहा था कि यदि कभी मेरी सुंदरता, मेरे लिए श्राप बन जाए तो मैं अपनी अस्मत लुट जाने से पहले ही इस हीरे का प्रयोग कर लूँ। हमारे पन्ना की खान में से निकला हुआ यह विशेष हीरा है जो आप अंगूठी में जड़ा देख रहे हैं। इसे जीभ पर ज़रा-सा छुआते ही आदमी के प्राण पखेरू पलभर में उड़ जाते हैं।“ मस्तानी अपनी अंगूठी वाली तर्जनी का अगला पोर बाजी राव के होंठों पर फेरने लग जाती है। मस्तानी को यकीन हो जाता है कि बाजी राव ने उसकी सुनाई गाथा पर पूरा विश्वास कर लिया है।

बाजी राव झपट कर उसकी उंगली पकड़ लेता है, “मुझसे दूर रख इसे, कहीं मेरी जान भी न चली जाए।“

“हाय ! यह कैसी बातें करते हैं आप। ईश्वर मेरी आयु भी आपको दे दे।“ मस्तानी मुहब्बत में मस्त हो जाती है।

“बस, मेरी जान ! अब तू मराठों के पेशवा श्रीमंत बाजी राव बलाल बाला जी भट्ट की बायिको (पत्नी) बन गई है। अब कोई तेरे बारे में सपने में भी गलती से सोचने की हिमाकत नहीं करेगा। जानती है, जब मेरे बडील (पिता) की मौत हुई थी तो मैं तब केवल बीस वर्ष का था। छत्रपति को चिंता हो गई कि अगला पेशवा किसको नियुक्त किया जाए। मैंने छत्रपति के दरबार में सीना तानकर कहा था कि मैं यह उŸारदायित्व उठाने का प्रण करता हूँ और मुगलों को उठाकर हिमालय के पार फंेक दूँगा जहाँ से वे आए हैं। हिंदुस्तान हमारा है। मैं अपने भारतवर्ष की पवित्र धरती को गै़र जातियों और बाबरियों से स्वतंत्र करवाऊँगा। औरतबाज मुगल तो अफीमें खा खाकर पहले ही नकारा थे। मैंने कहा, मैं तनों को काटूँगा, फिर पŸो-टहनियाँ तो खुद ब खुद ही झड़ जाएँगे। मैंने शाहू जी को वचन दिया था कि केसरी मराठा परचम कृष्णा नदी से सिंधू दरिया तक और अटक के किले पर फहराकर दिखाऊँगा। दक्खिन का सारा सरमाया हमारा होगा और हम अपनी सरहदों को केन्द्रीय भारत से विस्तार देते हुए पूरे देश में फैला देंगे। शाहू जी महाराज मेरी दिलेरी देखकर प्रसन्न हो गए थे और उन्होंने मुझे पेशवा बना दिया था। मैंने भी फिर बाधाओं को चुन चुनकर दूर कर दिया। 1723 ई. में मालवा, 1724 ई. में धार और औरंगाबाद, 1728 ई. में पालखेड़ी के मैदानों में शत्रुओं की अच्छी तरह हौसले पस्त कर दिए थे।“

“सिद्धियों से फिर आपका क्या वैर है ? वे भी आपके शत्रु बने हुए हैं ?“ मस्तानी अचानक अपना प्रश्न कर देती है।

“सिद्धी या जिन्हें शीदी भी कहा जाता है, इन हब्शी लोगों को अरबी और पुर्तगाली गुलाम बनाकर इस्तेमाल करने के लए भारत में लेकर आए थे। इसलिए इन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना रखा है। 628 ई. में भारोच तट, गुजरात में आकर सिद्धी बसे थे। बाकी उसके बाद 712 ई. में अरबी लोगों के साथ आए। हिंदुस्तान पर चढ आए प्रथम बाहरी हमलावर मुहम्मद बिन कासिम (31 दिसम्बर 695 - 18 जुलाई 715) की फौज में ही हब्शियों की भारी संख्या थी। वे इन बंनतू बोली बोलने वालों को ‘ज़ीना’ कहा करते थे। हट्टे-कट्टे होने के कारण इन्हें कठिन और भारी मजूदरी वाले कामों में इस्तेमाल किया जाता था। फिर ये अपनी ईमानदारी के कारण अमीरों और रजवाड़ों से उच्च ओहदे प्राप्त करते चले गए और इन्होंने जंजीरा (जफ़राबाद का एक टापू), गुजरात में अपना राज स्थापित कर लिया। भारत की पहली महिला शासक रजि़या सुल्तान उर्फ़ जलालत-उद-दीन रजि़या (1205- 14 अक्तूबर 1240) की एक कमाल-उद-दीन याकूत नाम के हब्शी गुलाम के साथ काफ़ी निकटता थी। कुछ सिद्धी मराठों की फौज में भी भर्ती हो गए थे। अम्बर मलिक जैसे सिद्धियों से मराठों ने युद्ध विद्या भी सीखी थी। उसने खिरकी नाम का नगर बसाया था जिसको औरंगजेब ने अपने नाम पर बाद में औरंगाबाद बना दिया था। अट्ठारहवीं सदी में यह सिद्धी आसिफ़ जाह निजाम के साथ मिलने के बाद मराठों के विरुद्ध हो गए। दरअसल मराठों और सिद्धियों के मध्य स्थिति तब तनावपूर्ण होनी प्रारंभ हो गई थी जब सिद्धी फौजदार, सिद्धी सताल सत ने कोकण के परशुराम मंदिर का अपमान किया और हमारे धर्माध्यक्ष ब्रह्ममहिंदरा स्वामी को अपमानित किया। यह 1729 ई. की बात है। सवनौर के नवाब ने जंजीरा के सिद्धियों को एक हाथी नज़राने के तौर पर दिया था। जब वह हाथी ब्रह्ममहिंदरा के आश्रम के समीप से गुज़र रहा था तो मराठों के एक सरदार कानोजी अंगारे ने उसको कब्जे़ में ले लिया। इसके बाद स्वामी ब्रह्ममहिंदरा की साजि़श समझकर सिद्धी फौजदार ने स्वामी ब्रह्ममहिंदरा का निरादर किया और उसके परशुराम मंदिर को ध्वस्त भी किया। स्वामी ब्रह्ममहिंदरा को मराठे अपना धर्मगुरू मानकर उसका बहुत सत्कार करते थे। इस कारण मराठों और सिद्धियों के बीच झड़पें होनी प्रारंभ हो गईं। उससे थोड़ा अरसा बाद 4 जुलाई 1729 ई. को कानोजी अंगारे का देहांत हो गया और उसके स्थान पर उसका पुत्र सेखोजी अंगारे मराठा सरखेल बन गया। सिद्धी सत को हमारा इतना खौफ था कि उसने लड़े बिना ही हमारी अधीनता स्वीकार कर ली। आज देख, सब तरफ बाजी राव...बाजी राव हुई पड़ी है। यह जैतपुर वाली ताज़ा जंग तो मुझे लड़ते हुए तुमने अपनी आँखों से देखा है।“ बाजी राव पूरी शेखी में आया पड़ा होता है।

मस्तानी बाजी राव को कसकर अपनी बाहों में भींच लेती है, “हूँ ! तभी तो आपकी मर्दानगी पर यह मस्तानी मर मिटी है। हाय ! मरहटा, कमबख्त मारकर ही हटा...।“

बाजी राव मस्तानी का चेहरा अपने हाथों में लेकर कहता है, “यूँ तो कंजरी तू है बहुत सुंदर। नाचती और गाती भी कमाल का है। तलवारबाजी भी कर लेती है। सेज पर भी पटाखे फोड़ती है। दृढ़ता, चतुराई, बहादुरी, सूझबूझ, महत्वाकांक्षी, अल्हड़, अनुभवी और जवान है। वो क्या कहते हैं - अद्भुत बŸाीस लक्षणों वाली महासुंदरी है यार मस्तानी तू तो।“

“लो, जाने भी दो, गप्प मारना भी कोई आप से सीखे। मैं कहाँ से बŸाीस लक्षणी हो गई ? बŸाीस लक्षण तो किसी भी इन्सान में पूरे नहीं होते। मनुष्यों में तो केवल चार-पाँच लक्षण होते हैं। देवताओं में चैदह और शिव भगवान में अट्ठाईस थे। जानते भी हो कि बŸाीस लक्षण कौन से होते हैं ?“ मस्तानी पाज़ी हँसी हँसती है।

“ले, तुमने क्या मुझे क्षत्रिय समझ रखा है। पंडितों का बेटा हूँ मैं। ब्रह्मज्ञान रखने वाला ब्राह्मण। तुझे नहीं पता कि स्कंद पुराण के काशी खंड में नारी और पुरुषों पर बŸाीस लक्षण बताए हुए हैं। उनकी पहचान शारीरिक अंगों की बनावट से की जाती है। वो ईश्वर तेरा भला करे... ऐसा बताते हैं कि पाँच दीर्घ होने चाहिएँ जो कि नेत्र, जबाड़ा(मुख वाक्य), नाक, बगल और बाहें हैं। पाँच सूक्ष्म बढि़या माने जाते हैं जैसे चमड़ी, केश, उंगलियाँ, दाँत, अंगों की गांठें। सात लाल हों तो उŸाम होते हैं जैसे हथेली, पैर के तलुवे, आँखों के कोये, तालुआ, जीभ, होंठ और नाखून। छह ऊँचे हों तो अच्छे होते हैं - रीढ़ की हड्डी, पेट, पसली, कंधे, हाथ के ऊपरी हिस्से, मुख। तीन विस्तार वाले अधिक आकर्षक लगते हैं जैसे मस्तक, छाती, नितम्ब। तीन छोटे हों तो सुंदर माने जाते हैं जैसे गर्दन, जाँघ, गुप्त अंग। अन्तिम तीन गंभीर हों तो अच्छे होते हैं जैसे स्वर, नाभि, स्वभाव।

मस्तानी हैरान होकर पूछती है, “अच्छा जी, आपको लगता है मेरे में ये सब लक्षण हैं ?“

“नहीं होंगे तो तेरे में पैदा कर देंगे, सुंदरी। आसान नहीं है इन बŸाीस लक्षणों का अभ्यास और पालन। दरअसल ये बŸाीस लक्षण होते हैं - सुंदरता, स्वच्छता, लज्जा, चतुराई, विद्या, सेवा, दया, सत्य, प्रियवाणी, प्रसन्नता, नम्रता, निष्कपटता, एकता, धीरज, धर्मनिष्ठा, संयम, उदारता, गंभीरता, उद्यम, शूरवीरता, राग, काव्य, नृत्य, चित्रकला, औषधि उपचार, रसोई, सिलाई-कढ़ाई, घर की वस्तुओं को यथायोग प्रयोग करना और सजाना, खुद और दूसरों का शिंगार करना, बुजुर्गों का सम्मान, अतिथि सत्कार, पतिभक्ति और संतान पालन।“

मस्तानी लाड़ में आकर छेड़ती है, “वाह, मेरे ऋषि वेदव्यास, आपको तो पूरा ज्ञान है। आप मनुष्य हो कि रावण ?“

“रावण ही हूँ जो तुम्हें उठा लाया है।“

“आपकी सोने की लंका की ख़ैर नहीं फिर अब।“

“हाँ, मैं भी वही सोचता हूँ कि कहीं अपने हुस्न के सेक से हमारा पूरा पूणा जलाकर न रख दे। आओ प्रिय, अब कलेजे में मचती अग्नि को ठंडा करें। मैं तुम्हारे साथ दैहिक मिलन के लिए तड़प रहा हूँ।“ बाजी राव मस्तानी को दबोच कर चकौटियाँ काटते हुए कामक्रीड़ा में मगन हो जाता है।

 


गृह प्रवेश

ज्योतिषियों द्वारा घोषित की गई शुभ घड़ी में बाजी राव अपने लश्कर सहित पूणे में प्रवेश होकर ससवाद अपने गृह स्थान में पहुँच जाता है। महल के प्रांगण में बाजी राव के घोड़े, पीछे हाथी पर आ रही मस्तानी की पालकी का उतारा होता है। बेहद कीमती हीरे, जवाहरात, गहने और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र पहने जब मस्तानी पालकी में से बाहर निकलती है तो ऐसा लगता है मानो अँधेरे में किसी ने लाखों करोड़ों चहुंमुखी दीये जला दिए हों। एकबार तो सारे पूना के मराठा साँस रोककर मस्तानी के हुस्न को एकटक देखते रह जाते हैं।

बाजी राव घोड़े से उतरकर अपनी माता राधा बाई के चरण स्पर्श करता है। राधा बाई पूजा वाली थाली में से तिलक लगाकर बाजी राव का स्वागत करती है। फिर वह मस्तानी की ओर पग बढ़ाती है। मस्तानी भी अपनी सास राधा बाई के चरणों को हाथ लगाकर माथा टेकती है।

मस्तानी की सुंदरता देखकर एकबार तो राधा बाई भी पलकें झपकना भूल जाती है। वह मन ही मन सोचती है कि चलो, खूबसूरत और जवान है। मराठा चितपवन शाहूकार ब्राह्मणी न सही, बुंदेलन राजपूतनी ही सही। सबसे बड़ी बात कि खाली पड़े खजाने भर देगी। युद्धों में अधिक व्यय हो जाने के कारण कई सालों से चढ़े कर्जे उतर जाएँगे। राधा बाई बिना हिचकिचाहट के मस्तानी को स्वीकार कर लेती है और उसकी नज़र उतार कर मस्तानी का गृह प्रवेश करवाती है।

बाकी पारिवारिक सदस्यों की नज़रों में मस्तानी का सत्कार पैदा करने के लिए बाजी राव, महाराजा छत्रसाल की ओर से भेजे गए उपहार और दहेज के सामान की प्रदर्शनी लगा देता है। सबके लिए दहेज में कुछ न कुछ अवश्य होता है। स्त्रियों के लिए रेशम और पश्मीने के वस्त्र, लहगें, साडि़याँ। ऊन के शाॅल, तुलसी मालायें, चूडि़याँ, पुखराज, नीलम, माणक जड़े टिक्के, हार और अन्य बहुत से गहनें। पुरुषों के लिए नगों वाले हुक्के, पगडि़याँ, कलगियाँ, मालायें, कंबल, चोले, सोने के कड़े, खंजर, कृपाणें और निजी प्रयोग की अन्य बहुत सारी वस्तुएँ। नित्यप्रति घरेलू प्रयोग की अनेक वस्तुएँ, संद और औजार मस्तानी अपने साथ बुंदेलखंड से लेकर आती है।

दहेज के सामान के साथ ही बाजी राव का भाई चिमाजी अप्पा, भाभियाँ, बहनें आदि सब बहल जाते हैं। यदि कोई नाराज रहता है तो वह केवल बाजी राव की पत्नी काशी बाई और उसका पुत्र नाना साहिब ही होते हैं। बाजी राव समझ रहा होता है कि काशी बाई का रोष उचित है। वह अकेला काशी बाई को जाकर मिलता है, “काशी, मुझे नहीं पता कि यह ठीक है या गलत। पर जि़न्दगी में इन्सान को बहुत सारी बातों का निर्णय भाग्य पर छोड़ना पड़ता है। ऐसे ही यह भी कोई संजोगों का खेल था जो हमारा मस्तानी के साथ मेल हुआ है। वह इस परिवार में नई है और मराठा रीति-रस्मों से अनजान है। मेर अनुरोध है कि तुम उसको अपनी छोटी बहन समझकर प्रेम से रखो। तुम तो जानती ही हो, मैं एक हुक्मरान हूँ। हुक्मरानों को सियासी कारणों से एक से अधिक रिश्ते निभाने पड़ते हैं। बाबा के भी तो दो विवाह हुए थे। शाहू जी की चार पत्नियाँ हैं। छत्रपति शिवाजी ने साई बाई के अलावा सुमन बाई, सोयरा बाई, पुलता बाई, लक्ष्मी बाई, सकवार बाई, काशी बाई और गुणवंतना बाई आदि के साथ भी शादियाँ की थीं। आठ विवाह थे उनके। उनके पिता शाह जी के जीजा बाई, टुका बाई और दासी नरसा बाई आदि के साथ विवाह हुए थे। फिर भी तू मेरी हमजोली है और मैं तेरा गुनहगार हूँ। इसकी जो चाहे सज़ा तू मुझे दे लेना। पर मस्तानी को कभी माथे पर बल डालकर न देखना।“

काशी बाई कुछ नहीं बोलती, बस चुपचाप खड़ी सुनती रहती है। जब बाजी राव बाहर चला जाता है तो काशी सिरहाने में सिर देकर ज़ोर ज़ोर से रोने लग पड़ती है। काशी बाई की समझ में नहीं आता कि वह पति का आदेश मानकर खुशी मनाये अथवा अपने मन के कहने लगकर दुखी हो। एक गुबार जो सीने में उसने संभाल रखा होता है, वह किनारे तोड़ कर बाहर आ जाता है। काशी की आँखों में से आँसुओं की बाढ़ उमड़ पड़ती है। सारा बिस्तर काशी के आँसुओं के सैलाब से भीग जाता है।

बाजी राव को मस्तानी को लेकर जितने घरेलू क्लेश की आशा थी, वह नहीं होता। बल्कि सारे परिवार की ओर से मस्तानी को सहज ही स्वीकार कर लिया जाता है। मस्तानी अपने हंसमुख स्वभाव के कारण बहुत शीघ्र ही समस्त परिवार में घुलमिल जाती है।

 


फैसला

बाजी राव और मस्तानी को यह विवाहित जीवन की खुशियाँ अधिक देर नसीब नहीं होतीं। बाजी राव के बेटे नाना साहिब की पूर्व में तय की गई शादी निकट आ जाती है।

विवाह की तैयारियों में समस्त परिवार का व्यवहार मस्तानी के साथ यकायक बदल जाता है। काशी बाई का व्यवहार तो पहले दिन से ही मस्तानी के प्रति ईष्र्यालू और झगड़ालू ही रहा होता है। काशी बाई अपने पुत्र नाना साहिब को भड़का कर बाजी राव के साथ लड़वा देती है।

नाना साहिब अपने पिता बाजी राव को घेरकर खड़ा हो जाता है, “मेरी शादी के रंग में भंग डालने के लिए यह कौन है जिसे उठा लाए हो ? आपको शर्म नहीं आई ? एय्यासियाँ करने के लिए यही समय मिला था ? आप मेरे पिता नहीं, शत्रु हो।“

“मुँह संभालकर बात कर नादान लड़के। यह न भूल, मैं केवल तेरा पिता ही नहीं, पेशवा भी हूँ। मस्तानी मेरी स्त्री है। मेरी उनतींस साल की आयु हो गई है। ऐसे तो मैं कभी बड़े बुजुर्ग लोगों से आज तक नहीं बोला, जैसे तू ज़बान चला रहा है। कल का बच्चा है तू। नौ दस साल का है और यह तेवर ? बड़ा होकर क्या रंग लगाएगा ?“ बाजी राव भी पूरे क्रोध में आ जाता है।

इस प्रकार पिता-पुत्र काफ़ी समय तक तू तू, मैं मैं करते लड़ते झगड़ते रहते हैं तो राधा बाई उनको शांत करने के लिए बीच में आ जाती है, “बाजी राव, तू ठंडे दिमाग से सोच... यह गंभीर मामला है। मस्तानी को यहाँ देखकर लोग तरह तरह के सवाल हमसे करेंगे। हम क्या जवाब देंगे ? किस किस का मुँह पकड़ेंगे ? भिहू बाई के पति अभाजी जोशी और बारामती वाले समधी क्या कहेंगे ? वंकटराव गोरपड़े और अनू बाई के ससुराल इशालकरन जी वालों का खानदान हमारे मुँह में हाथ देगा ? तेरे बाबा के भाई नारायण कृष्णा जी, रुद्रा जी विश्वनाथ, विट्ठल जी विश्वनाथ(सभी रिश्तेदारों में लगते चाचा-ताऊ) और सबसे अधिक डर हमें राजमाचीकर वंशियों (बाजी राव के पिता के दूसरे ससुराल वाले) का है। हम किस किस की ज़बान को पकड़ेंगे ? क्या कहेंगेे, हम सबको कि मस्तानी कौन है ?“

बाजी राव तर्क प्रस्तुत करता है, “इसमें बुराई ही क्या है ? कह देना, मस्तानी मेरी दूसरी पत्नी है। मेरे बाबा की भी तो दो पत्नियाँ थीं। महाराज शाहू जी की चार बेगमें हैं। छत्रपति शिवाजी ने आठ विवाह करवाये थे। शहंशाह अकबर ने छŸाीस विवाह करवाये और हरम में तीन सौ स्त्रियाँ रखी थीं। बादशाह शाहजहाँ के तीन निकाह हुए थे। आलमगीर औरंगजेब की पाँच बीवियाँ थीं। निज़ाम और नवाब कितने कितने विवाह करवाते हैं। एक से अधिक स्त्री रखना शासक के लिए गौरव की निशानी है। बहु विवाह रुतबे और शक्ति का संकेत होते हैं।“

“वे मुगल बादशाह थे और तू एक हिंदू पेशवा है। और फिर, मस्तानी तेरी रखैल है। क्या हमारे समाज के सामने तेरा उसके साथ विवाह हुआ है ? बाबा ने मराठी ब्राह्मण स्त्री के साथ शादी की थी। तू एक मुसलमानी, खत्राणी...राजपूतानी या जो भी यह है, जिसको तुम उठा लाए हो। हम चितपवनी उच्च कुल के ब्राह्मण हैं। इसको कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?“ चिमाजी अप्पा भी अपनी टांग अड़ा देता है।

बाजी राव जि़रह करता है, “फिर बुंदेलखंड से आया दाज-दहेज़ देखकर तब क्यों आँखें बंद कर ली थीं ? आपको यह सब अब याद आ रहा है ?“

“बाजी राव, आप कोई दूध पीता बच्चा नहीं हो जो तुम्हें हर बात समझानी पड़े। मराठा कौम का मान हो आप और एक पेशवा भी। मौके की नज़ाकत को समझो और कुछ समय के लिए मस्तानी को उसके मायके में भेज दो। फिर शादी के बाद यह वापस आ जाएगी।“ चिमाजी अप्पा अपना सुझाव देता है।

“नहीं। ऐसा कतई नहीं होगा। मस्तानी वहीं रहेगी, जहाँ मैं रहूँगा।“ बाजी राव डट जाता है।

“तेरा बहुत समय तो युद्ध के मैदानों में बीतता है। कल रणभूमि में भी इसको साथ ही लेकर जाएगा ?“ राधा बाई खीझकर बोलती है।

“हाँ, ले जाऊँगा। कान खोलकर सुन लो... मैं मस्तानी के बारे में एक भी शब्द नहीं सुनना चाहता। ऊब गया हूँ, सफाइयाँ देते और समझाते हुए। मैं मस्तानी को लेकर कोथरूड़ (ज्ञवजीतनकए ादवूद ज्ञवजीतनक ठंह पद जीम मतं व िजीम च्मेीूंेए पे जीम ूमेजमतद ेनइनतइ व िजीम बपजल व िच्नदमए डंींतंेीजतं पद प्दकपंण् ैपजनंजमक तमसंजपअमसल दमंत जीम बमदजतम व िंद पदकनेजतपंसप्रमक बपजलण् ज्ञवजीतनक पे दवू वदम व िजीम नचउंतामज ंतमंे व िच्नदम) जा रहा हूँ। आपको शादी की रस्मों में मेरी ज़रूरत हुई तो बुला लेना। विवाह में मैं और मस्तानी शामिल होंगे और एकसाथ रहेंगे। नहीं तो नहीं। बस, यही मेरा अटल फैसला है।“

तैश में आकर बाजी राव ससवाद (ैंेूंक वे ं बपजल ंदक उनदपबपचंस बवनदबपस पद च्नदमए डंींतंेीजतंण् ैंेूंक पे ेपजनंजमक वद जीम इंदो व िज्ञंतीं तपअमत) छोड़कर मस्तानी को साथ लेकर कोथरूड वाडे की ओर चला जाता है। बाजी राव की अनुपस्थिति में शादी की कार्रवाई जारी रहती है। बाजी राव की माँ राधा बाई कुछ आवश्यक रस्मों में अकेले बाजी राव को शामिल होने के लिए मनाने चली जाती है, “बेटा बाजी राव, हमें जग में तमाशा न बना। घर चल और अपने बेटे के शगुन मना।“

“नहीं। मेरा कहा पत्थर की लकीर है। मैं अपना फैसला सुना चुका हूँ। मुझसे रोज रोज कुŸो सा मत भौंकवाओ। जहाँ मस्तानी नहीं जा सकती, वहाँ मैं भी नहीं जाऊँगा।“ बाजी राव आवेश में आ जाता है।

मस्तानी, माँ-बेटे का वार्तालाप ओट मंे खड़ी होकर सुन रही होती है। मस्तानी से प्रभावित तो बाजी राव पहले ही बहुत होता है, लेकिन इस समय मस्तानी को अपनी सूझ बूझ और लियाकत दिखाने का एक और अवसर मिल जाता है। वह पर्दे के पीछे से निकलकर बाहर आती है और राधा बाई के चरण स्पर्श करके बाजी राव को संबोधित होती है, “स्वामी। मुझ नाचीज़ को लेकर आपको घर में क्लेश नहीं डालना चाहिए। आपके परिवार वाले अपनी जगह पर सही हैं। मेरे एकदम आपके पुत्र के विवाह में प्रकट होने से आपके चरित्र पर अनेक प्रश्नचिह्न लग जाएँगे। आपकी अब तक की बनी हुई छवि बिगड़ जाएगी। मेरे विचार में आपको अकेले ही इस खुशी के अवसर में सम्मिलित होकर परिवार की खुशियों को साझा करना चाहिए। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके परिवार विशेषकर आपका बेटा नाना साहिब और बहू द्वारा मुझे कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा। वह मुझे सदैव बखेड़े खड़े करने वाली कहकर धिक्कारा करेंगे। मेरी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि आप ससवाद जाकर विवाह में शामिल हों और खुशियों का आनन्द उठायें। बहुत सारी रस्में ऐसी हैं जो आपके कर-कमलों से ही सम्पूर्ण होनी चाहिएँ। जाइये और अपने कर्तव्यों को पूरा करिये।“

“पर तुम्हें यहाँ अकेली छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ ?“ बाजी राव दहाड़ता है।

मस्तानी बाजी राव की बांह पकड़ लेती है, “मैं कौन सा कहीं भाग चली हूँ ? मैं यहीं हूँ। आपके जाने से मुझे भी आपके परिवार के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने का अवसर मिल जाएगा। विशेषकर मुझे लेकर जो आपकी पत्नी काशी बाई के मन में घृणा और जलन है, वह कषैलापन भी मर जाएगा। माता श्री चलकर आए हैं। बुजु़र्गों का मान रखना हमारा धर्म और कर्तव्य है।“

राधा बाई बीच में बोल पड़ती है, “हाँ, मस्तानी ठीक कह रही है। मेरे सफ़ेद बालों की नहीं तो इसकी ही बात मान ले ? बाजी राव, भट्टों का स्वाभिमान मिट्टी में नष्ट करने का तुझे कोई हक नहीं है। कुछ दिनों की ही तो बात है। और फिर, अपनी इज्ज़त ढकी रह जाएगी। शीघ्र ही सब अतिति अपने अपने घरों को लौट जाएँगे। फिर जो चाहे कंजरियों को नचाते रहना।“

राधा बाई मस्तानी की ओर तिरछी नज़र से देखकर शांत हो जाती है। बाजी राव खामोश खड़ा मस्तानी की ओर देखता है। मस्तानी सिर हिलाकर बाजी राव को चले जाने के लिए प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार मस्तानी बाजी राव के व्यक्तित्व पर अपनी योग्यता का गहरा प्रभाव डाल जाती है। बाजी राव अपना निर्णय बदलकर अनमने-से मन से चला जाता है और अपने कर्तव्य निभाकर शीघ्र ही वापस मस्तानी के पास लौट आता है।

 
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